अंग 1226

अंग
1226
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੀਤਿਆ ਬਹੁਰਿ ਨ ਜੂਐ ਹਾਰਿ ॥੧॥
ਆਠ ਪਹਰ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਵਹ ਪੂਰਨ ਸਬਦਿ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸਨਿ ਦਾਸੁ ਜਨੁ ਤੇਰਾ ਪੁਨਹ ਪੁਨਹ ਨਮਸਕਾਰਿ ॥੨॥੮੯॥੧੧੨॥
जनमु पदारथु गुरमुखि जीतिआ बहुरि न जूऐ हारि ॥१॥
आठ पहर प्रभ के गुण गावह पूरन सबदि बीचारि ॥
नानक दासनि दासु जनु तेरा पुनह पुनह नमसकारि ॥२॥८९॥११२॥

हिन्दी अर्थ: गुरमुख इस कीमती मनुष्य जनम को (विकारों के मुकाबले में) कामयाब बना लेता है। फिर कभी इसको जूए में हार के नहीं जाता। 1। हे भाई ! आओ। मिल के सर्व-व्यापक प्रभू के गुणों को गुरू-शबद के द्वारा मन में बसा के आठों पहर उसके गुण गाते रहें। हे नानक ! (कह-) हे प्रभू ! मैं तेरे दासों का दास हूँ। (तेरे दर पर ही) बार-बार नमस्कार करता हूँ। 2। 89। 112।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪੋਥੀ ਪਰਮੇਸਰ ਕਾ ਥਾਨੁ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਗਾਵਹਿ ਗੁਣ ਗੋਬਿੰਦ ਪੂਰਨ ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਧਿਕ ਸਿਧ ਸਗਲ ਮੁਨਿ ਲੋਚਹਿ ਬਿਰਲੇ ਲਾਗੈ ਧਿਆਨੁ ॥
ਜਿਸਹਿ ਕ੍ਰਿਪਾਲੁ ਹੋਇ ਮੇਰਾ ਸੁਆਮੀ ਪੂਰਨ ਤਾ ਕੋ ਕਾਮੁ ॥੧॥
ਜਾ ਕੈ ਰਿਦੈ ਵਸੈ ਭੈ ਭੰਜਨੁ ਤਿਸੁ ਜਾਨੈ ਸਗਲ ਜਹਾਨੁ ॥
ਖਿਨੁ ਪਲੁ ਬਿਸਰੁ ਨਹੀ ਮੇਰੇ ਕਰਤੇ ਇਹੁ ਨਾਨਕੁ ਮਾਂਗੈ ਦਾਨੁ ॥੨॥੯੦॥੧੧੩॥
सारग महला ५ ॥
पोथी परमेसर का थानु ॥
साधसंगि गावहि गुण गोबिंद पूरन ब्रहम गिआनु ॥१॥ रहाउ ॥
साधिक सिध सगल मुनि लोचहि बिरले लागै धिआनु ॥
जिसहि क्रिपालु होइ मेरा सुआमी पूरन ता को कामु ॥१॥
जा कै रिदै वसै भै भंजनु तिसु जानै सगल जहानु ॥
खिनु पलु बिसरु नही मेरे करते इहु नानकु मांगै दानु ॥२॥९०॥११३॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! गुरबाणी (ही) परमात्मा के मिलाप का स्थान है। जो मनुष्य गुरू की संगति में र हके परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। वे मनुष्य सर्व-व्यापक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल लेते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! जोग-साधना करने वाले मनुष्य। जोग-साधना में सिद्ध-हस्त जोगी। सारे ऋषि-मुनि (परमात्मा के साथ मिलाप की) तमन्ना करते आ रहे हैं। पर किसी विरले की सुरति (उसमें) जुड़ती है। जिस मनुष्य पर मेरा मालिक-प्रभू स्वयं दयावान होता है। उसका (यह) काम सफल हो जाता है। 1। हे भाई ! सारे डरों का नाश करने वाला परमात्मा जिस मनुष्य के हृदय में आ बसता है उसको सारा जगत जान लेता है (सारे जगत में उसकी शोभा पसर जाती है)। (उस परमात्मा के दर पर) नानक यह दान माँगता है (कि) हे मेरे करतार ! (मेरे मन से कभी) एक छिन वास्ते एक पल के लिए भी ना बिसर। 2। 90। 113।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਵੂਠਾ ਸਰਬ ਥਾਈ ਮੇਹੁ ॥
ਅਨਦ ਮੰਗਲ ਗਾਉ ਹਰਿ ਜਸੁ ਪੂਰਨ ਪ੍ਰਗਟਿਓ ਨੇਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚਾਰਿ ਕੁੰਟ ਦਹ ਦਿਸਿ ਜਲ ਨਿਧਿ ਊਨ ਥਾਉ ਨ ਕੇਹੁ ॥
ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਿਧਿ ਗੋਬਿੰਦ ਪੂਰਨ ਜੀਅ ਦਾਨੁ ਸਭ ਦੇਹੁ ॥੧॥
ਸਤਿ ਸਤਿ ਹਰਿ ਸਤਿ ਸੁਆਮੀ ਸਤਿ ਸਾਧਸੰਗੇਹੁ ॥
ਸਤਿ ਤੇ ਜਨ ਜਿਨ ਪਰਤੀਤਿ ਉਪਜੀ ਨਾਨਕ ਨਹ ਭਰਮੇਹੁ ॥੨॥੯੧॥੧੧੪॥
सारग महला ५ ॥
वूठा सरब थाई मेहु ॥
अनद मंगल गाउ हरि जसु पूरन प्रगटिओ नेहु ॥१॥ रहाउ ॥
चारि कुंट दह दिसि जल निधि ऊन थाउ न केहु ॥
क्रिपा निधि गोबिंद पूरन जीअ दानु सभ देहु ॥१॥
सति सति हरि सति सुआमी सति साधसंगेहु ॥
सति ते जन जिन परतीति उपजी नानक नह भरमेहु ॥२॥९१॥११४॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा का यश गाया करो। (जैसे। ) बरसात (टोए-टिब्बे) सब जगह होती है (वैसे ही यश गायन करने वालों के हृदयों में) आनंद और खुशियों की बरखा होती है। सर्व-व्यापक परमात्मा का प्यार (हृदय में) पैदा हो जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (जीवन-) जल का खजाना प्रभू चारों कुंटों में दसों दिशाओं में (हर जगह मौजूद है) कोई भी जगह (उसके अस्तित्व से) खाली नहीं। (उसका इस तरह यश गाया करो-) हे दया के खजाने ! हे गोबिंद ! हे सर्व-व्यापक ! तू सब जीवों को ही जीवन-दाति देता है। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा सदा ही अटल रहने वाला है (जहाँ वह मिलता है। वह) साध-संगति भी धुर से चली आ रही है। जिन मनुष्यों के हृदय में परमात्मा के प्रति श्रद्धा पैदा हो जाती है। वे भी अटल धार्मिक जीवन वाले हो जाते हैं। उनको कोई भटकना नहीं रह जाती। 2। 91। 114।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੋਬਿਦ ਜੀਉ ਤੂ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰ ॥
ਸਾਜਨ ਮੀਤ ਸਹਾਈ ਤੁਮ ਹੀ ਤੂ ਮੇਰੋ ਪਰਵਾਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰੁ ਮਸਤਕਿ ਧਾਰਿਓ ਮੇਰੈ ਮਾਥੈ ਸਾਧਸੰਗਿ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥
ਤੁਮਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਸਭ ਫਲ ਪਾਏ ਰਸਕਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਧਿਆਏ ॥੧॥
ਅਬਿਚਲ ਨੀਵ ਧਰਾਈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਕਬਹੂ ਡੋਲਤ ਨਾਹੀ ॥
ਗੁਰ ਨਾਨਕ ਜਬ ਭਏ ਦਇਆਰਾ ਸਰਬ ਸੁਖਾ ਨਿਧਿ ਪਾਂਹੀ ॥੨॥੯੨॥੧੧੫॥
सारग महला ५ ॥
गोबिद जीउ तू मेरे प्रान अधार ॥
साजन मीत सहाई तुम ही तू मेरो परवार ॥१॥ रहाउ ॥
करु मसतकि धारिओ मेरै माथै साधसंगि गुण गाए ॥
तुमरी क्रिपा ते सभ फल पाए रसकि राम नाम धिआए ॥१॥
अबिचल नीव धराई सतिगुरि कबहू डोलत नाही ॥
गुर नानक जब भए दइआरा सरब सुखा निधि पांही ॥२॥९२॥११५॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे प्रभू जी ! तू मेरे प्राणों का आसरा है। तू ही मेरा सज्जन है। तू ही मेरा मित्र है। तू ही मेरी मदद करने वाला है। तू ही मेरीा परिवार है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! जब तूने मेरे माथे पर मेरे मस्तक पर (अपनी मेहर का) हाथ रखा। तब मैंने साध-संगति में (टिक के तेरी) सिफत-सालाह के गीत गाए हैं। हे प्रभू ! तेरी मेहर से मैंने सारे फल हासिल किए हैं। और प्यार से तेरा नाम सिमरा है। 1। हे भाई ! सतिगुरू ने (जिन मनुष्यों के हृदय में हरी-नाम सिमरन की) अटल नींव रख दी। वे कभी (माया में) डोलते नहीं हैं। हे नानक ! (कह-) जब सतिगुरू जी दयावान होते हैं। वह सारे सुखों के खजाने परमात्मा का मिलाप हासिल कर लेते हैं। 2। 92। 115।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਨਿਬਹੀ ਨਾਮ ਕੀ ਸਚੁ ਖੇਪ ॥
ਲਾਭੁ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ਨਿਧਿ ਧਨੁ ਬਿਖੈ ਮਾਹਿ ਅਲੇਪ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਗਲ ਸੰਤੋਖੇ ਆਪਨਾ ਪ੍ਰਭੁ ਧਿਆਇ ॥
ਰਤਨ ਜਨਮੁ ਅਪਾਰ ਜੀਤਿਓ ਬਹੁੜਿ ਜੋਨਿ ਨ ਪਾਇ ॥੧॥
ਭਏ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਦਇਆਲ ਗੋਬਿਦ ਭਇਆ ਸਾਧੂ ਸੰਗੁ ॥
ਹਰਿ ਚਰਨ ਰਾਸਿ ਨਾਨਕ ਪਾਈ ਲਗਾ ਪ੍ਰਭ ਸਿਉ ਰੰਗੁ ॥੨॥੯੩॥੧੧੬॥
सारग महला ५ ॥
निबही नाम की सचु खेप ॥
लाभु हरि गुण गाइ निधि धनु बिखै माहि अलेप ॥१॥ रहाउ ॥
जीअ जंत सगल संतोखे आपना प्रभु धिआइ ॥
रतन जनमु अपार जीतिओ बहुड़ि जोनि न पाइ ॥१॥
भए क्रिपाल दइआल गोबिद भइआ साधू संगु ॥
हरि चरन रासि नानक पाई लगा प्रभ सिउ रंगु ॥२॥९३॥११६॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम का सदा कायम रहने वाला व्यापार का लादा हुआ माल जिस जीव-बनजारे के साथ सदा का साथ बना लेता है। वह जीव-बंजारा (सदा) परमात्मा के गुण गाता रहता है। यही असल कमाई है। यही असल खजाना है यही असल धन है। (इसकी बरकति से) वह जीव-वणजारा (मायावी) पदार्थों में निर्लिप रहता है। 1। रहाउ। हे भाई ! अपने प्रभू का ध्यान धर के सारे जीव संतोख वाला जीवन हासिल कर लेते हैं। जिस भी मनुष्य ने यह बेयंत कीमती मनुष्य-जनम विकारों के हमलों से बचा लिया। वह बार-बार जूनियों में नहीं पड़ता। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जिस मनुष्य पर प्रभू जी दयावान होते हैं। उसको गुरू का मिलाप हासिल होता है। वह मनुष्य प्रभू के चरणों की प्रीति का सरमाया हासिल कर लेता है। उसका प्रभू के साथ प्यार बन जाता है। 2। 93। 116।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਾਈ ਰੀ ਪੇਖਿ ਰਹੀ ਬਿਸਮਾਦ ॥
ਅਨਹਦ ਧੁਨੀ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਮੋਹਿਓ ਅਚਰਜ ਤਾ ਕੇ ਸ੍ਵਾਦ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਬੰਧਪ ਹੈ ਸੋਈ ਮਨਿ ਹਰਿ ਕੋ ਅਹਿਲਾਦ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਗਾਏ ਗੁਨ ਗੋਬਿੰਦ ਬਿਨਸਿਓ ਸਭੁ ਪਰਮਾਦ ॥੧॥
ਡੋਰੀ ਲਪਟਿ ਰਹੀ ਚਰਨਹ ਸੰਗਿ ਭ੍ਰਮ ਭੈ ਸਗਲੇ ਖਾਦ ॥
ਏਕੁ ਅਧਾਰੁ ਨਾਨਕ ਜਨ ਕੀਆ ਬਹੁਰਿ ਨ ਜੋਨਿ ਭ੍ਰਮਾਦ ॥੨॥੯੪॥੧੧੭॥
सारग महला ५ ॥
माई री पेखि रही बिसमाद ॥
अनहद धुनी मेरा मनु मोहिओ अचरज ता के स्वाद ॥१॥ रहाउ ॥
मात पिता बंधप है सोई मनि हरि को अहिलाद ॥
साधसंगि गाए गुन गोबिंद बिनसिओ सभु परमाद ॥१॥
डोरी लपटि रही चरनह संगि भ्रम भै सगले खाद ॥
एकु अधारु नानक जन कीआ बहुरि न जोनि भ्रमाद ॥२॥९४॥११७॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे (मेरी) माँ ! (प्रभू के करिश्मे) देख के मैं हैरान हो रही हूँ। जिस प्रभू की जीवन-रौंअ एक-रस (सारे जगत में) रुमक रही है उसने मेरा मन मोह लिया है। उसके (मिलाप के) आनंद भी हैरान करने वाले हैं। 1। रहाउ। हे माँ ! (सब जीवों का) माता-पिता संबंधी वह प्रभू ही है। (मेरे) मन में उस प्रभू (के मिलाप) का हुलारा आ रहा है। हे माँ ! जिस मनुष्य ने साध-संगति में (टिक के) उसकी सिफत-सालाह के गीत गाए हैं। उसका सारा भरम-भुलेखा दूर हो गया। 1। हे दास नानक ! जिस मनुष्य के चिक्त की डोर प्रभू के चरणों के साथ जुड़ी रहती है। उसके सारे भ्रम सारे डर समाप्त हो जाते हैं। जिसने सिर्फ हरी-नाम को अपनी जिंदगी का आसरा बना लिया। वह बार-बार जूनियों में नहीं भटकता। 2। 94। 117।

संदर्भ: यह अंग 1226 है, राग सारंग का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Chittaranjan Park के Bengali-दुर्गा-puja के बीच पंडाल में किसी quiet pause में।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1226” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: सारंग राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1227 →, पीछे का: ← अंग 1225

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।