मार्कण्डेय का प्रलय-दर्शन
गंगा के तट पर वह छठा दिन उतर आया था। हवा में एक ठहराव था, जैसे नदी भी जानती हो कि अब बहुत कुछ कहा जा चुका, और बहुत थोड़ा बाक़ी है। परीक्षित् ने शुकदेव की ओर देखा। उनके चेहरे पर अब वह बेचैनी न थी जो पहले दिन थी; तक्षक की छाया अब भी पास थी, पर उससे डर जैसे रिस-रिसकर निकल चुका था।
”मुनिवर,” परीक्षित् ने कहा, ”आपने इन दिनों में जितनी कथाएँ सुनाईं, सब में कोई न कोई जीव भगवान् तक पहुँचा। कोई भक्ति से, कोई पुकार से, कोई प्रेम से। पर एक बात मुझे अब भी समझ नहीं आती। यह सारा संसार, यह नदी, यह आकाश, ये सभा में बैठे ऋषि, मेरा यह बचा हुआ शरीर भी, एक दिन प्रलय में मिट जाएगा। तब क्या रहता है? और जो रहता है, उसे किसी ने अपनी आँखों देखा है?”
शुकदेव कुछ देर मौन रहे। फिर उनकी आवाज़ में वह शान्ति उतरी जो गहरे जल की होती है।
”राजन्, एक ऋषि थे, मार्कण्डेय। बड़े पुराने, बड़े तपस्वी। चिरंजीवी, युग पर युग जिनके सामने से बीत गए। उन्होंने भी यही जानना चाहा था जो आप पूछ रहे हैं। और भगवान् ने उन्हें दिखा दिया। सुनिए।”

मार्कण्डेय का तप ऐसा था कि उसके आगे काल भी पाँव रोककर खड़ा हो जाता। एक ही आसन पर बैठे, जप करते, श्रीहरि का स्मरण करते, उनके सामने से छह मन्वन्तर बीत गए। उम्र उनके शरीर को छू नहीं पाती थी।

सातवें मन्वन्तर में इन्द्र को उनके इस तप का पता चला, और वे डर गए। ऐसा तप कहीं उनके आसन को न डिगा दे, यह सोचकर उन्होंने मार्कण्डेय की साधना भंग करने को गन्धर्व, अप्सराओं के दल, कामदेव, वसन्त, मलय-पवन, और लोभ तथा मद को उनके आश्रम भेजा। पुंजिकस्थली जैसी सुन्दरियाँ नाच उठीं, वसन्त ने अपनी सारी माया फैला दी, कामदेव ने अपने पाँच बाण चढ़ाए। पर मार्कण्डेय रत्ती भर भी न डिगे; मन में अहंकार तक न आया। अन्त में कामदेव उनके तेज से जलने लगा और अपने दल समेत वैसे ही भाग खड़ा हुआ, जैसे छोटे बच्चे सोते हुए साँप को जगाकर भाग जाते हैं।

तब, उनकी इस अडिग साधना से प्रसन्न होकर, भगवान् नर और नारायण के रूप में उनके पास प्रकट हुए और बोले कि कोई वर माँग लें। मार्कण्डेय ने हाथ जोड़कर एक ही बात कही।
”प्रभु, मुझे आपकी वह माया दिखा दीजिए, जिससे यह सारा संसार बनता है और जिसमें यह सारा संसार लौट जाता है। मैं उसे देखना चाहता हूँ।”
नारायण मुस्कुराए। ”ऐसा ही होगा,” उन्होंने कहा, और दोनों अपने धाम बदरीवन की ओर लौट गए। चेतावनी कोई न दी; जो माँगा था, वही मिलने वाला था।
मार्कण्डेय अपनी कुटिया के पास नदी के किनारे ध्यान में बैठे रहे। दिन ढला। साँझ की लाली पानी पर बिछ गई, फिर वह भी बुझ गई।
आधी रात कभी आई होगी, कभी नहीं, यह वे बाद में तय नहीं कर पाए।
अचानक एक आवाज़ हुई, जैसे आकाश का कोई छोर फट गया हो। मार्कण्डेय ने आँखें खोलीं और चारों ओर देखा।
नदी कहीं न थी। जो वन वर्षों से उनके चारों ओर खड़ा था, वह कहीं न था। दूर के पर्वत, जिनकी रेखा वे आँख मूँदकर भी जानते थे, मिट चुके थे।

बस जल था। एक छोर से दूसरे छोर तक, ऊपर-नीचे, हर ओर जल। एक अथाह समुद्र, जिसमें न लहर का शोर था, न किनारे का कोई वादा। आकाश न था। सूर्य न था, चन्द्र न था, एक भी तारा न था जिससे दिशा पहचानी जाती। प्रकाश कहीं से आ रहा था और कहीं नहीं; पानी अपने भीतर से एक मटमैली रोशनी छोड़ रहा था।
मार्कण्डेय उस जल में अकेले तैरने लगे।
और तब उन्हें डर लगा। जीवन में पहली बार। इतने कल्पों में, इतने तपों में, मृत्यु तक उनके पास नहीं फटकी थी; पर इस सन्नाटे में, इस अनन्त ठंडे जल में, उनके भीतर कुछ काँपने लगा।
”प्रभु, यह क्या है?” उन्होंने पुकारा।
कोई उत्तर न आया। केवल अपनी ही आवाज़ जल पर फिसलकर लौट आई।
वे तैरते रहे। हाथ चलते रहे, पाँव चलते रहे, और जल वैसा का वैसा। कितने प्रहर बीते, कितने वर्ष, यह कहना कठिन था; जहाँ सूर्य न हो, वहाँ समय की कोई पकड़ नहीं रहती। पर बाद में जान पड़ता था कि वह कोई थोड़ा समय न था; उस प्रलय के जल में भटकते-भटकते उन पर लाखों-करोड़ों वर्ष बीत गए।
भूख और प्यास उन्हें सताने लगी। कहीं से बड़े-बड़े मगर उन पर झपटते, कहीं से तिमिंगिल जैसे विशाल मच्छ उन्हें निगलने को आते। लहरों के थपेड़े उनके शरीर को घायल कर जाते, और रह-रहकर तरह-तरह के रोग उन्हें घेर लेते। कभी शोक, कभी मोह, कभी भय, कभी क्षण भर को कोई सुख। थकान उनके कंधों में, फिर सीने में उतरने लगी। साँस भारी हुई। वह तप जो काल को रोक देता था, इस जल में चुकने लगा।
तभी, उस अंतहीन जल के बीच, उन्हें कुछ दिखा।
पृथ्वी का एक उठा हुआ टीला, और उस पर एक छोटा-सा बरगद का पेड़। उसकी एक डाल पर, एक नई-सी कोमल पत्ती दोने-सी बनकर फैली थी।
और उस पत्ती पर एक शिशु लेटा था।

नवजात-सा छोटा। मरकत-मणि के समान साँवल-साँवला, मेघ के रंग का। मुख ऐसा कि देखते ही भीतर का सारा डर पिघलने लगे। उसके शरीर से ऐसी उज्ज्वल छटा छिटक रही थी कि आसपास का अँधेरा हटता जाता था। गरदन शंख के समान उतार-चढ़ाव वाली, छाती चौड़ी, नासिका तोते की चोंच-सी सुन्दर, भौंहें बड़ी मनोहर। काली-काली घुँघराली अलकें कपोलों पर लटक रहीं, और साँस लगने से कभी-कभी हिल भी जातीं। कानों में, जो शंख के समान घुमावदार थे, लाल-लाल फूल शोभा पा रहे थे। मूँगे के समान लाल होंठों की कान्ति से उसकी सुधामयी श्वेत मुस्कान कुछ ललाई लिए हुई थी। नाभि गहरी थी, तोंद पीपल के पत्ते-सी, और साँस लेने पर उस पर पड़ी हुई बलें तथा नाभि हिल-हिल जातीं। वह सोया हुआ था, अपने दोनों नन्हे करकमलों से एक चरणकमल को मुख में डालकर चूस रहा था, और होंठों पर एक हलकी-सी मुस्कान काँप रही थी, जैसे नींद में भी उसे किसी बात पर हँसी आ रही हो।
मार्कण्डेय थके हाथों से तैरते-तैरते उस तक पहुँचे, और रुककर देखते रह गए।
फिर उन्होंने एक बात लक्ष्य की।
वह शिशु साँस ले रहा था। धीमे, सहज, जैसे कोई बालक नींद में लेता है। पर उसकी हर साँस के साथ कुछ ऐसा हो रहा था जो किसी बालक की साँस के साथ नहीं होता।
जब वह साँस भीतर खींचता, तो मार्कण्डेय खिंचते चले जाते, उसके नन्हे मुख की ओर, और फिर भीतर, उसके भीतर।
और भीतर?

एक पूरा ब्रह्माण्ड भीतर था। वही आकाश जो बाहर मिट चुका था, वही सूर्य, वही चन्द्र और तारे। पर्वत अपनी जगह खड़े, नदियाँ अपने मार्ग पर बहती हुई। नगर, गाँव, उनकी अपनी वह कुटिया भी जो खो गई थी। मनुष्य अपने काम में लगे, देव अपने विमानों पर, असुर अपनी सभाओं में। और इन सबके बीच, मार्कण्डेय ने स्वयं को भी देखा, उसी जल के किनारे ध्यान में बैठे हुए, उसी वर की प्रतीक्षा करते।
वे भीतर तैरते रहे, अपना सारा जिया हुआ जीवन फिर से बीतते देखते।
फिर वह शिशु साँस बाहर छोड़ता, और मार्कण्डेय बहकर बाहर आ जाते, उसी प्रलय के ठंडे जल में, जहाँ फिर कुछ न था।
फिर साँस भीतर, और सारा ब्रह्माण्ड लौट आता। फिर साँस बाहर, और सब बुझ जाता। यह कई बार हुआ, इतनी बार कि मार्कण्डेय गिनना भूल गए।
और तब उन्हें समझ आया।
”यह शिशु स्वयं भगवान् हैं,” उनके भीतर एक स्थिर समझ उतरी। ”इनकी एक साँस में सारी सृष्टि उग आती है, और एक साँस में लौट जाती है। जिसे हम युगों का बनना और मिटना कहते हैं, वह इनकी आती-जाती साँस भर है।”
उन्होंने हाथ जोड़ दिए।
”प्रभु, मैंने देख लिया। समस्त लोकों को धारण करने वाले आप, और इस पत्ते पर लेटे एक नन्हे शिशु भी आप ही।”
शिशु ने आँखें खोलीं। एक पल को उस उदार, अथाह दृष्टि ने मार्कण्डेय को छू लिया।
और उसी पल सब बदल गया।
मार्कण्डेय अपनी कुटिया में थे। नदी अपने तट के बीच बह रही थी, वन अपनी जगह खड़ा था, आकाश में सूर्य वैसे ही चमक रहा था जैसे किसी सुबह चमकता है। उनके सामने वही जप की माला पड़ी थी।
उन्होंने अपने हाथ देखे, अपनी हथेलियाँ। वही पुरानी, वही रेखाएँ। बाहर कुछ न बदला था।
भीतर सब बदल चुका था।
अब वे जानते थे कि यह सारा संसार, यह नदी, यह सूर्य, यह उनका अपना तप तक, एक शिशु की साँस भर है। एक साँस भीतर जाती है और सब उग आता है; एक साँस बाहर आती है और सब लौट जाता है। और वह शिशु, वह आती-जाती साँस, वह सब, श्रीहरि के सिवा और कोई नहीं।
मार्कण्डेय फिर ध्यान में बैठ गए।
इस बार उनके मन में न कोई प्रश्न था, न कोई भय। केवल वह शिशु, और उसकी हलकी मुस्कान।
शुकदेव यहाँ क्षण भर के लिए रुके। गंगा का जल उनके सामने धीमे-धीमे सरक रहा था।
”राजन्,” उन्होंने कहा, ”आपने पूछा था कि प्रलय में सब मिट जाने पर क्या रहता है, और क्या किसी ने उसे देखा है। मार्कण्डेय ने देखा। जब आकाश, सूर्य, उनका अपना शरीर तक नहीं रहा, तब भी वह शिशु पत्ते पर लेटा साँस ले रहा था। जो रहता है, वह यही है।”
परीक्षित् देर तक चुप रहे। फिर बोले, ”मुनिवर, एक बात मन में रह गई। मार्कण्डेय बड़े तपस्वी थे, चिरंजीवी थे। फिर भी उस जल में वे डर गए, उनका बल चुकने लगा। तो वर माँगने में, माया देखने में, उन्हें क्या मिला?”
शुकदेव हलके से मुस्कुराए। ”यही तो मिला, राजन्। जब तक तप उनके साथ था, तब तक वे अपने बल पर खड़े थे। उस जल में जब बल चुक गया, तभी उन्हें वह शिशु दिखा। जो अपने बल के सहारे तैरता रहता है, उसे पत्ते पर लेटा बालक नहीं दिखता। बल का चुकना ही वहाँ कृपा का द्वार था।”
”और वह शिशु,” परीक्षित् ने धीमे से कहा, ”इतने बड़े प्रलय के बीच, अकेला, सोया हुआ, फिर भी अपने नन्हे हाथों से अपना ही चरणकमल मुख में लिए चूसता हुआ, मुस्कुराता हुआ।”
”हाँ,” शुकदेव ने कहा। ”जिसके भीतर सारे लोक समाए हैं, वही पत्ते पर एक नन्हे बालक की तरह खेल रहा है। यह विरोध नहीं है, राजन्। यही उनकी लीला है। बड़े को बड़े रूप में देखना सहज है; उसे एक शिशु की साँस में पहचानना, वही दर्शन है।”
परीक्षित् ने सिर झुका लिया। इन छह दिनों में उन्होंने बहुत कुछ सुना था, और अब वह सब इस एक चित्र में आकर ठहर गया था, एक शिशु की पत्ते पर लेटी हुई साँस में।
”भगवन्,” उन्होंने कहा, ”जब तक मैं अपने राज पर, अपने बल पर खड़ा था, मृत्यु एक भय थी। अब लगता है, जैसे वह भी उसी साँस का बाहर जाना है। एक बार भीतर, एक बार बाहर।”
शुकदेव ने उन्हें देखा, और कुछ न कहा। जो कहना था, राजा स्वयं कह चुके थे।
गंगा बहती रही। एक पक्षी जल को छूकर पार उतर गया। दिन का प्रकाश पानी पर थरथराया, और एक दिन और कम हो गया।
दूर कहीं, अनन्त जल के बीच, एक पत्ते पर लेटा शिशु अब भी साँस ले रहा था।
साहित्यिक-संदर्भ
मार्कण्डेय का प्रलय-दर्शन श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कन्ध के अध्याय 8 और 9 में आता है (अध्याय 8 में तप और वर, अध्याय 9 में माया-दर्शन); बट-पत्र पर लेटे बालमुकुन्द का दर्शन विशेषकर अध्याय 9 में है। चिरंजीवी ऋषि मार्कण्डेय भगवान् से माया देखने का वर माँगते हैं, और महाप्रलय के जल में बरगद की पत्ती पर लेटे शिशु के रूप में उन्हें भगवान् के दर्शन होते हैं, जिनकी एक साँस में समस्त ब्रह्माण्ड समाया है।
यही दृश्य गीताप्रेस की रचना में इन कथाओं के संग्रह का एक गहरा विराम-बिन्दु है। बालमुकुन्द का यह रूप परवर्ती भक्ति-परम्परा में बहुत गाया गया, पर भागवत इसे शान्त और अद्भुत के संगम में रखता है, जहाँ विस्मय अन्ततः प्रणाम में बदल जाता है।
दर्शन-दृष्टि
इस कथा की एक गाँठ यह है कि प्रलय में जब सब कुछ मिट जाता है, तब मार्कण्डेय कैसे उसे देखते रह जाते हैं। भागवत का उत्तर सीधा है: वे चिरंजीवी हैं, काल जिन्हें नहीं छूता, इसीलिए वे साक्षी बने रह सके। पर कथा का मर्म इस तर्क में नहीं, उस क्षण में है जब उनका बल चुक जाता है और तभी उन्हें वह शिशु दिखता है।
शुकदेव परीक्षित् को यह कथा प्रायः अन्त में सुनाते हैं, मानो छह दिनों की सारी कीर्तन-यात्रा इसी एक चित्र में आकर थम जाए: सृष्टि और प्रलय, दोनों एक बालक की आती-जाती साँस। यहाँ अद्भुत रस अपने चरम पर पहुँचकर शान्त में घुल जाता है, और देखने वाले के पास प्रणाम के सिवा कुछ नहीं बचता।
कथा का स्वर
हर चीज़ का अपना प्रलय आता है। जो बना है, वह एक दिन बिखरेगा; जो बिखरा है, वह फिर बनेगा। इन सबके बीच एक साक्षी बना रहता है, जैसे मार्कण्डेय उस जल पर बने रहे। इन कथाओं का प्रवाह यहाँ एक पल थमता है, उस शिशु की एक साँस पर, जिसमें सारा संसार उगता और लौटता है।
यही कथा वहाँ भी
- अध्याय 14 · द्रौपदी-हरण (जयद्रथ), मार्कण्डेय-कथाएँ
महाभारत (वन पर्व): मार्कण्डेय की कथाएँ और प्रलय-दर्शन - देवी माहात्म्य
देवी माहात्म्य, जो मार्कण्डेय पुराण का अंश है