अध्याय 2 · देवी की उत्पत्ति

देवी माहात्म्य

द्वितीय अध्याय · देवी की उत्पत्ति और महिषासुर-सेना का वध · मध्यम चरित्र

पूरे सौ बरस का देव-असुर संग्राम, और अंत में महिषासुर जीत कर इंद्र के आसन पर जा बैठा। हारे हुए देव ब्रह्मा को आगे कर विष्णु और शिव की शरण में पहुँचे। उनकी विपत्ति सुनते ही दोनों की भौंहें तन गईं, और तीनों देवों के मुख से एक महान तेज निकल पड़ा। सब देवों का तेज मिल कर जलते पर्वत-सा एक पुंज बना, और उसी से एक देवी प्रकट हुईं। हर देव ने अपना-अपना अस्त्र अर्पित किया, और सिंह पर सवार देवी ने ऐसा रौद्र नाद किया कि तीनों लोक काँप उठे।

70 श्लोक · पिछला अध्याय · देवी माहात्म्य मुख्य पृष्ठ

ऋषि कहते हैं, बहुत पुराने समय की बात है। देवों और असुरों के बीच पूरे सौ बरस का घोर युद्ध हुआ, एक ओर असुरों के अधिपति महिषासुर, दूसरी ओर देवों के अधिपति पुरंदर इंद्र। उस संग्राम में महा-पराक्रमी असुरों के आगे देव-सेना टिक न सकी और पराजित हो गई। समस्त देवों को जीत कर महिषासुर स्वयं इंद्र के स्थान पर जा बैठा।

1 · 2

ऋषिरुवाच ।
देवासुरमभूद् युद्धं पूर्णमब्दशतं पुरा ।
महिषे ऽसुराणामधिपे देवानां च पुरन्दरे ॥ 1 ॥
तत्रासुरैर्महावीर्यैर्देवसैन्यं पराजितम् ।
जित्वा च सकलान् देवानिन्द्रो ऽबून्महिषासुरः ॥ 2 ॥

तब हारे हुए देव-गण पद्म-योनि प्रजापति ब्रह्मा को अपने आगे कर के वहाँ गए जहाँ शिव और विष्णु विराजमान थे। दोनों के सम्मुख देवों ने सब कुछ खोल कर रख दिया, जैसा-जैसा हुआ था, महिषासुर की एक-एक चेष्टा और अपने पराभव का सारा विस्तार। उन्होंने बताया कि सूर्य, इंद्र, अग्नि, वायु, चन्द्र, यम और वरुण से ले कर शेष सब देवों के अधिकार अब वह दुरात्मा अकेले ही चलाने लगा है। स्वर्ग से निकाले हुए सब देव-गण अब धरती पर साधारण मनुष्यों की भाँति भटक रहे हैं।

3 · 4 · 5 · 6

ततः पराजिता देवाः पद्मयोनिं प्रजापतिम् ।
पुरस्कृत्य गतास्तत्र यत्रेशगरुडध्वजौ ॥ 3 ॥
यथावृत्तं तयोस्तद्वन्महिषासुरचेष्टितम् ।
त्रिदशाः कथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम् ॥ 4 ॥
सूर्येन्द्राग्न्यनिलेन्दूनां यमस्य वरुणस्य च ।
अन्येषां चाधिकारान् स स्वयमेवाधितिष्ठति ॥ 5 ॥
स्वर्गान्निराकृताः सर्वे तेन देवगणा भुवि ।
विचरन्ति यथा मर्त्या महिषेण दुरात्मना ॥ 6 ॥

देव-शत्रु की यह सारी चेष्टा कह कर देवों ने हाथ जोड़ दिए, हम आपकी शरण में हैं, अब इस महिषासुर के वध का कोई उपाय सोचिए। उनके वचन सुनते ही मधुसूदन विष्णु और शम्भु शिव, दोनों के मुख कोप से कुटिल हो उठे, भौंहें तन गईं। फिर अति-कोप से भरे चक्रधारी विष्णु के मुख से, और साथ ही ब्रह्मा तथा शंकर के मुख से, एक महान तेज निकल पड़ा। यहाँ कोप ही सृजन का हेतु बन गया।

7 · 8 · 9

एतद्वः कथितं सर्वममरारिविचेष्टितम् ।
शरणं वः प्रपन्नाः स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम् ॥ 7 ॥
ऋषिरुवाच ।
इत्थं निशम्य देवानां वचांसि मधुसूदनः ।
चकार कोपं शम्भुश्च भ्रुकुटीकुटिलाननौ ॥ 8 ॥
ततो ऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्ततः ।
निश्चक्राम महत्तेजो ब्रह्मणः शङ्करस्य च ॥ 9 ॥

इंद्र आदि शेष देवों के शरीरों से भी सुमहान तेज निकला, और सारा तेज मिल कर एक हो गया। वह अतीव तेज का पुंज देवों ने जलते हुए पर्वत-सा देखा, जिसकी ज्वालाओं से सब दिशाएँ भर उठीं। सब देवों के शरीर से उपजा वह अतुल तेज एक जगह सिमट कर एक स्त्री-विग्रह में ढल गया, और उसकी द्युति से तीनों लोक व्याप्त हो उठे।

10 · 11 · 12

अन्येषाञ्चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः ।
निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत ॥ 10 ॥
अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम् ।
ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम् ॥ 11 ॥
अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम् ।
एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ॥ 12 ॥

अब हर देव का तेज देवी के एक-एक अंग में ढलने लगा। शम्भु के तेज से उनका मुख बना, यम और विष्णु के तेज से घने केश। चन्द्र के तेज से स्तन-युग्म, इंद्र से मध्य भाग, वरुण से जंघा और ऊरु, और पृथ्वी के तेज से नितम्ब रचे गए। ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य के तेज से चरण की उँगलियाँ, वसुओं के तेज से हाथ की उँगलियाँ, और कुबेर के तेज से नासिका बनी।

13 · 14 · 15

यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजायत तन्मुखम् ।
याम्येन चाभवन् केशा बहवो विष्णुतेजसा ॥ 13 ॥
सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत् ।
वारुणेन च जङ्घोरू नितम्बस्तेजसा भुवः ॥ 14 ॥
ब्रह्मणस्तेजसा पादौ तदङ्गुल्योऽर्कतेजसा ।
वसूनाञ्च कराङ्गुल्यः कौबेरेण च नासिका ॥ 15 ॥

प्रजापति के तेज से देवी के दाँत बने, और अग्नि के तेज से तीन दहकते नेत्र। संध्या के तेज से दोनों भौंहें, वायु के तेज से दोनों कान, और शेष देवों के तेज से बाक़ी सब अंग, यह सम्पूर्ण कल्याण-रूप कल्याणी प्रकट हुआ। समस्त देवों के तेज-राशि से बनी उस देवी को देख कर महिष से पीड़ित देव-गण हर्ष से भर उठे।

16 · 17 · 18

तस्यास्तु दन्ताः सम्भूताः प्राजापत्येन तेजसा ।
नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा ॥ 16 ॥
भ्रुवौ च सन्ध्ययोस्तेजः श्रवणावनिलस्य च ।
अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा ॥ 17 ॥
ततः समस्तदेवानां तेजोराशिसमुद्भवाम् ।
तां विलोक्य मुदं प्रापुरमरा महिषार्दिताः ॥ 18 ॥

फिर सब देवों ने जय की कामना से उन विजयिनी को अपने-अपने आयुध अर्पित किए और ऊँचे स्वर में जय-जयकार किया। पिनाक-धारी शिव ने अपने ही शूल से एक शूल निकाल कर दिया, और कृष्ण ने अपने चक्र से एक नया चक्र उत्पन्न कर के अर्पित किया। वरुण ने शंख दिया, अग्नि ने शक्ति, और वायु ने धनुष तथा बाणों से भरे दो तरकश।

19 · 20 · 21

ततो देवा ददुस्तस्यै स्वानि स्वान्यायुधानि च ।
ऊचुर्जयजयेत्युच्चैर्जयन्तीं ते जयैषिणः ॥ 19 ॥
शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य ददौ तस्यै पिनाकधृक् ।
चक्रं च दत्तवान् कृष्णः समुत्पाद्य स्वचक्रतः ॥ 20 ॥
शङ्खञ्च वरुणः शक्तिं ददौ तस्यै हुताशनः ।
मारुतो दत्तवांश्चापं बाणपूर्णे तथेषुधी ॥ 21 ॥

सहस्र नेत्रों वाले अमर-अधिप इंद्र ने अपने कुलिश से एक वज्र उत्पन्न कर दिया, और अपने ऐरावत गज से एक घंटा। यम ने अपने काल-दंड से दंड दिया, वरुण ने पाश, प्रजापति ने अक्ष-माला और ब्रह्मा ने कमंडलु। दिवाकर सूर्य ने देवी के समस्त रोम-कूपों में अपनी किरणें भर दीं, और काल ने खड्ग तथा एक निर्मल चर्म अर्पित किया।

22 · 23 · 24

वज्रमिन्द्रः समुत्पाद्य कुलिशादमराधिपः ।
ददौ तस्यै सहस्राक्षो घण्टामैरावताद् गजात् ॥ 22 ॥
कालदण्डाद्यमो दण्डं पाशं चाम्बुपतिर्ददौ ।
प्रजापतिश्चाक्षमालां ददौ ब्रह्मा कमण्डलुम् ॥ 23 ॥
समस्तरोमकूपेषु निजरश्मीन् दिवाकरः ।
कालश्च दत्तवान् खड्गं तस्याश्चर्म च निर्मलम् ॥ 24 ॥

क्षीर-सागर ने देवी को कभी न मैला होने वाला हार, कभी न जीर्ण होने वाले वस्त्र, दिव्य चूड़ामणि, कुंडल और कटक दिए। उसने शुभ्र अर्ध-चन्द्र भी दिया, सब भुजाओं के लिए केयूर, निर्मल नूपुर, अनुपम ग्रैवेयक, और सब उँगलियों के लिए रत्न-जटित अंगूठियाँ, देवी सिर से चरण तक आभूषित हो उठीं।

25 · 26

क्षीरोदश्चामलं हारमजरे च तथाम्बरे ।
चूडामणिं तथा दिव्यं कुण्डले कटकानि च ॥ 25 ॥
अर्धचन्द्रं तथा शुभ्रं केयूरान् सर्वबाहुषु ।
नूपुरौ विमलौ तद्वद् ग्रैवेयकमनुत्तमम् ।
अङ्गुलीयकरत्नानि समस्तास्वङ्गुलीषु च ॥ 26 ॥

देव-शिल्पी विश्वकर्मा ने अति-निर्मल परशु, अनेक रूप के अस्त्र और अभेद्य कवच दिया। समुद्र ने देवी के सिर और वक्ष के लिए कभी न मुरझाने वाली कमल-मालाएँ अर्पित कीं, और साथ ही एक अति-शोभन कमल भी। हिमवान ने देवी का वाहन सिंह और विविध रत्न दिए, यहीं पहली बार सिंह-वाहन का दान होता है, और कुबेर ने सुरा से सदा भरा रहने वाला पान-पात्र दिया।

27 · 28 · 29

विश्वकर्मा ददौ तस्यै परशुञ्चातिनिर्मलम् ।
अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यं च दंशनम् ॥ 27 ॥
अम्लानपङ्कजां मालां शिरस्युरसि चापराम् ।
अददज्जलधिस्तस्यै पङ्कजं चातिशोभनम् ॥ 28 ॥
हिमवान् वाहनं सिंहं रत्नानि विविधानि च ।
ददावशून्यं सुरया पानपात्रं धनाधिपः ॥ 29 ॥

जो इस पृथ्वी को अपने फनों पर धारण करते हैं, उन सर्व-नागेश शेष ने महा-मणि से जड़ा हुआ नाग-हार देवी को दिया। इन सब के अतिरिक्त और भी सुरों ने भूषणों और आयुधों से देवी का सम्मान किया। तब सब प्रकार से सज्जित उन देवी ने उच्च स्वर में, बार-बार अट्टहास भरा भीषण नाद किया।

30 · 31

शेषश्च सर्वनागेशो महामणिविभूषितम् ।
नागहारं ददौ तस्यै धत्ते यः पृथिवीमिमाम् ॥ 30 ॥
अन्यैरपि सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा ।
संमानिता ननादोच्चैः साट्टहासं मुहुर्मुहुः ॥ 31 ॥

उस घोर नाद से सारा आकाश भर गया, और एक असीम महान प्रतिध्वनि गूँज उठी। उससे सब लोक काँप गए, समुद्र हिल उठे, पृथ्वी डोल गई और सब पर्वत थरथरा उठे। हर्ष से भरे देवों ने उस सिंह-वाहिनी का जय-घोष किया, और भक्ति से नम्र मुनि-गण उनकी स्तुति करने लगे। तीनों लोक को इस तरह क्षुब्ध देख कर देव-शत्रु असुर अपनी समस्त सेना सहित आयुध उठा कर युद्ध को खड़े हो गए।

32 · 33 · 34 · 35

तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नभः ।
अमायतातिमहता प्रतिशब्दो महानभूत् ॥ 32 ॥
चुक्षुभुः सकला लोकाः समुद्राश्च चकम्पिरे ।
चचाल वसुधा चेलुः सकलाश्च महीधराः ॥ 33 ॥
जयेति देवाश्च मुदा तामूचुः सिंहवाहिनीम् ।
तुष्टुवुर्मुनयश्चैनां भक्तिनम्रात्ममूर्तयः ॥ 34 ॥
दृष्ट्वा समस्तं संक्षुब्धं त्रैलोक्यममरारयः ।
सन्नद्धाखिलसैन्यास्ते समुत्तस्थुरुदायुधाः ॥ 35 ॥

वह नाद सुन कर महिषासुर क्रोध से भर उठा, आः, यह क्या है, ऐसा कहता हुआ वह समस्त असुरों से घिरा उसी शब्द की ओर दौड़ पड़ा। दौड़ते ही उसने देवी को देखा, जिनकी द्युति तीनों लोक व्याप्त किए हुए थी, जिनके चरणों के भार से भूमि झुक रही थी और जिनका मुकुट आकाश को छू रहा था। उनके धनुष की डोरी की टंकार से पाताल तक क्षुब्ध हो उठा, और सहस्र भुजाओं से वे सब दिशाओं को व्याप्त किए खड़ी थीं।

36 · 37 · 38

आः किमेतदिति क्रोधादाभाष्य महिषासुरः ।
अभ्यधावत तं शब्दमशेषैरसुरैर्वृतः ॥ 36 ॥
स ददर्श ततो देवीं व्याप्तलोकत्रयां त्विषा ।
पादाक्रान्त्या नतभुवं किरीटोल्लिखिताम्बराम् ॥ 37 ॥
क्षोभिताशेषपातालां धनुर्ज्यानिःस्वनेन ताम् ।
दिशो भुजसहस्रेण समन्ताद् व्याप्य संस्थिताम् ॥ 38 ॥

फिर उस देवी और सुर-द्वेषी असुरों के बीच महायुद्ध छिड़ गया, और चारों ओर से छूटते शस्त्र-अस्त्रों से दिशाएँ चमक उठीं। महिषासुर का सेनापति चिक्षुर नाम का महासुर और चामर अन्य असुरों के साथ चतुरंग-बल ले कर देवी से भिड़ गए। उदग्र नाम का महासुर साठ हज़ार रथ ले कर लड़ा, और महा-हनु एक करोड़ सेना के साथ।

39 · 40 · 41

ततः प्रववृते युद्धं तया देव्या सुरद्विषाम् ।
शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम् ॥ 39 ॥
महिषासुरसेनानीश्चिक्षुराख्यो महासुरः ।
युयुधे चामरश्चान्यैश्चतुरङ्गबलान्वितः ॥ 40 ॥
रथानामयुतैः षड्भिरुदग्राख्यो महासुरः ।
अयुध्यतायुतानाञ्च सहस्रेण महाहनुः ॥ 41 ॥

असिलोमा नाम का महासुर पचास नियुत सेना ले कर, और वाष्कल छह सौ अयुत ले कर रण में लड़ा। उग्र-दर्शन अनेक सहस्र गज और अश्वों के समूह तथा एक करोड़ रथ से घिरा हुआ उस युद्ध में जूझा। बिडालाक्ष पचास अयुत रथों से घिरा हुआ संग्राम में भिड़ गया, और काल नामक असुर भी पचास अयुत रथ तथा उतने ही योद्धाओं से घिरा हुआ लड़ता रहा।

42 · 43 · 44 · 45

पञ्चाशद्भिश्च नियुतैरसिलोमा महासुरः ।
अयुतानां शतैः षड्भिर्वाष्कलो युयुधे रणे ॥ 42 ॥
गजवाजिसहस्रौघैरनेकैरुग्रदर्शनः ।
वृतो रथानां कोट्या च युद्धे तस्मिन्नयुध्यत ॥ 43 ॥
बिडालाक्षो ऽयुतानाञ्च पञ्चाशद्भिरथायुतैः ।
युयुधे संयुगे तत्र रथानां परिवारितः ॥ 44 ॥
वृतः कालो रथानाञ्च रणे पञ्चाशतायुतैः ।
युयुधे संयुगे तत्र तावद्भिः परिवारितः ॥ 45 ॥

और भी अनेक महा-असुर अयुतों रथ, हाथी और घोड़ों से घिरे हुए देवी से जूझने लगे। स्वयं महिषासुर करोड़ों-करोड़ों सहस्र रथ, हाथी और घोड़ों से घिरा हुआ उस युद्ध में डटा हुआ था। असुर तोमर, भिन्दिपाल, शक्ति, मूसल, खड्ग, परशु और पट्टिश, इन सब आयुधों से देवी पर टूट पड़े। किसी ने शक्तियाँ फेंकीं, किसी ने पाश, और किसी ने खड्ग-प्रहार से देवी का वध करने का प्रयास किया।

46 · 47 · 48 · 49

अन्ये च तत्रायुतशो रथनागहयैर्वृताः ।
युयुधुः संयुगे देव्या सह तत्र महासुराः ॥ 46 ॥
कोटिकोटिसहस्रैस्तु रथानां दन्तिनां तथा ।
हयानाञ्च वृतो युद्धे तत्राभून्महिषासुरः ॥ 47 ॥
तोमरैर्भिन्दिपालैश्च शक्तिभिर्मुसलैस्तथा ।
युयुधुः संयुगे देव्या खड्गैः परशुपट्टिशैः ॥ 48 ॥
केचिच्च चिक्षिपुः शक्तीः केचित् पाशांस्तथापरे ।
देवीं खड्गप्रहारैस्तु ते तां हन्तुं प्रचक्रमुः ॥ 49 ॥

पर वह चण्डिका देवी असुरों के सब शस्त्र-अस्त्रों को खेल-ही-खेल में काट देती रहीं, और साथ ही अपने शस्त्र-अस्त्रों की वर्षा करती गईं। उनका मुख तनिक भी थका नहीं; सुर और ऋषियों से स्तुत वे ईश्वरी असुर-देहों पर अपने शस्त्र-अस्त्र बरसाती रहीं। उधर देवी का वाहन सिंह क्रुद्ध हो कर, अपनी अयाल झटकता हुआ, असुर-सेनाओं में वन की आग की भाँति विचरने लगा।

50 · 51 · 52

सापि देवी ततस्तानि शस्त्राण्यस्त्राणि चण्डिका ।
लीलयैव प्रचिच्छेद निजशस्त्रास्त्रवर्षिणी ॥ 50 ॥
अनायस्तानना देवी स्तूयमाना सुरर्षिभिः ।
मुमोचासुरदेहेषु शस्त्राण्यस्त्राणि चेश्वरी ॥ 51 ॥
सो ऽपि क्रुद्धो धुतसटो देव्या वाहनकेशरी ।
चचारासुरसैन्येषु वनेष्विव हुताशनः ॥ 52 ॥

युद्ध करती हुई अम्बिका ने रण में जो निःश्वास छोड़े, वे तुरंत सैकड़ों-हज़ारों गण बन कर प्रकट हो गए। देवी-शक्ति से पुष्ट वे गण परशु, भिन्दिपाल, असि और पट्टिश से असुर-गणों का संहार करने लगे। कुछ गण पटह बजाने लगे, कुछ शंख और कुछ मृदंग, और यह घोर संग्राम मानो एक युद्ध-महोत्सव बन उठा।

53 · 54 · 55

निःश्वासान्मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणे ऽम्बिका ।
त एव सद्यः सम्भूता गणाः शतसहस्रशः ॥ 53 ॥
युयुधुस्ते परशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशैः ।
नाशयन्तो ऽसुरगणान् देवीशक्त्युपबृंहिताः ॥ 54 ॥
अवादयन्त पटहान् गणाः शङ्खांस्तथापरे ।
मृदङ्गांश्च तथैवान्ये तस्मिन् युद्धमहोत्सवे ॥ 55 ॥

फिर देवी ने त्रिशूल, गदा, शक्ति-वृष्टि और खड्ग आदि से सैकड़ों महा-असुरों का संहार किया। घंटा के स्वर से मोहित कुछ असुरों को उन्होंने गिरा दिया, और कुछ को पाश से बाँध कर भूमि पर घसीटा। कुछ तीक्ष्ण खड्ग-प्रहार से दो टुकड़े हो गए, और कुछ गदा की चोट से पिट कर भूमि पर पड़े रहे।

56 · 57 · 58

ततो देवी त्रिशूलेन गदया शक्तिवृष्टिभिः ।
खड्गादिभिश्च शतशो निजघान महासुरान् ॥ 56 ॥
पातयामास चैवान्यान् घण्टास्वनविमोहितान् ।
असुरान् भुवि पाशेन बद्ध्वा चान्यानकर्षयत् ॥ 57 ॥
केचिद् द्विधा कृतास्तीक्ष्णैः खड्गपातैस्तथापरे ।
विपोथिता निपातेन गदया भुवि शेरते ॥ 58 ॥

कुछ असुर मूसल की मार से रुधिर वमन करते हुए गिरे, और कुछ वक्ष में शूल बिंध जाने से भूमि पर ढह गए। बाण-समूहों से बेधे गए कुछ देव-शत्रु काँटों से भरे शरीर ले कर रण-भूमि में प्राण छोड़ बैठे। किसी की बाहें कट गईं, किसी की ग्रीवा, किसी के सिर गिर पड़े, और कोई बीच से ही चिर गया।

59 · 60 · 61

वेमुश्च केचिद्रुधिरं मुसलेन भृशं हताः ।
केचिन्निपातिता भूमौ भिन्नाः शूलेन वक्षसि ॥ 59 ॥
निरन्तराः शरौघेण कृताः केचिद्रणाजिरे ।
शल्यानुकारिणः प्राणान् मुमुचुस्त्रिदशार्दनाः ॥ 60 ॥
केषाञ्चिद्बाहवश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे ।
शिरांसि पेतुरन्येषामन्ये मध्ये विदारिताः ॥ 61 ॥

कुछ महा-असुरों की जंघाएँ कट कर वे पृथ्वी पर गिर पड़े, और किसी की एक भुजा, एक आँख तथा एक चरण काट कर देवी ने उसे दो टुकड़े कर दिया। सिर कट जाने पर भी कुछ असुर गिर कर फिर उठ खड़े हुए, और कबंध बन कर परम-आयुध हाथ में ले कर देवी से जूझने लगे। कुछ सिर-कटे कबंध हाथों में खड्ग, शक्ति और ऋष्टि लिए रण-वाद्यों की लय पर नाचने लगे।

62 · 63 · 64

विच्छिन्नजङ्घास्त्वपरे पेतुरुर्व्यां महासुराः ।
एकबाह्वक्षिचरणाः केचिद्देव्या द्विधा कृताः ॥ 62 ॥
छिन्ने ऽपि चान्ये शिरसि पतिताः पुनरुत्थिताः ।
कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधाः ॥ 63 ॥
ननृतुश्चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिताः ।
कबन्धाश्छिन्नशिरसः खड्गशक्त्यृष्टिपाणयः ॥ 64 ॥

रुधिर-धारा से लथपथ कुछ महा-असुर अब भी देवी को ठहर जाओ, ठहर जाओ कह कर ललकारते रहे, और यह संग्राम रोंगटे खड़े कर देने वाला हो उठा। गिरे हुए रथ, हाथी, घोड़े और असुरों से वह रण-भूमि चलने योग्य ही न रही, जहाँ वह महा-रण मचा हुआ था। हाथी, घोड़ों और असुरों के बीच रक्त की धाराएँ महा-नदियों की तरह बह निकलीं।

65 · 66 · 67

तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो देवीमन्ये महासुराः ।
रुधिरौघविलुप्ताङ्गाः संग्रामे लोमहर्षणे ॥ 65 ॥
पातितै रथनागाश्वैरसुरैश्च वसुन्धरा ।
अगम्या साभवत् तत्र यत्राभूत् स महारणः ॥ 66 ॥
शोणितौघा महानद्यः सद्यस्तत्र विसुस्रुवुः ।
मध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम् ॥ 67 ॥

अम्बिका ने उस असुर-महासेना को क्षण भर में नष्ट कर दिया, जैसे अग्नि तृण और काठ के विशाल ढेर को भस्म कर देती है। और वह सिंह महा-नाद करता, अपनी अयाल झटकता हुआ, असुर-शरीरों से मानो उनके प्राण ही चुनता फिरने लगा। देवी और उनके गणों ने वहाँ असुरों से जैसा युद्ध किया, उससे प्रसन्न हो कर देवों ने स्वर्ग से पुष्प-वृष्टि की। पर मुख्य लक्ष्य, महिषासुर, अभी जीवित था, और अगली कथा वहीं से उठती है।

68 · 69 · 70

क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका ।
निन्ये क्षयं यथा वह्निस्तृणदारुमहाचयम् ॥ 68 ॥
स च सिंहो महानादमुत्सृजन् धुतकेसरः ।
शरीरेभ्यो ऽमरारीणामसूनिव विचिन्वति ॥ 69 ॥
देव्या गणैश्च तैस्तत्र कृतं युद्धं तथासुरैः ।
यथैषां तुतुषुर्देवाः पुष्पवृष्टिमुचो दिवि ॥ 70 ॥

आगे

इस अध्याय में देवी की समस्त सेना ने महिषासुर का बल तोड़ दिया है, पर महिषासुर स्वयं अभी रण में डटा है। अगला अध्याय वहीं से उठता है। तृतीय अध्याय में देवी सेनापति चिक्षुर और चामर का संहार करती हैं, उदग्र, बाष्कल और अन्य प्रमुख असुर मारे जाते हैं, और अंत में महिष स्वयं अनेक रूप बदल कर देवी से जूझता हुआ रण-भूमि में आता है।

देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती), मध्यम चरित्र। मार्कण्डेय-पुराण के अंतर्गत अध्याय बयासी, श्रीदुर्गासप्तशती के तेरह अध्यायों में दूसरा, इसमें सत्तर श्लोक हैं। मूल पाठ मानक संस्करण के अनुसार।