अंग
1222
राग सारंग
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੀ ਜੀਵਨਿ ॥
ਬਿਖੈ ਰਸ ਭੋਗ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਰਾਮ ਨਾਮ ਰਸੁ ਪੀਵਨਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੰਚਨਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਧਨੁ ਰਤਨਾ ਮਨ ਤਨ ਭੀਤਰਿ ਸੀਵਨਿ ॥
ਹਰਿ ਰੰਗ ਰਾਂਗ ਭਏ ਮਨ ਲਾਲਾ ਰਾਮ ਨਾਮ ਰਸ ਖੀਵਨਿ ॥੧॥
ਜਿਉ ਮੀਨਾ ਜਲ ਸਿਉ ਉਰਝਾਨੋ ਰਾਮ ਨਾਮ ਸੰਗਿ ਲੀਵਨਿ ॥
ਨਾਨਕ ਸੰਤ ਚਾਤ੍ਰਿਕ ਕੀ ਨਿਆਈ ਹਰਿ ਬੂੰਦ ਪਾਨ ਸੁਖ ਥੀਵਨਿ ॥੨॥੬੮॥੯੧॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੀ ਜੀਵਨਿ ॥
ਬਿਖੈ ਰਸ ਭੋਗ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਰਾਮ ਨਾਮ ਰਸੁ ਪੀਵਨਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੰਚਨਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਧਨੁ ਰਤਨਾ ਮਨ ਤਨ ਭੀਤਰਿ ਸੀਵਨਿ ॥
ਹਰਿ ਰੰਗ ਰਾਂਗ ਭਏ ਮਨ ਲਾਲਾ ਰਾਮ ਨਾਮ ਰਸ ਖੀਵਨਿ ॥੧॥
ਜਿਉ ਮੀਨਾ ਜਲ ਸਿਉ ਉਰਝਾਨੋ ਰਾਮ ਨਾਮ ਸੰਗਿ ਲੀਵਨਿ ॥
ਨਾਨਕ ਸੰਤ ਚਾਤ੍ਰਿਕ ਕੀ ਨਿਆਈ ਹਰਿ ਬੂੰਦ ਪਾਨ ਸੁਖ ਥੀਵਨਿ ॥੨॥੬੮॥੯੧॥
सारग महला ५ ॥
हरि हरि संत जना की जीवनि ॥
बिखै रस भोग अंम्रित सुख सागर राम नाम रसु पीवनि ॥१॥ रहाउ ॥
संचनि राम नाम धनु रतना मन तन भीतरि सीवनि ॥
हरि रंग रांग भए मन लाला राम नाम रस खीवनि ॥१॥
जिउ मीना जल सिउ उरझानो राम नाम संगि लीवनि ॥
नानक संत चात्रिक की निआई हरि बूंद पान सुख थीवनि ॥२॥६८॥९१॥
हरि हरि संत जना की जीवनि ॥
बिखै रस भोग अंम्रित सुख सागर राम नाम रसु पीवनि ॥१॥ रहाउ ॥
संचनि राम नाम धनु रतना मन तन भीतरि सीवनि ॥
हरि रंग रांग भए मन लाला राम नाम रस खीवनि ॥१॥
जिउ मीना जल सिउ उरझानो राम नाम संगि लीवनि ॥
नानक संत चात्रिक की निआई हरि बूंद पान सुख थीवनि ॥२॥६८॥९१॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ यह ही जिंदगी संत जनों की। हे भाई ! परमात्मा के भगत आत्मिक जीवन देने वाले सुखों के समुंद्र हरी-नाम का रस (सदा) पीते रहते हैं। यही उनके लिए दुनिया वाले विषौ भोगों का स्वाद है- 1। रहाउ। हे भाई ! संत जन परमात्मा का नाम-धन एकत्र करते हैं। नाम-रत्न इकट्ठा करते हैं। और अपने मन में हृदय में (उनको) परो (सिल के) रखते हैं। परमात्मा के नाम-रंग के साथ रंग के उनका मन गाढ़े रंग वाला हुआ रहता है। वे हरी-नाम के रस से मस्त रहते हैं। 1। हे भाई ! जैसे मछली पानी से लिपटी रहती है (पानी के बिना जी नहीं सकती) वैसे ही संत जन हरी-नाम में लीन रहते हैं। हे नानक ! संत जन पपीहे की तरह हैं (जैसे पपीहा स्वाति नक्षत्र की बरखा की बूँद पी के तृप्त होता है। वैसे संत जन) परमात्मा के नाम की बूँद पी के सुखी होते हैं। 2। 68। 91।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮਹੀਨ ਬੇਤਾਲ ॥
ਜੇਤਾ ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਤੇਤਾ ਸਭਿ ਬੰਧਨ ਜੰਜਾਲ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿਨੁ ਪ੍ਰਭ ਸੇਵ ਕਰਤ ਅਨ ਸੇਵਾ ਬਿਰਥਾ ਕਾਟੈ ਕਾਲ ॥
ਜਬ ਜਮੁ ਆਇ ਸੰਘਾਰੈ ਪ੍ਰਾਨੀ ਤਬ ਤੁਮਰੋ ਕਉਨੁ ਹਵਾਲ ॥੧॥
ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ਦਾਸ ਅਪੁਨੇ ਕਉ ਸਦਾ ਸਦਾ ਕਿਰਪਾਲ ॥
ਸੁਖ ਨਿਧਾਨ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ਸਾਧਸੰਗਿ ਧਨ ਮਾਲ ॥੨॥੬੯॥੯੨॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮਹੀਨ ਬੇਤਾਲ ॥
ਜੇਤਾ ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਤੇਤਾ ਸਭਿ ਬੰਧਨ ਜੰਜਾਲ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿਨੁ ਪ੍ਰਭ ਸੇਵ ਕਰਤ ਅਨ ਸੇਵਾ ਬਿਰਥਾ ਕਾਟੈ ਕਾਲ ॥
ਜਬ ਜਮੁ ਆਇ ਸੰਘਾਰੈ ਪ੍ਰਾਨੀ ਤਬ ਤੁਮਰੋ ਕਉਨੁ ਹਵਾਲ ॥੧॥
ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ਦਾਸ ਅਪੁਨੇ ਕਉ ਸਦਾ ਸਦਾ ਕਿਰਪਾਲ ॥
ਸੁਖ ਨਿਧਾਨ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ਸਾਧਸੰਗਿ ਧਨ ਮਾਲ ॥੨॥੬੯॥੯੨॥
सारग महला ५ ॥
हरि के नामहीन बेताल ॥
जेता करन करावन तेता सभि बंधन जंजाल ॥१॥ रहाउ ॥
बिनु प्रभ सेव करत अन सेवा बिरथा काटै काल ॥
जब जमु आइ संघारै प्रानी तब तुमरो कउनु हवाल ॥१॥
राखि लेहु दास अपुने कउ सदा सदा किरपाल ॥
सुख निधान नानक प्रभु मेरा साधसंगि धन माल ॥२॥६९॥९२॥
हरि के नामहीन बेताल ॥
जेता करन करावन तेता सभि बंधन जंजाल ॥१॥ रहाउ ॥
बिनु प्रभ सेव करत अन सेवा बिरथा काटै काल ॥
जब जमु आइ संघारै प्रानी तब तुमरो कउनु हवाल ॥१॥
राखि लेहु दास अपुने कउ सदा सदा किरपाल ॥
सुख निधान नानक प्रभु मेरा साधसंगि धन माल ॥२॥६९॥९२॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम से जो मनुष्य वंचित रहते हैं (आत्मिक-जीवन की कसवटी के अनुसार) वे भूत-प्रेत ही हैं। (ऐसे मनुष्य) जितना कुछ करते हैं और करवाते हैं। उनके सारे काम माया के फंदे माया के जंजाल (बढ़ाते हैं)। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा की भगती के बिना और-और की सेवा करते हुए (मनुष्य अपनी जिंदगी का) समय व्यर्थ बिताता है। हे प्राणी ! (अगर तू हरी-नाम के बिना ही रहा। तो) जब जमराज आ के मारता है। तब (सोच) तेरा क्या हाल होगा। 1। हे सदा ही दया के श्रोत ! अपने दास (नानक) की स्वयं रक्षा कर (और। अपना नाम बख्श)। हे नानक ! (कह- हे भाई !) मेरा प्रभू सारे सुखों का खजाना है। उसका नाम-धन साध-संगति में ही मिलता है। 2। 69। 92।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਰਾਮ ਕੋ ਬਿਉਹਾਰੁ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਗੁਨ ਗਾਵਨ ਗੀਧੇ ਪੋਹਤ ਨਹ ਸੰਸਾਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸ੍ਰਵਣੀ ਕੀਰਤਨੁ ਸਿਮਰਨੁ ਸੁਆਮੀ ਇਹੁ ਸਾਧ ਕੋ ਆਚਾਰੁ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਅਸਥਿਤਿ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਪੂਜਾ ਪ੍ਰਾਨ ਕੋ ਆਧਾਰੁ ॥੧॥
ਪ੍ਰਭ ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਸੁਨਹੁ ਬੇਨੰਤੀ ਕਿਰਪਾ ਅਪਨੀ ਧਾਰੁ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਉਚਰਉ ਨਿਤ ਰਸਨਾ ਨਾਨਕ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੁ ॥੨॥੭੦॥੯੩॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਰਾਮ ਕੋ ਬਿਉਹਾਰੁ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਗੁਨ ਗਾਵਨ ਗੀਧੇ ਪੋਹਤ ਨਹ ਸੰਸਾਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸ੍ਰਵਣੀ ਕੀਰਤਨੁ ਸਿਮਰਨੁ ਸੁਆਮੀ ਇਹੁ ਸਾਧ ਕੋ ਆਚਾਰੁ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਅਸਥਿਤਿ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਪੂਜਾ ਪ੍ਰਾਨ ਕੋ ਆਧਾਰੁ ॥੧॥
ਪ੍ਰਭ ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਸੁਨਹੁ ਬੇਨੰਤੀ ਕਿਰਪਾ ਅਪਨੀ ਧਾਰੁ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਉਚਰਉ ਨਿਤ ਰਸਨਾ ਨਾਨਕ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੁ ॥੨॥੭੦॥੯੩॥
सारग महला ५ ॥
मनि तनि राम को बिउहारु ॥
प्रेम भगति गुन गावन गीधे पोहत नह संसारु ॥१॥ रहाउ ॥
स्रवणी कीरतनु सिमरनु सुआमी इहु साध को आचारु ॥
चरन कमल असथिति रिद अंतरि पूजा प्रान को आधारु ॥१॥
प्रभ दीन दइआल सुनहु बेनंती किरपा अपनी धारु ॥
नामु निधानु उचरउ नित रसना नानक सद बलिहारु ॥२॥७०॥९३॥
मनि तनि राम को बिउहारु ॥
प्रेम भगति गुन गावन गीधे पोहत नह संसारु ॥१॥ रहाउ ॥
स्रवणी कीरतनु सिमरनु सुआमी इहु साध को आचारु ॥
चरन कमल असथिति रिद अंतरि पूजा प्रान को आधारु ॥१॥
प्रभ दीन दइआल सुनहु बेनंती किरपा अपनी धारु ॥
नामु निधानु उचरउ नित रसना नानक सद बलिहारु ॥२॥७०॥९३॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! जिन मनुष्यों के मन में हृदय में (सदा) परमात्मा का (नाम सिमरन का ही) आहर है। जो मनुष्य प्रभू-प्रेम और हरी-भगती (के मतवाले हैं) जो प्रभू के गुण गाने में गिझे (प्रेम से मस्त) हुए हैं। उनको जगत (का मोह) पोह नहीं सकता। 1। रहाउ। हे भाई ! कानों से मालिक-प्रभू की सिफतसालाह सुननी। (जीभ से मालिक का नाम) सिमरना- संत-जनों की यह नित्य की करणी हुआ करती है। उनके हृदय में परमात्मा के सुंदर चरणों का टिकाव हमेशा बना रहता है। प्रभू की पूजा-भगती उनके प्राणों का आसरा होता है। 1। हे नानक ! (कह-) हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! (मेरी) बिनती सुन। (मेरे पर) अपनील मेहर कर। तेरा नाम ही (मेरे वास्ते सब पदार्थों का) खजाना है (मेहर कर। मैं यह नाम) जीभ से सदा उचारता रहूँ। और तुझसे सदा सदके होता रहूँ। 2। 70। 93।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮਹੀਨ ਮਤਿ ਥੋਰੀ ॥
ਸਿਮਰਤ ਨਾਹਿ ਸਿਰੀਧਰ ਠਾਕੁਰ ਮਿਲਤ ਅੰਧ ਦੁਖ ਘੋਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਲਾਗੀ ਅਨਿਕ ਭੇਖ ਬਹੁ ਜੋਰੀ ॥
ਤੂਟਤ ਬਾਰ ਨ ਲਾਗੈ ਤਾ ਕਉ ਜਿਉ ਗਾਗਰਿ ਜਲ ਫੋਰੀ ॥੧॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਭਗਤਿ ਰਸੁ ਦੀਜੈ ਮਨੁ ਖਚਿਤ ਪ੍ਰੇਮ ਰਸ ਖੋਰੀ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ਪ੍ਰਭ ਬਿਨੁ ਆਨ ਨ ਹੋਰੀ ॥੨॥੭੧॥੯੪॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮਹੀਨ ਮਤਿ ਥੋਰੀ ॥
ਸਿਮਰਤ ਨਾਹਿ ਸਿਰੀਧਰ ਠਾਕੁਰ ਮਿਲਤ ਅੰਧ ਦੁਖ ਘੋਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਲਾਗੀ ਅਨਿਕ ਭੇਖ ਬਹੁ ਜੋਰੀ ॥
ਤੂਟਤ ਬਾਰ ਨ ਲਾਗੈ ਤਾ ਕਉ ਜਿਉ ਗਾਗਰਿ ਜਲ ਫੋਰੀ ॥੧॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਭਗਤਿ ਰਸੁ ਦੀਜੈ ਮਨੁ ਖਚਿਤ ਪ੍ਰੇਮ ਰਸ ਖੋਰੀ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ਪ੍ਰਭ ਬਿਨੁ ਆਨ ਨ ਹੋਰੀ ॥੨॥੭੧॥੯੪॥
सारग महला ५ ॥
हरि के नामहीन मति थोरी ॥
सिमरत नाहि सिरीधर ठाकुर मिलत अंध दुख घोरी ॥१॥ रहाउ ॥
हरि के नाम सिउ प्रीति न लागी अनिक भेख बहु जोरी ॥
तूटत बार न लागै ता कउ जिउ गागरि जल फोरी ॥१॥
करि किरपा भगति रसु दीजै मनु खचित प्रेम रस खोरी ॥
नानक दास तेरी सरणाई प्रभ बिनु आन न होरी ॥२॥७१॥९४॥
हरि के नामहीन मति थोरी ॥
सिमरत नाहि सिरीधर ठाकुर मिलत अंध दुख घोरी ॥१॥ रहाउ ॥
हरि के नाम सिउ प्रीति न लागी अनिक भेख बहु जोरी ॥
तूटत बार न लागै ता कउ जिउ गागरि जल फोरी ॥१॥
करि किरपा भगति रसु दीजै मनु खचित प्रेम रस खोरी ॥
नानक दास तेरी सरणाई प्रभ बिनु आन न होरी ॥२॥७१॥९४॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम से वंचित रहते हैं। उनकी मति होछी सी ही बन जाती है। वे लक्ष्मी-पति मालिक-प्रभू का नाम नहीं सिमरते। माया के मोह में अंधे हो चुके उन मनुष्यों को भयानक (आत्मिक) दुख-कलेश होते रहते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम से प्यार नहीं डालते। पर अनेकों धार्मिक भेषों से प्रीत जोड़ी रखते हैं। उनकी इस प्रीत के टूटते देर नहीं लगती। जैसे टूटी हुई गागर में पानी नहीं ठहर सकता। 1। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) मेहर कर। मुझे अपनी भगती का स्वाद बख्श। मेरा मन तेरे प्रेम-रस की ख़ुमारी में मस्त रहे। हे प्रभू ! (तेरा) दास नानक तेरी शरण आया है। हे प्रभू ! तेरे बिना मेरा और कोई दूसरा सहारा नहीं। 2। 71। 94।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਚਿਤਵਉ ਵਾ ਅਉਸਰ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਹੋਇ ਇਕਤ੍ਰ ਮਿਲਹੁ ਸੰਤ ਸਾਜਨ ਗੁਣ ਗੋਬਿੰਦ ਨਿਤ ਗਾਹਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਜਨ ਜੇਤੇ ਕਾਮ ਕਰੀਅਹਿ ਤੇਤੇ ਬਿਰਥੇ ਜਾਂਹਿ ॥
ਪੂਰਨ ਪਰਮਾਨੰਦ ਮਨਿ ਮੀਠੋ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਦੂਸਰ ਨਾਹਿ ॥੧॥
ਜਪ ਤਪ ਸੰਜਮ ਕਰਮ ਸੁਖ ਸਾਧਨ ਤੁਲਿ ਨ ਕਛੂਐ ਲਾਹਿ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਨਾਨਕ ਮਨੁ ਬੇਧਿਓ ਚਰਨਹ ਸੰਗਿ ਸਮਾਹਿ ॥੨॥੭੨॥੯੫॥
ਚਿਤਵਉ ਵਾ ਅਉਸਰ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਹੋਇ ਇਕਤ੍ਰ ਮਿਲਹੁ ਸੰਤ ਸਾਜਨ ਗੁਣ ਗੋਬਿੰਦ ਨਿਤ ਗਾਹਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਜਨ ਜੇਤੇ ਕਾਮ ਕਰੀਅਹਿ ਤੇਤੇ ਬਿਰਥੇ ਜਾਂਹਿ ॥
ਪੂਰਨ ਪਰਮਾਨੰਦ ਮਨਿ ਮੀਠੋ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਦੂਸਰ ਨਾਹਿ ॥੧॥
ਜਪ ਤਪ ਸੰਜਮ ਕਰਮ ਸੁਖ ਸਾਧਨ ਤੁਲਿ ਨ ਕਛੂਐ ਲਾਹਿ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਨਾਨਕ ਮਨੁ ਬੇਧਿਓ ਚਰਨਹ ਸੰਗਿ ਸਮਾਹਿ ॥੨॥੭੨॥੯੫॥
सारग महला ५ ॥
चितवउ वा अउसर मन माहि ॥
होइ इकत्र मिलहु संत साजन गुण गोबिंद नित गाहि ॥१॥ रहाउ ॥
बिनु हरि भजन जेते काम करीअहि तेते बिरथे जांहि ॥
पूरन परमानंद मनि मीठो तिसु बिनु दूसर नाहि ॥१॥
जप तप संजम करम सुख साधन तुलि न कछूऐ लाहि ॥
चरन कमल नानक मनु बेधिओ चरनह संगि समाहि ॥२॥७२॥९५॥
चितवउ वा अउसर मन माहि ॥
होइ इकत्र मिलहु संत साजन गुण गोबिंद नित गाहि ॥१॥ रहाउ ॥
बिनु हरि भजन जेते काम करीअहि तेते बिरथे जांहि ॥
पूरन परमानंद मनि मीठो तिसु बिनु दूसर नाहि ॥१॥
जप तप संजम करम सुख साधन तुलि न कछूऐ लाहि ॥
चरन कमल नानक मनु बेधिओ चरनह संगि समाहि ॥२॥७२॥९५॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! मैं तो अपने मन उस मौके का इन्तजार करता रहता हूँ। जब में संतों-सज्जनों को मिलूँ जो नित्य इकट्ठे हो के परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के भजन के बिना और जितने भी काम किए जाते हैं। वे सारे (जिंद के हिसाब से) व्यर्थ चले जाते हैं। सर्व-व्यापक और सब से ऊँचे आनंद के मालिक का नाम मन में मीठा लगना- यही है असल लाभदायक काम। (क्योंकि) उस परमात्मा के बिना और कोई (साथी) नहीं। 1। हे नानक ! (कह-) जप-तप-संजम आदि हठ-कर्म और सुख की तलाश के और साधन – परमात्मा के नाम की बराबरी नहीं कर सकते और संत-जन इनको कुछ भी नहीं समझते (तुच्छ समझते हैं)। संत जनों का मन परमात्मा के सुंदर चरणों में भेदा रहता है। संत जन परमात्मा के चरणों में ही लीन रहते हैं। 2। 72। 95।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਸੰਗੇ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਆਗੈ ਕੁਸਲ ਪਾਛੈ ਖੇਮ ਸੂਖਾ ਸਿਮਰਤ ਨਾਮੁ ਸੁਆਮੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਸੰਗੇ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਆਗੈ ਕੁਸਲ ਪਾਛੈ ਖੇਮ ਸੂਖਾ ਸਿਮਰਤ ਨਾਮੁ ਸੁਆਮੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सारग महला ५ ॥
मेरा प्रभु संगे अंतरजामी ॥
आगै कुसल पाछै खेम सूखा सिमरत नामु सुआमी ॥१॥ रहाउ ॥
मेरा प्रभु संगे अंतरजामी ॥
आगै कुसल पाछै खेम सूखा सिमरत नामु सुआमी ॥१॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! सबके दिल की जानने वाला मेरा प्रभू (हर वक्त मेरे) साथ है- (जिस मनुष्य को यही निश्चय बन जाता है। उसको) मालिक-प्रभू का नाम सिमरते हुए परलोक और इस लोक में सदा सुख-आनंद बना रहता है। 1। रहाउ।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1222 है, राग सारंग का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Noida के office-tower की 15वीं मंज़िल से शाम का Delhi-view।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1222” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सारंग राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1223 →, पीछे का: ← अंग 1221।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।