अंग 1228

अंग
1228
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਲੀਨੇ ਕਰਿ ਅਪੁਨੇ ਉਪਜੀ ਦਰਸ ਪਿਆਸ ॥
ਸੰਤਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਏ ਬਿਨਸੀ ਦੁਤੀਆ ਆਸ ॥੧॥
ਮਹਾ ਉਦਿਆਨ ਅਟਵੀ ਤੇ ਕਾਢੇ ਮਾਰਗੁ ਸੰਤ ਕਹਿਓ ॥
ਦੇਖਤ ਦਰਸੁ ਪਾਪ ਸਭਿ ਨਾਸੇ ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਰਤਨੁ ਲਹਿਓ ॥੨॥੧੦੦॥੧੨੩॥
करि किरपा लीने करि अपुने उपजी दरस पिआस ॥
संतसंगि मिलि हरि गुण गाए बिनसी दुतीआ आस ॥१॥
महा उदिआन अटवी ते काढे मारगु संत कहिओ ॥
देखत दरसु पाप सभि नासे हरि नानक रतनु लहिओ ॥२॥१००॥१२३॥

हिन्दी अर्थ: हे माँ ! मेहर कर के (जिनको परमात्मा ने) अपने बना लिया। उनके अंदर प्रभू के दर्शन की तमन्ना पैदा हो जाती है। वे मनुष्य साध-संगति में मिल के परमात्मा की परमात्मा की सिफतसालाह के गीत गाते हैं। (उनके अंदर से परमात्मा के बिना) कोई और दूसरी टेक खत्म हो जाती है। 1। हे नानक ! जिनको संत जनों ने (सही जीवन-) राह बता दिया। उनको उनके बड़े संघने जंगल (जैसे संसार-वन) से बाहर निकाल लिया। (परमात्मा का) दर्शन करके उन मनुष्यों के सारे पाप नाश हो गए। उन्होंने प्रभू का नाम-रत्न पा लिया। 2। 100। 123।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਾਈ ਰੀ ਅਰਿਓ ਪ੍ਰੇਮ ਕੀ ਖੋਰਿ ॥
ਦਰਸਨ ਰੁਚਿਤ ਪਿਆਸ ਮਨਿ ਸੁੰਦਰ ਸਕਤ ਨ ਕੋਈ ਤੋਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪ੍ਰਾਨ ਮਾਨ ਪਤਿ ਪਿਤ ਸੁਤ ਬੰਧਪ ਹਰਿ ਸਰਬਸੁ ਧਨ ਮੋਰ ॥
ਧ੍ਰਿਗੁ ਸਰੀਰੁ ਅਸਤ ਬਿਸਟਾ ਕ੍ਰਿਮ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਜਾਨਤ ਹੋਰ ॥੧॥
ਭਇਓ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਦੀਨ ਦੁਖ ਭੰਜਨੁ ਪਰਾ ਪੂਰਬਲਾ ਜੋਰ ॥
ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਿਧਿ ਸਾਗਰ ਬਿਨਸਿਓ ਆਨ ਨਿਹੋਰ ॥੨॥੧੦੧॥੧੨੪॥
सारग महला ५ ॥
माई री अरिओ प्रेम की खोरि ॥
दरसन रुचित पिआस मनि सुंदर सकत न कोई तोरि ॥१॥ रहाउ ॥
प्रान मान पति पित सुत बंधप हरि सरबसु धन मोर ॥
ध्रिगु सरीरु असत बिसटा क्रिम बिनु हरि जानत होर ॥१॥
भइओ क्रिपाल दीन दुख भंजनु परा पूरबला जोर ॥
नानक सरणि क्रिपा निधि सागर बिनसिओ आन निहोर ॥२॥१०१॥१२४॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे माँ ! (मेरा मन प्रीतम प्रभू के) प्यार के नशे में मस्त रहता है। मेरे मन में उसके दर्शन की लगन लगी रहती ह। उस सुंदर (के दर्शन) की चाहत बनी रहती है (यह लगन यह चाहत ऐसी है कि इसको) कोई तोड़ नहीं सकता। 1। रहाउ। हे माँ ! अब मेरे वास्ते प्रभू प्रीतम ही जिंद है। आसरा है। इज्जत है। पिता है। पुत्र है। सन्बंधी है। धन है। मेरा सब कुछ वही वही है। जो मनुष्य परमात्मा के बिना और-और सांझ बनाए रखता है। उसका शरीर धिक्कार-योग्य हो जाता है (क्योकि फिर यह मानस-शरीर सिर्फ) हड्डियां। गंदगी और कृमि ही है। 1। हे नानक ! (कह- हे माँ !) जिससे कोई आदि कदीमी का (परा-पूर्बला) जोड़ होता है। गरीबों के दुख दूर करने वाला प्रभू उस पर दयावान होता है। वह मनुष्य दया के खजाने मेहर के समुंद्र प्रभू की शरण पड़ता है। उसकी अन्य (सारी) मुथाजी समाप्त हो जाती है। 2। 101। 124।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਨੀਕੀ ਰਾਮ ਕੀ ਧੁਨਿ ਸੋਇ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਅਨੂਪ ਸੁਆਮੀ ਜਪਤ ਸਾਧੂ ਹੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚਿਤਵਤਾ ਗੋਪਾਲ ਦਰਸਨ ਕਲਮਲਾ ਕਢੁ ਧੋਇ ॥
ਜਨਮ ਮਰਨ ਬਿਕਾਰ ਅੰਕੁਰ ਹਰਿ ਕਾਟਿ ਛਾਡੇ ਖੋਇ ॥੧॥
ਪਰਾ ਪੂਰਬਿ ਜਿਸਹਿ ਲਿਖਿਆ ਬਿਰਲਾ ਪਾਏ ਕੋਇ ॥
ਰਵਣ ਗੁਣ ਗੋਪਾਲ ਕਰਤੇ ਨਾਨਕਾ ਸਚੁ ਜੋਇ ॥੨॥੧੦੨॥੧੨੫॥
सारग महला ५ ॥
नीकी राम की धुनि सोइ ॥
चरन कमल अनूप सुआमी जपत साधू होइ ॥१॥ रहाउ ॥
चितवता गोपाल दरसन कलमला कढु धोइ ॥
जनम मरन बिकार अंकुर हरि काटि छाडे खोइ ॥१॥
परा पूरबि जिसहि लिखिआ बिरला पाए कोइ ॥
रवण गुण गोपाल करते नानका सचु जोइ ॥२॥१०२॥१२५॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा की लगन (हृदय में बना)। परमात्मा की सिफतसालाह करनी- यह एक सुंदर (काम) है। हे भाई ! सुंदर मालिक प्रभू के सुंदर चरन जपते हुए मनुष्य भला नेक बन जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जगत के पालनहार प्रभू के दर्शनों की तमन्ना मन में बसाता हुआ (भाव। बसा के) (अपने अंदर से सारे) पाप धो के दूर कर ले। (अगर तू हरी-दर्शन की चाहत अपने अंदर पैदा करेगा तो) परमात्मा (तेरे अंदर से) जनम मरण के (सारी उम्र के) विकारों के फूट रहे बीज काट के नाश कर देगा। 1। यह दाति कोई वह विरला मनुष्य हासिल करता है जिसके माथे पर पूर्बले समय से (ये लेख) लिखे होते हैं हे नानक ! जो परमात्मा सदा कायम रहने वाला है उस करतार गोपाल के गुन गाने- । 2। 102। 125।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਕੀ ਮਤਿ ਸਾਰ ॥
ਹਰਿ ਬਿਸਾਰਿ ਜੁ ਆਨ ਰਾਚਹਿ ਮਿਥਨ ਸਭ ਬਿਸਥਾਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਧਸੰਗਮਿ ਭਜੁ ਸੁਆਮੀ ਪਾਪ ਹੋਵਤ ਖਾਰ ॥
ਚਰਨਾਰਬਿੰਦ ਬਸਾਇ ਹਿਰਦੈ ਬਹੁਰਿ ਜਨਮ ਨ ਮਾਰ ॥੧॥
ਕਰਿ ਅਨੁਗ੍ਰਹ ਰਾਖਿ ਲੀਨੇ ਏਕ ਨਾਮ ਅਧਾਰ ॥
ਦਿਨ ਰੈਨਿ ਸਿਮਰਤ ਸਦਾ ਨਾਨਕ ਮੁਖ ਊਜਲ ਦਰਬਾਰਿ ॥੨॥੧੦੩॥੧੨੬॥
सारग महला ५ ॥
हरि के नाम की मति सार ॥
हरि बिसारि जु आन राचहि मिथन सभ बिसथार ॥१॥ रहाउ ॥
साधसंगमि भजु सुआमी पाप होवत खार ॥
चरनारबिंद बसाइ हिरदै बहुरि जनम न मार ॥१॥
करि अनुग्रह राखि लीने एक नाम अधार ॥
दिन रैनि सिमरत सदा नानक मुख ऊजल दरबारि ॥२॥१०३॥१२६॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम सिमरन (की ओर प्रेरित करने) वाली बुद्धि (अन्य कार्यों की तरफ प्रेरित करने वाली बुद्धियों से) श्रेष्ठ है। जो मनुष्य परमात्मा को भुला के और-और आहरों में सदा व्यस्त रहते हैं उनके सारे पसारे (आखिर) व्यर्थ जाते हैं। 1। हे भाई ! साध-संगति में (टिक के) मालिक-प्रभू का भजन किया कर (सिमरन की बरकति से) सारे पाप नाश हो जाते हैं। हे भाई ! परमात्मा के सुंदर चरण अपने हृदय में बसाए रख। दोबारा जनम-मरण का चक्कर नहीं होगा। 1। हे नानक ! मेहर करके जिन मनुष्यों की प्रभू रक्षा करता है। उनको अपने नाम का सहारा देता है। दिन-रात सदा सिमरन करते हुए उनके मुँह प्रभू के दरबार में उज्जवल हो जाते हैं। 2। 103। 126।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਾਨੀ ਤੂੰ ਰਾਮ ਕੈ ਦਰਿ ਮਾਨੀ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਏ ਬਿਨਸੀ ਸਭ ਅਭਿਮਾਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਧਾਰਿ ਅਨੁਗ੍ਰਹੁ ਅਪਨੀ ਕਰਿ ਲੀਨੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪੂਰ ਗਿਆਨੀ ॥
ਸਰਬ ਸੂਖ ਆਨੰਦ ਘਨੇਰੇ ਠਾਕੁਰ ਦਰਸ ਧਿਆਨੀ ॥੧॥
ਨਿਕਟਿ ਵਰਤਨਿ ਸਾ ਸਦਾ ਸੁਹਾਗਨਿ ਦਹ ਦਿਸ ਸਾਈ ਜਾਨੀ ॥
ਪ੍ਰਿਅ ਰੰਗ ਰੰਗਿ ਰਤੀ ਨਾਰਾਇਨ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਕੁਰਬਾਨੀ ॥੨॥੧੦੪॥੧੨੭॥
सारग महला ५ ॥
मानी तूं राम कै दरि मानी ॥
साधसंगि मिलि हरि गुन गाए बिनसी सभ अभिमानी ॥१॥ रहाउ ॥
धारि अनुग्रहु अपनी करि लीनी गुरमुखि पूर गिआनी ॥
सरब सूख आनंद घनेरे ठाकुर दरस धिआनी ॥१॥
निकटि वरतनि सा सदा सुहागनि दह दिस साई जानी ॥
प्रिअ रंग रंगि रती नाराइन नानक तिसु कुरबानी ॥२॥१०४॥१२७॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ (हे जिंदे ! अगर तू भी यह उद्यम करे। तो) तू परमात्मा के दर पर अवश्य सत्कार हासिल करेगी। (हे जिंदे ! जिस जीव-स्त्री ने) साध-संगति में मिल के परमात्मा के गुण गाने आरम्भ कर दिए। उसके अंदर से अहंकार वाली मति सारी समाप्त हो गई। 1। रहाउ। हे जिंदे ! प्रभू ने मेहर करके (जिस जीव-स्त्री को) अपनी बना लिया। वह गुरू के सन्मुख र हके आत्मिक जीवन की पूरी सूझ वाली हो गई। उसके हृदय में सारे सुख अनेकों आनंद पैदा हो गए। उसकी सुरति मालिक-प्रभू के दर्शनों में जुड़ने लग गई। 1। हे जिंदे ! जो जीव-स्त्री सदा प्रभू-चरणों में टिकने लग गई। वह सदा के लिए सोहाग-भाग वाली हो गई। वही सारे जगत में प्रकट हो गई। हे नानक ! (कह-) मैं उस जीव-स्त्री से सदके हूँ जो प्यारे प्रभू के करिश्मों के रंग में रंगी रहती है। 2। 104। 127।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤੁਅ ਚਰਨ ਆਸਰੋ ਈਸ ॥
ਤੁਮਹਿ ਪਛਾਨੂ ਸਾਕੁ ਤੁਮਹਿ ਸੰਗਿ ਰਾਖਨਹਾਰ ਤੁਮੈ ਜਗਦੀਸ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੂ ਹਮਰੋ ਹਮ ਤੁਮਰੇ ਕਹੀਐ ਇਤ ਉਤ ਤੁਮ ਹੀ ਰਾਖੇ ॥
ਤੂ ਬੇਅੰਤੁ ਅਪਰੰਪਰੁ ਸੁਆਮੀ ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਕੋਈ ਲਾਖੈ ॥੧॥
ਬਿਨੁ ਬਕਨੇ ਬਿਨੁ ਕਹਨ ਕਹਾਵਨ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਜਾਨੈ ॥
ਜਾ ਕਉ ਮੇਲਿ ਲਏ ਪ੍ਰਭੁ ਨਾਨਕੁ ਸੇ ਜਨ ਦਰਗਹ ਮਾਨੇ ॥੨॥੧੦੫॥੧੨੮॥
सारग महला ५ ॥
तुअ चरन आसरो ईस ॥
तुमहि पछानू साकु तुमहि संगि राखनहार तुमै जगदीस ॥ रहाउ ॥
तू हमरो हम तुमरे कहीऐ इत उत तुम ही राखे ॥
तू बेअंतु अपरंपरु सुआमी गुर किरपा कोई लाखै ॥१॥
बिनु बकने बिनु कहन कहावन अंतरजामी जानै ॥
जा कउ मेलि लए प्रभु नानकु से जन दरगह माने ॥२॥१०५॥१२८॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे ईश्वर ! (हम जीवों को) तेरे चरणों का (ही) आसरा है। तू ही (हमारा) जान-पहचान वाला है। तेरे साथ ही हमारा मेल-मिलाप है। हे जगत के ईश्वर ! तू ही (हमारी) रक्षा कर सकने वाला है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! हरेक जीव यही कहता है कि तू हमारा है हम तेरे हैं। तू ही इस लोक और परलोक में रखवाला है। हे मालिक-प्रभू ! तू ही बेअंत है। परे से परे है। किसी विरले मनुष्य ने गुरू की मेहर से ये बात समझी है। 1। नानक (कहता है- हे भाई !) प्रभू हरेक के दिल की जानने वाला है। हमारे बोले बिना। हमारे कहे-कहाए बिना (हमारी जरूरतें) जान लेता है। वह प्रभू ! जिन को (अपने चरणों में) जोड़ लेता है। वह मनुष्य उसकी हजूरी में आदर-सम्मान प्राप्त करते हैं। 2। 105। 128।

संदर्भ: यह अंग 1228 है, राग सारंग का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Sangam Vihar में सुबह 4 बजे जब रसोई शुरू होती है।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 39 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1228” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: सारंग राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1229 →, पीछे का: ← अंग 1227

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।