पड़ि पड़ि पंडित वादु वखाणदे माइआ मोह सुआइ ॥
दूजै भाइ नामु विसारिआ मन मूरख मिलै सजाइ ॥
जिनि॑ कीते तिसै न सेवन॑ी देदा रिजकु समाइ ॥
जम का फाहा गलहु न कटीऐ फिरि फिरि आवहि जाइ ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ सतिगुरु मिलिआ तिन आइ ॥
अनदिनु नामु धिआइदे नानक सचि समाइ ॥1॥
सचु वणजहि सचु सेवदे जि गुरमुखि पैरी पाहि ॥
नानक गुर कै भाणै जे चलहि सहजे सचि समाहि ॥2॥
आसा विचि अति दुखु घणा मनमुखि चितु लाइआ ॥
गुरमुखि भए निरास परम सुखु पाइआ ॥
विचे गिरह उदास अलिपत लिव लाइआ ॥
ओना सोगु विजोगु न विआपई हरि भाणा भाइआ ॥
नानक हरि सेती सदा रवि रहे धुरि लए मिलाइआ ॥31॥
पराई अमाण किउ रखीऐ दिती ही सुखु होइ ॥
गुर का सबदु गुर थै टिकै होर थै परगटु न होइ ॥
अंन॑े वसि माणकु पइआ घरि घरि वेचण जाइ ॥
ओना परख न आवई अढु न पलै पाइ ॥
जे आपि परख न आवई तां पारखीआ थावहु लइओु परखाइ ॥
जे ओसु नालि चितु लाए तां वथु लहै नउ निधि पलै पाइ ॥
घरि होदै धनि जगु भुखा मुआ बिनु सतिगुर सोझी न होइ ॥
सबदु सीतलु मनि तनि वसै तिथै सोगु विजोगु न कोइ ॥
वसतु पराई आपि गरबु करे मूरखु आपु गणाए ॥
नानक बिनु बूझे किनै न पाइओ फिरि फिरि आवै जाए ॥1॥
मनि अनदु भइआ मिलिआ हरि प्रीतमु सरसे सजण संत पिआरे ॥
जो धुरि मिले न विछुड़हि कबहू जि आपि मेले करतारे ॥
अंतरि सबदु रविआ गुरु पाइआ सगले दूख निवारे ॥
हरि सुखदाता सदा सलाही अंतरि रखां उर धारे ॥
मनमुखु तिन की बखीली कि करे जि सचै सबदि सवारे ॥
ओना दी आपि पति रखसी मेरा पिआरा सरणागति पए गुर दुआरे ॥
नानक गुरमुखि से सुहेले भए मुख ऊजल दरबारे ॥2॥
इसतरी पुरखै बहु प्रीति मिलि मोहु वधाइआ ॥
पुत्रु कलत्रु नित वेखै विगसै मोहि माइआ ॥
देसि परदेसि धनु चोराइ आणि मुहि पाइआ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (आशाओं के इस लंबे जाल में से) वही बचते हैं जो गुरू की शरण पड़ते हैं जिनका रखवाला गुरू अकाल-पुरख स्वयं बनता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।