जपि मन नरहरे नरहर सुआमी हरि सगल देव देवा स्री राम राम नामा हरि प्रीतमु मोरा ॥1॥ रहाउ ॥
जितु ग्रिहि गुन गावते हरि के गुन गावते राम गुन गावते तितु ग्रिहि वाजे पंच सबद वड भाग मथोरा ॥
तिन॑ जन के सभि पाप गए सभि दोख गए सभि रोग गए कामु क्रोधु लोभु मोहु अभिमानु गए तिन॑ जन के हरि मारि कढे पंच चोरा ॥1॥
हरि राम बोलहु हरि साधू हरि के जन साधू जगदीसु जपहु मनि बचनि करमि हरि हरि आराधू हरि के जन साधू ॥
हरि राम बोलि हरि राम बोलि सभि पाप गवाधू ॥
नित नित जागरणु करहु सदा सदा आनंदु जपि जगदीसोुरा ॥
मन इछे फल पावहु सभै फल पावहु धरमु अरथु काम मोखु जन नानक हरि सिउ मिले हरि भगत तोरा ॥2॥2॥9॥
जपि मन माधो मधुसूदनो हरि स्रीरंगो परमेसरो सति परमेसरो प्रभु अंतरजामी ॥
सभ दूखन को हंता सभ सूखन को दाता हरि प्रीतम गुन गाओु ॥1॥ रहाउ ॥
हरि घटि घटे घटि बसता हरि जलि थले हरि बसता हरि थान थानंतरि बसता मै हरि देखन को चाओु ॥
कोई आवै संतो हरि का जनु संतो मेरा प्रीतम जनु संतो मोहि मारगु दिखलावै ॥
तिसु जन के हउ मलि मलि धोवा पाओु ॥1॥
हरि जन कउ हरि मिलिआ हरि सरधा ते मिलिआ गुरमुखि हरि मिलिआ ॥
मेरै मनि तनि आनंद भए मै देखिआ हरि राओु ॥
जन नानक कउ किरपा भई हरि की किरपा भई जगदीसुर किरपा भई ॥
मै अनदिनो सद सद सदा हरि जपिआ हरि नाओु ॥2॥3॥10॥
जपि मन निरभउ ॥
सति सति सदा सति ॥
निरवैरु अकाल मूरति ॥
आजूनी संभउ ॥
मेरे मन अनदिनोु धिआइ निरंकारु निराहारी ॥1॥ रहाउ ॥
हरि दरसन कउ हरि दरसन कउ कोटि कोटि तेतीस सिध जती जोगी तट तीरथ परभवन करत रहत निराहारी ॥
तिन जन की सेवा थाइ पई जिन॑ कउ किरपाल होवतु बनवारी ॥1॥
हरि के हो संत भले ते ऊतम भगत भले जो भावत हरि राम मुरारी ॥
जिन॑ का अंगु करै मेरा सुआमी तिन॑ की नानक हरि पैज सवारी ॥2॥4॥11॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारंग महला 4 ॥ हे (मेरे) मन ! (सबके) मालिक नरहर-प्रभू का नाम जपा कर।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।