मार्कण्डेय का प्रलय-दर्शन
मार्कण्डेय एक ऋषि थे। बहुत powerful। बहुत पुराने।
उनका एक special qualification। वो ”चिरंजीवी” थे। बहुत-बहुत लंबे समय तक जीने वाले।
उन्होंने एक बार विष्णु से प्रार्थना की।
”हे प्रभु, मुझे आप की माया दिखाइए। वो माया जिससे ब्रह्मांड बनता और मिटता है।”
विष्णु ने मुस्कुराकर कहा, ”ठीक है। पर ध्यान रखना। यह दर्शन डरावना होगा।”
मार्कण्डेय एक नदी के किनारे ध्यान में बैठे थे।
एक रात।
अचानक उन्होंने आँखें खोलीं। और चारों ओर देखा।
नदी नहीं थी।
जंगल नहीं था।
पहाड़ नहीं थे।
बस पानी। हर तरफ़। एक अनन्त समुद्र। और कुछ नहीं।
आकाश नहीं था। सूर्य नहीं। चन्द्र नहीं।
बस पानी।
मार्कण्डेय तैरने लगे।
उन्हें डर लगा। पहली बार उनकी ज़िंदगी में।
”हे प्रभु, यह क्या?”
जवाब नहीं।
वो तैरते रहे। पानी में।
घंटे बीते। शायद दिन। शायद साल। समय की कोई पकड़ नहीं थी।
उनकी ताक़त खत्म हो रही थी।
अचानक उन्होंने कुछ देखा।
एक बरगद का पेड़। तैरता हुआ। पानी के बीच में।
पेड़ के एक छोटी सी पत्ती पर, एक छोटा सा बच्चा था।
नीला रंग। मासूम चेहरा। पाँव में सुनहरी पायल।
वो बच्चा सो रहा था। पर हलकी मुस्कान।
मार्कण्डेय तैरते-तैरते उस तक पहुँचे।
शिशुं प्रलयेऽपि न्यग्भूतमेकम् ॥
(श्रीमद्भागवत 12.9)
वहीं प्रलय के बीच, एक उदार-नज़र वाला बच्चा, बरगद की पत्ती पर। एक अकेला, सब को अपने अंदर।
तभी कुछ और हुआ।
वो बच्चा साँस ले रहा था। और हर साँस के साथ कुछ अद्भुत।
जब बच्चा साँस अंदर लेता, मार्कण्डेय को खींच लिया जाता। उसके मुँह के अंदर।
और अंदर?
एक पूरा ब्रह्मांड। तारे। ग्रह। पर्वत। नदियाँ। मनुष्य। देव। राक्षस। सब कुछ।
मार्कण्डेय अंदर तैरते। अपनी पूरी ज़िंदगी देखते।
फिर बच्चा साँस बाहर छोड़ता। और मार्कण्डेय बाहर आ जाते। प्रलय के पानी में।
फिर अंदर। फिर बाहर।
यह कई बार हुआ।
मार्कण्डेय ने समझा।
”यह बच्चा। यह कोई और नहीं। यह स्वयं भगवान। और हर साँस में पूरी सृष्टि।”
”सृष्टि अंदर। प्रलय बाहर। साँस लेना सृष्टि। साँस छोड़ना प्रलय।”
वो हाथ जोड़े।
”हे प्रभु, मैंने देखा। आप ब्रह्मांड के निर्माता। और भीतर एक छोटे बच्चे।”
बच्चे ने आँखें खोलीं। एक पल को मार्कण्डेय को देखा।
और तब, सब कुछ बदला।
मार्कण्डेय अचानक अपनी कुटिया में थे।
नदी फिर थी। जंगल फिर था। आकाश में सूर्य।
उन्होंने अपने हाथ देखे। वही थे।
मगर अंदर, कुछ बदल चुका था।
वो जानते थे कि यह सारी दुनिया, यह सब जो दिखता है, यह सब एक बच्चे की साँस।
एक पल को साँस अंदर, हम सब हैं।
साँस बाहर, हम सब ग़ायब।
और यह बच्चा, यह breath, यह सब, वही भगवान।
मार्कण्डेय फिर ध्यान में बैठे।
इस बार एक नई समझ के साथ।
और यह कथा भागवतम् का closing scene है।
व्यासजी ने इसी पर अपनी पुस्तक ख़त्म की।
क्योंकि इससे ज़्यादा क्या कहना? सब कुछ एक बच्चे की साँस। और वो बच्चा, हमारे अपने अंदर।
मार्कण्डेय की कथा भागवतम् का closing image है।
एक ऋषि जो माया देखना चाहता था। और भगवान ने दिखा दी।
एक प्रलय। सब कुछ ख़त्म।
और एक बच्चा। एक पत्ती पर। साँस लेता हुआ। हर साँस में पूरा ब्रह्मांड।
यह image पूरी भागवतम् को capture करता है।
क्योंकि भागवतम् हमें यह बताता है कि सब कुछ एक केन्द्र से आता है। और उसी में लौटता है।
वो केन्द्र क्या है? एक बच्चा। एक नीला बच्चा। मासूम। खेलता हुआ। पर साथ ही, सब का स्रोत।
हम अक्सर ब्रह्म को बहुत abstract बनाते हैं। कुछ बड़ा। कुछ दूर।
भागवतम् कह रहा है, ”नहीं। वो एक बच्चा है। मासूम। प्यारा। और हर सांस में पूरा ब्रह्मांड।”
हम कहाँ ढूँढते हैं उसे? पहाड़ पर? मंदिर में? किताबों में?
मार्कण्डेय को वो प्रलय के बीच मिला। एक तैरते बच्चे के रूप में।
हम अपने भीतर भी ढूँढ सकते हैं। हर साँस के साथ।
साँस अंदर, ”अहम्।” साँस बाहर, ”सोऽहम्।” तीन हज़ार साल पुराना सूत्र।
हर साँस में, हम भी एक बच्चे की तरह, अपनी पूरी दुनिया रच रहे हैं। और बिखेर रहे हैं।
और कौन वो बच्चा? वो हम ख़ुद हैं।
साठ कथाएँ ख़त्म। पर असली कथा अब शुरू।
आपकी अपनी।