राग सारंग
दोपहर का राग, गर्मी और लम्बाई का।
सारंग दोपहर का राग है, गर्मी और दिन की लम्बाई का स्वर। मध्यान्ह-सारंग, वृन्दावनी-सारंग, और कई दूसरे उप-राग इसी कुल के हैं।
ग्रंथ में सारंग की रचनाएँ अंग ग्यारह-सौ-अड़सठ के क़रीब से शुरू होती हैं। दोपहर की कीर्तन-संगति में अक्सर इसकी रचनाएँ गायी जाती हैं।
"हरि बिनु तेरो को न सहाई ॥" सारंग M9
इस राग के सब अंग
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 1 (38)
- अपुने ठाकुर की हउ चेरी ॥अंग 1197
- हरि बिनु किउ रहीऐ दुखु बिआपै ॥अंग 1197
- दूरि नाही मेरो प्रभु पिआरा ॥अंग 1197
- हरि बिनु किउ जीवा मेरी माई ॥अंग 1232
- हरि बिनु किउ धीरै मनु मेरा ॥अंग 1232
- न भीजै रागी नादी बेदि ॥अंग 1237
- नव छिअ खट का करे बीचारु ॥अंग 1237
- जिनसि थापि जीआं कउ भेजै जिनसि थापि लै जावै ॥अंग 1238
- जुड़ि जुड़ि विछुड़े विछुड़ि जुड़े ॥अंग 1238
- इकसु न पुजहि बोल जे पूरे पूरा करि मिलै ॥अंग 1239
- आखणि अउखा सुनणि अउखा आखि न जापी आखि ॥अंग 1239
- जूठि न रागंी जूठि न वेदंी ॥अंग 1240
- नानक चुलीआ सुचीआ जे भरि जाणै कोइ ॥अंग 1240
- दुख विचि जंमणु दुखि मरणु दुखि वरतणु संसारि ॥अंग 1240
- नानक दुनीआ भसु रंगु भसू हू भसु खेह ॥अंग 1240
- घरि नाराइणु सभा नालि ॥अंग 1240
- सभे सुरती जोग सभि सभे बेद पुराण ॥अंग 1241
- पुरीआ खंडा सिरि करे इक पैरि धिआए ॥अंग 1241
- है है आखां कोटि कोटि कोटी हू कोटि कोटि ॥अंग 1241
- सभे राती सभि दिह सभि थिती सभि वार ॥अंग 1241
- अखंी परणै जे फिरां देखां सभु आकारु ॥अंग 1241
- होरु सरीकु होवै कोई तेरा तिसु अगै तुधु आखां ॥अंग 1242
- जां न सिआ किआ चाकरी जां जंमे किआ कार ॥अंग 1242
- सासत्र बेद पुराण पड़॑ंता ॥अंग 1242
- जां हउ तेरा तां सभु किछु मेरा हउ नाही तू होवहि ॥अंग 1242
- कलि होई कुते मुही खाजु होआ मुरदारु ॥अंग 1242
- रंना होईआ बोधीआ पुरस होए सईआद ॥अंग 1243
- लख सिउ प्रीति होवै लख जीवणु किआ खुसीआ किआ चाउ ॥अंग 1243
- कापड़ु काठु रंगाइआ रांगि ॥अंग 1243
- बेदु पुकारे पुंनु पापु सुरग नरक का बीउ ॥अंग 1243
- मरणि न मूरतु पुछिआ पुछी थिति न वारु ॥अंग 1244
- नानक ढेरी ढहि पई मिटी संदा कोटु ॥अंग 1244
- धनवंता इव ही कहै अवरी धन कउ जाउ ॥अंग 1244
- सूरजु चड़ै विजोगि सभसै घटै आरजा ॥अंग 1244
- ध्रिगु तिना का जीविआ जि लिखि लिखि वेचहि नाउ ॥अंग 1245
- सचु वरतु संतोखु तीरथु गिआनु धिआनु इसनानु ॥अंग 1245
- गिआन विहूणा गावै गीत ॥अंग 1245
- मनहु जि अंधे कूप कहिआ बिरदु न जाणन॑ी ॥अंग 1246
महला 2 (9)
- गुरु कुंजी पाहू निवलु मनु कोठा तनु छति ॥अंग 1237
- आपि उपाए नानका आपे रखै वेक ॥अंग 1238
- साह चले वणजारिआ लिखिआ देवै नालि ॥अंग 1238
- जिन वडिआई तेरे नाम की ते रते मन माहि ॥अंग 1238
- कीता किआ सालाहीऐ करे सोइ सालाहि ॥अंग 1239
- तिसु सिउ कैसा बोलणा जि आपे जाणै जाणु ॥अंग 1239
- सिफति जिना कउ बखसीऐ सेई पोतेदार ॥अंग 1239
- कथा कहाणी बेदंी आणी पापु पुंनु बीचारु ॥अंग 1243
- जैसा करै कहावै तैसा ऐसी बनी जरूरति ॥अंग 1245
महला 3 (26)
- मन मेरे हरि कै नामि वडाई ॥अंग 1233
- मन मेरे हरि का नामु अति मीठा ॥अंग 1233
- मन मेरे हरि की अकथ कहाणी ॥अंग 1234
- नउमी नेमु सचु जे करै ॥अंग 1245
- पड़ि॑ पड़ि॑ पंडित मोुनी थके देसंतर भवि थके भेखधारी ॥अंग 1246
- नांगे आवणा नांगे जाणा हरि हुकमु पाइआ किआ कीजै ॥अंग 1246
- सहजे सुखि सुती सबदि समाइ ॥अंग 1247
- जिन॑ी नामु विसारिआ किआ जपु जापहि होरि ॥अंग 1247
- जिनी नामु विसारिआ बहु करम कमावहि होरि ॥अंग 1247
- जिचरु इहु मनु लहरी विचि है हउमै बहुतु अहंकारु ॥अंग 1247
- सो जपु तपु सेवा चाकरी जो खसमै भावै ॥अंग 1247
- विणु सतिगुर सेवे सुखु नही मरि जंमहि वारो वार ॥अंग 1248
- माइआ मोहि विसारिआ सचु मरणा हरि नामु ॥अंग 1248
- गुर का कहिआ जे करे सुखी हू सुखु सारु ॥अंग 1248
- सचु पुराणा ना थीऐ नामु न मैला होइ ॥अंग 1248
- मनमुख बोलि न जाणन॑ी ओना अंदरि कामु क्रोधु अहंकारु ॥अंग 1248
- हरि गुरमुखि तिन॑ी अराधिआ जिन॑ करमि परापति होइ ॥अंग 1248
- पड़ि पड़ि पंडित वादु वखाणदे माइआ मोह सुआइ ॥अंग 1249
- सचु वणजहि सचु सेवदे जि गुरमुखि पैरी पाहि ॥अंग 1249
- पराई अमाण किउ रखीऐ दिती ही सुखु होइ ॥अंग 1249
- मनि अनदु भइआ मिलिआ हरि प्रीतमु सरसे सजण संत पिआरे ॥अंग 1249
- गुरमुखि अंम्रितु नामु है जितु खाधै सभ भुख जाइ ॥अंग 1250
- बिनु सबदै जगि आन॑ेरु है सबदे परगटु होइ ॥अंग 1250
- माइआ मोहि विसारिआ गुर का भउ हेतु अपारु ॥अंग 1250
- अमरु वेपरवाहु है तिसु नालि सिआणप न चलई न हुजति करणी जाइ ॥अंग 1251
- दाति जोति सभ सूरति तेरी ॥अंग 1251
महला 4 (54)
- हरि के संत जना की हम धूरि ॥अंग 1198
- गोबिंद चरनन कउ बलिहारी ॥अंग 1198
- हरि हरि अंम्रित नामु देहु पिआरे ॥अंग 1199
- गोबिद की ऐसी कार कमाइ ॥अंग 1199
- मेरा मनु राम नामि मनु मानी ॥अंग 1199
- जपि मन राम नामु पड़्हु सारु ॥अंग 1200
- काहे पूत झगरत हउ संगि बाप ॥अंग 1200
- जपि मन जगंनाथ जगदीसरो जगजीवनो मनमोहन सिउ प्रीति लागी मै हरि हरि हरि टेक सभ दिनसु सभ राति ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1200
- जपि मन नरहरे नरहर सुआमी हरि सगल देव देवा स्री राम राम नामा हरि प्रीतमु मोरा ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1201
- जपि मन माधो मधुसूदनो हरि स्रीरंगो परमेसरो सति परमेसरो प्रभु अंतरजामी ॥अंग 1201
- जपि मन निरभउ ॥अंग 1201
- जपि मन गोविंदु हरि गोविंदु गुणी निधानु सभ स्रिसटि का प्रभो मेरे मन हरि बोलि हरि पुरखु अबिनासी ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1202
- जपि मन सिरी रामु ॥अंग 1202
- आपे आपि निरंजना जिनि आपु उपाइआ ॥अंग 1237
- गुरमुखि चलतु रचाइओनु गुण परगटी आइआ ॥अंग 1238
- मनमुखि दूजा भरमु है दूजै लोभाइआ ॥अंग 1238
- हरि का नामु निधानु है सेविऐ सुखु पाई ॥अंग 1239
- नामु निरंजनु निरमला सुणिऐ सुखु होई ॥अंग 1239
- नाइ सुणिऐ मनु रहसीऐ नामे सांति आई ॥अंग 1240
- नाइ सुणिऐ सभ सिधि है रिधि पिछै आवै ॥अंग 1240
- नाइ सुणिऐ सुचि संजमो जमु नेड़ि न आवै ॥अंग 1240
- नाइ मंनिऐ सुखु ऊपजै नामे गति होई ॥अंग 1241
- नाइ मंनिऐ कुलु उधरै सभु कुटंबु सबाइआ ॥अंग 1241
- नाइ मंनिऐ दुरमति गई मति परगटी आइआ ॥अंग 1242
- नाइ मंनिऐ सुरति ऊपजै नामे मति होई ॥अंग 1242
- नामु निरंजन अलखु है किउ लखिआ जाई ॥अंग 1242
- बाहरि भसम लेपन करे अंतरि गुबारी ॥अंग 1243
- जिन कै हिरदै मैलु कपटु है बाहरु धोवाइआ ॥अंग 1243
- निंमु बिरखु बहु संचीऐ अंम्रित रसु पाइआ ॥अंग 1244
- जिन अंदरि निंदा दुसटु है नक वढे नक वढाइआ ॥अंग 1244
- सभु कोई है खसम का खसमहु सभु को होइ ॥अंग 1244
- सभना दाता आपि है आपे मेलणहारु ॥अंग 1244
- गुरमुखि हिरदै सांति है नाउ उगवि आइआ ॥अंग 1244
- सतसंगति नामु निधानु है जिथहु हरि पाइआ ॥अंग 1244
- सतिगुरु अंम्रित बिरखु है अंम्रित रसि फलिआ ॥अंग 1245
- भूपति राजे रंग राइ संचहि बिखु माइआ ॥अंग 1245
- गुरमुखि सभ पवितु है धनु संपै माइआ ॥अंग 1246
- सतिगुरु सेवनि से वडभागी ॥अंग 1246
- गणतै सेव न होवई कीता थाइ न पाइ ॥अंग 1246
- खान मलूक कहाइदे को रहणु न पाई ॥अंग 1246
- गड़ि॑ काइआ सीगार बहु भांति बणाई ॥अंग 1247
- नामु सलाहनि नामु मंनि असथिरु जगि सोई ॥अंग 1247
- नामु सलाहनि भाउ करि निज महली वासा ॥अंग 1247
- सभु को लेखे विचि है मनमुखु अहंकारी ॥अंग 1247
- लेखा पड़ीऐ हरि नामु फिरि लेखु न होई ॥अंग 1248
- मंगत जनु जाचै दानु हरि देहु सुभाइ ॥अंग 1248
- आस करे सभु लोकु बहु जीवणु जाणिआ ॥अंग 1248
- आसा विचि अति दुखु घणा मनमुखि चितु लाइआ ॥अंग 1249
- इसतरी पुरखै बहु प्रीति मिलि मोहु वधाइआ ॥अंग 1249
- इसत्री पुरखै अति नेहु बहि मंदु पकाइआ ॥अंग 1250
- नानक जिसु बिनु घड़ी न जीवणा विसरे सरै न बिंद ॥अंग 1250
- सावणु आइआ झिमझिमा हरि गुरमुखि नामु धिआइ ॥अंग 1250
- गुर पूरे की दाति नित देवै चड़ै सवाईआ ॥अंग 1250
- वडा आपि अगंमु है वडी वडिआई ॥अंग 1251
महला 5 (147)
- सतिगुर मूरति कउ बलि जाउ ॥अंग 1202
- करत बुराई मानुख ते छपाई साखी भूत पवान ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1202
- अब मोरो नाचनो रहो ॥अंग 1203
- अब पूछे किआ कहा ॥अंग 1203
- माई धीरि रही प्रिअ बहुतु बिरागिओ ॥अंग 1203
- माई सति सति सति हरि सति सति सति साधा ॥अंग 1204
- मेरै मनि बासिबो गुर गोबिंद ॥अंग 1204
- अब मोहि राम भरोसउ पाए ॥अंग 1204
- ओुइ सुख का सिउ बरनि सुनावत ॥अंग 1205
- बिखई दिनु रैनि इव ही गुदारै ॥अंग 1205
- अवरि सभि भूले भ्रमत न जानिआ ॥अंग 1205
- अनदिनु राम के गुण कहीऐ ॥अंग 1206
- बलिहारी गुरदेव चरन ॥अंग 1206
- गाइओ री मै गुण निधि मंगल गाइओ ॥अंग 1206
- कैसे कहउ मोहि जीअ बेदनाई ॥अंग 1206
- रे मूड़॑े तू किउ सिमरत अब नाही ॥अंग 1207
- किउ जीवनु प्रीतम बिनु माई ॥अंग 1207
- उआ अउसर कै हउ बलि जाई ॥अंग 1207
- मनोरथ पूरे सतिगुर आपि ॥अंग 1207
- मन कहा लुभाईऐ आन कउ ॥अंग 1208
- मन सदा मंगल गोबिंद गाइ ॥अंग 1208
- हरि जन सगल उधारे संग के ॥अंग 1208
- हरि जन राम राम राम धिआंए ॥अंग 1208
- मोहन घरि आवहु करउ जोदरीआ ॥अंग 1209
- अब किआ सोचउ सोच बिसारी ॥अंग 1209
- अब मोहि सरब उपाव बिरकाते ॥अंग 1209
- अब मोहि लबधिओ है हरि टेका ॥अंग 1209
- मेरा मनु एकै ही प्रिअ मांगै ॥अंग 1209
- अब मोरो ठाकुर सिउ मनु मानां ॥अंग 1210
- मेरै मनि चीति आए प्रिअ रंगा ॥अंग 1210
- बचन नाद मेरे स्रवनहु पूरे देहा प्रिअ अंकि समानी ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1210
- अब मेरो पंचा ते संगु तूटा ॥अंग 1210
- अब मेरो ठाकुर सिउ मनु लीना ॥अंग 1210
- मोहन सभि जीअ तेरे तू तारहि ॥अंग 1211
- अब मोहि धनु पाइओ हरि नामा ॥अंग 1211
- मेरै मनि मिसट लगे प्रिअ बोला ॥अंग 1211
- रसना राम कहत गुण सोहं ॥अंग 1211
- नैनहु देखिओ चलतु तमासा ॥अंग 1211
- चरनह गोबिंद मारगु सुहावा ॥अंग 1212
- धिआइओ अंति बार नामु सखा ॥अंग 1212
- गुर मिलि ऐसे प्रभू धिआइआ ॥अंग 1212
- मेरै मनि सबदु लगो गुर मीठा ॥अंग 1212
- हरि हरि नामु दीओ गुरि साथे ॥अंग 1212
- रे मूड़॑े आन काहे कत जाई ॥अंग 1213
- ओअं प्रिअ प्रीति चीति पहिलरीआ ॥अंग 1213
- मन ओइ दिनस धंनि परवानां ॥अंग 1213
- अब मोरो सहसा दूखु गइआ ॥अंग 1213
- प्रभु मेरो इत उत सदा सहाई ॥अंग 1213
- अपना मीतु सुआमी गाईऐ ॥अंग 1214
- द्रिसटि न लिआवउ अवर काहू कउ माणि महति प्रभ तेरै ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1214
- प्रभ सिमरत दूख बिनासी ॥अंग 1214
- मेरो मनु जत कत तुझहि सम॑ारै ॥अंग 1214
- मन ते भै भउ दूरि पराइओ ॥अंग 1214
- अंम्रित नामु मनहि आधारो ॥अंग 1215
- बिनु प्रभ रहनु न जाइ घरी ॥अंग 1215
- रसना जपती तूही तूही ॥अंग 1215
- जाहू काहू अपुनो ही चिति आवै ॥अंग 1215
- झूठो माइआ को मद मानु ॥अंग 1215
- अपुनी इतनी कछू न सारी ॥अंग 1215
- मोहनी मोहत रहै न होरी ॥अंग 1216
- कहा करहि रे खाटि खाटुली ॥अंग 1216
- कोटि जोध उआ की बात न पुछीऐ तां दरगह भी मानिओ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1216
- हरि हरि दीओ सेवक कउ नाम ॥अंग 1216
- तू मेरे मीत सखा हरि प्रान ॥अंग 1216
- करहु गति दइआल संतहु मोरी ॥अंग 1217
- ठाकुर बिनती करन जनु आइओ ॥अंग 1217
- जा की राम नाम लिव लागी ॥अंग 1217
- अब जन ऊपरि को न पुकारै ॥अंग 1217
- हरि जन छोडिआ सगला आपु ॥अंग 1217
- मेरै गुरि मोरो सहसा उतारिआ ॥अंग 1218
- सिमरत नामु प्रान गति पावै ॥अंग 1218
- अपुने गुर पूरे बलिहारै ॥अंग 1218
- बिनु हरि है को कहा बतावहु ॥अंग 1218
- ठाकुर तुम॑ सरणाई आइआ ॥अंग 1218
- हरि के नाम की गति ठांढी ॥अंग 1219
- जिहवे अंम्रित गुण हरि गाउ ॥अंग 1219
- होती नही कवन कछु करणी ॥अंग 1219
- फीके हरि के नाम बिनु साद ॥अंग 1219
- नामु विसारि लगहि अन लालचि बिरथा जनमु पराणी ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1219
- धनवंत नाम के वणजारे ॥अंग 1219
- प्रभ जी मोहि कवनु अनाथु बिचारा ॥अंग 1220
- आवै राम सरणि वडभागी ॥अंग 1220
- जा ते साधू सरणि गही ॥अंग 1220
- रसना राम को जसु गाउ ॥अंग 1220
- बैकुंठ गोबिंद चरन नित धिआउ ॥अंग 1220
- साचे सतिगुरू दातारा ॥अंग 1221
- गुर के चरन बसे मन मेरै ॥अंग 1221
- जीवनु तउ गनीऐ हरि पेखा ॥अंग 1221
- सिमरन राम को इकु नाम ॥अंग 1221
- धूरतु सोई जि धुर कउ लागै ॥अंग 1221
- हरि हरि संत जना की जीवनि ॥अंग 1222
- हरि के नामहीन बेताल ॥अंग 1222
- मनि तनि राम को बिउहारु ॥अंग 1222
- हरि के नामहीन मति थोरी ॥अंग 1222
- चितवउ वा अउसर मन माहि ॥अंग 1222
- मेरा प्रभु संगे अंतरजामी ॥अंग 1222
- जा कै राम को बलु होइ ॥अंग 1223
- जीवतु राम के गुण गाइ ॥अंग 1223
- मन रे नाम को सुख सार ॥अंग 1223
- बिराजित राम को परताप ॥अंग 1223
- आतुरु नाम बिनु संसार ॥अंग 1223
- तिनि प्रभि साचै आपि भुलाइआ बिखै ठगउरी पीउ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1224
- रमण कउ राम के गुण बाद ॥अंग 1224
- कीन॑े पाप के बहु कोट ॥अंग 1224
- अंधे खावहि बिसू के गटाक ॥अंग 1224
- टूटी निंदक की अध बीच ॥अंग 1224
- त्रिसना चलत बहु परकारि ॥अंग 1224
- रे पापी तै कवन की मति लीन ॥अंग 1225
- माई री चरनह ओट गही ॥अंग 1225
- माई री मनु मेरो मतवारो ॥अंग 1225
- माई री आन सिमरि मरि जांहि ॥अंग 1225
- हरि काटी कुटिलता कुठारि ॥अंग 1225
- पोथी परमेसर का थानु ॥अंग 1226
- वूठा सरब थाई मेहु ॥अंग 1226
- साजन मीत सहाई तुम ही तू मेरो परवार ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1226
- निबही नाम की सचु खेप ॥अंग 1226
- माई री पेखि रही बिसमाद ॥अंग 1226
- माई री माती चरण समूह ॥अंग 1227
- बिनसे काच के बिउहार ॥अंग 1227
- ता ते करण पलाह करे ॥अंग 1227
- हरि के नाम के जन कांखी ॥अंग 1227
- माखी राम की तू माखी ॥अंग 1227
- माई री काटी जम की फास ॥अंग 1227
- माई री अरिओ प्रेम की खोरि ॥अंग 1228
- नीकी राम की धुनि सोइ ॥अंग 1228
- हरि के नाम की मति सार ॥अंग 1228
- मानी तूं राम कै दरि मानी ॥अंग 1228
- तुअ चरन आसरो ईस ॥अंग 1228
- हरि भजि आन करम बिकार ॥अंग 1229
- सुभ बचन बोलि गुन अमोल ॥अंग 1229
- कंचना बहु दत करा ॥अंग 1229
- राम राम राम जापि रमत राम सहाई ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1229
- हरि हरे हरि मुखहु बोलि हरि हरे मनि धारे ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1230
- नाम भगति मागु संत तिआगि सगल कामी ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1230
- गुन लाल गावउ गुर देखे ॥अंग 1230
- मनि बिरागैगी ॥ खोजती दरसार ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1230
- ऐसी होइ परी ॥अंग 1230
- लाल लाल मोहन गोपाल तू ॥अंग 1231
- करत केल बिखै मेल चंद्र सूर मोहे ॥अंग 1231
- गुसाइंी परतापु तुहारो डीठा ॥अंग 1235
- अगम अगाधि सुनहु जन कथा ॥अंग 1235
- सभ देखीऐ अनभै का दाता ॥अंग 1236
- धरति सुहावड़ी आकासु सुहंदा जपंदिआ हरि नाउ ॥अंग 1247
- सचु खाणा सचु पैनणा सचु नामु अधारु ॥अंग 1251
- सभे जीअ समालि अपणी मिहर करु ॥अंग 1251
- वुठे मेघ सुहावणे हुकमु कीता करतारि ॥अंग 1251
- हरि के संग बसे हरि लोक ॥अंग 1253
महला 9 (4)
- हरि बिनु तेरो को न सहाई ॥अंग 1231
- कहा मन बिखिआ सिउ लपटाही ॥अंग 1231
- कहा नर अपनो जनमु गवावै ॥अंग 1231
- मन करि कबहू न हरि गुन गाइओ ॥अंग 1231
भगत कबीर जी (3)
- कहा नर गरबसि थोरी बात ॥अंग 1251
- राजास्रम मिति नही जानी तेरी ॥अंग 1252
- हरि बिनु कउनु सहाई मन का ॥अंग 1253
भगत नामदेव जी (3)
- काएं रे मन बिखिआ बन जाइ ॥अंग 1252
- बदहु की न होड माधउ मो सिउ ॥अंग 1252
- दास अनिंन मेरो निज रूप ॥अंग 1252
अन्य भगत (1)
- तै नर किआ पुरानु सुनि कीना ॥अंग 1253