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अंग 1250

अंग
1250
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अंति होवै वैर विरोधु को सकै न छडाइआ ॥
नानक विणु नावै ध्रिगु मोहु जितु लगि दुखु पाइआ ॥32॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: आखिर। ये धन वैर-विरोध पैदा कर देता है (और धन की खातिर किए पापों से) कोई बचा नहीं सकता। हे नानक ! नाम से वंचित रह के ये मोह धिक्कार-योग्य है। क्योंकि इस मोह में लग के मनुष्य दुख पाता है। 32।
सलोक मः 3 ॥
गुरमुखि अंम्रितु नामु है जितु खाधै सभ भुख जाइ ॥
त्रिसना मूलि न होवई नामु वसै मनि आइ ॥
बिनु नावै जि होरु खाणा तितु रोगु लगै तनि धाइ ॥
नानक रस कस सबदु सलाहणा आपे लए मिलाइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ गुरू के पास प्रभू का नाम एक ऐसा पवित्र भोजन है जिसके खाने से (माया की) भूख सारी दूर हो जाती है। (माया की) तृष्णा बिल्कुल ही नहीं रहती। मन में प्रभू का नाम आ बसता है। प्रभू का नाम बिसार के खाने-पीने का जो भी कोई और चस्का (मनुष्य को लगता) है उससे (तृष्णा का) रोग शरीर में बड़ा गहरा असर डाल के आ ग्रसता है। हे नानक ! अगर मनुष्य (माया के) अनेकों किस्म के स्वादों की जगह गुरू के शबद को प्रभू की सिफत-सालाह को ग्रहण करे तो प्रभू स्वयं ही इसको अपने साथ मिला लेता है। 1।
मः 3 ॥
जीआ अंदरि जीउ सबदु है जितु सह मेलावा होइ ॥
बिनु सबदै जगि आन॑ेरु है सबदे परगटु होइ ॥
पंडित मोनी पड़ि पड़ि थके भेख थके तनु धोइ ॥
बिनु सबदै किनै न पाइओ दुखीए चले रोइ ॥
नानक नदरी पाईऐ करमि परापति होइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ प्रभू की सिफतसालाह ही जीवों के अंदर जिंदगी है। इस सिफतसालाह से पति-प्रभू से (जीव का) मिलाप होता है; प्रभू की सिफतसालाह से टूट के जगत में (आत्मिक जीवन से) अंधेरा है। शबद से ही (अंधेरा दूर हो के। आत्मिक जीवन की सूझ का) प्रकाश होता है। मुनि जन और पंडित (धार्मिक पुस्तकें) पढ़-पढ़ के हार गए। भेषधारी साधू तीर्थों पर स्नान कर-कर के थक गए। पर सिफत-सालाह की बाणी के बिना किसी को भी पति-प्रभू नहीं मिला। सब दुखी हो के रो के यहाँ से गए। हे नानक ! सिफतसालाह भी प्रभू की मेहर की नजर से मिलती है। प्रभू की बख्शिश से ही प्राप्त होती है। 2।
पउड़ी ॥
इसत्री पुरखै अति नेहु बहि मंदु पकाइआ ॥
दिसदा सभु किछु चलसी मेरे प्रभ भाइआ ॥
किउ रहीऐ थिरु जगि को कढहु उपाइआ ॥
गुर पूरे की चाकरी थिरु कंधु सबाइआ ॥
नानक बखसि मिलाइअनु हरि नामि समाइआ ॥33॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (अगर) मनुष्य का (अपनी) स्त्री के साथ बहुत प्यार है (तो इसका नतीजा आम तौर पर यही निकलता है कि) बैठ के कोई विकार की चितवनी ही चितवता है (और नाशवंत से मोह बढ़ता जाता है); पर। मेरे प्रभू की रज़ा यह है कि जो कुछ (आँखों से) दिखता है ये सब नाश हो जाना है। फिर कोई ऐसा उपाय तलाशो जिससे जगत में हमेशा टिके रह सकें (भाव। सदा टिके रहने वाले प्रभू से एक-सुर हो सकें)। (वह उपाय) पूरे सतिगुरू की (बताई हुई) सेवा-भगती ही है जिस के कारण सारा शरीर (भाव। सारी ज्ञानेन्द्रियां) (विकारों के मुकाबले में) अडोल रह सकती हैं। हे नानक ! जिन पर उस प्रभू ने मेहर करके (अपने साथ) मिलाया है वे उस हरी के नाम में लीन रहते हैं। 33।
सलोक मः 3 ॥
माइआ मोहि विसारिआ गुर का भउ हेतु अपारु ॥
लोभि लहरि सुधि मति गई सचि न लगै पिआरु ॥
गुरमुखि जिना सबदु मनि वसै दरगह मोख दुआरु ॥
नानक आपे मेलि लए आपे बखसणहारु ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ माया के मोह में पड़ के मनुष्य गुरू का अदब भुला देता है। और (यह भी) बिसार देता है कि गुरू (कितना) बेअंत प्यार (इससे करता है); लोभ-लहर में फंस के इसकी अकल-होश गुम हो जाती है। सदा-स्थिर प्रभू में इसका प्यार नहीं बनता। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों के मन में गुरू का शबद बसता है। उनको प्रभू की हजूरी प्राप्त हो जाती है। उनको माया के मोह से बचने का राह मिल जाता है; हे नानक ! बख्शणहार प्रभू स्वयं ही गुरमुखों को अपने साथ मिला लेता है। 1।
मः 4 ॥
नानक जिसु बिनु घड़ी न जीवणा विसरे सरै न बिंद ॥
तिसु सिउ किउ मन रूसीऐ जिसहि हमारी चिंद ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ हे नानक ! कह- जिस प्रभू के बिना एक घड़ी भी नहीं जीया जा सकता। जिसको एक घड़ी के लिए भी बिसार के नहीं निभती। हे मन ! जिस प्रभू को हमारा (हर वक्त) फिकर है। उससे रूठना ठीक नहीं। 2।
मः 4 ॥
सावणु आइआ झिमझिमा हरि गुरमुखि नामु धिआइ ॥
दुख भुख काड़ा सभु चुकाइसी मीहु वुठा छहबर लाइ ॥
सभ धरति भई हरीआवली अंनु जंमिआ बोहल लाइ ॥
हरि अचिंतु बुलावै क्रिपा करि हरि आपे पावै थाइ ॥
हरि तिसहि धिआवहु संत जनहु जु अंते लए छडाइ ॥
हरि कीरति भगति अनंदु है सदा सुखु वसै मनि आइ ॥
जिन॑ा गुरमुखि नामु अराधिआ तिना दुख भुख लहि जाइ ॥
जन नानकु त्रिपतै गाइ गुण हरि दरसनु देहु सुभाइ ॥3॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के हरी का नाम सिमरता है (उसके लिए। जैसे) झिमझिम बरसने वाला सावन (का महीना) आ जाता है। जब झड़ी लगा के वर्षा होती है। गर्मी और लोगों की भूख और दुख सब दूर कर देता है। (क्योंकि) सारी धरती पर हरियाली ही दिखती है और ढेरों के ढेर अन्न पैदा होता है। (इसी तरह। गुरमुख को) अचिंत प्रभू खुद ही मेहर करके अपने नजदीक लाता है। उसकी मेहनत को खुद ही प्रवान करता है। हे संत जनो ! उस प्रभू को याद करो जो आखिर (इन दुखों-भूखों से) खलासी दिलाता है। प्रभू की सिफतसालाह और बँदगी में ही (असल) आनंद है। सदा के लिए मन में सुख आ बसता है। जिन गुरमुखों ने नाम सिमरा है उनके दुख दूर हो जाते हैं। उनकी तृष्णा समाप्त हो जाती है। दास नानक भी प्रभू के गुण गा-गा के ही (माया की ओर से) तृप्त है (और अरज़ोई करता है-) हे हरी ! मेहर कर के दीदार दे। 3।
पउड़ी ॥
गुर पूरे की दाति नित देवै चड़ै सवाईआ ॥
तुसि देवै आपि दइआलु न छपै छपाईआ ॥
हिरदै कवलु प्रगासु उनमनि लिव लाईआ ॥
जे को करे उस दी रीस सिरि छाई पाईआ ॥
नानक अपड़ि कोइ न सकई पूरे सतिगुर की वडिआईआ ॥34॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ पूरे सतिगुरू की दी हुई (नाम की) दाति जो वह सदा देता है बढ़ती रहती है; (गुरू की मेहर की नजर के कारण यह दाति) दयालु प्रभू खुद प्रसन्न हो के देता है। और किसी के छुपाने से छुपती नहीं; (जिस मनुष्य पर गुरू की तरफ से बख्शिश हो उसके) हृदय का कमल फूल खिल उठता है। वह पूरन खिलाव में टिका रहता है (उसके हृदय में आनंदमयी अवस्था बनी रहती है); जो मनुष्य उसकी बराबरी करने का यतन करता है वह नामोशी ही कमाता है। हे नानक ! पूरे गुरू की बख्शी हुई वडिआई की कोई मनुष्य बराबरी नहीं कर सकता। 34।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।