पंच जना गुरि वसगति आणे तउ उनमनि नामि लगानी ॥
जन नानक हरि किरपा धारी हरि रामै नामि समानी ॥4॥5॥
जपि मन राम नामु पड़्हु सारु ॥
राम नाम बिनु थिरु नही कोई होरु निहफल सभु बिसथारु ॥1॥ रहाउ ॥
किआ लीजै किआ तजीऐ बउरे जो दीसै सो छारु ॥
जिसु बिखिआ कउ तुम॑ अपुनी करि जानहु सा छाडि जाहु सिरि भारु ॥1॥
तिलु तिलु पलु पलु अउध फुनि घाटै बूझि न सकै गवारु ॥
सो किछु करै जि साथि न चालै इहु साकत का आचारु ॥2॥
संत जना कै संगि मिलु बउरे तउ पावहि मोख दुआरु ॥
बिनु सतसंग सुखु किनै न पाइआ जाइ पूछहु बेद बीचारु ॥3॥
राणा राउ सभै कोऊ चालै झूठु छोडि जाइ पासारु ॥
नानक संत सदा थिरु निहचलु जिन राम नामु आधारु ॥4॥6॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
काहे पूत झगरत हउ संगि बाप ॥
जिन के जणे बडीरे तुम हउ तिन सिउ झगरत पाप ॥1॥ रहाउ ॥
जिसु धन का तुम गरबु करत हउ सो धनु किसहि न आप ॥
खिन महि छोडि जाइ बिखिआ रसु तउ लागै पछुताप ॥1॥
जो तुमरे प्रभ होते सुआमी हरि तिन के जापहु जाप ॥
उपदेसु करत नानक जन तुम कउ जउ सुनहु तउ जाइ संताप ॥2॥1॥7॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जपि मन जगंनाथ जगदीसरो जगजीवनो मनमोहन सिउ प्रीति लागी मै हरि हरि हरि टेक सभ दिनसु सभ राति ॥1॥ रहाउ ॥
हरि की उपमा अनिक अनिक अनिक गुन गावत सुक नारद ब्रहमादिक तव गुन सुआमी गनिन न जाति ॥
तू हरि बेअंतु तू हरि बेअंतु तू हरि सुआमी तू आपे ही जानहि आपनी भांति ॥1॥
हरि कै निकटि निकटि हरि निकट ही बसते ते हरि के जन साधू हरि भगात ॥
ते हरि के जन हरि सिउ रलि मिले जैसे जन नानक सललै सलल मिलाति ॥2॥1॥8॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “कानों से दिन-रात आपकी सिफत-सालाह सुनता रहूँ।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।