अंग
1225
राग सारंग
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪੂਰਨ ਹੋਤ ਨ ਕਤਹੁ ਬਾਤਹਿ ਅੰਤਿ ਪਰਤੀ ਹਾਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਂਤਿ ਸੂਖ ਨ ਸਹਜੁ ਉਪਜੈ ਇਹੈ ਇਸੁ ਬਿਉਹਾਰਿ ॥
ਆਪ ਪਰ ਕਾ ਕਛੁ ਨ ਜਾਨੈ ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧਹਿ ਜਾਰਿ ॥੧॥
ਸੰਸਾਰ ਸਾਗਰੁ ਦੁਖਿ ਬਿਆਪਿਓ ਦਾਸ ਲੇਵਹੁ ਤਾਰਿ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਸਰਣਾਇ ਨਾਨਕ ਸਦ ਸਦਾ ਬਲਿਹਾਰਿ ॥੨॥੮੪॥੧੦੭॥
ਸਾਂਤਿ ਸੂਖ ਨ ਸਹਜੁ ਉਪਜੈ ਇਹੈ ਇਸੁ ਬਿਉਹਾਰਿ ॥
ਆਪ ਪਰ ਕਾ ਕਛੁ ਨ ਜਾਨੈ ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧਹਿ ਜਾਰਿ ॥੧॥
ਸੰਸਾਰ ਸਾਗਰੁ ਦੁਖਿ ਬਿਆਪਿਓ ਦਾਸ ਲੇਵਹੁ ਤਾਰਿ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਸਰਣਾਇ ਨਾਨਕ ਸਦ ਸਦਾ ਬਲਿਹਾਰਿ ॥੨॥੮੪॥੧੦੭॥
पूरन होत न कतहु बातहि अंति परती हारि ॥१॥ रहाउ ॥
सांति सूख न सहजु उपजै इहै इसु बिउहारि ॥
आप पर का कछु न जानै काम क्रोधहि जारि ॥१॥
संसार सागरु दुखि बिआपिओ दास लेवहु तारि ॥
चरन कमल सरणाइ नानक सद सदा बलिहारि ॥२॥८४॥१०७॥
सांति सूख न सहजु उपजै इहै इसु बिउहारि ॥
आप पर का कछु न जानै काम क्रोधहि जारि ॥१॥
संसार सागरु दुखि बिआपिओ दास लेवहु तारि ॥
चरन कमल सरणाइ नानक सद सदा बलिहारि ॥२॥८४॥१०७॥
हिन्दी अर्थ: किसी भी बात से (यह तृष्णा) तृप्त नहीं होती। (जिंदगी के आखिर तक) यह सफल नहीं होती (और-और बढ़ती ही रहती है)। 1। रहाउ। हे भाई ! (तृष्धा के कारण मनुष्य के मन में कभी) शांति पैदा नहीं होती। आनंद नहीं बनता। आत्मिक अडोलता नहीं उपजती। बस ! इस तृष्णा का (सदा) यही व्यवहार है। काम और क्रोध से (यह तृष्णा मनुष्य का अंदरला) जला देती है। किसी का लिहज़ नहीं करतीै। 1। हे भाई ! तृष्णा के कारण जीव पर संसार-समुंद्र अपना जोर डाले रखता है। (जीव) दुख में फसा रहता है। (पर। हे प्रभू !) तू अपने सेवकों को (इस संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। हे नानक ! कह- (हे प्रभू !) मैं (भी) तेरे सुंदर चरणों की शरण आया हूँ। मैं तुझसे सदा-सदा सदके जाता हूँ। 2। 84। 107।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਰੇ ਪਾਪੀ ਤੈ ਕਵਨ ਕੀ ਮਤਿ ਲੀਨ ॥
ਨਿਮਖ ਘਰੀ ਨ ਸਿਮਰਿ ਸੁਆਮੀ ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਜਿਨਿ ਦੀਨ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਖਾਤ ਪੀਵਤ ਸਵੰਤ ਸੁਖੀਆ ਨਾਮੁ ਸਿਮਰਤ ਖੀਨ ॥
ਗਰਭ ਉਦਰ ਬਿਲਲਾਟ ਕਰਤਾ ਤਹਾਂ ਹੋਵਤ ਦੀਨ ॥੧॥
ਮਹਾ ਮਾਦ ਬਿਕਾਰ ਬਾਧਾ ਅਨਿਕ ਜੋਨਿ ਭ੍ਰਮੀਨ ॥
ਗੋਬਿੰਦ ਬਿਸਰੇ ਕਵਨ ਦੁਖ ਗਨੀਅਹਿ ਸੁਖੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਪਦ ਚੀਨੑ ॥੨॥੮੫॥੧੦੮॥
ਰੇ ਪਾਪੀ ਤੈ ਕਵਨ ਕੀ ਮਤਿ ਲੀਨ ॥
ਨਿਮਖ ਘਰੀ ਨ ਸਿਮਰਿ ਸੁਆਮੀ ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਜਿਨਿ ਦੀਨ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਖਾਤ ਪੀਵਤ ਸਵੰਤ ਸੁਖੀਆ ਨਾਮੁ ਸਿਮਰਤ ਖੀਨ ॥
ਗਰਭ ਉਦਰ ਬਿਲਲਾਟ ਕਰਤਾ ਤਹਾਂ ਹੋਵਤ ਦੀਨ ॥੧॥
ਮਹਾ ਮਾਦ ਬਿਕਾਰ ਬਾਧਾ ਅਨਿਕ ਜੋਨਿ ਭ੍ਰਮੀਨ ॥
ਗੋਬਿੰਦ ਬਿਸਰੇ ਕਵਨ ਦੁਖ ਗਨੀਅਹਿ ਸੁਖੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਪਦ ਚੀਨੑ ॥੨॥੮੫॥੧੦੮॥
सारग महला ५ ॥
रे पापी तै कवन की मति लीन ॥
निमख घरी न सिमरि सुआमी जीउ पिंडु जिनि दीन ॥१॥ रहाउ ॥
खात पीवत सवंत सुखीआ नामु सिमरत खीन ॥
गरभ उदर बिललाट करता तहां होवत दीन ॥१॥
महा माद बिकार बाधा अनिक जोनि भ्रमीन ॥
गोबिंद बिसरे कवन दुख गनीअहि सुखु नानक हरि पद चीन॑ ॥२॥८५॥१०८॥
रे पापी तै कवन की मति लीन ॥
निमख घरी न सिमरि सुआमी जीउ पिंडु जिनि दीन ॥१॥ रहाउ ॥
खात पीवत सवंत सुखीआ नामु सिमरत खीन ॥
गरभ उदर बिललाट करता तहां होवत दीन ॥१॥
महा माद बिकार बाधा अनिक जोनि भ्रमीन ॥
गोबिंद बिसरे कवन दुख गनीअहि सुखु नानक हरि पद चीन॑ ॥२॥८५॥१०८॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे पापी ! तूने किस की (बुरी) मति ले ली है। जिस मालिक-प्रभू ने तुझे यह जिंद दी। यह शरीर दिया। उसको तू बघड़ी भर के लिए भी आँख झपकने जितने समय के लिए भी याद नहीं करता। 1। रहाउ। हे पापी ! खाता। पीता। सोता तो तू खुश रहता है पर प्रभू का नाम सिमरते हुए तू आलसी हो जाता है। जब तू माँ के पेट में था। तब बिलकता था। तब तू गरीबड़ा सा बना रहता था। 1। हे पापी ! बड़े-बड़े विकारों की मस्ती में बंधा हुआ तू अनेकों जूनियों में भटकता आ रहा है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा का नाम भूलने से इतने दुख आते हैं कि गिने नहीं जा सकते। परमात्मा के चरणों से सांझ डालने से ही सुख मिलता है। 2। 85। 108।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਾਈ ਰੀ ਚਰਨਹ ਓਟ ਗਹੀ ॥
ਦਰਸਨੁ ਪੇਖਿ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਮੋਹਿਓ ਦੁਰਮਤਿ ਜਾਤ ਬਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਗਹ ਅਗਾਧਿ ਊਚ ਅਬਿਨਾਸੀ ਕੀਮਤਿ ਜਾਤ ਨ ਕਹੀ ॥
ਜਲਿ ਥਲਿ ਪੇਖਿ ਪੇਖਿ ਮਨੁ ਬਿਗਸਿਓ ਪੂਰਿ ਰਹਿਓ ਸ੍ਰਬ ਮਹੀ ॥੧॥
ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਪ੍ਰੀਤਮ ਮਨਮੋਹਨ ਮਿਲਿ ਸਾਧਹ ਕੀਨੋ ਸਹੀ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਜੀਵਤ ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਜਮ ਕੀ ਭੀਰ ਨ ਫਹੀ ॥੨॥੮੬॥੧੦੯॥
ਮਾਈ ਰੀ ਚਰਨਹ ਓਟ ਗਹੀ ॥
ਦਰਸਨੁ ਪੇਖਿ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਮੋਹਿਓ ਦੁਰਮਤਿ ਜਾਤ ਬਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਗਹ ਅਗਾਧਿ ਊਚ ਅਬਿਨਾਸੀ ਕੀਮਤਿ ਜਾਤ ਨ ਕਹੀ ॥
ਜਲਿ ਥਲਿ ਪੇਖਿ ਪੇਖਿ ਮਨੁ ਬਿਗਸਿਓ ਪੂਰਿ ਰਹਿਓ ਸ੍ਰਬ ਮਹੀ ॥੧॥
ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਪ੍ਰੀਤਮ ਮਨਮੋਹਨ ਮਿਲਿ ਸਾਧਹ ਕੀਨੋ ਸਹੀ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਜੀਵਤ ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਜਮ ਕੀ ਭੀਰ ਨ ਫਹੀ ॥੨॥੮੬॥੧੦੯॥
सारग महला ५ ॥
माई री चरनह ओट गही ॥
दरसनु पेखि मेरा मनु मोहिओ दुरमति जात बही ॥१॥ रहाउ ॥
अगह अगाधि ऊच अबिनासी कीमति जात न कही ॥
जलि थलि पेखि पेखि मनु बिगसिओ पूरि रहिओ स्रब मही ॥१॥
दीन दइआल प्रीतम मनमोहन मिलि साधह कीनो सही ॥
सिमरि सिमरि जीवत हरि नानक जम की भीर न फही ॥२॥८६॥१०९॥
माई री चरनह ओट गही ॥
दरसनु पेखि मेरा मनु मोहिओ दुरमति जात बही ॥१॥ रहाउ ॥
अगह अगाधि ऊच अबिनासी कीमति जात न कही ॥
जलि थलि पेखि पेखि मनु बिगसिओ पूरि रहिओ स्रब मही ॥१॥
दीन दइआल प्रीतम मनमोहन मिलि साधह कीनो सही ॥
सिमरि सिमरि जीवत हरि नानक जम की भीर न फही ॥२॥८६॥१०९॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे माँ ! (जब का) परमात्मा के चरणों का आसरा लिया है। (उसके) दर्शन करके मेरा मन मोहा गया है। (मेरे अंदर से) बुरी मति बह गई है। 1। रहाउ। हे माँ ! वह परमात्मा अथाह है बेअंत गहरा है। बहुत ऊँचा है। कभी नहीं मरता। उसका मूल्य नहीं पाया जा सकता। जल में धरती में (हर जगह उसको) देख के मेरा मन खिला रहता है। हे माँ ! वह सारी सृष्टि में व्यापक है। 1। हे माँ ! साध-संगति में मिल के गरीबों पर दया करने वाले और मन को मोह लेने वाले प्रीतम का मैंने दर्शन किया है। हे नानक ! (कह- हे माँ !) परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के आत्मिक जीवन मिलता है। और जमों के चुंगल में नहीं फसता। 2। 86। 109।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਾਈ ਰੀ ਮਨੁ ਮੇਰੋ ਮਤਵਾਰੋ ॥
ਪੇਖਿ ਦਇਆਲ ਅਨਦ ਸੁਖ ਪੂਰਨ ਹਰਿ ਰਸਿ ਰਪਿਓ ਖੁਮਾਰੋ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਿਰਮਲ ਭਏ ਊਜਲ ਜਸੁ ਗਾਵਤ ਬਹੁਰਿ ਨ ਹੋਵਤ ਕਾਰੋ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਸਿਉ ਡੋਰੀ ਰਾਚੀ ਭੇਟਿਓ ਪੁਰਖੁ ਅਪਾਰੋ ॥੧॥
ਕਰੁ ਗਹਿ ਲੀਨੇ ਸਰਬਸੁ ਦੀਨੇ ਦੀਪਕ ਭਇਓ ਉਜਾਰੋ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਸਿਕ ਬੈਰਾਗੀ ਕੁਲਹ ਸਮੂਹਾਂ ਤਾਰੋ ॥੨॥੮੭॥੧੧੦॥
ਮਾਈ ਰੀ ਮਨੁ ਮੇਰੋ ਮਤਵਾਰੋ ॥
ਪੇਖਿ ਦਇਆਲ ਅਨਦ ਸੁਖ ਪੂਰਨ ਹਰਿ ਰਸਿ ਰਪਿਓ ਖੁਮਾਰੋ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਿਰਮਲ ਭਏ ਊਜਲ ਜਸੁ ਗਾਵਤ ਬਹੁਰਿ ਨ ਹੋਵਤ ਕਾਰੋ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਸਿਉ ਡੋਰੀ ਰਾਚੀ ਭੇਟਿਓ ਪੁਰਖੁ ਅਪਾਰੋ ॥੧॥
ਕਰੁ ਗਹਿ ਲੀਨੇ ਸਰਬਸੁ ਦੀਨੇ ਦੀਪਕ ਭਇਓ ਉਜਾਰੋ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਸਿਕ ਬੈਰਾਗੀ ਕੁਲਹ ਸਮੂਹਾਂ ਤਾਰੋ ॥੨॥੮੭॥੧੧੦॥
सारग महला ५ ॥
माई री मनु मेरो मतवारो ॥
पेखि दइआल अनद सुख पूरन हरि रसि रपिओ खुमारो ॥१॥ रहाउ ॥
निरमल भए ऊजल जसु गावत बहुरि न होवत कारो ॥
चरन कमल सिउ डोरी राची भेटिओ पुरखु अपारो ॥१॥
करु गहि लीने सरबसु दीने दीपक भइओ उजारो ॥
नानक नामि रसिक बैरागी कुलह समूहां तारो ॥२॥८७॥११०॥
माई री मनु मेरो मतवारो ॥
पेखि दइआल अनद सुख पूरन हरि रसि रपिओ खुमारो ॥१॥ रहाउ ॥
निरमल भए ऊजल जसु गावत बहुरि न होवत कारो ॥
चरन कमल सिउ डोरी राची भेटिओ पुरखु अपारो ॥१॥
करु गहि लीने सरबसु दीने दीपक भइओ उजारो ॥
नानक नामि रसिक बैरागी कुलह समूहां तारो ॥२॥८७॥११०॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे माँ ! मेरा मन (प्रभू के दीदार में) मस्त हो रहा है। उस दया के सोमे प्रभू का दर्शन करके मेरे अंदर पूरी तरह से आत्मिक आनंद सुख बना हुआ है। मेरा मन प्रेम-रस से रंगा गया है और मस्त है। 1। रहाउ। हे माँ ! परमात्मा का यश गाते हुए जिस मनुष्य का मन निर्मल-उज्जवल हो जाता है। वह दोबारा (विकारों से) काला नहीं होता। (सिफतसालाह की बरकति से) जिस मनुष्य के मन की डोर प्रभू के सुंदर चरणों के साथ जुड़ती है। उसको बेअंत प्रभू मिल जाता है। 1। हे माँ ! जिस मनुष्य का हाथ पकड़ के प्रभू उसको अपना बना लेता है। उसको सब कुछ बख्शता है। उसके अंदर (नाम के) दीए का प्रकाश हो जाता है। हे नानक ! परमात्मा के नाम में प्रीत प्रेम जोड़ने वाला मनुष्य अपनी सारी कुलों को (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 2। 87। 110।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਾਈ ਰੀ ਆਨ ਸਿਮਰਿ ਮਰਿ ਜਾਂਹਿ ॥
ਤਿਆਗਿ ਗੋਬਿਦੁ ਜੀਅਨ ਕੋ ਦਾਤਾ ਮਾਇਆ ਸੰਗਿ ਲਪਟਾਹਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰਿ ਚਲਹਿ ਅਨ ਮਾਰਗਿ ਨਰਕ ਘੋਰ ਮਹਿ ਪਾਹਿ ॥
ਅਨਿਕ ਸਜਾਂਈ ਗਣਤ ਨ ਆਵੈ ਗਰਭੈ ਗਰਭਿ ਭ੍ਰਮਾਹਿ ॥੧॥
ਸੇ ਧਨਵੰਤੇ ਸੇ ਪਤਿਵੰਤੇ ਹਰਿ ਕੀ ਸਰਣਿ ਸਮਾਹਿ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਜਗੁ ਜੀਤਿਓ ਬਹੁਰਿ ਨ ਆਵਹਿ ਜਾਂਹਿ ॥੨॥੮੮॥੧੧੧॥
ਮਾਈ ਰੀ ਆਨ ਸਿਮਰਿ ਮਰਿ ਜਾਂਹਿ ॥
ਤਿਆਗਿ ਗੋਬਿਦੁ ਜੀਅਨ ਕੋ ਦਾਤਾ ਮਾਇਆ ਸੰਗਿ ਲਪਟਾਹਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰਿ ਚਲਹਿ ਅਨ ਮਾਰਗਿ ਨਰਕ ਘੋਰ ਮਹਿ ਪਾਹਿ ॥
ਅਨਿਕ ਸਜਾਂਈ ਗਣਤ ਨ ਆਵੈ ਗਰਭੈ ਗਰਭਿ ਭ੍ਰਮਾਹਿ ॥੧॥
ਸੇ ਧਨਵੰਤੇ ਸੇ ਪਤਿਵੰਤੇ ਹਰਿ ਕੀ ਸਰਣਿ ਸਮਾਹਿ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਜਗੁ ਜੀਤਿਓ ਬਹੁਰਿ ਨ ਆਵਹਿ ਜਾਂਹਿ ॥੨॥੮੮॥੧੧੧॥
सारग महला ५ ॥
माई री आन सिमरि मरि जांहि ॥
तिआगि गोबिदु जीअन को दाता माइआ संगि लपटाहि ॥१॥ रहाउ ॥
नामु बिसारि चलहि अन मारगि नरक घोर महि पाहि ॥
अनिक सजांई गणत न आवै गरभै गरभि भ्रमाहि ॥१॥
से धनवंते से पतिवंते हरि की सरणि समाहि ॥
गुर प्रसादि नानक जगु जीतिओ बहुरि न आवहि जांहि ॥२॥८८॥१११॥
माई री आन सिमरि मरि जांहि ॥
तिआगि गोबिदु जीअन को दाता माइआ संगि लपटाहि ॥१॥ रहाउ ॥
नामु बिसारि चलहि अन मारगि नरक घोर महि पाहि ॥
अनिक सजांई गणत न आवै गरभै गरभि भ्रमाहि ॥१॥
से धनवंते से पतिवंते हरि की सरणि समाहि ॥
गुर प्रसादि नानक जगु जीतिओ बहुरि न आवहि जांहि ॥२॥८८॥१११॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे माँ ! वह (प्रभू के बिना) और को मन में बसाए रख के आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। सारे जीवों को दातें देने वाले परमात्मा को छोड़ के जो मनुष्य (सदा) माया के साथ चिपके रहते हैं। 1। रहाउ। हे माँ ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम भुला के और (जीवन-) राह पर चलते हैं। वे भयानक नर्क में पड़े रहते हैं। उनको इतनी सजाएं मिलती रहती हैं कि उनकी गिनती नहीं हो सकती। वे हरेक जून में भटकते फिरते हैं। 1। हे माँ ! जो मनुष्य परमात्मा की शरण में टिके रहते हैं। वे धन वाले हैं। वे इज्जत वाले हैं। हे नानक ! (कह- हे माँ !) गुरू की मेहर से उन्होंने जगत (के मोह) को जीत लिया है। वे बार-बार ना पैदा होते हैं ना मरते हैं। 2। 88। 111।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਕਾਟੀ ਕੁਟਿਲਤਾ ਕੁਠਾਰਿ ॥
ਭ੍ਰਮ ਬਨ ਦਹਨ ਭਏ ਖਿਨ ਭੀਤਰਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਪਰਹਾਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਨਿੰਦਾ ਪਰਹਰੀਆ ਕਾਢੇ ਸਾਧੂ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮਾਰਿ ॥
ਹਰਿ ਕਾਟੀ ਕੁਟਿਲਤਾ ਕੁਠਾਰਿ ॥
ਭ੍ਰਮ ਬਨ ਦਹਨ ਭਏ ਖਿਨ ਭੀਤਰਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਪਰਹਾਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਨਿੰਦਾ ਪਰਹਰੀਆ ਕਾਢੇ ਸਾਧੂ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮਾਰਿ ॥
सारग महला ५ ॥
हरि काटी कुटिलता कुठारि ॥
भ्रम बन दहन भए खिन भीतरि राम नाम परहारि ॥१॥ रहाउ ॥
काम क्रोध निंदा परहरीआ काढे साधू कै संगि मारि ॥
हरि काटी कुटिलता कुठारि ॥
भ्रम बन दहन भए खिन भीतरि राम नाम परहारि ॥१॥ रहाउ ॥
काम क्रोध निंदा परहरीआ काढे साधू कै संगि मारि ॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा ने (जिस मनुष्य के) मन का खोट (मानो) कुहाड़े से काट दिया। उसके अंदर से प्रभू के नाम की चोट से एक छिन में ही भटकना के जंगलों के जंगल ही जल (के राख हो) गए। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य गुरू की संगति में रह के काम क्रोध निंदा आदि विकारों को (अपने अंदर से) दूर कर देता है मार-मार के निकाल देता है
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1225 है, राग सारंग का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Greater Kailash के बाज़ार में सर्दियों की धूप, और कोई पुराना दोस्त मिल जाए।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1225” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सारंग राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1226 →, पीछे का: ← अंग 1224।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।