अंग 1223

अंग
1223
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਾਜਨ ਮੀਤ ਸਖਾ ਹਰਿ ਮੇਰੈ ਗੁਨ ਗੋੁਪਾਲ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥
ਬਿਸਰਿ ਨ ਜਾਈ ਨਿਮਖ ਹਿਰਦੈ ਤੇ ਪੂਰੈ ਗੁਰੂ ਮਿਲਾਇਆ ॥੧॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਰਾਖੇ ਦਾਸ ਅਪਨੇ ਜੀਅ ਜੰਤ ਵਸਿ ਜਾ ਕੈ ॥
ਏਕਾ ਲਿਵ ਪੂਰਨ ਪਰਮੇਸੁਰ ਭਉ ਨਹੀ ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੈ ॥੨॥੭੩॥੯੬॥
साजन मीत सखा हरि मेरै गुन गोुपाल हरि राइआ ॥
बिसरि न जाई निमख हिरदै ते पूरै गुरू मिलाइआ ॥१॥
करि किरपा राखे दास अपने जीअ जंत वसि जा कै ॥
एका लिव पूरन परमेसुर भउ नही नानक ता कै ॥२॥७३॥९६॥

हिन्दी अर्थ: (उसे यह विश्वास रहता है कि) प्रभू ही मेरे लिए सज्जन-मित्र है। गोपाल-प्रभू-पातिशाह के गुण ही मेरे (असल) साथी हैं। हे भाई ! जिस मनुष्य को पूरे गुरू ने परमात्मा से मिला दिया। उसके हृदय से परमात्मा की याद पलक झपकने जितने समय के लिए भरूी नहीं भूलती 1। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जिस परमात्मा के वश में सारे जीव-जंतु हैं। वह मेहर करके अपने दासों की रक्षा खुद करता आया है। जिस मनुष्य के अंदर सर्व-व्यापक परमात्मा की ही हर वक्त प्रीति है। उसके मन में (किसी प्रकार का कोई) डर नहीं रहता। 2। 73। 96।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਾ ਕੈ ਰਾਮ ਕੋ ਬਲੁ ਹੋਇ ॥
ਸਗਲ ਮਨੋਰਥ ਪੂਰਨ ਤਾਹੂ ਕੇ ਦੂਖੁ ਨ ਬਿਆਪੈ ਕੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੋ ਜਨੁ ਭਗਤੁ ਦਾਸੁ ਨਿਜੁ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਸੁਣਿ ਜੀਵਾਂ ਤਿਸੁ ਸੋਇ ॥
ਉਦਮੁ ਕਰਉ ਦਰਸਨੁ ਪੇਖਨ ਕੌ ਕਰਮਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥੧॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਨਿਹਾਰਉ ਦੂਸਰ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ॥
ਦਾਨੁ ਦੇਹਿ ਨਾਨਕ ਅਪਨੇ ਕਉ ਚਰਨ ਜੀਵਾਂ ਸੰਤ ਧੋਇ ॥੨॥੭੪॥੯੭॥
सारग महला ५ ॥
जा कै राम को बलु होइ ॥
सगल मनोरथ पूरन ताहू के दूखु न बिआपै कोइ ॥१॥ रहाउ ॥
जो जनु भगतु दासु निजु प्रभ का सुणि जीवां तिसु सोइ ॥
उदमु करउ दरसनु पेखन कौ करमि परापति होइ ॥१॥
गुर परसादी द्रिसटि निहारउ दूसर नाही कोइ ॥
दानु देहि नानक अपने कउ चरन जीवां संत धोइ ॥२॥७४॥९७॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा की मेहर का सहारा होता है। उस मनुष्य के सारे मनोरथ पूरे हो जाते हैं। उस पर कोई दुख अपना जोर नहीं डाल सकता। 1। रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का खास अपना दास भगत बन जाता है। मैं उसकी शोभा सुन के आत्मिक जीवन हासिल करता हूँ। मैं उसके दर्शन करने के लिए जतन करता हूँ। पर (संत-जन का दर्शन भी परमात्मा की) मेहर से ही होता है। 1। हे भाई ! गुरू की मेहर के सदका मैं अपनी आँखों से देख रहा हूँ कि (परमात्मा के बराबर का) और कोई दूसरा नहीं। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) मुझे अपने दास को ये ख़ैर डाल कि मैं संत-जनों चरण धो-धो के आत्मिक जीवन प्राप्त करता रहूँ। 2। 74। 97।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜੀਵਤੁ ਰਾਮ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥
ਕਰਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਗੋਪਾਲ ਬੀਠੁਲੇ ਬਿਸਰਿ ਨ ਕਬ ਹੀ ਜਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਧਨੁ ਸਭੁ ਤੁਮਰਾ ਸੁਆਮੀ ਆਨ ਨ ਦੂਜੀ ਜਾਇ ॥
ਜਿਉ ਤੂ ਰਾਖਹਿ ਤਿਵ ਹੀ ਰਹਣਾ ਤੁਮੑਰਾ ਪੈਨੈੑ ਖਾਇ ॥੧॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੈ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਈ ਬਹੁੜਿ ਨ ਜਨਮਾ ਧਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਚਲਾਇ ॥੨॥੭੫॥੯੮॥
सारग महला ५ ॥
जीवतु राम के गुण गाइ ॥
करहु क्रिपा गोपाल बीठुले बिसरि न कब ही जाइ ॥१॥ रहाउ ॥
मनु तनु धनु सभु तुमरा सुआमी आन न दूजी जाइ ॥
जिउ तू राखहि तिव ही रहणा तुम॑रा पैनै॑ खाइ ॥१॥
साधसंगति कै बलि बलि जाई बहुड़ि न जनमा धाइ ॥
नानक दास तेरी सरणाई जिउ भावै तिवै चलाइ ॥२॥७५॥९८॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा के गुण गा-गा के (मनुष्य) आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है। हे सृष्टि के मालिक ! हे निर्लिप प्रभू ! (मेरे पर) मेहर कर। (मुझे तेरा नाम) कभी ना भूले। 1। रहाउ। हे (मेरे) मालिक ! मेरा मन मेरा शरीर मेरा धन- यह सब कुछ तेरा ही दिया हुआ है। (तेरे बिना) मेरा कोई और आसरा नहीं। जैसे तू रखता है। वैसे ही (जीव) रह सकते हैं। (हरेक जीव) तेरा ही दिया पहनता है तेरा ही दिया खाता है। 1। हे नानक ! (कह-) मैं साध-संगति से सदा सदके जाता हूँ। (साध-संगति की बरकति से जीव) दोबारा जन्मों में नहीं भटकता। हे प्रभू ! तेरा दास (नानक) तेरी शरण आया है। जैसे तुझे अच्छा लगे। उसी तरह (मुझे) जीवन-राह पर चला। 2। 75। 98।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਨ ਰੇ ਨਾਮ ਕੋ ਸੁਖ ਸਾਰ ॥
ਆਨ ਕਾਮ ਬਿਕਾਰ ਮਾਇਆ ਸਗਲ ਦੀਸਹਿ ਛਾਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗ੍ਰਿਹਿ ਅੰਧ ਕੂਪ ਪਤਿਤ ਪ੍ਰਾਣੀ ਨਰਕ ਘੋਰ ਗੁਬਾਰ ॥
ਅਨਿਕ ਜੋਨੀ ਭ੍ਰਮਤ ਹਾਰਿਓ ਭ੍ਰਮਤ ਬਾਰੰ ਬਾਰ ॥੧॥
ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਭਗਤਿ ਬਛਲ ਦੀਨ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰ ॥
ਕਰ ਜੋੜਿ ਨਾਨਕੁ ਦਾਨੁ ਮਾਂਗੈ ਸਾਧਸੰਗਿ ਉਧਾਰ ॥੨॥੭੬॥੯੯॥
सारग महला ५ ॥
मन रे नाम को सुख सार ॥
आन काम बिकार माइआ सगल दीसहि छार ॥१॥ रहाउ ॥
ग्रिहि अंध कूप पतित प्राणी नरक घोर गुबार ॥
अनिक जोनी भ्रमत हारिओ भ्रमत बारं बार ॥१॥
पतित पावन भगति बछल दीन किरपा धार ॥
कर जोड़ि नानकु दानु मांगै साधसंगि उधार ॥२॥७६॥९९॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे (मेरे) मन ! परमात्मा के नाम सिमरन का सुख (और सभी सुखों से) उक्तम है। हे मन ! (निरी) माया की खातिर ही और-और काम (आत्मिक जीवन के लिए) व्यर्थ हैं। वे सारे राख (समान ही) दिखते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! (सिर्फ माया की खातिर दौड़-भाग करने वाला) प्राणी घोर अंधेरे नर्क समान गृहस्त के अंधे कूएँ में गिरा रहता है। वह अनेकों जूनियों में भटकता बार-बार भटकता थक जाता है (जीवन-सक्ता गवा बैठता है)। 1। हे विकारियों को पवित्र करने वाले ! हे भगती से प्यार करने वाले ! हे गरीबों पर मेहर करने वाले ! (तेरा दास) नानक दोनों हाथ जोड़ के यह दान माँगता है कि साध-संगति में रख के (मुझे माया-ग्रसित अंधे कूएँ में से) बचा ले। 2। 76। 99।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਬਿਰਾਜਿਤ ਰਾਮ ਕੋ ਪਰਤਾਪ ॥
ਆਧਿ ਬਿਆਧਿ ਉਪਾਧਿ ਸਭ ਨਾਸੀ ਬਿਨਸੇ ਤੀਨੈ ਤਾਪ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਬੁਝੀ ਪੂਰਨ ਸਭ ਆਸਾ ਚੂਕੇ ਸੋਗ ਸੰਤਾਪ ॥
ਗੁਣ ਗਾਵਤ ਅਚੁਤ ਅਬਿਨਾਸੀ ਮਨ ਤਨ ਆਤਮ ਧ੍ਰਾਪ ॥੧॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਲੋਭ ਮਦ ਮਤਸਰ ਸਾਧੂ ਕੈ ਸੰਗਿ ਖਾਪ ॥
ਭਗਤਿ ਵਛਲ ਭੈ ਕਾਟਨਹਾਰੇ ਨਾਨਕ ਕੇ ਮਾਈ ਬਾਪ ॥੨॥੭੭॥੧੦੦॥
सारग महला ५ ॥
बिराजित राम को परताप ॥
आधि बिआधि उपाधि सभ नासी बिनसे तीनै ताप ॥१॥ रहाउ ॥
त्रिसना बुझी पूरन सभ आसा चूके सोग संताप ॥
गुण गावत अचुत अबिनासी मन तन आतम ध्राप ॥१॥
काम क्रोध लोभ मद मतसर साधू कै संगि खाप ॥
भगति वछल भै काटनहारे नानक के माई बाप ॥२॥७७॥१००॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! (जिस मनुष्य के हृदय में) परमात्मा के नाम का बल आ टिकता है। उसके अंदर से आधि-बिआधि और उपाधि- ये तीनों ही ताप बिल्कुल ही समाप्त हो जाते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! (जिस मनुष्य के अंदर हरी-नाम का बल है। उसकी) तृष्णा मिट जाती है। उसकी हरेक आशा पूरी हो जाती है। उसके अंदर से ग़म-कलेश खत्म हो जाते हैं। अविनाशी और नाश-रहित प्रभू के गुण गाते-गाते उसका मन उसका तन उसकी जिंद (की तृष्णा) तृप्त हो जाते हैं। 1। मुझे साध-संगति में रख के (मेरे अंदर से) काम-क्रोध-लोभ-अहंकार और ईष्या (आदिक विकार) नाश कर। हे भगती से प्यार करने वाले ! हे सारे डर दूर करने वाले ! हे नानक के माता-पिता (ष्की तरह पालना करने वाले !) 2। 77। 100।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਆਤੁਰੁ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਸੰਸਾਰ ॥
ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨ ਹੋਵਤ ਕੂਕਰੀ ਆਸਾ ਇਤੁ ਲਾਗੋ ਬਿਖਿਆ ਛਾਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪਾਇ ਠਗਉਰੀ ਆਪਿ ਭੁਲਾਇਓ ਜਨਮਤ ਬਾਰੋ ਬਾਰ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਸਿਮਰਨੁ ਨਿਮਖ ਨ ਸਿਮਰਿਓ ਜਮਕੰਕਰ ਕਰਤ ਖੁਆਰ ॥੧॥
ਹੋਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਦੀਨ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਤੇਰਿਆ ਸੰਤਹ ਕੀ ਰਾਵਾਰ ॥
सारग महला ५ ॥
आतुरु नाम बिनु संसार ॥
त्रिपति न होवत कूकरी आसा इतु लागो बिखिआ छार ॥१॥ रहाउ ॥
पाइ ठगउरी आपि भुलाइओ जनमत बारो बार ॥
हरि का सिमरनु निमख न सिमरिओ जमकंकर करत खुआर ॥१॥
होहु क्रिपाल दीन दुख भंजन तेरिआ संतह की रावार ॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! (परमात्मा के) नाम को भुला के जगत व्याकुल हुआ रहता है। इस राख समान माया में ही लगा रहता है (चिपका रहता है) कुक्ती के स्वभाव वाली (जगत की) लालसा कभी नहीं अघाती। 1। रहाउ। (पर। हे भाई ! जीव के भी क्या वश। परमात्मा ने माया की) ठॅग-बूटी डाल के स्वयं ही (जगत को) गलत राह पर डाल रखा है। (कुमार्ग पर पड़ कर जीव) बार-बार जूनियों में रहता है। आँख झपकने जितने समय के लिए भी (जीव) परमातमा (के नाम) का सिमरन नहीं करता। जमदूत इसको ख्वार करते रहते हैं। 1। हे प्रभू ! हे गरीबों का दुख नाश करने वाले ! (दास नानक पर) दयावान हो। (तेरा दास) तेरे संत-जनों के चरणों की धूड़ बना रहे।

संदर्भ: यह अंग 1223 है, राग सारंग का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Vasant Vihar के market में Sunday सुबह की धीमी-धीमी activity।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1223” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: सारंग राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1224 →, पीछे का: ← अंग 1222

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।