अध्याय 14 · द्रौपदी-हरण (जयद्रथ), मार्कण्डेय-कथाएँ

महाभारत · वन पर्व
जयद्रथ द्वारा द्रौपदी का हरण और भीम-अर्जुन द्वारा उसका दमन, और मार्कण्डेय मुनि की सुनाई कथाएँ, राम-कथा, सावित्री-सत्यवान, और प्रलय का दर्शन।

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वन पर्व की वह कथा, जहाँ अर्जुन पाँच वर्ष तक इन्द्रलोक में रहकर, अग्नि, वरुण, सोम, वायु, विष्णु, इन्द्र, पशुपति, ब्रह्मा, यम और कुबेर के दिव्य अस्त्र सीखकर गन्धमादन पर्वत पर अपने भाइयों के पास लौट आते हैं। यहीं से आरम्भ होकर कथा निवातकवच और हिरण्यपुर के असुरों के संहार तक, फिर पाण्डवों के पर्वत-वास, सर्परूपी नहुष द्वारा भीम के बन्धन और युधिष्ठिर के प्रश्नोत्तर तक, और अन्त में काम्यक वन में महर्षि मार्कण्डेय के आगमन तथा उनकी सुनाई हुई मनु-मत्स्य की कथा और प्रलय के दर्शन तक पहुँचती है। यह व्यास की कथा का सीधा, पास रहकर किया गया अनुवाद है, जिसमें गीता प्रेस गोरखपुर की परम्परा को प्रामाणिकता का आधार माना गया है। ध्यान रहे, इन घटनाओं में मनुष्य और देव, शाप और मुक्ति, धर्म और भाग्य के वे जटिल प्रश्न उठते हैं जिन्हें महाभारत कभी सरल नहीं करता।

कुबेर की विदाई और धौम्य का दिग्दर्शन

गन्धमादन पर्वत पर कुबेर (धन के स्वामी, गुह्यकों के अधिपति) ने युधिष्ठिर को सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे अर्जुन (जिष्णु) महेन्द्र के, भीम (वृकोदर) वायु के, युधिष्ठिर स्वयं धर्म के, और दोनों जुड़वाँ नकुल-सहदेव अश्विनीकुमारों के संरक्षण के अधिकारी हैं, वैसे ही वे सब कुबेर के भी संरक्षण के पात्र हैं। कुबेर ने कहा कि अर्जुन से अगले क्रम के भाई, फाल्गुन, अर्थशास्त्र और समस्त मर्त्य-नियमों के ज्ञाता, स्वर्ग में सकुशल हैं। स्वर्ग को ले जाने वाले जो भी गुण संसार में माने जाते हैं, वे सब धनंजय में जन्म से ही स्थापित हैं। आत्मसंयम, दान, बल, बुद्धि, विनय, धैर्य और उत्तम तेज, ये सब उस महान्-आत्मा में विद्यमान हैं। कुबेर ने कहा कि अर्जुन ने कभी मन की दुर्बलता से कोई लज्जाजनक कार्य नहीं किया, और संसार में कोई नहीं कहता कि पार्थ ने असत्य कहा हो। कुबेर ने यह भी बताया कि युधिष्ठिर के पितामह के पितामह, सम्राट् शान्तनु, जिन्होंने यमुना के तट पर सात बड़े अश्वमेध यज्ञ करके देवताओं, पितरों और ब्राह्मणों की पूजा की थी और जो स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं, इन्द्रलोक में रहते हुए युधिष्ठिर की कुशल पूछ रहे हैं।

कुबेर की यह वाणी सुनकर पाण्डव प्रसन्न हुए। तब युधिष्ठिर ने अपनी गदा, मूसल, खड्ग और धनुष को नीचे रखकर कुबेर को प्रणाम किया। कुबेर ने उन्हें झुका हुआ देखकर कहा कि वे शत्रुओं के गर्व के नाशक और मित्रों के आनन्द के वर्धक बनें। उन्होंने आश्वासन दिया कि यक्ष उनकी इच्छाओं का उल्लंघन नहीं करेंगे, और अस्त्रों पर अधिकार पाकर अर्जुन (गुडाकेश) शीघ्र ही, स्वयं इन्द्र (मघवान्) से विदा लेकर, उनके पास लौट आएँगे। यह कहकर गुह्यकों के स्वामी कुबेर उस श्रेष्ठ पर्वत से अन्तर्धान हो गए। सहस्रों यक्ष और राक्षस चित्रित गद्दों से ढके और रत्नों से सजे वाहनों में उनके पीछे चले गए। कुबेर की आज्ञा से राक्षसों के शव पर्वत-शिखर से हटा दिए गए, क्योंकि अगस्त्य मुनि के शाप की जो अवधि थी, वह युद्ध में मारे जाने पर पूरी हो चुकी थी, और राक्षस उस अभिशाप से मुक्त हो गए।

समझने की कुंजी (स्थान): गन्धमादन एक दिव्य पर्वत है, जो कुबेर के क्रीड़ा-उद्यानों से सुशोभित है। पाण्डव यहाँ अर्जुन की प्रतीक्षा में ठहरे हैं। मन्दर, मेरु (महामेरु), कैलास, ये सब इसी हिमालयी दिव्य-भूगोल के पर्वत हैं, जो कथा में बार-बार आएँगे।

सूर्योदय के समय धौम्य (पाण्डवों के पुरोहित) आर्ष्टिषेण के साथ पाण्डवों के पास आए। आर्ष्टिषेण और धौम्य के चरणों में प्रणाम करके पाण्डवों ने हाथ जोड़कर सब ब्राह्मणों को नमस्कार किया। तब धौम्य ने युधिष्ठिर का दाहिना हाथ पकड़कर, पूर्व दिशा की ओर देखते हुए, उन्हें दिशाओं का दिग्दर्शन कराया। उन्होंने कहा कि यह पर्वतराज मन्दर समुद्र तक फैली पृथ्वी को ढके हुए है, और इस वन-पर्वत से शोभित स्थान पर इन्द्र और वैश्रवण (कुबेर) का अधिकार है। पूर्व से उदित होते सूर्य की द्विज, सिद्ध, साध्य और देवता उपासना करते हैं। दक्षिण दिशा पर धर्म के ज्ञाता राजा यम का अधिकार है, जहाँ प्रेतात्माएँ जाती हैं; यही संयमन नामक यम का पवित्र निवास है, और उस पर्वत को बुद्धिमान् लोग अस्त कहते हैं, जहाँ पहुँचकर सूर्य सत्य का आश्रय लेता है। पश्चिम में राजा वरुण इस पर्वत और अगाध समुद्र में रहते हुए सब प्राणियों की रक्षा करते हैं।

धौम्य ने आगे बताया कि उत्तर दिशा को आलोकित करता हुआ महामेरु स्थित है, जो ब्रह्म को जानने वालों का शरण है, जहाँ ब्रह्मा की सभा है और जहाँ रहते हुए प्रजापति ने समस्त चर-अचर की रचना की। महामेरु ब्रह्मा के सात मानस-पुत्रों का भी निवास है, जिनमें सातवें दक्ष थे। वहीं वसिष्ठ आदि सात ब्रह्मर्षि उदित और अस्त होते हैं। मेरु के उज्ज्वल शिखर पर देवताओं सहित पितामह ब्रह्मा विराजते हैं। ब्रह्मा के निवास के समीप ही उस आदिकारण नारायण का स्थान है, जिनका न आदि है न अन्त, और जिनका तेजोमय स्थान देवता तक नहीं देख सकते। वह उच्च-आत्मा विष्णु का क्षेत्र सूर्य और अग्नि से भी अधिक प्रदीप्त है, जिसे देव और दानव भी नहीं देख पाते। उस स्थान तक महर्षि तो क्या, ब्रह्मर्षि भी नहीं पहुँच पाते; केवल यति (संयमी तपस्वी) ही वहाँ पहुँचते हैं, जो श्रद्धा और कठोर तप से नारायण हरि को प्राप्त करते हैं और फिर इस संसार में नहीं लौटते।

धौम्य ने सूर्य की गति का भी वर्णन किया, कि सूर्य और चन्द्रमा प्रतिदिन मेरु की परिक्रमा करते हैं, परन्तु विपरीत दिशाओं में। सूर्य पर्वों के अनुसार माह को विभाजित करता है। जब सूर्य दक्षिण की ओर जाता है तब शीत आती है, और प्राणियों से ऊर्जा खींच लेता है, जिससे मनुष्य श्रम, निद्रा और शिथिलता का अनुभव करते हैं। फिर वही सूर्य वर्षा कराकर प्राणियों को पुनर्जीवित करता है। इस प्रकार सूर्य काल के चक्र पर अविराम घूमता है, कभी विश्राम नहीं करता, और प्राणियों से ऊर्जा खींचकर पुनः लौटा देता है, तथा दिन-रात, काल और काष्ठा में समय को विभाजित करते हुए समस्त सृष्टि को जीवन और गति देता है।

सार: कुबेर अपने यक्षों सहित गन्धमादन से लौट गए और राक्षस अगस्त्य के शाप से मुक्त हुए। धौम्य ने युधिष्ठिर को चारों दिशाओं के अधिपति देवों, मेरु पर ब्रह्मा-नारायण के परम स्थान, और सूर्य की काल-चक्र-गति का दिग्दर्शन कराया। पाण्डव अर्जुन की प्रतीक्षा में पर्वत पर एक मास कठिनाई से बिताते हैं।

अर्जुन का गन्धमादन लौटना और स्वर्ग-वृत्तान्त

बिजलियों से भरे आकाश से उतरते इंद्र के स्वर्ण रथ की ओर पर्वत पर खड़े अर्जुन हाथ बढ़ाए।

एक दिन, जब पाण्डव अर्जुन का ही चिन्तन कर रहे थे, मातलि के द्वारा हाँका जाता, बिजली के तेज वाले घोड़ों से जुता महेन्द्र का रथ अचानक आकाश को आलोकित करता हुआ आ पहुँचा। उसमें मालाओं और नए आभूषणों से सुसज्जित अर्जुन (किरीटी) बैठे थे। वज्रधारी के समान प्रतापी धनंजय उस पर्वत पर उतरे और पहले धौम्य के, फिर युधिष्ठिर (अजातशत्रु) के चरणों में प्रणाम किया। उन्होंने भीम के चरण भी छुए, और जुड़वाँ भाइयों ने उन्हें प्रणाम किया। फिर द्रौपदी (कृष्णा) को सान्त्वना देकर वे विनम्र भाव से अपने बड़े भाई के सामने खड़े हुए। सबके आनन्द की सीमा न रही। पाण्डवों ने उस रथ की परिक्रमा की, जिस पर बैठकर इन्द्र ने दिति के पुत्रों की सात सेनाओं का संहार किया था, और मातलि का देवराज के समान सत्कार किया। मातलि भी उन्हें अभिवादन करके, पिता के समान उपदेश देकर, उस रथ पर चढ़कर इन्द्र के पास लौट गए।

मातलि के जाने पर अर्जुन ने अपनी प्रिया, सुतसोम की माता (द्रौपदी) को इन्द्र के दिए हुए सूर्य-समान तेज वाले रत्न और आभूषण भेंट किए। फिर कुरुश्रेष्ठों और ब्राह्मणों के बीच बैठकर उन्होंने संक्षेप में बताया कि उन्होंने इन्द्र, वायु और साक्षात् शिव से अस्त्र सीखे, और अपने सदाचार तथा एकाग्रता से इन्द्र सहित सब देवता उन पर प्रसन्न हुए। उस रात अर्जुन माद्री के दोनों पुत्रों के साथ सुखपूर्वक सोए।

अगले दिन देवलोक से वाद्यों की भीषण ध्वनि, रथ-चक्रों की घड़घड़ाहट और घण्टों का स्वर उठा। समस्त दिशाओं से गन्धर्वों और अप्सराओं के दल देवराज के पीछे चले, और सूर्य-समान देदीप्यमान रथ पर इन्द्र (पुरन्दर) स्वयं पाण्डवों के पास आ पहुँचे। युधिष्ठिर ने भाइयों सहित उनका विधिपूर्वक पूजन किया। अर्जुन जटाधारी और तपस्वी रूप में दास के समान विनम्र भाव से इन्द्र के सामने खड़े थे। यह देखकर युधिष्ठिर ने अर्जुन का मस्तक सूँघा और परम आनन्द का अनुभव किया। तब इन्द्र ने युधिष्ठिर से कहा कि वे पृथ्वी पर राज्य करेंगे, और अब वे पुनः काम्यक वन को लौट जाएँ। यह कहकर इन्द्र अपने स्थान को लौट गए।

समझने की कुंजी (अवधारणा): मातलि इन्द्र के सारथि हैं। किरीटी, फाल्गुन, धनंजय, जिष्णु, सव्यसाची, ये सब अर्जुन के ही नाम हैं। इन्द्र के अनेक नाम भी कथा में आते हैं, पुरन्दर, मघवान्, शक्र, वासव, मरुत्वान्। एक ही पात्र के अनेक नाम महाभारत की शैली है।

इन्द्र के लौटने पर युधिष्ठिर ने अर्जुन से उनका सम्पूर्ण स्वर्ग-वृत्तान्त विस्तार से सुनना चाहा। अर्जुन ने बताया कि युधिष्ठिर की आज्ञा से वे तप के लिए वन में गए। काम्यक से भृगुतुंग जाकर एक रात तप किया। वहाँ एक ब्राह्मण मिले, जिन्होंने उन्हें तप का परामर्श दिया और कहा कि शीघ्र ही वे इन्द्र का दर्शन करेंगे। उनके कहे अनुसार अर्जुन ने हिमवान् पर चढ़कर तप आरम्भ किया, पहले मास फल-मूल पर, दूसरे मास जल पर, तीसरे मास निराहार, और चौथे मास भुजाएँ ऊपर उठाकर रहे, फिर भी उनका बल क्षीण न हुआ।

किरात-रूपी शिव से युद्ध और पाशुपत की प्राप्ति

Arjuna and the Kirata hunter both loosing arrows at the same charging boar in the Himalayan slope.

पाँचवें मास के पहले दिन अर्जुन के सामने एक वराह (सूअर) के रूप में एक प्राणी प्रकट हुआ, जो मुख से धरती खोदता, पैरों से भूमि कूटता, और भयानक रूप से घूम रहा था। उसके पीछे धनुष-बाण और खड्ग लिए, स्त्रियों से घिरा हुआ, एक किरात (व्याध) के रूप में एक महान् प्राणी आया। अर्जुन ने अपने दोनों अक्षय तूणीर और धनुष लेकर उस वराह को बाण मारा, और उसी क्षण उस किरात ने भी बलपूर्वक धनुष खींचकर बाण चलाया। किरात ने कहा कि अर्जुन ने आखेट के नियम तोड़कर पहले उसके द्वारा निशाना बनाए पशु पर वार क्यों किया। यह कहकर वह अर्जुन पर बाणों की वर्षा करने लगा।

दोनों में घोर युद्ध हुआ। अर्जुन ने मन्त्र से अभिमन्त्रित तीक्ष्ण बाण चलाए, पर वह किरात अपने शरीर को सौ और सहस्र गुना बढ़ाने लगा। अर्जुन ने सब रूपों को बेधा, तो वे पुनः एक हो जाते। अर्जुन ने वायव्यास्त्र साधा, पर उसे चला न सके; फिर स्थूणाकर्ण, वारुण, सलाव और अश्मवर्ष अस्त्र चलाए, परन्तु किरात ने वे सब निगल लिए। अन्त में अर्जुन ने ब्रह्मास्त्र छोड़ा, पर वह भी निष्फल हो गया। तब दोनों में मल्लयुद्ध हुआ, और अन्ततः अर्जुन मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। उस अद्भुत प्राणी ने हँसते हुए स्त्री सहित अन्तर्धान होकर अपना दिव्य रूप धारण कर लिया।

Shiva with Uma revealing his true form and handing the Pashupata weapon to the kneeling Arjuna.

तब अर्जुन के सामने उमा के साथ वह दिव्य प्राणी प्रकट हुआ, जिसका चिह्न वृषभ था, जो पिनाक धारण किए, सर्पों से सुशोभित और अनेक रूप धारण करने में समर्थ थे। वे साक्षात् महादेव थे। शिव ने प्रसन्न होकर अर्जुन के धनुष और अक्षय तूणीर लौटा दिए और कहा कि अमरत्व को छोड़कर वे कोई भी वर माँग लें। अर्जुन ने केवल अस्त्र-ज्ञान की कामना की। तब त्र्यम्बक ने उन्हें अपना रौद्र अस्त्र, पाशुपत, प्रदान किया, और चेतावनी दी कि इसे कभी अल्प-तेज वाले मनुष्यों पर न चलाया जाए, अन्यथा यह समस्त ब्रह्माण्ड को भस्म कर देगा; इसे केवल तभी छोड़ें जब अन्य सब अस्त्र निष्फल हो जाएँ। यह कहकर शिव अन्तर्धान हो गए।

एक उप-कथा: किरात-वेश का अर्थ। महादेव अर्जुन की परीक्षा लेने व्याध (किरात) का रूप धरकर आए। वराह वस्तुतः मूक नामक दानव था। पहले बाण किसने मारा, इस विवाद के बहाने शिव ने अर्जुन के सम्पूर्ण अस्त्र-बल और धैर्य को तौला, और अन्त में प्रसन्न होकर पाशुपत दिया। यहाँ देव छल नहीं, परीक्षा करते हैं, और मनुष्य की पराजय ही उसके वरदान का द्वार बनती है।

उस रात अर्जुन ने वहीं विश्राम किया। प्रातः वही ब्राह्मण पुनः मिले, जिन्हें अर्जुन ने महादेव-दर्शन की बात बताई। ब्राह्मण ने प्रसन्न होकर कहा कि अब अर्जुन शीघ्र ही वैवस्वत (यम) तथा अन्य लोकपालों और इन्द्र से मिलेंगे, और इन्द्र उन्हें अस्त्र देंगे। उसी सायंकाल शीतल वायु बही, हिमालय की तलहटी में सुगन्धित पुष्प खिल उठे, और इन्द्र-सम्बन्धी मधुर स्तुतियाँ गूँजने लगीं। तब यम दक्षिण में, वरुण और कुबेर अपने-अपने क्षेत्रों में, तथा इन्द्र प्रकट हुए। लोकपालों ने अर्जुन से कहा कि उन्होंने देवकार्य के लिए शंकर का दर्शन पाया है, अब वे उन सब से अस्त्र ग्रहण करें। अर्जुन ने आदरपूर्वक उन सब दिव्य अस्त्रों को स्वीकार किया।

इन्द्रलोक की यात्रा और गुरु-दक्षिणा का भार

लोकपालों के लौटने पर इन्द्र ने अर्जुन से कहा कि वे स्वर्ग को आएँगे, और इन्द्र की आज्ञा से मातलि उन्हें ले जाएँगे। अर्जुन ने इन्द्र से प्रार्थना की कि वे उनके गुरु बनें और अस्त्र सिखाएँ। इन्द्र ने पहले परीक्षा-स्वरूप कहा कि अस्त्र पाकर अर्जुन भयंकर कर्म करेंगे, पर अर्जुन ने वचन दिया कि वे इन दिव्य अस्त्रों को मनुष्यों पर तभी चलाएँगे जब अन्य सब अस्त्र निष्फल हो जाएँ। इस उत्तर से प्रसन्न होकर इन्द्र ने कहा कि यह परीक्षा ही थी, और अर्जुन को अपने धाम बुलाकर वायु, अग्नि, वसु, वरुण, मरुत्, सिद्ध, ब्रह्मा, गन्धर्व, उरग, राक्षस, विष्णु, नैऋत्य और स्वयं इन्द्र के समस्त अस्त्र सीखने को कहा।

मातलि अर्जुन को रथ पर बैठाकर ले चले। रथ चलते समय मातलि ने आश्चर्य से कहा कि स्वयं इन्द्र भी पहले झटके पर हिल जाते हैं, पर अर्जुन तनिक भी विचलित नहीं हुए, यह शक्र की भी सामर्थ्य से बढ़कर है। आकाश में उड़ते हुए मातलि ने अर्जुन को देवलोक के नन्दन आदि उद्यान और इन्द्र की अमरावती दिखाई, जहाँ न ताप है, न शीत, न श्रम, न शोक, न दैन्य; जहाँ वृक्ष सदा हरे-भरे और फल-फूल से लदे रहते हैं, और भूमि रत्नों से जड़ी है। अर्जुन ने वसु, रुद्र, साध्य, मरुत्, आदित्य और अश्विनीकुमारों की पूजा की, और उन्होंने अर्जुन को बल, प्रताप, तेज, कीर्ति, अस्त्र-कौशल और युद्ध में विजय का आशीर्वाद दिया।

इन्द्र ने अर्जुन को अपने आसन का आधा भाग दिया। अर्जुन गन्धर्वों के साथ स्वर्ग में रहने लगे। विश्वावसु के पुत्र चित्रसेन उनके मित्र बने और उन्हें सम्पूर्ण गन्धर्व-विद्या (नृत्य-संगीत की कला) सिखाई। अर्जुन ने अस्त्र-विद्या में दक्षता प्राप्त की और गीत-वाद्य भी सीखे, पर उनका ध्यान मुख्यतः अस्त्रों पर ही रहा। जब अर्जुन अस्त्रों में निपुण हो गए, तब इन्द्र ने उनके सिर पर हाथ रखकर कहा कि अब देवता भी उन्हें नहीं जीत सकते, मनुष्यों की तो बात ही क्या। फिर इन्द्र ने गुरु-दक्षिणा माँगी।

अर्जुन ने वचन दिया कि जो कार्य उनकी सामर्थ्य में होगा, वे उसे पूर्ण समझें। तब इन्द्र ने कहा कि उनके शत्रु, समुद्र की कोख में रहने वाले निवातकवच नामक दानव, जो संख्या में तीन करोड़ हैं और सब समान रूप, बल और तेज वाले हैं, उनका वध ही गुरु-दक्षिणा होगी। इन्द्र ने अर्जुन को मातलि-संचालित दिव्य रथ, मस्तक पर उत्तम किरीट, शरीर के आभूषण, अभेद्य कवच, और गाण्डीव के लिए अक्षय प्रत्यंचा प्रदान की। यह वही रथ था जिस पर बैठकर इन्द्र ने विरोचन के पुत्र बलि को जीता था। देवताओं ने अर्जुन को देवदत्त नामक शंख भी दिया, और निवातकवचों के वध के लिए उनकी स्तुति की।

समझने की कुंजी (संख्या, आधुनिक समतुल्य): स्रोत में निवातकवचों की संख्या तीन करोड़ कही गई है, अर्थात् लगभग तीन करोड़ की एक विशाल दानव-सेना। ये समुद्र की गहराई में बसे, ब्रह्मा के वरदान से देवताओं के लिए भी अवध्य असुर थे। गाण्डीव अर्जुन का धनुष है, देवदत्त उनका शंख।

निवातकवचों का संहार

Arjuna in Indra's chariot blowing the Devadatta conch as thousands of armored Nivatakavacha demons pour from the undersea city.

अर्जुन समुद्र तक पहुँचे, जहाँ पर्वत-समान लहरें उठ-गिर रही थीं, और जल में तिमिंगिल, कच्छप और मकर तैर रहे थे। कुछ ही दूर पर उन्हें दानवों से भरी असुर-नगरी दिखी। मातलि ने रथ को पृथ्वी के नीचे ले जाकर बलपूर्वक हाँका। रथ की घड़घड़ाहट सुनकर दानव अर्जुन को इन्द्र समझकर भयभीत हो उठे और नगर के द्वार बन्द कर लिए। तब अर्जुन ने देवदत्त शंख बार-बार बजाया, जिसकी ध्वनि से समस्त आकाश गूँज उठा। सहस्रों निवातकवच नाना आयुध, लोहे के भाले, गदा, मूसल, परशु, खड्ग, चक्र, शतघ्नी और भुशुण्डि लेकर निकल पड़े।

घोर युद्ध हुआ। देवर्षि, दानवर्षि, ब्रह्मर्षि और सिद्ध उस युद्ध को देखने आए, और मुनियों ने अर्जुन की वैसी ही स्तुति की जैसी कभी तारा के लिए हुए युद्ध में इन्द्र की की थी। निवातकवचों ने अर्जुन को बाणों, भालों और गदाओं से ढक दिया, पर अर्जुन ने गाण्डीव से प्रत्येक को दस-दस बाणों से बेधा। मातलि के कुशल संचालन से सैकड़ों घोड़े थोड़े-से प्रतीत होते हुए दानवों को रौंदने लगे। अर्जुन ने इन्द्र का प्रिय अस्त्र मघवान् चलाकर असुरों के तोमर, खड्ग और त्रिशूल हजार टुकड़ों में काट डाले। उनके बाण काले भौंरों की पंक्ति के समान छूटते थे, जिसे देखकर मातलि चकित रह गए।

तब निवातकवचों ने माया का सहारा लिया। पहले वृक्ष-समान शिलाओं की वर्षा हुई, जिसे अर्जुन ने महेन्द्र के अस्त्र से चूर्ण कर दिया। फिर अक्ष के समान मोटी धाराओं वाली भयंकर जल-वर्षा हुई, जिसे अर्जुन ने इन्द्र से सीखे विशोषण अस्त्र से सुखा दिया। फिर अग्नि और वायु की माया फैली, जिसे अर्जुन ने वारुण और शैल-अस्त्रों से शान्त किया। अन्त में सघन अन्धकार छा गया, घोड़े विचलित हो गए, और मातलि के हाथ से सोने का चाबुक छूट गया। मातलि भयभीत होकर बार-बार पूछने लगे कि अर्जुन कहाँ हैं। उन्होंने कहा कि इतने भीषण युद्धों में, समवर, वृत्र और प्रह्लाद के संग्रामों में भी, वे कभी इस प्रकार विचलित नहीं हुए थे, और सम्भवतः पितामह ब्रह्मा ने सृष्टि का संहार ठान लिया है।

अर्जुन ने मातलि को धीरज बँधाते हुए कहा कि वे अपनी भुजाओं और गाण्डीव के बल से इस माया का नाश करेंगे, और भयभीत न हों। अर्जुन ने एक ऐसे अस्त्र की माया रची जो सब प्राणियों को मोहित कर दे, और दानवों की माया को छिन्न कर दिया। फिर भी असुर अदृश्य रहकर लड़ते रहे। मातलि के संकेत पर अर्जुन ने वज्र अस्त्र चलाया, जिसके अधिमन्त्रित लौह-बाणों ने शिलाओं और छिपे हुए निवातकवचों को बेधकर सबको यमलोक भेज दिया। उस दिशा में निवातकवचों के शव शिलाओं के समान बिखर गए, पर न घोड़ों को, न रथ को, न मातलि को, न अर्जुन को कोई क्षति पहुँची।

दानवों के संहार पर उनकी स्त्रियाँ शरद् ऋतु की क्रौंच पक्षियों के समान विलाप करने लगीं और सोने के महलों में भाग गईं। उस अद्भुत नगरी को देखकर अर्जुन ने मातलि से पूछा कि देवता ऐसे श्रेष्ठ स्थान में क्यों नहीं रहते। मातलि ने बताया कि प्राचीन काल में यही इन्द्र की नगरी थी, पर निवातकवचों ने ब्रह्मा से वर पाकर देवताओं को यहाँ से निकाल दिया था। उन्हें वर मिला था कि वे यहाँ रहेंगे और देवताओं के युद्ध में निर्भय रहेंगे। इसीलिए ब्रह्मा ने इन्द्र को आश्वासन दिया था कि वे दूसरे शरीर से, अर्थात् अर्जुन के रूप में, इनका संहार करेंगे। अर्जुन ने नगरी को जीतकर मातलि के साथ इन्द्रलोक की ओर प्रस्थान किया।

सार: इन्द्र ने गुरु-दक्षिणा में निवातकवचों का वध माँगा। अर्जुन ने समुद्र की गहराई में बसी असुर-नगरी पर आक्रमण किया, माया-युद्ध में शिला, जल, अग्नि और अन्धकार की सब विद्याओं को परास्त किया, और वज्र अस्त्र से तीन करोड़ निवातकवचों का संहार किया। यह नगरी कभी इन्द्र की ही थी, जिसे असुरों ने वरदान के बल पर छीन लिया था।

हिरण्यपुर का विध्वंस और रौद्र अस्त्र

लौटते समय अर्जुन ने आकाश में स्वच्छन्द विचरती, अग्नि या सूर्य के समान तेजस्वी एक अद्भुत नगरी देखी, जिसमें रत्नमय वृक्ष और मधुर-स्वर पक्षी थे। चार द्वारों, तोरणों और बुर्जों वाली यह अभेद्य नगरी पौलोम और कालकंज नामक असुरों से भरी थी। अर्जुन के पूछने पर मातलि ने बताया कि पुलोमा नामक दैत्य-कन्या और कालका नामक असुर-स्त्री ने सहस्र दिव्य वर्षों तक कठोर तप करके ब्रह्मा से वर पाया था कि उनकी सन्तान कभी विपत्ति न पाए, देवता-राक्षस-पन्नग भी उन्हें न मार सकें, और उन्हें एक अजेय, स्वर्णमयी, स्वच्छन्द विचरने वाली आकाशनगरी मिले। यही हिरण्यपुर है, जिसे ब्रह्मा ने कालकेयों के लिए रचा। पर ब्रह्मा ने इसका विनाश मनुष्यों के हाथों नियत किया था, अतः मातलि ने अर्जुन से वज्र अस्त्र द्वारा कालकंजों के संहार को कहा।

अर्जुन ने प्रसन्नतापूर्वक मातलि से नगरी के समीप ले चलने को कहा। दिति के पुत्र कवच पहने, नाना आयुध लिए, अर्जुन पर टूट पड़े। अर्जुन ने बाणों की वर्षा से उन्हें रोका और रथ को घुमाते हुए उन्हें भ्रमित कर दिया, जिससे वे एक-दूसरे को धकेलने और परस्पर लड़ने लगे। अर्जुन ने सैकड़ों दैत्यों के सिर काट डाले। तब दैत्य अपनी नगरी सहित आकाश में उड़ गए, कभी पृथ्वी में, कभी जल में समाते। अर्जुन ने बाणों से उनका मार्ग रोका और दिव्य अस्त्रों से नगरी को धराशायी कर दिया।

The Raudra weapon manifesting as a three-headed, nine-eyed, six-armed flaming being amid the doomed demon host.

तब साठ हजार रथों ने अर्जुन को घेर लिया। वे योद्धा इतने कुशल और असंख्य थे कि अर्जुन को घोर युद्ध में भय-सा हुआ। तब अर्जुन ने देवों के देव रौद्र को नमस्कार करके, “समस्त प्राणियों का कल्याण हो” कहते हुए, वह महान् रौद्र अस्त्र गाण्डीव पर चढ़ाया। तभी तीन सिर, नौ नेत्र, तीन मुख और छह भुजाओं वाला एक पुरुष प्रकट हुआ, जिसके केश अग्नि के समान धधक रहे थे और जो वस्त्र के स्थान पर जीभ लपलपाते महासर्प पहने था। त्रिनेत्र शिव को प्रणाम करके अर्जुन ने वह अस्त्र छोड़ दिया। छूटते ही सहस्रों मृग, सिंह, व्याघ्र, भालू, सर्प, गज, वानर, वराह और नाना भयंकर रूप प्रकट हुए, जिन्होंने दानवों को बेधकर नष्ट कर दिया। अर्जुन ने क्षण भर में पाषाण-समान कठोर, अग्नि-सूर्य के समान दीप्त बाणों से सब दानवों का संहार कर दिया।

हिरण्यपुर के विध्वंस को देखकर मातलि ने अर्जुन को प्रणाम किया और कहा कि यह कार्य देवता तो क्या, स्वयं इन्द्र भी नहीं कर सकते थे। दानवों की स्त्रियाँ कुररी पक्षियों के समान विलाप करती, बाल बिखेरे नगरी से बाहर निकलीं, और वह नगरी मेघ-रचित नगरी के समान विलीन हो गई। अर्जुन मातलि के साथ इन्द्र के पास लौटे। मातलि ने इन्द्र को सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया। हिरण्यपुर के विनाश और निवातकवचों के संहार को सुनकर इन्द्र अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले, “साधु, साधु।” इन्द्र ने कहा कि अब युद्ध में देव, दानव, राक्षस, यक्ष, असुर, गन्धर्व, पक्षी या सर्प कोई भी अर्जुन के सामने नहीं ठहर सकेगा, और उनकी भुजाओं के बल से युधिष्ठिर पृथ्वी पर राज्य करेंगे।

समझने की कुंजी (अवधारणा): रौद्र अस्त्र वही पाशुपत है जो शिव ने दिया था, जिसका प्रकट रूप तीन सिर, नौ नेत्र और छह भुजाओं वाला भयंकर पुरुष है। ध्यान दें कि अर्जुन इसे केवल देवकार्य में, असुरों के विरुद्ध, और अन्तिम उपाय के रूप में प्रयोग करते हैं, मनुष्यों पर नहीं, यही शिव की शर्त थी।

इन्द्र ने अर्जुन को सुवर्ण-माला, देवदत्त शंख, दिव्य कवच और किरीट दिया। इस प्रकार आदरपूर्वक पाँच वर्ष इन्द्रलोक में बिताकर, जुए से उपजे कलह का स्मरण करते हुए, अर्जुन गन्धमादन की निचली श्रेणी पर अपने भाइयों के पास लौट आए। युधिष्ठिर ने कहा कि सौभाग्य से अर्जुन ने अस्त्र पाए, सौभाग्य से शिव और लोकपालों का दर्शन किया, और सौभाग्य से वे लौट आए, मानो समस्त पृथ्वी जीत ली गई हो। युधिष्ठिर ने वे दिव्य अस्त्र देखने की इच्छा प्रकट की, और अर्जुन ने प्रातः दिखाने का वचन दिया।

अस्त्र-प्रदर्शन और नारद का निषेध

प्रातःकाल अर्जुन ने अत्यन्त पवित्रता के साथ वे दिव्य अस्त्र क्रम से प्रदर्शित करने आरम्भ किए। ज्यों ही अस्त्र साधे गए, अर्जुन के चरणों के भार से पृथ्वी वृक्षों सहित काँप उठी, नदियाँ और समुद्र क्षुब्ध हुए, शिलाएँ फट गईं, वायु थम गई, सूर्य का प्रकाश मन्द पड़ गया, और अग्नि की ज्वाला बुझ-सी गई। पृथ्वी के भीतर बसे प्राणी पीड़ित होकर हाथ जोड़े अर्जुन के पास आ खड़े हुए और प्राणों की भीख माँगने लगे। ब्रह्मर्षि, सिद्ध, महर्षि, देव, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, सब वहाँ आ पहुँचे। पितामह ब्रह्मा, सब लोकपाल और स्वयं महादेव भी अपने अनुचरों सहित आ गए। वायु ने अर्जुन पर दिव्य पुष्प बरसाए, गन्धर्वों ने गान किया, और अप्सराओं ने नृत्य किया।

उसी क्षण देवताओं के भेजे नारद वहाँ आए और अर्जुन से कहा कि वे दिव्य अस्त्रों को निष्प्रयोजन न चलाएँ। ये अस्त्र तब भी न छोड़े जाएँ जब कोई योग्य लक्ष्य हो, जब तक अत्यन्त विवश न हों, क्योंकि बिना अवसर के इनका प्रयोग महान् अनर्थ लाता है। नारद ने कहा कि उचित रीति से रखे जाने पर ये अस्त्र अर्जुन के बल और सुख के साधन होंगे, पर अनुचित रीति से रखे जाने पर ये तीनों लोकों के विनाश के कारण बन जाएँगे। उन्होंने कहा कि युधिष्ठिर इन अस्त्रों को तब देखेंगे जब अर्जुन इन्हें युद्ध में शत्रुओं के संहार के लिए प्रयोग करेंगे। यह कहकर देवता अपने-अपने स्थान को लौट गए, और पाण्डव द्रौपदी सहित उसी वन में सुखपूर्वक रहने लगे।

सार: अर्जुन के अस्त्र-प्रदर्शन से ही पृथ्वी काँप उठी और समस्त प्राणी भयभीत हुए। नारद ने आकर समझाया कि दिव्य अस्त्र निष्प्रयोजन या अनुचित रीति से प्रयोग किए जाएँ तो तीनों लोकों का विनाश कर सकते हैं। यह महाभारत का गहरा संकेत है कि महान् शक्ति का मूल्य उसके संयम में है।

पर्वतों की यात्रा और सर्प का बन्धन

अर्जुन के लौटने के बाद पाण्डवों ने भीम के परामर्श पर निश्चय किया कि वे गन्धमादन के सुखमय वास को छोड़कर पृथ्वी पर लौटें, क्योंकि स्वर्ग-समान इस स्थान में रहकर वे अपने दुःख और प्रतिज्ञा को भूल सकते हैं। भीम ने युधिष्ठिर से कहा कि यह उनके वनवास का ग्यारहवाँ वर्ष है, और अब उन्हें शत्रुओं के दण्ड की ओर मन लगाना चाहिए। युधिष्ठिर ने कुबेर के निवास की परिक्रमा करके, पर्वत से पुनः लौटने की प्रार्थना की, और भाइयों तथा ब्राह्मणों के साथ उसी मार्ग से प्रस्थान किया। घटोत्कच और उसके अनुचर उन्हें पर्वत-प्रपातों के पार ले गए, और महर्षि लोमश तथा आर्ष्टिषेण से विदा लेकर पाण्डव आगे बढ़े।

कैलास के समीप से होते हुए वे राजा वृषपर्वा के आश्रम पहुँचे, जहाँ एक रात बिताई। फिर विशाला नामक बेर-वृक्ष तक, और नारायण-आश्रम में कुबेर के प्रिय सरोवर के पास आकर वे शोकरहित होकर रहे। बदरी में एक मास रहकर वे किरात-राज सुबाहु के राज्य की ओर बढ़े, और चीन, तुखार, दरद तथा कुलिन्द देशों को पार करके सुबाहु की राजधानी पहुँचे। वहाँ उनके सारथि विशोक तथा इन्द्रसेन आदि अनुचर उनसे आ मिले। एक रात ठहरकर, सब रथों और रथियों को साथ लेकर तथा घटोत्कच को विदा करके, वे यमुना के समीप के पर्वत पर पहुँचे, और हिम से ढके शिखरों वाले विशाखयूप वन में, चित्ररथ वन के समान सुन्दर उस स्थान में, एक वर्ष आखेट करते हुए रहे।

A monstrous four-fanged serpent coiling and pinning the mighty Bhima in a dark mountain cave.

उसी पर्वत की एक गुफा में भीम ने भूख से व्याकुल, मृत्यु के समान भयंकर, एक विशाल सर्प को देखा। भीम, जिनमें दस हजार हाथियों का बल था, उस सर्प की पकड़ में आते ही अचेत-से हो गए और स्वयं को मुक्त न कर सके। जनमेजय के पूछने पर वैशम्पायन ने यह कथा विस्तार से कही। भीम वन में आखेट करते हुए घूम रहे थे, अनेक वराह और मृग मारे, और पर्वत-शिखरों पर सिंहनाद करते हुए विचरते रहे। तभी उन्होंने एक पर्वत-गुफा को अपने शरीर से ढके हुए, चार दाँतों, चमकती आँखों और ताम्र-मुख वाले उस गोग्रासी सर्प को देखा। भीम के समीप आते ही सर्प ने उन्हें अपनी कुण्डली में जकड़ लिया। उस सर्प को प्राप्त वरदान के कारण भीम का सम्पूर्ण बल जाता रहा, और वे विवश हो गए।

समझने की कुंजी (वंश): यह सर्प कोई साधारण प्राणी नहीं, अपितु पूर्वज राजर्षि नहुष हैं, जो आयु के पुत्र और चन्द्रवंश में पाँचवें थे। तीनों लोकों का अधिपति बनकर अहंकार में उन्होंने ब्राह्मणों का अपमान किया, और अगस्त्य के शाप से सर्प बन गए। पाण्डव इन्हीं के वंशज हैं, अतः भीम उनके अग्रज-तुल्य गोत्रज हैं।

नहुष का शाप और युधिष्ठिर के प्रश्नोत्तर

भीम ने सर्प से पूछा कि वह कौन है और दस हजार हाथियों के बल वाले उन्हें कैसे वश में कर सका। सर्प ने भीम को छोड़कर केवल भुजाएँ मुक्त कीं और कहा कि सौभाग्य से आज भूखे उसे भोजन मिला है, क्योंकि प्राण सबको प्रिय हैं। उसने अपनी कथा सुनाई कि वह राजर्षि नहुष है, जो अगस्त्य के शाप से सर्प बना। गिरते समय उसने अगस्त्य से शाप-मुक्ति की प्रार्थना की थी, और दयालु ऋषि ने कहा था कि जो आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध को जानकर उसके प्रश्नों का उत्तर देगा, वही उसे मुक्त करेगा; और जो भी उसकी पकड़ में आएगा, चाहे उससे बलवान् क्यों न हो, अपना बल खो देगा।

भीम ने कहा कि वे न क्रोधित हैं, न स्वयं को दोष देते हैं, क्योंकि सुख-दुःख मनुष्य के वश में सदा नहीं रहते। उन्होंने कहा कि वे अपने वध का इतना शोक नहीं करते, जितना अपने भाइयों का, जो राज्य से वंचित होकर वन में हैं और उन्हें ढूँढते हुए व्याकुल होंगे। इसी बीच, उधर युधिष्ठिर अपशकुनों से चिन्तित हो उठे। दिशाएँ धधक रही थीं, गीदड़ दाहिनी ओर अमंगल स्वर कर रहे थे, और सूर्य की ओर मुँह किए रक्त वमन करते एक पंख, एक नेत्र और एक पैर वाले विकट पक्षी दिख रहे थे। युधिष्ठिर ने द्रौपदी से भीम के विषय में पूछा, और जानकर कि वे बहुत पहले निकल गए हैं, धौम्य को साथ लेकर भीम के पदचिह्नों पर चल पड़े। अन्ततः उन्होंने एक पर्वत-गुफा में भीम को सर्प की कुण्डली में जकड़ा हुआ पाया।

युधिष्ठिर ने सर्प से प्रार्थना की कि वह भीम को छोड़ दे, बदले में उसे अन्य भोजन दिया जाएगा। सर्प ने कहा कि यह राजपुत्र स्वयं उसके मुख तक आया है, अतः वह इसे नहीं छोड़ेगा, और यदि युधिष्ठिर भी रुके तो कल वही उसका आहार बनेंगे; पर यदि युधिष्ठिर उसके प्रश्नों का उत्तर दे दें, तो वह भीम को मुक्त कर देगा। युधिष्ठिर ने प्रश्न पूछने को कहा।

सर्प ने पूछा कि ब्राह्मण कौन है और जानने योग्य क्या है। युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि जिसमें सत्य, दान, क्षमा, सदाचार, अहिंसा, तप और दया दिखाई दे, वही ब्राह्मण है; और जानने योग्य वह परम ब्रह्म है, जिसमें न सुख है न दुःख, और जिसे पाकर प्राणी दुःख से अछूते रहते हैं। सर्प ने प्रतिप्रश्न किया कि ये गुण तो शूद्र में भी दिख सकते हैं, और ऐसी कोई वस्तु नहीं जो सुख-दुःख दोनों से रहित हो। युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि ब्राह्मण और शूद्र के लक्षण एक नहीं होते, और मनुष्य केवल जन्म से ब्राह्मण या शूद्र नहीं होता, अपितु आचरण से होता है। उन्होंने कहा कि चारों वर्णों के परस्पर मिश्रण के कारण जन्म से जाति का निर्णय कठिन है, अतः बुद्धिमानों ने आचरण को ही मुख्य माना है; जो पवित्र और सदाचारी आचरण करता है, वही ब्राह्मण है।

समझने की कुंजी (अवधारणा): यह संवाद महाभारत के उन स्थलों में है जहाँ जाति को जन्म नहीं, अपितु आचरण और गुण से जोड़ा गया है। युधिष्ठिर का मत है कि सत्य, दान, क्षमा और तप जैसे गुण ही ब्राह्मणत्व के लक्षण हैं, केवल कुल नहीं।

तब सर्प ने मोक्ष का साधन पूछा। युधिष्ठिर ने कहा कि जो योग्य पात्रों को दान देता है, मधुर और सत्य बोलता है, और किसी प्राणी की हिंसा नहीं करता, वह स्वर्ग जाता है। सर्प ने सत्य और दान, मधुर वचन और अहिंसा में श्रेष्ठता का अन्तर पूछा, तो युधिष्ठिर ने कहा कि इनका मूल्य उनके प्रभाव और उपयोगिता से तय होता है, कभी सत्य श्रेष्ठ है तो कभी दान, कभी अहिंसा तो कभी सुवचन। फिर देहधारी आत्मा के पुनर्जन्म, इन्द्रिय-बोध, और कर्मफल के विषय में गहन प्रश्नोत्तर हुए। सर्प ने कहा कि मनुष्य अपने कर्मों से मनुष्य, देव या निम्न योनि को प्राप्त होता है; क्रोध, लोभ और द्वेष में डूबा प्राणी पशु-योनि में जाता है, और पशु भी मनुष्य या देव-अवस्था को प्राप्त हो सकते हैं। ज्ञानी पुरुष अपनी आत्मा को सनातन परमात्मा में स्थिर करता है।

आत्मा की इन्द्रिय-बोध-प्रक्रिया पर सर्प ने कहा कि आत्मा शरीर रूपी आश्रय लेकर इन्द्रियों के माध्यम से विषयों को जानता है। मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ आत्मा की सहायक ‘करण’ कही जाती हैं। मन एक समय में एक ही वस्तु जान सकता है, और योगी भृकुटि के मध्य स्थित आत्मा से उच्च-नीच बुद्धि को विभिन्न विषयों में भेजता है। मन और बुद्धि के भेद पर सर्प ने कहा कि बुद्धि कर्म से प्रकट होती है, मन स्वयंसिद्ध है; बुद्धि संवेदना (सुख-दुःख) उत्पन्न नहीं करती, मन करता है, यही दोनों का भेद है।

युधिष्ठिर ने आश्चर्य से पूछा कि सर्प इतना ज्ञानी होकर भी माया में कैसे पड़ गया, जबकि वह कभी स्वर्ग में रहा था। सर्प ने उत्तर दिया कि समृद्धि बुद्धिमानों और वीरों को भी उन्मत्त कर देती है, और विलास में रहने वाले विवेक खो देते हैं; इसी ऐश्वर्य के मद ने उसे पतित किया। उसने बताया कि स्वर्ग में रथ पर चढ़कर वह ब्रह्मर्षियों, देवों, यक्षों, गन्धर्वों से कर वसूलता था, और हजारों ब्रह्मर्षि उसका रथ खींचते थे। एक दिन अगस्त्य रथ खींच रहे थे, और नहुष का पैर उनके शरीर से छू गया; क्रोध में अगस्त्य ने शाप दिया कि वह सर्प बन जाए। तब अगस्त्य ने ही कहा था कि धर्मात्मा युधिष्ठिर उसे इस शाप से मुक्त करेंगे, और उसका अहंकार-जनित पाप समाप्त होने पर उसे मोक्ष मिलेगा। यही सोचकर उसने युधिष्ठिर से परमात्मा और ब्राह्मणत्व के प्रश्न पूछे।

यह कहकर नहुष ने सर्प-रूप त्यागकर अपना दिव्य रूप धारण किया और स्वर्ग को लौट गए। भीम मुक्त हो गए। युधिष्ठिर धौम्य और भीम के साथ आश्रम लौटे और सब ब्राह्मणों को यह वृत्तान्त सुनाया। यह सुनकर तीनों भाई, ब्राह्मणगण और द्रौपदी लज्जित हुए, और ब्राह्मणों ने भीम को ऐसे दुस्साहस से दूर रहने का परामर्श दिया। भीम के सकुशल लौटने से सब प्रसन्न होकर वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे।

सार: सर्प-रूपी पूर्वज नहुष ने भीम को जकड़ लिया, क्योंकि अगस्त्य के शाप से उसकी पकड़ में आते ही बलवान् भी निर्बल हो जाता था। शाप-मुक्ति की शर्त थी आत्मा-परमात्मा के प्रश्नों के उत्तर। युधिष्ठिर के विवेकपूर्ण उत्तरों से नहुष मुक्त होकर स्वर्ग लौटे और भीम बच गए। यहाँ अहंकार के पतन और ज्ञान से उद्धार का गूढ़ संदेश है।

वर्षा-ऋतु और काम्यक वन में वापसी

उसी स्थान पर रहते हुए वर्षा-ऋतु आई, जो ग्रीष्म का अन्त करती और सब प्राणियों को प्रिय है। काले मेघ दिन-रात गरजते हुए बरसते रहे; बिजली की निर्मल आभा सूर्य के तेज का स्थान ले रही थी; पृथ्वी घास, कीट-पतंगों और सरीसृपों से भर गई। जब जल ने सब ढक लिया, तो भूमि के समतल-विषम, नदी-वृक्ष-पर्वत का भेद ही न रहा। फुफकारते सर्पों के समान वेग से बहती नदियों ने वनों की शोभा बढ़ाई, और चातक, मयूर, कोकिल तथा प्रसन्न मेंढक आनन्द से दौड़ने लगे। फिर शरद् ऋतु आई, जो हंस और सारसों से भरी, धूलि-रहित, मेघों से शीतल, ग्रहों-तारों और चन्द्रमा से सुशोभित थी। सरस्वती नदी के तट पर, जिसका जल नीलाकाश-समान निर्मल था, पाण्डवों ने शरद् की पूर्णिमा (कार्तिक मास की पवित्र रात्रि) धर्मात्मा साधुओं के साथ बिताई।

कृष्णपक्ष आते ही पाण्डव अर्जुन, सारथियों और रसोइयों सहित काम्यक वन में लौट आए। वहाँ साधुओं ने उनका सत्कार किया, और वे द्रौपदी सहित सुखपूर्वक रहने लगे। एक ब्राह्मण ने कहा कि अर्जुन के प्रिय मित्र, शूरवंश के, उच्च-बुद्धि श्रीकृष्ण शीघ्र आएँगे, क्योंकि हरि सदा उनके दर्शन को उत्सुक और उनके हित में रहते हैं; और बहुत वर्षों तक तप और स्वाध्याय में लीन रहने वाले महर्षि मार्कण्डेय भी शीघ्र पधारेंगे।

उसी क्षण शैव्य और सुग्रीव नामक घोड़ों से जुते रथ पर, सत्यभामा सहित, देवकी-पुत्र श्रीकृष्ण वहाँ आ पहुँचे। रथ से उतरकर उन्होंने युधिष्ठिर और भीम को प्रणाम किया, धौम्य का सम्मान किया, और जुड़वाँ भाइयों के प्रणाम स्वीकार किए। घुँघराले केश वाले अर्जुन को उन्होंने बार-बार गले लगाया, और द्रौपदी को सान्त्वना दी। सत्यभामा ने भी द्रौपदी को आलिंगन किया। अर्जुन के साथ संयुक्त श्रीकृष्ण की शोभा कार्तिकेय के साथ शिव के समान थी। अर्जुन ने वन का सम्पूर्ण वृत्तान्त श्रीकृष्ण को सुनाया और सुभद्रा तथा अभिमन्यु की कुशल पूछी।

श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर की प्रशंसा करते हुए कहा कि धर्म ही राज्य-लाभ से श्रेष्ठ है, और युधिष्ठिर ने सत्य और निष्ठा से इस लोक और परलोक दोनों को जीत लिया है। उन्होंने कहा कि जब कुरुजांगल के लोगों ने सभा में द्रौपदी का अपमान देखा, तब युधिष्ठिर के अतिरिक्त कौन उस अधर्म को सह सकता था। श्रीकृष्ण ने आश्वासन दिया कि प्रतिज्ञा की अवधि पूरी होते ही दशार्ह, कुकुर और अन्धक वीर युधिष्ठिर की आज्ञा से दुर्योधन और उसके अनुयायियों का दमन करेंगे, और हस्तिनापुर उनके लिए तैयार किया जाएगा। उन्होंने द्रौपदी से कहा कि उसके पुत्र अनार्त देश में, वृष्णियों के बीच, रुक्मिणी-पुत्र प्रद्युम्न के संरक्षण और शिक्षा में अस्त्र-विद्या सीख रहे हैं और सुभद्रा उनका सावधानी से पालन कर रही है। युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर कहा कि श्रीकृष्ण ही पाण्डवों के आश्रय हैं, और समय आने पर वे वही करेंगे जो उन्होंने कहा, अथवा उससे भी अधिक।

समझने की कुंजी (वंश): श्रीकृष्ण दशार्ह (यदुवंश) के अग्रणी हैं। द्रौपदी के पाँच पुत्र इस समय द्वारका में सुभद्रा और अभिमन्यु के साथ हैं, और रुक्मिणी-पुत्र प्रद्युम्न उनके अस्त्र-गुरु हैं। सत्यभामा श्रीकृष्ण की प्रिय पत्नी हैं।

मार्कण्डेय का आगमन और कर्मफल का उपदेश

वन में युधिष्ठिर हाथ पसारे कृष्ण, वीणाधारी नारद और मुनियों का स्वागत करते, पीछे पांडव और द्रौपदी।

इसी बीच महर्षि मार्कण्डेय वहाँ पधारे, जो तप में जर्जर होकर भी सहस्रों वर्ष जी चुके थे, फिर भी पच्चीस वर्ष के युवक-से दिखते थे, अमर और सद्गुणी थे। सब ब्राह्मणों, श्रीकृष्ण और पाण्डवों ने उनका सत्कार किया। देवर्षि नारद भी पधारे, और उनकी अनुमति से मार्कण्डेय ने कथा सुनाने का निश्चय किया। युधिष्ठिर ने उनसे पूछा कि जब वे स्वयं दुःखी हैं और दुष्ट-आचरण वाले धृतराष्ट्र-पुत्र सब प्रकार से फल-फूल रहे हैं, तो क्या मनुष्य ही अपने शुभ-अशुभ कर्मों का कर्ता और भोक्ता है; ईश्वर का कर्तृत्व कैसा है; और कर्म इस लोक में फल देते हैं या परलोक में।

मार्कण्डेय ने कहा कि प्रजापति ने आदि में सब प्राणियों के लिए निर्मल, पवित्र और धर्म की ओर प्रवृत्त शरीर रचे थे। प्राचीन मनुष्य सत्यवादी, पवित्र और देवतुल्य थे, इच्छानुसार आकाश में आते-जाते, अपने जीवन-मृत्यु पर अधिकार रखते, और सहस्रों वर्ष जीते थे। फिर काल-क्रम से वे काम और क्रोध के वश होकर, असत्य और छल का आश्रय लेकर, केवल भूमि पर चलने तक सीमित हो गए, और दुष्कर्मों से नरक तथा निम्न योनियों में जाने लगे। मार्कण्डेय ने कहा कि प्रत्येक प्राणी की मृत्यु के बाद की गति उसके कर्मों से ही तय होती है। मनुष्य अपने सूक्ष्म शरीर के साथ पुण्य-पाप का भण्डार लिए रहता है, और स्थूल शरीर त्यागकर तुरन्त दूसरी योनि में जन्म लेता है; एक क्षण भी वह अस्तित्वहीन नहीं रहता, और उसके कर्म छाया की भाँति उसका अनुसरण करते हैं।

मार्कण्डेय ने बताया कि जो उच्च तप, सत्य, योग, क्षमा और संयम से युक्त होते हैं, वे रोग, भय और शोक से मुक्त होकर, गर्भ में या जन्म के समय भी आत्मा का परमात्मा से सम्बन्ध पहचान लेते हैं, और कर्म-क्षेत्र को पार करके देवलोक को लौट जाते हैं। कुछ मनुष्य इस लोक में सुख पाते हैं पर परलोक में नहीं, कुछ परलोक में पाते हैं पर इस लोक में नहीं, कुछ दोनों में, और कुछ किसी में नहीं। जो धर्मपूर्वक धन कमाकर विवाह और यज्ञ करते हैं, वे दोनों लोकों में सुख पाते हैं। मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर को आश्वासन दिया कि पाण्डव दुष्टों के संहार और देवकार्य के लिए ही इस लोक में जन्मे हैं, और अपने कर्मों से अन्ततः परम धाम पाएँगे, अतः इन कष्टों पर वे संदेह न करें, क्योंकि यह क्लेश उनके हित के लिए ही है।

समझने की कुंजी (अवधारणा): मार्कण्डेय चिरंजीवी ऋषि हैं, जिन्होंने अनेक प्रलय और सृष्टि-चक्र देखे हैं। उनके उपदेश का सार यह है कि सूक्ष्म शरीर के साथ कर्म-संस्कार अगले जन्म तक जाते हैं, और मनुष्य की गति उसके अपने कर्मों से निर्धारित होती है, न कि अकारण भाग्य से।

ब्राह्मण-महिमा की कथाएँ

पाण्डवों के अनुरोध पर मार्कण्डेय ने ब्राह्मण-महिमा की कथाएँ सुनाईं। एक हैहयवंशी राजकुमार ने आखेट में, कृष्णमृग-चर्म ओढ़े एक मुनि को मृग समझकर मार डाला। पश्चात्ताप से व्याकुल होकर वह हैहय-प्रमुखों के पास गया, और सब मिलकर मुनि के कुल की खोज में कश्यप-पुत्र अरिष्टनेमि (ताक्ष्र्य) के आश्रम पहुँचे। उन्होंने अपना अपराध बताया कि उन्होंने एक ब्राह्मण को मार डाला है। पर लौटकर देखा तो वह शव वहाँ नहीं था। ताक्ष्र्य ने बताया कि वह मारा गया ब्राह्मण उन्हीं का पुत्र था, जो जीवित खड़ा था। चकित राजकुमारों के पूछने पर ताक्ष्र्य ने कहा कि उनके कुल पर मृत्यु का अधिकार नहीं, क्योंकि वे अपने धर्म का पालन करते, ब्राह्मणों का कभी अनिष्ट नहीं सोचते, अतिथियों और आश्रितों को भोजन कराकर बचा हुआ स्वयं खाते, शान्त, तपस्वी, दानशील और तीर्थसेवी हैं। यह सुनकर राजकुमार सांसारिक मोह से मुक्त होकर लौट गए।

फिर मार्कण्डेय ने अत्रि और वैन्य की कथा सुनाई। राजर्षि वैन्य अश्वमेध कर रहे थे, और महर्षि अत्रि याचना के लिए वहाँ गए। सभा में अत्रि ने वैन्य की प्रशंसा करते हुए उन्हें सब राजाओं में श्रेष्ठ और धर्मज्ञान में अद्वितीय कहा। इस पर गौतम ऋषि ने रुष्ट होकर कहा कि मात्र महेन्द्र ही सब प्राणियों के स्वामी हैं। अत्रि और गौतम में विवाद हुआ। निर्णय के लिए मुनिगण सनत्कुमार के पास गए, जिन्होंने कहा कि जैसे वायु से सहायता पाई अग्नि वन को जला देती है, वैसे ही ब्राह्मण-तेज और क्षत्रिय-तेज मिलकर शत्रुओं का नाश करते हैं। राजा प्रजा का रक्षक और धर्म का प्रवर्तक है, अतः वह भी ‘मनुष्यों के भाग्य का विधाता’ कहलाता है। इस निर्णय से प्रसन्न होकर वैन्य ने अत्रि को सौ करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ और दस भार सोना दिया, जिसे अत्रि ने पुत्रों में बाँटकर वन को प्रस्थान किया।

तदनन्तर मार्कण्डेय ने सरस्वती और ताक्ष्र्य का संवाद सुनाया, जिसमें ताक्ष्र्य ने पूछा कि मनुष्य के लिए श्रेष्ठ कर्म क्या है और धर्म से च्युत हुए बिना कैसे आचरण किया जाए। सरस्वती ने वेदाध्ययन, पवित्रता और समभाव से परमात्मा के दर्शन की महिमा बताई, और गो-दान का माहात्म्य कहा, कि गो-दान से मनुष्य उच्चतम लोक पाता है और सात पीढ़ियों तक अपने वंश को तार देता है। भूमि-दान और कन्या-दान का भी पुण्य बताया गया।

एक उप-कथा: अरिष्टनेमि के कुल पर मृत्यु का अधिकार क्यों नहीं। ताक्ष्र्य ने जो कारण गिनाए, स्वधर्म-पालन, ब्राह्मणों के प्रति सद्भाव, अतिथि-सेवा, शान्ति, दान, तीर्थ-वास और सत्पुरुषों के बीच निवास, वे ही उस कुल को मृत्यु के भय से मुक्त रखते हैं। यह कथा कहती है कि धर्माचरण ही जीवन-मृत्यु पर विजय का मूल है।

वैवस्वत मनु और मत्स्य की कथा

युधिष्ठिर के अनुरोध पर मार्कण्डेय ने वैवस्वत मनु की कथा कही। विवस्वान् (सूर्य) के पुत्र मनु, ब्रह्मा के समान तेजस्वी थे, और विशाला नामक बेर-वन में चिरिणी नदी के तट पर, एक पैर पर खड़े होकर, मस्तक नीचे किए, दस सहस्र वर्ष तक कठोर तप करते रहे। एक दिन एक छोटी मछली ने उनसे प्रार्थना की कि बड़ी मछलियाँ उसे खा जाती हैं, अतः वे उसकी रक्षा करें, और वह उनका प्रत्युपकार करेगी। दयालु मनु ने उसे जल से निकालकर एक घड़े में रखा। मछली बढ़ती गई, तो उन्होंने उसे तालाब में, फिर गंगा में, और अन्ततः समुद्र में छोड़ा।

समुद्र में छोड़े जाने पर मछली ने मुस्कुराकर कहा कि मनु ने उसकी विशेष रक्षा की है, अतः वह उन्हें भविष्य का हित बताती है, कि शीघ्र ही इस चर-अचर जगत् का प्रलय होने वाला है। उसने मनु को आदेश दिया कि वे एक दृढ़ विशाल नौका बनाएँ, उसमें एक लम्बी रस्सी बाँधें, सप्तर्षियों के साथ उस पर चढ़ें, और प्राचीन ब्राह्मणों के गिनाए सब बीज सावधानी से साथ रख लें; और जब वह सींग वाले प्राणी के रूप में आए, तब उसे पहचान लें। मनु ने उसकी बात मान ली। समय आने पर सब ओर जल ही जल हो गया, और मनु ने अपनी नौका सींग वाली उस विशाल मछली के सींग में रस्सी का फन्दा बाँध दिया।

The giant horned fish towing Manu's boat with the seven sages across the flood to the Himalayan peak of Naubandhana.

मछली ने नौका को खारे जल पर वेग से खींचा। आँधी में नौका मतवाली-सी डगमगाती रही, और न भूमि दिखती थी, न दिशाएँ; सर्वत्र जल था, जो स्वर्ग और अन्तरिक्ष तक छा गया। संसार में मनु, सप्तर्षि और वह मछली, बस यही दिखाई देते थे। अनेक वर्षों तक मछली नौका को खींचकर हिमवान् के सर्वोच्च शिखर तक ले गई, और वहाँ नौका बाँध देने को कहा। उस शिखर को आज भी नौबन्धन कहते हैं। तब मछली ने ऋषियों से कहा कि वह स्वयं सब प्राणियों का स्वामी ब्रह्मा है, जिसने मत्स्य-रूप धरकर उन्हें इस प्रलय से बचाया; अब मनु तप के बल से देव, असुर और मनुष्य सहित समस्त चर-अचर सृष्टि की पुनर्रचना करेंगे। यह कहकर मछली अन्तर्धान हो गई, और मनु ने तप करके पुनः सृष्टि रची।

समझने की कुंजी (स्थान): नौबन्धन हिमवान् का वह शिखर है जहाँ प्रलय-काल में मनु की नौका बाँधी गई थी, अर्थात् ‘नौका के बन्धन का स्थान’। यह मत्स्य-अवतार और जल-प्रलय की वही प्राचीन कथा है, जिसका वर्णन यहाँ मार्कण्डेय करते हैं।

युगों का चक्र और कलि के लक्षण

युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय की दीर्घ-आयु पर आश्चर्य प्रकट किया कि उन्होंने अनेक प्रलय देखे हैं, और महाप्रलय के समय जब आकाश, देव और दानव सब लुप्त हो जाते हैं, तब वे अकेले ब्रह्मा की उपासना करते हैं और सृष्टि के पुनरारम्भ को देखते हैं। मार्कण्डेय ने उस आदि, सनातन, अविनाशी, गुणसहित और गुणरहित परमात्मा को प्रणाम करके कहा कि पीताम्बरधारी जनार्दन ही सबके कर्ता, आत्मा और स्वामी हैं, जो अनादि-अनन्त, सबमें व्याप्त, अपरिवर्तनशील और सबके कारण हैं।

फिर मार्कण्डेय ने युगों का मान बताया। कृतयुग चार सहस्र वर्ष का है, जिसकी सन्ध्या और सन्ध्यांश चार-चार सौ वर्ष के हैं। त्रेता तीन सहस्र वर्ष का, सन्ध्या-सन्ध्यांश तीन-तीन सौ का; द्वापर दो सहस्र वर्ष का, सन्ध्या-सन्ध्यांश दो-दो सौ का; और कलि एक सहस्र वर्ष का, सन्ध्या-सन्ध्यांश सौ-सौ का। इन चारों का एक चक्र बारह सहस्र वर्ष का होता है, और ऐसे एक सहस्र चक्र ब्रह्मा का एक दिन बनाते हैं। जब समस्त ब्रह्माण्ड स्वयं ब्रह्मा में समा जाता है, तब उसे विद्वान् ‘प्रलय’ कहते हैं।

कलि के अन्त के निकट मनुष्य असत्य में प्रवृत्त होते हैं, यज्ञ और दान प्रतिनिधियों से कराए जाते हैं, ब्राह्मण शूद्रोचित कर्म करते हैं और शूद्र धन-संचय करते हैं। ब्राह्मण वेद और यज्ञ त्याग देते हैं, सर्वभक्षी हो जाते हैं, और शूद्र तप-ध्यान में लग जाते हैं। म्लेच्छ राजा पृथ्वी पर शासन करते हैं, और आन्ध्र, शक, पुलिन्द, यवन, काम्बोज, वाह्लीक तथा आभीर राज्य पाते हैं। मनुष्य अल्पायु, दुर्बल और छोटे शरीर वाले हो जाते हैं, सत्य से दूर होते हैं। सात-आठ वर्ष की कन्याएँ गर्भवती होती हैं, दस-बारह वर्ष के बालक सन्तान उत्पन्न करते हैं, और सोलहवें वर्ष में मनुष्य वृद्ध हो जाते हैं। व्यापारी झूठे माप-तौल से ठगते हैं, धर्मात्मा निर्धन और अल्पजीवी होते हैं, और पापी समृद्ध तथा दीर्घजीवी। इन्द्र ऋतु के अनुसार वर्षा नहीं करते, और बोए बीज भी नहीं उगते। ये सब महाप्रलय के अग्रदूत लक्षण हैं।

समझने की कुंजी (संख्या): चार युगों का एक चक्र बारह सहस्र दिव्य वर्ष का है। एक सहस्र ऐसे चक्र ब्रह्मा का एक दिन बनाते हैं, जिसके अन्त में प्रलय आता है। कलियुग का वर्णन यहाँ नैतिक पतन और प्राकृतिक विपर्यय के लक्षणों से किया गया है, जो सृष्टि-संहार के संकेत हैं।

प्रलय का दर्शन और वटपत्र पर बालक

मार्कण्डेय ने प्रलय का वर्णन किया। चारों युगों के सहस्रों वर्षों के अन्त में अनेक वर्ष का भयंकर अनावृष्टि-काल आता है, और दुर्बल प्राणी भूख से सहस्रों की संख्या में मर जाते हैं। फिर आकाश में सात धधकते सूर्य प्रकट होकर नदियों और समुद्रों का सम्पूर्ण जल पी जाते हैं, और गीला-सूखा सब काष्ठ-तृण भस्म कर देते हैं। तब वायु से प्रेरित संवर्तक नामक अग्नि प्रकट होती है, जो पाताल तक प्रवेश करके देव, दानव और यक्षों के हृदय में भय भर देती है, और सहस्रों योजन तक फैले इस ब्रह्माण्ड को क्षण भर में भस्म कर देती है।

तब आकाश में हाथियों के झुंड-समान, बिजली की मालाओं से सजे, गहरे मेघ उठते हैं, जिनमें कुछ नीलकमल के, कुछ कुमुद के, कुछ कमल-तन्तु के, कुछ बैंगनी, कुछ हल्दी-से पीले रंग के होते हैं। ये भयंकर गर्जते मेघ समस्त आकाश को ढककर पर्वतों, वनों और खानों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी को जल से डुबो देते हैं, और उस भयंकर संवर्तक-अग्नि को बुझा देते हैं। ये मेघ बारह वर्ष तक अविराम बरसते हैं। तब समुद्र अपनी सीमाएँ लाँघ जाता है, पर्वत टूटकर बिखर जाते हैं, और पृथ्वी जल में डूब जाती है। फिर वायु के वेग से वे मेघ भी आकाश में विलीन हो जाते हैं। तब स्वयम्भू, कमल पर निवास करने वाले आदिकारण प्रभु, उन भयंकर वायुओं को पीकर निद्रा में लीन हो जाते हैं।

प्रलय के अथाह सागर में युवा मार्कण्डेय ऊंची लहरों के बीच तैरते हुए, आकाश मेघों से घिरा।

मार्कण्डेय ने अपना अनुभव सुनाया कि जब समस्त ब्रह्माण्ड एक अथाह जल-राशि बन जाता है, सब चर-अचर, देव-असुर, यक्ष-राक्षस, मनुष्य, वृक्ष और आकाश तक नष्ट हो जाते हैं, तब वे अकेले उस भयंकर जल-विस्तार में व्यथित होकर भटकते रहते हैं, किसी प्राणी को न देखकर थक जाते हैं, पर विश्राम का स्थान नहीं पाते। कुछ काल बाद उन्हें उस जल में एक विशाल फैला हुआ वटवृक्ष दिखता है। उस वट की एक दूर तक फैली शाखा पर, दिव्य शय्या से ढके एक पर्यंक पर, कमल या चन्द्रमा के समान मुख और पूर्ण-विकसित कमल-पत्र के समान विशाल नेत्रों वाला एक बालक बैठा था।

मार्कण्डेय को विस्मय हुआ कि जब संसार ही नष्ट हो गया, तब यह बालक अकेला यहाँ कैसे बैठा है। यद्यपि वे भूत, भविष्य और वर्तमान के ज्ञाता थे, फिर भी तप-ध्यान से इसका रहस्य न जान सके। अलसी-पुष्प के समान कान्ति वाले और श्रीवत्स-चिह्न से अंकित वह बालक साक्षात् लक्ष्मी का धाम-सा प्रतीत हुआ। बालक ने मधुर वाणी में कहा, “हे मार्कण्डेय, हम जानते हैं कि आप थके हुए और विश्राम के इच्छुक हैं। आप जितना चाहें यहाँ विश्राम करें। हे मुनिश्रेष्ठ, हमारे शरीर में प्रवेश करके वहीं विश्राम कीजिए, यही स्थान हमने आपके लिए नियत किया है, क्योंकि हम आप पर प्रसन्न हैं।”

विराट बालक के खुले मुख में समाते मार्कण्डेय, नीचे पांडव, द्रौपदी और कृष्ण यह दृश्य निहारते।

यह सुनते ही मार्कण्डेय की अपनी दीर्घ-आयु और मनुष्यत्व के प्रति उपेक्षा-सी जाग उठी। तब बालक ने अकस्मात् अपना मुख खोला, और मार्कण्डेय विवश होकर उसके मुख में प्रवेश कर गए। बालक के उदर में पहुँचकर उन्होंने नगरों और राज्यों से भरी समस्त पृथ्वी देखी। वहाँ उन्हें गंगा, यमुना, सरस्वती, सिन्धु, गोदावरी, नर्मदा, कावेरी आदि अनेक नदियाँ; मगरों और शार्कों से भरा रत्न-आकर समुद्र; सूर्य-चन्द्र से सुशोभित आकाश; वन-उपवन से सजी पृथ्वी; यज्ञरत ब्राह्मण, परोपकारी क्षत्रिय, कृषिरत वैश्य और सेवारत शूद्र दिखाई दिए। उन्होंने हिमवान्, हेमकूट, निषध, श्वेत, गन्धमादन, मन्दर, नील, मेरु, महेन्द्र, विन्ध्य, मलय और पारियात्र पर्वत; तथा सिंह, व्याघ्र, वराह आदि सब प्राणी देखे। उन्होंने इन्द्र सहित देवगण, साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, नाग, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, ऋषि, और दैत्य-दानवों के समूह, सब उस बालक के उदर में देखे।

फलों पर निर्वाह करते हुए मार्कण्डेय अनेक शताब्दियों तक उस शरीर में घूमते रहे, पर उसकी सीमा न पा सके। अन्ततः चिन्तित होकर उन्होंने उस वरदायी देव की शरण ली, और उसकी श्रेष्ठता स्वीकार की। तब वायु के झोंके से वे बालक के खुले मुख से बाहर निकल आए, और पुनः उसी वट की शाखा पर बैठे, समस्त ब्रह्माण्ड को निगल चुके, श्रीवत्स-चिह्नित, पीताम्बरधारी उसी अपार-तेजस्वी बालक को देखा। बालक ने मुस्कुराकर कहा कि मार्कण्डेय उसके शरीर में रहकर थक गए हैं। उसी क्षण मार्कण्डेय को एक नवीन दृष्टि प्राप्त हुई, जिससे वे सत्यज्ञान से युक्त और सांसारिक माया से मुक्त हो गए।

मार्कण्डेय ने ताम्र-समान चरणों वाले उस दिव्य पुरुष के चरण अपने मस्तक पर रखकर, हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि वे उस देव और उसकी इस अद्भुत माया को जानना चाहते हैं, कि उसके शरीर में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड क्यों है, वह बालक-रूप में जगत् को निगलकर यहाँ क्यों स्थित है, और कब तक रहेगा। यहीं पर इस खण्ड की कथा उस परम रहस्य के द्वार पर पहुँचती है, जहाँ चिरंजीवी ऋषि साक्षात् नारायण से उनके स्वरूप का परिचय माँग रहे हैं।

सार: मार्कण्डेय ने प्रलय का प्रत्यक्ष दर्शन सुनाया, सात सूर्य, संवर्तक-अग्नि, बारह वर्ष की महावृष्टि, और सर्वत्र जल। उस एकमात्र जल-विस्तार में उन्हें वटपत्र पर श्रीवत्स-चिह्नित बालक (नारायण) मिला, जिसके उदर में उन्होंने समस्त नदियाँ, पर्वत, देव और प्राणी देखे। यह वह परम दृश्य है जहाँ संहार के बीच भी सृष्टि का बीज उस आदि-बालक में सुरक्षित रहता है।

प्रलय का जल और बरगद पर बैठा बालक

मार्कण्डेय मुनि (एक चिरंजीवी ऋषि, जो अनेक कल्पों से जीवित हैं) पाण्डवों के बीच बैठे हुए कह रहे थे, और राजा युधिष्ठिर तथा उनके भाई, द्रौपदी सहित, सुन रहे थे। मुनि ने कहा, “हे पृथ्वी के स्वामी, जब यह सारा विश्व एक मृत जल-विस्तार बन जाता है, जब चर और अचर सब प्राणी नष्ट हो चुके होते हैं, जब देवता और असुर नहीं रहते, जब यक्ष और राक्षस लुप्त हो जाते हैं, जब मनुष्य नहीं रहता, जब वृक्ष और हिंसक पशु तक मिट जाते हैं, जब आकाश स्वयं भी नहीं रह जाता, तब, हे राजन्, मैं अकेला उस जल पर भटकता हूँ, और दुःख से भरा रहता हूँ। उस भयानक जल-विस्तार पर भटकते हुए किसी जीव को न देखकर हमारा हृदय व्याकुल हो उठता है। बिना रुके उस बाढ़ में घूमते हुए हम थक जाते हैं, परन्तु कहीं विश्राम का स्थान नहीं मिलता।”

जल के बीच वट की डाल पर पत्ते में सोए तेजोमय बालक को मार्कण्डेय विस्मय से देखते।

“फिर कुछ समय के पश्चात् उस संचित जल के विस्तार में हमने एक विशाल और दूर तक फैला हुआ वट-वृक्ष (बरगद) देखा। और उस वट की एक दूर तक गई शाखा पर, एक शंख पर बैठा हुआ, दिव्य शय्या से ढका हुआ, एक बालक हमने देखा, जिसका मुख कमल अथवा चन्द्रमा के समान सुन्दर था और जिसके नेत्र पूर्ण-विकसित कमल की पंखुड़ियों के समान बड़े थे। यह देखकर हमारा हृदय आश्चर्य से भर गया। हमने स्वयं से पूछा, ‘जब संसार ही नष्ट हो गया है, तब यह बालक यहाँ अकेला कैसे बैठा है?’ यद्यपि हमें भूत, वर्तमान और भविष्य का पूर्ण ज्ञान है, फिर भी तप-ध्यान से भी हम इसके विषय में कुछ न जान सके। अलसी (अतसी, एक नीले फूल वाला पौधा) के फूल-सी कान्ति वाला और श्रीवत्स (विष्णु के वक्ष का चिह्न) से अंकित वह बालक हमें लक्ष्मी का निवास-सा प्रतीत हुआ।”

“फिर उस बालक ने कानों को अति प्रिय लगने वाले शब्दों में हमसे कहा, ‘हे आर्य, हम जानते हैं कि आप थके हुए हैं और विश्राम चाहते हैं। हे भृगुवंशी मार्कण्डेय, जितना चाहें यहाँ विश्राम कीजिए। हे मुनिश्रेष्ठ, हमारे शरीर में प्रवेश करके वहीं विश्राम कीजिए। वही स्थान हमने आपके लिए नियत किया है। हम आपसे प्रसन्न हैं।’ उस बालक के यों कहते ही हमें अपने दीर्घ जीवन और अपने पुरुषत्व, दोनों के प्रति पूर्ण उदासीनता का भाव हो आया। तभी उस बालक ने सहसा अपना मुख खोला, और विधि का विधान, हम गति-शक्ति से रहित होकर उसके मुख में प्रवेश कर गए।”

समझने की कुंजी (अवधारणा): यह प्रलय (कल्प के अन्त में सृष्टि का विलय) का दर्शन है। बरगद पर बैठा बालक स्वयं नारायण हैं, जो प्रलय के जल पर बाल-रूप में रहते हैं। ऋषि का उनके मुख में प्रवेश ‘विश्वरूप’ का वह रूप है जिसमें समस्त ब्रह्माण्ड भगवान् के उदर में निवास करता है।

उस बालक के उदर में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड

बालक के उदर में मार्कण्डेय पर्वतों, नदियों, नगरों और तीर्थों से भरा समस्त ब्रह्मांड देखते हुए।

मार्कण्डेय बोले, “हे राजन्, उस बालक के उदर में सहसा प्रवेश करके वहाँ हमने नगरों और राज्यों से भरी समस्त पृथ्वी देखी। उसके उदर में घूमते हुए हमने गंगा, शतद्रु (सतलुज), सीता, यमुना और कौशिकी देखीं; चर्मण्वती (चम्बल), वेत्रवती; चन्द्रभागा (चेनाब), सरस्वती, सिन्धु, विपाशा (व्यास) और गोदावरी; वस्वोकसारा, नलिनी और नर्मदा; ताम्रा और मनोहर धारा वाली वेण्णा; सुवेण्णा, कृष्णवेण्णा, इरामा और महानदी; वितस्ता (झेलम), और वह विशाल नदी कावेरी; तथा विशल्या और किम्पुना भी। ये और इनके सिवा पृथ्वी की अनेक नदियाँ हमने देखीं। हे शत्रुहन्ता, वहाँ हमने नक्र (घड़ियाल) और शार्क मछलियों से भरे, रत्नों की खान-स्वरूप उस समुद्र को भी देखा। आकाश को भी देखा, जो सूर्य और चन्द्रमा से सुशोभित था। वन-कानन से सुशोभित पृथ्वी देखी।”

“और हे राजन्, उसके उदर में हमने अनेक ब्राह्मणों को विविध यज्ञों में लगे हुए देखा; क्षत्रियों को सब वर्णों के हित में संलग्न; वैश्यों को कृषि में लगे हुए; और शूद्रों को द्विजवर्ण की सेवा में रत। उसी उदर में घूमते हुए हमने हिमवान् और हेमकूट पर्वत देखे; निषाध और रजत से भरे श्वेत पर्वत देखे; गन्धमादन, मन्दर और विशाल नील पर्वत; स्वर्णमय मेरु, महेन्द्र, और विन्ध्य; मलय और पारिपात्र भी। ये और पृथ्वी के अनेक पर्वत, सब रत्नों से जड़े हुए, हमने उसके उदर में देखे। सिंह, व्याघ्र, शूकर, और पृथ्वी के समस्त पशु भी।”

“उसके उदर में घूमते हुए हमने इन्द्र के साथ देवताओं का समस्त समूह देखा; साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प और नाग, पक्षी-जाति, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सराएँ, यक्ष, ऋषि, दैत्य और दानवों के दल, सिंहिका के पुत्र, और देवताओं के अन्य शत्रु। चर-अचर जो कुछ पृथ्वी पर देखा जा सकता है, सब हमने उस महात्मा के उदर में देखा। हे प्रभो, फलों पर निर्वाह करते हुए हम अनेक शताब्दियों तक उसके शरीर में रहे, उस सम्पूर्ण विश्व में भ्रमण करते रहे। फिर भी हमने कभी उस शरीर की सीमा न पाई।”

“जब हम उस महात्मा के शरीर की सीमा न माप सके, चित्त में अत्यन्त व्यग्र होकर भी, तब हमने मन, वचन और कर्म से उस वरदायी परम देव की शरण ली, उनकी श्रेष्ठता को स्वीकार करते हुए। और हे राजन्, जैसे ही हमने यह किया, सहसा एक वायु के झोंके से हम उस महात्मा के खुले मुख से बाहर फेंक दिए गए। फिर हमने उसी वट की शाखा पर उसी अपरिमेय तेज वाले को बाल-रूप में बैठा देखा, जिसने सम्पूर्ण विश्व को निगल लिया था।”

समझने की कुंजी (संख्या एवं स्थान): नदियों, पर्वतों और लोकों की यह सूची भारत के समूचे भूगोल और समस्त ब्रह्माण्ड का प्रतीक है, जो एक ही दिव्य देह में समाया हुआ है। ‘अनेक शताब्दियों’ का अर्थ यह कि ऋषि-काल और मानवीय काल यहाँ एक नहीं रहते; ईश्वर के भीतर समय अपने आप विस्तृत हो जाता है।

नारायण की अपनी वाणी में आत्म-कथन

मार्कण्डेय बोले, “पीले वस्त्र पहने, श्रीवत्स से अंकित, प्रज्वलित कान्ति वाले उस बालक ने मुस्कुराते हुए हमसे कहा, ‘हे मार्कण्डेय, हे मुनिश्रेष्ठ, हमारे शरीर में कुछ समय रहकर आप थक गए होंगे। अब हम आपसे कहेंगे।’ उसके यह कहते ही हमें उसी क्षण मानो एक नई दृष्टि प्राप्त हुई, जिससे हमने स्वयं को सच्चे ज्ञान से युक्त और संसार के भ्रम से मुक्त अनुभव किया। तब हमने ताम्रवर्ण तलवों वाले उसके पूज्य चरणों को मस्तक पर रखकर, हाथ जोड़कर पूछा, ‘हे दिव्य पुरुष, हम आपको और आपकी इस अद्भुत माया को जानना चाहते हैं। आपके उदर में हमने सम्पूर्ण विश्व देखा। आप यहाँ बाल-रूप में, सारे ब्रह्माण्ड को निगलकर, क्यों रहते हैं? कब तक रहेंगे? हे कमलनयन, सब कुछ विस्तार से कहिए, क्योंकि जो हमने देखा वह सब अद्भुत और अचिन्त्य है।’”

“तब उस देवाधिदेव ने हमें सान्त्वना देते हुए कहा, ‘हे ब्राह्मण, देवता भी मुझे यथार्थतः नहीं जानते। पर आपसे प्रसन्न होकर हम बताते हैं कि हमने यह विश्व कैसे रचा। प्राचीन काल में हमने जल को नार नाम दिया था, और चूँकि जल सदा हमारा अयन अर्थात् निवास रहा है, इसलिए हम नारायण (जल में निवास करने वाले) कहलाए। हम नारायण हैं, समस्त वस्तुओं के मूल, नित्य, अविकारी। हम ही सबके स्रष्टा हैं और सबके संहारक भी। हम ही विष्णु हैं, हम ही ब्रह्मा हैं, हम ही देवराज इन्द्र। हम ही वैश्रवण (कुबेर) हैं, और हम ही प्रेतलोक के स्वामी यम। हम ही शिव हैं, हम ही सोम, और हम ही प्रजापति कश्यप। अग्नि हमारा मुख है, पृथ्वी हमारे चरण, सूर्य और चन्द्रमा हमारे नेत्र; स्वर्ग हमारे मस्तक का मुकुट, दिशाएँ हमारे कान, और जल हमारे स्वेद से उत्पन्न।’”

“‘शेषनाग का रूप धारण करके चार समुद्रों से घिरी, मेरु और मन्दर से सजी इस पृथ्वी को हम ही अपने मस्तक पर धारण करते हैं। वराह-रूप धारण करके हमने ही जल में डूबी इस पृथ्वी को उठाया था। बड़वानल (समुद्र में स्थित वडवामुख की अग्नि) बनकर हम ही समुद्र के जल को पी जाते हैं और फिर रचते हैं। हमारी ऊर्जा से, हमारे मुख, बाहु, ऊरु और चरणों से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र उत्पन्न हुए। हमीं से ऋक्, साम, यजुस् और अथर्व वेद निकले, और काल आने पर सब हममें ही समा जाते हैं।’”

वटपत्र पर लेटे दिव्य बालक के ऊपर चार युगों के श्वेत, पीत, रक्त और श्याम रूप।

“‘हे ब्राह्मण, धर्म और नीति जब घटते हैं और पाप तथा अनीति बढ़ते हैं, तब हम स्वयं को नए रूपों में रचते हैं। जब क्रूर और दुष्ट दैत्य-राक्षस, जिन्हें देवता भी नहीं मार सकते, पृथ्वी पर जन्म लेते हैं, तब हम सद्पुरुषों के कुलों में जन्म लेकर, मानव शरीर धारण करके, समस्त अनिष्टों का नाश कर शान्ति की स्थापना करते हैं। अपनी माया से हम देव, मनुष्य, गन्धर्व, राक्षस और सब अचर वस्तुओं को रचते हैं, और काल आने पर स्वयं ही उन्हें नष्ट करते हैं। कृत युग में हम श्वेत होते हैं, त्रेता में पीत, द्वापर में रक्त, और कलि में कृष्ण वर्ण के हो जाते हैं।’”

“‘तीन पगों से हम समस्त ब्रह्माण्ड को नाप लेते हैं; हम ही विश्व की आत्मा हैं, समस्त सुख के स्रोत, सब अभिमान के दमनकर्ता; हम सर्वव्यापी, अनन्त, इन्द्रियों के स्वामी हैं। हे ब्राह्मण, हम ही अकेले काल का चक्र चलाते हैं; हम निराकार हैं, सब प्राणियों के संहारक, और सब चेष्टाओं के कारण। हमारी आत्मा समस्त प्राणियों में व्याप्त है, पर हमें कोई नहीं जानता। आपने हमारे उदर में जो भी कष्ट अनुभव किया, हे निष्पाप, वह आपके कल्याण के लिए ही था। हम जो नारायण कहलाते हैं, हम ही शंख, चक्र और गदा के धारक हैं। हे ऋषि, युगों की सहस्र गुनी अवधि तक हम, विश्वात्मा, समस्त प्राणियों को मूर्च्छा में डुबाकर सोते हैं। ब्रह्मा के जागने तक हम वृद्ध होते हुए भी इसी बाल-रूप में रहते हैं।’”

एक उप-कथा: ‘तीन पगों से ब्रह्माण्ड को नापना’ यहाँ वामन-अवतार की ओर संकेत है। उस कथा में विष्णु ने वामन (बौने ब्राह्मण) का रूप धरकर बलि से तीन पग भूमि माँगी थी, और फिर विराट् होकर तीन ही पगों में पृथ्वी, आकाश और पाताल नाप लिए, जिससे देवताओं को असुरों के प्रभुत्व से मुक्ति मिली।

वन में शिला पर बैठे कृष्ण पांडवों और द्रौपदी से संवाद करते हुए, वृक्षों से छनती धूप।

मार्कण्डेय बोले, “यह कहकर वह अद्भुत देव हमारी दृष्टि से अन्तर्धान हो गए। फिर हमने इस विविध और विचित्र सृष्टि को पुनः जीवन में आते देखा। हे भारतश्रेष्ठ, युग के अन्त में हमने यह सब देखा। और वह कमलनयन देव जिन्हें हमने प्राचीन काल में देखा था, ये ही हैं यह नरश्रेष्ठ जनार्दन, जो आपके सम्बन्धी बन चुके हैं। इन्हीं के वरदान से हमारी स्मृति लुप्त नहीं होती, हमारा जीवन इतना दीर्घ है, और मृत्यु हमारे वश में है। ये ही वे प्राचीन परम प्रभु हरि हैं, जिन्होंने वृष्णिवंश में कृष्ण-रूप में जन्म लिया है। हे कुरुश्रेष्ठो, आप सब इन्हीं रक्षक की शरण लीजिए।” यह सुनकर पाण्डव-पुत्रों ने, द्रौपदी सहित, जनार्दन को प्रणाम किया, और कृष्ण ने मधुर वचनों से सबको सान्त्वना दी।

सार: प्रलय के जल पर बरगद की शाखा पर बैठा वह बालक नारायण हैं, जिनके उदर में समस्त नदियाँ, पर्वत, लोक और प्राणी समाए हैं। उन्होंने मार्कण्डेय को अपना आत्म-स्वरूप बताया, अर्थात् वे ही स्रष्टा, पालक और संहारक, और प्रत्येक युग में नए रूपों में अवतरित होते हैं। मार्कण्डेय इसी से पहचानते हैं कि उनके बीच बैठे कृष्ण वही परम प्रभु हैं।

कलियुग की भविष्यवाणी

युधिष्ठिर ने फिर मुनि से पूछा, “हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, युग के अन्त में सबके नाश और पुनर्जन्म का जो आपने बताया, वह आश्चर्य से भरा है। पर मुझे कलियुग के विषय में जिज्ञासा है। जब धर्म और नीति का अन्त हो जाएगा, तब क्या बचेगा? उस युग में मनुष्यों का बल कैसा होगा, उनका आहार क्या, उनके मनोरंजन क्या? युग के अन्त में आयु कितनी होगी? और किस सीमा को पाकर कृत युग नए सिरे से आरम्भ होगा? सब विस्तार से कहिए।”

मार्कण्डेय बोले, “हे राजन्, मेरे देखे, सुने और देवकृपा से अन्तर्ज्ञान से जाने हुए को सुनिए। कृत युग में धर्म, बैल की भाँति, अपने चारों पैरों पर खड़ा था। त्रेता में पाप ने एक पैर हर लिया और धर्म तीन पैरों पर रहा। द्वापर में पाप और धर्म आधे-आधे मिले, और धर्म दो ही पैरों पर रहा। कलि के अन्धकार-युग में, हे भरतश्रेष्ठ, धर्म तीन भाग पाप के साथ रहता है, अतः केवल एक चौथाई अंश ही धर्म का बचता है। हे युधिष्ठिर, जान लीजिए, प्रत्येक युग में मनुष्यों की आयु, ऊर्जा, बुद्धि और शारीरिक बल घटते जाते हैं।”

“कलियुग में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र छल से धर्म का आचरण करेंगे, और लोग धर्म का जाल फैलाकर एक-दूसरे को ठगेंगे। मिथ्या विद्या के अभिमानी अपने कर्मों से सत्य को संकुचित और गुप्त कर देंगे। आयु की अल्पता से वे अधिक ज्ञान न पा सकेंगे, और ज्ञान की अल्पता से उनमें विवेक न रहेगा; इसी से लोभ सब पर छा जाएगा। लोभ, क्रोध, अज्ञान और काम में डूबे मनुष्य एक-दूसरे के प्राण लेने को उतारू होंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अपने धर्म और तप से रहित होकर शूद्रों के समान हो जाएँगे। नीच वर्ण मध्यम स्थान पर चढ़ जाएँगे और मध्यम वर्ण नीच पद पर उतर आएँगे।”

“उस युग में सन के बने वस्त्र श्रेष्ठ माने जाएँगे और अन्नों में कोदों श्रेष्ठ। मनुष्य अपनी पत्नियों को ही एकमात्र मित्र समझेंगे। गायें लुप्त हो जाएँगी, और लोग मछली, बकरी-भेड़ और दूध पर निर्वाह करेंगे। व्रती तक लोभी हो जाएँगे। लोग नास्तिक और चोर बन जाएँगे। पिता पुत्र का धन भोगेगा और पुत्र पिता का। शास्त्र में जिनका भोग वर्जित है, वे वस्तुएँ भी भोगी जाएँगी। ब्राह्मण वेदों की निन्दा करेंगे, व्रत न करेंगे, और कुतर्क-विद्या से बुद्धि मलिन करके यज्ञ-होम छोड़ देंगे।”

“पुत्र पिता को और पिता पुत्र को मारकर लज्जित न होंगे; उलटे गर्व करेंगे। सारा संसार म्लेच्छ-आचार और म्लेच्छ-भावना से भर जाएगा; यज्ञ बन्द हो जाएँगे, आनन्द कहीं न रहेगा। कायर वीर कहलाएँगे और वीर कायरों-से दीन। कोई किसी पर विश्वास न करेगा। पाप बढ़ेगा और धर्म क्षीण होगा। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य लुप्त हो जाएँगे, और सब मनुष्य बिना भेद के एक ही वर्ग के हो जाएँगे। पुत्र-पिता परस्पर क्षमा न करेंगे, पत्नियाँ पतियों की सेवा न करेंगी।”

“बौद्धिक अन्धकार समूची पृथ्वी को घेर लेगा, और मनुष्य की आयु सोलह वर्ष की रह जाएगी, जिसे पाकर मृत्यु आ जाएगी। पाँच-छह वर्ष की कन्याएँ सन्तान जनेंगी और सात-आठ वर्ष के बालक पिता बनेंगे। पति-पत्नी एक-दूसरे से कभी सन्तुष्ट न होंगे। लोग धर्म के झूठे चिह्न धारण करेंगे, ईर्ष्या और द्वेष संसार को भर देंगे। अकाल और दुर्भिक्ष पृथ्वी को पीड़ित करेंगे, राजमार्ग कुचरित्र स्त्री-पुरुषों से भरे रहेंगे। मनुष्य म्लेच्छ-आचरण अपनाकर बिना भेद के सर्वभक्षी और अपने हर कर्म में क्रूर हो जाएँगे।”

“लोग बिना संकोच वृक्ष और उद्यान नष्ट करेंगे। लोभ से अभिभूत होकर ब्राह्मणों को मारकर उनका धन भोगेंगे। द्विजगण शूद्रों से सताए, भयभीत होकर, हाहाकार करते हुए, रक्षक के बिना पृथ्वी पर भटकेंगे। डाकुओं से पीड़ित होकर वे कौओं की भाँति भयभीत होकर नदियों, पर्वतों और दुर्गम स्थानों में शरण लेंगे। कर के बोझ से दबे ब्राह्मण धैर्य खोकर शूद्रों के सेवक बन जाएँगे। शूद्र शास्त्र का व्याख्यान करेंगे और ब्राह्मण उनकी व्याख्या को प्रमाण मानकर सुनेंगे। नीच ऊँचे हो जाएँगे और सब कुछ उलटा प्रतीत होगा।”

“देवताओं को त्यागकर लोग दीवारों में रखी हड्डियों और अवशेषों की पूजा करेंगे। ऋषियों के आश्रमों, ब्राह्मणों के विद्या-स्थलों, देव-स्थानों और पवित्र तीर्थों में पृथ्वी मन्दिरों के बजाय अस्थि-अवशेष वाले स्तूपों और स्तम्भों से कुरूप हो जाएगी। जब मनुष्य क्रूर, धर्महीन, मांसभक्षी और मद्यपायी हो जाएँगे, तब युग का अन्त आ जाएगा। दिशाओं में आग लग जाएगी, तारे निस्तेज हो जाएँगे, ग्रह अशुभ हो जाएँगे, वायु उन्मत्त होकर बहेगी, अनगिनत उल्काएँ अनिष्ट का संकेत देती आकाश में गिरेंगी। सूर्य छह अन्य सूर्यों के साथ उदित होगा, और राहु उसे असमय ग्रस लेगा। स्त्रियाँ तीखी, निर्दय और रोदनप्रिय होंगी, और पति की आज्ञा न मानेंगी।”

“जब युग का अन्त आएगा, पुत्र पिता-माता का वध करेंगे और स्त्रियाँ निरंकुश होकर पति-पुत्रों का। राहु असमय सूर्य को निगल लेगा, चारों ओर अग्नि भभकेगी। पथिकों को भोजन, जल और आश्रय न मिलेगा। कौए, सर्प, गिद्ध और चील भयानक स्वर में चिल्लाएँगे। लोग ‘हे पिता, हे पुत्र’ पुकारते हुए देश-नगर छोड़कर नए ठिकाने ढूँढ़ते भटकेंगे।”

समझने की कुंजी (आधुनिक समतुल्य): ‘धर्म-रूपी बैल के चार पैर’ एक रूपक है, जिसमें कृत में धर्म पूर्ण (चार पैर), त्रेता में तीन-चौथाई, द्वापर में आधा, कलि में मात्र एक-चौथाई। ‘म्लेच्छ’ का तात्पर्य वैदिक आचार से बाहर के असंस्कृत आचरण से है, किसी विशेष जाति से नहीं। यह वर्णन एक नैतिक-सामाजिक पतन का चित्र है, जिसमें वर्ण-व्यवस्था, परिवार और विश्वास का ढाँचा टूटता दिखाया गया है।

कल्कि का आविर्भाव और कृत युग का पुनरारम्भ

मार्कण्डेय बोले, “जब वे भयानक काल बीत जाएँगे, तब सृष्टि नए सिरे से आरम्भ होगी। मनुष्य फिर रचे जाएँगे और ब्राह्मण से लेकर चारों वर्णों में विभक्त होंगे। प्रजा-वृद्धि के लिए विधाता पुनः अनुकूल होंगे। जब सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति, पुष्य नक्षत्र के साथ एक ही राशि में प्रवेश करेंगे, तब कृत युग पुनः आरम्भ होगा। मेघ समय पर बरसेंगे, तारे और ग्रह शुभ हो जाएँगे, चारों ओर समृद्धि, स्वास्थ्य और शान्ति होगी।”

अग्नि के पास बैठे मार्कण्डेय पांडवों, द्रौपदी और कृष्ण को श्वेत अश्व पर आते कल्कि का दर्शन कराते।

“उसी समय काल की प्रेरणा से कल्कि नामक एक ब्राह्मण जन्म लेंगे। वे विष्णु की महिमा बढ़ाएँगे और महान् ऊर्जा, बुद्धि तथा पराक्रम से युक्त होंगे। वे सम्भल नामक नगर में एक शुभ ब्राह्मण-कुल में जन्म लेंगे। जैसे ही वे सोचेंगे, वाहन, अस्त्र, योद्धा और कवच उन्हें उपलब्ध हो जाएँगे। वे राजाओं के राजा और धर्म के बल से सदा विजयी होंगे। वे इस उच्छृंखल संसार में व्यवस्था और शान्ति की पुनर्स्थापना करेंगे। वह तेजस्वी ब्राह्मण सबका नाश कर एक नए युग का सूत्रपात करेंगे, और ब्राह्मणों से घिरकर म्लेच्छों का संहार करेंगे, चाहे वे कहीं भी शरण लें।”

“चोर-डाकुओं को मारकर कल्कि एक महान् अश्वमेध यज्ञ में यह पृथ्वी ब्राह्मणों को दान कर देंगे, और स्वयंभू (ब्रह्मा) द्वारा निश्चित धर्म-मर्यादा की पुनर्स्थापना करके एक रमणीय वन में प्रवेश करेंगे। पृथ्वी के लोग उनके आचरण का अनुकरण करेंगे। जब ब्राह्मण चोर-डाकुओं का उन्मूलन कर देंगे, तब सर्वत्र समृद्धि होगी। एक के बाद एक देश जीतकर वह ब्राह्मणश्रेष्ठ कल्कि मृगचर्म, भाले और त्रिशूल रखकर पृथ्वी पर विचरेंगे, ब्राह्मणों द्वारा पूजित होते हुए, और चोर-डाकुओं का संहार करते हुए।”

“जब इस प्रकार पाप जड़ से उखड़ जाएगा और कृत युग के आगमन पर धर्म फूलेगा, तब मनुष्य फिर धार्मिक कर्मों में लगेंगे। सुसज्जित उद्यान, यज्ञ-स्थल, बड़े सरोवर, विद्या के केन्द्र और मन्दिर सर्वत्र पुनः प्रकट होंगे। यज्ञ-संस्कार फिर होने लगेंगे। ब्राह्मण साधु और सच्चे बनेंगे, तपस्या में लीन होकर मुनि बनेंगे, और जो आश्रम पहले दुष्टों से भरे थे, वे सत्यपरायण पुरुषों के घर बनेंगे। बोए हुए सब बीज उगेंगे, हर ऋतु में हर फसल होगी। ब्राह्मण अपने छह कर्मों (अध्ययन, अध्यापन, यज्ञ, याजन, दान और प्रतिग्रह) में लगेंगे, क्षत्रिय पराक्रम में, वैश्य अपने कर्म में, और शूद्र तीनों वर्णों की सेवा में। हे युधिष्ठिर, यही कृत, त्रेता, द्वापर और कलि युगों का क्रम है।”

समझने की कुंजी (वंश एवं स्थान): कल्कि विष्णु के दसवें और अन्तिम अवतार माने जाते हैं, जो कलियुग के अन्त में सम्भल ग्राम में जन्म लेकर अधर्म का नाश करते और सत्ययुग की पुनर्स्थापना करते हैं। यह वर्णन वायु पुराण की उस परम्परा से लिया है, जिसे मार्कण्डेय युधिष्ठिर को सुनाते हैं।

मार्कण्डेय बोले, “हे निष्पाप, अपना मन सदा धर्म पर लगाए रखिए, क्योंकि धर्मात्मा को यहाँ और परलोक, दोनों में सुख मिलता है। ब्राह्मण का कभी अपमान न कीजिए, क्योंकि क्रुद्ध ब्राह्मण अपने व्रत के बल से तीनों लोकों का नाश कर सकता है।” युधिष्ठिर ने पूछा, “यदि मुझे प्रजा की रक्षा करनी है, तो मैं किस आचरण का पालन करूँ, जिससे अपने वर्ण-धर्म से न गिरूँ?” मुनि बोले, “सब प्राणियों पर दयालु रहिए और उनके हित में लगे रहिए। किसी से घृणा न कीजिए, सत्यवादी, विनम्र और जितेन्द्रिय रहिए। धर्म का आचरण कीजिए, पाप त्यागिए, पितरों और देवों की पूजा कीजिए, और अज्ञान या प्रमाद से किए पापों का प्रायश्चित दान से कीजिए। अभिमान त्यागकर विनय धारण कीजिए। यही धर्म के अनुकूल आचरण है। हे पुत्र, अपनी इस वर्तमान विपत्ति को हृदय पर मत लीजिए। विवेकी पुरुष काल के सताने पर कभी विचलित नहीं होते। स्वर्ग के देव तक काल से ऊपर नहीं उठ सकते।”

युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “हे द्विजश्रेष्ठ, आपकी आज्ञा से मैं आपके सब उपदेशों का पालन करूँगा। मुझमें न लोभ है, न काम, न भय, न अभिमान। मैं वही करूँगा जो आपने कहा।” मुनि की बात सुनकर पाण्डव और वहाँ उपस्थित सब ब्राह्मण आनन्द से भर गए, और उनके हृदय आश्चर्य से पूर्ण हो गए।

सार: कलियुग के पतन के पश्चात् कल्कि अधर्म का नाश कर कृत युग की पुनर्स्थापना करेंगे, और युगों का चक्र फिर चलेगा। मार्कण्डेय युधिष्ठिर को राजधर्म का सार देते हैं: दया, सत्य, विनय, प्रजा-रक्षा, और काल के आगे धैर्य।

ब्राह्मणों की महिमा: राजा परीक्षित और मेंढक-राजकुमारी

जनमेजय ने पूछा, “जैसे मार्कण्डेय ने पाण्डवों को ब्राह्मणों की महिमा बताई थी, वह आप मुझे विस्तार से सुनाइए।” वैशम्पायन बोले, “युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय से ब्राह्मणों की महिमा सुनाने को कहा था, और मुनि ने एक प्राचीन कथा सुनाई।”

“अयोध्या में इक्ष्वाकु-वंश का परीक्षित नामक एक राजा था। एक बार वह आखेट को निकला। अकेले घोड़े पर मृग का पीछा करते-करते वह मनुष्य-बस्ती से बहुत दूर निकल गया। भूख-प्यास से व्याकुल होकर उसने एक घने वन में प्रवेश किया, और वहाँ एक मनोहर सरोवर में स्वयं तथा घोड़े ने स्नान किया। घोड़े के आगे कमल-नाल रखकर राजा सरोवर के तट पर बैठा। तभी उसने मधुर संगीत के स्वर सुने और सोचा, ‘यहाँ तो मनुष्यों के पदचिह्न तक नहीं; ये स्वर किसके और कहाँ से?’ तभी उसने फूल चुनती हुई एक परम सुन्दरी कन्या देखी, जो गाती जा रही थी। राजा ने पूछा, ‘हे भद्रे, आप कौन हैं और किसकी हैं?’ उसने उत्तर दिया, ‘मैं एक कन्या हूँ।’ राजा बोला, ‘मैं आपसे विवाह का प्रस्ताव करता हूँ।’ कन्या ने कहा, ‘मुझे एक वचन दीजिए, तभी मैं आपकी हो सकती हूँ।’ राजा के पूछने पर वह बोली, ‘आप मुझे कभी जल न दिखाएँगे।’ राजा ने ‘ऐसा ही हो’ कहकर उससे विवाह कर लिया।”

“परीक्षित उसके साथ आनन्द में रहने लगा। इसी बीच उसकी सेना वहाँ पहुँची, और राजा अपनी नवविवाहिता पत्नी सहित एक सुन्दर रथ पर बैठकर राजधानी लौट आया। वहाँ वह उसके साथ एकान्त में रहने लगा, यहाँ तक कि निकट के लोग भी उससे भेंट न कर पाते। प्रधानमन्त्री ने राजा की सेविकाओं से पूछा कि क्या हो रहा है। उन्होंने बताया, ‘यहाँ एक अनुपम सुन्दरी है, जिसके साथ राजा रमण करते हैं, इस वचन पर कि वे उसे कभी जल न दिखाएँगे।’ यह सुनकर मन्त्री ने एक कृत्रिम वन बनवाया, जो फूलों और फलों से भरे वृक्षों से युक्त था, और उसके एक छिपे कोने में अमृत-सा मधुर जल वाला एक बड़ा सरोवर खुदवाया, जो मोतियों के जाल से ढका था।”

“एक दिन एकान्त में राजा से मन्त्री ने कहा, ‘यह सुन्दर वन जल-रहित है; आप यहाँ प्रसन्नता से विहार कीजिए।’ राजा अपनी प्रिया सहित उस वन में गया। विहार करते-करते भूख-प्यास से थककर वह माधवी-लताओं के एक कुंज में पहुँचा, और वहाँ अमृत-सा निर्मल जल वाला सरोवर देखा। तट पर बैठकर राजा ने पत्नी से कहा, ‘इस जल में प्रसन्नता से उतरिए।’ यह सुनते ही वह जल में उतर गई, पर उतरकर फिर सतह पर न आई। राजा ने ढूँढ़ा, पर कोई चिह्न न मिला। उसने सरोवर का जल उलीचवाया, और एक बिल के मुख पर बैठा एक मेंढक देखा। क्रोध में आकर राजा ने आज्ञा दी, ‘मेरे राज्य में सर्वत्र मेंढक मारे जाएँ! जो मुझसे भेंट करना चाहे, मरे मेंढकों की भेंट लेकर आए।’”

“भयभीत मेंढकों ने अपने राजा से सारी बात कही। मेंढक-राज ने तपस्वी का वेश धारण कर परीक्षित के पास आकर कहा, ‘हे राजन्, क्रोध मत कीजिए; प्रसन्न होइए। इन निर्दोष मेंढकों का वध उचित नहीं।’ दुःख से भरे परीक्षित ने उत्तर दिया, ‘मैं इन्हें क्षमा नहीं करूँगा। इन दुष्टों ने मेरी प्रिया को निगल लिया है। आप इनका पक्ष न लीजिए।’ तब मेंढक-राज ने पीड़ित मन से कहा, ‘प्रसन्न होइए, राजन्। मैं मेंढकों का राजा आयु हूँ। जो आपकी पत्नी थी, वह मेरी पुत्री सुशोभना है। यह उसका दुराचार है; इससे पहले उसने अनेक राजाओं को ठगा है।’ राजा बोला, ‘मैं उसे चाहता हूँ; आप उसे मुझे प्रदान कीजिए।’”

“मेंढक-राज ने अपनी पुत्री परीक्षित को सौंप दी और उससे कहा, ‘राजा की सेवा-शुश्रूषा करना।’ फिर क्रोध में आकर उसने कन्या से कहा, ‘चूँकि आपने अनेक राजाओं को इस असत्य आचरण से ठगा है, आपकी सन्तान ब्राह्मणों के प्रति अनादर वाली होगी।’ पर परीक्षित उसके गुणों पर इतना मुग्ध हुआ कि मानो उसे तीनों लोकों का राज्य मिल गया। उसने मेंढक-राज को प्रणाम किया, और हर्ष से अश्रुपूरित कण्ठ से कहा, ‘मैं धन्य हुआ।’ मेंढक-राज पुत्री की अनुमति लेकर अपने स्थान को लौट गया। कुछ काल बाद राजा को उससे तीन पुत्र हुए, जिनके नाम शल, दल और बल थे। समय आने पर राजा ज्येष्ठ पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर तपस्या के लिए वन चला गया।”

समझने की कुंजी (वंश): यह परीक्षित इक्ष्वाकु-वंश के अयोध्या-नरेश हैं, अर्जुन के पौत्र अभिमन्यु-पुत्र वाले परीक्षित से भिन्न। मेंढक-राज आयु की दी हुई चेतावनी, कि सुशोभना की सन्तान ब्राह्मणों का अनादर करेगी, आगे की कथा का बीज है, क्योंकि उसके पुत्र शल और दल वामदेव ऋषि के साथ अनादर का व्यवहार करते हैं।

वामी अश्वों का लोभ और वामदेव का शाप

मार्कण्डेय बोले, “एक दिन शल आखेट में मृग का पीछा करते हुए सारथि से बोला, ‘तेज चलाओ।’ सारथि ने कहा, ‘ऐसा संकल्प न कीजिए; यह मृग आपसे पकड़ा नहीं जाएगा। यदि आपके रथ में वामी अश्व जुते होते, तभी इसे पकड़ सकते।’ राजा ने पूछा कि वामी अश्व क्या हैं, अन्यथा वह उसे मार डालेगा। सारथि वामदेव के शाप और राजा, दोनों से भयभीत था, पर राजा के तलवार उठाने पर बोला, ‘वामी अश्व वामदेव ऋषि के हैं; वे मन के समान वेग वाले हैं।’ राजा ने सारथि से वामदेव के आश्रम चलने को कहा।”

“आश्रम पहुँचकर राजा ने ऋषि से कहा, ‘हे पूज्य, मेरा घायल मृग भाग रहा है। अपने वामी अश्वों का जोड़ा देकर उसे पकड़ने योग्य बना दीजिए।’ ऋषि ने कहा, ‘मैं अपने वामी अश्व देता हूँ; पर अपना काम पूरा करके इन्हें शीघ्र लौटा देना।’ राजा अश्व लेकर मृग के पीछे चला। आश्रम छोड़ते ही उसने सारथि से कहा, ‘ये रत्न-सरीखे अश्व ब्राह्मणों के योग्य नहीं; इन्हें वामदेव को न लौटाना।’ मृग पकड़कर वह राजधानी लौटा और अश्वों को अन्तःपुर में रख लिया।”

“एक मास बाद ऋषि ने सोचा, ‘राजकुमार युवा है; उत्तम अश्व पाकर आनन्द में लौटाता नहीं। कैसा खेद!’ उन्होंने अपने शिष्य आत्रेय को राजा के पास भेजा कि यदि काम हो गया हो तो अश्व लौटा दे। राजा ने उत्तर दिया, ‘यह जोड़ा राजाओं के योग्य है; ब्राह्मण ऐसे रत्न के योग्य नहीं। ब्राह्मणों को अश्वों से क्या प्रयोजन? आप सन्तोष से लौट जाइए।’ आत्रेय ने लौटकर सब कह सुनाया। यह दुःखद समाचार सुनकर वामदेव क्रोध से भर गए और स्वयं राजा के पास जाकर अश्व माँगे।”

“राजा ने अश्व देने से इनकार कर दिया। वामदेव बोले, ‘हे पृथ्वीपति, मेरे वामी अश्व मुझे लौटाइए। इन्हीं से आपने वह कार्य सिद्ध किया जो आपके लिए असम्भव-सा था। ब्राह्मणों और क्षत्रियों की मर्यादा भंग करके वरुण के भयानक पाश से मृत्यु को मत बुलाइए।’ राजा ने उत्तर दिया, ‘हे वामदेव, ये दो उत्तम, सुशिक्षित और सीधे बैल ब्राह्मणों के योग्य पशु हैं; इन्हें लेकर आप जहाँ चाहें जाइए। वेद तो आप-सरीखों को ढोते ही हैं।’ वामदेव बोले, ‘वेद हमें परलोक में ढोते हैं; पर इस लोक में, हे राजन्, ऐसे पशु ही हम-सरीखों और सबको ढोते हैं।’”

“राजा ने कहा, ‘चार गधे, या चार उत्तम खच्चर, या वायु-वेग वाले चार अश्व आपको ढो लें; इनके साथ जाइए। यह वामी जोड़ा क्षत्रियों का है; ये आपके नहीं।’ इस पर वामदेव बोले, ‘हे राजन्, ब्राह्मणों के लिए भयानक व्रत निश्चित हैं। यदि मैंने उनका पालन किया है, तो मेरी आज्ञा से चार भयानक राक्षस आपका पीछा करें, आपके शरीर के चार टुकड़े करके अपने तीखे भालों पर उठा लें।’ राजा बोला, ‘जो आपको ऐसा ब्राह्मण जानते हों जो मन, वचन, कर्म से प्राण लेने का इच्छुक है, वे मेरी आज्ञा से चमकीले भाले और तलवार लेकर आपको शिष्यों सहित मेरे सामने गिरा दें।’”

“वामदेव ने कहा, ‘हे राजन्, मेरे वामी अश्व पाकर आपने कहा था कि लौटा दूँगा। अतः लौटाइए, जिससे अपने प्राण बचा सकें।’ राजा बोला, ‘मृग का आखेट ब्राह्मणों के लिए नियत नहीं। पर आपकी असत्यता का दण्ड मैं देता हूँ।’ ऐसा कहते-कहते उसने पुकारा, ‘यदि इक्ष्वाकु-वंश के सब वंशज, मेरा भाई दल, और ये सब वैश्य मेरी अधीनता मानते हों, तो मैं वामदेव को वामी अश्व न दूँगा, क्योंकि ये लोग कभी धर्मात्मा नहीं हो सकते।’ वह यह कह ही रहा था कि उन राक्षसों ने भालों से उसका वध कर दिया, और पृथ्वीपति भूमि पर गिर पड़ा।”

“इक्ष्वाकुओं ने राजा का वध जानकर दल को सिंहासन पर बैठाया। तब वामदेव दल के पास जाकर बोले, ‘हे राजन्, सब शास्त्र कहते हैं कि ब्राह्मणों को दान देना चाहिए। यदि आप पाप से डरते हैं, तो वामी अश्व बिना विलम्ब दीजिए।’ क्रोध में दल ने सारथि से कहा कि विष में बुझा एक सुन्दर बाण लाओ, जिससे वामदेव कुत्तों से नुचता हुआ पीड़ा में गिर पड़े। वामदेव बोले, ‘मैं जानता हूँ, हे राजन्, आपकी रानी से उत्पन्न दस वर्ष का एक पुत्र सेनजित है। मेरे वचन से उस प्रिय पुत्र को अपने भयानक बाणों से अभी मार डालिए।’”

“वामदेव के इन वचनों से राजा का छोड़ा हुआ वह बाण अन्तःपुर में राजकुमार को मार बैठा। यह सुनकर दल ने कहा, ‘हे इक्ष्वाकुजनो, मैं आज इस ब्राह्मण को बल से पीसकर मार डालूँगा। दूसरा बाण लाओ; मेरा पराक्रम देखो।’ वामदेव बोले, ‘विष में बुझा यह भयानक बाण जो आप मुझ पर ताने हैं, उसे न आप चला सकेंगे, न ताक भी सकेंगे।’ राजा बोला, ‘देखो, मैं उठाए बाण को चला ही नहीं सकता; मैं इस ब्राह्मण का वध नहीं कर पाता। दीर्घायु वामदेव जीवित रहें।’ वामदेव बोले, ‘इसी बाण से अपनी रानी को छूकर आप ब्राह्मण-वध के प्रयास के पाप से शुद्ध हो सकते हैं।’”

“राजा दल ने वैसा ही किया। तब रानी ने मुनि से कहा, ‘हे वामदेव, मैं इस अभागे पति को प्रतिदिन हित-वचनों से उपदेश दे सकूँ; मैं सदा ब्राह्मणों की सेवा कर पुण्यलोक प्राप्त करूँ।’ यह सुनकर वामदेव बोले, ‘हे सुनयने, आपने इस राजवंश की रक्षा की है। कोई अनुपम वर माँगिए।’ रानी ने कहा, ‘यही वर माँगती हूँ, कि मेरा पति इस पाप से मुक्त हो जाए, और आप उसके पुत्र और बन्धुओं के कल्याण का विचार करते रहें।’ मुनि ने ‘ऐसा ही हो’ कहा। तब राजा दल ने प्रसन्न होकर, प्रणाम करके, मुनि को उनके वामी अश्व लौटा दिए।”

सार: परीक्षित को मेंढक-राजकुमारी सुशोभना मिली, पर उसके पुत्रों शल और दल ने वामदेव के वामी अश्व लौटाने से इनकार किया। ऋषि के शाप-तेज से शल राक्षसों के हाथ मारा गया और दल अपने ही बाण से पुत्र-हानि का दुःख पाया। अन्ततः रानी के विवेक और वामदेव की क्षमा से वंश की रक्षा हुई। कथा का सार यह कि क्रुद्ध ब्राह्मण का तेज क्षत्रिय-बल से भी ऊपर है, और दिए वचन का पालन धर्म का मूल है।

वक ऋषि और इन्द्र: अमरत्व के दुःख और सुख

वैशम्पायन बोले, “ऋषियों और युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय से पूछा कि वक ऋषि इतने दीर्घायु कैसे हुए। मार्कण्डेय ने कहा कि राजर्षि वक महान् तपस्वी और दीर्घजीवी हैं, और उन्होंने वक तथा इन्द्र की भेंट की वह कथा सुनाई, जो हर्ष और शोक, दोनों से भरी है।”

“देव-असुर संग्राम समाप्त होने पर इन्द्र तीनों लोकों का स्वामी बना। मेघ भरपूर बरसे, प्रजा सुखी और सदाचारी हुई, धर्म-निरत रहकर शान्ति से रही। बल के संहारक इन्द्र ने ऐरावत हाथी पर बैठकर अपनी सुखी प्रजा का निरीक्षण किया: ऋषियों के आश्रम, मंगलमय नदियाँ, समृद्ध नगर, हरे-भरे गाँव, धर्मनिष्ठ राजा, और जल से भरे सरोवर-कूप देखे। फिर वह पूर्व दिशा में, समुद्र के तट पर, हरीतिमा से भरे एक पवित्र आश्रम में गया, जहाँ वक रहते थे।”

“इन्द्र को देखकर वक प्रसन्न हुए और पाद्य, आसन, अर्घ्य तथा फल-मूल से उनकी पूजा की। सुखपूर्वक बैठकर इन्द्र ने पूछा, ‘हे निष्पाप मुनि, आप सौ वर्ष जी चुके हैं। बताइए, अमर पुरुषों के दुःख क्या हैं?’ वक बोले, ‘अप्रिय लोगों के साथ जीवन, प्रिय और स्नेहियों से वियोग, दुष्टों का सहवास, ये दुःख अमर को सहने पड़ते हैं। पुत्र-पत्नी, बन्धु-मित्रों की मृत्यु, और दूसरों पर निर्भरता की पीड़ा परम कष्टों में हैं। धनहीन पुरुष का दूसरों से अपमान, इससे करुण दृश्य संसार में नहीं। जिनके पास कुल-गौरव न था उनका उसे पाना, जिनके पास था उनका उसे खोना, मिलन और विछोह, ये सब अमर को देखने पड़ते हैं।’”

“‘मूर्ख और अज्ञानी सुखी और प्रसन्न रहते हैं, जबकि विद्वान् और बुद्धिमान् दुःख भोगते हैं। संसार में ऐसे विरोधी विधान असंख्य हैं। अच्छे कुल वाले नीच कुल वालों के अधीन होकर कष्ट पाते हैं, और दरिद्र धनवानों से अपमानित होते हैं। इससे अधिक करुण और क्या? जो अमर जीवन जीते हैं, वे यह सब देखने और इसका दुःख सहने के लिए ही नियत हैं।’”

“इन्द्र ने पूछा, ‘अब बताइए, अमर पुरुषों के सुख क्या हैं, वे सुख जो देवों और ऋषियों को भी प्रिय हैं?’ वक बोले, ‘यदि बिना किसी दुष्ट मित्र के संग के, कोई पुरुष दिन के आठवें या बारहवें भाग में अपने घर में थोड़ी-सी शाक-सब्जी पका ले, तो इससे अधिक सुखी कोई नहीं। जो दिन गिनकर भोजन नहीं करता, वह पेटू नहीं कहलाता। अपने ही प्रयत्न से, बिना किसी पर निर्भर हुए, जो अपने घर में फल-शाक भी खाता है, वह आदर के योग्य है। जो दूसरे के घर तिरस्कारपूर्वक दिया भोजन खाता है, चाहे वह कितना ही स्वादिष्ट हो, वह निन्दनीय कर्म करता है।’”

“‘विद्वानों का मत यह है कि उस नीच का अन्न धिक्कार के योग्य है जो कुत्ते या राक्षस की भाँति दूसरे के घर खाता है। यदि अतिथियों, सेवकों और पितरों को भोजन देकर कोई सच्चा ब्राह्मण बचा हुआ खाता है, तो इससे अधिक सुखी कोई नहीं। अतिथि को पहला भाग देकर जो ब्राह्मण भोजन करता है, उसका प्रत्येक ग्रास सहस्र गायों के दान के समान पुण्य उत्पन्न करता है, और उसके यौवन के सब पाप निश्चय ही धुल जाते हैं।’ वक से ये और अनेक बातें कहकर इन्द्र स्वर्ग को लौट गया।”

सार: वक ऋषि बताते हैं कि अमरत्व का दुःख प्रियजनों के बार-बार वियोग को देखना और संसार के अन्यायों को सहना है, जबकि उसका सुख स्वावलम्बी, सरल, और अतिथि-सेवा-युक्त जीवन में है। दीर्घजीवन तभी मधुर है जब वह आत्म-निर्भरता और दान से युक्त हो।

क्षत्रियों की महिमा: सुहोत्र, शिवि, ययाति, वृषदर्भ

पाण्डवों ने राजर्षियों की महिमा सुनाने को कहा। मार्कण्डेय बोले, “कुरुवंश का सुहोत्र नामक राजा महर्षियों के दर्शन कर लौट रहा था। मार्ग में उसने उशीनर-पुत्र शिवि को रथ पर बैठे देखा। दोनों ने अपनी आयु के अनुसार एक-दूसरे का अभिवादन किया, और दोनों स्वयं को समान समझकर मार्ग देने को तैयार न हुए। तभी नारद आए और पूछा, ‘आप दोनों एक-दूसरे का मार्ग रोककर क्यों खड़े हैं?’ दोनों ने कहा, ‘हे पूज्य, ऐसा न कहिए। प्राचीन ऋषियों ने कहा है कि श्रेष्ठ या अधिक समर्थ को मार्ग दिया जाए। पर हम दोनों हर बात में समान हैं; ठीक से देखें तो हममें कोई श्रेष्ठ नहीं।’”

“नारद ने तीन श्लोक कहे, ‘हे कुरुवंशी, दुष्ट विनम्र के साथ भी दुष्टता करता है; विनम्र दुष्ट के साथ भी विनय और सच्चाई से व्यवहार करता है। सज्जन दुर्जन के साथ भी सच्चाई बरतता है; फिर सज्जन के साथ क्यों न बरते? सज्जन की दृष्टि में किया उपकार सौ गुना बड़ा प्रतीत होता है। निश्चय ही उशीनर-पुत्र शिवि की सद्गुणता आपसे अधिक है। नीच को दान से, असत्यवादी को सत्य से, कुकर्मी को क्षमा से, और बेईमान को ईमान से जीतना चाहिए। आप दोनों उदार-हृदय हैं; इन श्लोकों के संकेत के अनुसार एक हट जाए।’ यह सुनकर कुरुवंशी राजा ने शिवि की परिक्रमा कर, उसकी प्रशंसा करते हुए, उसे मार्ग दिया और चला गया।”

मार्कण्डेय बोले, “एक और कथा सुनिए। एक दिन नहुष-पुत्र ययाति सिंहासन पर नागरिकों से घिरा बैठा था। तभी एक ब्राह्मण अपने गुरु के लिए धन माँगने आया और बोला, ‘हे राजन्, अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मैं आपसे गुरु के लिए धन माँगता हूँ।’ राजा ने उसकी प्रतिज्ञा पूछी। ब्राह्मण ने कहा, ‘हे राजन्, संसार में जब लोग याचना करते हैं, तो याचक का अनादर किया जाता है। मैं पूछता हूँ, किस भाव से आप मुझे वह देंगे जो मैं माँगता हूँ?’ राजा ने उत्तर दिया, ‘दान देकर मैं कभी डींग नहीं हाँकता; जो दिया नहीं जा सकता, उसकी याचना मैं सुनता ही नहीं; पर जो दिया जा सकता है, उसकी प्रार्थना सुनकर, देकर मैं सदा प्रसन्न होता हूँ। मैं आपको सहस्र गायें दूँगा। माँगने वाला ब्राह्मण मुझे सदा प्रिय है; जो मुझसे याचना करता है उस पर मैं कभी क्रुद्ध नहीं होता, और दी हुई वस्तु पर कभी पछताता नहीं।’ ब्राह्मण सहस्र गायें पाकर चला गया।”

एक उप-कथा: वृषदर्भ और सेडुक नामक दो राजा थे, दोनों नीति और शस्त्र-विद्या में निपुण। सेडुक जानता था कि वृषदर्भ का बाल्यकाल से एक अकथित व्रत था, कि वह ब्राह्मणों को स्वर्ण और रजत के सिवा कोई धातु नहीं देता। एक ब्राह्मण वेदाध्ययन पूरा कर सेडुक के पास आया और गुरु के लिए सहस्र अश्व माँगे। सेडुक बोला, ‘यह मेरे लिए सम्भव नहीं; आप धर्मात्मा वृषदर्भ के पास जाइए, वह आपकी प्रार्थना पूरी करेगा।’ ब्राह्मण वृषदर्भ के पास गया और सहस्र अश्व माँगे। राजा ने उसे कोड़े से मार दिया। निर्दोष ब्राह्मण क्रोध में शाप देने को उद्यत हुआ, पर राजा बोला, ‘जो आपको न दे उसे आप शाप देते हैं? क्या यह ब्राह्मण के योग्य है?’ ब्राह्मण ने कहा कि उसे सेडुक ने भेजा है। तब राजा बोला, ‘जिस ब्राह्मण को मैंने कोड़ा मारा है, उसे खाली हाथ कैसे लौटाऊँ? प्रातःकाल तक जो भी कर मुझे प्राप्त होगा, वह सब मैं आपको दूँगा।’ और उसने उस दिन की समस्त आय ब्राह्मण को दे दी, जो सहस्र अश्वों के मूल्य से कहीं अधिक थी।

सार: राजर्षियों की महिमा उनके दान, विनय और वचन-पालन में है। सुहोत्र ने अधिक गुणी शिवि को मार्ग दिया, ययाति ने बिना अहंकार सहस्र गायें दीं, और वृषदर्भ ने ब्राह्मण को मारने के बावजूद उसे अपनी पूरी दैनिक आय देकर अपना व्रत निभाया।

कबूतर और बाज़: राजा शिवि की परीक्षा

मार्कण्डेय बोले, “एक दिन देवों ने निश्चय किया कि वे पृथ्वी पर उतरकर उशीनर-पुत्र शिवि की सद्गुणता की परीक्षा लें। अग्नि और इन्द्र पृथ्वी पर आए। अग्नि कबूतर बन गया, और इन्द्र बाज़ बनकर उसका पीछा करने लगा। वह कबूतर उत्तम आसन पर बैठे राजा शिवि की गोद में आ गिरा। पुरोहित ने कहा, ‘बाज़ से डरकर और अपनी रक्षा चाहकर यह कबूतर आपकी शरण आया है। शकुन-शास्त्र कहता है कि किसी के शरीर पर कबूतर का गिरना महान् संकट का सूचक है। राजा शकुन जानता हो तो संकट से बचने को दान करे।’”

“कबूतर भी बोला, ‘बाज़ से डरकर, अपने प्राण बचाने को मैं आपकी शरण आया हूँ। मैं एक मुनि हूँ, जिसने कबूतर का रूप धरा है। मुझे वेदज्ञ, ब्रह्मचारी, जितेन्द्रिय और तपस्वी जानिए; मैंने अपने गुरु से कभी अप्रिय वचन नहीं कहा। मैं कबूतर नहीं हूँ। मुझे बाज़ को न सौंपिए। विद्वान् और शुद्ध ब्राह्मण को सौंप देना कभी अच्छा दान नहीं हो सकता।’ तब बाज़ बोला, ‘हे राजन्, प्राणी एक ही क्रम में जन्म नहीं लेते। हो सकता है, पूर्वजन्म में आप इसी कबूतर से उत्पन्न हुए हों। पर इस कबूतर की रक्षा करके मेरे भोजन में बाधा डालना आपको शोभा नहीं देता।’”

“राजा बोला, ‘क्या किसी ने पहले पक्षियों को इस प्रकार मनुष्य की शुद्ध वाणी बोलते देखा है? यह कबूतर जो कहता है, यह बाज़ जो कहता है, इन्हें जानकर हम आज धर्म के अनुसार कैसे आचरण करें? जो भयभीत शरणागत को शत्रु को सौंप देता है, उसे स्वयं की आवश्यकता पर रक्षा नहीं मिलती। उसके लिए मेघ समय पर नहीं बरसते, बोए बीज नहीं उगते, और उसकी सन्तान बाल्यावस्था में मर जाती है। ऐसे का पूर्वज स्वर्ग में नहीं रहता; देवता उसकी आहुति स्वीकार नहीं करते। हे बाज़, शिवि-वंश के लोग आपको इस कबूतर के बदले चावल के साथ पका हुआ बैल और प्रचुर मांस आपके निवास पर पहुँचा दें।’”

“बाज़ बोला, ‘हे राजन्, मैं बैल नहीं माँगता, न अन्य मांस, न इस कबूतर से अधिक मात्रा में कुछ। यह मुझे देवों ने दिया है। इसकी मृत्यु नियत है; अतः यही आज मेरा भोजन है। इसे मुझे दीजिए।’ राजा ने कहा, ‘मेरे लोग पूरे अंगों सहित बैल आपके पास पहुँचा दें; वही इस भयभीत प्राणी का मोल हो। पर इस कबूतर को न मारिए। मैं प्राण दे दूँगा, पर इस कबूतर को न दूँगा। यदि आप चाहें, तो मुझे कोई ऐसा कार्य बताइए जो मैं आपके लिए करूँ।’ बाज़ बोला, ‘हे राजन्, यदि आप अपनी दाहिनी जाँघ से इस कबूतर के बराबर मांस काटकर दें, तो यह कबूतर बच सकता है, और शिवि-जन आपकी प्रशंसा करेंगे।’”

“राजा ने स्वीकार किया। उसने अपनी दाहिनी जाँघ से एक टुकड़ा काटकर कबूतर के बराबर तौला, पर कबूतर भारी निकला। उसने दूसरा टुकड़ा काटा, फिर भी कबूतर भारी रहा। फिर उसने शरीर के सब अंगों से मांस काट-काटकर तराजू पर रखा, पर कबूतर तब भी भारी रहा। अन्ततः राजा स्वयं तराजू पर चढ़ गया, और इसमें उसे तनिक भी खेद न हुआ। यह देखकर बाज़ ‘बच गया’ कहकर अन्तर्धान हो गया।”

“राजा ने कबूतर से पूछा, ‘शिवि-जन जानें कि यह बाज़ कौन था। विश्व के स्वामी के सिवा ऐसा कौन कर सकता है? हे पूज्य, उत्तर दीजिए।’ कबूतर बोला, ‘मैं धूमध्वज अग्नि हूँ, जिसे वैश्वानर भी कहते हैं। बाज़ वज्रधारी शची-पति इन्द्र हैं। हे सुरथ-पुत्र, आप नरों में श्रेष्ठ हैं। हम आपकी परीक्षा लेने आए थे। मेरी रक्षा के लिए आपने जो मांस-खण्ड अपने शरीर से काटे, उनसे आपके अंगों में जो घाव बने, उन्हें मैं मंगलमय और सुन्दर बना दूँगा; वे स्वर्ण-वर्ण के होंगे और मधुर सुगन्ध देंगे। महान् यश पाकर, देवों और ऋषियों से पूजित होकर, आप दीर्घकाल इस प्रजा पर शासन करेंगे, और आपकी कोख से कपतरोमा नामक पुत्र होगा।’”

सार: देवों ने अग्नि (कबूतर) और इन्द्र (बाज़) के रूप में शिवि की परीक्षा ली। राजा ने शरणागत की रक्षा के लिए अपने ही शरीर का मांस तौलकर दिया, और अन्त में स्वयं को अर्पित कर दिया। शरणागत-रक्षा को राजा ने अपने प्राणों से ऊपर रखा। यही क्षत्रिय-धर्म की परम मर्यादा है।

नारद की परीक्षा: अष्टक, प्रतर्दन, वसुमनस् और शिवि

मार्कण्डेय बोले, “विश्वामित्र-वंश के राजा अष्टक के अश्वमेध यज्ञ में अनेक राजा आए। उसके तीन भाई भी आए: प्रतर्दन, वसुमनस्, और उशीनर-पुत्र शिवि। यज्ञ की समाप्ति पर अष्टक भाइयों सहित रथ पर जा रहा था कि उन्होंने नारद को आते देखा। अभिवादन कर उन्होंने नारद से रथ पर साथ चलने को कहा। नारद ‘ऐसा ही हो’ कहकर रथ पर बैठ गए। एक राजा ने नारद को प्रसन्न कर पूछा, ‘हे पूज्य, मैं कुछ पूछना चाहता हूँ।’ नारद ने अनुमति दी। राजा बोला, ‘हम चारों दीर्घायु और सर्वगुण-सम्पन्न हैं। हम किसी स्वर्ग में दीर्घकाल वास करेंगे। पर हममें से पहले कौन गिरेगा?’ नारद बोले, ‘यह अष्टक पहले गिरेगा।’”

“‘किस कारण?’ राजा ने पूछा। नारद बोले, ‘मैं कुछ दिन अष्टक के घर रहा। एक दिन उसने मुझे रथ पर नगर के बाहर ले जाकर भिन्न-भिन्न रंगों की सहस्रों गायें दिखाईं। मैंने पूछा ये किसकी हैं, तो वह बोला, ‘ये गायें मैंने दान की हैं।’ इस उत्तर में उसने अपनी ही प्रशंसा कर दी। इसी से अष्टक पहले गिरेगा।’”

“फिर पूछा गया कि शेष तीन में पहले कौन गिरेगा। नारद बोले, ‘प्रतर्दन।’ कारण पूछने पर उन्होंने कहा, ‘मैं प्रतर्दन के घर भी कुछ दिन रहा। एक दिन वह मुझे रथ पर ले जा रहा था कि एक ब्राह्मण ने अश्व माँगा। राजा ने कहा, लौटकर दूँगा, पर ब्राह्मण ने शीघ्र माँगा, तो उसने रथ के दाहिने पहिये का अश्व दे दिया। फिर दूसरे ब्राह्मण को बाएँ पहिये का, फिर तीसरे को बाईं ओर के अगले अश्व को खोलकर। चौथे ब्राह्मण के माँगने पर उसने अन्तिम बचा अश्व भी दे दिया, और स्वयं रथ का जुआ पकड़कर खींचने लगा। तब उसने कहा, ‘अब ब्राह्मणों के लिए कुछ नहीं रहा।’ उसने दान तो दिया, पर निन्दा-सहित। उसी वचन के लिए वह स्वर्ग से गिरेगा।’”

“शेष दो में से एक ने पूछा कि उन दोनों में कौन गिरेगा। नारद बोले, ‘वसुमनस्।’ कारण पूछने पर बोले, ‘भ्रमण करते मैं वसुमनस् के घर पहुँचा। ब्राह्मण एक पुष्प-रथ के लिए स्वस्तिवाचन कर रहे थे। समारोह पूर्ण होने पर वह पुष्प-रथ प्रकट हुआ। मैंने उसकी प्रशंसा की, तो राजा बोला, ‘हे पूज्य, आपने इसकी प्रशंसा की; अतः यह रथ आपका।’ फिर एक बार और मुझे रथ की आवश्यकता थी; मैंने उसकी प्रशंसा की, तो राजा बोला, ‘यह आपका।’ तीसरी बार मैंने फिर प्रशंसा की, पर इस बार राजा ब्राह्मणों को रथ दिखाते हुए मेरी ओर देखकर बोला, ‘हे पूज्य, आपने रथ की पर्याप्त प्रशंसा कर ली।’ उसने केवल इतना कहा, रथ दिया नहीं। इसी से वह गिरेगा।’”

“फिर पूछा गया कि जो आपके साथ रहेगा, उन दोनों में कौन जाएगा और कौन गिरेगा। नारद बोले, ‘शिवि जाएगा, पर मैं गिरूँगा।’ कारण पूछने पर बोले, ‘मैं शिवि के समान नहीं हूँ। एक दिन एक ब्राह्मण शिवि के पास आकर बोला कि वह भोजन के लिए आया है। शिवि ने पूछा कि क्या करूँ, आज्ञा दीजिए। ब्राह्मण बोला, ‘आपका वृहद्गर्भ नामक यह पुत्र मारा जाए, और आप उसे पकाकर मेरे भोजन के लिए दीजिए।’”

“‘यह सुनकर मैं देखता रहा कि आगे क्या होता है। शिवि ने अपने पुत्र को मारकर, विधिपूर्वक पकाकर, उस अन्न को पात्र में रखकर सिर पर लेकर ब्राह्मण को ढूँढ़ने निकला। तभी किसी ने कहा कि वह ब्राह्मण नगर में घुसकर क्रोध में आपके भवन, कोष, शस्त्रागार, अन्तःपुर और अश्व-गज की शालाओं में आग लगा रहा है। शिवि ने यह सुना, पर उसका रंग तक न बदला। नगर में जाकर वह ब्राह्मण से बोला, ‘हे पूज्य, भोजन पक गया है।’ ब्राह्मण चुप, लज्जित होकर नीचे देखता खड़ा रहा। शिवि ने कहा, ‘हे पूज्य, इसे खाइए।’ ब्राह्मण ने उसकी ओर देखकर कहा, ‘आप ही इसे खाइए।’ शिवि ने कहा, ‘ऐसा ही हो,’ और प्रसन्नता से पात्र सिर से उतारकर खाने को उद्यत हुआ। तब ब्राह्मण ने उसका हाथ पकड़कर कहा, ‘आपने क्रोध को जीत लिया है। ब्राह्मणों को देने योग्य ऐसी कोई वस्तु नहीं जो आप न दे सकें।’ यह कहकर ब्राह्मण ने शिवि की पूजा की, और शिवि ने सामने देखा तो उसका पुत्र देव-शिशु-सा अलंकृत, सुगन्धित, खड़ा था। वह ब्राह्मण स्वयं विधाता थे, जो राजर्षि की परीक्षा को आए थे।’”

“‘विधाता के अन्तर्धान होने पर मन्त्रियों ने शिवि से पूछा, ‘आप सब जानते थे, फिर यह सब क्यों किया?’ शिवि ने उत्तर दिया, ‘न यश के लिए, न धन के लिए, न भोग के लिए मैंने यह किया। यह मार्ग पापमय नहीं। सत्पुरुषों का चला मार्ग प्रशंसनीय है; मेरा हृदय सदा उसी ओर झुकता है।’ मार्कण्डेय बोले, ‘शिवि की यह उच्च सद्गुणता मैं जानता हूँ, इसी से मैंने इसे सुनाया।’”

समझने की कुंजी (अवधारणा): नारद का संकेत यह कि दान का पुण्य आत्म-प्रशंसा या निन्दा से नष्ट हो जाता है। अष्टक की डींग, प्रतर्दन की निन्दा, और वसुमनस् की कृपणता ने उनके पुण्य को घटाया, जबकि शिवि का निःस्वार्थ, क्रोध-विजयी दान सर्वोच्च रहा। इसलिए वही स्वर्ग में स्थिर रहेगा।

इन्द्रद्युम्न और चिरंजीवियों की शृंखला

पाण्डवों और ऋषियों ने मार्कण्डेय से पूछा कि क्या कोई उनसे अधिक दीर्घायु है। मार्कण्डेय बोले, “निःसन्देह है। इन्द्रद्युम्न नामक एक राजर्षि का पुण्य क्षीण हो जाने पर वह स्वर्ग से गिरा, ‘मेरे कर्म नष्ट हो गए’ पुकारता हुआ। उसने मेरे पास आकर पूछा, ‘क्या आप मुझे जानते हैं?’ मैंने कहा, ‘हम पुण्य-संचय के लिए कहीं स्थिर नहीं रहते; एक गाँव या नगर में एक रात ही ठहरते हैं। अतः मुझ-सरीखा आपके कर्म नहीं जान सकता।’ उसने पूछा कि क्या मुझसे कोई दीर्घायु है। मैंने कहा, ‘हिमवान् पर प्रावरकर्ण नामक एक उल्लू रहता है, जो मुझसे वृद्ध है; वह आपको जानता होगा।’”

“इन्द्रद्युम्न अश्व बनकर मुझे उस उल्लू के पास ले गया। राजा ने पूछा, ‘क्या आप मुझे जानते हैं?’ उल्लू कुछ क्षण सोचकर बोला, ‘मैं आपको नहीं जानता।’ तब उल्लू ने बताया कि इन्द्रद्युम्न नामक सरोवर में नाडीजंघ नामक एक बगुला रहता है, जो उन दोनों से वृद्ध है। हम तीनों उस सरोवर पर गए। बगुले ने भी ‘मैं इन्द्रद्युम्न को नहीं जानता’ कहा, और बताया कि उसी सरोवर में अकूपार नामक एक कछुआ रहता है, जो सबमें वृद्ध है।”

“बगुले के बुलाने पर कछुआ तट पर आया। उससे पूछा गया कि क्या वह इन्द्रद्युम्न को जानता है। कछुआ कुछ क्षण सोचता रहा, फिर उसके नेत्र अश्रुपूर्ण हो गए, हृदय द्रवित हुआ, और वह काँपने लगा। हाथ जोड़कर बोला, ‘अरे, इन्हें मैं न जानूँ? इन्होंने यज्ञाग्नि प्रज्वलित करते समय सहस्र बार यज्ञ-स्तम्भ गाड़े थे। यह सरोवर उन्हीं गायों के खुरों से बना है जो इन्होंने यज्ञ की समाप्ति पर ब्राह्मणों को दान दीं। तभी से मैं यहाँ रहता हूँ।’”

“कछुए के यह कहते ही स्वर्ग से एक विमान आया, और आकाशवाणी हुई, ‘हे इन्द्रद्युम्न, आइए और स्वर्ग में अपना योग्य स्थान पाइए! आपके कर्म महान् हैं!’ साथ ही ये श्लोक भी सुनाई पड़े, ‘पुण्य-कर्म का यश पृथ्वी पर फैलता और स्वर्ग तक चढ़ता है; जब तक वह यश रहता है, कर्ता स्वर्ग में रहता है। और जिसके पाप-कर्म की चर्चा होती है, वह उतने ही काल अधोलोक में गिरकर रहता है। अतः मनुष्य को स्वर्ग पाने को सत्कर्मी होना चाहिए।’ राजा ने कहा, ‘जब तक मैं इन वृद्धों को उनके स्थानों पर न पहुँचा दूँ, यह विमान यहीं ठहरे।’ मुझे और उल्लू को हमारे स्थानों पर पहुँचाकर वह विमान पर अपने योग्य लोक को चला गया। दीर्घायु होने से मैं यह सब देखता हूँ।”

पाण्डवों ने कहा, “धन्य हैं आप, जिन्होंने स्वर्ग से गिरे इन्द्रद्युम्न को पुनः उसका लोक दिलाया।” मार्कण्डेय बोले, “देवकी-पुत्र कृष्ण ने भी इसी प्रकार नरक में गिरे राजर्षि नृग को उठाकर स्वर्ग दिलाया था।”

सार: चिरंजीवियों की यह शृंखला, अर्थात् मार्कण्डेय, उल्लू प्रावरकर्ण, बगुला नाडीजंघ, और सबमें वृद्ध कछुआ अकूपार, यह दिखाती है कि पुण्य का यश ही मनुष्य को स्वर्ग में टिकाए रखता है। इन्द्रद्युम्न का कर्म इतना गहरा था कि एक अति-वृद्ध कछुआ तक उसे स्मरण रखता था, और उसी स्मृति-यश से वह पुनः स्वर्ग को लौटा।

दान का धर्म और यमलोक का मार्ग

युधिष्ठिर ने पूछा, “इन्द्रलोक पाने के लिए मनुष्य किस अवस्था में दान करे: गृहस्थ-जीवन में, बाल्यकाल में, यौवन में, या वृद्धावस्था में?” मार्कण्डेय बोले, “व्यर्थ जीवन चार प्रकार का है, और व्यर्थ दान सोलह प्रकार का। उसका जीवन व्यर्थ है जिसके पुत्र नहीं; जो धर्म से बाहर है; जो दूसरों के अन्न पर जीता है; और जो पितरों, देवों और अतिथियों को दिए बिना स्वयं के लिए पकाकर अकेला खा लेता है।”

“व्रत-भ्रष्ट को दिया दान, और अन्याय से कमाए धन का दान, दोनों व्यर्थ हैं। पतित ब्राह्मण, चोर, और झूठे गुरु को दिया दान व्यर्थ है। असत्यवादी, पापी, कृतघ्न, सब वर्णों के लिए याजन करने वाले, वेद बेचने वाले, शूद्र के लिए पकाने वाले, और जन्म से ब्राह्मण होकर भी अपने कर्म से रहित को दिया दान व्यर्थ है। रजस्वला होने के बाद विवाहित कन्या से ब्याहे पुरुष को, स्त्रियों को, सर्प-क्रीड़ा करने वाले को, और नीच कर्म करने वाले को दिया दान भी व्यर्थ है। ये सोलह प्रकार के दान निष्फल हैं।”

“जो भय या क्रोध से, अज्ञान से आच्छादित मन से दान देता है, वह उसका फल माता के गर्भ में ही भोगता है। जो अन्य अवस्थाओं में ब्राह्मणों को दान देता है, वह उसका फल वृद्धावस्था में पाता है। अतः स्वर्ग चाहने वाला सब अवस्थाओं में ब्राह्मणों को सब कुछ दान करे।” युधिष्ठिर ने पूछा कि चारों वर्णों से दान लेने वाले ब्राह्मण दूसरों और स्वयं की रक्षा कैसे करते हैं। मार्कण्डेय बोले, “जप, मन्त्र, होम और वेदाध्ययन से ब्राह्मण एक वैदिक नौका बनाते हैं, जिससे वे स्वयं और दूसरों, दोनों को तारते हैं।”

“अतिथि को पाद-प्रक्षालन का जल, थके पैरों पर मलने को घी, अन्धकार में दीप, भोजन और आश्रय देने वाले को यम के सामने नहीं जाना पड़ता। श्राद्ध में सुपात्र ब्राह्मण को ही भोजन कराना चाहिए, और शापित या पतित, अति-गोरे या अति-काले, रोगी, कुष्ठी, छली, और शस्त्रजीवी ब्राह्मणों को त्याग देना चाहिए। एक गाय एक ही ब्राह्मण को देनी चाहिए; एक गाय अनेक को न दी जाए, क्योंकि बाँटने पर बेची जाने से दाता का कुल तीन पीढ़ी तक नष्ट होता है। भूमि, गाय और स्वर्ण का दान सर्वोच्च है, क्योंकि स्वर्ण अग्नि से, भूमि विष्णु से, और गाय सूर्य से उत्पन्न हुई है। पर अन्न-दान परम गहरा है, क्योंकि अन्न ही प्रजापति है, प्रजापति ही संवत्सर, और संवत्सर ही यज्ञ है; यज्ञ से ही सब प्राणी उत्पन्न होते हैं।”

“भोजन देने वाला आगे चलता है, उसके पीछे सत्य बोलने वाला, और उसके पीछे बिना माँगे देने वाला, पर तीनों एक ही स्थान को जाते हैं।” युधिष्ठिर ने पूछा कि यमलोक मनुष्यलोक से कितनी दूर है और मनुष्य उसे कैसे पार करते हैं। मार्कण्डेय बोले, “यमलोक मनुष्यलोक से छियासी सहस्र योजन दूर है। वह मार्ग जलहीन, छायाहीन, विश्रामहीन और भयानक है। यम के दूत सब प्राणियों को बलपूर्वक उसी मार्ग पर ले जाते हैं।”

“जिन्होंने ब्राह्मणों को अश्व और वाहन दिए, वे उन्हीं वाहनों पर इस मार्ग को पार करते हैं। छाता देने वाले छाते से धूप रोकते जाते हैं; अन्न देने वाले बिना भूख के, न देने वाले भूख से पीड़ित। वस्त्र देने वाले वस्त्र पहने, न देने वाले नग्न। स्वर्ण देने वाले अलंकृत होकर सुख से; भूमि देने वाले हर कामना पूर्ण किए हुए; गृह देने वाले रथों पर; जल देने वाले बिना प्यास के, प्रसन्न-हृदय। दीप देने वाले अपने आगे प्रकाश करते हुए; गाय देने वाले समस्त पापों से मुक्त। जिसने मासभर उपवास किया, वह हंसों के रथ पर; छह रात उपवास करने वाला मोरों के रथ पर। जल देने वालों को वहाँ पुष्पोदका नामक एक नदी मिलती है, जिससे वे शीतल अमृत-सा जल पीते हैं, जबकि दुष्कर्मियों के लिए उसमें पीब बहती है।”

समझने की कुंजी (संख्या-आधुनिक-समतुल्य): एक योजन प्रायः आठ से नौ मील के बराबर माना जाता है; अतः ‘छियासी सहस्र योजन’ यमलोक की दूरी का एक प्रतीकात्मक, अकल्पनीय रूप से विशाल माप है, जो यह कहता है कि वह यात्रा बिना पुण्य-संचय के असह्य है। ‘पुष्पोदका’ (फूलों के जल वाली) नदी जल-दान का फल है।

शुद्धि, तप और ज्ञान का रहस्य

मार्कण्डेय बोले, “जो प्रातः-सायं सन्ध्या-देवी की और वेदों की माता गायत्री की ध्यानपूर्वक उपासना करता है, वह उससे पवित्र होकर सब पापों से मुक्त हो जाता है। तीन प्रकार की शुद्धि है: वाणी की, कर्म की, और जल से प्राप्त। ब्राह्मण, चाहे वेदज्ञ हो या अज्ञ, चाहे शुद्ध हो या अशुद्ध, अग्नि की भाँति होता है; अतः उसका अनादर न करना चाहिए। जैसे श्मशान में जलती अग्नि अशुद्ध नहीं मानी जाती, वैसे ही ब्राह्मण सदा पवित्र है।”

“तीन दण्ड धारण करना, मौन-व्रत, जटा, शिखा-मुण्डन, वल्कल और मृगचर्म, व्रत, स्नान, अग्नि-पूजा, वन-वास, शरीर को सुखाना, ये सब व्यर्थ हैं यदि हृदय शुद्ध न हो। छह इन्द्रियों में मन ही, जो सहज ही चंचल है, परम भयानक है। जो वचन, कर्म, हृदय और आत्मा से पाप नहीं करते, वही सच्चे तपस्वी हैं, न कि वे जो उपवास से देह सुखाते हैं। जिसके हृदय में बन्धु-बान्धवों के प्रति दया नहीं, वह शुद्ध-देह होकर भी पापमुक्त नहीं; उसकी कठोरता उसके तप की शत्रु है। जो सदा पवित्र और गुणयुक्त है, जो जीवनभर दया का आचरण करता है, वह गृहस्थ होकर भी मुनि है।”

“उपवास और तप पाप नष्ट नहीं करते, चाहे वे रक्त-मांस की देह को कितना ही सुखा दें। जिसका हृदय पवित्रता-रहित है, वह अज्ञान में किए तप से केवल यातना ही पाता है। पवित्रता और धर्म से ही मनुष्य कल्याण-लोक पाते हैं, और तभी व्रत-उपवास फलदायी होते हैं। जैसे अग्नि से जले बीज नहीं उगते, वैसे ज्ञान से जली पीड़ा आत्मा को नहीं छूती। यह जड़ देह, आत्मा के बिना काठ-सी, समुद्र के फेन-सी अल्पजीवी है। जो वेद की एक या आधी ऋचा से भी आत्मा का दर्शन पा लेता है, उसे और किसी की आवश्यकता नहीं। मोक्ष का निश्चित चिह्न परमात्मा से अपनी अभिन्नता का ज्ञान है। तप से स्वर्ग, दान से भोग, और तीर्थ-स्नान से पाप-शुद्धि मिल सकती है, पर पूर्ण मुक्ति ज्ञान के बिना नहीं मिलती।”

सार: बाह्य तप, व्रत और कर्मकाण्ड तभी फलते हैं जब हृदय शुद्ध और दयालु हो। तप से स्वर्ग और दान से भोग मिलता है, पर पूर्ण मुक्ति केवल आत्मा-परमात्मा की अभिन्नता के ज्ञान से प्राप्त होती है। यही मार्कण्डेय का गूढ़तम उपदेश है।

धुन्धुमार की कथा: मधु-कैटभ का वध

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे मुनि, इक्ष्वाकु-वंश का अजेय राजा कुवलाश्व धुन्धुमार नाम से क्यों प्रसिद्ध हुआ?” मार्कण्डेय बोले, “यह नैतिक कथा सुनिए। एक रमणीय वन में उतंक नामक एक प्रसिद्ध ऋषि का आश्रम था। उतंक ने अगणित वर्षों तक विष्णु को प्रसन्न करने के लिए कठोरतम तप किया। प्रसन्न होकर विष्णु प्रकट हुए, और उतंक ने अनेक स्तुतियों से उनकी अर्चना की, ‘हे महातेजस्वी, सब प्राणी, देव, असुर, मनुष्य, चर-अचर, ब्रह्मा, वेद, और जो भी ज्ञेय है, सब आपके रचे हैं। आकाश आपका मस्तक है, सूर्य-चन्द्र आपके नेत्र, वायु आपका श्वास, अग्नि आपका तेज, दिशाएँ आपकी भुजाएँ, और महासमुद्र आपका उदर। पर्वत आपकी ऊरु हैं, आकाश आपका कटि-प्रदेश, पृथ्वी आपके चरण, और वनस्पतियाँ आपकी रोमावली।’”

“विष्णु ने वर माँगने को कहा। उतंक बोले, ‘हरि के, उस नित्य पुरुष के, इस विश्व के स्रष्टा के दर्शन ही मेरे लिए महान् वर हैं।’ विष्णु इस निःस्पृहता और भक्ति से और प्रसन्न हुए और वर लेने का आग्रह किया। तब उतंक ने हाथ जोड़कर माँगा, ‘मेरा हृदय सदा धर्म, सत्य और सन्तोष पर टिका रहे, और सदा आपकी भक्ति में लीन रहे।’ विष्णु बोले, ‘ऐसा ही होगा। और आपमें एक योग-शक्ति प्रकट होगी, जिससे आप स्वर्ग और त्रिलोक के लिए एक महान् कार्य सिद्ध करेंगे। इस समय धुन्धु नामक एक असुर त्रिलोक के नाश के लिए घोर तप कर रहा है। सुनिए, उसे कौन मारेगा। इक्ष्वाकु-वंश में वृहदश्व नामक एक राजा होगा, जिसका पुत्र कुवलाश्व अत्यन्त पवित्र, संयमी और यशस्वी होगा। मुझसे प्राप्त योग-शक्ति से युक्त वह राजा, आपकी प्रेरणा से, उस असुर धुन्धु का वध करेगा।’ यह कहकर विष्णु अन्तर्धान हो गए।”

“मार्कण्डेय ने वंश सुनाया: इक्ष्वाकु के बाद शशाद, फिर ककुत्स्थ, अनेनस्, पृथु, विश्वगश्व, अद्रि, युवनाश्व, श्रावस्थ (जिसने श्रावस्ती नगरी बसाई), वृहदश्व, और फिर कुवलाश्व। कुवलाश्व के इक्कीस सहस्र पुत्र थे, सब प्रचण्ड, बलवान् और विद्या में निपुण। समय आने पर वृहदश्व ने वीर और धर्मात्मा कुवलाश्व को सिंहासन पर बैठाया और स्वयं तप के लिए वन जाने को उद्यत हुए।”

“यह सुनकर उतंक वृहदश्व के पास आए और तप से रोकते हुए बोले, ‘हे राजन्, प्रजा की रक्षा आपका धर्म है; आप वन न जाइए। मेरे आश्रम के निकट उज्जालक नामक बालुका-समुद्र है, जो जलहीन है और अनेक योजन फैला है। वहाँ धुन्धु नामक एक दानव-प्रमुख भूमि के नीचे रहता है। वह मधु और कैटभ का पुत्र है, भयानक और महाप्रतापी। ब्रह्मा से वर पाकर वह देव, दैत्य, राक्षस, सर्प और गन्धर्वों के लिए अवध्य हो गया है। हर वर्ष के अन्त में जब वह बालू में सोया हुआ साँस लेता है, तब समूची पृथ्वी पर्वत-वनों सहित काँपती है, उसका श्वास बालू के बादल उठाकर सूर्य को ढक देता है, और सात दिन तक धुएँ-सहित अग्नि की चिनगारियाँ फैलती हैं। इसी से मैं शान्ति से तप नहीं कर पाता। आप उसका वध कर तब वन जाइए। विष्णु ने पहले ही वर दिया है कि जो इस असुर का वध करेगा, उसमें विष्णु अपना अजेय तेज भर देंगे।’”

“वृहदश्व ने हाथ जोड़कर कहा, ‘हे ब्राह्मण, आपकी यह यात्रा व्यर्थ न होगी। मेरा पुत्र कुवलाश्व स्थिरता और पराक्रम में अद्वितीय है। अपने वीर पुत्रों सहित वह यह सब सिद्ध करेगा। मुझे विदा दीजिए, क्योंकि मैंने शस्त्र त्याग दिए हैं।’ उतंक ने ‘ऐसा ही हो’ कहा, और वृहदश्व पुत्र को उतंक की आज्ञा पालन का आदेश देकर वन चले गए।”

एक उप-कथा: युधिष्ठिर के पूछने पर मार्कण्डेय ने धुन्धु के जन्म का मूल सुनाया। जब विश्व एक जल-विस्तार था, नित्य विष्णु शेषनाग की विशाल फणों पर योग-निद्रा में लेटे थे। उनकी नाभि से सूर्य-सी कान्ति वाला एक कमल निकला, और उससे चतुर्मुख ब्रह्मा प्रकट हुए। तभी मधु और कैटभ नामक दो महाप्रतापी दानवों ने ब्रह्मा को आतंकित किया। ब्रह्मा के काँपने से कमल-नाल हिला, और केशव जाग पड़े। उन्होंने उन दानवों को ‘स्वागत है’ कहकर वर माँगने को कहा। दानवों ने हँसते हुए कहा कि वे ही विष्णु को वर देंगे। विष्णु बोले, ‘तो मैं यही वर माँगता हूँ, कि आप दोनों मेरे हाथों वध को स्वीकार कीजिए, संसार के हित के लिए।’ मधु-कैटभ बोले, ‘हम कभी असत्य नहीं बोले, हास्य में भी नहीं। काल पर कोई विजय नहीं पाता। पर हमारी एक इच्छा है, कि आप हमें ऐसे स्थान पर मारिए जो पूर्णतः अनावृत हो, और हम आपके पुत्र होना चाहते हैं।’ विष्णु ने सोचा, पर पृथ्वी या आकाश में कोई अनावृत स्थान न मिला; तब उन्होंने अपनी ऊरु को अनावृत देखा और वहीं अपने तीक्ष्ण चक्र से मधु-कैटभ के मस्तक काट डाले। यही धुन्धु उन्हीं मधु-कैटभ का पुत्र था।

“धुन्धु ने एक पैर पर खड़े होकर, देह को केवल नस-नाड़ियों का जाल बनाकर घोर तप किया, और ब्रह्मा से यह वर पाया कि देव, दानव, राक्षस, सर्प, गन्धर्व, कोई उसका वध न कर सके। पिता के वध का स्मरण कर वह विष्णु पर टूट पड़ा, देवों को गन्धर्वों सहित पराजित किया, और अन्ततः उज्जालक के बालुका-समुद्र में उतंक के आश्रम को सताने लगा। वहीं वह भूमि के नीचे, बालू में छिपकर, त्रिलोक के नाश के संकल्प से घोर तप में लेटा रहता था।”

कुवलाश्व का विजय और धुन्धुमार नाम

मार्कण्डेय बोले, “उतंक के साथ कुवलाश्व अपने इक्कीस सहस्र पुत्रों और सेना सहित उस प्रदेश की ओर चला। उतंक की आज्ञा से विष्णु ने, त्रिलोक के हित के लिए, कुवलाश्व में अपना तेज भर दिया। मार्ग में आकाशवाणी हुई, ‘यह भाग्यशाली और अवध्य वीर आज धुन्धु का संहारक बनेगा।’ देवों ने दिव्य पुष्प बरसाए, बिना बजाए दुन्दुभियाँ बज उठीं, शीतल वायु बही, और इन्द्र ने मार्ग की धूल बैठाने को हलकी फुहार दी। देव, गन्धर्व और महर्षि कुवलाश्व-धुन्धु के युद्ध को देखने आकाश में जुट आए।”

“नारायण के तेज से भरा कुवलाश्व पुत्रों सहित उस बालुका-समुद्र को घेरकर उसे खुदवाने लगा। सात दिन खोदने पर पुत्रों ने सूर्य-सा तेजस्वी धुन्धु का विशाल शरीर बालू में देखा, जो मरुस्थल के पश्चिमी भाग को ढके पड़ा था। चारों ओर से घिरे उस दानव पर पुत्रों ने तीखे बाण, गदा, मुद्गर, फरसे, लोह-शूल और तलवारें बरसाईं। आहत होकर वह दानव क्रोध से उठ खड़ा हुआ। उसने वे सब अस्त्र निगल लिए और मुख से युगान्त के संवर्तक-अग्नि-सी ज्वालाएँ उगलीं। उन ज्वालाओं से, जैसे पुरातन कपिल ने सगर के पुत्रों को भस्म किया था, उस असुर ने कुवलाश्व के सब पुत्रों को क्षणभर में भस्म कर दिया।”

“जब उसके सब पुत्र भस्म हो गए, तब महातेजस्वी कुवलाश्व उस दानव के सम्मुख आया, जो नींद से जागे दूसरे कुम्भकर्ण-सा था। राजा के शरीर से एक विशाल जलधारा बहने लगी, जिसने उन ज्वालाओं को बुझा दिया। फिर योग-बल से युक्त कुवलाश्व ने ब्रह्मास्त्र नामक प्रसिद्ध अस्त्र से उस दुष्ट दानव को भस्म कर त्रिलोक को भय से मुक्त किया, और स्वयं मानो त्रिलोक का दूसरा स्वामी-सा हो गया।”

“धुन्धु को मारने से कुवलाश्व उसी समय से धुन्धुमार (धुन्धु का संहारक) नाम से प्रसिद्ध हुआ, और युद्ध में अजेय माना गया। देव और महर्षि प्रसन्न होकर वर माँगने को बोले। राजा ने हाथ जोड़कर माँगा, ‘मैं सदा श्रेष्ठ ब्राह्मणों को धन दे सकूँ; सब शत्रुओं के लिए अजेय रहूँ; विष्णु से मेरी मित्रता हो; किसी प्राणी के प्रति मेरे मन में दुर्भाव न हो; मेरा हृदय सदा धर्म की ओर मुड़े; और अन्त में मैं सदा के लिए स्वर्ग में वास करूँ।’ देवों ने ‘ऐसा ही हो’ कहा। कुवलाश्व के सब पुत्र भस्म होने पर भी तीन पुत्र बचे थे: दृढाश्व, कपिलाश्व और चन्द्राश्व; उन्हीं से इक्ष्वाकु-वंश के राजाओं की वह यशस्वी परम्परा चली।”

सार: मधु-कैटभ के पुत्र धुन्धु ने ब्रह्मा के वर के बल पर त्रिलोक को त्रस्त किया। विष्णु के तेज से युक्त कुवलाश्व ने इक्कीस सहस्र पुत्रों की आहुति देकर, अपने शरीर से बही जलधारा से अग्नि बुझाकर और ब्रह्मास्त्र से उसका वध किया। इसी विजय से वह धुन्धुमार कहलाया, एक ऐसा नाम जो खाली नहीं, अक्षरशः सत्य था।

पतिव्रता-धर्म और कौशिक की भूल

युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय से नारी-धर्म और पतिव्रता-स्त्रियों के उच्च धर्म पर पूछा, यह कहते हुए कि माता-पिता की सेवा और पति की उपासना उन्हें परम कठिन प्रतीत होती है। मार्कण्डेय बोले, “कोई माता को श्रेष्ठ मानते हैं, कोई पिता को। पर जो माता सन्तान को जन्म देती और पालती है, वही अधिक कठिन धर्म निभाती है। स्त्रियों के लिए न यज्ञ, न श्राद्ध, न उपवास इतना फलदायी है जितनी पति की सेवा; उसी से वे स्वर्ग पाती हैं।”

क्रोधित तपस्वी की दृष्टि से जलकर भूमि पर गिरी बगुली, ऊपर पक्षी उड़ता, ग्रामजन द्वार से देखते।

“सुनिए, कौशिक नामक एक तपस्वी ब्राह्मण थे, वेदाध्ययन-निरत और तप-सम्पन्न। एक दिन वे एक वृक्ष के नीचे वेद-पाठ कर रहे थे, और ऊपर बैठी एक बगुली ने उन पर बीट कर दी। क्रुद्ध ब्राह्मण ने उसे क्रोधभरी दृष्टि से देखा, और वह बगुली भूमि पर गिरकर मर गई। बगुली को मरा देख ब्राह्मण को दया आई और वे विलाप करने लगे, ‘हाय, क्रोध और द्वेष में आकर मैंने बुरा कर्म किया।’”

“भिक्षा के लिए वे एक गाँव में, एक परिचित घर में गए और ‘भिक्षा दीजिए’ कहा। भीतर से एक स्त्री ने ‘ठहरिए’ कहा। वह स्त्री भिक्षा-पात्र साफ कर ही रही थी कि उसका पति, भूख से व्याकुल, घर आ गया। पतिव्रता स्त्री ने ब्राह्मण की उपेक्षा कर पहले पति को पाद्य, आसन और स्वादिष्ट भोजन-पान दिया, और उसकी सब आवश्यकताओं में लगी रही। तभी उसे स्मरण हुआ कि उसने ब्राह्मण को ‘ठहरिए’ कहा था; वह लज्जित होकर भिक्षा लेकर बाहर आई।”

“ब्राह्मण ने क्रोध से कहा, ‘हे स्त्री, ‘ठहरिए’ कहकर मुझे बैठाए रखा और विदा न किया!’ स्त्री ने उन्हें शान्त करते हुए कहा, ‘हे विद्वन्, क्षमा कीजिए। मेरा पति मेरा परम देव है। वह भूखा-थका आया, तो मैं उसकी सेवा में लगी।’ ब्राह्मण बोला, ‘क्या आप पति को ब्राह्मणों से ऊपर रखती हैं? गृहस्थ होकर ब्राह्मणों का अनादर करती हैं? इन्द्र भी इनके सामने झुकते हैं। क्या आप नहीं जानतीं कि ब्राह्मण अग्नि-सरीखे हैं और समूची पृथ्वी को भस्म कर सकते हैं?’ स्त्री बोली, ‘हे ऋषि, मैं बगुली नहीं हूँ! यह क्रोध त्यागिए। इन क्रोधभरी दृष्टियों से आप मेरा क्या कर लेंगे? मैं ब्राह्मणों का अनादर नहीं करती; वे देव-सरीखे हैं। पर मेरी यह भूल क्षमा कीजिए।’”

“स्त्री ने आगे कहा, ‘मैं ब्राह्मणों के तेज को जानती हूँ। उनके क्रोध से ही समुद्र का जल खारा और अपेय हुआ। दण्डक वन में आज तक उनके क्रोध की अग्नि नहीं बुझी। ब्राह्मणों का अनादर करने से ही दुष्ट असुर वातापि अगस्त्य के सम्पर्क में पच गया। पर जैसे ब्राह्मण क्रोध में महान् हैं, वैसे ही क्षमा में भी। मेरा हृदय पति-सेवा के पुण्य की ओर झुकता है, क्योंकि मैं पति को सब देवों में श्रेष्ठ मानती हूँ। मैं जानती हूँ कि आपने अपने क्रोध से एक बगुली जलाई। पर क्रोध ही मनुष्य का परम बड़ा शत्रु है। देवता उसी को ब्राह्मण जानते हैं जिसने क्रोध और काम त्याग दिए हैं, जो सत्यवादी है, जो गुरु को प्रसन्न रखता है, और जो आहत होकर भी आघात नहीं लौटाता।’”

“स्त्री ने कहा, ‘हे ब्राह्मण, मेरा कहना अप्रिय लगे तो क्षमा कीजिए, क्योंकि धर्म चाहने वाले स्त्रियों को कष्ट नहीं देते। यदि आप सचमुच धर्म का यथार्थ नहीं जानते, तो मिथिला नगरी में जाइए। वहाँ एक धर्मात्मा व्याध रहता है, जो सत्यवादी, जितेन्द्रिय और माता-पिता का सेवक है। वही आपको धर्म का उपदेश देगा।’ इन वचनों से ब्राह्मण शान्त हुआ और बोला, ‘मैं आपसे प्रसन्न हूँ। आपकी फटकार मेरे लिए परम हितकारी होगी। अब मैं वही करूँगा जो मेरे कल्याण का है।’ विदा पाकर कौशिक स्वयं की निन्दा करते हुए अपने आश्रम लौट गए।”

मांस की दुकान पर बैठा धर्मव्याध तराजू थामे सामने बैठे ब्राह्मण कौशिक को धर्म समझाता हुआ।

“उस स्त्री के अद्भुत उपदेश पर बार-बार विचार करते हुए कौशिक ने सोचा, ‘इस स्त्री का कहा मुझे आदर से मानना चाहिए और मिथिला जाना चाहिए।’ बगुली की मृत्यु का ज्ञान और उसके धर्म-वचनों ने उन पर श्रद्धा जगाई। वे अनेक वन, गाँव और नगर पार करते मिथिला पहुँचे, जो जनक के शासन में थी। उन्होंने विभिन्न पन्थों की पताकाओं से सजी, यज्ञ-उत्सवों के स्वरों से गूँजती, भव्य द्वारों, अट्टालिकाओं, रथों और स्वस्थ-प्रसन्न नागरिकों से भरी उस सुन्दर नगरी को देखा। द्विजों से पूछकर वे उस धर्मात्मा व्याध के पास पहुँचे, जो एक कसाई-वाटिका में बैठा था।”

सार: तप-सम्पन्न कौशिक ने क्रोध से बगुली को भस्म किया, पर एक साधारण गृहिणी ने उन्हें सिखाया कि पति-सेवा और कर्तव्य ही उसका धर्म है, और क्रोध से बड़ा कोई शत्रु नहीं। वह स्त्री कौशिक को मिथिला के धर्मात्मा व्याध के पास भेजती है। यह संकेत कि धर्म का यथार्थ कुल या वर्ण से नहीं, आचरण और कर्तव्य-पालन से प्रकट होता है, चाहे वह नीच कहे जाने वाले व्यवसाय में ही क्यों न हो।

काम्यक वन में एक स्त्री अकेली, और एक राजा की कुदृष्टि

पांडव धनुष लिए वन में आखेट को जाते, कुटिया के आगे बैठी द्रौपदी, दूर जयद्रथ की सवारी आती।

भरतवंश के वे महान योद्धा काम्यक वन (पाण्डवों का वनवास-काल का एक प्रमुख निवास) में देवताओं के समान विचरते रहे, आखेट में रत और चारों ओर ऋतु-ऋतु पर खिले फूलों से लदी वनभूमि के दर्शन से प्रसन्न। पाण्डु के वे पाँचों पुत्र, हर एक इन्द्र के समान और शत्रुओं के लिए भय, वहाँ कुछ काल तक रहे। एक दिन वे सब, अपने साथ रहने वाले ब्राह्मणों के भोजन के लिए मृग आदि की खोज में, चारों दिशाओं में निकल पड़े। उन्होंने तपस्या के तेज से देदीप्यमान महातपस्वी त्रिणबिन्दु और अपने कुलगुरु धौम्य की अनुमति लेकर द्रौपदी को आश्रम में अकेली छोड़ दिया।

उसी समय सिन्धु देश का प्रसिद्ध राजा, वृद्धक्षत्र का पुत्र जयद्रथ, विवाह के विचार से शाल्व देश की ओर जा रहा था। वह अपने श्रेष्ठ राजसी वस्त्रों में सजा हुआ था और अनेक राजकुमार उसके साथ थे। मार्ग में वह काम्यक वन में रुका। उस एकान्त स्थान में उसने पाण्डवों की प्रिय और सर्वत्र विख्यात पत्नी द्रौपदी को आश्रम के द्वार पर खड़ी देखा। अपने रूप की उत्कृष्ट शोभा में वह ऐसी दीप्त थी मानो काले मेघों के समूह को चीरती बिजली ने वनभूमि को आलोकित कर दिया हो। जिन्होंने उसे देखा, वे अपने आप से पूछने लगे, “क्या यह कोई अप्सरा है, या देवकन्या, या कोई दिव्य माया?” इसी विचार से उनके हाथ अपने आप जुड़ गए। वे उस निर्दोष-सुन्दर रूप को टकटकी लगाए देखते रह गए।

सिन्धुराज जयद्रथ उस निष्कलंक सुन्दरी को देखकर विस्मित हुआ, और उसके मन में बुरी मनसा जाग उठी। काम से जलते हुए उसने कोटिक नामक राजकुमार से कहा, “यह निर्दोष रूप वाली स्त्री किसकी है? क्या यह मनुष्य-जाति की है? यदि इस अनुपम सुन्दरी को मैं पा सकूँ तो मुझे विवाह की कोई आवश्यकता ही नहीं। इसे अपने साथ ले जाकर मैं अपने घर लौट जाऊँगा। पर पहले जाकर पता कीजिए कि यह कौन है, कहाँ से आई है, और इतनी कोमल देह वाली यह स्त्री काँटों से भरे इस वन में क्यों आ पहुँची। कोटिक, आप जाइए और पूछिए कि इसका पति कौन है।”

आश्रम के आगे बैठी द्रौपदी से जयद्रथ हाथ बढ़ाकर प्रणय की बात कहता, पीछे उसका दल-बल।

यों कहे जाने पर कोटिक, कान में कुण्डल पहने हुए, अपने रथ से उतरकर उसके पास गया, जैसे कोई गीदड़ बाघिन के पास जाता हो, और उससे ये वचन बोले।

समझने की कुंजी (जयद्रथ कौन): जयद्रथ सिन्धु, सौवीर और शिवि आदि देशों का राजा है, वृद्धक्षत्र का पुत्र। यही वह जयद्रथ है जो आगे चलकर धृतराष्ट्र की कन्या दुःशला का पति बनता है, अर्थात् कौरवों का बहनोई। महाभारत के युद्ध में अभिमन्यु-वध से जुड़ी प्रसिद्ध घटना भी इसी जयद्रथ की है। यहाँ वन-काल में इसका द्रौपदी-हरण आगे के बैर का एक और सूत्र बो देता है।

सार: पाण्डव आखेट को निकले और द्रौपदी आश्रम में अकेली रह गई। मार्ग में रुके सिन्धुराज जयद्रथ की उस पर कुदृष्टि पड़ी और उसने कोटिक को द्रौपदी का परिचय पूछने भेजा।

कोटिक का प्रश्न और द्रौपदी का परिचय

कोटिक ने कहा, “हे श्रेष्ठ स्त्री, आप कौन हैं जो इस आश्रम में कदम्ब-वृक्ष की एक शाखा पकड़े अकेली खड़ी हैं, और रात में वायु से प्रज्वलित अग्नि-शिखा के समान शोभायमान हैं? इतनी अनुपम सुन्दरी होकर भी इन वनों में आपको भय क्यों नहीं लगता? मुझे लगता है आप कोई देवी हैं, या यक्षी, या दानवी, या कोई श्रेष्ठ अप्सरा, या किसी दैत्य की पत्नी, या नागराज की कन्या, या राक्षसी, या वरुण, यम, सोम अथवा कुबेर की पत्नी, जो मनुष्य-रूप धरकर इन वनों में विचर रही हो। आप हमसे यह भी नहीं पूछतीं कि हम कौन हैं, और न ही हम जानते हैं कि यहाँ आपकी रक्षा कौन करता है। आदरपूर्वक हम पूछते हैं, हे भद्रे, आपके पिता कौन हैं, आपके पति का, बन्धुओं का और आपके वंश का नाम सत्य-सत्य बताइए, और यह भी कि आप यहाँ क्या कर रही हैं।”

फिर उसने अपना और साथियों का परिचय दिया, “मैं राजा सुरथ का पुत्र कोटिक हूँ। वह जो कमल-पंखुड़ी-से बड़े नेत्रों वाला सोने के रथ पर बैठा है, वह त्रिगर्त का राजा क्षेमंकर है। उसके पीछे पुलिन्द-राज का प्रसिद्ध पुत्र है। और हे सुकेशी, यदि आपने कभी सौवीर-राज जयद्रथ का नाम सुना हो, तो वही यहाँ छह हज़ार रथों के साथ, घोड़े-हाथी-पैदल सेना सहित खड़ा है, और बारह सौवीर राजकुमार उसके ध्वजवाहक हैं।”

द्रौपदी उंगली उठाकर सशस्त्र जयद्रथ को धिक्कारती हुई, पीछे कुटिया के पास सहमी हुई सखी।

शिवि-वंश के उस आभूषण-स्वरूप राजकुमार के यों पूछने पर द्रौपदी ने अपने नेत्र धीरे से घुमाए, कदम्ब की शाखा को छोड़ा, अपने रेशमी वस्त्र को सँवारा, और कहा, “हे राजकुमार, मैं जानती हूँ कि मेरे जैसी स्त्री का इस प्रकार आपसे बात करना उचित नहीं। पर यहाँ बातचीत के लिए और कोई स्त्री या पुरुष नहीं, और मैं इस समय अकेली हूँ, इसलिए कहती हूँ। हे साम्ब्य, मुझे ज्ञात है कि आप सुरथ के पुत्र कोटिक हैं। अब मैं अपने सम्बन्धियों और प्रसिद्ध वंश के विषय में बताती हूँ। मैं राजा द्रुपद की कन्या हूँ, लोग मुझे कृष्णा के नाम से जानते हैं। मैंने पाँच पुरुषों को पति रूप में स्वीकार किया है, जिनके विषय में आपने सुना होगा जब वे खाण्डवप्रस्थ में रहते थे। वे पाँचों श्रेष्ठ पुरुष, युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन और माद्री के दोनों पुत्र, मुझे यहाँ छोड़कर चारों दिशाओं में आखेट को गए हैं। राजा पूर्व दिशा में गए, भीमसेन दक्षिण की ओर, अर्जुन पश्चिम और दोनों जुड़वाँ भाई उत्तर की ओर। अतः अब आप उतरिए और अपने रथ-वाहन रोकिए, ताकि उनसे यथोचित सत्कार पाकर आप जा सकें। धर्म के उच्च-आत्मा पुत्र अतिथि-प्रिय हैं और आपको देख अवश्य प्रसन्न होंगे।”

साम्ब्य-पुत्र से ऐसा कहकर, चन्द्रमा के समान मुख वाली द्रुपद-कन्या अपने पति के आतिथ्य-धर्म को स्मरण करती हुई अपनी विशाल कुटी में चली गई।

एक उप-कथा का सूत्र: द्रौपदी का आतिथ्य-वचन यहाँ बड़ा मार्मिक है। वह उस व्यक्ति को भी अतिथि मानकर भोजन-विश्राम का प्रस्ताव देती है जिसकी आँखों में दुर्भाव है। यही पाण्डव-गृहस्थी का धर्म है, और यही वह आदर्श है जिसका जयद्रथ अगले ही क्षण उल्लंघन करेगा। कथा अच्छाई और बुराई को आमने-सामने रखकर पाठक को स्वयं अन्तर देखने देती है।

सार: कोटिक के पूछने पर द्रौपदी ने अपना परिचय द्रुपद-कन्या कृष्णा और पाँचों पाण्डवों की पत्नी के रूप में दिया, और अतिथि-धर्म का पालन करते हुए उन्हें सत्कार का निमन्त्रण देकर कुटी में लौट गई।

जयद्रथ का कुटी में प्रवेश और अपमानजनक प्रस्ताव

कोटिक ने प्रतीक्षारत राजकुमारों के पास लौटकर वह सब कह सुनाया जो उसके और कृष्णा के बीच हुआ था। यह सुनकर जयद्रथ बोला, “केवल उसकी वाणी सुनकर ही मेरा हृदय उस स्त्री-रत्न की ओर खिंच गया है। फिर आप यों असफल लौट क्यों आए? मैं सत्य कहता हूँ, एक बार इसे देख लेने के बाद अन्य सब स्त्रियाँ मुझे बन्दरियों-सी जान पड़ती हैं। उसे देखकर मेरा हृदय हर लिया गया है। बताइए, क्या वह श्रेष्ठ स्त्री मनुष्य-जाति की है?” कोटिक ने उत्तर दिया, “यह तो प्रसिद्ध राजकुमारी कृष्णा है, द्रुपद की कन्या और पाण्डु के पाँच पुत्रों की विख्यात पत्नी। यह पृथा-पुत्रों की अत्यन्त सम्मानित, प्रिय और पतिव्रता पत्नी है।”

यों सुनकर भी दुर्बुद्धि जयद्रथ बोला, “मैं द्रौपदी से अवश्य मिलूँगा।” और छह अन्य पुरुषों के साथ वह उस एकान्त आश्रम में ऐसे घुसा जैसे कोई भेड़िया सिंह की मांद में घुसे। उसने कृष्णा से कहा, “हे श्रेष्ठ स्त्री, आपका कल्याण हो। आपके पति और वे सब, जिनकी समृद्धि आप सदा चाहती हैं, कुशल से तो हैं?” द्रौपदी ने उत्तर दिया, “कुन्ती-पुत्र कुरुवंशी राजा युधिष्ठिर, उनके भाई, मैं, और जिनके विषय में आपने पूछा, सब कुशल से हैं। आपका राज्य, शासन, कोष और सेना सब ठीक तो है? आप शैव्य, शिवि, सिन्धु आदि समृद्ध देशों पर न्यायपूर्वक शासन तो कर रहे हैं? आप यह पाद्य (चरण धोने का जल) स्वीकार कीजिए, और यह आसन ग्रहण कीजिए। आपके अनुचरों के जलपान के लिए मैं पचास पशु अर्पित करती हूँ। और कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिर स्वयं आपको अनेक प्रकार के मृग और पशु देंगे।”

यह सुनकर जयद्रथ बोला, “मेरा सब कुशल है। जलपान का प्रबन्ध करके आपने मानो उसे दे ही दिया। पर अब आइए, मेरे रथ पर चढ़िए और पूर्ण सुखी हो जाइए। उन दीन पृथा-पुत्रों का आदर करना आपको शोभा नहीं देता, जो वनों में रह रहे हैं, जिनका तेज क्षीण हो चुका, जिनका राज्य छिन चुका, और जिनका भाग्य न्यूनतम स्तर पर पहुँच चुका है। आप जैसी समझदार स्त्री दरिद्र पति से आसक्त नहीं होती। स्त्री को चाहिए कि पति की समृद्धि में उसका साथ दे, पर विपत्ति में उसे त्याग दे। पाण्डु-पुत्र अपने उच्च स्थान से सदा के लिए गिर चुके हैं। अतः आप इनका त्याग कर, मेरी पत्नी बनकर सुखी हो जाइए, और सिन्धु तथा सौवीर के राज्यों में मेरे साथ भागिनी बनिए।”

सिन्धुराज के ये भयंकर वचन सुनकर कृष्णा का मुख भौंहों के संकोच से कुटिल हो उठा। उसने अत्यन्त तिरस्कार से उसके वचनों की उपेक्षा करते हुए कहा, “ऐसा फिर मत कहिए! क्या आपको लज्जा नहीं आती? सावधान रहिए!” और वह निर्दोष चरित्र वाली स्त्री अपने पतियों के लौटने की उत्सुकता से प्रतीक्षा करती हुई, लम्बी-लम्बी बातों से उसे उलझाए रखने लगी।

सार: जयद्रथ ने कुटी में घुसकर द्रौपदी से पाण्डवों को छोड़ अपने साथ चलने का अपमानजनक प्रस्ताव रखा; द्रौपदी ने उसे फटकारा और पतियों के लौटने तक समय बिताने को उलझाए रखा।

द्रौपदी की चेतावनी और जयद्रथ का बलात्-हरण

स्वभाव से सुन्दर द्रुपद-कन्या क्रोध से लाल हो उठी। नेत्र दहक उठे, भौंहें तन गईं। उसने सौवीर-राज को फटकारते हुए कहा, “ओ मूर्ख, क्या आपको लज्जा नहीं आती जो उन प्रसिद्ध और भयंकर योद्धाओं के विषय में ऐसे अपमानजनक वचन कहते हैं, जिनमें हर एक साक्षात् इन्द्र के समान है, जो अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित हैं और जो यक्ष-राक्षसों की सेनाओं से लड़ते हुए भी कभी विचलित नहीं होते? आप युधिष्ठिर को परास्त करने की आशा में वैसे ही हैं जैसे कोई हिमालय की घाटियों में विचरते झुण्ड के, पर्वत-शिखर-से विशाल, मदमत्त गजराज से उसके नेता को छीनना चाहे। आप बालक-सी मूर्खता से सोए सिंह को मुख के बाल नोचने के लिए जगा रहे हैं। भीमसेन को क्रोध में देखेंगे तो भागना पड़ेगा। आपकी जिष्णु (अर्जुन) से युद्ध की चाह वैसी ही है जैसे पर्वत-गुहा में सोए, पूर्ण-यौवन और प्रचण्ड सिंह को कोई कुरेद दे।”

जयद्रथ ने उत्तर दिया, “हे कृष्णा, मैं यह सब जानता हूँ, और उन राजकुमारों के पराक्रम से भली-भाँति परिचित हूँ। पर इन धमकियों से अब आप हमें भयभीत नहीं कर सकतीं। हम भी जन्म से सत्रह उच्च कुलों में से हैं और छह राजगुणों से सम्पन्न हैं। हम पाण्डवों को हीन पुरुष समझते हैं। अतः हे द्रुपद-कन्या, इस हाथी या इस रथ पर शीघ्र चढ़िए, क्योंकि केवल वचनों से आप हमें टाल नहीं सकतीं; अथवा कम घमण्ड के साथ बोलकर सौवीर-राज की कृपा माँग लीजिए।”

द्रौपदी ने उत्तर दिया, “इतनी सामर्थ्यवान होते हुए भी सौवीर-राज मुझे इतना असहाय क्यों समझता है? मैं इतनी प्रसिद्ध होकर, हिंसा के भय से किसी राजकुमार के सामने स्वयं को दीन नहीं बनाऊँगी। जिसकी रक्षा के लिए कृष्ण और अर्जुन एक ही रथ पर बैठकर पीछा करें, उसका तो इन्द्र भी हरण नहीं कर सकता, फिर किसी दुर्बल मनुष्य की क्या बिसात? जब किरीटी (अर्जुन) मेरे लिए आपकी सेना में घुसेगा, तब वह ग्रीष्म में सूखी घास के ढेर को जलाती अग्नि के समान चारों ओर सब कुछ भस्म कर देगा। गाण्डीव की प्रत्यंचा से छूटे धनंजय के भयंकर बाण मेघों की भाँति गरजते हुए वायु को चीरते आएँगे। जब भीम गदा लेकर आगे बढ़ेगा और माद्री के दोनों पुत्र क्रोध का विष उगलते हुए चारों ओर घूमेंगे, तब आपको अनन्त काल तक पछताना पड़ेगा। जैसे मैंने अपने श्रेष्ठ पतियों के साथ मन से भी कभी छल नहीं किया, उसी पुण्य के बल पर मैं आपको परास्त और पृथा-पुत्रों द्वारा घसीटा जाता देखूँगी। ओ निर्दयी, मुझे बलपूर्वक पकड़कर भी आप भयभीत नहीं कर सकते, क्योंकि जैसे ही वे कुरु-योद्धा मुझे देखेंगे, मुझे काम्यक वन में वापस ले आएँगे।”

रथ से झुककर जयद्रथ द्रौपदी की कलाई खींचता हुआ, वृद्ध पुरोहित धौम्य हाथ उठाकर रोकते।

तब उस विशाल-नेत्रा ने उन्हें अपने ऊपर हाथ डालने को उद्यत देख फटकारते हुए कहा, “अपने स्पर्श से मुझे अपवित्र मत कीजिए!” और बड़े भय में उसने अपने आध्यात्मिक गुरु धौम्य को पुकारा। जयद्रथ ने उसके उत्तरीय वस्त्र को पकड़ा, पर उसने उसे बड़े बल से धक्का दिया। धक्के से वह पापी जड़ से कटे वृक्ष-सा भूमि पर गिर पड़ा। पर उसने फिर बड़े बल से उसे पकड़ लिया, और कृष्णा हाँफने लगी। उस दुष्ट से घसीटी जाती हुई कृष्णा अन्ततः धौम्य के चरणों की वन्दना करके उसके रथ पर चढ़ गई।

तब धौम्य ने जयद्रथ को सम्बोधित करते हुए कहा, “हे जयद्रथ, क्षत्रियों की प्राचीन रीति का पालन कीजिए। उन महान योद्धाओं को परास्त किए बिना आप इसे हर नहीं सकते। निःसन्देह आप अपने इस घृणित कर्म का कष्टकर फल भोगेंगे, जब युधिष्ठिर को आगे रखकर पाण्डु के वीर पुत्रों से आपका सामना होगा।” यह कहकर धौम्य जयद्रथ की पैदल सेना के बीच घुसकर, उस हरण की जाती राजकुमारी के पीछे-पीछे चल पड़े।

समझने की कुंजी (छह राजगुण और सत्रह कुल): जयद्रथ अपने वंश-गौरव में “सत्रह उच्च कुल” और “छह राजगुण” गिनाता है। प्राचीन राजनीति में राजा के छह गुण माने जाते थे: सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैध और आश्रय (अर्थात् मेल, युद्ध, चढ़ाई, ठहराव, सेना-विभाजन और शरण)। यह ध्यान देने योग्य है कि वंश और गुण का गर्व उसे अधर्म से नहीं रोकता; कथा यहीं दिखाती है कि कुलीनता और सद्गुण भिन्न वस्तुएँ हैं।

सार: द्रौपदी ने पाण्डवों के पराक्रम की चेतावनी दी, पर जयद्रथ ने उसे बलपूर्वक रथ पर चढ़ा लिया; गुरु धौम्य उसे रोकते हुए सेना के पीछे-पीछे चल पड़े।

अपशकुन, दासी का रुदन और पाण्डवों का पीछा

अशुभ पक्षियों से घिरे आकाश तले पांचों पांडव धनुष लिए द्रौपदी की खोज में दौड़ते हुए।

इसी बीच, पृथ्वी के वे श्रेष्ठ धनुर्धर, अलग-अलग दिशाओं में विचरकर और बहुत-से मृग-भैंसों का वध करके, अन्ततः एक साथ मिले। उन्होंने देखा कि वह विशाल वन, जो मृग और वन्य पशुओं के झुण्डों से भरा था और पक्षियों के तीव्र स्वरों से गूँज रहा था, अब विकट चीत्कारों से व्याप्त है। युधिष्ठिर ने भाइयों से कहा, “सूर्य से प्रकाशित दिशा की ओर उड़ते ये पक्षी और भागते वन-पशु विकट स्वर निकाल रहे हैं और अत्यन्त उद्विग्न हैं। यह सब बताता है कि इस वन में किसी शत्रु ने घुसपैठ की है। एक क्षण की देर किए बिना हम आखेट छोड़ें। मेरा हृदय जल रहा है और मानो फटा जा रहा है। यह काम्यक वन मुझे ऐसा सूना जान पड़ता है जैसे गरुड़ द्वारा अपने भीतर के सर्प से रहित कर दिया गया कोई सरोवर, या प्यासे मनुष्यों द्वारा खाली कर दिया गया घड़ा, या राजा और समृद्धि से रहित कोई राज्य।”

यों कहकर वे वीर सिन्धु-नस्ल के, वायु के वेग वाले अश्वों से जुते सुन्दर रथों पर अपने आश्रम की ओर दौड़ पड़े। लौटते समय मार्ग में उन्होंने बाईं ओर एक गीदड़ को विकट रीति से चिल्लाते देखा। युधिष्ठिर ने उसे ध्यान से देखकर भीम और धनंजय से कहा, “बाईं ओर बोलता यह गीदड़ स्पष्ट संकेत दे रहा है कि पापी कौरवों ने हमारी उपेक्षा करके बलप्रयोग से हमें पीड़ा देनी आरम्भ कर दी है।”

आश्रम पहुँचकर उन्होंने द्रौपदी की दासी धात्रेयिका को भूमि पर पड़ी सिसकती-रोती पाया। सारथि इन्द्रसेन ने रथ से शीघ्र उतरकर उससे व्यथित मन से पूछा, “आप यों भूमि पर पड़ी क्यों रो रही हैं, और आपका मुख इतना उदास और पीला क्यों है? कहीं किसी क्रूर ने अनुपम रूप वाली राजकुमारी द्रौपदी का अनिष्ट तो नहीं किया, जो उन कुरुश्रेष्ठों में से हर एक की दूसरी आत्मा है? वह कौन मूर्ख होगा जो पाण्डु के सदा-विजयी पुत्रों का यह अमूल्य रत्न हर ले जाए, जो उन्हें अपने प्राणों के समान प्रिय है?”

यों पूछे जाने पर धात्रेयिका ने अपना सुन्दर मुख पोंछकर सारथि इन्द्रसेन से कहा, “इन्द्र-समान पाँचों पाण्डु-पुत्रों की उपेक्षा करके जयद्रथ कृष्णा को बलपूर्वक हर ले गया है। उसके द्वारा बनाया मार्ग अभी मिटा नहीं है, क्योंकि टूटी हुई वृक्ष-शाखाएँ अभी कुम्हलाई नहीं हैं। अतः अपने रथ मोड़कर शीघ्र उसका पीछा कीजिए, क्योंकि राजकुमारी अभी दूर नहीं गई होगी। ऐसा न हो कि भय या बल से दबकर वह किसी अयोग्य के हाथ पड़ जाए, जैसे यज्ञ की पवित्र आहुति राख के ढेर पर उँडेल दी जाए।”

वृद्ध धौम्य बाहें फैलाकर सैनिकों के बीच दौड़ते हुए, रथ पर जयद्रथ द्रौपदी को लिए भागता।

युधिष्ठिर ने कहा, “हट जाओ, भद्रे, और अपनी वाणी संयत करो। हमारे सामने इस प्रकार मत बोलो। जो राजा या राजकुमार शक्ति के मद में चूर होते हैं, वे अवश्य दुर्गति को प्राप्त होते हैं।” इन वचनों के साथ वे बताए गए मार्ग पर चल पड़े, साँपों की फुफकार-से गहरी साँसें भरते और अपने विशाल धनुषों की प्रत्यंचाएँ टंकारते हुए। तभी उन्होंने जयद्रथ की सेना के घोड़ों के खुरों से उठी धूल देखी, और रावण-सेना के बीच भीम को आगे बढ़ने को प्रेरित करते धौम्य को देखा। उन राजकुमारों ने धौम्य को धैर्य बँधाते हुए कहा, “आप प्रसन्न मन से लौट आइए,” और फिर बाज के समान झपटकर उस सेना पर टूट पड़े।

समझने की कुंजी (अपशकुन): महाभारत में प्रकृति और पशु-पक्षी अक्सर आने वाली घटना के संकेत-वाहक बनते हैं। पक्षियों का विकट कलरव, बाईं ओर चिल्लाता गीदड़, सूना-सा लगता वन, ये सब युधिष्ठिर को भीतर ही भीतर अनिष्ट की सूचना दे देते हैं। यह कथा-कौशल पाठक के भीतर तनाव बाँधता है, इससे पहले कि दासी का रुदन सत्य खोले।

सार: अपशकुनों से सावधान पाण्डव आश्रम लौटे, रोती दासी से हरण का समाचार पाया, और टूटी शाखाओं के चिह्नों के सहारे जयद्रथ की सेना का पीछा करके उस पर टूट पड़े।

रथ पर बैठी द्रौपदी का पतियों का परिचय देना

भीमसेन और अर्जुन को देखकर शत्रु क्षत्रियों ने वन में बड़ा कोलाहल मचाया। और दुष्ट जयद्रथ, जब उन कुरुश्रेष्ठों के ध्वज देखे, तो उसका हृदय बैठ गया। उसने अपने रथ पर बैठी याज्ञसेनी से कहा, “हे कृष्णा, जो ये पाँच महान योद्धा आ रहे हैं, ये निश्चय ही आपके पति होंगे। आप तो पाण्डु-पुत्रों को भली-भाँति जानती हैं; इसलिए हे सुकेशी, एक-एक करके बताइए कि कौन किस रथ पर है।”

द्रौपदी ने उत्तर दिया, “यह हिंसक कर्म करके, जो आपकी आयु घटाने वाला है, अब इन महान योद्धाओं के नाम जानकर आप क्या करेंगे, ओ मूर्ख? अब जब मेरे वीर पति आ पहुँचे हैं, आपमें से एक भी युद्ध में जीवित नहीं बचेगा। फिर भी, चूँकि आप मृत्यु के मुख में खड़े होकर पूछ रहे हैं, मैं आपको सब बताती हूँ, क्योंकि यही उचित है। जिस योद्धा के ध्वज-दण्ड पर नन्द और उपनन्द नामक दो सुन्दर और गूँजते नगाड़े सदा बजते रहते हैं, वह सौवीर-नरेश, अपने कर्मों के धर्म का यथार्थ ज्ञाता है। शुद्ध सोने-सी कान्ति, उन्नत नासिका, विशाल नेत्र और सुगठित देह वाले मेरे वे पति युधिष्ठिर के नाम से प्रसिद्ध हैं, धर्म के पुत्र और कुरुवंश में अग्रणी। वह धर्मात्मा शरणागत शत्रु को भी प्राणदान देते हैं। अतः ओ मूर्ख, अपने शस्त्र फेंककर, हाथ जोड़कर उनकी शरण में दौड़ जाइए, यही आपके हित में है।

“और वह दूसरा, जिसे आप लम्बी भुजाओं वाला और पूर्ण-वृद्ध शाल-वृक्ष-सा ऊँचा, रथ पर बैठा, होंठ काटता और भौंहें सिकोड़ता देख रहे हैं, वह मेरे पति वृकोदर (भीम) हैं। उनके कर्म अमानवीय हैं, इसी से पृथ्वी पर वे भीम के नाम से जाने जाते हैं। जो उन्हें ठेस पहुँचाते हैं, वे कभी जीवित नहीं रहते; वे शत्रु को कभी नहीं भूलते। और वह श्रेष्ठ धनुर्धर, बुद्धि और कीर्ति से सम्पन्न, इन्द्रियों पर पूर्ण संयम वाला, युधिष्ठिर का भाई और शिष्य, मेरे पति धनंजय (अर्जुन) हैं। वे काम, भय या क्रोध से कभी धर्म नहीं त्यागते, न कभी क्रूर कर्म करते हैं।

“और वह दूसरा युवक, जो धर्म और अर्थ के हर प्रश्न में निपुण है, भयभीतों का भय दूर करता है, और जो समस्त संसार में परम सुन्दर पुरुष माना जाता है, वह मेरे पति नकुल हैं, महान पराक्रमी। और वह वीर, शस्त्रों में निपुण, बुद्धिमान और विवेकी, धर्म-पुत्र को प्रिय करने में तत्पर, पाण्डवों में कनिष्ठ, वह मेरे पति सहदेव हैं। वीर, बुद्धिमान, विवेकी; उनके समान बुद्धि या वाणी में और कोई नहीं। जब पाण्डु-पुत्र आपके योद्धाओं को युद्ध में मार डालेंगे, तब आप अपनी सेना को उस जहाज़-सी दुर्दशा में देखेंगे जो रत्नों से लदी हुई किसी विशाल मत्स्य की पीठ पर टूट चुकी हो।”

भीम गदा और अर्जुन धनुष लिए जयद्रथ की सेना को चीरते, रथ पर द्रौपदी को लिए जयद्रथ भागता।

तब वे पाँचों पृथा-पुत्र, हर एक इन्द्र-समान, क्रोध से भरकर, दया की भीख माँगती भयभीत पैदल सेना को छोड़, रथारूढ़ योद्धाओं पर चारों ओर से टूट पड़े और बाणों की घनी वर्षा से आकाश तक अन्धकारमय कर दिया।

सार: भयभीत जयद्रथ के पूछने पर द्रौपदी ने रथ पर बैठे-बैठे पाँचों पतियों का परिचय देकर उसे शरण लेने को कहा; पर पाण्डव क्रोध से शत्रु-सेना पर बाण-वर्षा करते टूट पड़े।

युद्ध, सेना का संहार और जयद्रथ का पलायन

सिन्धुराज अपने राजकुमारों को “रुको, मारो, बढ़ो, शीघ्र करो” जैसी आज्ञाएँ देता रहा। पर भीम, अर्जुन, जुड़वाँ भाइयों और युधिष्ठिर को देख शिवि, सौवीर और सिन्धु जातियों के योद्धा, उन प्रचण्ड व्याघ्र-समान वीरों के समक्ष, हतोत्साह हो गए। भीमसेन, सोने से मढ़ी शुद्ध शैक्य-लोहे की गदा लेकर, मृत्यु को प्राप्त उस सिन्धुराज की ओर झपटे। पर कोटिकाख्य ने रथियों की पंक्ति से वृकोदर को घेरकर बीच में आ गया। अनेक भालों, गदाओं और लौह-बाणों से प्रहार किए जाने पर भी भीम क्षणभर को न डिगे; उन्होंने अपनी गदा से जयद्रथ के रथ के आगे लड़ते एक हाथी को उसके महावत और चौदह पैदल सैनिकों सहित मार गिराया।

अर्जुन ने, सौवीर-राज को पकड़ने की इच्छा से, सिन्धु-सेना के आगे लड़ते पाँच सौ वीर पर्वतवासियों का वध किया। उस संग्राम में राजा युधिष्ठिर ने पलक झपकते सौवीरों के सौ श्रेष्ठ योद्धाओं को मार डाला। नकुल ने खड्ग हाथ में लिए रथ से कूदकर, बीज बोते किसान-सा, पीछे लड़ते सैनिकों के सिर बिखेर दिए। और सहदेव ने रथ से लौह-बाणों से हाथियों पर लड़ते अनेक योद्धाओं को, वृक्ष की डालों से गिरते पक्षियों-सा, गिराया।

तब त्रिगर्त-राज ने धनुष लेकर अपने विशाल रथ से उतरकर अपनी गदा से युधिष्ठिर के चारों अश्व मार डाले। पर कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिर ने शत्रु को इतना समीप और पैदल लड़ते देख, अर्धचन्द्राकार बाण से उसका वक्ष बेध दिया। वह वीर रक्त वमन करता उखड़े वृक्ष-सा भूमि पर गिर पड़ा। अश्वहीन हुए युधिष्ठिर इन्द्रसेन के साथ रथ से उतरकर सहदेव के रथ पर चढ़ गए।

क्षेमंकर और महामुक्ष नामक दो योद्धाओं ने नकुल को घेरकर दोनों ओर से तीखे बाणों की वर्षा की, पर माद्री-पुत्र ने दो लम्बे बाणों से उन दोनों को मार गिराया। त्रिगर्त-राज सुरथ, गज-युद्ध में निपुण, नकुल के रथ के सामने आकर उसे अपने हाथी से खिंचवाने लगा; पर निर्भीक नकुल रथ से कूदकर ढाल-तलवार लिए पर्वत-सा अचल खड़ा हो गया, और जब सुरथ का मदमत्त हाथी सूँड उठाए पास आया, तो नकुल ने एक ही वार में उसकी सूँड और दाँत काट डाले। वह कवचधारी हाथी भयंकर चिग्घाड़ता हुआ अपने सवारों को कुचलता गिर पड़ा। यह दुस्साहसी कर्म करके माद्री-पुत्र भीमसेन के रथ पर चढ़कर कुछ विश्राम करने लगा।

भीम ने कोटिकाख्य को युद्ध को झपटते देख, अश्व-नाल-सदृश बाण से उसके सारथि का सिर काट दिया। बिना सारथि के राजकुमार का रथ चारों दिशाओं में दौड़ने लगा; भीम ने पास जाकर उसे दाढ़ी-वाले भाले से मार डाला। और धनंजय ने अपने तीखे अर्धचन्द्राकार बाणों से बारहों सौवीर वीरों के सिर और धनुष काट डाले, तथा इक्ष्वाकुओं, शिवियों, त्रिगर्तों और सैन्धवों के नायकों को संहार दिया। अनेक हाथी अपने झण्डों सहित और रथ अपनी ध्वजाओं सहित अर्जुन के हाथों गिरते देखे गए। धड़-रहित सिर और सिर-रहित धड़ समूचे रणक्षेत्र में बिखर गए, और श्वान, गीध, कौवे और गीदड़ मारे गए योद्धाओं के मांस-रक्त पर टूट पड़े।

जब जयद्रथ ने अपने योद्धा मारे जाते देखे, तो वह भयभीत होकर कृष्णा को छोड़कर भागने को व्याकुल हो उठा। उसी अफरा-तफरी में वह नीच द्रौपदी को वहीं उतारकर, उसी वन-मार्ग से, जिससे आया था, अपनी जान बचाकर भागा। राजा युधिष्ठिर ने धौम्य के आगे चलते द्रौपदी को देख, उसे माद्री-पुत्र सहदेव के रथ पर चढ़वा लिया। जयद्रथ के भागने पर भीम लौह-बाणों से भागते अनुचरों को नाम ले-लेकर गिराने लगे। पर अर्जुन ने, यह देखकर कि जयद्रथ भाग निकला है, भाई को शेष सैन्धव-सेना के संहार से रोका और कहा, “रणक्षेत्र में मुझे जयद्रथ नहीं मिल रहा, जिसके अकेले अपराध से हमें यह विपत्ति झेलनी पड़ी। पहले उसे ढूँढ़ो; इन सैनिकों को मारने से क्या लाभ?”

सार: पाण्डवों ने सिन्धु-सौवीर सेना का भीषण संहार किया; भीम, अर्जुन, युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव ने अपने-अपने प्रतिद्वन्द्वी काट गिराए; और भयभीत जयद्रथ द्रौपदी को छोड़ अकेला भाग निकला।

द्रौपदी का आक्रोश और भीम-अर्जुन का जयद्रथ-पीछा

भीमसेन ने अर्जुन से कहा, “हे राजन्, शत्रु के बहुत-से योद्धा मारे जा चुके हैं और शेष चारों ओर भाग रहे हैं। आप द्रौपदी, जुड़वाँ भाइयों और उच्च-आत्मा धौम्य को लेकर आश्रम लौटिए और राजकुमारी को सान्त्वना दीजिए। उस मूर्ख सिन्धुराज को मैं जीते-जी नहीं छोड़ूँगा, चाहे वह पाताल में शरण ले या स्वयं इन्द्र उसकी पीठ पर हो।” युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “हे महाबाहु, अपनी बहन दुःशला और सम्माननीया गान्धारी का स्मरण करके आप सिन्धुराज का वध मत कीजिए, चाहे वह कितना ही दुष्ट क्यों न हो।”

यह सुनकर द्रौपदी अत्यन्त उद्वेलित हो उठी। वह बुद्धिमती स्त्री, क्रोध और लज्जा मिश्रित भाव से, अपने दोनों पतियों भीम और अर्जुन से बोली, “यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं, तो उस नीच, पापी, मूर्ख और घृणित सैन्धव-नायक का वध अवश्य कीजिए। जो शत्रु किसी की पत्नी को बलपूर्वक हर ले जाए, और जो राज्य छीन ले, उसे रणभूमि में कभी क्षमा नहीं करना चाहिए, चाहे वह दया की भीख ही क्यों न माँगे।” यों उत्साहित होकर वे दोनों वीर सैन्धव-नायक की खोज में निकल पड़े, और राजा कृष्णा तथा गुरु धौम्य को लेकर आश्रम लौटे।

आश्रम में युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय और अन्य ब्राह्मणों को द्रौपदी की विपत्ति पर शोक करते पाया। द्रौपदी को पुनः पाकर और सैन्धव-सौवीर सेना को परास्त कर लौटे राजा को देख सब हर्षित हो उठे, और कृष्णा दोनों भाइयों के साथ आश्रम में प्रविष्ट हुई।

इधर भीम और अर्जुन को ज्ञात हुआ कि शत्रु पूरे दो योजन (लगभग सोलह से चौबीस किलोमीटर का प्राचीन माप) आगे है। उन्होंने अश्वों को और तेज़ दौड़ाया। अर्जुन ने एक अद्भुत कर्म किया: दो योजन की दूरी से ही, मन्त्र-अभिमन्त्रित बाणों से जयद्रथ के घोड़े मार डाले। अश्व मरे देख जयद्रथ अत्यन्त व्यथित हुआ और उसी वन-मार्ग से भागता रहा। अर्जुन ने उसे जा लिया और कहा, “इतने पौरुषहीन होकर आपने एक स्त्री को बल से हरने का साहस कैसे किया? लौटिए, हे राजकुमार; भागना आपको शोभा नहीं देता।” पर सिन्धुराज एक बार भी न मुड़ा। तब भीम ने उसे एक ही क्षण में जा पकड़ा, पर दयालु अर्जुन ने उन्हें उस नीच के वध से रोका।

समझने की कुंजी (नैतिक तनाव): यहाँ कथा की नैतिक जटिलता खुलती है। युधिष्ठिर बहन दुःशला और गान्धारी के सम्बन्ध के कारण जयद्रथ को जीवित रखना चाहते हैं, द्रौपदी न्याय की माँग पर उसका वध चाहती है, और अर्जुन बार-बार भीम के क्रोध पर अंकुश लगाते हैं। एक ही घटना पर तीन धर्म टकराते हैं: सम्बन्ध-धर्म, दण्ड-धर्म और क्षमा-धर्म। महाभारत किसी एक को सीधा-सही नहीं ठहराता।

सार: युधिष्ठिर ने दुःशला के कारण जयद्रथ को न मारने को कहा, द्रौपदी ने उसका वध माँगा; भीम-अर्जुन दो योजन पीछा कर उसे जा पकड़ते हैं, पर अर्जुन भीम को वध से रोक देते हैं।

भीम का दण्ड: पाँच चोटियाँ और दासत्व का वचन

दोनों भाइयों को भुजाएँ उठाए देख जयद्रथ अत्यन्त व्यथित होकर वेग से भागा। पर क्रुद्ध भीमसेन रथ से उतरकर उस भागते राजा के पीछे दौड़े और उसके केश पकड़ लिए। उन्होंने उसे आकाश में ऊँचा उठाकर बल से भूमि पर पटक दिया। फिर सिर पकड़कर इधर-उधर रगड़ा। जब वह दुष्ट होश में आकर कराहते हुए उठने लगा, तो भीम ने उसके सिर पर लात मारी और घुटनों तथा मुक्कों से उसके वक्ष को दबाया, जिससे वह मूर्च्छित हो गया।

भूमि पर पड़े जयद्रथ के केश काटकर भीम पांच चोटियां छोड़ते हुए, पांडव और द्रौपदी देखते।

तब अर्जुन ने युधिष्ठिर के दुःशला-सम्बन्धी वचन का स्मरण कराकर क्रुद्ध भीम को और दण्ड देने से रोका। पर भीम बोले, “इस पापी ने कृष्णा का घोर अपमान किया है, जो ऐसा व्यवहार सह ही नहीं सकती। यह तो मेरे हाथों मरने योग्य है। पर मैं क्या करूँ? राजा सदा दया से भरे रहते हैं, और आप भी अपने बालक-सरीखे धर्म-बोध से सदा मेरे मार्ग में बाधा डालते हैं।” यों कहकर वृकोदर ने अपने अर्धचन्द्राकार बाण से उसके सिर के बाल इस प्रकार मूँड डाले कि पाँच स्थानों पर पाँच चोटियाँ छोड़ दीं। जयद्रथ इस पर एक शब्द भी न बोला।

तब वृकोदर ने शत्रु से कहा, “यदि आप जीवित रहना चाहते हैं, तो सुनिए। आपको भरी सभाओं और खुले दरबारों में कहना होगा, ‘मैं पाण्डवों का दास हूँ।’ इसी शर्त पर मैं आपको प्राणदान दूँगा। रणभूमि में विजय का यही प्रचलित नियम है।” यों आदेशित और दण्डित होकर जयद्रथ ने काँपते, मूर्च्छित और धूल से सने हुए कहा, “ऐसा ही हो।” तब अर्जुन और भीम ने उसे जंजीरों से बाँधकर रथ पर डाल दिया, और भीम स्वयं उस रथ पर चढ़कर, अर्जुन के साथ, आश्रम की ओर चल पड़े।

पांच चोटियों वाला रस्सियों में बंधा जयद्रथ घुटनों पर झुका, आसन पर बैठे युधिष्ठिर क्षमा का हाथ उठाए।

भीम ने जयद्रथ को उसी दशा में युधिष्ठिर के समक्ष रख दिया। राजा मुसकराते हुए उसे मुक्त करने को कहने लगे। भीम बोले, “द्रौपदी से कहिए कि यह दुष्ट पाण्डवों का दास बन चुका है।” तब बड़े भाई ने स्नेह से कहा, “यदि आपको हमारा कुछ भी ध्यान है, तो इस दुष्ट को मुक्त कर दीजिए।” द्रौपदी ने भी राजा के मन को भाँपकर कहा, “इसे छोड़ दीजिए। यह राजा का दास हो ही चुका है, और आपने इसके सिर पर पाँच चोटियाँ छोड़कर इसे विरूप भी कर दिया है।”

तब वह लज्जित राजकुमार, मुक्त होकर, युधिष्ठिर के पास आकर नतमस्तक हुआ। वहाँ बैठे मुनियों को भी उसने प्रणाम किया। दयालु युधिष्ठिर ने उससे कहा, “आप अब स्वतन्त्र हैं; मैं आपको मुक्त करता हूँ। जाइए और फिर ऐसा कर्म न कीजिए; आपको धिक्कार है। आप जैसे नीच और निर्बल होकर भी एक स्त्री को बल से हरने का विचार किया। आपका हृदय धर्म में बढ़े; फिर कभी मन को अधर्म-कर्म में मत लगाइए। अब अपने रथ, अश्व और सैनिकों सहित शान्ति से प्रस्थान कीजिए।” यों कहे जाने पर वह राजकुमार लज्जा से अभिभूत, सिर झुकाए, चुपचाप और दुःखी मन से वहाँ से चल पड़ा जहाँ गंगा पर्वतों से उतरकर मैदान में आती है।

समझने की कुंजी (पाँच चोटियाँ और दासत्व): भीम जयद्रथ का वध नहीं करते, पर उसे जीवनभर का अपमान दे देते हैं। सिर पर केवल पाँच चोटियाँ छोड़ देना उस युग में मुण्डन-सा अपमान-चिह्न था, और भरी सभा में स्वयं को “पाण्डवों का दास” कहलवाना उसके राजसी गर्व पर स्थायी आघात। प्राणदान देकर भी उन्होंने उसे क्षत्रिय-गौरव से वंचित कर दिया, जो मृत्यु से भी कठोर दण्ड माना जाता था।

सार: भीम ने जयद्रथ को पीट-पीटकर सिर पर पाँच चोटियाँ छोड़ दीं और उससे “मैं पाण्डवों का दास हूँ” कहलवाया; युधिष्ठिर ने उसे जीवनदान देकर मुक्त कर दिया, और लज्जित जयद्रथ गंगाद्वार की ओर चला गया।

जयद्रथ की तपस्या और शिव का वरदान

पर्वतों में हाथ जोड़े तप करते जयद्रथ के आगे त्रिशूलधारी शिव नंदी सहित प्रकट होते हुए।

गंगाद्वार पहुँचकर जयद्रथ ने त्रिनेत्र, उमापति महादेव की शरण ली और वहाँ कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने साक्षात् प्रकट होकर उसकी अर्चना स्वीकार की और वर देने को कहा। जयद्रथ ने वर माँगा, “मैं युद्ध में पाँचों पाण्डु-पुत्रों को उनके रथों सहित परास्त कर सकूँ!” पर महादेव ने कहा, “यह नहीं हो सकता। इन्हें युद्ध में कोई मार या जीत नहीं सकता। अर्जुन को छोड़कर, शेष चारों को आप केवल एक बार (एक दिन के लिए) रणभूमि में रोक सकेंगे।

“महाबाहु अर्जुन साक्षात् नर नामक देव का अवतार है। उसने प्राचीन काल में बदरी-वन में तपस्या की थी। नारायण उसका सखा है, इसी से वह देवताओं के लिए भी अजेय है। मैंने स्वयं उसे पाशुपत नामक दिव्य अस्त्र दिया है। दसों दिशाओं के लोकपालों से उसने वज्र आदि महान अस्त्र प्राप्त किए हैं। और जो भगवान विष्णु, अनन्त चैतन्य, समस्त देवताओं के परम गुरु और निर्गुण परमपुरुष, समूची सृष्टि में व्याप्त हैं, वही विष्णु अर्जुन के रक्षक हैं।”

समझने की कुंजी (वर का बीज): यह वरदान आगे चलकर महाभारत-युद्ध के एक निर्णायक दिन का बीज है। शिव का यह वचन कि जयद्रथ अर्जुन को छोड़ शेष पाण्डवों को “केवल एक दिन” रोक सकेगा, ठीक उसी दिन फलित होता है जब चक्रव्यूह में अभिमन्यु अकेला घिर जाता है, क्योंकि जयद्रथ द्वार पर शेष पाण्डवों को रोके रखता है। इस प्रकार वन-काल की यह छोटी-सी घटना युद्ध की परम करुण घटना से जा जुड़ती है।

सार: अपमानित जयद्रथ ने गंगाद्वार पर शिव की तपस्या की और यह वर पाया कि अर्जुन को छोड़कर शेष पाण्डवों को वह एक दिन रणभूमि में रोक सकेगा, क्योंकि अर्जुन स्वयं नर का अवतार और नारायण-रक्षित है।

शिव की वाणी में नारायण की महिमा: प्रलय और अवतार

महादेव ने जयद्रथ को विष्णु की अद्भुत महिमा भी सुनाई। “युग-चक्र के अन्त में वही भगवान सर्वभक्षी अग्नि का रूप धरकर पर्वतों, समुद्रों, द्वीपों और वनों सहित समूचे विश्व को भस्म कर देते हैं। पाताल के नागलोक का भी इसी प्रकार संहार हो जाने पर, बिजली की धारियों से युक्त, भीषण गर्जना करते रंग-बिरंगे मेघ समूचे आकाश में फैल जाते हैं और रथ-धुरी-सी मोटी धाराओं में जल बरसाकर उस सर्वभक्षी अग्नि को बुझा देते हैं।

“चार हज़ार युगों के अन्त में जब पृथ्वी एक विशाल समुद्र-सी जल से भर जाती है, समस्त चर प्राणी मृत्यु में लीन हो जाते हैं, सूर्य, चन्द्र और वायु नष्ट हो जाते हैं, और विश्व ग्रह-नक्षत्रों से रहित हो जाता है, तब सहस्र मस्तकों, सहस्र नेत्रों और सहस्र चरणों वाले इन्द्रियातीत परमपुरुष नारायण विश्राम की इच्छा करते हैं। सहस्र फणों वाला, दस हज़ार सूर्यों-सा देदीप्यमान, कुन्द-पुष्प, चन्द्र, मोती-माला और श्वेत कमल-सा उज्ज्वल शेषनाग उनकी शय्या बनता है। उस गहन जल-राशि की गोद में वह सर्वशक्तिमान सोते हैं, और समूचे अवकाश को रात्रि के अन्धकार से ढक देते हैं।

“जब उनकी सृजन-शक्ति जागती है, तब वे जागकर विश्व को शून्य पाते हैं। इसी प्रसंग में नारायण नाम की व्याख्या सुनी जाती है: नर ऋषि से जल उत्पन्न हुआ और वही उनका शरीर बना, इसी से वह ‘नार’ कहलाया; और वही जल उनका ‘अयन’ अर्थात् विश्राम-स्थान बना, इसी से वे ‘नारायण’ कहलाए। पुनः सृष्टि के ध्यान में लीन उस शाश्वत पुरुष के नाभि से एक कमल प्रकट होता है, और उस नाभि-कमल से चतुर्मुख ब्रह्मा निकलते हैं। फिर सबके पितामह ब्रह्मा उस कमल पर बैठकर, विश्व को शून्य देख, अपने ही संकल्प से अपने सदृश मरीचि आदि महर्षियों की रचना करते हैं, और वे महर्षि यक्ष, राक्षस, पिशाच, सरीसृप, मनुष्य तथा समस्त चर-अचर सृष्टि पूर्ण करते हैं।

“परमात्मा की तीन अवस्थाएँ हैं: ब्रह्मा-रूप में वे सृष्टि करते हैं, विष्णु-रूप में पालन करते हैं, और रुद्र-रूप में संहार करते हैं। जब विश्व इस प्रकार जल-मय हो गया था, तब वही प्रभु, स्थिर भूमि की खोज में, वर्षा-रात्रि के जुगनू-से इधर-उधर घूमे। ‘मैं जल में डूबी इस पृथ्वी को कैसे उठाऊँ?’ यों सोचकर उन्होंने जल में क्रीड़ा-प्रिय वराह (सूअर) का रूप धरा, दस योजन लम्बा, नुकीले दाँतों वाला, मेघ-सा श्याम और पर्वत-सा विशाल; और जल में कूदकर अपने एक दाँत से पृथ्वी को उठाकर उसके यथास्थान रख दिया।

“फिर किसी समय उन्होंने आधा सिंह-आधा मनुष्य (नृसिंह) का अद्भुत रूप धरा। दैत्यराज हिरण्यकशिपु उस विचित्र रूप को देख क्रोध से जल उठा और त्रिशूल लेकर उस पर झपटा। पर उस नर-सिंह ने आकाश में छलाँग मारकर अपने तीखे नखों से दैत्य को चीर डाला। फिर वही कमलनयन प्रभु कश्यप से अदिति के गर्भ में जन्मे; हज़ार वर्ष बाद वामन-रूप में, बौने ब्राह्मण-बालक के वेश में, दण्ड-कमण्डलु लिए और वक्ष पर श्रीवत्स-चिह्न धारण किए प्रकट हुए। वे दानवराज बलि के यज्ञ में बृहस्पति की सहायता से पहुँचे। बलि ने प्रसन्न होकर कहा, ‘ब्राह्मण, माँगिए, क्या चाहिए?’ वामन ने मुसकराकर कहा, ‘केवल तीन पग भूमि।’ बलि ने स्वीकार किया, और तब हरि ने अपने तीन ही पगों में यह समूचा अनन्त विश्व नाप लिया, और इसे इन्द्र को दे दिया। यही कथा ‘वामन-अवतार’ के नाम से प्रसिद्ध है।

“और दुष्टों के संहार तथा धर्म की रक्षा के लिए वही विष्णु यदुवंश में मनुष्यों के बीच जन्मे हैं, और कृष्ण कहलाते हैं। हे सिन्धुराज, शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले, पीताम्बरधारी, श्रीवत्स-चिह्नित उन अजेय कृष्ण की ही रक्षा में अर्जुन है। उस अनन्त-शक्ति, कमलनयन, शत्रुसंहारक के साथ एक ही रथ पर बैठा पृथा-पुत्र अजेय है। देवता भी उसका सामना नहीं कर सकते, फिर मनुष्य की क्या बात? इसलिए, हे राजन्, आप उसे छोड़ देना। शेष चार पाण्डवों को आप केवल एक दिन रोक सकेंगे।”

यह कहकर त्रिनेत्र हर, उमापति, अपने बौने, कुबड़े और भयंकर नेत्र-कानों वाले गणों से घिरे हुए, उमा सहित वहाँ से अन्तर्धान हो गए। और दुष्ट जयद्रथ भी अपने घर लौट गया, जबकि पाण्डव काम्यक वन में रहते रहे।

समझने की कुंजी (युग-संख्या का आधुनिक समतुल्य): “चार हज़ार युग” का अभिप्राय एक कल्प के अन्त में होने वाले महाप्रलय से है। पारम्परिक गणना में एक हज़ार चतुर्युगी (सत्य-त्रेता-द्वापर-कलि का एक चक्र) मिलकर ब्रह्मा का एक दिन बनता है, जिसके अन्त में यह जल-प्रलय होता है। यह संख्या कोटि-कोटि वर्षों के विराट काल-मान का संकेत है, जहाँ सृष्टि और संहार एक अनन्त लय में दोहराते रहते हैं।

सार: शिव ने जयद्रथ को नारायण की महिमा सुनाई: प्रलय में सर्वभक्षी अग्नि और महाजल, शेष-शय्या पर सोते नारायण, नाभि-कमल से ब्रह्मा का जन्म, और वराह, नृसिंह, वामन तथा कृष्ण के अवतार; फिर शिव और जयद्रथ दोनों अपने-अपने मार्ग गए।

युधिष्ठिर का प्रश्न: क्या कोई मुझसे भी अधिक अभागा हुआ है?

जनमेजय ने पूछा, “द्रौपदी के इस हरण से ऐसा कष्ट सहकर वे नरश्रेष्ठ पाण्डव फिर क्या करने लगे?” वैशम्पायन ने कहा, “जयद्रथ को परास्त कर और कृष्णा को छुड़ाकर धर्मराज युधिष्ठिर मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय के पास बैठ गए। द्रौपदी की विपत्ति पर शोक करते उन तपस्वियों के बीच, पाण्डु-पुत्र युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय से कहा, ‘हे पूज्य, देवताओं और तपस्वियों में आप भूत और भविष्य दोनों के पूर्ण ज्ञाता माने जाते हैं। मेरे मन में एक सन्देह है जिसे आप दूर करें।

“‘यह द्रुपद की कन्या यज्ञ-वेदी से उत्पन्न हुई है, मांस से जन्मी नहीं; यह अत्यन्त पुण्यवती है और महात्मा पाण्डु की पुत्रवधू भी। मुझे लगता है कि काल, कर्म पर आश्रित मानव-नियति, और अनिवार्य भाग्य, प्राणियों के सम्बन्ध में अपराजेय हैं। यदि ऐसा न होता, तो हमारी इस सती और पतिव्रता पत्नी पर ऐसी विपत्ति कैसे आती, जैसे किसी ईमानदार पर चोरी का झूठा आरोप? द्रुपद-कन्या ने न कभी कोई पापकर्म किया, न कोई अप्रशंसनीय कार्य; उलटे उसने ब्राह्मणों के प्रति उच्चतम धर्म का अभ्यास किया है। फिर भी मूर्ख जयद्रथ उसे बलपूर्वक हर ले गया।

“‘यह सच है कि सिन्धु-सेना को मारकर हमने उसे छुड़ा लिया, और उस पापी के सिर पर चोटियाँ छुड़वाकर उसे और उसके सहयोगियों को परास्त भी किया। पर असावधानी के क्षण में हमारी पत्नी के इस हरण का कलंक हम पर लग ही गया। यह वन-जीवन दुःखों से भरा है। हम आखेट से जीते हैं, और वन में रहकर भी उन्हीं प्राणियों का वध करते हैं जो हमारे साथ रहते हैं। यह वनवास भी कुटिल बन्धुओं के छल का फल है। क्या कोई मुझसे अधिक अभागा है? क्या आपने पहले कभी ऐसा किसी को देखा या सुना है?’”

एक उप-कथा: द्रौपदी का “मांस से नहीं, यज्ञ-वेदी से जन्म” कोई अलंकार नहीं, अपितु उसकी उत्पत्ति-कथा है। राजा द्रुपद ने द्रोण से बैर लेने के लिए एक यज्ञ कराया था, और उसी यज्ञ-अग्नि से धृष्टद्युम्न और द्रौपदी (कृष्णा) प्रकट हुए थे। इसी से वह “याज्ञसेनी” (यज्ञ से उत्पन्न) कहलाती है। युधिष्ठिर इसी दिव्य जन्म का स्मरण कर पूछते हैं कि ऐसी पुण्यमयी पर भी विपत्ति क्यों।

सार: द्रौपदी को पुनः पाकर भी आहत युधिष्ठिर मार्कण्डेय से पूछते हैं कि क्या उनसे अधिक अभागा कोई और हुआ है, और काल-कर्म-भाग्य की अपराजेयता पर अपना सन्देह व्यक्त करते हैं।

मार्कण्डेय का उत्तर: राम भी ऐसे ही दुःख में पड़े थे

मार्कण्डेय ने कहा, “हे भरतश्रेष्ठ, राम ने भी अतुलनीय दुःख सहा था; क्योंकि दुर्बुद्धि राक्षसराज रावण ने छल का सहारा लेकर और गिद्ध जटायु को परास्त करके, राम की पत्नी सीता को उनके वन-आश्रम से बलपूर्वक हर लिया था। फिर भी राम ने सुग्रीव की सहायता से समुद्र पर सेतु बाँधकर और अपने तीखे बाणों से लंका को भस्म करके, उसे पुनः पा लिया।”

युधिष्ठिर ने कहा, “राम किस वंश में जन्मे, और उनके बल-पराक्रम की सीमा क्या थी? रावण किसका पुत्र था, और किस कारण उसका राम से विरोध हुआ? हे महामति, यह सब विस्तार से बताइए; मैं महान कर्मों वाले राम की कथा सुनना चाहता हूँ।”

मार्कण्डेय ने कहा, “सुनिए, हे भरतवंशी, यह प्राचीन इतिहास जैसा घटा वैसा ही। इक्ष्वाकु-वंश में अज नामक एक महान राजा हुए। उनके पुत्र दशरथ हुए, जो वेदाध्ययन में रत और सदा पवित्र रहते थे। दशरथ के चार पुत्र हुए, धर्म और अर्थ के ज्ञाता: राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और बलवान भरत। राम की माता कौसल्या, भरत की माता कैकेयी, और शत्रुओं के दण्डदाता लक्ष्मण-शत्रुघ्न सुमित्रा के पुत्र थे। विदेह के राजा जनक थे, और सीता उनकी कन्या। त्वष्टा ने स्वयं उसकी रचना की थी, इस इच्छा से कि वह राम की प्रिय पत्नी बने।

“अब मैं रावण के जन्म की कथा कहता हूँ। समस्त प्राणियों के स्वामी और विश्व-स्रष्टा, महान तपस्वी स्वयम्भू प्रजापति ही रावण के पितामह हैं। पुलस्त्य के एक बलवान पुत्र हुए, वैश्रवण, जो एक गौ से उत्पन्न हुए। पर वे पुत्र अपने पिता को छोड़कर अपने पितामह के पास चले गए। इस पर क्रुद्ध होकर पुलस्त्य ने अपने ही आधे अंश से एक दूसरा स्वरूप उत्पन्न किया, जो विश्रवा कहलाया, ताकि वैश्रवण से बदला ले सके। पर पितामह ब्रह्मा वैश्रवण से प्रसन्न होकर उन्हें अमरत्व, विश्व के समस्त धन का स्वामित्व, एक दिशा का रक्षण, ईशान की मित्रता, और नलकूबर नामक पुत्र दे चुके थे; साथ ही राक्षस-गणों से रक्षित लंका नगरी और इच्छानुसार सर्वत्र जाने वाला पुष्पक विमान भी।

समझने की कुंजी (कथा-के-भीतर रामकथा): महाभारत में राम की यह कथा “रामोपाख्यान” कहलाती है, अर्थात् मार्कण्डेय द्वारा युधिष्ठिर को सुनाई गई संक्षिप्त रामायण। यह वाल्मीकि रामायण से स्वतन्त्र, व्यास-महाभारत की अपनी प्रस्तुति है, इसलिए कहीं-कहीं ब्योरे भिन्न हैं (जैसे यहाँ सीता को त्वष्टा की रचना कहा गया है)। प्रयोजन सान्त्वना है: युधिष्ठिर का दर्पण राम हैं, जिन्होंने पत्नी-हरण का इससे भी बड़ा दुःख सहकर अन्ततः उसे पुनः पाया।

सार: मार्कण्डेय युधिष्ठिर को सान्त्वना देने राम की कथा आरम्भ करते हैं: इक्ष्वाकु-वंश में दशरथ के चार पुत्रों का जन्म, सीता का प्राकट्य, और रावण के पितामह पुलस्त्य से वैश्रवण-विश्रवा की उत्पत्ति।

रावण और भाइयों का जन्म, घोर तप और ब्रह्मा के वरदान

मार्कण्डेय ने आगे कहा, “पुलस्त्य के आधे अंश से उत्पन्न मुनि विश्रवा क्रोध में वैश्रवण को कुपित दृष्टि से देखने लगे। राक्षसराज कुबेर (वैश्रवण), यह जानकर कि पिता उससे रुष्ट हैं, उन्हें प्रसन्न करने के यत्न करता रहा। लंका में रहते उस राजाधिराज ने तीन राक्षसियों को, पुष्पोत्कटा, राका और मालिनी, अपने पिता की सेवा में भेजा। ये गायन-नृत्य में निपुण थीं और उस महात्मा ऋषि की सेवा में सदा तत्पर रहीं। प्रसन्न होकर विश्रवा ने तीनों को इच्छानुसार राजकुमार-पुत्रों के वर दिए।

“पुष्पोत्कटा से दो राक्षस-श्रेष्ठ पुत्र हुए: कुम्भकर्ण और दस सिर वाला रावण, दोनों पराक्रम में अद्वितीय। मालिनी का पुत्र विभीषण हुआ, और राका के जुड़वाँ सन्तान खर तथा शूर्पणखा हुए। विभीषण सबमें अधिक सुन्दर, अत्यन्त धार्मिक और समस्त धर्म-कर्मों में निष्ठावान था। दशमुख रावण सबमें ज्येष्ठ, तेजस्वी और महान बलशाली था। कुम्भकर्ण युद्ध में परम बलवान, भीषण और माया-विद्या में निपुण था। खर धनुर्विद्या में दक्ष, पर ब्राह्मण-विरोधी और मांसाहारी था, और शूर्पणखा तपस्वियों के लिए सदा संकट का कारण।

“वैश्रवण को धन-सम्पन्न और मनुष्यों के कंधों पर वहन किया जाता देख, ये भाई ईर्ष्या से जल उठे और तप करने का संकल्प किया। दशमुख रावण केवल वायु पर जीवित रहकर, पंचाग्नि के बीच, एक पैर पर खड़े होकर सहस्र वर्ष ध्यानमग्न रहा। कुम्भकर्ण सिर नीचे किए, अल्पाहारी होकर तप में लीन रहा। बुद्धिमान विभीषण उपवास करते, केवल सूखे पत्ते खाते, दीर्घकाल तक कठोर तप करता रहा। खर और शूर्पणखा प्रसन्न मन से इनकी रक्षा और सेवा करते रहे।

“सहस्र वर्ष के अन्त में दशमुख रावण ने अपने सिर काट-काटकर अग्नि में आहुति दी। इस कर्म से प्रसन्न होकर ब्रह्मा स्वयं प्रकट हुए और सबको तप से विरत होकर वर माँगने को कहा। ब्रह्मा ने कहा, ‘मैं प्रसन्न हूँ, हे पुत्रो! अमरत्व को छोड़कर जो भी चाहो, वर माँगो। हे रावण, जो सिर आपने अग्नि को अर्पित किए, वे आपकी इच्छानुसार पुनः शोभा देंगे; आपकी देह विकृत न होगी, आप इच्छानुसार रूप धर सकेंगे, और युद्ध में शत्रुओं के विजेता बनेंगे।’

“रावण ने कहा, ‘मैं गन्धर्व, देव, किन्नर, असुर, यक्ष, राक्षस, नाग और अन्य सभी प्राणियों के हाथों कभी पराजित न होऊँ!’ ब्रह्मा बोले, ‘जिन्हें आपने गिनाया, उनसे आपको कभी भय न होगा। केवल मनुष्यों से आपको सावधान रहना होगा।’ अपने विकृत बोध के कारण मनुष्य-भक्षी रावण ने मनुष्यों को तुच्छ मानकर इस छूट की उपेक्षा कर दी। कुम्भकर्ण ने, तमस से ढके मन के कारण, दीर्घ निद्रा का वर माँगा, और ‘ऐसा ही हो’ कहकर ब्रह्मा ने वह दे दिया। विभीषण ने माँगा, ‘महान संकट में भी मैं धर्म के मार्ग से कभी न डिगूँ, और अज्ञानी होते हुए भी दिव्य ज्ञान के प्रकाश से आलोकित रहूँ।’ ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर कहा, ‘राक्षस-कुल में जन्म लेकर भी आपकी आत्मा अधर्म की ओर नहीं झुकती; इसलिए मैं आपको अमरत्व देता हूँ।’

“वर पाकर दशमुख रावण ने कुबेर को युद्ध में परास्त कर उससे लंका का राज्य छीन लिया। कुबेर लंका छोड़कर गन्धर्वों, यक्षों और किन्नरों सहित गन्धमादन पर्वत पर जा बसे। रावण ने उनसे पुष्पक विमान भी बलपूर्वक छीन लिया, जिस पर कुबेर ने शाप दिया, ‘यह विमान आपको कभी न ढोएगा; यह उसी को ढोएगा जो आपको युद्ध में मारेगा! और मुझ बड़े भाई का अपमान करने के कारण आप शीघ्र मरेंगे।’ इधर विभीषण सदाचारियों के मार्ग पर चलकर कुबेर के साथ चले गए, और कुबेर ने प्रसन्न होकर उन्हें यक्ष-राक्षस सेनाओं का नायक बना दिया। उधर राक्षसों और पिशाचों ने एकत्र होकर दशमुख रावण को अपना सम्राट बनाया। इच्छानुसार रूप धरने वाले, आकाशगामी, भीषण-पराक्रमी रावण ने देवों और दैत्यों पर आक्रमण कर उनकी समस्त बहुमूल्य सम्पदा छीन ली। समस्त प्राणियों को रुलाने (रावयति) के कारण ही वह ‘रावण’ कहलाया, और उसने देवताओं तक को भयभीत कर दिया।”

समझने की कुंजी (वरदान का छिद्र): रावण ने देव-दानव-यक्ष-राक्षस आदि सब प्राणियों से अवध्यता माँगी, पर अहंकार में “मनुष्य” को छोड़ दिया, क्योंकि वह मनुष्य को तुच्छ समझता था। यही उसके विनाश का द्वार बना; इसी कारण विष्णु को मनुष्य-रूप में राम बनकर अवतार लेना पड़ा। महाभारत यहाँ दिखाता है कि अहंकार स्वयं अपने भीतर अपने पतन का बीज छिपाए रखता है।

सार: रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण के घोर तप से प्रसन्न ब्रह्मा ने वर दिए; रावण ने मनुष्यों को छोड़ शेष सब प्राणियों से अवध्यता पाई, कुबेर से लंका और पुष्पक छीने, और तीनों लोकों को त्रस्त कर ‘रावण’ नाम पाया।

देवताओं की पुकार और वानर-भालुओं के रूप में अवतार

मार्कण्डेय ने कहा, “तब ब्रह्मर्षि, सिद्ध और देवर्षि, अग्नि (हव्यवाह) को आगे करके ब्रह्मा की शरण में गए। अग्नि ने कहा, ‘विश्रवा का वह बलवान दशमुख पुत्र आपके वर के कारण मारा नहीं जा सकता। महाबली होकर वह पृथ्वी के प्राणियों को हर प्रकार से सताता है। हे पूज्य, आप ही हमारी रक्षा कीजिए; आपके सिवा और कोई रक्षक नहीं।’

“ब्रह्मा ने कहा, ‘हे अग्नि, उसे देव या असुर युद्ध में नहीं जीत सकते। इसके लिए जो आवश्यक था, वह मैं पहले ही विधान कर चुका हूँ। उसकी मृत्यु निकट है। मेरी प्रेरणा से चतुर्मुख का अंश (अर्थात् नियति-विधान) उसके लिए अवतरित हो चुका है, और शत्रु-संहारक विष्णु ही वह कार्य पूर्ण करेंगे।’

“फिर पितामह ने सबके समक्ष इन्द्र को आज्ञा दी, ‘आप समस्त देवताओं सहित पृथ्वी पर जन्म लीजिए, और वानरों तथा भालुओं में, इच्छानुसार रूप धरने वाले, महाबली वीर पुत्र उत्पन्न कीजिए, जो विष्णु के सहयोगी बनें।’ तब देव, गन्धर्व और दानव परस्पर मन्त्रणा करने एकत्र हुए कि वे अपने-अपने अंशों से पृथ्वी पर कैसे जन्म लें। वर-दाता ब्रह्मा ने दुन्दुभि नामक एक गन्धर्वी को आज्ञा दी, ‘इस कार्य की सिद्धि के लिए आप वहाँ जाइए।’ पितामह के ये वचन सुनकर वह मनुष्य-लोक में कुबड़ी मन्थरा के रूप में जन्मी।

“इन्द्र आदि सभी प्रमुख देवताओं ने वानरों और भालुओं की श्रेष्ठ स्त्रियों में सन्तान उत्पन्न की। वे पुत्र बल और कीर्ति में अपने पिताओं के समान हुए। वे पर्वत-शिखर तोड़ सकते थे; उनके अस्त्र शिलाएँ और शाल-ताल वृक्ष थे; उनकी देह वज्र-सी कठोर थी, और बल अपार। वे सब युद्ध में निपुण और इच्छानुसार शक्ति बटोरने में समर्थ थे, सहस्र हाथियों के समान बलवान और वायु के समान वेगवान। कोई इच्छानुसार कहीं भी रहता, कोई वनों में। विश्व-स्रष्टा ब्रह्मा ने यह सब विधान करके मन्थरा को भी समझा दिया कि उसे क्या करना है, और विचार-मात्र से सब समझकर मन्थरा कलह-कलह फैलाती इधर-उधर विचरने लगी।”

समझने की कुंजी (मन्थरा का दिव्य प्रयोजन): रामायण में जिस मन्थरा की दासी-कुटिलता राम के वनवास का कारण बनती है, महाभारत की इस कथा में वह गन्धर्वी दुन्दुभि का अवतार बताई गई है, जिसे ब्रह्मा ने ही जान-बूझकर कलह फैलाने भेजा। यह दृष्टि गहन है: राम का वनवास, सीता-हरण और रावण-वध, यह समूचा क्रम पहले से ही देव-योजना का अंग था, जिसका छोटा-सा साधन मन्थरा बनी।

सार: रावण से त्रस्त देवताओं की पुकार पर ब्रह्मा ने विष्णु के मनुष्य-रूप में अवतार का विधान बताया, इन्द्रादि देवों को वानर-भालुओं में पुत्र उत्पन्न करने को कहा, और गन्धर्वी दुन्दुभि को मन्थरा के रूप में कलह फैलाने भेजा।

राम का राज्याभिषेक-संकल्प और वनवास का बीज

युधिष्ठिर ने कहा, “हे पूज्य, आपने राम आदि के जन्म का इतिहास विस्तार से कह सुनाया। अब मैं उनके वनवास का कारण जानना चाहता हूँ। हे ब्राह्मण, बताइए कि दशरथ के पुत्र, भाई राम और लक्ष्मण, मिथिला की प्रसिद्ध राजकुमारी के साथ वन को क्यों गए।”

मार्कण्डेय ने कहा, “धर्मनिष्ठ राजा दशरथ, वृद्धों के प्रति सदा सचेत और धर्म-कर्मों में तत्पर, इन पुत्रों के जन्म से अत्यन्त प्रसन्न हुए। पुत्र क्रमशः बल में बढ़े और वेद तथा उनके रहस्यों सहित अस्त्र-विद्या में पारंगत हुए। ब्रह्मचर्य-व्रत पूर्ण कर जब राजकुमारों का विवाह हुआ, तब राजा दशरथ सुखी और परम प्रसन्न हुए। सबमें ज्येष्ठ बुद्धिमान राम पिता के प्रिय बने और अपने मोहक स्वभाव से प्रजा को प्रसन्न रखते।

“तब बुद्धिमान राजा ने स्वयं को आयु में वृद्ध मानकर अपने सद्गुणी मन्त्रियों और कुलगुरु से राम को राज्य का युवराज (राज्य का भावी अधिकारी) बनाने की मन्त्रणा की, और सब महान मन्त्री इस पर सहमत हुए कि यही उचित समय है। लाल नेत्रों, सुगठित भुजाओं, मदमत्त गज-सी चाल, ऊँचे कंधों और श्याम घुँघराले केशों वाले उस पुत्र को, कौसल्या के आनन्द-वर्धक राम को देख, दशरथ अत्यन्त प्रसन्न हुए। राम वीर थे, तेज से दीप्त, युद्ध में इन्द्र से कम नहीं, वेदज्ञ, बृहस्पति-तुल्य बुद्धिमान, समस्त विद्याओं में दक्ष, सबके प्रिय; इन्द्रियों पर पूर्ण संयम के कारण उन्हें देखकर शत्रु तक प्रसन्न होते। वे दुष्टों के लिए भय और सज्जनों के रक्षक थे।”

समझने की कुंजी (कथा का प्रयोजन यहीं ठहरता है): यह खण्ड राम के वनवास के ठीक मुहाने पर रुकता है, जहाँ दशरथ राम को युवराज बनाने का संकल्प करते हैं, पर मन्थरा द्वारा बोया कलह अभी फलने को है। रामोपाख्यान की शेष कथा (कैकेयी के वर, राम का वन-गमन, सीता-हरण, सेतु-बन्ध और रावण-वध) इसी अध्याय के आगे के खण्डों में चलती है। यहाँ युधिष्ठिर का दर्पण स्पष्ट हो जाता है: जैसे राम ने पत्नी-हरण का दुःख सहकर भी सब पुनः पाया, वैसे ही पाण्डवों के लिए भी आशा शेष है।

सार: मार्कण्डेय ने राम के राज्याभिषेक-संकल्प तक कथा सुनाई: दशरथ के चारों पुत्रों की शिक्षा-विवाह, राम का सर्वप्रिय गुण-वैभव, और वृद्ध दशरथ का राम को युवराज बनाने का निश्चय, जिसके आगे वनवास का प्रसंग प्रतीक्षारत है।

शकुनि और कर्ण की बात, और दुर्योधन के मन की रंजिश

हे जनमेजय, धृतराष्ट्र के वे वचन सुनकर सुबल-पुत्र शकुनि ने, अवसर देखकर, कर्ण की सहायता से दुर्योधन से कहा, “हे भारत, अपने ही पराक्रम से वीर पाण्डवों को वनवास भेजकर अब आप इस पृथ्वी पर निष्कण्टक राज्य कीजिए, जैसे शम्बर के संहारक इन्द्र स्वर्ग पर राज करते हैं। हे राजन, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर के सब राजा आपके कर देनेवाले बन गए हैं। वह दीप्त लक्ष्मी (राज्यश्री), जो कुछ ही दिन पूर्व हमने भारी मन से इन्द्रप्रस्थ में युधिष्ठिर के पास देखी थी, आज आपके पास देख रहे हैं। केवल बुद्धि के बल पर आपने उसे राजा युधिष्ठिर से छीन लिया।”

“हे राजन, समुद्रों से घिरी, पर्वतों और वनों, नगरों और खानों से युक्त यह समस्त वसुधा अब आपकी है। ब्राह्मणों से पूजित और राजाओं से सम्मानित होकर आप अपने पराक्रम के कारण ऐसे शोभित होते हैं, जैसे स्वर्ग में देवों के बीच सूर्य। हे राजन, चलिए, हम जाकर पाण्डवों को देखें, जो अब वैभव से रहित हैं, जिन्होंने कभी किसी की आज्ञा नहीं मानी थी और कभी किसी के अधीन नहीं रहे थे। सुना है कि वे द्वैतवन नामक सरोवर के तट पर ब्राह्मणों के समूह के साथ रहते हैं, और जंगल ही उनका घर है। आप वहाँ अपने समस्त वैभव के साथ जाइए, और अपनी दीप्ति के दर्शन से पाण्डु-पुत्र को ऐसे झुलसाइए, जैसे सूर्य अपनी तप्त किरणों से सबको झुलसाता है।”

“हे राजन, अपनी समृद्धि में और उन्हें समृद्धि से रहित देखना, क्या इससे बढ़कर कोई सुख है? पर्वत-शिखर पर खड़ा व्यक्ति नीचे धरती पर रेंगते दूसरे को जैसे देखता है, वैसे ही अपने को समृद्ध और शत्रु को विपत्ति में देखना। हे नरश्रेष्ठ, अपने को वैभव में और धनंजय को वल्कल और मृगचर्म पहने देखकर आपको जो हर्ष होगा, वह संतान, धन या राज्य की प्राप्ति से कहीं अधिक होगा। आपकी रानियाँ बहुमूल्य वस्त्रों में सजी हों और शोकग्रस्त कृष्णा (द्रौपदी) वल्कल और मृगचर्म में, तो उसका दुःख और बढ़ेगा। द्रुपद-कन्या आपकी रानियों को आभूषणों से सजी देखकर अपने जीवन को धिक्कारेगी, और उसे जो शोक होगा, वह सभा में दुःशासन के घसीटने पर हुए शोक से भी कहीं अधिक होगा।”

हे जनमेजय, ऐसा कहकर कर्ण और शकुनि दोनों मौन हो गए।

कर्ण के ये वचन सुनकर राजा दुर्योधन अत्यन्त प्रसन्न हुआ; किन्तु तुरन्त ही उदास होकर बोला, “हे कर्ण, आप जो कह रहे हैं, वह तो सदा मेरे मन में रहता है। पर मुझे वहाँ जाने की अनुमति न मिलेगी जहाँ पाण्डव रहते हैं। राजा धृतराष्ट्र सदा उन वीरों के लिए शोक करते रहते हैं। वे समझते हैं कि तपस्या के कारण पाण्डव पहले से कहीं अधिक बलवान हो गए हैं। और यदि राजा हमारा मन्तव्य समझ गए, तो भविष्य का विचार करके वे कभी अनुमति न देंगे। हे महातेजस्वी, द्वैतवन के वनों में निर्वासित पाण्डवों के नाश के सिवा हमारा वहाँ और कोई काम नहीं हो सकता।”

“आपको स्मरण है, द्यूत के समय क्षत्ता (विदुर) ने मुझसे, आपसे और सुबल-पुत्र से क्या वचन कहे थे। उन सब वचनों और विलापों को याद करके मैं निश्चय नहीं कर पा रहा कि जाऊँ या न जाऊँ। यदि मैं भीम और फाल्गुन (अर्जुन) को कृष्णा के साथ वनों में दुःख भोगते देख सकूँ, तो अवश्य ही अत्यन्त प्रसन्न होऊँगा। समस्त पृथ्वी का राज्य पाने में भी वह हर्ष नहीं जो पाण्डवों को वल्कल और मृगचर्म में देखने में होगा। हे कर्ण, आप, सुबल-पुत्र और दुःशासन के साथ कोई कुशल योजना बनाइए, जिससे हम उन वनों में जा सकें। कल मैं राजा के पास जाऊँगा। और जब मैं भीष्म, उस कुरुश्रेष्ठ, के साथ बैठा रहूँ, तब आप शकुनि के साथ कोई बहाना प्रस्तुत कीजिए।”

समझने की कुंजी (स्थान): द्वैतवन वह वन है जहाँ निर्वासित पाण्डव रह रहे हैं; इसके निकट ही कुरुओं की गोशालाएँ (कैटल-स्टेशन) हैं, जहाँ राजकीय गायों के झुंड पाले जाते हैं। पूरी “घोषयात्रा” (गायों के झुंड का निरीक्षण) इसी निकटता का बहाना बनकर रची जाएगी।

“ऐसा ही हो,” कहकर वे सब अपने-अपने स्थानों को चले गए। रात बीतते ही कर्ण राजा के पास आया और मुस्कराकर दुर्योधन से बोला, “हे नरेश, मैंने एक योजना बनाई है। हमारे गोधन (गायों के झुंड) इस समय द्वैतवन के वनों में आपकी प्रतीक्षा में हैं। हम सब वहाँ अपनी गोशालाओं के निरीक्षण के बहाने जा सकते हैं, क्योंकि राजाओं का अपनी गोशालाओं में बार-बार जाना उचित ही है। यह कारण रखेंगे तो आपके पिता अवश्य अनुमति देंगे।” दुर्योधन और कर्ण यों हँसते-बतियाते थे कि शकुनि ने भी कहा, “यही निर्दोष योजना मुझे भी सूझी थी। राजा अवश्य अनुमति देंगे, या स्वयं ही हमें वहाँ भेजेंगे।” तीनों एक साथ हँसे, और एक-दूसरे को हाथ देकर निश्चय करके कुरुश्रेष्ठ (धृतराष्ट्र) को देखने गए।

एक उप-कथा: सामंग नामक एक गोपाल (ग्वाला) को पहले ही सिखा दिया गया था। उसने राजा धृतराष्ट्र के पास जाकर गायों की बात छेड़ी कि बछड़ों की गणना और चिह्नांकन का समय आ गया है। तभी कर्ण और शकुनि ने यह जोड़ा कि यह दुर्योधन के लिए आखेट (शिकार) का भी उत्तम समय है। इस प्रकार बहाने को राजकीय कार्य का रूप दे दिया गया।

हे जनमेजय, यह सुनकर धृतराष्ट्र ने सावधान करते हुए कहा, “मृगया (शिकार) और गोधन का निरीक्षण उचित ही है, हे पुत्र। पर पाण्डव उन गोशालाओं के समीप ही रहते हैं। आप स्वयं वहाँ मत जाइए। छल से पराजित होकर वे गहन वन में बड़े कष्ट में रह रहे हैं। वे महाबली हैं, अब तपस्या में लगे हैं। युधिष्ठिर तो क्रोध न करेंगे, पर भीमसेन स्वभाव से ही उग्र है। याज्ञसेनी (द्रौपदी) तो तेज की प्रतिमूर्ति है। आप लोग गर्व और मूर्खता से भरे हैं, अवश्य अपराध कर बैठेंगे। तपोबल से युक्त वह आपको भस्म कर देगी, या वे शस्त्रधारी वीर। और यदि संख्या-बल से आप उन्हें कुछ हानि पहुँचाना भी चाहेंगे, तो यह अत्यन्त अनुचित होगा, यद्यपि मेरे विचार से आप सफल न हो सकेंगे। महाबाहु धनंजय अस्त्र-विद्या में और भी निपुण होकर वन से लौटा है। क्या वह आप सबका वध न कर सकेगा? अतः मेरे विचार में आपका स्वयं वहाँ जाना उचित नहीं।”

तब शकुनि बोला, “पाण्डवों में ज्येष्ठ धर्मज्ञ हैं। उन्होंने सभा में प्रतिज्ञा की थी कि बारह वर्ष वन में रहेंगे। शेष पाण्डव सब युधिष्ठिर के आज्ञाकारी हैं, और कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिर हम पर कभी क्रोध न करेंगे। हम केवल मृगया पर जाना चाहते हैं, और उसी अवसर पर गोधन की गणना देख लेंगे। हम पाण्डवों को देखने नहीं जाएँगे, अतः हमारी ओर से कोई दुराचरण सम्भव नहीं।” यों कहे जाने पर धृतराष्ट्र ने अनिच्छा से ही दुर्योधन को अनुमति दे दी।

समझने की कुंजी (संख्या, आधुनिक समतुल्य): दुर्योधन की यात्रा का दल लगभग एक चलते-फिरते नगर जैसा था, 8000 रथ, 30000 हाथी, 9000 घोड़े, और सहस्रों पैदल सैनिक, साथ ही दुकानें, मण्डप, व्यापारी, चारण और शिकारी। आधुनिक दृष्टि से यह किसी विशाल राजकीय पर्यटन-काफ़िले जैसा था, जिसका कोलाहल वर्षाकाल की आँधियों के गहन गर्जन-सा था। दुर्योधन ने द्वैतवन सरोवर से लगभग चार मील की दूरी पर पड़ाव डाला।

सार: शकुनि और कर्ण दुर्योधन को उकसाते हैं कि वह अपने वैभव से वनवासी पाण्डवों को मानसिक रूप से कुचलने जाए। दुर्योधन सहमत तो होता है पर पिता की अनुमति की चिन्ता करता है। तीनों मिलकर “गोशाला-निरीक्षण” का बहाना रचते हैं। धृतराष्ट्र पाण्डवों की निकटता और तपोबल से सावधान करते हुए मना करते हैं, पर शकुनि के आश्वासन पर अनिच्छा से अनुमति दे देते हैं।

द्वैतवन में गन्धर्वों से टकराव और दुर्योधन का बन्दी होना

राजा दुर्योधन वन-दर-वन घूमता हुआ अन्ततः गोशालाओं तक पहुँचा और अपनी सेना का पड़ाव डाला। सेवकों ने जल और वृक्षों से समृद्ध एक सुन्दर स्थान चुनकर उसके लिए और कर्ण, शकुनि तथा भाइयों के लिए पृथक्-पृथक् आवास बनाए। राजा ने सहस्रों गायों के अंग और चिह्न देखकर उनकी गणना की, बछड़ों को चिह्नित कराया, और जिन्हें वश में करना था उन्हें छाँटा। तीन वर्ष के प्रत्येक बछड़े की गिनती पूरी करके कुरु-राजकुमार गोपालों से घिरा प्रसन्नता से विचरने लगा। नागरिक और सहस्रों सैनिक भी उन वनों में देवताओं की भाँति क्रीड़ा करने लगे। गायन, नृत्य और वाद्य में निपुण गोपाल और आभूषणों से सजी कन्याएँ राजा का मनोरंजन करने लगीं। राजा अन्तःपुर की स्त्रियों से घिरा हुआ इच्छानुसार धन, अन्न और पेय बाँटने लगा।

राजा ने अपने अनुचरों सहित लकड़बग्घे, भैंसे, हरिण, गवय, भालू और शूकर मारे। सहस्रों पशुओं को बाणों से बींधकर, दूध पीते और अनेक स्वादिष्ट पदार्थों का आनन्द लेते हुए, मधुमत्त भौंरों से गुंजायमान और मयूरों की कुहूक से भरे वनों को देखता हुआ वह अन्ततः पवित्र द्वैतवन सरोवर के निकट पहुँचा। वह स्थान सप्तच्छद, पुन्नाग और बकुल वृक्षों की छाया से घिरा था। राजा वज्रधारी इन्द्र की भाँति वहाँ पहुँचा।

हे कुरुश्रेष्ठ, उसी समय धर्मराज युधिष्ठिर उस सरोवर के निकट अपनी पत्नी द्रुपद-कन्या के साथ “राजर्षि” नामक दैनिक यज्ञ कर रहे थे, उसी विधान से जो देवताओं और वनवासियों के लिए नियत है। वहाँ पहुँचकर दुर्योधन ने सहस्रों सेवकों को आज्ञा दी, “शीघ्र क्रीड़ा-गृह बनाइए।” वे “ऐसा ही हो” कहकर सरोवर के तट की ओर गए। पर जैसे ही वे वन के द्वार में प्रवेश करने को हुए, अनेक गन्धर्वों ने उन्हें रोक दिया। क्योंकि गन्धर्वराज अपने अनुचरों सहित कुबेर के निवास से पहले ही वहाँ आ चुका था। वह अप्सराओं के अनेक गणों और देवपुत्रों के साथ क्रीड़ा के लिए वहाँ आया था, और उस स्थान को घेरकर सबके लिए बन्द कर रखा था।

समझने की कुंजी (अवधारणा): गन्धर्व, देवलोक के अर्ध-दिव्य प्राणी, गीत-वाद्य और माया (इल्यूज़न; भ्रम उत्पन्न करने की दिव्य शक्ति) में निपुण। इनका राजा चित्रसेन है, जो आगे चलकर अर्जुन का मित्र और गुरु निकलता है। इनका रोका जाना केवल सीमा-विवाद नहीं, अपितु एक दैवी हस्तक्षेप का आरम्भ है।

दुर्योधन के सैनिक लौटकर बोले कि सरोवर गन्धर्वराज द्वारा बन्द है। दुर्योधन ने अपने योद्धा भेजे कि गन्धर्वों को खदेड़ दें। योद्धा सरोवर पर लौटकर बोले, “महाराज दुर्योधन क्रीड़ा हेतु यहाँ आ रहे हैं, आप हट जाइए।” गन्धर्व हँसकर कठोर वचन बोले, “आपका दुष्ट राजा दुर्योधन बुद्धिहीन है। वह हम स्वर्गवासियों को ऐसे कैसे आज्ञा देता है जैसे हम उसके सेवक हों? आप मूर्ख भी मृत्यु के मुख में हैं, जो उसका सन्देश लेकर आए हैं। शीघ्र लौट जाइए, या आज ही यमलोक जाइए।”

यह सुनकर दुर्योधन क्रोध से भर गया और बोला, “इन दुष्टों को दण्ड दो, चाहे ये सौ यज्ञोंवाले इन्द्र के साथ ही क्यों न आए हों।” धृतराष्ट्र के पुत्र और सहस्रों योद्धा सिंहनाद करते हुए वन में घुसे। गन्धर्व उन्हें मृदुता से रोकते रहे, पर वे न माने। तब गन्धर्व अपने राजा चित्रसेन के पास गए और सब बताया। चित्रसेन ने क्रुद्ध होकर आज्ञा दी, “इन दुराचारी दुष्टों को दण्ड दो।” गन्धर्व शस्त्र लेकर धृतराष्ट्र की सेना पर टूट पड़े। उठे हुए शस्त्रों के साथ गन्धर्वों को आते देख कुरु-सैनिक दुर्योधन के सम्मुख ही चारों दिशाओं में भाग गए।

पर सबको पीठ दिखाकर भागते देख भी वीर राधेय (कर्ण) नहीं भागा। उसने बाणों की वर्षा से गन्धर्वों को रोका। हाथ की अत्यन्त फुर्ती से सूत-पुत्र ने सैकड़ों गन्धर्वों को क्षुरप्र, भल्ल और हड्डी-इस्पात के अनेक अस्त्रों से बींधा, और चित्रसेन की सेना को थोड़े ही समय में पीड़ा से चीत्कार करा दिया। पर गन्धर्व सैकड़ों-सहस्रों की संख्या में फिर लौट पड़े। तब दुर्योधन, शकुनि, दुःशासन, विकर्ण और धृतराष्ट्र के अन्य पुत्र, गरुड़ की गर्जन-सी रथ-ध्वनि करते हुए, कर्ण के नेतृत्व में लौटे और उस सेना का संहार करने लगे।

तब समस्त गन्धर्व-सेना कौरवों से भिड़ गई। घोर युद्ध हुआ। गन्धर्व कुरुओं के बाणों से व्याकुल होकर थके-से प्रतीत हुए, और कौरवों ने उच्च नाद किया। पर गन्धर्व-सेना को भयभीत होते देख क्रुद्ध चित्रसेन अपने आसन से उछला और कुरु-सेना का नाश करने पर तुल गया। नाना युद्ध-कौशल में निपुण होकर उसने माया (भ्रामक) अस्त्रों से युद्ध किया। चित्रसेन की माया से कौरव योद्धा सुध-बुध खोने लगे। ऐसा प्रतीत हुआ कि कुरु-सेना का प्रत्येक योद्धा दस-दस गन्धर्वों से घिर गया हो। आक्रमण से पीड़ित और भयभीत होकर जो जीना चाहते थे, सब भाग गए।

पर समस्त धृतराष्ट्र-सेना के टूटकर भागने पर भी सूर्य-पुत्र कर्ण पर्वत-सा अविचल खड़ा रहा। दुर्योधन, कर्ण और शकुनि घायल और क्षत-विक्षत होकर भी गन्धर्वों से लड़ते रहे। तब सब गन्धर्व कर्ण को मारने सैकड़ों-सहस्रों की संख्या में तलवारों, फरसों और भालों के साथ चारों ओर से टूट पड़े। किसी ने उसके रथ का जुआ काटा, किसी ने ध्वजदण्ड, किसी ने धुरी, किसी ने घोड़े, किसी ने सारथि, किसी ने छत्र। सहस्रों गन्धर्वों ने मिलकर उसका रथ टुकड़े-टुकड़े कर दिया। तब कर्ण तलवार और ढाल लेकर रथ से कूद पड़ा और विकर्ण के रथ पर चढ़कर घोड़ों को भगाकर अपनी रक्षा की।

कर्ण के पराजित होने पर समस्त कुरु-सेना दुर्योधन के सम्मुख ही भाग खड़ी हुई। पर दुर्योधन ने भागना अस्वीकार किया। उसने बाणों की घनी वर्षा की, पर गन्धर्वों ने उसका रथ खण्ड-खण्ड कर डाला, सारथि और घोड़े मार डाले। रथहीन दुर्योधन भूमि पर गिरा, तो बलवान चित्रसेन ने उस पर झपटकर उसे ऐसे पकड़ा मानो प्राण ही ले लिए हों। राजा के बन्दी होने पर गन्धर्वों ने रथ पर बैठे दुःशासन को भी पकड़ लिया, और विविंशति, चित्रसेन (दुर्योधन के भाई), विन्द-अनुविन्द तथा अन्तःपुर की समस्त स्त्रियों को भी।

समझने की कुंजी (नाम): इस प्रसंग में दो “चित्रसेन” आते हैं, एक गन्धर्वराज चित्रसेन (अर्जुन का मित्र), और एक धृतराष्ट्र-पुत्र चित्रसेन (दुर्योधन का भाई)। दोनों भिन्न पात्र हैं; नाम की समानता से भ्रम न हो।

सार: दुर्योधन गोशालाओं की गणना और भोग-विलास में लगा रहता है, पर द्वैतवन-सरोवर पहले से ही गन्धर्वराज चित्रसेन ने घेर रखा है। दुर्योधन के दर्प से युद्ध छिड़ता है; कर्ण अकेला डटकर लड़ता है पर माया-युद्ध में पराजित होकर भागता है। दुर्योधन, उसके भाई और अन्तःपुर की स्त्रियाँ बन्दी बना ली जाती हैं। यहाँ कौरवों का दर्प पहली बार सार्वजनिक रूप से टूटता है।

पाण्डवों के पास शरण की याचना और युधिष्ठिर का धर्म-विचार

गन्धर्वों से पराजित दुर्योधन के सैनिक, पहले भागे हुओं से मिलकर, पास ही रहते पाण्डवों के पास पहुँचे। दुर्योधन के बन्दी हो जाने पर सब वाहन, दुकानें, मण्डप, गाड़ियाँ और पशु पाण्डवों के संरक्षण में सौंप दिए गए। सैनिक बोले, “धृतराष्ट्र-पुत्र को गन्धर्व बन्दी बनाकर ले जा रहे हैं। हे पृथा-पुत्रो, उनका अनुगमन कीजिए! दुःशासन, दुर्विषह, दुर्मुख, दुर्जय, सब बेड़ियों में बन्दी होकर ले जाए जा रहे हैं, और साथ ही अन्तःपुर की सब स्त्रियाँ भी।”

शोक से व्याकुल वे दुर्योधन के पुरुष राजा की मुक्ति की कामना से युधिष्ठिर के पास आए। तब भीम ने व्यंग्य-भरे स्वर में उन वृद्ध अनुचरों से कहा, “जिस कार्य को हम घोड़ों और हाथियों से सुसज्जित होकर बड़े प्रयत्न से करते, वह गन्धर्वों ने कर दिखाया। जो दूसरे प्रयोजन से यहाँ आए थे, वे ऐसे परिणाम में जा पड़े जिसकी उन्हें कल्पना न थी। यही उस राजा की दुष्ट नीति का फल है जो कपट-द्यूत का प्रेमी है। दुर्बल व्यक्ति का शत्रु किसी और के हाथ गिराया जाता है, गन्धर्वों ने हमारी आँखों के सामने इस उक्ति को सच कर दिखाया। यह दुष्ट यहाँ हम पर दृष्टि डालने आया था, स्वयं समृद्धि में, और हम विपत्ति में, तपस्या से क्षीण, शीत-ताप सहते हुए। जो इस पापी कौरव का अनुसरण करते हैं, वे अब उसका अपमान देख रहे हैं।” भीम यों कटु वचन कह ही रहा था कि युधिष्ठिर ने कहा, “यह कठोर वचनों का समय नहीं है।”

युधिष्ठिर बोले, “हे पुत्र, भयभीत और विपत्ति में पड़े कुरुओं के प्रति, जो हमारी शरण में आए हैं, ऐसी भाषा क्यों? हे वृकोदर, रक्त-सम्बन्धियों में मतभेद और विवाद होते रहते हैं, शत्रुता भी चलती है। पर कुल का सम्मान कभी आँच में नहीं डाला जाता। यदि कोई बाहरी व्यक्ति कुल के सम्मान का अपमान करना चाहे, तो सज्जन उसे सहन नहीं करते। दुष्ट गन्धर्वराज जानता है कि हम यहाँ रहते हैं, फिर भी हमारी अवहेलना करके उसने यह अप्रिय कार्य किया है। एक बाहरी व्यक्ति द्वारा दुर्योधन का बलात् हरण और हमारे कुल की स्त्रियों का अपमान, इससे हमारे कुल का सम्मान नष्ट हो रहा है।”

“अतः हे नरश्रेष्ठो, उठिए और शरणागतों की रक्षा तथा कुल-सम्मान की रक्षा हेतु शस्त्र धारण कीजिए। अर्जुन, आप, और दोनों जुड़वाँ (नकुल-सहदेव) दुर्योधन को मुक्त कराइए। यहाँ धृतराष्ट्र-पुत्रों के स्वर्णिम ध्वजों और सब प्रकार के अस्त्रों से युक्त रथ तैयार खड़े हैं। इन्द्रसेन तथा अन्य कुशल सारथियों के साथ इन पर चढ़कर जाइए। एक साधारण क्षत्रिय भी अपनी पूरी शक्ति से शरणागत की रक्षा करता है, फिर हे वृकोदर, आपके विषय में क्या कहूँ! शत्रु को भी हाथ जोड़े शरण माँगते देखकर जो उसकी सहायता करे, वही उच्चात्मा है।”

“वर-दान, राज्य की प्राप्ति, और पुत्र-जन्म, ये तीनों महान हर्ष के स्रोत हैं। पर हे पाण्डवो, शत्रु को विपत्ति से उबारना इन तीनों के बराबर है। विपत्ति में पड़ा दुर्योधन अपने प्राण आपकी भुजाओं के बल पर निर्भर मानकर माँग रहा है, इससे बढ़कर हर्ष क्या होगा? यदि मेरा व्रत समाप्त हो चुका होता, तो मैं स्वयं उसकी सहायता को दौड़ता। हे भारत, पहले संधि (समझौते) से दुर्योधन को छुड़ाने का प्रयत्न करना। यदि गन्धर्वराज संधि से न माने, तो हल्की झड़प से छुड़ाना। और यदि तब भी न छोड़े, तो उन्हें पूर्ण बल से कुचलकर ही मुक्त कराना। मेरा व्रत आरम्भ है, अभी समाप्त नहीं हुआ, इसीलिए मैं स्वयं नहीं आ सकता।”

अजातशत्रु (युधिष्ठिर) के ये वचन सुनकर धनंजय ने अपने ज्येष्ठ की आज्ञा के सम्मान में कौरवों को मुक्त कराने की प्रतिज्ञा की। अर्जुन बोले, “यदि गन्धर्व धृतराष्ट्र-पुत्रों को शान्ति से न छोड़ें, तो आज पृथ्वी गन्धर्वराज का रक्त पिएगी।” सत्यवादी अर्जुन की यह प्रतिज्ञा सुनकर कौरवों ने अपने खोए हुए धैर्य को फिर पाया।

सार: यहाँ महाभारत की नैतिक गहराई उभरती है। भीम का व्यंग्य स्वाभाविक है, शत्रु अपने ही दर्प से गिरा। पर युधिष्ठिर इसे कुल-सम्मान का प्रश्न बनाते हैं: बाहरी द्वारा रक्त-सम्बन्धी का अपमान सहनीय नहीं। यह सरल अच्छाई-बुराई नहीं; धर्म-संकट है, जिसने अन्याय किया, उसी की रक्षा कर्तव्य बन जाती है। युधिष्ठिर तीन-स्तरीय रणनीति देते हैं: पहले संधि, फिर हल्की झड़प, फिर पूर्ण बल।

गन्धर्वों से युद्ध और अर्जुन के दिव्यास्त्र

युधिष्ठिर के वचन सुनकर भीमसेन के नेतृत्व में वे नरश्रेष्ठ प्रसन्न मुख से उठ खड़े हुए। उन्होंने शुद्ध स्वर्ण से चित्रित अभेद्य कवच पहने और नाना दिव्यास्त्र धारण किए। कवच पहने और ध्वजों से युक्त रथों पर चढ़े पाण्डव प्रज्वलित अग्नि-से दीख रहे थे। उन्हें एक साथ आते देख कुरु-सेना ने उच्च नाद किया।

युधिष्ठिर की बुद्धिमत्तापूर्ण आज्ञा के अनुसार पहले हल्की झड़प हुई। पर जब अर्जुन ने देखा कि गन्धर्वराज के मूर्ख सैनिक हल्की झड़प से अपना भला नहीं समझ रहे, तो उसने मधुर स्वर में कहा, “मेरे भाई राजा सुयोधन (दुर्योधन) को छोड़ दो।” गन्धर्व हँसकर बोले, “हे बालक, संसार में एक ही है जिसकी आज्ञा हम मानते हैं और जिसके अधीन हम सुखपूर्वक रहते हैं। उस दिव्य अधिपति के सिवा हमें कोई आज्ञा नहीं दे सकता।” तब धनंजय बोले, “दूसरों की स्त्रियों को छूना और मनुष्यों से यह शत्रुतापूर्ण व्यवहार, दोनों ही गन्धर्वराज के लिए निन्दनीय और अनुचित हैं। अतः धृतराष्ट्र-पुत्रों और इन स्त्रियों को धर्मराज युधिष्ठिर की आज्ञा से छोड़ दो। यदि शान्ति से न छोड़ोगे, तो मैं अपने पराक्रम से सुयोधन को छुड़ाऊँगा।” ऐसा कहकर पृथा-पुत्र धनंजय ने आकाशगामी तीक्ष्ण बाणों की वर्षा कर दी।

समझने की कुंजी (अवधारणा): दिव्यास्त्र, मन्त्र से अभिमन्त्रित दैवी अस्त्र, जिनका आह्वान विशिष्ट विधि से होता है। अर्जुन यहाँ आग्नेय (अग्नि का), स्थूणाकर्ण, इन्द्रजाल (भ्रम-नाशक माया-अस्त्र), सौर, सौम्य और शब्दवेध (केवल शब्द सुनकर लक्ष्य भेदनेवाला) अस्त्रों का प्रयोग करता है। अन्तिम अस्त्र इसीलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि चित्रसेन माया से अदृश्य होकर लड़ता है।

चार पाण्डवों और सहस्रों गन्धर्वों के बीच का यह युद्ध असाधारण था। जैसे कर्ण और दुर्योधन के रथ पहले तोड़े गए थे, वैसे ही इन वीरों के रथ तोड़ने का प्रयत्न हुआ। पर वे बाण-वर्षा से सहस्रों गन्धर्वों को रोकते रहे, और गन्धर्व उनके निकट तक न पहुँच सके। तब क्रुद्ध अर्जुन ने आग्नेय अस्त्र से लाखों गन्धर्वों को यमलोक भेज दिया। महाधनुर्धर भीम ने भी सैकड़ों गन्धर्वों का वध किया। माद्री-पुत्रों (नकुल-सहदेव) ने भी सैकड़ों को मारा।

दिव्यास्त्रों से मारे जाते गन्धर्व धृतराष्ट्र-पुत्रों को लेकर आकाश में उड़ चले। पर धनंजय ने उन्हें बाणों के विस्तृत जाल से चारों ओर से घेर लिया, मानो पिंजरे में बन्द पक्षी हों। उन्होंने क्रोध से अर्जुन पर गदा, बरछे और खड्ग बरसाए, पर अर्जुन ने अर्धचन्द्राकार बाणों से उनके अंग काट डाले। ऊपर से सिर, टाँगें और भुजाएँ पत्थरों की वर्षा-सी गिरने लगीं। अर्जुन ने स्थूणाकर्ण, इन्द्रजाल, सौर, आग्नेय और सौम्य अस्त्र छोड़े। कुन्ती-पुत्र के अग्नि-अस्त्रों से गन्धर्व ऐसे जलने लगे जैसे इन्द्र के वज्र से दैत्य।

कुन्ती-पुत्र से गन्धर्वों को भयभीत देख चित्रसेन गदा लेकर ऊपर से धनंजय पर झपटा। पर अर्जुन ने बाणों से वह लोहे की गदा सात टुकड़ों में काट दी। तब चित्रसेन अपनी विद्या (माया) से अर्जुन की दृष्टि से ओझल होकर लड़ने लगा। अर्जुन ने अपने दिव्यास्त्रों से उसके सब अस्त्र रोक दिए। जब गन्धर्वराज पूरी तरह अदृश्य हो गया, तो अर्जुन ने शब्दवेध अस्त्र से उसका छिपना रोक दिया। उन अस्त्रों से व्याकुल होकर अपने प्रिय मित्र (अर्जुन) के सम्मुख गन्धर्वराज प्रकट हुआ और बोला, “मुझे देखिए, मैं आपका मित्र हूँ, आपसे लड़ रहा हूँ!” अपने थके मित्र चित्रसेन को देखकर अर्जुन ने अस्त्र खींच लिए। अन्य पाण्डवों ने भी अपने अस्त्र और रथ रोक लिए। चित्रसेन, भीम, अर्जुन और जुड़वाँ, सब एक-दूसरे की कुशल पूछकर अपने-अपने रथों पर बैठ गए।

सार: हल्की झड़प में जब गन्धर्व नहीं मानते, अर्जुन दिव्यास्त्रों का प्रयोग करता है और गन्धर्व-सेना को कुचल देता है। निर्णायक मोड़ तब आता है जब गन्धर्वराज अदृश्य होकर लड़ता है और अर्जुन शब्दवेध अस्त्र से उसे प्रकट कर देता है। तब पता चलता है कि वह चित्रसेन है, अर्जुन का मित्र और गुरु। युद्ध मैत्री में बदल जाता है।

चित्रसेन का रहस्य और दुर्योधन की मुक्ति

तब तेजस्वी अर्जुन ने गन्धर्व-सेना के बीच मुस्कराकर चित्रसेन से पूछा, “हे वीर, आप कौरवों को दण्ड क्यों दे रहे हैं? सुयोधन को उसकी स्त्रियों सहित यों क्यों दण्डित किया गया?” चित्रसेन ने उत्तर दिया, “हे धनंजय, अपने निवास से ही मैंने दुष्ट दुर्योधन और नीच कर्ण के यहाँ आने का प्रयोजन जान लिया था। प्रयोजन यही था, आपको वनवास में दुःख भोगते जानकर, स्वयं समृद्धि में, यह आपको और द्रुपद-कन्या को विपत्ति में देखकर उपहास करना चाहता था। देवराज इन्द्र ने भी यह प्रयोजन जानकर मुझसे कहा, ‘जाइए, दुर्योधन को उसके मन्त्रियों सहित बेड़ियों में बाँधकर ले आइए। और युद्ध में धनंजय तथा उसके भाई की सदा रक्षा कीजिए, क्योंकि वह आपका प्रिय मित्र और शिष्य है।’ इन्द्र के इन वचनों से मैं यहाँ आया। अब मैं इस दुष्ट को पाक-शासन (इन्द्र) की आज्ञा से देवलोक ले जाऊँगा।”

अर्जुन बोले, “हे चित्रसेन, यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं, तो धर्मराज युधिष्ठिर की आज्ञा से सुयोधन को छोड़ दीजिए, क्योंकि वह हमारा भाई है।” चित्रसेन ने कहा, “यह पापी सदा अहंकार से भरा है, मुक्ति के योग्य नहीं। इसने युधिष्ठिर और कृष्णा (द्रौपदी) दोनों को छला और सताया है। पर युधिष्ठिर अभी इसके आने का प्रयोजन नहीं जानते। अतः राजा सब जानकर जो चाहें, वही करें।”

तब सब युधिष्ठिर के पास गए और दुर्योधन के आचरण का सब वृत्तान्त सुनाया। अजातशत्रु ने सब सुनकर कौरवों को मुक्त कर दिया और गन्धर्वों की प्रशंसा की। राजा बोले, “सौभाग्य है कि महाबली होकर भी आपने धृतराष्ट्र-पुत्र का उसके मन्त्रियों और सम्बन्धियों सहित वध नहीं किया। यह आपकी हम पर बड़ी कृपा है। इस दुष्ट को मुक्त करने से हमारे कुल का सम्मान भी रह गया। मैं आप सबको देखकर प्रसन्न हूँ। बताइए, मैं आपके लिए क्या करूँ। और जो चाहते हों पाकर शीघ्र लौट जाइए।”

गन्धर्व प्रसन्न होकर अप्सराओं सहित चले गए। तब देवराज इन्द्र ने वहाँ आकर युद्ध में मारे गए गन्धर्वों पर दिव्य अमृत छिड़ककर उन्हें जीवित कर दिया। पाण्डवों ने अपने सम्बन्धियों और अन्तःपुर की स्त्रियों को मुक्त कराकर वह कठिन कार्य सिद्ध किया। तब युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के बीच मुक्त दुर्योधन से स्नेहपूर्वक कहा, “हे पुत्र, फिर कभी ऐसा दुस्साहसपूर्ण कार्य मत करना। हे भारत, दुस्साहसी को सुख नहीं मिलता। हे कुरुवंशी, अपने सब भाइयों के साथ प्रसन्न रहें। बिना खिन्न या निराश हुए अपनी राजधानी को लौट जाइए।”

पाण्डु-पुत्र से यों विदा पाकर दुर्योधन ने युधिष्ठिर को प्रणाम किया, और लज्जा से अभिभूत, हृदय विदीर्ण, यन्त्रवत् प्राणहीन-सा अपनी राजधानी की ओर चल पड़ा। कौरव-राजकुमार के जाने पर ब्राह्मणों ने युधिष्ठिर का पूजन किया, और वे तपोधन ब्राह्मणों से घिरे हुए, मानो देवताओं से घिरे इन्द्र हों, द्वैत-वन में सुखपूर्वक रहने लगे।

एक उप-कथा: चित्रसेन का यह रहस्य महाभारत की नैतिक जटिलता का सुन्दर उदाहरण है। दुर्योधन का हरण कोई संयोग नहीं, इन्द्र की सुनियोजित योजना थी, उसका दर्प तोड़ने को। पर उसी इन्द्र ने चित्रसेन को यह भी कहा था कि वह अर्जुन की रक्षा करे। इस प्रकार जिस गन्धर्व ने दुर्योधन को बाँधा, वही अर्जुन का संरक्षक मित्र निकला। शत्रु और रक्षक की रेखाएँ यहाँ सीधी नहीं रहतीं।

सार: चित्रसेन प्रकट करता है कि यह सब इन्द्र की योजना थी, दुर्योधन के दुष्ट प्रयोजन को दण्डित करने और साथ ही अर्जुन की रक्षा करने की। युधिष्ठिर, धर्म-दृष्टि से, दुर्योधन को क्षमा-सहित मुक्त कराते हैं और बिना अहंकार के विदा करते हैं। दुर्योधन के लिए यही उद्धार उसके दर्प पर गहरा प्रहार बन जाता है, शत्रु ने ही उसे बचाया।

लज्जित दुर्योधन और प्राणान्त-व्रत का संकल्प

जनमेजय ने पूछा, “शत्रु से पराजित और बन्दी होकर, फिर पाण्डवों द्वारा शस्त्र-बल से मुक्त होकर, उस अभिमानी, दुष्ट, डींगमार दुर्योधन का हस्तिनापुर में प्रवेश तो अत्यन्त कठिन रहा होगा। हे वैशम्पायन, उस लज्जा और शोक से व्याकुल राजकुमार के नगर-प्रवेश का विस्तार से वर्णन कीजिए।”

वैशम्पायन बोले, युधिष्ठिर से विदा पाकर दुर्योधन सिर झुकाए, शोक से व्याकुल, धीरे-धीरे चला। मार्ग में घास और जल से समृद्ध एक रमणीय स्थान पर उसने अपनी चतुरंगिणी सेना सहित पड़ाव डाला। अग्नि-तेज से युक्त एक ऊँचे शय्या पर, ग्रहण-ग्रस्त चन्द्रमा-सा, वह बैठा था। प्रातःकाल के समय कर्ण उसके पास आकर बोला, “हे गान्धारी-पुत्र, सौभाग्य है कि आप जीवित हैं! सौभाग्य है कि हम फिर मिले! भाग्य से ही आपने इच्छानुसार रूप धरनेवाले गन्धर्वों को जीता, और आपके भाई विजयी होकर लौटे। रहा मैं, सब गन्धर्वों से घिरकर, शरीर बाणों से क्षत-विक्षत होकर, मैं आपके सम्मुख ही भागकर अपनी रक्षा कर सका। यह तो बड़ा अचम्भा है कि आप सब उस अमानवीय युद्ध से अपनी स्त्रियों, सेना और वाहनों सहित सकुशल लौटे।”

कर्ण के ये वचन सुनकर दुर्योधन ने आँसुओं से रुँधे स्वर में अंग-नरेश (कर्ण) से कहा, “हे राधेय, आप नहीं जानते कि क्या हुआ। इसीलिए मैं आपके वचनों पर रुष्ट नहीं होता। आप समझते हैं कि गन्धर्व मेरे ही बल से जीते गए। हे महाबाहु, मेरे भाई और मैं बहुत देर तक गन्धर्वों से लड़े। दोनों ओर बहुत मारे गए। पर जब वे वीर गन्धर्व अपनी अनेक मायाओं से आकाश में चढ़कर वहीं से लड़ने लगे, तो युद्ध समान न रहा। पराजय हुई, और बन्दी भी बने। तब हमारे कुछ सैनिक और अधिकारी शोक से व्याकुल होकर पाण्डवों के पास गए, उन वीरों के पास जो कभी शरणागत को सहायता से वंचित नहीं करते।”

“पाण्डवों ने सौम्य वचनों से हमारी मुक्ति माँगी, यद्यपि वे बल से भी कर सकते थे। जब गन्धर्वों ने न माना, तो अर्जुन, भीम और जुड़वाँ ने बाण-वर्षा की। तब गन्धर्व हमें घसीटते हुए आकाश में भागे। अर्जुन ने बाणों का जाल फैलाकर, दिव्यास्त्र छोड़कर उन्हें रोका। तब उसका मित्र गन्धर्वराज प्रकट हुआ, और दोनों ने आलिंगन करके एक-दूसरे की कुशल पूछी। हे कर्ण, अर्जुन ने चित्रसेन के पास जाकर मनस्वी वचनों में कहा, ‘हे गन्धर्वश्रेष्ठ, मेरे भाइयों को मुक्त कीजिए। जब तक पाण्डव जीवित हैं, इनका अपमान सम्भव नहीं।’ तब गन्धर्वराज ने पाण्डवों के सामने हमारा वह प्रयोजन प्रकट कर दिया, कि हम उन्हें और द्रुपद-कन्या को विपत्ति में देखकर उपहास करने आए थे।”

“और जब वह गन्धर्व हमारी ये योजनाएँ प्रकट कर रहा था, तो लज्जा से अभिभूत मैंने चाहा कि पृथ्वी फट जाए और मैं उसी में समा जाऊँ। गन्धर्व हमें बाँधकर युधिष्ठिर के पास ले गए और सब प्रकट कर दिया। हाय, इससे बड़ा दुःख क्या होगा कि अपनी स्त्रियों के सम्मुख, बेड़ियों में बँधा, शत्रुओं के पूर्ण अधीन, मैं युधिष्ठिर को भेंट चढ़ाया गया! जिन्हें मैंने सदा सताया, जो सदा मेरे शत्रु रहे, उन्होंने मुझे बन्धन से मुक्त किया, और मैं अधम उनका अपने प्राणों के लिए ऋणी हूँ। यदि उस महायुद्ध में मेरी मृत्यु हो जाती, तो यह कहीं अच्छा होता। गन्धर्वों से मारा जाता तो मेरी कीर्ति समस्त पृथ्वी पर फैलती, और मुझे इन्द्र-स्वर्ग के शुभ लोक मिलते।”

“अब सुनिए, मैं क्या करूँगा। मैं यहीं अन्न त्यागकर बैठूँगा, और आप सब घर लौट जाइए। मेरे सब भाई हस्तिनापुर लौट जाएँ। कर्ण सहित सब मित्र और दुःशासन सहित सब सम्बन्धी राजधानी लौट जाएँ। शत्रु से अपमानित होकर मैं वहाँ न जाऊँगा। जिसने पहले शत्रुओं से सम्मान छीना और मित्रों का मान बढ़ाया, वही अब मित्रों के लिए शोक और शत्रुओं के लिए हर्ष का स्रोत बन गया है। हस्तिनापुर जाकर मैं राजा से क्या कहूँगा? भीष्म, द्रोण, कृप, अश्वत्थामा, विदुर, संजय, बाह्लीक, सोमदत्त और अन्य पूज्य गुरुजन मुझसे क्या कहेंगे, और मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? अब तक शत्रुओं के सिर पर रहकर, उनके वक्ष पर पाँव रखकर चलनेवाला मैं अपने पद से गिर गया हूँ। मूर्खता से मैंने अत्यन्त अनुचित और पापमय कार्य किया, जिसके फलस्वरूप ऐसी विपत्ति में जा पड़ा। अतः मैं अनशन से प्राण त्यागूँगा। शत्रु से उद्धार पाकर कौन स्वाभिमानी अपना जीवन ढो सकता है?”

तब दुर्योधन ने दुःशासन से कहा, “हे दुःशासन, मेरे ये वचन सुनिए। मेरे स्थान पर आप राजा बनिए। कर्ण और सुबल-पुत्र की रक्षा में इस वसुधा पर राज कीजिए। मरुतों की रक्षा करते इन्द्र की भाँति अपने भाइयों का पालन कीजिए, जिससे वे सब आप पर विश्वास करें। ब्राह्मणों को सदा वृत्ति दीजिए, मित्रों और सम्बन्धियों के आश्रय बनिए। गुरुजनों का सदा सम्मान कीजिए। जाइए, मित्रों को प्रसन्न और शत्रुओं को दण्डित करते हुए पृथ्वी पर राज कीजिए।” और गला पकड़कर दुर्योधन ने कहा, “जाइए!”

यह सुनकर दुःशासन शोक से व्याकुल, गला रुँधा, हाथ जोड़े, सिर झुकाए बोला, “ऐसा न करें!” और भारी मन से पृथ्वी पर गिर पड़ा। आँसू बहाते हुए, ज्येष्ठ भ्राता के चरणों पर, वह बार-बार बोला, “यह कभी न होगा! पृथ्वी फट जाए, स्वर्ग का आकाश टूट जाए, सूर्य अपना तेज त्याग दे, चन्द्र अपनी शीतलता छोड़ दे, वायु अपनी गति त्याग दे, हिमवान् अपने स्थान से डिग जाए, समुद्र का जल सूख जाए, और अग्नि अपनी ऊष्मा छोड़ दे, फिर भी हे राजन, मैं आपके बिना पृथ्वी पर राज न करूँगा। शान्त हों, हे राजन! हमारे कुल में आप ही सौ वर्ष तक राजा रहेंगे।” यों कहकर दुःशासन ज्येष्ठ भ्राता के चरण पकड़े विलाप करने लगा।

सार: लज्जित दुर्योधन कर्ण के सामने सच स्वीकार करता है, गन्धर्व उसके बल से नहीं, माया से हारते-जीतते रहे; पाण्डवों ने ही उसे मुक्त कराया। यह कृतज्ञता का बोझ उसके लिए मृत्यु से भी कठिन है। वह अनशन-व्रत (प्राणान्त उपवास) का संकल्प करता है और राज्य दुःशासन को सौंपना चाहता है। दुःशासन का प्रेम-विलाप कौरव-पक्ष की मानवीयता दिखाता है।

कर्ण और शकुनि का धीरज, और दुर्योधन का अडिग व्रत

दोनों को रोते देख कर्ण ने शोक से उनके पास आकर कहा, “हे कुरु-राजकुमारो, मूर्खों की भाँति साधारण मनुष्यों जैसे शोक क्यों करते हैं? रोने से शोक कभी कम नहीं होता। धैर्य धारण कीजिए और ऐसे आचरण से शत्रु को प्रसन्न मत कीजिए। हे राजन, पाण्डवों ने आपको मुक्त करके अपना कर्तव्य ही किया। राजा के राज्य में रहनेवाले सदा राजा का प्रिय करते हैं। आपके संरक्षण में रहते पाण्डव आपके राज्य में सुखी हैं। साधारण व्यक्ति की भाँति शोक मत कीजिए। देखिए, आपको अनशन का संकल्प करते देख आपके सहोदर भाई कैसे दुःखी हैं। उठिए, अपने नगर लौटिए और इन्हें सान्त्वना दीजिए।”

कर्ण आगे बोला, “हे राजन, आज का यह आचरण बालकोचित प्रतीत होता है। हे शत्रुनाशक, इसमें आश्चर्य क्या कि शत्रु से पराजित आपको पाण्डवों ने मुक्त किया? जो राजा के राज्य में रहते हैं, विशेषकर जो शस्त्र-वृत्ति वाले हैं, वे सदा राजा का प्रिय करते हैं, चाहे राजा उन्हें जानता हो या नहीं। प्रायः ऐसे श्रेष्ठ पुरुष भी, जो शत्रु-सेना को चीरते हैं, शत्रु से पराजित होकर अपने सैनिकों से मुक्त किए जाते हैं। पाण्डव आपके राज्य में रहते हैं; उन्होंने आपको मुक्त किया, तो इसमें शोक क्या? हाँ, युद्ध के समय वे आपके साथ न आए, यह उनकी ओर से अनुचित अवश्य था। वे पहले द्यूत में आपके अधीन, आपके दास बन चुके थे, अतः वे आपकी सहायता को बँधे हैं। आप पाण्डवों का सब वैभव भोग रहे हैं, वे अभी जीवित हैं, उन्होंने अनशन से मरने का संकल्प नहीं किया। उठिए, हे राजन! यदि आप अनशन से प्राण त्यागेंगे, तो अन्य राजाओं के बीच केवल उपहास के पात्र बनेंगे।”

कर्ण के इन वचनों पर भी दुर्योधन संसार त्यागने पर अडिग रहा, और अपने स्थान से उठने को तैयार न हुआ। तब अपमान न सह सकनेवाले, प्राणान्त व्रत पर बैठे दुर्योधन को सान्त्वना देते हुए सुबल-पुत्र शकुनि बोला, “हे कुरुवंशी, आपने कर्ण के वचन सुने। उसके वचन वस्तुतः बुद्धिमत्तापूर्ण हैं। जो उच्च समृद्धि मैंने आपके लिए जीती, उसे मूर्खता से त्यागकर आज प्राण क्यों त्यागते हैं? मुझे लगता है, आपने कभी वृद्धों की सेवा नहीं की। जो अकस्मात् आए हर्ष या शोक को वश में नहीं रख सकता, वह समृद्धि पाकर भी जल में डूबे कच्चे घड़े-सा नष्ट हो जाता है।”

“जो राजा धैर्यहीन, पराक्रमहीन, आलस्यप्रिय, अविवेकी और इन्द्रिय-सुखों में आसक्त हो, उसका प्रजा सम्मान नहीं करती। इतना लाभ पाकर भी यह अकारण शोक क्यों? पृथा-पुत्रों द्वारा किए इस सुन्दर कार्य को शोक में पड़कर व्यर्थ मत कीजिए। जब आपको हर्षित होकर पाण्डवों को पुरस्कृत करना चाहिए, तब आप शोक कर रहे हैं, यह आचरण असंगत है। प्रसन्न होइए, प्राण मत त्यागिए, और उनके किए उपकार को प्रसन्न मन से स्मरण कीजिए। पृथा-पुत्रों को उनका राज्य लौटा दीजिए, और इस आचरण से धर्म तथा कीर्ति दोनों अर्जित कीजिए। पाण्डवों से मैत्री स्थापित करके, उन्हें उनका पैतृक राज्य देकर, तब आप सुखी होंगे।”

शकुनि के ये वचन सुनकर, और दुःशासन को बन्धु-प्रेम से व्याकुल अपने सम्मुख गिरा देखकर, राजा ने दुःशासन को उठाया, अपनी गोल भुजाओं में भरकर स्नेह से उसका मस्तक सूँघा। पर कर्ण और शकुनि के वचनों से दुर्योधन और भी हतोत्साह हो गया, लज्जा और निराशा ने उसकी आत्मा को घेर लिया। उसने शोक से उत्तर दिया, “अब मुझे धर्म, धन, मैत्री, वैभव, राज्य और भोगों से कोई प्रयोजन नहीं। मेरे संकल्प में बाधा मत डालिए, मुझे अकेला छोड़ दीजिए। मैं अनशन से प्राण त्यागने को दृढ़ हूँ। नगर लौटकर मेरे गुरुजनों का आदर करना।” वे बोले, “हे राजन, आपका जो मार्ग है, वही हमारा भी है। आपके बिना हम नगर कैसे प्रवेश करें?”

मित्रों, मन्त्रियों, भाइयों और सम्बन्धियों के नाना प्रकार समझाने पर भी राजा अपने संकल्प से न डिगा। उसने कुश-घास भूमि पर बिछाई, जल का स्पर्श करके स्वयं को शुद्ध किया, और वहीं बैठ गया। वल्कल और कुश पहने उसने परम व्रत धारण किया। समस्त वाणी रोककर, स्वर्ग जाने की इच्छा से, वह बाह्य व्यवहार त्यागकर भीतर ही भीतर प्रार्थना और ध्यान करने लगा।

समझने की कुंजी (अवधारणा): प्रायोपवेश / अनशन-व्रत, अन्न-जल त्यागकर मृत्यु की प्रतीक्षा का संकल्प। प्राचीन क्षत्रिय-परम्परा में यह कभी प्रतिशोध या लज्जा-निवारण का साधन भी बनता था। दुर्योधन इसे आत्म-हनन नहीं, अपितु अपमान से बचने और स्वर्ग पाने का मार्ग समझता है।

सार: कर्ण और शकुनि व्यावहारिक तर्क देते हैं, पाण्डवों ने तो प्रजा का कर्तव्य ही निभाया, इसमें लज्जा क्या। शकुनि तो यहाँ तक कहता है कि पाण्डवों को राज्य लौटाकर मैत्री कर लो। पर दुर्योधन का अहंकार उसे झुकने नहीं देता; वह कुश बिछाकर प्रायोपवेश पर बैठ जाता है।

पाताल के दानवों का आह्वान और दुर्योधन का प्रबोधन

इसी बीच, जो दैत्य और दानव पुरातन काल में देवताओं से पराजित होकर पाताल में रहते थे, उन्होंने दुर्योधन का संकल्प जान लिया। यह समझकर कि यदि राजा मर गया तो उनका पक्ष दुर्बल हो जाएगा, उन्होंने दुर्योधन को अपने पास बुलाने के लिए अग्नि से एक यज्ञ आरम्भ किया। मन्त्रवेत्ताओं ने बृहस्पति और उशनस् (शुक्राचार्य) द्वारा कथित सूत्रों के सहारे वे विधियाँ कीं, जो अथर्ववेद और उपनिषदों में बताई गई हैं। कठोर व्रती ब्राह्मणों ने मन्त्र उच्चारते हुए अग्नि में घृत और दूध की आहुतियाँ दीं।

रीति समाप्त होने पर, हे राजन, अग्नि से एक विचित्र देवी प्रकट हुई, मुख फैलाए, कहती हुई, “मैं क्या करूँ?” प्रसन्न दानवों ने आज्ञा दी, “धृतराष्ट्र-पुत्र को यहाँ ले आइए, जो प्राण त्यागने का व्रत कर रहा है।” “ऐसा ही हो” कहकर वह पलक झपकते उस स्थान पर पहुँची जहाँ सुयोधन था। उसे पाताल ले जाकर उसने दानवों को सूचित किया। रात में राजा को बीच में पाकर दानव प्रसन्न नेत्रों से उससे चाटुकारी-भरे वचन बोले।

दानव बोले, “हे सुयोधन, हे महाराज, हे भरतवंश के संवर्धक! आप सदा वीरों और तेजस्वियों से घिरे रहते हैं। फिर अनशन का यह दुस्साहसपूर्ण कार्य क्यों? आत्महन्ता नरक में गिरता है और निन्दा का पात्र बनता है। आप जैसे बुद्धिमान कभी ऐसे पापमय और स्वार्थ-विरोधी कार्य नहीं करते। अतः धर्म, अर्थ, सुख, कीर्ति और तेज का नाश करनेवाले इस संकल्प को रोकिए। हे महाराज, अपनी आत्मा के दिव्य उद्गम और अपने शरीर के निर्माता का सत्य जानिए, फिर धैर्य धारण कीजिए।”

“प्राचीन काल में हमने तपस्या से महेश्वर से आपको प्राप्त किया था। आपके शरीर का ऊपरी भाग वज्रों के समूह से बना है, अतः सब अस्त्रों से अभेद्य है। निचला भाग, जो स्त्री-हृदय को मोह सकता है, स्वयं महादेव की देवी ने पुष्पों से बनाया। इस प्रकार आपका शरीर महेश्वर और उनकी देवी की रचना है। अतः हे नरश्रेष्ठ, आप दिव्य उद्गम के हैं, मानव नहीं। भगदत्त आदि अनेक वीर क्षत्रिय आपके शत्रुओं का वध करेंगे, अतः यह शोक त्यागिए। आपके लिए कोई भय नहीं। आपकी सहायता को अनेक वीर दानव पृथ्वी पर जन्म ले चुके हैं।”

“अन्य असुर भीष्म, द्रोण, कर्ण आदि वीरों में प्रवेश करेंगे। उनसे आविष्ट होकर ये वीर अपनी करुणा त्यागकर आपके शत्रुओं से लड़ेंगे। जब दानव इनके हृदय में प्रवेश करके इन्हें पूर्णतया वश में करेंगे, तो ये समस्त स्नेह दूर फेंककर, कठोर-हृदय होकर, पुत्र, भाई, पिता, मित्र, शिष्य, सम्बन्धी, बालक और वृद्ध, किसी को छोड़े बिना, युद्ध में सबको मारेंगे। अज्ञान और क्रोध से अन्धे होकर, विधाता द्वारा नियत उस नियति से प्रेरित होकर, ये पापमय हृदयवाले नरश्रेष्ठ सब प्रकार के अस्त्र चलाते हुए पृथ्वी को जनहीन कर देंगे, और परस्पर डींग मारते कहेंगे, ‘आज आप जीवित बचकर नहीं जाएँगे।’”

समझने की कुंजी (अवधारणा, संयम के साथ पढ़ें): यहाँ दानव दुर्योधन को आश्वस्त करने को कहते हैं कि भीष्म, द्रोण, कर्ण जैसे वीर असुर-आविष्ट होकर निर्मम युद्ध करेंगे। महाभारत यहाँ नैतिक संकट को टालता नहीं, अपितु यह संकेत देता है कि आगे का महायुद्ध केवल मानवीय द्वेष नहीं, अपितु दैवी-आसुरी शक्तियों के संघर्ष का रंगमंच बनेगा। पर यह दानवों का कथन है, सर्वज्ञ सत्य नहीं, इसे एक पक्ष की व्याख्या के रूप में देखना उचित है।

दानव बोले, “और हे राजन, ये पाँचों पाण्डव भी इनसे लड़ेंगे, और भाग्य के अनुकूल होकर इनका संहार करेंगे। क्षत्रिय-वंश में जन्मे अनेक दैत्य-राक्षस गदा, मूसल, बरछों और श्रेष्ठ अस्त्रों से आपके शत्रुओं से लड़ेंगे। हे वीर, अर्जुन से जो भय आपके मन में है, उसके वध का उपाय हमने पहले ही कर लिया है। मारे गए नरकासुर की आत्मा ने कर्ण का रूप धरा है। अपनी पुरानी शत्रुता स्मरण करके वह केशव (कृष्ण) और अर्जुन दोनों से भिड़ेगा। वह महावीर युद्ध में अर्जुन और आपके सब शत्रुओं को जीतेगा।”

“यह सब जानकर, अर्जुन की रक्षा के इच्छुक वज्रधारी इन्द्र छद्म रूप से कर्ण से उसके कुण्डल और कवच ले लेंगे। इसी कारण हमने सैकड़ों-सहस्रों दैत्य-राक्षस नियुक्त किए हैं, जो ‘संशप्तक’ नाम से प्रसिद्ध हैं। ये प्रसिद्ध योद्धा वीर अर्जुन का वध करेंगे। अतः शोक मत कीजिए। आप निष्कण्टक होकर समस्त पृथ्वी पर राज करेंगे। निराश मत होइए। हे कुरुवंशी, यदि आप मरेंगे तो हमारा पक्ष दुर्बल हो जाएगा। जैसे पाण्डव देवताओं के आश्रय हैं, वैसे ही आप सदा हमारे आश्रय हैं।”

समझने की कुंजी (नाम): संशप्तक, वे योद्धा जो “मारकर ही लौटेंगे, अन्यथा मरेंगे” की प्रतिज्ञा करते हैं। कुरुक्षेत्र-युद्ध में ये अर्जुन को मुख्य युद्ध से दूर उलझाने का प्रयत्न करेंगे। यहाँ इनका उल्लेख आगे की कथा का बीज है।

ऐसा कहकर दानवों ने उस राजश्रेष्ठ का आलिंगन किया और पुत्र-सा प्रोत्साहित किया। मृदु वचनों से उसका मन शान्त करके उन्होंने उसे विदा किया, “जाइए, और विजय प्राप्त कीजिए!” तब वही देवी उसे फिर उसी स्थान पर ले आई जहाँ वह प्राणान्त-व्रत पर बैठा था। वीर को बैठाकर, उसे प्रणाम करके, राजा की अनुमति से देवी अन्तर्धान हो गई।

देवी के जाने पर दुर्योधन ने यह सब स्वप्न-सा माना। उसने मन में सोचा, “मैं युद्ध में पाण्डवों को पराजित करूँगा।” उसने माना कि कर्ण और संशप्तक-सेना दोनों पार्थ (अर्जुन) के नाश में समर्थ और तत्पर हैं। इस प्रकार पाण्डवों को जीतने की उस दुष्टमति की आशा दृढ़ हो गई। कर्ण भी, जिसकी आत्मा में नरकासुर का अंश समा गया था, अर्जुन के वध को कटिबद्ध हो गया था। संशप्तक भी, राक्षसों से आविष्ट और रजोगुण-तमोगुण से प्रभावित होकर, फाल्गुन का वध चाहते थे। भीष्म, द्रोण और कृप आदि भी, दानवों से प्रभावित होकर, पाण्डवों के प्रति पहले-सा स्नेह न रखते थे। पर राजा सुयोधन ने यह किसी को न बताया।

रात बीतने पर सूर्य-पुत्र कर्ण ने हाथ जोड़कर मुस्कराते हुए दुर्योधन से कहा, “मृत व्यक्ति शत्रुओं को नहीं जीतता; जीवित रहकर ही वह अपना भला देखता है। मृत की विजय कहाँ? अतः यह शोक, भय या मृत्यु का समय नहीं।” उसने राजा का आलिंगन करके कहा, “उठिए, हे राजन! क्यों लेटे हैं? क्यों शोक करते हैं? या क्या अर्जुन के पराक्रम से भय है? मैं सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ कि युद्ध में अर्जुन का वध करूँगा। अपने अस्त्र की शपथ खाकर कहता हूँ कि तेरह वर्ष बीतने पर मैं पृथा-पुत्रों को आपके अधीन ले आऊँगा।”

कर्ण के इन वचनों और दानवों के वचनों तथा भाइयों की प्रार्थनाओं को स्मरण करके सुयोधन उठ खड़ा हुआ। दृढ़ संकल्प से उसने घोड़ों, हाथियों, रथों और पैदल से भरी अपनी सेना सजाई। श्वेत छत्रों, ध्वजों, श्वेत चामरों, रथों, हाथियों और पैदल सैनिकों से भरी वह विशाल सेना गंगा के जल-सी बहती हुई शोभित हुई। ब्राह्मणों से विजय-आशीष पाकर, असंख्य हाथ जोड़े सम्मान पाता, अत्यन्त तेज से चमकता वह कर्ण और शकुनि के साथ आगे चला। दुःशासन आदि सब भाई, भूरिश्रवा, सोमदत्त और महाराज बाह्लीक उस सिंह-समान राजा के पीछे रथों, घोड़ों और श्रेष्ठ हाथियों के साथ चले, और थोड़े ही समय में वे कुरुवंशी अपने नगर में प्रवेश कर गए।

सार: दानव दुर्योधन को पाताल बुलाकर बताते हैं कि उसका शरीर महेश्वर की रचना है, और भीष्म-द्रोण-कर्ण आसुरी शक्तियों से आविष्ट होकर निर्मम युद्ध करेंगे; कर्ण में नरकासुर का अंश है जो अर्जुन से भिड़ेगा, और संशप्तक उसका वध करेंगे। यह स्वप्न-सा अनुभव दुर्योधन में नया आत्मविश्वास भरता है। वह व्रत त्यागकर, कर्ण की अर्जुन-वध-प्रतिज्ञा के साथ, सेना सजाकर हस्तिनापुर लौटता है।

भीष्म की शान्ति-सम्मति और कर्ण की दिग्विजय

जनमेजय ने पूछा, “जब पृथा-पुत्र वन में रहते थे, तब धृतराष्ट्र-पुत्रों, कर्ण, शकुनि, भीष्म, द्रोण और कृप ने क्या किया? यह मुझे बताइए।”

वैशम्पायन बोले, पाण्डवों द्वारा मुक्त होकर हस्तिनापुर लौटे दुर्योधन से भीष्म ने कहा, “हे पुत्र, मैंने पहले ही कहा था कि वहाँ जाना मुझे अच्छा नहीं लगता, पर आपने वैसा ही किया। फलस्वरूप आप शत्रु के बलात् बन्दी बने, और धर्मज्ञ पाण्डवों ने आपको मुक्त किया। फिर भी आपको लज्जा नहीं। हे गान्धारी-पुत्र, आपके और आपकी सेना के सम्मुख ही सूत-पुत्र (कर्ण) भयभीत होकर गन्धर्व-युद्ध से भागा। हे राजन, आपने उच्चात्मा पाण्डवों का पराक्रम और सूत-पुत्र की दुर्बलता दोनों देखी। अस्त्र-विद्या, वीरता या धर्म, किसी में भी कर्ण पाण्डवों के चौथाई भाग के भी बराबर नहीं। अतः कुल के कल्याण के लिए मेरे विचार से उच्चात्मा पाण्डवों से संधि ही श्रेयस्कर है।”

भीष्म के ये वचन सुनकर राजा बहुत हँसा और सहसा सुबल-पुत्र के साथ निकल गया। उसके जाने पर कर्ण और दुःशासन आदि महाधनुर्धर भी उसके पीछे चल दिए। उन्हें जाते देख कुरु-पितामह भीष्म लज्जा से सिर झुकाकर अपने स्थान को चले गए। भीष्म के जाने पर दुर्योधन फिर वहाँ आया और मन्त्रियों से विचार करने लगा, “मेरे लिए क्या उत्तम है? क्या शेष रह गया? और जो भला हो, उसे कैसे सिद्ध करें?”

कर्ण बोला, “हे कुरुनन्दन दुर्योधन, मेरी बात हृदय में धारण कीजिए। भीष्म सदा हमारी निन्दा और पाण्डवों की प्रशंसा करते हैं। आपके प्रति दुर्भाव से वे मुझसे भी द्वेष करते हैं और आपके सम्मुख सदा मुझे नीचा दिखाते हैं। मैं उनके ये वचन सहन न करूँगा। आप मुझे सेवकों, सेना और रथों सहित आज्ञा दीजिए। मैं अकेला ही पर्वतों और वनों से युक्त यह पृथ्वी जीत लूँगा। चार पराक्रमी पाण्डवों ने जो पृथ्वी जीती थी, वही मैं अकेले आपके लिए जीत लूँगा। वह दुष्ट भीष्म इसे देखे और स्वयं को धिक्कारे। आप आज्ञा दीजिए, विजय अवश्य आपकी होगी। अपने अस्त्र की शपथ खाकर कहता हूँ।”

कर्ण के ये वचन सुनकर परम हर्षित दुर्योधन बोला, “मैं धन्य हूँ। आपने मुझ पर अनुग्रह किया। आज मेरा जीवन सफल हुआ। हे वीर, जाइए, आपका कल्याण हो!” शुभ तिथि, शुभ मुहूर्त और शुभ नक्षत्र में, द्विजों से सम्मानित और मंगल द्रव्यों से स्नान कराकर पूजित होकर, वह महाधनुर्धर अपने रथ की घर्घराहट से तीनों लोकों को भरता हुआ निकल पड़ा।

कर्ण ने विशाल सेना सहित द्रुपद के सुन्दर नगर को घेरा और घोर युद्ध के बाद उसे वश में करके चाँदी, सोना, रत्न और कर वसूले। फिर उत्तर जाकर भगदत्त को पराजित करके, शत्रुओं से लड़ता हुआ महान हिमवान् पर्वत पर चढ़ा और वहाँ के सब राजाओं से कर लिया। पर्वत से उतरकर पूर्व की ओर बढ़कर उसने अंग, बंग, कलिंग, मण्डिक, मगध, कर्ककण्ड, आवसीर, योध्य और अहिक्षत्र को अपने अधीन किया। फिर वत्सभूमि लेकर केवली, मृत्तिकावती, मोहन, पात्रन, त्रिपुरा और कोसल को कर देने को विवश किया।

दक्षिण जाकर कर्ण ने वहाँ के महारथियों को जीता और दाक्षिणात्य में रुक्मी से भिड़ा। घोर युद्ध के बाद रुक्मी बोला, “हे राजश्रेष्ठ, मैं आपके बल और पराक्रम से प्रसन्न हूँ। मैं आपका अहित न करूँगा; मैंने केवल क्षत्रिय का व्रत निभाया है। आप जितना चाहें स्वर्ण ले लीजिए।” रुक्मी से मिलकर कर्ण पाण्ड्य और श्री-पर्वत गया, और करल, राजा नील तथा वेणुदारि-पुत्र आदि दक्षिण के राजाओं से कर लिया। फिर शिशुपाल-पुत्र को पराजित करके आसपास के सब राजाओं को वश में किया। अवन्तियों को जीतकर और संधि करके, वृष्णियों से मिलकर उसने पश्चिम जीता। वरुण की दिशा में जाकर सब यवन और बर्बर राजाओं से कर लिया।

इस प्रकार पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण, समस्त पृथ्वी जीतकर, बिना किसी सहायता के अकेले, उस वीर ने सब म्लेच्छों, पर्वतवासियों, भद्रों, रोहितकों, आग्नेयों और मालवों को वश में किया। नग्नजितों आदि महारथियों को जीतकर शशकों और यवनों को अधीन किया। इस प्रकार समस्त संसार जीतकर वह महारथी हस्तिनापुर लौटा। धृतराष्ट्र-पुत्र अपने पिता, भाइयों और मित्रों सहित कर्ण के पास आकर उसका विधिवत् सम्मान किया, और घोषणा की, “जो मुझे भीष्म, द्रोण, कृप या बाह्लीक से नहीं मिला, वह आपसे मिला। हे कर्ण, आप में ही मेरा आश्रय है। पाण्डव और अन्य समृद्ध राजा भी आपके सोलहवें भाग के बराबर नहीं।”

हस्तिनापुर में कोलाहल मच गया, कुछ राजा कर्ण की प्रशंसा करते, कुछ निन्दा, कुछ मौन रहते। समस्त पृथ्वी को वश में करके और अक्षय धन पाकर कर्ण राजा के सम्मुख प्रकट हुआ। राजमहल में प्रवेश करके उस धर्मज्ञ ने धृतराष्ट्र और गान्धारी के चरण पुत्र की भाँति स्पर्श किए। धृतराष्ट्र ने उसे स्नेह से आलिंगन करके विदा किया। तभी से दुर्योधन और शकुनि मानने लगे कि पृथा-पुत्र युद्ध में कर्ण से पराजित ही हो चुके हैं।

सार: भीष्म दुर्योधन को स्पष्ट चेतावनी देते हैं, कर्ण गन्धर्व-युद्ध में भागा, वह पाण्डवों के चौथाई भाग के बराबर भी नहीं, अतः संधि ही श्रेयस्कर है। पर दुर्योधन हँसकर चला जाता है। तब कर्ण अपने अपमान का बदला सिद्ध करने को दिग्विजय (समस्त दिशाओं की विजय) पर निकलता है और चारों दिशाओं के राजाओं को जीतकर लौटता है, कौरव-पक्ष का दर्प फिर ऊँचा उठ जाता है।

वैष्णव यज्ञ और पाण्डवों को निमन्त्रण

कर्ण ने दुर्योधन से कहा, “हे कौरव, अब पृथ्वी शत्रुओं से रहित हो गई है। आप शत्रुहीन इन्द्र की भाँति इस पर राज कीजिए।” राजा बोला, “हे नरश्रेष्ठ, जिसका आप आश्रय हों, उसके लिए कुछ अप्राप्य नहीं। पाण्डवों द्वारा किया वह श्रेष्ठ राजसूय यज्ञ देखकर मेरे मन में भी वैसा करने की इच्छा जगी है। हे सूत-पुत्र, मेरी यह इच्छा पूरी कीजिए।” कर्ण ने कहा कि सब राजा वश में हैं, अतः प्रमुख ब्राह्मणों को बुलाकर विधिवत् यज्ञ-सामग्री जुटाई जाए और वेदज्ञ ऋत्विज विधि से यज्ञ कराएँ।

राजा ने पुरोहित को बुलाकर राजसूय यज्ञ कराने को कहा। पर श्रेष्ठ ब्राह्मण बोले, “हे कुरुश्रेष्ठ, जब तक युधिष्ठिर जीवित हैं, यह यज्ञ आपके कुल में नहीं हो सकता। और आपके दीर्घायु पिता धृतराष्ट्र भी जीवित हैं, इस कारण भी यह यज्ञ आप नहीं कर सकते। पर राजसूय-तुल्य एक और महान यज्ञ है, उसे कीजिए। आपको कर देनेवाले सब राजा शुद्ध-अशुद्ध स्वर्ण में कर देंगे। उस स्वर्ण का यज्ञीय हल बनवाकर यज्ञ-भूमि जोतिए। उस स्थान पर निर्विघ्न, मन्त्रों से पवित्र, अन्न-समृद्ध यज्ञ आरम्भ हो। इस यज्ञ का नाम वैष्णव है, जिसे प्राचीन विष्णु के अतिरिक्त किसी ने नहीं किया। यह राजसूय की समता करता है, और निर्विघ्न पूर्ण हो सकता है।”

राजा ने ब्राह्मणों के वचन सुनकर कर्ण, भाइयों और शकुनि से पूछा। सबने “ऐसा ही हो” कहा। तब राजा ने सबको कार्य सौंपे और शिल्पियों को स्वर्ण-हल बनाने को कहा। सब आज्ञाएँ क्रमशः पूरी हुईं। तब वैष्णव यज्ञ आरम्भ हुआ; गान्धारी-पुत्र विधिवत् दीक्षित हुआ। धृतराष्ट्र, विदुर, भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण और गान्धारी सब हर्षित हुए। दुर्योधन ने राजाओं और ब्राह्मणों को निमन्त्रण देने दूत भेजे।

एक दूत को दुःशासन ने कहा, “द्वैत-वन जाकर वहाँ के ब्राह्मणों और उन दुष्ट पाण्डवों को भी निमन्त्रित करना।” दूत ने वहाँ जाकर पाण्डवों को प्रणाम करके कहा, “अपने पराक्रम से अपार धन पाकर कुरुश्रेष्ठ दुर्योधन यज्ञ कर रहे हैं। नाना दिशाओं से राजा और ब्राह्मण आ रहे हैं। राजा आपको निमन्त्रित करते हैं; आप उस यज्ञ को देखने पधारिए।”

दूत के वचन सुनकर युधिष्ठिर बोले, “सौभाग्य है कि अपने पूर्वजों की कीर्ति बढ़ानेवाले राजा सुयोधन यह श्रेष्ठ यज्ञ कर रहे हैं। हम अवश्य आते, पर अभी नहीं आ सकते, क्योंकि तेरहवें वर्ष तक हमें अपना व्रत निभाना है।” यह सुनकर भीम बोला, “राजा युधिष्ठिर तब वहाँ जाएँगे जब तेरहवाँ वर्ष बीतने पर वे युद्ध-रूपी यज्ञ में दुर्योधन को शस्त्रों की अग्नि में आहुति देंगे। सुयोधन से कह दीजिए, जब पाण्डव युद्ध-यज्ञ में धृतराष्ट्र-पुत्रों पर अपने क्रोध का घृत उँडेलेंगे, तब मैं आऊँगा।” शेष पाण्डवों ने कुछ अप्रिय न कहा। दूत ने लौटकर सब वृत्तान्त सुनाया।

दुर्योधन का यह यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हुआ। विदुर ने सब वर्णों को अन्न-पान, माला और वस्त्र से सन्तुष्ट किया। राजा ने सहस्रों राजाओं और ब्राह्मणों को नाना धन देकर विदा किया।

एक उप-कथा: भीम का यह उत्तर महाभारत के संवादों की धार दिखाता है। दुर्योधन का यज्ञ-निमन्त्रण वस्तुतः अपने वैभव का प्रदर्शन है। भीम इसे “युद्ध-यज्ञ” के रूपक में पलट देता है, जहाँ आहुति दुर्योधन और कौरव होंगे, और घृत पाण्डवों का संचित क्रोध। यह केवल व्यंग्य नहीं, आगामी कुरुक्षेत्र की भविष्यवाणी भी है।

सार: दुर्योधन राजसूय करना चाहता है, पर ब्राह्मण बताते हैं कि युधिष्ठिर और धृतराष्ट्र के जीवित रहते वह सम्भव नहीं; अतः राजसूय-तुल्य “वैष्णव यज्ञ” किया जाता है। पाण्डवों को निमन्त्रण मिलता है, पर युधिष्ठिर व्रत का हवाला देकर अस्वीकार करते हैं और भीम युद्ध-यज्ञ की चेतावनी भेजता है।

कर्ण की अर्जुन-वध-प्रतिज्ञा और पाण्डवों की व्याकुलता

नगर में प्रवेश करते दुर्योधन की वन्दीजन स्तुति करने लगे। नागरिकों ने उस पर लावा (भुना धान) और चन्दन छिड़ककर कहा, “हे राजन, सौभाग्य है कि आपका यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हुआ।” पर कुछ निर्भीक वचनवाले बोले, “यह यज्ञ युधिष्ठिर के यज्ञ की समता नहीं करता, उसके सोलहवें भाग के भी बराबर नहीं।” पर मित्र बोले, “यह यज्ञ परम श्रेष्ठ रहा, अन्य सब यज्ञों से बढ़कर। ययाति, नहुष, मान्धाता और भरत भी ऐसे यज्ञ करके स्वर्ग गए।” मित्रों के प्रिय वचन सुनकर राजा प्रसन्न होकर नगर और अपने भवन में प्रवेश कर गया। पिता-माता, भीष्म, द्रोण, कृप और विदुर के चरण पूजकर, छोटे भाइयों से पूजित होकर वह श्रेष्ठ आसन पर बैठा।

तब कर्ण उठकर बोला, “हे भरतश्रेष्ठ, सौभाग्य है कि यह महान यज्ञ पूर्ण हुआ। पर जब युद्ध में पृथा-पुत्र मारे जाएँगे और आप राजसूय करेंगे, तब मैं आपका इसी प्रकार सम्मान करूँगा।” राजा बोला, “सत्य कहा। जब दुष्ट पाण्डव मारे जाएँ और मैं राजसूय करूँ, तब हे वीर, आप मुझे फिर इसी प्रकार सम्मानित करना।” यों कहकर उसने कर्ण का आलिंगन किया और राजसूय का विचार करने लगा। उसने कुरुओं से कहा, “पाण्डवों को मारकर मैं वह श्रेष्ठ राजसूय यज्ञ कब करूँगा?”

तब कर्ण बोला, “सुनिए, हे राजश्रेष्ठ! जब तक मैं अर्जुन का वध नहीं कर लेता, तब तक न तो किसी को अपने पाँव धोने दूँगा, न मांस खाऊँगा। और मैं ‘आसुर व्रत’ का पालन करूँगा, जो भी कुछ माँगेगा, उससे कभी न कहूँगा, ‘मेरे पास नहीं है।’” कर्ण की इस प्रतिज्ञा पर धृतराष्ट्र-पुत्रों ने उच्च नाद किया और मानने लगे कि पाण्डव जीते जा चुके हैं। तब दुर्योधन कुबेर के चित्ररथ-उद्यान में प्रवेश करते-से अपने भवन में चला गया, और सब महाधनुर्धर अपने-अपने स्थानों को गए।

समझने की कुंजी (अवधारणा): कर्ण का “आसुर व्रत”, किसी भी याचक को कभी निराश न करना, और तब तक भोग-सुख त्यागना जब तक प्रतिज्ञा पूरी न हो। यही व्रत आगे चलकर कर्ण की त्रासदी का बीज बनेगा, क्योंकि इसी उदारता के कारण इन्द्र छल से उसके कवच-कुण्डल माँगकर ले जाएँगे।

उधर पाण्डव दूत के वचनों से चिन्तित होकर अब तनिक भी सुख न पाते थे। गुप्तचरों से कर्ण की अर्जुन-वध-प्रतिज्ञा का समाचार मिलने पर धर्मराज युधिष्ठिर अत्यन्त व्याकुल हो उठे। अभेद्य-कवच कर्ण को अद्भुत पराक्रमी मानकर, और अपने सब दुःख स्मरण करके, उन्हें शान्ति न मिली। चिन्ता से भरकर उन्होंने हिंस्र पशुओं से भरे द्वैतवन को छोड़ने का निश्चय किया।

इधर धृतराष्ट्र-पुत्र अपने वीर भाइयों तथा भीष्म, द्रोण और कृप के साथ पृथ्वी पर राज करने लगा। रण-कीर्ति से युक्त कर्ण की सहायता से दुर्योधन सदा राजाओं के कल्याण में लगा रहा, और प्रचुर दान से यज्ञ करके ब्राह्मणों का पूजन करता रहा। यह मानकर कि देना और भोगना ही धन का एकमात्र उपयोग है, वह अपने भाइयों का कल्याण करता रहा।

सार: यज्ञ के बाद कर्ण घोर प्रतिज्ञा करता है, अर्जुन-वध तक भोग-त्याग और आसुर व्रत। यह समाचार पाकर युधिष्ठिर व्याकुल होते हैं और द्वैतवन छोड़ने का विचार करते हैं। कौरव-पक्ष दर्प में डूबा है, मानो पाण्डव पहले ही हार चुके हों।

मृगों का स्वप्न और काम्यक-वन की ओर

जनमेजय ने पूछा, “दुर्योधन को मुक्त करने के बाद पाण्डवों ने वन में क्या किया?” वैशम्पायन बोले, एक बार द्वैत-वन में रात्रि-शयन के समय युधिष्ठिर के स्वप्न में आँसुओं से रुँधे स्वर में कुछ मृग आए। काँपते शरीर से हाथ जोड़े खड़े उन मृगों से युधिष्ठिर ने पूछा, “आप कौन हैं? क्या चाहते हैं?” मारे गए मृगों के वे शेष बचे प्राणी बोले, “हे भारत, हम मारे गए मृगों के बचे-खुचे हैं। हम पूर्णतया नष्ट हो जाएँगे, अतः आप अपना निवास बदल लीजिए। आपके सब भाई शस्त्र-निपुण वीर हैं; उन्होंने वन-वासियों की पंक्तियाँ पतली कर दी हैं। हम कुछ ही बीज-समान शेष हैं। आपकी कृपा से हमें बढ़ने दीजिए।”

बीज-समान शेष उन मृगों को भय से काँपते देख युधिष्ठिर शोक से भर गए। सब प्राणियों के कल्याण में रत राजा ने कहा, “ऐसा ही हो, मैं वैसा ही करूँगा।” जागने पर मृगों पर दया से द्रवित होकर उन्होंने भाइयों से कहा, “मारे गए मृगों के बचे प्राणी रात्रि में मुझसे बोले, ‘हम अपनी पंक्तियों के बीज-समान शेष हैं, हम पर दया कीजिए।’ उन्होंने सच कहा। हम एक वर्ष और आठ मास से इन्हीं पर निर्वाह कर रहे हैं। अतः फिर रमणीय काम्यक-वन को चलें, जो मरुभूमि के सिरे पर त्रिणबिन्दु सरोवर के निकट है, और वहीं शेष समय सुखपूर्वक बिताएँ।”

तब पाण्डव ब्राह्मणों, सब साथियों और इन्द्रसेन आदि अनुचरों के साथ शीघ्र चल पड़े। उत्तम अन्न और स्वच्छ जल से युक्त मार्गों पर चलकर वे तपोबल से युक्त पवित्र काम्यक-आश्रम पहुँचे। जैसे पुण्यात्मा स्वर्ग में प्रवेश करते हैं, वैसे ही वे ब्राह्मण-श्रेष्ठों से घिरे उस वन में पहुँचे।

सार: स्वप्न में बचे हुए मृग युधिष्ठिर से प्रार्थना करते हैं कि वे निवास बदल लें, अन्यथा मृग-कुल नष्ट हो जाएगा। प्राणि-कल्याण में रत युधिष्ठिर तुरन्त सहमत होकर पाण्डवों को द्वैतवन से काम्यक-वन ले जाते हैं। यह प्रसंग युधिष्ठिर की उस अहिंसा-दृष्टि को दिखाता है जो शत्रु तक पर दया करती है।

व्यास का आगमन और दान-तप पर उपदेश

वन में रहते पाण्डवों के ग्यारह वर्ष दुःख में बीते। फल-मूल पर निर्वाह करते वे सुख के योग्य होकर भी कष्ट में दिन काटते। द्यूत के अपने अपराध को स्मरण करके युधिष्ठिर को शान्ति से नींद न आती, मानो हृदय में बरछा बिंध गया हो। कर्ण के कटु वचन स्मरण करके वे अपने क्रोध-विष को दबाते, दीन वेश में आहें भरते रहते। अर्जुन, जुड़वाँ, द्रौपदी और बलिष्ठ भीम, सब युधिष्ठिर को देखकर तीव्र पीड़ा अनुभव करते। निर्वासन का अल्प समय शेष जानकर वे क्रोध और आशा से भरकर नाना प्रयत्नों में लगे रहते।

कुछ काल बाद महातपस्वी व्यास, सत्यवती-पुत्र, पाण्डवों को देखने आए। युधिष्ठिर ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया, प्रणाम किया, और ऋषि के बैठने पर सुनने की इच्छा से सामने बैठ गए। अपने पौत्रों को क्षीण और वन-उपज पर जीते देख व्यास करुणा से द्रवित होकर रुँधे स्वर में बोले, “हे युधिष्ठिर, जो तपस्या नहीं करते, वे इस लोक में महान सुख नहीं पाते। मनुष्य सुख-दुःख बारी-बारी भोगता है; कोई अखण्ड सुख नहीं भोगता। बुद्धिमान जानता है कि जीवन में उतार-चढ़ाव हैं, अतः न अति हर्ष करता है, न शोक। सुख आए तो भोगो, दुःख आए तो सहो, जैसे किसान ऋतु की प्रतीक्षा करता है।”

“तप से बढ़कर कुछ नहीं; तप से महान फल मिलता है। हे भारत, ऐसा कुछ नहीं जो तप से न सधे। सत्य, निष्कपटता, क्रोध-त्याग, न्याय, आत्म-संयम, इन्द्रिय-निग्रह, द्वेष-हीनता, सरलता, पवित्रता और इन्द्रिय-दमन, ये पुण्यवान को शुद्ध करते हैं। इस लोक में किए कर्म का फल अगले लोक में मिलता है। अतः मनुष्य को तप और व्रत से अपने शरीर को संयमित करना चाहिए। निष्कपट और प्रसन्न मन से, यथाशक्ति, पात्र के पास जाकर, उसे प्रणाम करके दान देना चाहिए।”

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे महर्षि, दान और तप में परलोक के लिए अधिक फलदायी कौन है, और कठिन कौन?” व्यास बोले, “हे पुत्र, इस संसार में दान से कठिन कुछ नहीं। मनुष्य धन की अत्यन्त तृष्णा करता है, और धन कठिनाई से मिलता है। धन के लिए वीर अपने प्रिय प्राण तक त्यागकर समुद्र और वन की गहराई में घुसते हैं; कोई कृषि करता है, कोई गोपालन, कोई दासता। ऐसे कष्ट से कमाए धन को त्यागना अत्यन्त कठिन है। अतः मेरे मत में दान परम श्रेष्ठ है, हर अन्य पुण्य से ऊपर। शुद्ध भाव से, उचित समय और स्थान पर पुण्यात्माओं को दिया गया दान अक्षय फल देता है। पर अन्याय से कमाए धन का दान दाता को पुनर्जन्म के पाप से नहीं बचाता।” इसी सन्दर्भ में व्यास ने मुद्गल की पुरानी कथा सुनाई, जिसने केवल एक द्रोण अन्न दान करके अक्षय फल पाया।

समझने की कुंजी (संख्या): द्रोण, अन्न नापने का प्राचीन माप। एक द्रोण लगभग कुछ सेर अनाज के बराबर था (आधुनिक दृष्टि से कुछ ही किलोग्राम)। कथा का मर्म यही है कि दान की मात्रा नहीं, अपितु भाव की शुद्धता अक्षय फल देती है।

मुद्गल की कथा और दुर्वासा की परीक्षा

व्यास बोले, “कुरुक्षेत्र में मुद्गल नामक एक धर्मात्मा ऋषि रहते थे, सत्यवादी, द्वेष-हीन, जितेन्द्रिय। वे शिल और उञ्छ वृत्ति (खेतों में बचे और गिरे हुए दाने बीनकर जीवन-यापन) से रहते थे। कबूतर-सी वृत्ति होते हुए भी वे अतिथियों का सत्कार करते, इष्टिकृत यज्ञ और अन्य कर्म करते। पुत्र और पत्नी सहित वे पन्द्रह दिन भोजन करते और शेष पन्द्रह दिन कबूतर-वृत्ति से एक द्रोण अन्न संचित करते। देवताओं और अतिथियों के भोजन के बाद बचा अन्न ही वे खाते।”

“शुभ तिथियों पर स्वयं इन्द्र देवताओं सहित उनके यज्ञ का अन्न ग्रहण करते। मुद्गल प्रसन्न मन से अतिथियों को भी भोजन कराते। उनके शुद्ध भाव से वह एक द्रोण अन्न अतिथि के आते ही इतना बढ़ जाता कि सैकड़ों विद्वान ब्राह्मण उससे तृप्त हो जाते।”

“एक बार व्रत-निष्ठ मुद्गल की कीर्ति सुनकर दुर्वासा मुनि वहाँ आए, दिगम्बर (केवल आकाश ही जिनका वस्त्र), उन्मत्त-से वेश में, सिर मुँडाए, अपमानजनक वचन बोलते हुए। उन्होंने कहा, ‘हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, जान लीजिए कि मैं भोजन की कामना से आया हूँ।’ मुद्गल ने कहा, ‘आपका स्वागत है।’ भूख से व्याकुल उस उन्मत्त-से ऋषि को पाँव और मुख धोने को जल देकर मुद्गल ने उत्तम भोजन परोसा। दुर्वासा ने सब भोजन समाप्त कर दिया। मुद्गल ने फिर भोजन दिया। उसे भी खाकर वे शरीर में जूठन पोतकर जैसे आए, वैसे चले गए।”

“इसी प्रकार छह ऋतुओं में दुर्वासा छह बार आए और हर बार सब भोजन खा गए। पर मुद्गल बिना स्वयं भोजन किए फिर उञ्छ-वृत्ति से अन्न संचय में लग जाते। भूख उनकी समता न बिगाड़ सकी; न क्रोध, न कपट, न अपमान का बोध, न क्षोभ उनके हृदय में प्रवेश कर सका। पुत्र-पत्नी सहित वे सदा शुद्ध-हृदय रहे। तब प्रसन्न होकर दुर्वासा बोले, ‘आपके समान निष्कपट और दानशील पृथ्वी पर दूसरा नहीं। भूख धर्म-बोध को दूर भगाती है और धैर्य छीन लेती है; पर आपने सब कुछ शुद्ध भाव से सिद्ध किया। आत्म-संयम, धैर्य, न्याय, इन्द्रिय-निग्रह, दया और धर्म, सब आप में स्थित हैं। आप अपने ही देह से स्वर्ग जाएँगे।’”

एक उप-कथा: दुर्वासा की यह परीक्षा महाभारत में दो बार छाया डालती है, यहाँ मुद्गल की, और आगे (दुर्योधन की चाल से) पाण्डवों की। दोनों स्थानों पर दुर्वासा का क्रोध एक कसौटी है: जो शुद्ध-हृदय और धर्म-निष्ठ है, वह उस अग्नि से अक्षत निकलता है। मुद्गल की उञ्छ-वृत्ति यह सिखाती है कि अत्यल्प साधनों में भी परम शुद्ध दान सम्भव है।

स्वर्ग के दोष और मुद्गल का परम-पद चयन

दुर्वासा के यों कहते ही एक देवदूत हंस और सारस जुते रथ पर मुद्गल के सम्मुख आया, घण्टियों की झंकार से युक्त, दिव्य सुगन्ध से भरा, चित्रित, और इच्छानुसार सर्वत्र जाने में समर्थ। उसने कहा, “हे ऋषि, अपने कर्मों से अर्जित इस रथ पर चढ़िए। आपने तपस्या का फल पा लिया।” मुद्गल बोले, “हे देवदूत, मुझे वहाँ के निवासियों के गुण-स्वभाव बताइए। स्वर्ग में सुख क्या है, और उसके दोष क्या? सात पग साथ चलने से सज्जनों से मैत्री हो जाती है, उसी मैत्री के नाते मुझे सच बताइए, जिससे मैं अपना मार्ग निश्चित करूँ।”

देवदूत बोला, “हे महर्षि, आप सरल बुद्धि के हैं, जो वह दिव्य सुख पाकर भी अविवेकी-से विचार कर रहे हैं। स्वर्ग नामक वह लोक ऊपर है, ऊँचे मार्गों से युक्त, सदा दिव्य रथों से युक्त। नास्तिक, असत्यवादी, तप-हीन और महान यज्ञ न करनेवाले वहाँ नहीं जा सकते। केवल पुण्यात्मा, संयमी, जितेन्द्रिय, द्वेष-हीन, दानशील वीर ही वहाँ जाते हैं। वहाँ देव, साध्य, विश्वेदेव, महर्षि, यम, धर्म, गन्धर्व और अप्सराओं के सहस्रों दीप्त लोक हैं। वहाँ तैंतीस हज़ार योजन फैला स्वर्ण-मेरु है, और नन्दन आदि दिव्य उद्यान हैं। वहाँ न भूख है, न प्यास, न थकान, न भय, न कुछ घृणित।”

“वहाँ की सब सुगन्धें मनोहर, सब वायु सुखद, सब ध्वनियाँ कर्ण-प्रिय हैं। वहाँ न शोक है, न जरा, न श्रम, न पश्चात्ताप। यह लोक अपने ही कर्मों के फल से मिलता है। उससे ऊपर ब्रह्मा के दीप्त लोक हैं, और उनसे भी ऊपर ऋभु नामक प्राणी रहते हैं, जो देवताओं के भी देवता हैं। वे अपने ही प्रकाश से दीप्त, द्वेष-शोक-थकान-अज्ञान से रहित हैं, और कल्प के अन्त पर भी नहीं बदलते। उनके लिए न उन्माद है, न हर्ष, न दुःख। देवता भी उनकी परम अवस्था की कामना करते हैं।”

“अब स्वर्ग के दोष सुनिए। स्वर्ग में मनुष्य पहले किए कर्मों का फल ही भोगता है, नया कर्म नहीं कर सकता। और पुण्य पूरा भोग लेने पर उसका पतन हो जाता है। यह पतन ही उसका दोष है, सुख में डूबे हुए को नीचे गिरना, ऊँचे लोक भोगकर निम्न स्थान पर बैठना, अत्यन्त असह्य है। गिरनेवाले की चेतना मूढ़ हो जाती है, माला मुरझाने लगती है, और भय हृदय में घर कर लेता है। ये दोष ब्रह्मा के लोक तक फैले हैं। पतित जीव अपने पुण्य के कारण मनुष्यों में जन्म लेकर उच्च सौभाग्य पाते हैं। इस लोक को कर्म-लोक कहा गया है, अन्य लोकों को फल-लोक।”

यह सुनकर मुद्गल ने विचार किया और कहा, “हे देवदूत, मैं आपको प्रणाम करता हूँ; आप शान्ति से लौट जाइए। ऐसे प्रमुख दोषोंवाले स्वर्ग या सुख से मेरा कोई प्रयोजन नहीं। मैं उस अविनाशी लोक की खोज करूँगा जहाँ जाकर लोग शोक, पीड़ा या क्षोभ नहीं पाते। मुझे दोष-रहित लोक बताइए।” देवदूत बोला, “ब्रह्मा के लोक से ऊपर विष्णु का परम पद है, शुद्ध, शाश्वत, प्रकाशमय, परब्रह्म नाम से प्रसिद्ध। वहाँ इन्द्रिय-विषयों में आसक्त, अहंकारी, लोभी, अज्ञानी, क्रोधी और ईर्ष्यालु नहीं जा सकते। केवल राग-रहित, गर्व-रहित, द्वन्द्व-रहित, जितेन्द्रिय, ध्यान और योग में रत जन ही वहाँ जाते हैं।”

यह सुनकर मुनि ने देवदूत को विदा किया, और उञ्छ-वृत्ति में रत वह पूर्ण सन्तोष को प्राप्त हुआ। तब उसके लिए स्तुति-निन्दा समान हो गई; ढेला, पत्थर और स्वर्ण एक-से दीखने लगे। ब्रह्म-प्राप्ति के साधनों से वह सदा ध्यान में लीन रहा, और ज्ञान से उत्तम बुद्धि पाकर उस परम-शाश्वत मोक्ष-पद को प्राप्त हुआ। व्यास ने कहा, “अतः हे कुन्ती-पुत्र, आप भी शोक मत कीजिए। समृद्ध राज्य से आप वंचित हुए, पर तप से उसे फिर पाएँगे। दुःख के बाद सुख, सुख के बाद दुःख, पहिये की धुरी के चारों ओर परिधि-बिन्दु की भाँति बारी-बारी आते हैं। तेरहवें वर्ष के बीतने पर आप अपने पिता-पितामह का राज्य पुनः पाएँगे। अतः हृदय का ज्वर त्याग दीजिए।” यों कहकर व्यास तपस्या हेतु अपने आश्रम लौट गए।

सार: देवदूत मुद्गल को स्वर्ग और ब्रह्मलोक तक के सुख वर्णन करता है, पर उनका मूल दोष भी बताता है, पुण्य चुक जाने पर पतन। विवेकी मुद्गल नश्वर स्वर्ग के बदले विष्णु का परम पद (मोक्ष) चुनता है और उसे पाता है। इस कथा से व्यास युधिष्ठिर को धीरज देते हैं कि सुख-दुःख चक्र हैं और तेरहवें वर्ष राज्य लौटेगा।

दुर्योधन की दुर्वासा-चाल और द्रौपदी की कृष्ण-प्रार्थना

दुर्योधन साथियों समेत हाथ जोड़े झुका हुआ, सैकड़ों शिष्यों के संग पधारे दुर्वासा ऋषि के आगे।

जनमेजय ने पूछा कि वन में सुखी पाण्डवों के विरुद्ध दुर्योधन ने कर्ण, दुःशासन और शकुनि की कुमन्त्रणा से क्या किया। वैशम्पायन बोले, पाण्डवों को वन में नगर-सा सुखी जानकर दुर्योधन उन्हें हानि पहुँचाने को लालायित हुआ। तभी विख्यात तपस्वी दुर्वासा अपने दस सहस्र शिष्यों सहित कुरुओं के नगर आए। दुर्योधन और उसके भाइयों ने अत्यन्त विनय और नम्रता से उनका स्वागत किया। राजकुमार ने स्वयं सेवक-सा होकर ऋषि की सेवा की।

दुर्वासा कुछ दिन वहाँ रहे, और शाप के भय से दुर्योधन रात-दिन उनकी सेवा करता रहा। कभी ऋषि कहते, “मैं भूखा हूँ, शीघ्र भोजन दीजिए,” कभी स्नान को जाकर देर से लौटकर कहते, “आज भूख नहीं, कुछ न खाऊँगा,” और अदृश्य हो जाते। कभी अचानक आकर कहते, “शीघ्र भोजन कराइए।” कभी आधी रात जागकर भोजन बनवाते और फिर उसमें दोष निकालकर न खाते। इस प्रकार राजकुमार को परखते रहे, पर दुर्योधन को न क्रुद्ध, न खिन्न देखकर वे प्रसन्न हो गए और बोले, “मैं आपको वर दे सकता हूँ। जो आपके हृदय के निकट हो, माँग लीजिए, जो धर्म-विरुद्ध न हो।”

दुर्योधन ने कर्ण और दुःशासन से पहले ही तय कर रखा था कि क्या माँगना है। उसने हर्षित होकर माँगा, “महाराज युधिष्ठिर हमारे कुल के ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हैं, अभी वन में अपने भाइयों सहित रहते हैं। जैसे आप मेरे अतिथि रहे, वैसे ही एक बार उनके भी अतिथि बनिए। और उस समय जाइए, जब वह कोमल पांचाल-राजकुमारी (द्रौपदी) ब्राह्मणों, अपने पतियों और स्वयं को भोजन कराकर विश्राम कर चुकी हो।” दुर्वासा ने “ऐसा ही करूँगा” कहकर विदा ली। दुर्योधन ने स्वयं को कृतकृत्य माना और कर्ण का हाथ पकड़कर प्रसन्नता प्रकट की। कर्ण भी बोला, “सौभाग्य से आपके शत्रु ऐसे संकट-सागर में डूबे जिसे पार करना कठिन है। पाण्डव अब दुर्वासा के क्रोध की अग्नि में पड़ गए।” यों दुर्योधन आदि प्रसन्न होकर अपने-अपने घर लौटे।

एक दिन, यह जानकर कि पाण्डव सुख से बैठे हैं और कृष्णा भोजन के बाद विश्राम कर रही है, दुर्वासा दस सहस्र शिष्यों सहित उस वन में पहुँचे। धर्मात्मा युधिष्ठिर ने अपनी माताओं सहित आगे बढ़कर हाथ जोड़कर उत्तम आसन दिखाकर ऋषियों का सत्कार किया और कहा, “हे पूज्य, अपने नित्य स्नान-आचमन करके शीघ्र लौटिए।” यह न जानते हुए कि राजा इतने सबको भोजन कैसे कराएगा, मुनि शिष्यों सहित स्नान को नदी पर गए।

द्रौपदी अक्षय पात्र उठाए आकाश में प्रकट कृष्ण को पुकारती हुई, पीछे नदी में स्नान करते ऋषि।

इधर पतिपरायणा द्रौपदी भोजन की चिन्ता से व्याकुल हो उठी। बहुत विचार करने पर जब भोजन का कोई उपाय न दीखा, तो उसने मन ही मन कंस-नाशक कृष्ण की प्रार्थना की। द्रौपदी बोली, “हे कृष्ण, हे देवकी-पुत्र, हे अक्षय-शक्ति वासुदेव, हे विश्व-पति! आप शरणागतों के संकट हरते हैं। आप ही आत्मा, सृष्टा और संहारक हैं। आप अक्षय और आर्तों के रक्षक हैं। आप उच्च-से-उच्च हैं, और मानसिक चेतना के मूल हैं। हे परम और अनन्त, हे सर्व-कल्याण-दाता, असहायों के आश्रय बनिए। हे आदि-पुरुष, हे सर्व-नियन्ता, मैं आपकी शरण में हूँ। हे नील-कमल-दल-श्याम, लाल नेत्रोंवाले, पीताम्बरधारी, वक्ष पर कौस्तुभ-मणि धारण करनेवाले! जैसे आपने मुझे पहले दुःशासन से बचाया, वैसे अब इस संकट से उबारिए।”

द्रौपदी से पूजित, सदा आश्रितों पर कृपालु भगवान केशव, उसका संकट जानकर, रुक्मिणी की शय्या छोड़कर तुरन्त वहाँ पहुँचे। वासुदेव को देख द्रौपदी ने हर्ष से प्रणाम करके मुनियों के आगमन का सब वृत्तान्त बताया। सब सुनकर कृष्ण बोले, “मैं अत्यन्त भूखा हूँ, पहले मुझे भोजन दो, फिर अपना कार्य करना।” यह सुनकर द्रौपदी व्याकुल होकर बोली, “सूर्य का दिया वह पात्र मेरे भोजन तक भरा रहता है, पर मैं आज भोजन कर चुकी हूँ, अतः उसमें अब अन्न नहीं।” तब कृष्ण बोले, “यह परिहास का समय नहीं, द्रौपदी। मैं अत्यन्त भूखा हूँ, शीघ्र वह पात्र लाकर मुझे दिखाइए।”

कृष्ण अक्षय पात्र का बचा एक अन्न-कण मुख में रखते, नीचे नदी से ऋषिगण तृप्त होकर लौटते।

द्रौपदी के आग्रह से पात्र मँगाकर कृष्ण ने उसमें झाँका तो किनारे चावल और शाक का एक कण लगा दिखा। उसे ग्रहण करके वे बोले, “विश्व की आत्मा भगवान हरि, जो यज्ञों में आहुति ग्रहण करते हैं, इससे तृप्त हों।” फिर भीमसेन से कहा, “जाइए, शीघ्र उन सब मुनियों को भोजन पर बुला लाइए।” भीम नदी पर गया, जहाँ दुर्वासा आदि स्नान कर रहे थे। पर वे सब अनुभव कर रहे थे कि उनके उदर कण्ठ तक भर गए हैं। जल से निकलकर वे एक-दूसरे को विस्मय से देखने लगे और दुर्वासा से बोले, “हमने राजा से भोजन बनवाया, पर अब हमारे पेट भरे हैं। भोजन व्यर्थ बना। अब क्या करें?”

दुर्वासा बोले, “भोजन व्यर्थ करके हमने राजर्षि युधिष्ठिर का बड़ा अपराध किया। क्या पाण्डव हमें क्रुद्ध दृष्टि से भस्म न कर देंगे? मैं जानता हूँ कि वे महातपस्वी, धर्मनिष्ठ और वासुदेव-भक्त हैं। हरि-भक्तों से मुझे भय है। यदि वे क्रुद्ध हुए तो हमें रुई के ढेर-सा भस्म कर देंगे। अतः शिष्यो, उन्हें फिर देखे बिना शीघ्र भाग चलिए।” यों सब ब्राह्मण पाण्डवों से भयभीत होकर चारों दिशाओं में भाग गए।

भीम मुनियों को न पाकर लौटा और युधिष्ठिर को सब बताया। पाण्डव कुछ समय उनकी प्रतीक्षा करते रहे। युधिष्ठिर बोले, “आधी रात आकर ऋषि हमें छलेंगे। इस संकट से कैसे उबरें?” तभी कृष्ण अचानक प्रकट होकर बोले, “हे पृथा-पुत्रो, उस क्रोधी ऋषि से आपका संकट जानकर द्रौपदी की प्रार्थना पर मैं शीघ्र आया। अब दुर्वासा से तनिक भय न कीजिए; आपके तपोबल से डरकर वह पहले ही भाग चुका है। धर्मात्मा कभी कष्ट नहीं पाते। अब मैं विदा चाहता हूँ; आप सदा कल्याण-युक्त रहें।” पाण्डव और द्रौपदी निश्चिन्त होकर बोले, “जैसे डूबते व्यक्ति नौका से तट पाते हैं, वैसे ही हम आपकी कृपा से इस संकट से उबरे। हे गोविन्द, अब शान्ति से पधारिए।” कृष्ण अपनी राजधानी लौट गए, और पाण्डव द्रौपदी सहित वनों में सुखपूर्वक रहने लगे।

एक उप-कथा (सूर्य-पात्र): वनवास के आरम्भ में सूर्य ने युधिष्ठिर को एक अक्षय-पात्र दिया था, जो द्रौपदी के भोजन तक नित्य अन्न देता रहता था। दुर्योधन की चाल इसी पर आधारित थी, द्रौपदी के भोजन के बाद पात्र रिक्त हो जाता, और तभी दुर्वासा को सहस्रों शिष्यों सहित भेजना था, ताकि असत्कार से शाप मिले। पर कृष्ण ने पात्र में लगे एक कण को ग्रहण करके समस्त ब्रह्माण्ड की क्षुधा तृप्त कर दी, और चाल उलट गई।

सार: दुर्योधन दुर्वासा को सहस्रों शिष्यों सहित पाण्डवों के पास भेजने की चाल चलता है, उस समय जब अक्षय-पात्र रिक्त हो, ताकि असत्कार से शाप मिले। द्रौपदी की पुकार पर कृष्ण आते हैं और पात्र में बचे एक कण को ग्रहण करके सब मुनियों की क्षुधा तृप्त कर देते हैं। दुर्वासा भयभीत होकर भाग जाता है, और कौरवों की कुमन्त्रणा विफल हो जाती है।

जयद्रथ का काम्यक-वन में आना और द्रौपदी पर कुदृष्टि

भरतवंश के वे महावीर काम्यक-वन में अमरों-से विचरते, आखेट करते और ऋतु-पुष्पों से सजे वन-प्रदेशों का आनन्द लेते रहे। एक दिन वे वीर ब्राह्मणों के भोजन हेतु आखेट को सब दिशाओं में गए, और महातपस्वी त्रिणबिन्दु तथा गुरु धौम्य की अनुमति से द्रौपदी को आश्रम में अकेली छोड़ गए। उसी समय सिन्धु-राज, वृद्धक्षत्र का पुत्र जयद्रथ, विवाह की इच्छा से शाल्व-देश जाता हुआ, अनेक राजकुमारों सहित अपने श्रेष्ठ राजसी वेश में काम्यक-वन में रुका।

उस एकान्त स्थान में उसने आश्रम-द्वार पर खड़ी सुन्दरी द्रौपदी को देखा, जो श्याम-मेघों को प्रकाशित करती बिजली-सी वन को दीप्त कर रही थी। उसके निर्दोष रूप को देखकर सब विस्मित होकर हाथ जोड़े खड़े रह गए, “यह अप्सरा है, या देव-कन्या, या कोई दिव्य माया?” काम से अभिभूत जयद्रथ ने कोटिक नामक राजकुमार से कहा, “यह निर्दोष-रूपा कौन है? क्या यह मानवी है? यदि यह अत्यन्त सुन्दरी मुझे मिल जाए तो मुझे विवाह की आवश्यकता नहीं। इसे लेकर मैं अपने घर लौटूँगा। जाइए, कोटिक, पूछिए कि इसका पति कौन है।”

कुण्डल पहने कोटिक रथ से उतरकर, जैसे सियार बाघिन के पास जाए, उसके निकट जाकर बोला, “हे उत्तमे, आप कौन हैं, जो इस आश्रम में कदम्ब-वृक्ष की शाखा थामे, रात्रि में वायु से प्रज्वलित अग्नि-शिखा-सी अकेली खड़ी हैं? इतनी सुन्दर होकर भी आपको इन वनों में भय नहीं? मुझे लगता है आप देवी हैं, या यक्षी, या दानवी, या श्रेष्ठ अप्सरा, या किसी दैत्य की पत्नी, या नागराज की कन्या, या वरुण-यम-सोम-कुबेर में से किसी की पत्नी, जो मानव-रूप धरे यहाँ विचर रही हों।”

“आप हमसे नहीं पूछतीं कि हम कौन हैं। हे उत्तमे, हम आदर से पूछते हैं, अपने पति, बन्धु और कुल के नाम बताइए। रहा हम, मैं राजा सुरथ का पुत्र कोटिक हूँ। स्वर्ण-रथ पर बैठा कमल-नयन क्षेमंकर त्रिगर्त-राज है। उसके पीछे पुलिन्द-राज का पुत्र है। और वहाँ इक्ष्वाकु-वंशी सुबल का पुत्र खड़ा है। और यदि आपने जयद्रथ का नाम सुना हो, तो सौवीर-राज वही है, जो छह सहस्र रथों, घोड़ों, हाथियों और पैदल के साथ, अंगारक, कुंजर, गुप्तक, शत्रुंजय, सृंजय, सुप्रबिद्ध, प्रभंकर, भ्रमर, रवि, सूर, प्रताप और कुहन, इन बारह सौवीर-राजकुमारों को ध्वजवाहक बनाकर चल रहा है।”

समझने की कुंजी (वंश/स्थान): जयद्रथ, सिन्धु और सौवीर देशों (आधुनिक सिन्ध और निकटवर्ती क्षेत्र) का राजा, वृद्धक्षत्र का पुत्र। यही जयद्रथ कौरवों की एकमात्र बहन दुःशला का पति है, अतः पाण्डवों और कौरवों दोनों का बहनोई। यही पारिवारिक सम्बन्ध आगे उसके प्राण बचाएगा।

जयद्रथ के यों पूछने पर द्रौपदी ने नेत्र मन्द किए, कदम्ब-शाखा छोड़ी, अपना रेशमी वस्त्र सँभाला और कहा, “हे राजकुमार, मुझ-जैसी के लिए आपसे यों बात करना उचित नहीं, पर यहाँ अन्य कोई स्त्री-पुरुष नहीं और मैं अकेली हूँ, इसलिए कहती हूँ। हे शैव्य, मैंने जाना कि आप सुरथ-पुत्र कोटिक हैं। मैं द्रुपद-राज की कन्या हूँ, लोग मुझे कृष्णा कहते हैं। मैंने पाँच पुरुषों को पति रूप में स्वीकार किया है, जिन्हें आपने खाण्डवप्रस्थ में रहते सुना होगा। वे, युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन और माद्री के दो पुत्र, मुझे यहाँ छोड़कर चारों दिशाएँ बाँटकर आखेट को गए हैं। राजा पूर्व गए, भीमसेन दक्षिण, अर्जुन पश्चिम, और जुड़वाँ उत्तर। अतः अब आप उतरकर अपनी सवारियाँ छोड़ दीजिए, जिससे उनसे सत्कार पाकर ही जाएँ। धर्म-पुत्र अतिथि-प्रिय हैं, आपको देखकर अवश्य प्रसन्न होंगे।” यों कहकर, अपने पतियों के आतिथ्य-स्वभाव को स्मरण करती चन्द्र-मुखी द्रौपदी अपनी कुटिया में चली गई।

जयद्रथ का दुष्ट प्रस्ताव और द्रौपदी की फटकार

कोटिक ने जयद्रथ को द्रौपदी से हुई सब बात बताई। सुनकर जयद्रथ बोला, “केवल उसकी वाणी सुनकर ही मेरा हृदय उस पर मोहित हो गया। फिर आप असफल क्यों लौटे? हे महाबाहु, सच कहता हूँ, इसे एक बार देख लेने पर अन्य सब स्त्रियाँ मुझे वानरी-सी दीखती हैं। बताइए, क्या वह उत्तमा मानव-कुल की है?” कोटिक ने कहा, “यह प्रसिद्ध कृष्णा है, द्रुपद-कन्या, पाँच पाण्डवों की पत्नी, पृथा-पुत्रों की सम्मानित, प्रिय और पतिव्रता पत्नी। इसे लेकर आप सौवीर की ओर बढ़िए।”

यह सुनकर दुष्टमति जयद्रथ छह पुरुषों सहित उस एकान्त आश्रम में ऐसे घुसा जैसे भेड़िया सिंह की माँद में। उसने कृष्णा से कहा, “हे उत्तमे, आपका कल्याण हो! आपके पति और जिनका आप कल्याण चाहती हैं, वे सकुशल हैं?” द्रौपदी ने उत्तर दिया, “कुरुवंशी कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिर, उनके भाई, मैं और जिन्हें आपने पूछा, सब कुशल हैं। क्या आपका राज्य, कोष और सेना ठीक है? हे राजकुमार, यह पाँव धोने का जल और आसन स्वीकार कीजिए। आपके दल के भोजन हेतु पचास पशु अर्पित करती हूँ; और स्वयं युधिष्ठिर आपको मृग, हरिण, शूकर, भैंसे आदि अनेक पशु देंगे।”

यह सुनकर जयद्रथ बोला, “मेरा सब कुशल है। भोजन का प्रबन्ध करके आपने मानो कर ही दिया। अब आइए, मेरे रथ पर चढ़कर पूर्ण सुखी हो जाइए। वन में रहते, शक्तिहीन, राज्यहीन, दुर्भाग्य के परम-तल तक पहुँचे उन दीन पृथा-पुत्रों का आदर आपको शोभा नहीं देता। समझदार स्त्री दरिद्र पति से नहीं जुड़ती। पाण्डव अपने उच्च पद से सदा के लिए गिर चुके हैं, उनका राज्य सदा को छिन गया। अतः उनका दुःख बाँटने की आपको आवश्यकता नहीं। हे सुन्दरी, पाण्डवों को त्यागकर मेरी पत्नी बनकर सिन्धु और सौवीर के राज्य भोगिए।”

सिन्धु-राज के ये भयंकर वचन सुनकर कृष्णा भौंहें चढ़ाए, परम घृणा से उसके वचनों की उपेक्षा करती हुई पीछे हटी और बोली, “फिर ऐसा न कहिए! क्या आपको लज्जा नहीं? सावधान रहिए!” और अपने पतियों के लौटने की चिन्तातुर प्रतीक्षा करती वह लम्बी बातों से उसे उलझाती रही।

क्रोध से अरुण-वर्ण द्रौपदी ने, नेत्र दहकाए, भौंहें तानकर, सौवीर-राज को फटकारा, “हे मूर्ख, क्या आपको लज्जा नहीं? हे सौवीर, इन्द्र-समान, धर्मनिष्ठ, यक्ष-राक्षसों की सेना से भी न डिगनेवाले उन प्रसिद्ध वीरों के विषय में ऐसे अपमानजनक वचन कहते आपको संकोच नहीं? सज्जन कभी विद्वानों और तपस्वियों की निन्दा नहीं करते, चाहे वे वन में रहें या घर में। केवल आप-जैसे नीच ही ऐसा करते हैं। आप अपने ही पाँवों के नीचे गड्ढा खोद रहे हैं, और इस सभा में कोई क्षत्रिय नहीं जो हाथ पकड़कर आपको गिरने से बचाए।”

“राजा युधिष्ठिर को जीतने की आशा करना, हिमालय-घाटियों में विचरते, मद बहाते, पर्वत-शिखर-से विशाल झुंड-नायक हाथी से उसका नायक छीनने जैसा है। आप बालक-सी मूर्खता से सोए सिंह को जगाकर उसके मुख से बाल नोचना चाहते हैं। आपको तब भागना पड़ेगा जब क्रुद्ध भीमसेन को देखेंगे। दो विषधर काले नागों की पूँछ पर पाँव रखने-जैसा है दोनों छोटे पाण्डवों से युद्ध। बाँस, सरकंडा और केला फल देकर नष्ट हो जाते हैं, बढ़ते नहीं; और जैसे केकड़ी अपने ही नाश के लिए गर्भ धारण करती है, वैसे ही आप इन महावीरों से रक्षित मुझ पर हाथ डालकर अपना नाश बुला रहे हैं।”

जयद्रथ बोला, “हे कृष्णा, मैं यह सब जानता हूँ, और उन राजकुमारों का पराक्रम भी। पर आप इन धमकियों से हमें भयभीत नहीं कर सकतीं। हम सत्रह उच्च कुलों में जन्मे और छह राजकीय गुणों से युक्त हैं, अतः पाण्डवों को हीन समझते हैं। अतः हे द्रुपद-कन्या, शीघ्र इस हाथी या रथ पर चढ़िए, क्योंकि आप केवल वचनों से हमें न रोक सकेंगी; या नम्र होकर सौवीर-राज की दया माँगिए।”

समझने की कुंजी (अवधारणा): “छह राजकीय गुण” (षाड्गुण्य), प्राचीन राजनीति में राजा की छह नीतियाँ: सन्धि (मेल), विग्रह (युद्ध), यान (चढ़ाई), आसन (प्रतीक्षा), द्वैधीभाव (दोहरी नीति) और संश्रय (आश्रय लेना)। जयद्रथ का यह दर्प उसके कुल-गर्व को दिखाता है, जो शीघ्र ही टूटेगा।

द्रौपदी ने कहा, “इतनी शक्तिमती होकर भी सौवीर-राज मुझे इतनी असहाय क्यों समझते हैं? सुप्रसिद्ध होकर मैं भय से इस राजकुमार के सम्मुख दीन न बनूँगी। जिसकी रक्षा में कृष्ण और अर्जुन एक ही रथ पर बैठकर पीछे आएँ, उसका हरण तो स्वयं इन्द्र भी न कर सके, तो आप दुर्बल मानव की क्या बात! जब किरीटी (अर्जुन) मेरे लिए अपने रथ पर आपकी सेना में घुसेंगे, तो ग्रीष्म में सूखे घास के ढेर को जलाती अग्नि-सा सबको भस्म कर देंगे। जब अर्जुन गाण्डीव से टिड्डी-दल-सी बाण-वर्षा करेंगे, तब आप अपनी मूर्खता पर पछताएँगे।”

“जब भीम गदा लिए आप पर बढ़ेंगे, और माद्री के दोनों पुत्र अपने क्रोध-विष को उगलते सब दिशाओं में घूमेंगे, तब आपको ऐसा पश्चात्ताप होगा जो सदा रहेगा। जैसे मैं मन से भी अपने पतियों के प्रति कभी मिथ्या नहीं रही, उसी पुण्य से मुझे आपकी पराजय और पृथा-पुत्रों द्वारा आपके घसीटे जाने का सुख देखना होगा। हे क्रूर, आप मुझे बल से पकड़कर भयभीत नहीं कर सकते, क्योंकि वे कुरु-वीर मुझे देखते ही काम्यक-वन वापस ले आएँगे।”

तब द्रौपदी ने उन्हें हाथ डालने को उद्यत देख फटकारा, “अपने स्पर्श से मुझे अपवित्र मत कीजिए!” और बड़े भय से अपने गुरु धौम्य को पुकारा। जयद्रथ ने उसका उत्तरीय (ऊपरी वस्त्र) पकड़ा, पर उसने उसे ज़ोर से धकेला, और वह जड़ से उखड़े वृक्ष-सा भूमि पर गिर पड़ा। पर उसने फिर बल से पकड़ा, और द्रौपदी हाँफने लगी। उस दुष्ट से घसीटी जाती कृष्णा धौम्य के चरण पूजकर अन्ततः रथ पर चढ़ा दी गई। तब धौम्य ने जयद्रथ से कहा, “हे जयद्रथ, क्षत्रियों की प्राचीन रीति का पालन कीजिए। उन महावीरों को जीते बिना आप इसका हरण नहीं कर सकते। बिना सन्देह आप इस नीच कर्म का दुःखद फल पाएँगे, जब युधिष्ठिर के नेतृत्व में पाण्डवों से भिड़ेंगे।” यों कहकर धौम्य जयद्रथ की पैदल-सेना के बीच घुसकर हरण की जाती राजकुमारी के पीछे चल पड़े।

सार: काम्यक-वन में अकेली द्रौपदी पर जयद्रथ कुदृष्टि डालता है और उसे अपनी रानी बनने का दुष्ट प्रस्ताव देता है। द्रौपदी सम्मानजनक रहते हुए भी निर्भीक होकर पाण्डवों के पराक्रम की चेतावनी देती है, पर जयद्रथ कुल-गर्व में उसे बलपूर्वक रथ पर चढ़ा लेता है। गुरु धौम्य चेतावनी देते हुए सेना के पीछे चल पड़ते हैं।

पाण्डवों का लौटना और हरण का समाचार

इधर वे श्रेष्ठ धनुर्धर पृथक्-पृथक् विचरते, मृग-भैंसे मारते अन्ततः एक साथ मिले। पशु-पक्षियों की चीत्कार और वन के विकट कोलाहल को देख युधिष्ठिर ने भाइयों से कहा, “सूर्य की ओर भागते ये पक्षी और पशु कर्कश स्वर में अत्यन्त उद्विग्न दीखते हैं। इससे लगता है कि किसी शत्रु ने इस महावन में अतिक्रमण किया है। तत्काल आखेट छोड़िए। मेरा हृदय जलता-सा है; मेरी आत्मा बुद्धि को दबाकर मानो बाहर निकलने को है। गरुड़ द्वारा सर्प से रहित सरोवर-सा, प्यासों द्वारा रिक्त घड़े-सा, राजा और लक्ष्मी से रहित राज्य-सा यह काम्यक-वन मुझे लग रहा है।”

वे शीघ्र अपने आश्रम की ओर चले। मार्ग में बाईं ओर भयानक चीखता एक सियार दीखा। युधिष्ठिर बोले, “बाईं ओर बोलता यह सियार स्पष्ट संकेत दे रहा है कि पापी कुरुओं ने हमारी अवहेलना करके हम पर बल-अत्याचार आरम्भ किया है।” आश्रम में पहुँचकर उन्होंने द्रौपदी की दासी धात्रेयिका को भूमि पर रोते-सिसकते पाया। इन्द्रसेन रथ से उतरकर व्याकुल होकर बोला, “आप भूमि पर लोटकर क्यों रोती हैं? आपका मुख पीला और शोकाकुल क्यों है? कहीं किसी क्रूर ने अप्रतिम सुन्दरी, इन कुरु-वीरों की प्राण-सम द्रौपदी को कोई हानि तो नहीं पहुँचाई?”

धात्रेयिका अपना मुख पोंछकर बोली, “पाँच इन्द्र-समान पाण्डवों की अवहेलना करके जयद्रथ कृष्णा को बल से हर ले गया। उसका मार्ग अभी मिटा नहीं, तोड़ी गई वृक्ष-शाखाएँ अभी मुरझाई नहीं। अतः रथ मोड़कर शीघ्र पीछा कीजिए, राजकुमारी अभी दूर न गई होगी। हे इन्द्र-पराक्रमी वीरो, अपने श्रेष्ठ धनुष और तरकश लेकर शीघ्र चलिए, कहीं भय या बल से उसकी सुध और मुख-कान्ति लुट न जाए। ध्यान रहे, जैसे राख के ढेर पर हवन-आहुति, कब्र पर फूलमाला, या कुत्ते द्वारा यज्ञ का सोम चाट लिया जाना, वैसा अनर्थ न हो। चलिए, और समय हाथ से न जाने दीजिए।”

युधिष्ठिर बोले, “शान्त हों, हे भद्रे, और अपनी वाणी रोकिए। हमारे सम्मुख ऐसे मत बोलिए। जो राजा या राजकुमार शक्ति के मद में अन्धे होते हैं, वे अवश्य पतन को प्राप्त होते हैं।” यों कहकर वे बताए मार्ग पर चले, साँपों की फुफकार-सी गहरी आहें भरते और अपने विशाल धनुषों की प्रत्यंचा टंकारते हुए। तभी उन्होंने जयद्रथ की सेना के घोड़ों के खुरों से उठी धूल देखी, और सेना के बीच भीम को शीघ्रता का संकेत करते धौम्य को देखा। पाण्डवों ने धौम्य को धीरज बँधाकर कहा, “प्रसन्न होकर लौट जाइए।” और बाज़ अपने शिकार पर झपटे-से उस सेना पर क्रोध से टूट पड़े। पर जब उन्होंने जयद्रथ के रथ पर बैठी अपनी प्रिया को देखा, तो उनका क्रोध सीमा-रहित हो गया। उन्होंने जयद्रथ को रुकने को ललकारा, जिससे शत्रु दिशा-भ्रम में पड़ गए।

द्रौपदी द्वारा पाण्डवों का परिचय और युद्ध का आरम्भ

भीम और अर्जुन को देख शत्रु-क्षत्रियों ने वन में उच्च नाद किया। पर कुरु-वीरों के ध्वज देख दुष्ट जयद्रथ का साहस टूट गया। रथ पर बैठी याज्ञसेनी से उसने कहा, “हे कृष्णा, जो पाँच महावीर आ रहे हैं, वे, मेरे विचार में, आपके पति हैं। आप पाण्डवों को भली-भाँति जानती हैं, अतः बताइए कि कौन किस रथ पर है।” द्रौपदी ने उत्तर दिया, “अपना जीवन छोटा करनेवाला यह हिंसक कर्म करके अब उन महावीरों के नाम जानकर आपको क्या लाभ? अब जब मेरे वीर पति आ गए हैं, आप में से एक भी युद्ध में जीवित न बचेगा। फिर भी, चूँकि आप मृत्यु के मुख में हैं और आपने पूछा है, मैं रीति के अनुसार बता देती हूँ।”

“अपने छोटे भाइयों सहित युधिष्ठिर को देखकर मुझे आपसे तनिक भी भय नहीं। जिसके ध्वज-शिखर पर नन्द और उपनन्द नामक दो मधुर नगाड़े सदा बजते हैं, हे सौवीर-राज, वही अपने कर्मों के धर्म का सच्चा ज्ञाता है। शुद्ध स्वर्ण-सी कान्ति, ऊँची नासिका और बड़े नेत्रोंवाला, छरहरा मेरा वह पति लोक में युधिष्ठिर, धर्म-पुत्र और कुरुश्रेष्ठ, नाम से प्रसिद्ध है। वह आत्मसमर्पण करनेवाले शत्रु को भी जीवन-दान देता है। अतः हे मूर्ख, शस्त्र फेंककर, हाथ जोड़कर, अपने भले के लिए उसकी शरण में जाइए।”

“और जिसे आप लम्बी भुजाओंवाला, पूर्ण-वृद्ध साल-वृक्ष-सा ऊँचा, रथ पर बैठा, ओठ चबाता, भौंहें चढ़ाए देखते हैं, वह मेरा पति वृकोदर (भीम) है। उत्तम नस्ल के बलवान, सुशिक्षित घोड़े उसका रथ खींचते हैं। उसके कर्म अमानवीय हैं, अतः वह पृथ्वी पर भीम नाम से प्रसिद्ध है। जो उसका अपराध करते हैं, वे जीवित नहीं रहते; वह शत्रु को कभी नहीं भूलता, किसी न किसी बहाने प्रतिशोध ले लेता है, और लेकर भी शान्त नहीं होता।”

“और वह श्रेष्ठ धनुर्धर, बुद्धिमान और यशस्वी, इन्द्रिय-नियन्ता, वृद्धों का सम्मान करनेवाला, युधिष्ठिर का भाई और शिष्य, मेरा पति धनंजय (अर्जुन) है। वह काम, भय या क्रोध से कभी धर्म नहीं त्यागता, न कोई क्रूर कर्म करता है। अग्नि-तेज से युक्त, हर शत्रु का सामना करनेवाला वह कुन्ती-पुत्र है। और वह दूसरा युवक, धर्म-अर्थ के हर प्रश्न में निपुण, भयभीतों का भय हरनेवाला, समस्त संसार में परम सुन्दर माना जानेवाला, सब पाण्डवों का प्रिय, मेरा पति नकुल है। और वह वीर, अस्त्र-निपुण, बुद्धिमान, धर्म-पुत्र का प्रिय करनेवाला, पाण्डवों में कनिष्ठ, मेरा पति सहदेव है। बुद्धि और वाक्-चातुर्य में उसके समान कोई नहीं; वह सदा क्षत्रिय-धर्म का स्मरण रखता है, और धर्म-विरुद्ध कुछ कहने से पहले अग्नि में कूद जाना या प्राण देना श्रेयस्कर समझता है।”

“जब पाण्डव युद्ध में आपके योद्धा मार डालेंगे, तब आप अपनी सेना को व्हेल की पीठ पर रत्नों सहित डूबती नौका-सी दुर्दशा में देखेंगे। मूर्खतावश जिनकी आपने अवहेलना की, उनका पराक्रम मैंने आपको बता दिया। यदि आप इनसे बचकर निकल गए, तो समझिए कि आपको नया जीवन मिला।”

तब पाँचों पृथा-पुत्र, इन्द्र-समान, क्रोध से भरकर, दया की भीख माँगती भयभीत पैदल-सेना को छोड़, रथारोहियों पर टूट पड़े और बाण-वर्षा से आकाश को अन्धकार-सा कर दिया।

सौवीर-सेना का संहार और जयद्रथ का पलायन

इधर सिन्धु-राज “रुकिए, मारिए, बढ़िए, शीघ्र” की आज्ञाएँ दे रहा था। भीम, अर्जुन, जुड़वाँ और युधिष्ठिर को देख सेना ने उच्च नाद किया, पर बाघ-से उन वीरों को देख शिवि, सौवीर और सिन्धु-सैनिकों का साहस टूट गया। भीमसेन सोने से मढ़ी सैक्य-लोहे की गदा लिए मृत्यु को प्राप्त सिन्धु-राज की ओर झपटा। पर कोटिकाख्य ने रथों के घेरे से बीच में आकर दोनों को अलग कर दिया। अनेक भालों, गदाओं और बाणों से बिंधकर भी भीम न डिगा, और उसने गदा से जयद्रथ के रथ के सम्मुख एक हाथी, उसके महावत और चौदह पैदल-सैनिकों को मार डाला।

अर्जुन ने, सौवीर-राज को पकड़ने की इच्छा से, सिन्धु-सेना के अग्रभाग में लड़ते पाँच सौ वीर पर्वतवासियों को मारा। युधिष्ठिर ने पलक झपकते सौवीरों के सौ श्रेष्ठ योद्धा मार डाले। नकुल तलवार लिए रथ से कूदकर, किसान-सा बीज बोता हुआ, पीछे लड़ते सैनिकों के सिर बिखेरने लगा। सहदेव रथ से लौह-बाणों से हाथियों पर लड़ते अनेक वीरों को पेड़ की डालियों से गिरते पक्षियों-सा गिराने लगा।

तब त्रिगर्त-राज (सुरथ) रथ से उतरकर गदा से युधिष्ठिर के चार घोड़े मार डाले। पर युधिष्ठिर ने अर्धचन्द्र-बाण से उसका वक्ष बींध दिया, और वह रक्त वमन करता उखड़े वृक्ष-सा गिर पड़ा। अश्वहीन युधिष्ठिर इन्द्रसेन सहित सहदेव के रथ पर चढ़ गए। तब क्षेमंकर और महामुक्ष नामक दो वीर नकुल पर दोनों ओर से बाण-वर्षा करने लगे, पर माद्री-पुत्र ने दो लम्बे बाणों से दोनों को मार डाला। त्रिगर्त-राज सुरथ, हाथी-युद्ध में निपुण, नकुल के रथ के सामने आकर उसे हाथी से खिंचवाने लगा, पर नकुल कूदकर, ढाल-तलवार लिए, पर्वत-सा अविचल खड़ा हो गया। सुरथ ने सूँड़ उठाए विकराल हाथी उस पर बढ़ाया, पर पास आते ही नकुल ने तलवार से उसकी सूँड़ और दाँत काट डाले। वह कवचधारी हाथी भयानक चिग्घाड़ता अपने सवारों को कुचलता गिर पड़ा। यह पराक्रम करके नकुल भीम के रथ पर चढ़कर तनिक विश्राम करने लगा।

भीम ने कोटिकाख्य को आते देख घोड़े-नाल-सी आकृतिवाले बाण से उसके सारथि का सिर काट दिया। सारथि के बिना घोड़े दिशाहीन दौड़ने लगे, और उस सारथि-हीन राजकुमार को पीठ फेरते देख भीम ने पास जाकर एक दाढ़ीदार बाण (नाराच) से उसे मार डाला। अर्जुन ने अपने तीक्ष्ण अर्धचन्द्र-बाणों से बारह सौवीर-वीरों के सिर और धनुष काट डाले, और इक्ष्वाकु, शिवि, त्रिगर्त तथा सिन्धु-सेना के नायकों को मार गिराया। अर्जुन के हाथों अनेक हाथी अपने झंडों सहित और रथ अपने ध्वजों सहित गिरते दीखे। सिरहीन धड़ और धड़हीन सिर समस्त रणभूमि को ढाँपने लगे, और कुत्ते, बगुले, कौवे, बाज़, सियार और गिद्ध मारे गए योद्धाओं के मांस-रक्त पर टूट पड़े।

जब जयद्रथ ने अपने योद्धा मारे जाते देखे, तो भयभीत होकर कृष्णा को वहीं छोड़, उसी वन-मार्ग से जिससे आया था, प्राण बचाने भाग निकला। युधिष्ठिर ने धौम्य के साथ आगे चलती द्रौपदी को सहदेव द्वारा रथ पर चढ़वा लिया। जयद्रथ के भाग जाने पर भीम भागती सेना को नाम ले-लेकर लौह-बाणों से काटने लगा, पर अर्जुन ने उसे रोककर कहा, “रणभूमि में जयद्रथ नहीं दीख रहा, जिसके कारण ही हमने यह कटु विपत्ति झेली। पहले उसे खोजिए, आपका प्रयत्न सफल हो! इन सैनिकों को मारकर क्या लाभ? इस व्यर्थ कार्य पर क्यों तुले हैं?”

भीमसेन ने युधिष्ठिर की ओर मुड़कर कहा, “शत्रु के बहुत योद्धा मारे गए हैं और शेष चारों ओर भाग रहे हैं। हे राजन, अब आप द्रौपदी, जुड़वाँ और धौम्य को लेकर आश्रम लौटिए और राजकुमारी को सान्त्वना दीजिए। उस मूर्ख सिन्धु-राज को मैं जीवित न छोड़ूँगा, चाहे वह पाताल में शरण ले या स्वयं इन्द्र उसकी पीठ पर हो।” युधिष्ठिर बोले, “हे महाबाहु, अपनी बहन दुःशला और पूज्य गान्धारी का स्मरण करके, यह सिन्धु-राज चाहे कितना ही दुष्ट हो, इसका वध मत करना।”

समझने की कुंजी (वंश): दुःशला, धृतराष्ट्र और गान्धारी की एकमात्र पुत्री, सौ कौरवों की बहन, और जयद्रथ की पत्नी। युधिष्ठिर इसी सम्बन्ध के कारण भीम को जयद्रथ का वध न करने का आदेश देते हैं, गान्धारी विधवा-पुत्री का शोक न झेले। यहीं महाभारत की वह नैतिक उलझन दीखती है, जहाँ अपराधी को कुल-सम्बन्ध बचा लेता है।

सार: पाण्डव लौटते समय अपशकुनों से अनर्थ भाँप लेते हैं; दासी से द्रौपदी के हरण का समाचार मिलता है। वे जयद्रथ की सेना का पीछा करके उसे चीर डालते हैं, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव अद्भुत पराक्रम दिखाते हैं। जयद्रथ द्रौपदी को छोड़कर भाग जाता है। भीम उसका वध चाहता है, पर युधिष्ठिर बहन दुःशला और गान्धारी का स्मरण कराकर रोकते हैं, यही पारिवारिक करुणा उसे आगे जीवन देगी।

मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), वन पर्व; गीता प्रेस गोरखपुर परम्परा।