हींओु देंउ सभु मनु तनु अरपउ सीसु चरण परि राखिओ ॥2॥
चरण बंदना अमोल दासरो देंउ साधसंगति अरदागिओ ॥
करहु क्रिपा मोहि प्रभू मिलावहु निमख दरसु पेखागिओ ॥3॥
द्रिसटि भई तब भीतरि आइओ मेरा मनु अनदिनु सीतलागिओ ॥
कहु नानक रसि मंगल गाए सबदु अनाहदु बाजिओ ॥4॥5॥
माई सति सति सति हरि सति सति सति साधा ॥
बचनु गुरू जो पूरै कहिओ मै छीकि गांठरी बाधा ॥1॥ रहाउ ॥
निसि बासुर नखिअत्र बिनासी रवि ससीअर बेनाधा ॥
गिरि बसुधा जल पवन जाइगो इकि साध बचन अटलाधा ॥1॥
अंड बिनासी जेर बिनासी उतभुज सेत बिनाधा ॥
चारि बिनासी खटहि बिनासी इकि साध बचन निहचलाधा ॥2॥
राज बिनासी ताम बिनासी सातकु भी बेनाधा ॥
द्रिसटिमान है सगल बिनासी इकि साध बचन आगाधा ॥3॥
आपे आपि आप ही आपे सभु आपन खेलु दिखाधा ॥
पाइओ न जाई कही भांति रे प्रभु नानक गुर मिलि लाधा ॥4॥6॥
मेरै मनि बासिबो गुर गोबिंद ॥
जहां सिमरनु भइओ है ठाकुर तहां नगर सुख आनंद ॥1॥ रहाउ ॥
जहां बीसरै ठाकुरु पिआरो तहां दूख सभ आपद ॥
जह गुन गाइ आनंद मंगल रूप तहां सदा सुख संपद ॥1॥
जहा स्रवन हरि कथा न सुनीऐ तह महा भइआन उदिआनद ॥
जहां कीरतनु साधसंगति रसु तह सघन बास फलांनद ॥2॥
बिनु सिमरन कोटि बरख जीवै सगली अउध ब्रिथानद ॥
एक निमख गोबिंद भजनु करि तउ सदा सदा जीवानद ॥3॥
सरनि सरनि सरनि प्रभ पावउ दीजै साधसंगति किरपानद ॥
नानक पूरि रहिओ है सरब मै सगल गुणा बिधि जांनद ॥4॥7॥
अब मोहि राम भरोसउ पाए ॥
जो जो सरणि परिओ करुणानिधि ते ते भवहि तराए ॥1॥ रहाउ ॥
सुखि सोइओ अरु सहजि समाइओ सहसा गुरहि गवाए ॥
जो चाहत सोई हरि कीओ मन बांछत फल पाए ॥1॥
हिरदै जपउ नेत्र धिआनु लावउ स्रवनी कथा सुनाए ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे माँ !) निमाणों की तरह मैं बार-बार पूछती फिरती हूँ।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।