देवी माहात्म्य
द्वादश अध्याय · फल-श्रुति · उत्तर चरित्र
अब तक देवों ने स्तुति की थी। यहाँ देवी स्वयं वचन देती हैं। जो श्रद्धा से इस माहात्म्य को पढ़े और सुने, उसकी हर बाधा वे अपने ज़िम्मे हर लेती हैं। शत्रु और दस्यु, राजकोप और बंधन, अग्नि और जल का प्रवाह, हिंसक पशु और समुद्री आँधी, इन सब से रक्षा का यही उनका अभय-वचन है। शरत्-काल की वार्षिक महा-पूजा की महिमा भी वे यहीं कह जाती हैं, और फिर देवों के देखते-देखते अंतर्धान हो जाती हैं।
देवी ने स्वयं अपने मुख से सारी फल-श्रुति कही। उनका पहला वचन यही था, कि जो एकाग्र चित्त हो कर इन स्तवों से नित्य उनका स्मरण करता है, उसकी सकल बाधा का नाश वे निःसंशय अपने हाथ ले लेती हैं।
1
देव्युवाच ।
एभिः स्तवैश्च मां नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः ।
तस्याहं सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम् ॥ 1 ॥

फिर उन्होंने अपने तीनों चरित्र एक साथ गिनाए, मधु-कैटभ का प्रथम चरित, महिषासुर का संहार, और शुम्भ-निशुम्भ का वध। जो इन तीनों की कीर्ति गाते हैं, और जो अष्टमी, चतुर्दशी तथा नवमी पर एकचित्त हो कर भक्ति से उनका यह उत्तम माहात्म्य गाते हैं, उनके लिए ही आगे का सारा फल है। ऐसे उपासक से न कोई पाप-कर्म लगता है, न पाप से उपजी कोई विपत्ति। न उन्हें दरिद्रता आती है, न अपने प्रिय से वियोग।
2 · 3 · 4
मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम् ।
कीर्तयिष्यन्ति ये तद्वद् वधं शुम्भनिशुम्भयोः ॥ 2 ॥
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां चैकचेतसः ।
स्तोष्यन्ति चैव ये भक्त्या मम माहात्म्यमुत्तमम् ॥ 3 ॥
न तेषां दुष्कृतं किञ्चिद् दुष्कृतोत्था न चापदः ।
भविष्यति न दारिद्र्यं न चैवेष्टवियोजनम् ॥ 4 ॥

ऐसे जन को शत्रु से भय नहीं रहता, न दस्यु से, न राजदंड से; न शस्त्र, अग्नि और जल की बाढ़ से कभी कोई भय उस तक पहुँचता है। इसी कारण, देवी कहती हैं, समाहित जनों को यह उनका माहात्म्य सदा पढ़ना चाहिए और भक्ति से सुनना चाहिए, क्योंकि यही कल्याण का परम महान मार्ग है। महामारी से उठे सब उपद्रव और आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक, इन तीनों प्रकार के उत्पात, इसी माहात्म्य के पाठ से शांत हो जाते हैं।
5 · 6 · 7
शत्रुतो न भयं तस्य दस्युतो वा न राजतः ।
न शस्त्रानलतोयौघात् कदाचित् सम्भविष्यति ॥ 5 ॥
तस्मान्ममैतन्माहात्म्यं पठितव्यं समाहितैः ।
श्रोतव्यं च सदा भक्त्या परं स्वस्त्ययनं महत् ॥ 6 ॥
उपसर्गानशेषांस्तु महामारीसमुद्भवान् ।
तथा त्रिविधमुत्पातं माहात्म्यं शमयेन्मम ॥ 7 ॥

यहाँ देवी का सबसे कोमल वचन आता है। जिस स्थान में, उनके आयतन में, यह माहात्म्य भलीभाँति नित्य पढ़ा जाता है, वहाँ से वे अपना सान्निध्य कभी नहीं हटातीं। बलि-प्रदान में, पूजा में, अग्नि-कार्य में और महोत्सव में, उनका यह सारा चरित्र उच्चारण और श्रवण के योग्य है। और विधि का पूरा ज्ञान हो या न हो, जान कर या अनजाने जो बलि-पूजा और वह्नि-होम किया जाए, उसे वे प्रीति से ग्रहण करती हैं। श्रद्धा को वे विधि-कौशल से ऊपर रखती हैं।
8 · 9 · 10
यत्रैतत् पठ्यते सम्यङ्नित्यमायतने मम ।
सदा न तद्विमोक्ष्यामि सान्निध्यं तत्र मे स्थितम् ॥ 8 ॥
बलिप्रदाने पूजायामग्निकार्ये महोत्सवे ।
सर्वं ममैतच्चरितमुच्चार्यं श्राव्यमेव च ॥ 9 ॥
जानताजानता वापि बलिपूजां तथा कृताम् ।
प्रतीच्छिष्याम्यहं प्रीत्या वह्निहोमं तथा कृतम् ॥ 10 ॥
शरत्-काल में जो वार्षिक महा-पूजा होती है, जो आगे चल कर शारदीय नवरात्र के रूप में स्थिर हुई, उसी में देवी अपने इस माहात्म्य के श्रवण को विशेष रूप से जोड़ती हैं। उस पूजा में भक्ति-समन्वित हो कर जो इसे सुनता है, वह मनुष्य उनके प्रसाद से सब बाधाओं से मुक्त हो कर धन-धान्य से सम्पन्न होता है, इसमें कोई संशय नहीं। और उनका माहात्म्य, उनकी पृथक्-पृथक शुभ उत्पत्तियाँ, तथा युद्धों में उनका पराक्रम जो सुन लेता है, वह पुरुष भय से रहित हो जाता है।

11 · 12 · 13
शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी ।
तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः ॥ 11 ॥
सर्वबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसमन्वितः ।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॥ 12 ॥
श्रुत्वा ममैतन्माहात्म्यं तथोत्पत्तीः पृथक् शुभाः ।
पराक्रमं च युद्धेषु जायते निर्भयः पुमान् ॥ 13 ॥
यह फल केवल सुनने वाले तक सीमित नहीं रहता। उसके शत्रु क्षीण हो जाते हैं, कल्याण उसकी ओर आता है, और उसका पूरा कुल भी आनंद पाता है। हर शांति-कर्म में, बुरा स्वप्न देखने पर, और उग्र ग्रह-पीड़ा में देवी इसी माहात्म्य के श्रवण को उपाय बताती हैं। इसका फल भी वे साथ ही कह देती हैं, उपद्रव और दारुण ग्रह-पीड़ाएँ शांत हो जाती हैं, और जो दुःस्वप्न देखे गए थे, वे शुभ स्वप्न में बदल जाते हैं।

14 · 15 · 16
रिपवः संक्षयं यान्ति कल्याणं चोपपद्यते ।
नन्दते च कुलं पुंसां माहात्म्यं मम शृण्वताम् ॥ 14 ॥
शान्तिकर्मणि सर्वत्र तथा दुःस्वप्नदर्शने ।
ग्रहपीडासु चोग्रासु माहात्म्यं शृणुयान्मम ॥ 15 ॥
उपसर्गाः शमं यान्ति ग्रहपीडाश्च दारुणाः ।
दुःस्वप्नं च नृभिर्दृष्टं सुस्वप्नमुपजायते ॥ 16 ॥
बाल-ग्रहों से पीड़ित बच्चों को यह शांति देता है, और जहाँ जनों में फूट पड़ चुकी हो वहाँ फिर से मैत्री जोड़ने का यह उत्तम उपाय है। सब दुष्ट प्रकृति वालों का बल यह घटा देता है, और राक्षस, भूत तथा पिशाच केवल इसके पाठ-मात्र से नष्ट हो जाते हैं। इन सब फलों का मूल एक ही है, यह पूरा माहात्म्य अंततः देवी की निकट उपस्थिति को बुला लाता है।

17 · 18 · 19
बालग्रहाभिभूतानां बालानां शान्तिकारकम् ।
संघातभेदे च नृणां मैत्रीकरणमुत्तमम् ॥ 17 ॥
दुर्वृत्तानामशेषाणां बलहानिकरं परम् ।
रक्षोभूतपिशाचानां पठनादेव नाशनम् ॥ 18 ॥
सर्वं ममैतन्माहात्म्यं मम सन्निधिकारकम् ॥ 19 ॥
फिर देवी पूजा की पूरी सामग्री गिनाती हैं, बलि, पुष्प, अर्घ्य, धूप, उत्तम गंध और दीप, विप्रों का भोजन, होम और प्रोक्षण, दिन-रात अर्पित किए जाते हुए। पर साल भर के इन विविध भोगों और दानों से जो प्रसन्नता उन्हें मिलती है, वही प्रसन्नता इस सुचरित को एक बार श्रद्धा से सुन लेने से मिल जाती है। श्रवण को वे यहाँ वर्ष-भर की उपासना के बराबर रख देती हैं।

20 · 21
पशुपुष्पार्घ्यधूपैश्च गन्धदीपैस्तथोत्तमैः ।
विप्राणां भोजनैर्होमैः प्रोक्षणीयैरहर्निशम् ॥ 20 ॥
अन्यैश्च विविधैर्भोगैः प्रदानैर्वत्सरेण या ।
प्रीतिर्मे क्रियते सास्मिन् सकृत्सुचरिते श्रुते ॥ 21 ॥
देवी के अनेक जन्मों का यह कीर्तन सुना हुआ तीन काम एक साथ करता है, पाप हरता है, आरोग्य देता है, और भूत-बाधा से रक्षा करता है। रणभूमि में दुष्ट दैत्यों के संहार की जो उनकी कथा है, उसे जो सुन ले उसके मन में शत्रु का उपजाया भय फिर नहीं ठहरता। देवों की, ब्रह्मर्षियों की, और स्वयं ब्रह्मा की, जितनी भी स्तुतियाँ इस माहात्म्य में संगृहीत हैं, वे सब उपासक को शुभ गति की ओर ले जाती हैं।

22 · 23 · 24
श्रुतं हरति पापानि तथारोग्यं प्रयच्छति ।
रक्षां करोति भूतेभ्यो जन्मनां कीर्तनं मम ॥ 22 ॥
युद्धेषु चरितं यन्मे दुष्टदैत्यनिबर्हणम् ।
तस्मिन् श्रुते वैरिकृतं भयं पुंसां न जायते ॥ 23 ॥
युष्माभिः स्तुतयो याश्च याश्च ब्रह्मर्षिभिः कृताः ।
ब्रह्मणा च कृतास्तास्तु प्रयच्छन्ति शुभां गतिम् ॥ 24 ॥
अब देवी एक-एक संकट का चित्र खींचती हैं। कोई निर्जन वन या किसी ऊजड़ प्रांतर में दावानल से घिर गया हो, कोई सूने स्थान में डाकुओं से घेर लिया गया हो, या किसी को शत्रुओं ने बंदी बना लिया हो। किसी के पीछे सिंह और व्याघ्र लगे हों, कोई वन के मतवाले हाथियों से घिरा हो, या किसी क्रुद्ध राजा ने जिसे वध या कारागार की आज्ञा दे दी हो।
25 · 26
अरण्ये प्रान्तरे वापि दावाग्निपरिवारितः ।
दस्युभिर्वा वृतः शून्ये गृहीतो वापि शत्रुभिः ॥ 25 ॥
सिंहव्याघ्रानुयातो वा वने वा वनहस्तिभिः ।
राज्ञा क्रुद्धेन चाज्ञप्तो वध्यो बन्धगतो ऽपि वा ॥ 26 ॥

कोई महासमुद्र में प्रचंड आँधी से डगमगाती नाव पर खड़ा हो, या अत्यंत भीषण संग्राम में जिस पर चारों ओर से शस्त्र बरस रहे हों। इन सब घोर बाधाओं के बीच, या किसी भी वेदना से अत्यंत पीड़ित होने पर भी, जो उनके इस चरित का स्मरण करता है, वह नर संकट से छूट जाता है। पाठ की भी आवश्यकता नहीं, केवल स्मरण ही पर्याप्त है। उनके प्रभाव से सिंह जैसे हिंसक पशु, डाकू और शत्रु, चरित-स्मरण करने वाले के पास तक नहीं आते, बल्कि दूर से ही भाग खड़े होते हैं।
27 · 28 · 29
आघूर्णितो वा वातेन स्थितः पोते महार्णवे ।
पतत्सु चापि शस्त्रेषु संग्रामे भृशदारुणे ॥ 27 ॥
सर्वाबाधासु घोरासु वेदनाभ्यर्दितो ऽपि वा ।
स्मरन्ममैतच्चरितं नरो मुच्येत संकटात् ॥ 28 ॥
मम प्रभावात्सिंहाद्या दस्यवो वैरिणस्तथा ।
दूरादेव पलायन्ते स्मरतश्चरितं मम ॥ 29 ॥

इतना कह कर कथा का सूत्र फिर मेधा ऋषि के हाथ आ जाता है। फल-श्रुति कह चुकने के बाद प्रचंड पराक्रम वाली भगवती चण्डिका देवों के देखते-देखते वहीं अंतर्हित हो गईं। देवी ने जिनके शत्रु हर लिए थे, वे देवता निर्भय हो कर पहले की भाँति अपने-अपने अधिकार सँभालने लगे और यज्ञ का अपना भाग पाने लगे।
30 · 31
ऋषिरुवाच ।
इत्युक्त्वा सा भगवती चण्डिका चण्डविक्रमा ।
पश्यतामेव देवानां तत्रैवान्तरधीयत ॥ 30 ॥
ते ऽपि देव्या निरातङ्काः स्वाधिकारान् यथा पुरा ।
यज्ञभागभुजः सर्वे चक्रुर्विनिहतारयः ॥ 31 ॥
जगत को उजाड़ने वाला अति-उग्र देव-शत्रु शुम्भ, और महा-पराक्रमी निशुम्भ, दोनों देवी के हाथों रण में मारे जा चुके थे; जो दैत्य बच रहे, वे पाताल की शरण ले गए। राजा सुरथ को सम्बोधित कर ऋषि सार कहते हैं, इसी प्रकार भगवती देवी स्वयं नित्या और अजन्मा होते हुए भी, जगत की रक्षा के लिए बार-बार प्रकट होती रहती हैं।

32 · 33
दैत्याश्च देव्या निहते शुम्भे देवरिपौ युधि ।
जगद्विध्वंसके तस्मिन् महोग्रे ऽतुलविक्रमे ।
निशुम्भे च महावीर्ये शेषाः पातालमाययुः ॥ 32 ॥
एवं भगवती देवी सा नित्यापि पुनः पुनः ।
सम्भूय कुरुते भूप जगतः परिपालनम् ॥ 33 ॥
वही महामाया इस विश्व को मोह में डालती है, और वही उसे जन्म देती है। उससे जो ज्ञान माँगता है उसे वह ज्ञान देती है, और प्रसन्न होने पर वैभव भी स्वयं दे देती है। हे मनुजेश्वर, प्रलय के महा-काल में यह सारा ब्रह्माण्ड महाकाली के रूप में उन्हीं से व्याप्त है। समय आने पर वही संहार-रूपी महामारी बनती है, वही अजन्मा सृष्टि बन कर प्रकट होती है, और वही सब प्राणियों को धारण किए रहती है। ये तीनों क्रियाएँ एक ही सनातनी शक्ति की हैं।

34 · 35 · 36
तयैतन्मोह्यते विश्वं सैव विश्वं प्रसूयते ।
सा याचिता च विज्ञानं तुष्टा ऋद्धिं प्रयच्छति ॥ 34 ॥
व्याप्तं तयैतत्सकलं ब्रह्माण्डं मनुजेश्वर ।
महाकाल्या महाकाले महाकालीस्वरूपया ॥ 35 ॥
सैव काले महामारी सैव सृष्टिर्भवत्यजा ।
स्थितिं करोति भूतानां सैव काले सनातनी ॥ 36 ॥
उन्नति के समय वही जनों के घर में महालक्ष्मी बन कर समृद्धि बढ़ाती हैं, और पतन के समय वही अलक्ष्मी बन कर विनाश की ओर ले जाती हैं; दोनों दशाएँ एक ही शक्ति का खेल हैं। अध्याय का समापन वर-दान पर होता है। स्तुति और पुष्प, धूप तथा गंध से पूजित हो कर वही देवी अपने उपासकों को धन देती हैं, संतान देती हैं, धर्म में बुद्धि देती हैं, और अंत में शुभ गति, सब प्रदान करती हैं।
37 · 38
भवकाले नृणां सैव लक्ष्मीर्वृद्धिप्रदा गृहे ।
सैवाभावे तथालक्ष्मीर्विनाशायोपजायते ॥ 37 ॥
स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्धूपगन्धादिभिस्तथा ।
ददाति वित्तं पुत्रांश्च मतिं धर्मे गतिं शुभाम् ॥ 38 ॥
आगे
अध्याय 13 अंतिम है। राजा सुरथ और समाधि वैश्य ने वन में जा कर देवी की कठोर तपस्या की। देवी प्रत्यक्ष प्रकट हो कर वर देती हैं, सुरथ आगामी मन्वंतर में सावर्णि मनु बनेंगे, और समाधि को वह आत्म-ज्ञान मिलता है जिसकी उसने याचना की थी।