अध्याय 1 · मधु-कैटभ वध

देवी माहात्म्य

प्रथम अध्याय · मधु-कैटभ वध · प्रथम चरित्र

आरंभ एक हारे हुए राजा सुरथ से होता है। राज्य छिन गया, कोष छिन गया, अपने ही मंत्रियों ने मुख फेर लिया। फिर भी मन उसी नगर पर अटका रहता है, कि वहाँ सब कुशल तो है। गहन वन में मेधा ऋषि के आश्रम पर उसे समाधि नाम का एक वैश्य मिलता है, अपने ही पुत्र-स्त्री से निकाला हुआ, वही पीड़ा लिए। दोनों एक ही प्रश्न ले कर ऋषि के सामने बैठते हैं, कि यह मोह छूटता क्यों नहीं। उत्तर में ऋषि महामाया की बात कहते हैं, और फिर सुनाते हैं मधु और कैटभ की कथा, तथा उस आदि-शक्ति का आविर्भाव।

78 श्लोक · प्रथम चरित्र · देवी माहात्म्य मुख्य पृष्ठ

मार्कण्डेय ने अपने श्रोता से कहा, सूर्य के पुत्र सावर्णि की कथा सुनिए, जो आठवें मनु कहलाते हैं। उनकी उत्पत्ति का सारा प्रसंग हम आपसे विस्तार से कहते हैं। वह महाभाग सावर्णि किसी अपने पुरुषार्थ से नहीं, उसी महामाया के प्रभाव से मन्वंतर के अधिपति हुए। यही महामाया इस समूची कथा का केंद्र है, और इसी एक शब्द से इस ग्रंथ का स्वर बँध जाता है।

1 · 2

मार्कण्डेय उवाच ।
सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यते ऽष्टमः ।
निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद् गदतो मम ॥ 1 ॥
महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः ।
स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः ॥ 2 ॥

बहुत पहले, स्वारोचिष मन्वंतर में, चैत्र-वंश में जन्मे सुरथ नाम के एक राजा हुए, जो समस्त भू-मंडल पर शासन करते थे। वे अपनी प्रजा को औरस-पुत्रों के समान पालते थे, फिर भी कोलाविध्वंसी नाम के शत्रु राजा उठ खड़े हुए। सज्जनता अपने आप किसी को आक्रमण से नहीं बचा लेती। अति-प्रबल सेना वाले उस राजा का उन शत्रुओं से युद्ध हुआ, और संख्या में कम होने पर भी वे उन्हीं कोलाविध्वंसियों से हार गए।

3 · 4 · 5

स्वारोचिषे ऽन्तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः ।
सुरथो नाम राजाभूत् समस्ते क्षितिमण्डले ॥ 3 ॥
तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान् ।
बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तथा ॥ 4 ॥
तस्य तैरभवद् युद्धमतिप्रबलदण्डिनः ।
न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः ॥ 5 ॥

फिर वे अपने नगर लौट आए, और समस्त पृथ्वी का स्वामी अब केवल अपने ही देश का अधिप रह गया, और वह भी उन प्रबल शत्रुओं से घिरा हुआ। ऐश्वर्य का संकुचन एक ही आघात में हो जाता है। शत्रु तो बाहर थे ही, अब भीतर के अमात्य भी पलट गए। दुर्बल पड़े राजा के उन बलवान, दुष्ट और दुरात्मा मंत्रियों ने उसके अपने ही नगर में कोष और सेना, दोनों हर लिए।

6 · 7

ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपो ऽभवत् ।
आक्रान्तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः ॥ 6 ॥
अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः ।
कोषो बलञ्चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः ॥ 7 ॥

स्वामित्व खो चुके वे राजा अब शिकार का बहाना बना कर अकेले घोड़े पर सवार हो कर गहन वन में निकल पड़े। साथ कोई नहीं, केवल एकाकी। यह उस विरक्ति का पहला बीज था, जिसे राजा अभी पहचान नहीं पाते। वहाँ उन्होंने श्रेष्ठ ब्राह्मण मेधा का आश्रम देखा, जहाँ हिंसक पशु भी वैर भूल कर शांत बैठे थे, और जो मुनि-शिष्यों से सुशोभित था। उस मुनि से सत्कार पा कर राजा कुछ समय वहीं रह गए, उस श्रेष्ठ आश्रम में इधर-उधर विचरते हुए।

8 · 9 · 10

ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भुपतिः ।
एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम् ॥ 8 ॥
स तत्राश्रममद्राक्षीद् द्विजवर्यस्य मेधसः ।
प्रशान्तश्वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम् ॥ 9 ॥
तस्थौ कञ्चित् स कालञ्च मुनिना तेन सत्कृतः ।
इतश्चेतश्च विचरंस्तस्मिन् मुनिवराश्रमे ॥ 10 ॥

पर बाहर का स्वागत मिलने पर भी भीतर का मन शांत न हुआ। ममत्व से खिंची हुई चेतना से राजा सोचते रहते, कि मेरे पूर्वजों का पालित वह नगर, जो अब मुझ से रहित है, क्या मेरे उन दुष्ट सेवकों के हाथ धर्म से पाला जा रहा है, या नहीं। यहीं इस कथा का मूल बीज है। जिन्होंने त्याग दिया, उन्हीं की चिंता मन से हटती नहीं।

11

सो ऽचिन्तयत् तदा तत्र ममत्वाकृष्टचेतनः ।
मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत् ।
मद्भृत्यैस्तैरसद्वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा ॥ 11 ॥

वे मन ही मन कहते, हम नहीं जानते, हमारा वह प्रधान शूर-हाथी, जो सदा मद से उन्मत्त रहता था, अब शत्रुओं के वश में जा कर कौन-से भोग पा रहा होगा। जो हमारे प्रसाद, धन और भोजन से नित्य हमारे अनुगत थे, वे अब निश्चय ही दूसरे राजाओं की सेवा में लग गए होंगे। और जो कोष हमने अति-दुख से संचित किया था, वह अब बेढब ख़र्च करने वालों के हाथ सतत व्यय से क्षय को जा रहा होगा।

12 · 13 · 14

न जाने स प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः ।
मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते ॥ 12 ॥
ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः ।
अनुवृत्तिं ध्रुवं ते ऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम् ॥ 13 ॥
असम्यग्व्ययशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततं व्ययम् ।
संचितः सो ऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति ॥ 14 ॥

यह और ऐसी ही और बातें राजा निरंतर सोचते रहते। तभी कथा नया मोड़ लेती है। उसी ब्राह्मण के आश्रम के पास राजा को एक वैश्य दिखाई पड़ता है। एक दुखी हृदय दूसरे दुखी हृदय को सहज पहचान लेता है। राजा ने उससे पूछा, आप कौन हैं, यहाँ आने का क्या कारण है, और आप शोक से इतने व्याकुल क्यों दिखते हैं। राजा के इस स्नेह-भरे वचन को सुन कर वह वैश्य नम्रता से झुक कर उत्तर देने लगा।

15 · 16 · 17

एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः ।
तत्र विप्राश्रमाभ्यासे वैश्यमेकं ददर्श सः ॥ 15 ॥
स पृष्टस्तेन कस्त्वं भोः हेतुश्चागमने ऽत्र कः ।
सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे ॥ 16 ॥
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम् ।
प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम् ॥ 17 ॥

वैश्य बोला, हम समाधि नाम के वैश्य हैं, धनिकों के कुल में जन्मे। पर हमारे ही पुत्रों और पत्नी ने धन के लोभ में, असाधु बन कर, हमें घर से निकाल दिया। धन, पत्नी, पुत्र, सबसे वंचित कर के, हमारा सारा धन ले कर, यहाँ तक कि आप्त-बंधुओं ने भी मुँह मोड़ लिया, और हम दुखी हो कर इस वन में आ गए। अब यहाँ बैठे हम यह भी नहीं जानते कि हमारे पुत्र, स्वजन और पत्नी कुशल हैं या अकुशल।

18 · 19 · 20

वैश्य उवाच ।
समाधिर्नाम वैश्यो ऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले ।
पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः ॥ 18 ॥
विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम् ।
वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभैः ॥ 19 ॥
सो ऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम् ।
प्रवृत्तिं स्वजनानाञ्च दाराणाञ्चात्र संस्थितः ॥ 20 ॥

वैश्य का प्रश्न एक के बाद एक उठता रहा, कि उनके घर में अभी क्षेम है या अक्षेम, वे कैसे होंगे, मेरे पुत्र सद्-आचरण वाले हैं या दुराचारी। यह सुन कर राजा ने पूछा, जिन लोभियों ने, उन्हीं पुत्र-पत्नी आदि ने, धन के कारण आपको निकाल दिया, उन पर आपका मन स्नेह से क्यों बँधा है। राजा को अपनी ही व्यथा वैश्य में दिखती है, फिर भी वे पूछते हैं, मानो यह प्रश्न अपने आप से भी हो।

21 · 22

किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम् ।
कथं ते किं नु सद्वृत्ताः दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः ॥ 21 ॥
राजोवाच ।
यैर्निरस्तो भवांल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः ।
तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम् ॥ 22 ॥

वैश्य बोला, ऐसा ही है, जैसा आप कह रहे हैं, यह वचन हमारे ऊपर ठीक बैठता है। पर हम क्या करें, हमारा मन निष्ठुरता को बाँध ही नहीं पाता। जिन्होंने पिता का स्नेह छोड़ कर, धन के लोभ में, स्वजन का प्रेम भी त्याग कर हमें निकाला, हृदय से हमारा मन फिर भी उन्हीं पर टिका रहता है। यही मन का गूढ़तम रहस्य है, बुद्धि मान लेती है कि स्नेह व्यर्थ है, पर मन उस निर्णय को निष्ठुरता में बदल नहीं पाता।

23 · 24

वैश्य उवाच ।
एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वचः ।
किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः ॥ 23 ॥
यैः सन्त्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः ।
पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः ॥ 24 ॥

वैश्य ने आगे कहा, हे महामति, क्या हम यह जानते नहीं, और जानते हुए भी मानो नहीं जानते, कि चित्त गुण-हीन बंधुओं पर भी प्रेम में बहा जाता है। उन्हीं के लिए हमारी आहें उठती हैं, हमारी निराशा जागती है। हम क्या करें, मन उन अप्रिय व्यवहार वाले लोगों पर भी निष्ठुर ही नहीं हो पाता। राजा और वैश्य, दोनों एक ही दशा में खड़े हैं, मन को कठोर करने का यत्न करते हैं और सफल नहीं होते।

25 · 26

किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते ।
यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु ॥ 25 ॥
तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते ।
करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम् ॥ 26 ॥

मार्कण्डेय कहते हैं, हे विप्र, इसके बाद वे दोनों, समाधि नाम का वह वैश्य और वह श्रेष्ठ राजा, साथ-साथ मुनि के पास जा पहुँचे। सबसे गहरी आवश्यकता के क्षण में ही दोनों गुरु के समीप जाते हैं। उन्होंने विधि-पूर्वक, उचित रीति से मुनि का सत्कार किया, और फिर साथ बैठ कर कुछ बातें कीं। न उतावलापन, न कोई दबाव, केवल एक खुला हृदय।

27 · 28

मार्कण्डेय उवाच ।
ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ ।
समाधिर्नाम वैश्यो ऽसौ स च पार्थिवसत्तमः ॥ 27 ॥
कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्हं तेन संविदम् ।
उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ ॥ 28 ॥

तब राजा ने कहा, हे भगवन्, हम आपसे एक बात पूछना चाहते हैं, कृपया कहिए। हमारे मन को यही दुख देता है कि हमारे अपने चित्त पर हमारा कोई बस नहीं। राज्य तो छिन ही गया, फिर भी उसके सब अंगों पर ममत्व बना रहता है, और यह सब जानते हुए भी हम किसी अज्ञानी की भाँति आचरण करते हैं। हे मुनि-श्रेष्ठ, यह आख़िर है क्या। ज्ञान और व्यवहार के बीच की यही खाई सबसे तीखा प्रश्न है।

29 · 30

राजोवाच ।
भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत् ।
दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना ॥ 29 ॥
ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि ।
जानतो ऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम ॥ 30 ॥

राजा ने आगे कहा, और यह वैश्य भी, जिसे पुत्रों ने अपमानित किया, पत्नी और सेवकों ने छोड़ दिया, स्वजनों ने सर्वथा त्याग दिया, फिर भी इसका हृदय उन्हीं पर अत्यंत स्नेह रखता है। इस प्रकार यह वैश्य और हम, दोनों ही अत्यंत दुखी हैं, और जिस विषय का दोष हमने स्वयं देख लिया है, उसी पर हमारा मन ममत्व से खिंचा चला जाता है। हे महाभाग, यह कैसी बात है कि ज्ञानी होते हुए भी हम दोनों को यह मोह घेर लेता है, और विवेक के अंधे हो कर हम मूढ़ बने रहते हैं।

31 · 32 · 33

अयं च निकृतः पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः ।
स्वजनेन च सन्त्यक्तस्तेषु हार्दे तथाप्यति ॥ 31 ॥
एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ ।
दृष्टदोषे ऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ ॥ 32 ॥
तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि ।
ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता ॥ 33 ॥

ऋषि ने उत्तर दिया, हे महाभाग, हर प्राणी को अपने-अपने विषय का ज्ञान तो होता ही है, पर वही विषय हर एक के सामने भिन्न-भिन्न रूप में आता है। कुछ प्राणी दिन में अंधे होते हैं, कुछ रात में अंधे, और कुछ ऐसे भी हैं जिनकी दृष्टि दिन और रात दोनों में समान रहती है। मनुष्य ज्ञानी हैं, यह सच है, पर वे ही केवल ज्ञानी नहीं, क्योंकि पशु, पक्षी और मृग आदि सब अपने-अपने ढंग से ज्ञानी हैं।

34 · 35 · 36

ऋषिरुवाच ।
ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे ।
विषयश्च महाभाग याति चैवं पृथक् पृथक् ॥ 34 ॥
दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे ।
केचिद् दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः ॥ 35 ॥
ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किन्तु ते न हि केवलम् ।
यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः ॥ 36 ॥

मनुष्यों के पास जो ज्ञान है, वही ज्ञान पशु-पक्षियों के पास भी है, और जो उनके पास है वही मनुष्यों के पास, इस प्रकार और भी बहुत कुछ दोनों में समान है। ऋषि कहते हैं, इन्हें देखिए, ज्ञान रहते हुए भी ये पक्षी अपने बच्चों की चोंच में दाना डालने के लिए कैसे मोह में डूबे रहते हैं, जबकि स्वयं भूख से पीड़ित हैं। और हे पुरुष-श्रेष्ठ, यही मनुष्य भी अपने पुत्रों से लोभवश इस आशा में स्नेह रखते हैं कि ये बदले में हमारा कुछ उपकार करेंगे, क्या आप यह नहीं देखते।

37 · 38 · 39

ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम् ।
मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः ॥ 37 ॥
ज्ञाने ऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु ।
कणमोक्षादृतान् मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा ॥ 38 ॥
मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति ।
लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं न पश्यसि ॥ 39 ॥

फिर भी ये सब प्राणी ममता के भँवर में, मोह के गड्ढे में जा गिरते हैं, और इसका कारण है वह महामाया, जो इस संसार की स्थिति को बनाए रखती है। इसलिए इसमें कोई विस्मय की बात नहीं। यह योग-निद्रा स्वयं जगत्पति हरि की महामाया है, इसी से यह सारा जगत मोहित होता रहता है। वही भगवती देवी ज्ञानियों के चित्त को भी बलपूर्वक खींच कर मोह में डाल देती है, यही इस अध्याय का मर्म है।

40 · 41 · 42

तथापि ममतावर्ते मोहगर्ते निपातिताः ।
महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणा ॥ 40 ॥
तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः ।
महामाया हरेश्चैतत्तथा संमोह्यते जगत् ॥ 41 ॥
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥ 42 ॥

वही देवी इस समस्त चराचर जगत की सृष्टि करती है, और वही प्रसन्न हो कर वर देने वाली बन कर मनुष्यों को मुक्ति देती है। वही परम विद्या है, मुक्ति का सनातन हेतु है, और संसार-बंधन का कारण भी वही है। वही समस्त ईश्वरों की भी ईश्वरी है। एक ही शक्ति बंधन भी रचती है और मुक्ति भी देती है, और इसी विरोधाभास में उसका माहात्म्य छिपा है।

43 · 44

तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम् ।
सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये ॥ 43 ॥
सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी ।
संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ॥ 44 ॥

यह सुन कर राजा ने पूछा, हे भगवन्, वह देवी कौन है, जिसे आप महामाया कह रहे हैं। हे द्विज, वह कैसे उत्पन्न हुई, और उसका कर्म क्या है। उसका स्वभाव कैसा है, स्वरूप कैसा है, और उसका उद्भव किस प्रकार हुआ, हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ, यह सब हम आपसे सुनना चाहते हैं।

45 · 46

राजोवाच ।
भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान् ।
ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कर्मास्याश्च किं द्विज ॥ 45 ॥
यत्स्वभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा ।
तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर ॥ 46 ॥

ऋषि बोले, वह देवी तो नित्य है, इस सारे जगत का स्वरूप वही है, और इसी से यह सब व्याप्त है। फिर भी उसके आविर्भाव की कथा अनेक प्रकार की है, उसे आप हम से सुनिए। देवों के कार्य की सिद्धि के लिए जब वह प्रकट होती है, तब लोक में कहा जाता है कि वह उत्पन्न हुई, यद्यपि वह नित्य ही है।

47 · 48

ऋषिरुवाच ।
नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम् ।
तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम ॥ 47 ॥
देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा ।
उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते ॥ 48 ॥

अब ऋषि वह कथा खोलते हैं जिसका नाम इस अध्याय को मिला है। कल्प के अंत में, जब सारा जगत एक ही जल-समुद्र बन गया, तब भगवान विष्णु शेष-नाग की शय्या बिछा कर उस पर योग-निद्रा में लीन हो गए। उसी समय विष्णु के कान के मैल से उत्पन्न दो घोर असुर, मधु और कैटभ, ब्रह्मा को मारने के लिए उठ खड़े हुए।

49 · 50

योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते ।
आस्तीर्य शेषमभजत् कल्पान्ते भगवान् प्रभुः ॥ 49 ॥
तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ ।
विष्णुकर्णमलोद्भूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ ॥ 50 ॥

विष्णु की नाभि के कमल पर विराजे प्रजापति ब्रह्मा ने जब उन दोनों उग्र असुरों को देखा, और जनार्दन को गहरी नींद में सोया पाया, तब वे एकाग्र हृदय से उस योग-निद्रा की स्तुति करने लगे। उद्देश्य एक ही था, कि हरि की आँखों में निवास करने वाली वह निद्रा हट जाए और भगवान जाग उठें। यहीं से ब्रह्मा की वह स्तुति आती है, जो इस अध्याय का सर्वोच्च और मंत्र-सा गंभीर अंश है।

51 · 52

स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः ।
दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम् ॥ 51 ॥
तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः ।
विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम् ॥ 52 ॥

अतुल तेज वाले प्रभु ब्रह्मा ने विष्णु की उस भगवती निद्रा की स्तुति की, जो विश्वेश्वरी है, जगत को धारण करने वाली है, और स्थिति तथा संहार दोनों की कारिणी है। उन्होंने कहा, आप ही स्वाहा हैं, आप ही स्वधा, आप ही वषट्कार और स्वर-स्वरूपा हैं, आप ही अमृतमयी सुधा हैं। अक्षर और नित्य रूप में तीन मात्राओं वाली प्रणव-स्वरूपा आप ही हैं।

53 · 54

ब्रह्मोवाच ।
विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम् ।
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ॥ 53 ॥
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका ।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ॥ 54 ॥

आप ही वह नित्य अर्ध-मात्रा हैं, जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जाता। आप ही संध्या हैं, आप ही सावित्री हैं, और हे देवी, आप ही सबकी परम जननी हैं। आप ही से यह सब धारण होता है, आप ही से यह जगत रचा जाता है, आप ही से इसका पालन होता है, और हे देवी, अंत में आप ही इसे सर्वदा अपने में लय कर लेती हैं।

55 · 56

अर्धमात्रा स्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः ।
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा ॥ 55 ॥
त्वयैव धार्यते सर्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत् ।
त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥ 56 ॥

हे जगन्मयी, सृष्टि के समय आप ही सृष्टि-रूपा हैं, पालन के समय स्थिति-रूपा, और इस जगत के अंत में आप ही संहार-रूपा हैं। आप ही महाविद्या, महामाया, महामेधा और महास्मृति हैं, आप ही महामोहा हैं, और आप ही महादेवी तथा महेश्वरी हैं। आप ही सबकी प्रकृति हैं, तीनों गुणों को प्रकट करने वाली, और आप ही दारुण काल-रात्रि, महा-रात्रि तथा मोह-रात्रि हैं।

57 · 58 · 59

विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने ।
तथा संहृतिरूपान्ते जगतो ऽस्य जगन्मये ॥ 57 ॥
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः ।
महामोहा च भवती महादेवी महेश्वरी ॥ 58 ॥
प्रकृतिस्त्वञ्च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी ।
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा ॥ 59 ॥

आप ही श्री हैं, आप ही ईश्वरी, आप ही ह्री हैं, और बोध से लक्षित होने वाली बुद्धि भी आप ही हैं। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शांति और क्षमा, ये सब आप ही हैं। खड्ग, शूल, गदा, चक्र और शंख धारण करने वाली वह घोर रूप वाली भी आप ही हैं, और धनुष, बाण, भुशुण्डी तथा परिघ नाम के अस्त्र भी आप ही धरती हैं।

60 · 61

त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ।
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च ॥ 60 ॥
खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा ।
शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा ॥ 61 ॥

आप सौम्य हैं, और संसार के समस्त सौम्य पदार्थों से भी अधिक सौम्य तथा अति-सुंदर हैं। पर और अपर, सबसे परे आप ही परम हैं, और आप ही परमेश्वरी हैं। इस जगत में जो भी, जहाँ भी, कुछ वस्तु है, चाहे सत् हो या असत्, हे सर्वात्मिके, उस सबकी जो शक्ति है, वह आप ही हैं। ऐसे में भला आपकी स्तुति किस प्रकार की जाए।

62 · 63

सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी ।
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ॥ 62 ॥
यच्च किञ्चित् क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ।
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयते तदा ॥ 63 ॥

जिस आपने उस जगत को रचने वाले, पालने वाले और निगल जाने वाले विष्णु को भी निद्रा के वश में कर दिया, तो इस लोक में भला कौन ईश्वर है जो आपकी स्तुति कर सके। विष्णु, हम स्वयं ब्रह्मा, और ईशान, इन सबको आपने ही शरीर धारण कराया है, फिर भला कौन है जो आपकी स्तुति करने में समर्थ हो।

64 · 65

यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत् ।
सो ऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः ॥ 64 ॥
विष्णुः शरीरग्रहणमहामीशान एव च ।
कारितास्ते यतो ऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत् ॥ 65 ॥

हे देवी, इस प्रकार अपने उदार प्रभावों से स्तुत हो कर आप इन दोनों दुर्जय असुरों मधु और कैटभ को मोहित कर दीजिए। और जगत के स्वामी अच्युत को शीघ्र जगा दीजिए, उनमें ऐसा बोध जगा दीजिए कि वे इन दोनों महा-असुरों का संहार कर सकें।

66 · 67

सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता ।
मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ ॥ 66 ॥
प्रबोधञ्च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु ।
बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ ॥ 67 ॥

ऋषि कहते हैं, ब्रह्मा के इस प्रकार स्तुति करने पर वह तामसी देवी, विष्णु को जगाने और मधु-कैटभ का वध कराने के लिए, वहाँ प्रकट हो गई। वह अव्यक्त जन्म वाले ब्रह्मा के सामने, विष्णु के नेत्र, मुख, नासिका, भुजा, हृदय और वक्ष-स्थल से निकल कर खड़ी हो गई।

68 · 69

ऋषिरुवाच ।
एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा ।
विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ ॥ 68 ॥
नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः ।
निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणो ऽव्यक्तजन्मनः ॥ 69 ॥

उस देवी के विष्णु को छोड़ते ही जगन्नाथ जनार्दन उस एकार्णव-समुद्र में शेष-शय्या से उठ बैठे। जागते ही उन्होंने उन दोनों को देखा, वे दुरात्मा मधु और कैटभ, अत्यंत वीर्य और पराक्रम वाले, क्रोध से लाल आँखें किए, ब्रह्मा को निगल जाने को उद्यत।

70 · 71

उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः ।
एकार्णवे ऽहिशयनात्ततः स ददृशे च तौ ॥ 70 ॥
मधुकैटभौ दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ ।
क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ ॥ 71 ॥

तब भगवान हरि उठ खड़े हुए और उन दोनों से भिड़ गए। विभु ने पूरे पाँच हज़ार वर्षों तक केवल अपनी भुजाओं को ही अस्त्र बना कर उनसे युद्ध किया। बल के मद में उन्मत्त वे दोनों असुर महामाया से ऐसे मोहित हुए कि स्वयं ही केशव से कह बैठे, हम से कोई वर माँग लीजिए।

72 · 73

समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः ।
पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुप्रहरणो विभुः ॥ 72 ॥
तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ ।
उक्तवन्तौ वरो ऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम् ॥ 73 ॥

भगवान बोले, यदि आप दोनों मुझ पर प्रसन्न हैं, तो यही वर दीजिए कि आप दोनों मेरे ही हाथों वध्य हों। और किसी वर से यहाँ क्या काम, मेरे लिए तो बस इतना ही माँगना पर्याप्त है। ऋषि कहते हैं, इस प्रकार छले जा कर, और सारे जगत को जल से व्याप्त देख कर, उन दोनों ने उन कमल-नयन भगवान से कहा।

74 · 75

भगवानुवाच ।
भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि ।
किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मम ॥ 74 ॥
ऋषिरुवाच ।
वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत् ।
विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः ॥ 75 ॥

उन्होंने कहा, हमें वहाँ मारिए जहाँ धरती जल से ढकी न हो। आपके युद्ध से हम प्रसन्न हुए, और आप जैसे श्लाघ्य हाथों से मृत्यु पाना हमारे लिए सौभाग्य ही है। ऋषि कहते हैं, तब शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान ने तथास्तु कह कर अपनी जाँघों पर उन दोनों को रख लिया, और चक्र से उनके सिर काट डाले।

76 · 77

आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ।
प्रीतौ स्वस्तव युद्धेन श्लाघ्यस्त्वं मृत्युरावयोः ॥ 76 ॥
ऋषिरुवाच ।
तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता ।
कृत्वा चक्रेण वै च्छिन्ने जघने शिरसी तयोः ॥ 77 ॥

ऋषि कहते हैं, इस प्रकार वह देवी, जिसे ब्रह्मा ने स्वयं स्तुति कर के प्रकट किया, इसी रूप में आविर्भूत हुई। मधु और कैटभ का संहार हुआ, और देव-कार्य सिद्ध हुआ। अब इसी देवी का आगे का प्रभाव हम आपसे और कहते हैं, उसे सुनिए।

78

एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम् ।
प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः शृणु वदामि ते ॥ 78 ॥

आगे

अगला अध्याय मध्यम-चरित्र का प्रारंभ है। महिषासुर ने देव-राज्य छीन लिया है, इंद्र पदच्युत हैं, और देवगण विष्णु तथा शिव के समीप पहुँचते हैं। उनके क्रोध से उठे तेज-पुंज से एक अद्भुत देवी प्रकट होती है, और यहीं महिषासुर-मर्दिनी की कथा खुलती है। इस अध्याय का मर्म श्लोक 42 में है, कि ज्ञानियों के चित्त को भी देवी भगवती बल से खींच कर मोह में डाल देती है।

दुर्गा सप्तशती, प्रथम चरित्र। मार्कण्डेय-पुराण के अंतर्गत, श्रीदुर्गासप्तशती (देवी माहात्म्य) के तेरह अध्यायों में पहला। मूल पाठ मानक संस्करण के अनुसार, अक्षरशः।