ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
अपुने ठाकुर की हउ चेरी ॥
चरन गहे जगजीवन प्रभ के हउमै मारि निबेरी ॥1॥ रहाउ ॥
पूरन परम जोति परमेसर प्रीतम प्रान हमारे ॥
मोहन मोहि लीआ मनु मेरा समझसि सबदु बीचारे ॥1॥
मनमुख हीन होछी मति झूठी मनि तनि पीर सरीरे ॥
जब की राम रंगीलै राती राम जपत मन धीरे ॥2॥
हउमै छोडि भई बैरागनि तब साची सुरति समानी ॥
अकुल निरंजन सिउ मनु मानिआ बिसरी लाज लोुकानी ॥3॥
भूर भविख नाही तुम जैसे मेरे प्रीतम प्रान अधारा ॥
हरि कै नामि रती सोहागनि नानक राम भतारा ॥4॥1॥
हरि बिनु किउ रहीऐ दुखु बिआपै ॥
जिहवा सादु न फीकी रस बिनु बिनु प्रभ कालु संतापै ॥1॥ रहाउ ॥
जब लगु दरसु न परसै प्रीतम तब लगु भूख पिआसी ॥
दरसनु देखत ही मनु मानिआ जल रसि कमल बिगासी ॥1॥
ऊनवि घनहरु गरजै बरसै कोकिल मोर बैरागै ॥
तरवर बिरख बिहंग भुइअंगम घरि पिरु धन सोहागै ॥2॥
कुचिल कुरूपि कुनारि कुलखनी पिर का सहजु न जानिआ ॥
हरि रस रंगि रसन नही त्रिपती दुरमति दूख समानिआ ॥3॥
आइ न जावै ना दुखु पावै ना दुख दरदु सरीरे ॥
नानक प्रभ ते सहज सुहेली प्रभ देखत ही मनु धीरे ॥4॥2॥
दूरि नाही मेरो प्रभु पिआरा ॥
सतिगुर बचनि मेरो मनु मानिआ हरि पाए प्रान अधारा ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु सारग चउपदे महला 1 घरु 1 वह परमपिता परमेश्वर अद्वितीय है, नाम उसका ‘सत्य’ है, वह कर्ता पुरुष सर्वशक्तिमान है, वह निर्भय है, वह वैर से रहित है, वह कालातीत अमर है, वह जन्म-मरण से।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।