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अंग 594

अंग
594
राग Vadhans
राग: Vadhans · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सबदै सादु न आइओ नामि न लगो पिआरु ॥
रसना फिका बोलणा नित नित होइ खुआरु ॥
नानक किरति पइऐ कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य को सतिगुरू के शबद में रस नहीं आता।नाम में जिसका प्यार नहीं जुड़ा। वह मनुष्य जीभ से फीके वचन ही बोलता है और सदा ख्वार होता है; (पर) हे नानक ! (उस के भी क्या वश।) (पिछले किए कर्मों के) उकरे हुए (संस्कारों के) अनुसार उसको (अब भी वैसा ही) कर्म करना पड़ता है;कोई मनुष्य (उसके संस्कारों को) मिटा नहीं सकता। 2।
पउड़ी ॥
धनु धनु सत पुरखु सतिगुरू हमारा जितु मिलिऐ हम कउ सांति आई ॥
धनु धनु सत पुरखु सतिगुरू हमारा जितु मिलिऐ हम हरि भगति पाई ॥
धनु धनु हरि भगतु सतिगुरू हमारा जिस की सेवा ते हम हरि नामि लिव लाई ॥
धनु धनु हरि गिआनी सतिगुरू हमारा जिनि वैरी मित्रु हम कउ सभ सम द्रिसटि दिखाई ॥
धनु धनु सतिगुरू मित्रु हमारा जिनि हरि नाम सिउ हमारी प्रीति बणाई ॥19॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हमारा सतपुरुख सतिगुरू धन्य है।जिसके मिलने से हमारे हृदय में ठंड पड़ी है। और जिसके मिलने से हमें परमात्मा की भक्ति मिली है। हरी का भक्त हमारा सतिगुरू धन्य है।जिसकी सेवा करके हमने हरी के नाम में बिरती जोड़ी है; हरी के ज्ञान वाला हमारा सतिगुरू धन्य है जिसने वैरी क्या और सज्जन क्या- सबकी ओर हमें एकता की नजर (से देखने की जाच) सिखाई है। हमारा सज्जन सतिगुरू धन्य है।जिसने हरी के नाम से हमारा प्यार बना दिया है। 19।
सलोकु मः 1 ॥
घर ही मुंधि विदेसि पिरु नित झूरे संम्हाले ॥
मिलदिआ ढिल न होवई जे नीअति रासि करे ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ पति का घर (भाव।हृदय) में ही है।(पर उसको) परदेस में (समझते हुए) कमली स्त्री सदा झुरती है और (उसे) याद करती है; अगर नीयत को साफ करे तो मिलते हुए ढील नहीं लगती। 1।
मः 1 ॥
नानक गाली कूड़ीआ बाझु परीति करेइ ॥
तिचरु जाणै भला करि जिचरु लेवै देइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ हे नानक ! (हरी से) प्यार के बिना (अर्थात।जब तक प्यार से वंचित रहे) और बातें (करनी) झूठी हैं; (क्योंकि इस तरह) तब तक (हरी को जीव) अच्छा समझता है जब तक (हरी) देता है और (जीव) लेता है (भाव।जब तक जीव को कुछ मिलता रहता है)। 2।
पउड़ी ॥
जिनि उपाए जीअ तिनि हरि राखिआ ॥
अंम्रितु सचा नाउ भोजनु चाखिआ ॥
तिपति रहे आघाइ मिटी भभाखिआ ॥
सभ अंदरि इकु वरतै किनै विरलै लाखिआ ॥
जन नानक भए निहालु प्रभ की पाखिआ ॥20॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिस हरी ने जीव पैदा किए हैं।उसने उनकी रक्षा की है; जो जीव उस हरी का आत्मिक जीवन देने वाला सच्चा नाम (रूप) भोजन खाते हैं और (इस भोजन से) वह बहुत अघा (तृप्त हो) जाते हैं उनकी और खाने की इच्छा समाप्त हो जाती है। सारे जीवों में एक प्रभू स्वयं व्यापक है।पर किसी विरले ने समझा है; और हे नानक ! (वह विरला) दास प्रभू का पक्ष करके खिला रहता है (प्रभू के साथ दृढता से जुड़ा रहके आनंदमयी रहता है)। 20।
सलोकु मः 3 ॥
सतिगुर नो सभु को वेखदा जेता जगतु संसारु ॥
डिठै मुकति न होवई जिचरु सबदि न करे वीचारु ॥
हउमै मैलु न चुकई नामि न लगै पिआरु ॥
इकि आपे बखसि मिलाइअनु दुबिधा तजि विकार ॥
नानक इकि दरसनु देखि मरि मिले सतिगुर हेति पिआरि ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ जितना ये सारा संसार है (इसमें) हरेक जीव सतिगुरू के दर्शन करता है (पर) निरे दर्शन करने से मुक्ति नहीं मिलती।जब तक जीव सतिगुरू के शबद में विचार नहीं करता। (क्योंकि विचार किए बिना) अहंकार (-रूपी मन की) मैल नहीं उतरती और नाम के प्रति प्यार उत्पन्न नहीं होता। कई मनुष्यों को प्रभू ने खुद ही मेहर करके मिला लिया है जिन्होंने मेर-तेर और विकार छोड़े हैं। हे नानक ! कई मनुष्य (सतिगुरू के) दर्शन करके सतिगुरू के प्यार में बिरती जोड़ के मर के (भाव।स्वैभाव का अहंकार गवा के) हरी में मिल गए हैं। 1।
मः 3 ॥
सतिगुरू न सेविओ मूरख अंध गवारि ॥
दूजै भाइ बहुतु दुखु लागा जलता करे पुकार ॥
जिन कारणि गुरू विसारिआ से न उपकरे अंती वार ॥
नानक गुरमती सुखु पाइआ बखसे बखसणहार ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3। अंधे मूर्ख गवार ने अपने सतिगुरू की सेवा नहीं की। माया के प्यार में जब बहुत दुखी हुआ तब जलता हुआ विरलाप करता है; और जिनके लिए सतिगुरू को विसारा था वे आखिरी वक्त पर (मुश्किल में) नहीं (उसका साथ देने पुकारने पर भी) नहीं आते। हे नानक ! गुरू की मति ले के ही सुख मिलता है और बख्शने वाला हरी बख्शता है। 2।
पउड़ी ॥
तू आपे आपि आपि सभु करता कोई दूजा होइ सु अवरो कहीऐ ॥
हरि आपे बोलै आपि बुलावै हरि आपे जलि थलि रवि रहीऐ ॥
हरि आपे मारै हरि आपे छोडै मन हरि सरणी पड़ि रहीऐ ॥
हरि बिनु कोई मारि जीवालि न सकै मन होइ निचिंद निसलु होइ रहीऐ ॥
उठदिआ बहदिआ सुतिआ सदा सदा हरि नामु धिआईऐ जन नानक गुरमुखि हरि लहीऐ ॥21॥1॥ सुधु
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे हरी ! आप स्वयं ही स्वयं है और स्वयं ही सब कुछ पैदा करता है।किसी और दूसरे को जन्मदाता तब कहें।जो कोई और हो ही। हरी खुद ही (सब जीवों में) बोलता है।खुद ही सबको बुलाता है और खुद ही जल में थल व्याप रहा है। हे मन ! हरी खुद ही मारता है और खुद ही बख्शता है।(इस वास्ते) हरी की शरण में पड़ा रह। हे मन ! हरी के बिना कोई और ना मार सकता है ना जीवित कर सकता है (इसलिए) निश्चिंत हो के लंबी तान ले (बेफिक्र हो जा।किसी और की ओट ना देख और सबसे बड़े हरी की आस रख)। हे दास नानक ! अगर उठते-बैठते सोए हुए हर वक्त हरी का नाम सिमरें तो सतिगुरू के सन्मुख हो के हरी मिल जाता है। 21। 1।सुधु।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस मनुष्य को सतिगुरू के शबद में रस नहीं आता।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।