रसना फिका बोलणा नित नित होइ खुआरु ॥
नानक किरति पइऐ कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥2॥
धनु धनु सत पुरखु सतिगुरू हमारा जितु मिलिऐ हम कउ सांति आई ॥
धनु धनु सत पुरखु सतिगुरू हमारा जितु मिलिऐ हम हरि भगति पाई ॥
धनु धनु हरि भगतु सतिगुरू हमारा जिस की सेवा ते हम हरि नामि लिव लाई ॥
धनु धनु हरि गिआनी सतिगुरू हमारा जिनि वैरी मित्रु हम कउ सभ सम द्रिसटि दिखाई ॥
धनु धनु सतिगुरू मित्रु हमारा जिनि हरि नाम सिउ हमारी प्रीति बणाई ॥19॥
घर ही मुंधि विदेसि पिरु नित झूरे संम्हाले ॥
मिलदिआ ढिल न होवई जे नीअति रासि करे ॥1॥
नानक गाली कूड़ीआ बाझु परीति करेइ ॥
तिचरु जाणै भला करि जिचरु लेवै देइ ॥2॥
जिनि उपाए जीअ तिनि हरि राखिआ ॥
अंम्रितु सचा नाउ भोजनु चाखिआ ॥
तिपति रहे आघाइ मिटी भभाखिआ ॥
सभ अंदरि इकु वरतै किनै विरलै लाखिआ ॥
जन नानक भए निहालु प्रभ की पाखिआ ॥20॥
सतिगुर नो सभु को वेखदा जेता जगतु संसारु ॥
डिठै मुकति न होवई जिचरु सबदि न करे वीचारु ॥
हउमै मैलु न चुकई नामि न लगै पिआरु ॥
इकि आपे बखसि मिलाइअनु दुबिधा तजि विकार ॥
नानक इकि दरसनु देखि मरि मिले सतिगुर हेति पिआरि ॥1॥
सतिगुरू न सेविओ मूरख अंध गवारि ॥
दूजै भाइ बहुतु दुखु लागा जलता करे पुकार ॥
जिन कारणि गुरू विसारिआ से न उपकरे अंती वार ॥
नानक गुरमती सुखु पाइआ बखसे बखसणहार ॥2॥
तू आपे आपि आपि सभु करता कोई दूजा होइ सु अवरो कहीऐ ॥
हरि आपे बोलै आपि बुलावै हरि आपे जलि थलि रवि रहीऐ ॥
हरि आपे मारै हरि आपे छोडै मन हरि सरणी पड़ि रहीऐ ॥
हरि बिनु कोई मारि जीवालि न सकै मन होइ निचिंद निसलु होइ रहीऐ ॥
उठदिआ बहदिआ सुतिआ सदा सदा हरि नामु धिआईऐ जन नानक गुरमुखि हरि लहीऐ ॥21॥1॥ सुधु
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस मनुष्य को सतिगुरू के शबद में रस नहीं आता।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।