Lulla Family

अंग 1201

अंग
1201
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सारंग महला 4 ॥
जपि मन नरहरे नरहर सुआमी हरि सगल देव देवा स्री राम राम नामा हरि प्रीतमु मोरा ॥1॥ रहाउ ॥
जितु ग्रिहि गुन गावते हरि के गुन गावते राम गुन गावते तितु ग्रिहि वाजे पंच सबद वड भाग मथोरा ॥
तिन॑ जन के सभि पाप गए सभि दोख गए सभि रोग गए कामु क्रोधु लोभु मोहु अभिमानु गए तिन॑ जन के हरि मारि कढे पंच चोरा ॥1॥
हरि राम बोलहु हरि साधू हरि के जन साधू जगदीसु जपहु मनि बचनि करमि हरि हरि आराधू हरि के जन साधू ॥
हरि राम बोलि हरि राम बोलि सभि पाप गवाधू ॥
नित नित जागरणु करहु सदा सदा आनंदु जपि जगदीसोुरा ॥
मन इछे फल पावहु सभै फल पावहु धरमु अरथु काम मोखु जन नानक हरि सिउ मिले हरि भगत तोरा ॥2॥2॥9॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सारंग महला 4 ॥ हे (मेरे) मन ! (सबके) मालिक नरहर-प्रभू का नाम जपा कर। सर्व-व्यापक राम का नाम जपा कर। वह हरी सारे देवताओं का देवता है। वही हरी मेरा प्रीतम है। 1। रहाउ। हे (मेरे) मन ! जिस (हृदय-) घर में परमात्मा के गुण गाए जाते हैं। हरी के गुण गाए जाते हैं। उस (हृदय-) घर में (मानो) पाँच ही किस्मों के साज बज रहे हैं और आनंद बना हुआ है। (पर यह अवस्था मनुष्यों के अंदर ही बनती है जिनके) माथे के बड़े भाग्य जागते हैं। हे मन ! उन मनुष्यों के सारे पाप दूर हो जाते हैं। सारे विकार दूर हो जाते हैं। सारे रोग दूर हो जाते हैं। (उनके अंदर से) काम क्रोध लोभ मोह अहंकार नाश हो जाते हैं। परमात्मा उनके अंदर से (आत्मिक जीवन की राशि चुराने वाले इन) पाँचों चोरों को मार के निकाल देता है। 1। हे संत जनो ! परमात्मा हरी का नाम उचारा करो। हे हरी के संत-जनो ! जगत के मालिक-प्रभू का नाम जपा करो। हे हरी के साध-जनो ! अपने मन से (हरेक) वचन से (हरेक) कर्म से प्रभू की आराधना किया करो। हरी का नाम उचार के। राम का नाम जप के सारे पाप दूर हो कर लेंगे। हे संत जनो ! सदा ही (विकारों के हमलों से) सचेत रहो। जगत के मालिक का नाम जप-जप के सदा ही आत्मिक आनंद बना रहता है। हे संत जनो ! (नाम की बरकति से) सारे मन-माँगे फल हासिल करेंगे। सारी मुरादें पा लेंगे। धर्म। काम। मोक्ष – ये चारों पदार्थ प्राप्त कर लेंगे। हे दास नानक ! (कह-) हे हरी ! जो मनुष्य आपके (चरणों) के साथ जुड़े रहते हैं वही आपके भगत हैं। 2। 2। 9।
सारग महला 4 ॥
जपि मन माधो मधुसूदनो हरि स्रीरंगो परमेसरो सति परमेसरो प्रभु अंतरजामी ॥
सभ दूखन को हंता सभ सूखन को दाता हरि प्रीतम गुन गाओु ॥1॥ रहाउ ॥
हरि घटि घटे घटि बसता हरि जलि थले हरि बसता हरि थान थानंतरि बसता मै हरि देखन को चाओु ॥
कोई आवै संतो हरि का जनु संतो मेरा प्रीतम जनु संतो मोहि मारगु दिखलावै ॥
तिसु जन के हउ मलि मलि धोवा पाओु ॥1॥
हरि जन कउ हरि मिलिआ हरि सरधा ते मिलिआ गुरमुखि हरि मिलिआ ॥
मेरै मनि तनि आनंद भए मै देखिआ हरि राओु ॥
जन नानक कउ किरपा भई हरि की किरपा भई जगदीसुर किरपा भई ॥
मै अनदिनो सद सद सदा हरि जपिआ हरि नाओु ॥2॥3॥10॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 4 ॥ हे मेरे मन ! हरेक दिल की जानने वाले प्रभू का नाम जपा कर। वही माया का पति है। वही मधू राक्षस को मारने वाला है। वही हरी लक्ष्मी का पति है। वही सबसे बड़ा मालिक है। वही सदा कायम रहने वाला है। हे मेरे मन ! हरी प्रीतम के गुण गाया कर। वही सारे दुखों का नाश करने वाला है। वही सारे सुखों को देंने वाला है। 1। रहाउ। हे मेरे मन ! वही हरेक शरीर में बसता है। जल में धरती में बसता है। हरेक जगह में बसता है। मेरे अंदर उसके दर्शनों की तमन्ना है। हे मेरे मन ! अगर कोई संत मुझे आ के मिले। हरी का कोई संत आ के मिले। कोई मेरा प्यारा संत जन मुझे आ मिले। और। मुझे (परमात्मा के मिलाप का) रास्ता दिखा जाए। मैं उसके पैर मल-मल के धोऊँ। 1। हे भाई ! परमात्मा अपने किसी सेवक को मिलता है। (सेवक की) श्रद्धा-भावना के साथ मिलता है। गुरू की शरण पड़ कर मिलता है। (गुरू की मेहर से जब मैंने भी) प्रभू-पातशाह के दर्शन किए। तो मेरे मन में मेरे तन में खुशी ही खुशी पैदा हो गई। हे भाई ! दास नानक पर (भी) मेहर हुई है। हरी की मेहर हुई है। जगत के मालिक की कृपा हुई है। मैं अब हर वक्त सदा ही सदा ही उस हरी का नाम जप रहा हूँ। 2। 3। 10।
सारग महला 4 ॥
जपि मन निरभउ ॥
सति सति सदा सति ॥
निरवैरु अकाल मूरति ॥
आजूनी संभउ ॥
मेरे मन अनदिनोु धिआइ निरंकारु निराहारी ॥1॥ रहाउ ॥
हरि दरसन कउ हरि दरसन कउ कोटि कोटि तेतीस सिध जती जोगी तट तीरथ परभवन करत रहत निराहारी ॥
तिन जन की सेवा थाइ पई जिन॑ कउ किरपाल होवतु बनवारी ॥1॥
हरि के हो संत भले ते ऊतम भगत भले जो भावत हरि राम मुरारी ॥
जिन॑ का अंगु करै मेरा सुआमी तिन॑ की नानक हरि पैज सवारी ॥2॥4॥11॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 4 ॥ हे (मेरे) मन ! उस परमात्मा का नाम जपा कर। जिसको किसी से कोई डर नहीं। जो सदा सदा ही कायम रहने वाला है। जिसका किसी के साथ कोई वैर नहीं। जिसकी हस्ती मौत से परे है। जो जूनियों में नहीं आता। जो अपने-आप से प्रकट होता है। हे मेरे मन ! हर वक्त उस परमात्मा का ध्यान धरा कर। जिसका कोई स्वरूप (मूर्ति। शकल) नहीं बयान किया जा सकता। जिसको किसी आहार की आवश्यक्ता नहीं। 1। रहाउ। हे मेरे मन ! उस परमात्मा के दर्शनों की खातिर तैंतिस करोड़ देवते। सिद्ध जती जोगी भूखे रह के अनेकों तीर्थों के रटन करते फिरते हैं। हे मन ! उन (भाग्यशालियों) की ही सेवा कबूल होती है जिन पर परमात्मा स्वयं दयावान होता है। 1। हे भाई ! वह हरी के संत अच्छे हैं। वह हरी के भगत श्रेष्ठ हैं जो दुष्ट-दमन परमात्मा को प्यारे लगते हैं। हे नानक ! मेरा मालिक-प्रभू जिन मनुष्यों का पक्ष करता है (लोक-परलोक में) उनकी इज्जत रख लेता है। 2। 4। 11।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारंग महला 4 ॥ हे (मेरे) मन ! (सबके) मालिक नरहर-प्रभू का नाम जपा कर।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।