अंग 1227

अंग
1227
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਾਈ ਰੀ ਮਾਤੀ ਚਰਣ ਸਮੂਹ ॥
ਏਕਸੁ ਬਿਨੁ ਹਉ ਆਨ ਨ ਜਾਨਉ ਦੁਤੀਆ ਭਾਉ ਸਭ ਲੂਹ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਿਆਗਿ ਗੋੁਪਾਲ ਅਵਰ ਜੋ ਕਰਣਾ ਤੇ ਬਿਖਿਆ ਕੇ ਖੂਹ ॥
ਦਰਸ ਪਿਆਸ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਮੋਹਿਓ ਕਾਢੀ ਨਰਕ ਤੇ ਧੂਹ ॥੧॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਮਿਲਿਓ ਸੁਖਦਾਤਾ ਬਿਨਸੀ ਹਉਮੈ ਹੂਹ ॥
ਰਾਮ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਦਾਸ ਨਾਨਕ ਮਉਲਿਓ ਮਨੁ ਤਨੁ ਜੂਹ ॥੨॥੯੫॥੧੧੮॥
सारग महला ५ ॥
माई री माती चरण समूह ॥
एकसु बिनु हउ आन न जानउ दुतीआ भाउ सभ लूह ॥१॥ रहाउ ॥
तिआगि गोुपाल अवर जो करणा ते बिखिआ के खूह ॥
दरस पिआस मेरा मनु मोहिओ काढी नरक ते धूह ॥१॥
संत प्रसादि मिलिओ सुखदाता बिनसी हउमै हूह ॥
राम रंगि राते दास नानक मउलिओ मनु तनु जूह ॥२॥९५॥११८॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे (मेरी) माँ ! मैं तो प्रभू के चरणों में पूरी तरह से मस्त रहती हूँ। उस एक के बिना मैं किसी और को जानती-पहचानती ही नहीं। (अपने अंदर से) औरों का प्यार मैं सरा जला चुकी हूँ। 1। रहाउ। हे माँ ! प्रभू को भुला के और जो जो भी काम किए जाते हैं। वे सारे माया (के मोह) के कूएं में फेंके जाते हैं। हे माँ ! मेरा मन तो गोपाल के दर्शनों की चाहत में मगन रहता है। मुझे उसने नर्कों में से खींच के निकाल लिया है। 1। हे दास नानक ! जिस मनुष्य को गुरू की कृपा से सारे सुखों को देने वाला प्रभू मिल जाता है। (उसके अंदर से) अहंकार का शोर समाप्त हो जाता है। जो मनुष्य परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। उनका मन उनका तन (इस प्रकार से) हरा-भरा हो जाता है (जैसे बरसात होने से) जूह (घास से हरी हो जाती है)। 2। 95। 118।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਬਿਨਸੇ ਕਾਚ ਕੇ ਬਿਉਹਾਰ ॥
ਰਾਮ ਭਜੁ ਮਿਲਿ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਇਹੈ ਜਗ ਮਹਿ ਸਾਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਈਤ ਊਤ ਨ ਡੋਲਿ ਕਤਹੂ ਨਾਮੁ ਹਿਰਦੈ ਧਾਰਿ ॥
ਗੁਰ ਚਰਨ ਬੋਹਿਥ ਮਿਲਿਓ ਭਾਗੀ ਉਤਰਿਓ ਸੰਸਾਰ ॥੧॥
ਜਲਿ ਥਲਿ ਮਹੀਅਲਿ ਪੂਰਿ ਰਹਿਓ ਸਰਬ ਨਾਥ ਅਪਾਰ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਉ ਨਾਨਕ ਆਨ ਰਸ ਸਭਿ ਖਾਰ ॥੨॥੯੬॥੧੧੯॥
सारग महला ५ ॥
बिनसे काच के बिउहार ॥
राम भजु मिलि साधसंगति इहै जग महि सार ॥१॥ रहाउ ॥
ईत ऊत न डोलि कतहू नामु हिरदै धारि ॥
गुर चरन बोहिथ मिलिओ भागी उतरिओ संसार ॥१॥
जलि थलि महीअलि पूरि रहिओ सरब नाथ अपार ॥
हरि नामु अंम्रितु पीउ नानक आन रस सभि खार ॥२॥९६॥११९॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! काँच (-समान माया की खातिर) सारी दौड़-भाग व्यर्थ जाती हैं। साध-संगति में मिल के परमात्मा का भजन किया कर। जगत में यही काम श्रेष्ठ है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा का नाम (अपने) हृदय में बसाए रख (इसकी बरकति से) ना इस लोक में ना परलोक में कहीं भी डोलेगा। जिस मनुष्य को किस्मत से गुरू के चरणों का जहाज मिल जाता है। वह संसार (समुंद्र) से पार लांघ जाता है। 1। हे नानक ! जो प्रभू जल में थल में आकाश में भरपूर है। जो सब जीवों का खसम है। जो बेअंत है। उसका आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीते रहा कर। (हरी-नाम-जल के मुकाबले पर) और सारे रस कड़वे हैं। 2। 96। 119।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤਾ ਤੇ ਕਰਣ ਪਲਾਹ ਕਰੇ ॥
ਮਹਾ ਬਿਕਾਰ ਮੋਹ ਮਦ ਮਾਤੌ ਸਿਮਰਤ ਨਾਹਿ ਹਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਜਪਤੇ ਨਾਰਾਇਣ ਤਿਨ ਕੇ ਦੋਖ ਜਰੇ ॥
ਸਫਲ ਦੇਹ ਧੰਨਿ ਓਇ ਜਨਮੇ ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਸੰਗਿ ਰਲੇ ॥੧॥
ਚਾਰਿ ਪਦਾਰਥ ਅਸਟ ਦਸਾ ਸਿਧਿ ਸਭ ਊਪਰਿ ਸਾਧ ਭਲੇ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਧੂਰਿ ਜਨ ਬਾਂਛੈ ਉਧਰਹਿ ਲਾਗਿ ਪਲੇ ॥੨॥੯੭॥੧੨੦॥
सारग महला ५ ॥
ता ते करण पलाह करे ॥
महा बिकार मोह मद मातौ सिमरत नाहि हरे ॥१॥ रहाउ ॥
साधसंगि जपते नाराइण तिन के दोख जरे ॥
सफल देह धंनि ओइ जनमे प्रभ कै संगि रले ॥१॥
चारि पदारथ असट दसा सिधि सभ ऊपरि साध भले ॥
नानक दास धूरि जन बांछै उधरहि लागि पले ॥२॥९७॥१२०॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! ( मनुष्य ) इसलिए (सदा) करुणा-प्रलाप करता रहता है- मनुष्य मोह अहंकार (आदि) बड़े-बड़े विकारों में मगन रहता है। परमात्मा का नाम नहीं सिमरता। । 1। रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य साध-संगति में (टिक के) परमात्मा का नाम जपते रहते हैं। उनके (अंदर से सारे) पाप जल जाते हैं। जो मनुष्य प्रभू के साथ (के चरणों में) जुड़े रहते हैं। वे भाग्यशाली हैं। उनका जनम उसका शरीर सफल हो जाता है। 1। हे भाई ! (धर्म। काम। मोक्ष- यह) चार पदार्थ और अठारह सिद्धियाँ (लोग इनती खातिर तरले-मिन्नतें करते फिरते हैं। पर इन) सबसे संत जन श्रेष्ठ हैं। दास नानक तो संत जनों के चरणों की धूड़ (नित्य) माँगता है। (संत जनों के) लड़ लग के (अनेकों जीव संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। 2। 97। 120।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਕੇ ਜਨ ਕਾਂਖੀ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਬਚਨਿ ਏਹੀ ਸੁਖੁ ਚਾਹਤ ਪ੍ਰਭ ਦਰਸੁ ਦੇਖਹਿ ਕਬ ਆਖੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੂ ਬੇਅੰਤੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਸੁਆਮੀ ਗਤਿ ਤੇਰੀ ਜਾਇ ਨ ਲਾਖੀ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਪ੍ਰੀਤਿ ਮਨੁ ਬੇਧਿਆ ਕਰਿ ਸਰਬਸੁ ਅੰਤਰਿ ਰਾਖੀ ॥੧॥
ਬੇਦ ਪੁਰਾਨ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਧੂ ਜਨ ਇਹ ਬਾਣੀ ਰਸਨਾ ਭਾਖੀ ॥
ਜਪਿ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਨਾਨਕ ਨਿਸਤਰੀਐ ਹੋਰੁ ਦੁਤੀਆ ਬਿਰਥੀ ਸਾਖੀ ॥੨॥੯੮॥੧੨੧॥
सारग महला ५ ॥
हरि के नाम के जन कांखी ॥
मनि तनि बचनि एही सुखु चाहत प्रभ दरसु देखहि कब आखी ॥१॥ रहाउ ॥
तू बेअंतु पारब्रहम सुआमी गति तेरी जाइ न लाखी ॥
चरन कमल प्रीति मनु बेधिआ करि सरबसु अंतरि राखी ॥१॥
बेद पुरान सिम्रिति साधू जन इह बाणी रसना भाखी ॥
जपि राम नामु नानक निसतरीऐ होरु दुतीआ बिरथी साखी ॥२॥९८॥१२१॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा के सेवक परमात्मा के नाम के चाहवान रहते हैं। अपने मन से। तन से वचन से वे सदा यही सुख माँगते हैं कि कब अपनी आँखों से परमात्मा के दर्शन करेंगे। 1। रहाउ। हे पारब्रहम ! हे मालिक प्रभू ! तेरा अंत नहीं पाया जा सकता। तू किस तरह का है- ये बात बयान नहीं की जा सकती। (पर तेरे संत जनों का) मन तेरे सुंदर चरणों की प्रीति में परोया रहता है। इस प्रीत को ही वह (जगत का) सारा धन-पदार्थ समझ के अपने अंदर थ्अकाए रखते हैं। 1। हे नानक ! वेद-पुराण स्मृतियां (आदि धम्र-पुस्तकों का पाठ) संत-जन। अपनी जीभ से यही सिफतसालाह की बाणी ही उचारते हैं। यही उनके लिए परमात्मा का नाम सिमर के (ही) संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। इसके बिना और कोई दूसरील बात व्यर्थ है। 2। 98। 121।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਾਖੀ ਰਾਮ ਕੀ ਤੂ ਮਾਖੀ ॥
ਜਹ ਦੁਰਗੰਧ ਤਹਾ ਤੂ ਬੈਸਹਿ ਮਹਾ ਬਿਖਿਆ ਮਦ ਚਾਖੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਿਤਹਿ ਅਸਥਾਨਿ ਤੂ ਟਿਕਨੁ ਨ ਪਾਵਹਿ ਇਹ ਬਿਧਿ ਦੇਖੀ ਆਖੀ ॥
ਸੰਤਾ ਬਿਨੁ ਤੈ ਕੋਇ ਨ ਛਾਡਿਆ ਸੰਤ ਪਰੇ ਗੋਬਿਦ ਕੀ ਪਾਖੀ ॥੧॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਗਲੇ ਤੈ ਮੋਹੇ ਬਿਨੁ ਸੰਤਾ ਕਿਨੈ ਨ ਲਾਖੀ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸੁ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨਿ ਰਾਤਾ ਸਬਦੁ ਸੁਰਤਿ ਸਚੁ ਸਾਖੀ ॥੨॥੯੯॥੧੨੨॥
सारग महला ५ ॥
माखी राम की तू माखी ॥
जह दुरगंध तहा तू बैसहि महा बिखिआ मद चाखी ॥१॥ रहाउ ॥
कितहि असथानि तू टिकनु न पावहि इह बिधि देखी आखी ॥
संता बिनु तै कोइ न छाडिआ संत परे गोबिद की पाखी ॥१॥
जीअ जंत सगले तै मोहे बिनु संता किनै न लाखी ॥
नानक दासु हरि कीरतनि राता सबदु सुरति सचु साखी ॥२॥९९॥१२२॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे माया ! तू मक्खी है। परमात्मा की पैदा की हुई मक्खी (के स्वभाव वाली)। (जैसे मक्खी सदा गंदगी पर बैठती है। वैसे) जहाँ विकारों की बदबू होती है तू वहाँ बैटती है। तू सदा विकारों का नशा ही रखती रहती है। 1। रहाउ। हे माया ! हमने अपनी आँखों से तेरा यह हाल देखा है कि तू किसी भी एक जगह पर नहीं टिकती। संतों के बिना तूने किसी को भी (दुखी करने से) नहीं छोड़ा (वह भी इस वास्ते बचते हें कि) संत परमात्मा की शरण पड़े रहते हैं। 1। हे माया ! (जगत के सारे ही) जीव तूने अपने वश में किए हुए हैं। संतों के बिना किसी भी और ने ये बात नहीं समझी। हे नानक ! परमात्मा का संत परमात्मा की सिफतसालाह (के रंग) में रंगा रहता है। संत (गुरू के) शबद को अपनी सुरति में टिका के सदा-स्थिर प्रभू के दर्शन करता रहता है। 2। 99। 122।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਾਈ ਰੀ ਕਾਟੀ ਜਮ ਕੀ ਫਾਸ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਪਤ ਸਰਬ ਸੁਖ ਪਾਏ ਬੀਚੇ ਗ੍ਰਸਤ ਉਦਾਸ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सारग महला ५ ॥
माई री काटी जम की फास ॥
हरि हरि जपत सरब सुख पाए बीचे ग्रसत उदास ॥१॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे माँ ! (जिन भाग्यशालियों की) आत्मिक मौत लाने वाली माया के मोह की फाही काटी गई। परमात्मा का नाम जपते हुए उन्होंने सारे सुख पा लिए। वे गृहस्त में रहते हुए ही (माया के मोह से) उपराम रहते हैं। 1। रहाउ।

संदर्भ: यह अंग 1227 है, राग सारंग का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Punjabi Bagh के gurdwara में अरदास के बाद का calm।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1227” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: सारंग राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1228 →, पीछे का: ← अंग 1226

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।