अंग
1224
राग सारंग
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਾਨਕ ਦਾਸੁ ਦਰਸੁ ਪ੍ਰਭ ਜਾਚੈ ਮਨ ਤਨ ਕੋ ਆਧਾਰ ॥੨॥੭੮॥੧੦੧॥
नानक दासु दरसु प्रभ जाचै मन तन को आधार ॥२॥७८॥१०१॥
हिन्दी अर्थ: (तेरा) दास नानक तेरे दर्शन माँगता है। यही (इसके) मन का तन का आसरा है। 2। 78। 101।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮੈਲਾ ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਜੀਉ ॥
ਤਿਨਿ ਪ੍ਰਭਿ ਸਾਚੈ ਆਪਿ ਭੁਲਾਇਆ ਬਿਖੈ ਠਗਉਰੀ ਪੀਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕੋਟਿ ਜਨਮ ਭ੍ਰਮਤੌ ਬਹੁ ਭਾਂਤੀ ਥਿਤਿ ਨਹੀ ਕਤਹੂ ਪਾਈ ॥
ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਹਜਿ ਨ ਭੇਟਿਆ ਸਾਕਤੁ ਆਵੈ ਜਾਈ ॥੧॥
ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ਪ੍ਰਭ ਸੰਮ੍ਰਿਥ ਦਾਤੇ ਤੁਮ ਪ੍ਰਭ ਅਗਮ ਅਪਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ਭਵਜਲੁ ਉਤਰਿਓ ਪਾਰ ॥੨॥੭੯॥੧੦੨॥
ਮੈਲਾ ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਜੀਉ ॥
ਤਿਨਿ ਪ੍ਰਭਿ ਸਾਚੈ ਆਪਿ ਭੁਲਾਇਆ ਬਿਖੈ ਠਗਉਰੀ ਪੀਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕੋਟਿ ਜਨਮ ਭ੍ਰਮਤੌ ਬਹੁ ਭਾਂਤੀ ਥਿਤਿ ਨਹੀ ਕਤਹੂ ਪਾਈ ॥
ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਹਜਿ ਨ ਭੇਟਿਆ ਸਾਕਤੁ ਆਵੈ ਜਾਈ ॥੧॥
ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ਪ੍ਰਭ ਸੰਮ੍ਰਿਥ ਦਾਤੇ ਤੁਮ ਪ੍ਰਭ ਅਗਮ ਅਪਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ਭਵਜਲੁ ਉਤਰਿਓ ਪਾਰ ॥੨॥੭੯॥੧੦੨॥
सारग महला ५ ॥
मैला हरि के नाम बिनु जीउ ॥
तिनि प्रभि साचै आपि भुलाइआ बिखै ठगउरी पीउ ॥१॥ रहाउ ॥
कोटि जनम भ्रमतौ बहु भांती थिति नही कतहू पाई ॥
पूरा सतिगुरु सहजि न भेटिआ साकतु आवै जाई ॥१॥
राखि लेहु प्रभ संम्रिथ दाते तुम प्रभ अगम अपार ॥
नानक दास तेरी सरणाई भवजलु उतरिओ पार ॥२॥७९॥१०२॥
मैला हरि के नाम बिनु जीउ ॥
तिनि प्रभि साचै आपि भुलाइआ बिखै ठगउरी पीउ ॥१॥ रहाउ ॥
कोटि जनम भ्रमतौ बहु भांती थिति नही कतहू पाई ॥
पूरा सतिगुरु सहजि न भेटिआ साकतु आवै जाई ॥१॥
राखि लेहु प्रभ संम्रिथ दाते तुम प्रभ अगम अपार ॥
नानक दास तेरी सरणाई भवजलु उतरिओ पार ॥२॥७९॥१०२॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना जीव विकारों में भरा रहता है। (पर। जीव के भी क्या वश। ) उस सदा-स्थिर प्रभू ने आप ही इसको गलत राह पर डाला हुआ है कि विषियों की ठॅग-बूटी (घोट-घोट के) पीता रह। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा से टूटा हुआ मनुष्य कई तरीकों से करोड़ों जन्मों में भटकता रहता है। कहीं भी (इस चक्कर में से इसको) मुक्ति नहीं मिलती। आत्मिक अडोलता में (पहुँचाने वाला) पूरा गुरू इसको नहीं मिलता (इस वास्ते सदा) पैदा होता मरता रहता है। 1। हे सब ताकतों के मालिक प्रभू ! हे सब दातें देने वाले ! हम जीवों के लिए तू अपहुँच है बेअंत है। तू स्वयं ही रक्षा कर। हे नानक ! (कह- हे प्रभू ! जो तेरा) दास तेरी शरण आता है। वह संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। 2। 79। 102।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਰਮਣ ਕਉ ਰਾਮ ਕੇ ਗੁਣ ਬਾਦ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਧਿਆਈਐ ਪਰਮੇਸਰੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਜਾ ਕੇ ਸੁਆਦ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਿਮਰਤ ਏਕੁ ਅਚੁਤ ਅਬਿਨਾਸੀ ਬਿਨਸੇ ਮਾਇਆ ਮਾਦ ॥
ਸਹਜ ਅਨਦ ਅਨਹਦ ਧੁਨਿ ਬਾਣੀ ਬਹੁਰਿ ਨ ਭਏ ਬਿਖਾਦ ॥੧॥
ਸਨਕਾਦਿਕ ਬ੍ਰਹਮਾਦਿਕ ਗਾਵਤ ਗਾਵਤ ਸੁਕ ਪ੍ਰਹਿਲਾਦ ॥
ਪੀਵਤ ਅਮਿਉ ਮਨੋਹਰ ਹਰਿ ਰਸੁ ਜਪਿ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਬਿਸਮਾਦ ॥੨॥੮੦॥੧੦੩॥
ਰਮਣ ਕਉ ਰਾਮ ਕੇ ਗੁਣ ਬਾਦ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਧਿਆਈਐ ਪਰਮੇਸਰੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਜਾ ਕੇ ਸੁਆਦ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਿਮਰਤ ਏਕੁ ਅਚੁਤ ਅਬਿਨਾਸੀ ਬਿਨਸੇ ਮਾਇਆ ਮਾਦ ॥
ਸਹਜ ਅਨਦ ਅਨਹਦ ਧੁਨਿ ਬਾਣੀ ਬਹੁਰਿ ਨ ਭਏ ਬਿਖਾਦ ॥੧॥
ਸਨਕਾਦਿਕ ਬ੍ਰਹਮਾਦਿਕ ਗਾਵਤ ਗਾਵਤ ਸੁਕ ਪ੍ਰਹਿਲਾਦ ॥
ਪੀਵਤ ਅਮਿਉ ਮਨੋਹਰ ਹਰਿ ਰਸੁ ਜਪਿ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਬਿਸਮਾਦ ॥੨॥੮੦॥੧੦੩॥
सारग महला ५ ॥
रमण कउ राम के गुण बाद ॥
साधसंगि धिआईऐ परमेसरु अंम्रित जा के सुआद ॥१॥ रहाउ ॥
सिमरत एकु अचुत अबिनासी बिनसे माइआ माद ॥
सहज अनद अनहद धुनि बाणी बहुरि न भए बिखाद ॥१॥
सनकादिक ब्रहमादिक गावत गावत सुक प्रहिलाद ॥
पीवत अमिउ मनोहर हरि रसु जपि नानक हरि बिसमाद ॥२॥८०॥१०३॥
रमण कउ राम के गुण बाद ॥
साधसंगि धिआईऐ परमेसरु अंम्रित जा के सुआद ॥१॥ रहाउ ॥
सिमरत एकु अचुत अबिनासी बिनसे माइआ माद ॥
सहज अनद अनहद धुनि बाणी बहुरि न भए बिखाद ॥१॥
सनकादिक ब्रहमादिक गावत गावत सुक प्रहिलाद ॥
पीवत अमिउ मनोहर हरि रसु जपि नानक हरि बिसमाद ॥२॥८०॥१०३॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा के गुणों का उच्चारण- यह ही सिमरन के लिए (श्रेष्ठ दाति है)। हे भाई ! जिस परमेश्वर के (नाम जपने के) रस आत्मिक-जीवन देने वाले हैं। उसका ध्यान साध-संगति में टिक के धरना चाहिए। 1। रहाउ। हे भाई ! अविनाशी नाश-रहित प्रभू का नाम सिमरते हुए माया के सारे नशे नाश हो जाते हैं। (सिमरन वाले के अंदर) आत्मिक अडोलता के आनंद बने रहते हैं। सिफतसालाह की बाणी की ण्क-रस रौंअ निरंतर चलने लगती है। उसके मन में दुख-कलेश नहीं रह जाते। 1। हे भाई ! सनक आदि ब्रहमा के चारों पुत्र। ब्रहमा आदि देवतागण (उस प्रभू की सिफतसालाह के गीत) गाते रहते हैं। शुकदेव ऋषि प्रहलाद भगत आदि उसके गुण गाते हैं। हे नानक ! मन को मोहने वाले हरी का आत्मिक-जीवन देने वाला नाम-रस पीते हुए। हरी का नाम जप-जप के मनुष्य के अंद रवह अवस्था पैदा हो जाती है कि जहाँ यह सदा वाह-वाह की मस्ती में टिका रहता है। 2। 80। 103।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕੀਨੑੇ ਪਾਪ ਕੇ ਬਹੁ ਕੋਟ ॥
ਦਿਨਸੁ ਰੈਨੀ ਥਕਤ ਨਾਹੀ ਕਤਹਿ ਨਾਹੀ ਛੋਟ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਹਾ ਬਜਰ ਬਿਖ ਬਿਆਧੀ ਸਿਰਿ ਉਠਾਈ ਪੋਟ ॥
ਉਘਰਿ ਗਈਆਂ ਖਿਨਹਿ ਭੀਤਰਿ ਜਮਹਿ ਗ੍ਰਾਸੇ ਝੋਟ ॥੧॥
ਪਸੁ ਪਰੇਤ ਉਸਟ ਗਰਧਭ ਅਨਿਕ ਜੋਨੀ ਲੇਟ ॥
ਭਜੁ ਸਾਧਸੰਗਿ ਗੋਬਿੰਦ ਨਾਨਕ ਕਛੁ ਨ ਲਾਗੈ ਫੇਟ ॥੨॥੮੧॥੧੦੪॥
ਕੀਨੑੇ ਪਾਪ ਕੇ ਬਹੁ ਕੋਟ ॥
ਦਿਨਸੁ ਰੈਨੀ ਥਕਤ ਨਾਹੀ ਕਤਹਿ ਨਾਹੀ ਛੋਟ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਹਾ ਬਜਰ ਬਿਖ ਬਿਆਧੀ ਸਿਰਿ ਉਠਾਈ ਪੋਟ ॥
ਉਘਰਿ ਗਈਆਂ ਖਿਨਹਿ ਭੀਤਰਿ ਜਮਹਿ ਗ੍ਰਾਸੇ ਝੋਟ ॥੧॥
ਪਸੁ ਪਰੇਤ ਉਸਟ ਗਰਧਭ ਅਨਿਕ ਜੋਨੀ ਲੇਟ ॥
ਭਜੁ ਸਾਧਸੰਗਿ ਗੋਬਿੰਦ ਨਾਨਕ ਕਛੁ ਨ ਲਾਗੈ ਫੇਟ ॥੨॥੮੧॥੧੦੪॥
सारग महला ५ ॥
कीन॑े पाप के बहु कोट ॥
दिनसु रैनी थकत नाही कतहि नाही छोट ॥१॥ रहाउ ॥
महा बजर बिख बिआधी सिरि उठाई पोट ॥
उघरि गईआं खिनहि भीतरि जमहि ग्रासे झोट ॥१॥
पसु परेत उसट गरधभ अनिक जोनी लेट ॥
भजु साधसंगि गोबिंद नानक कछु न लागै फेट ॥२॥८१॥१०४॥
कीन॑े पाप के बहु कोट ॥
दिनसु रैनी थकत नाही कतहि नाही छोट ॥१॥ रहाउ ॥
महा बजर बिख बिआधी सिरि उठाई पोट ॥
उघरि गईआं खिनहि भीतरि जमहि ग्रासे झोट ॥१॥
पसु परेत उसट गरधभ अनिक जोनी लेट ॥
भजु साधसंगि गोबिंद नानक कछु न लागै फेट ॥२॥८१॥१०४॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! (हरी-नाम से विछुड़ के) मनुष्य पापों की अनेकों किले (चार दिवारियां) (अपनी जिंद के चारों तरफ) खड़ी करता जाता है। दिन-रात (पाप करते हुए) थकता नहीं (साध-संगति के बिना और) कहीं भी (पापों से) इसकी मुक्ति नहीं मिल सकती। 1। रहाउ। हे भाई ! (हरी-नाम से विछुड़ के) मनुष्य बड़े कठोर और आत्मिक मौत लाने वाले रोगों की पोटली (अपने) सिर पर उठाए रखता है। जब जमों ने (आ के) केसों से पकड़ लिया। तब एक-छिन में ही (इसकी) आँखें खुल जाती हैं (पर। तब क्या फायदा। )। 1। हे भाई ! (पापों की पोटली के कारण) जीव पशू। प्रेत। ऊँठ। गधा आदि अनेकों जूनियों में भटकता फिरता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) साध-संगति में टिक के परमात्मा का भजन किया कर। फिर (जमों की) रक्ती भर भी चोट नहीं लगेगी। 2। 81। 104।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅੰਧੇ ਖਾਵਹਿ ਬਿਸੂ ਕੇ ਗਟਾਕ ॥
ਨੈਨ ਸ੍ਰਵਨ ਸਰੀਰੁ ਸਭੁ ਹੁਟਿਓ ਸਾਸੁ ਗਇਓ ਤਤ ਘਾਟ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਾਥ ਰਞਾਣਿ ਉਦਰੁ ਲੇ ਪੋਖਹਿ ਮਾਇਆ ਗਈਆ ਹਾਟਿ ॥
ਕਿਲਬਿਖ ਕਰਤ ਕਰਤ ਪਛੁਤਾਵਹਿ ਕਬਹੁ ਨ ਸਾਕਹਿ ਛਾਂਟਿ ॥੧॥
ਨਿੰਦਕੁ ਜਮਦੂਤੀ ਆਇ ਸੰਘਾਰਿਓ ਦੇਵਹਿ ਮੂੰਡ ਉਪਰਿ ਮਟਾਕ ॥
ਨਾਨਕ ਆਪਨ ਕਟਾਰੀ ਆਪਸ ਕਉ ਲਾਈ ਮਨੁ ਅਪਨਾ ਕੀਨੋ ਫਾਟ ॥੨॥੮੨॥੧੦੫॥
ਅੰਧੇ ਖਾਵਹਿ ਬਿਸੂ ਕੇ ਗਟਾਕ ॥
ਨੈਨ ਸ੍ਰਵਨ ਸਰੀਰੁ ਸਭੁ ਹੁਟਿਓ ਸਾਸੁ ਗਇਓ ਤਤ ਘਾਟ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਾਥ ਰਞਾਣਿ ਉਦਰੁ ਲੇ ਪੋਖਹਿ ਮਾਇਆ ਗਈਆ ਹਾਟਿ ॥
ਕਿਲਬਿਖ ਕਰਤ ਕਰਤ ਪਛੁਤਾਵਹਿ ਕਬਹੁ ਨ ਸਾਕਹਿ ਛਾਂਟਿ ॥੧॥
ਨਿੰਦਕੁ ਜਮਦੂਤੀ ਆਇ ਸੰਘਾਰਿਓ ਦੇਵਹਿ ਮੂੰਡ ਉਪਰਿ ਮਟਾਕ ॥
ਨਾਨਕ ਆਪਨ ਕਟਾਰੀ ਆਪਸ ਕਉ ਲਾਈ ਮਨੁ ਅਪਨਾ ਕੀਨੋ ਫਾਟ ॥੨॥੮੨॥੧੦੫॥
सारग महला ५ ॥
अंधे खावहि बिसू के गटाक ॥
नैन स्रवन सरीरु सभु हुटिओ सासु गइओ तत घाट ॥१॥ रहाउ ॥
अनाथ रञाणि उदरु ले पोखहि माइआ गईआ हाटि ॥
किलबिख करत करत पछुतावहि कबहु न साकहि छांटि ॥१॥
निंदकु जमदूती आइ संघारिओ देवहि मूंड उपरि मटाक ॥
नानक आपन कटारी आपस कउ लाई मनु अपना कीनो फाट ॥२॥८२॥१०५॥
अंधे खावहि बिसू के गटाक ॥
नैन स्रवन सरीरु सभु हुटिओ सासु गइओ तत घाट ॥१॥ रहाउ ॥
अनाथ रञाणि उदरु ले पोखहि माइआ गईआ हाटि ॥
किलबिख करत करत पछुतावहि कबहु न साकहि छांटि ॥१॥
निंदकु जमदूती आइ संघारिओ देवहि मूंड उपरि मटाक ॥
नानक आपन कटारी आपस कउ लाई मनु अपना कीनो फाट ॥२॥८२॥१०५॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! (माया के मोह में) अंधे हो चुके मनुष्य आत्मिक मौत लाने वाले पदार्थ ही खुश हो-हो के खाते रहते हैं (आखिर मौत सिर पर आ जाती है)। आँखें। कान। शरीर- हरेक अंग काम करने से रह जाता है। और। सांसें भी खत्म हो जाती हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! (माया के मोह में अंधे हो चुके मनुष्य) कमजोरों को दुख दे-दे के अपना पेट पालते रहते हैं (पर मौत आने पर) वह माया भी साथ छोड़ देती है। ऐसे मनुष्य पाप करते-करते पछताते भी हैं। (पर। इन पापों को) छोड़ नहीं सकते। 1। हे भाई ! (यही हाल होता है निंदक मनुष्य का। निंदक सारी उम्र संत-जनों पर दूषणबाजी करता रहता है। आखिर में जब) जमदूत निंदक को आ पकड़ते हैं। उसके सिर के ऊपर (मौत की) चोट आ चलाते हैं। हे नानक ! (सारी उम्र) निंदक अपनी छुरी अपने ऊपर ही चलाता रहता है। अपने ही मन को निंदा के जख़्म लगाता रहता है। 2। 82। 105।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਟੂਟੀ ਨਿੰਦਕ ਕੀ ਅਧ ਬੀਚ ॥
ਜਨ ਕਾ ਰਾਖਾ ਆਪਿ ਸੁਆਮੀ ਬੇਮੁਖ ਕਉ ਆਇ ਪਹੂਚੀ ਮੀਚ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਉਸ ਕਾ ਕਹਿਆ ਕੋਇ ਨ ਸੁਣਈ ਕਹੀ ਨ ਬੈਸਣੁ ਪਾਵੈ ॥
ਈਹਾਂ ਦੁਖੁ ਆਗੈ ਨਰਕੁ ਭੁੰਚੈ ਬਹੁ ਜੋਨੀ ਭਰਮਾਵੈ ॥੧॥
ਪ੍ਰਗਟੁ ਭਇਆ ਖੰਡੀ ਬ੍ਰਹਮੰਡੀ ਕੀਤਾ ਅਪਣਾ ਪਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਨਿਰਭਉ ਕਰਤੇ ਕੀ ਅਨਦ ਮੰਗਲ ਗੁਣ ਗਾਇਆ ॥੨॥੮੩॥੧੦੬॥
ਟੂਟੀ ਨਿੰਦਕ ਕੀ ਅਧ ਬੀਚ ॥
ਜਨ ਕਾ ਰਾਖਾ ਆਪਿ ਸੁਆਮੀ ਬੇਮੁਖ ਕਉ ਆਇ ਪਹੂਚੀ ਮੀਚ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਉਸ ਕਾ ਕਹਿਆ ਕੋਇ ਨ ਸੁਣਈ ਕਹੀ ਨ ਬੈਸਣੁ ਪਾਵੈ ॥
ਈਹਾਂ ਦੁਖੁ ਆਗੈ ਨਰਕੁ ਭੁੰਚੈ ਬਹੁ ਜੋਨੀ ਭਰਮਾਵੈ ॥੧॥
ਪ੍ਰਗਟੁ ਭਇਆ ਖੰਡੀ ਬ੍ਰਹਮੰਡੀ ਕੀਤਾ ਅਪਣਾ ਪਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਨਿਰਭਉ ਕਰਤੇ ਕੀ ਅਨਦ ਮੰਗਲ ਗੁਣ ਗਾਇਆ ॥੨॥੮੩॥੧੦੬॥
सारग महला ५ ॥
टूटी निंदक की अध बीच ॥
जन का राखा आपि सुआमी बेमुख कउ आइ पहूची मीच ॥१॥ रहाउ ॥
उस का कहिआ कोइ न सुणई कही न बैसणु पावै ॥
ईहां दुखु आगै नरकु भुंचै बहु जोनी भरमावै ॥१॥
प्रगटु भइआ खंडी ब्रहमंडी कीता अपणा पाइआ ॥
नानक सरणि निरभउ करते की अनद मंगल गुण गाइआ ॥२॥८३॥१०६॥
टूटी निंदक की अध बीच ॥
जन का राखा आपि सुआमी बेमुख कउ आइ पहूची मीच ॥१॥ रहाउ ॥
उस का कहिआ कोइ न सुणई कही न बैसणु पावै ॥
ईहां दुखु आगै नरकु भुंचै बहु जोनी भरमावै ॥१॥
प्रगटु भइआ खंडी ब्रहमंडी कीता अपणा पाइआ ॥
नानक सरणि निरभउ करते की अनद मंगल गुण गाइआ ॥२॥८३॥१०६॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! संतजनों की निंदा करने वाले मनुष्य की जिंदगी निष्फल जाती है। मालिक-प्रभू स्वयं अपने सेवक की रक्षा करने वाला है। पर जो मनुष्य संत-जनों से मुँह मोड़े रखता है। वह आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। 1। रहाउ। हे भाई ! संतजनों की निंदा करने वाले मनुष्य की बात पर कोई ऐतबार नहीं करता। उसको कहीं भी इज्जत वाली जगह नहीं मिलती। निंदक इस लोक में दुख पाता है। (क्योंकि कोई उसकी इज्जत नहीं करता)। परलोक में वह नर्क भोगता है। अनेकों जूनियों में भटकता है। 1। हे भाई ! संतजनों की निंदा करने वाले मनुष्य अपने (इस) किए का (यह) फल पाता है कि सारे जगत में बदनाम हो जाता है। हे नानक ! (प्रभू का सेवक) निर्भय करतार की शरण पड़ा रहता है। प्रभू के गुण गाता है। उसके अंदर आहित्मक आनंद बना रहता है। आत्मिक खुशियां बनी रहती हैं। 2। 83। 106।
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਚਲਤ ਬਹੁ ਪਰਕਾਰਿ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਚਲਤ ਬਹੁ ਪਰਕਾਰਿ ॥
सारग महला ५ ॥
त्रिसना चलत बहु परकारि ॥
त्रिसना चलत बहु परकारि ॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला ५ ॥ हे भाई ! (मनुष्य के अंदर) तृष्णा कई तरीकों से दौड़-भाग करती रहती है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1224 है, राग सारंग का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली-यूनिवर्सिटी के North Campus में exam-season की tension।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1224” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सारंग राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1225 →, पीछे का: ← अंग 1223।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।