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अंग 1197

अंग
1197
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु सारग चउपदे महला 1 घरु 1
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
अपुने ठाकुर की हउ चेरी ॥
चरन गहे जगजीवन प्रभ के हउमै मारि निबेरी ॥1॥ रहाउ ॥
पूरन परम जोति परमेसर प्रीतम प्रान हमारे ॥
मोहन मोहि लीआ मनु मेरा समझसि सबदु बीचारे ॥1॥
मनमुख हीन होछी मति झूठी मनि तनि पीर सरीरे ॥
जब की राम रंगीलै राती राम जपत मन धीरे ॥2॥
हउमै छोडि भई बैरागनि तब साची सुरति समानी ॥
अकुल निरंजन सिउ मनु मानिआ बिसरी लाज लोुकानी ॥3॥
भूर भविख नाही तुम जैसे मेरे प्रीतम प्रान अधारा ॥
हरि कै नामि रती सोहागनि नानक राम भतारा ॥4॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: रागु सारग चउपदे महला 1 घरु 1 वह परमपिता परमेश्वर अद्वितीय है, नाम उसका ‘सत्य’ है, वह कर्ता पुरुष सर्वशक्तिमान है, वह निर्भय है, वह वैर से रहित है, वह कालातीत अमर है, वह जन्म-मरण से स्वतंत्र है, वह स्वयं प्रकाशमान हुआ है, गुरु कृपा से प्राप्ति होती है। जब से मैं अपने मालिक-प्रभू की दासी बन गई हूँ। तब से मैंने जगत के जीवन-प्रभू के चरण पकड़े हैं। उसने मेरे अहंकार को मार के समाप्त कर डाला है। 1। रहाउ। जब का मोहन-प्रभू ने मेरा मन (अपने प्यार में) मोह लिया है तब से मेरा मन गुरू का शबद विचार-विचार के ये समझ रहा है। कि परमेश्वर सबमें व्यापक है सबसे ऊँचा आत्मिक जीवन की रौशनी देने वाला है। मेरा प्यारा है और मेरे प्राणों का (सहारा) है। 1। जब तक मैं अपने मन के पीछे चलता रहा। मैं कमजोर रहा (विकार मेरे ऊपर हावी रहे)। मेरी अक्ल होछी ही रही। झूठ में ही लगी रही (इस कारण) मेरे मन में। मेरे शरीर में दुख-कलेश उठते रहे। पर। जब से मैं रंगीले राम (के प्यार में) रंगी गई हूँ। मेरा मन उस राम को सिमर-सिमर के धैर्य-वान होता जा रहा है। 2। जब से (ठाकुर-प्रभू की दासी बन के) मैं अहंकार को त्याग के माया-मोह की तरफ से उपराम हो चुकी हूँ। तब से मेरी सुरति सदा कायम रहने वाले सदा कायम रहने वाले प्रभू की याद में लीन रहती है; मेरा मन उस प्रभू की याद में भीगा रहता है जो माया के प्रभाव से रहित है और जिसका कोई खास कुल नहीं। (मुझे अहंकार नहीं रहा। इसलिए) मैं लोक-लाज (भी) भुला बैठा हूँ। 3। हे मेरे प्रीतम ! हे मेरे प्राणों के आसरे प्रभू ! अब मुझे आपके जैसा कोई नहीं दिखता। ना पिछले बीते हुए समयों में। ना अब। और ना ही आने वाले वक्त में। हे नानक ! (कह-) जिस जीव-स्त्री ने परमात्मा को अपना पति मान लिया है। जो प्रभू के नाम में रंगी रहती है। वह सौभाग्यशाली बन जाती है। 4। 1।
सारग महला 1 ॥
हरि बिनु किउ रहीऐ दुखु बिआपै ॥
जिहवा सादु न फीकी रस बिनु बिनु प्रभ कालु संतापै ॥1॥ रहाउ ॥
जब लगु दरसु न परसै प्रीतम तब लगु भूख पिआसी ॥
दरसनु देखत ही मनु मानिआ जल रसि कमल बिगासी ॥1॥
ऊनवि घनहरु गरजै बरसै कोकिल मोर बैरागै ॥
तरवर बिरख बिहंग भुइअंगम घरि पिरु धन सोहागै ॥2॥
कुचिल कुरूपि कुनारि कुलखनी पिर का सहजु न जानिआ ॥
हरि रस रंगि रसन नही त्रिपती दुरमति दूख समानिआ ॥3॥
आइ न जावै ना दुखु पावै ना दुख दरदु सरीरे ॥
नानक प्रभ ते सहज सुहेली प्रभ देखत ही मनु धीरे ॥4॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: सारंग महला 1 ॥ परमात्मा का सिमरन किए बिना मनुष्य सुखी जीवन नहीं जी सकता। दुख (सदा इसके मन पर) दबाव डाले रखते हैं। (सिमरन के बिना मनुष्य की) जीभ में (बोलने की) मिठास नहीं पैदा होती। मिठास के बिना होने के कारण सदा कड़वे व कठोर बोल बोलती है। प्रभू के सिमरन के बिना मौत का डर (भी) दुखी करता रहता है। 1। रहाउ। जब तक मनुष्य प्रीतम-प्रभू का दीदार नहीं करता। तब तक माया की भूख और प्यास अपना जोर डाले रखती है। दीदार करते ही मन प्रभू की याद में रीझ जाता है (और ऐसे खिलता है। जैसे) कमल का फूल जल के आनंद में खिलता है। 1। जब बादल झुक-झुक के गरजता है और बरसता है तब कोयल। मोर। वृक्ष। बैल। पंछी। साँप (आदिक) उल्लास में आते हैं। (इसी तरह जिस जीव-स्त्री के) हृदय-घर में पति-प्रभू आ बसता है वह जीव-स्त्री अपने आप को भाग्यशाली समझती है। 2। (पर। जिस जीव-स्त्री ने) पति-प्रभू के मिलाप का आनंद नहीं पाया। वह गंदी रहत-बहत वाली कुचील। कुरूप। बुरे से बुरे लक्षणों वाली कुलक्ष्णी ही रहती है। जिसकी जीभ प्रभू के आनंद के रंग में (रच के) चस्कों से नहीं मुड़ी। वह जीव-स्त्री दुर्मति के कारण दुखों में ही ग्रसी रहती है। 3। हे नानक ! प्रभू के मिलाप से अडोलता का आनंद पाने वाली जीव-स्त्री का मन प्रभू का दीदार कर के धैर्यवान रहता है। वह जनम-मरण के चक्करों में नहीं पड़ती। उसके ना मन को ना तन को कोई कलेश व्यापता है। 4। 2।
सारग महला 1 ॥
दूरि नाही मेरो प्रभु पिआरा ॥
सतिगुर बचनि मेरो मनु मानिआ हरि पाए प्रान अधारा ॥1॥ रहाउ ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 1 ॥ मेरा प्यारा प्रभू (मुझसे) दूर नहीं। जब से मेरा मन गुरू के (इस) वचन में यकीन ले आया है तब से (मुझे यह प्रतीत हो रहा है कि) मैंने अपने प्राणों का सहारा-प्रभू को ढूँढ लिया है। 1। रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु सारग चउपदे महला 1 घरु 1 वह परमपिता परमेश्वर अद्वितीय है, नाम उसका ‘सत्य’ है, वह कर्ता पुरुष सर्वशक्तिमान है, वह निर्भय है, वह वैर से रहित है, वह कालातीत अमर है, वह जन्म-मरण से।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।