अध्याय 13 · सुरथ-वैश्य को वर

देवी माहात्म्य

अध्याय 13 · सुरथ और वैश्य को वर · समापन

मेधा ऋषि ने पूरी कथा कह दी, और राजा सुरथ तथा वैश्य समाधि, दोनों के भीतर कुछ जाग उठा। दोनों नदी-तट पर गए, मिट्टी की मूर्ति गढ़ी, और तीन वर्ष तप किया। तब देवी प्रत्यक्ष प्रकट हो कर वर देने को उद्यत हुईं, राजा को आने वाले मन्वंतर का मनु बनने का वर, और वैश्य को वह ज्ञान जो आसक्ति की जड़ ही काट दे। यहीं समूचा ग्रंथ अपने विराम पर आता है।

17 श्लोक · पिछला

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महर्षि मेधा नदी-तट के आश्रम में राजा सुरथ और वैश्य समाधि को देवी की कथा सुनाते हुए।

अब ऋषि अपनी सारी कथा समेटने लगे। उन्होंने राजा से कहा कि हे भूप, यह उत्तम देवी-माहात्म्य आपको कह सुनाया; इसी देवी का वह प्रभाव है जिससे समूचा जगत धारण किया जाता है। फिर उन्होंने एक गहरी बात खोल दी, कि जिसे हम विद्या कहते हैं, वह भी उसी विष्णु-माया से रची जाती है। जैसे आप, यह वैश्य, और दूसरे विवेकी जन भी, सब मोह में पड़ते हैं, पड़ चुके हैं, और आगे भी पड़ते ही रहेंगे।

1 · 2

ऋषिरुवाच ।
एतत्ते कथितं भूप देवीमाहात्म्यमुत्तमम् ।
एवंप्रभावा सा देवी ययेदं धार्यते जगत् ॥ 1 ॥
विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया ।
तथा त्वमेष वैश्यश्च तथैवान्ये विवेकिनः ।
मोह्यन्ते मोहिताश्चैव मोहमेष्यन्ति चापरे ॥ 2 ॥

राजा सुरथ महर्षि मेधा के सम्मुख हाथ जोड़कर नतमस्तक, पास बैठा वैश्य समाधि उन्हें देखता हुआ।

माया का यह बंधन ज्ञानी को भी नहीं छोड़ता, इसी से ऋषि ने अपना परम उपदेश दे डाला। उन्होंने कहा, हे महाराज, उन्हीं परमेश्वरी की शरण में जाइए। आराधित होने पर वही माता मनुष्यों को भोग देती हैं, स्वर्ग देती हैं, और अपवर्ग, यानी अंतिम मुक्ति भी वही देती हैं। यही एक मार्ग है, और शरण ही उसका द्वार।

राजा सुरथ और वैश्य समाधि नदी-तट की ओर जाते हुए, आकाश में सिंहवाहिनी देवी का दिव्य दर्शन।

3

तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्वरीम् ।
आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा ॥ 3 ॥

मार्कण्डेय जी आगे कहते हैं कि ऋषि का वह वचन सुन कर नराधिप सुरथ ने उन महाभाग, दृढ़-व्रत मुनि को प्रणाम किया। राजा का चित्त अब अति-ममत्व से और अपने राज्य के छिन जाने से विरक्त हो चुका था। हे महामुने, उसी क्षण वह और वह वैश्य, दोनों तप के लिए चल पड़े।

4 · 5

मार्कण्डेय उवाच ।
इति तस्य वचः श्रुत्वा सुरथः स नराधिपः ।
प्रणिपत्य महाभागं तमृषिं शंसितव्रतम् ॥ 4 ॥
निर्विण्णो ऽतिममत्वेन राज्यापहरणेन च ।
जगाम सद्यस्तपसे स च वैश्यो महामुने ॥ 5 ॥

राजा और वैश्य नदी-किनारे देवी की मिट्टी की मूर्ति गढ़ते हुए, ऊपर सिंह सहित देवी प्रकट।

अम्बा के दर्शन की प्यास ले कर वह वैश्य एक नदी के पुलिन पर जा बैठा, और परम देवी-सूक्त का जप करते हुए तप करने लगा। दोनों ने उसी रेत-तट पर मिट्टी की एक देवी-मूर्ति गढ़ी, और पुष्प, धूप, अग्नि तथा तर्पण से उसकी अर्चना की। मिट्टी की उस छोटी-सी मूर्ति में उन्होंने मानो अनंत को बुला लिया।

तपस्या से कृश राजा सुरथ और वैश्य समाधि अंजलि में पुष्प लिए सिंहवाहिनी देवी को अर्घ्य देते हुए।

6 · 7

संदर्शनार्थमम्बाया नदीपुलिनसंस्थितः ।
स च वैश्यस्तपस्तेपे देवीसूक्तं परं जपन् ॥ 6 ॥
तौ तस्मिन् पुलिने देव्याः कृत्वा मूर्तिं महीमयीम् ।
अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः ॥ 7 ॥

उनका तप साधारण नहीं था। निराहार रह कर, चित्त को संयत कर, उन्हीं माता में लीन और एकाग्र हो कर वे बैठे रहे। और जब अर्पण की बारी आई, तो उन्होंने अपने ही अंगों के रक्त से सींची हुई बलि चढ़ा दी; देह तक न्योछावर कर देने वाला यह कैसा तप था। इसी प्रकार तीन वर्ष तक आराधना करते उन दोनों संयत साधकों पर जगद्धात्री चण्डिका परितुष्ट हो उठीं, और प्रत्यक्ष प्रकट हो कर बोलीं।

8 · 9

निराहारौ यतात्मानौ तन्मनस्कौ समाहितौ ।
ददतुस्तौ बलिं चैव निजगात्रासृगुक्षितम् ॥ 8 ॥
एवं समाराधयतोस्त्रिभिर्वर्षैर्यतात्मनोः ।
परितुष्टा जगद्धात्री प्रत्यक्षं प्राह चण्डिका ॥ 9 ॥

श्री-देवी ने स्नेह-भरे स्वर में कहा, हे भूप, और हे कुल-नंदन, जो भी आप दोनों माँगना चाहें, वह सब हमसे माँग लीजिए; परितुष्ट हो कर हम वह आपको दे देंगी। यह सुन कर मार्कण्डेय जी कहते हैं कि तब नृप ने अपना वर माँगा, अगले जन्म में कभी न नष्ट होने वाला राज्य, और इसी जन्म में अपना वह राज्य लौट आए जिसका शत्रु-बल बल से ही उखड़ जाए।

आयुधधारिणी देवी दुर्गा सिंह के साथ खड़ी हैं, राजा सुरथ और वैश्य समाधि दोनों ओर हाथ जोड़े।

10 · 11

श्रीदेव्युवाच ।
यत्प्रार्थ्यते त्वया भूप त्वया च कुलनन्दन ।
मत्तस्तत्प्राप्यतां सर्वं परितुष्टा ददामि तत् ॥ 10 ॥
मार्कण्डेय उवाच ।
ततो वव्रे नृपो राज्यमविभ्रंश्यन्यजन्मनि ।
अत्रैव च निजं राज्यं हतशत्रुबलं बलात् ॥ 11 ॥

सूर्यास्त के समय देवी मूर्ति के पास साक्षात खड़ी हैं, राजा और वैश्य श्रद्धा से प्रणाम करते हुए।

राजा तो विरक्त हो कर भी अंततः राज्य ही माँग बैठा, पर वैश्य की दृष्टि कहीं और थी। विरक्त-मन उस प्राज्ञ ने राज्य या भोग नहीं माँगा, उसने ज्ञान माँगा, ठीक वही ज्ञान जो “मैं” और “मेरा” की आसक्ति को जड़ से काट दे। तब श्री-देवी राजा से बोलीं, हे नृपते, थोड़े ही दिनों में आप अपना राज्य पा लेंगे; शत्रुओं को मार कर वहाँ आपका वह राज्य अटल और अविचल रहेगा।

देवी सिंह के संग शिला पर विराजमान, राजा सुरथ और वैश्य समाधि फल-फूल अर्पित कर प्रार्थना करते।

12 · 13

सो ऽपि वैश्यस्ततो ज्ञानं वव्रे निर्विण्णमानसः ।
ममेत्यहमिति प्राज्ञः सङ्गविच्युतिकारकम् ॥ 12 ॥
श्रीदेव्युवाच ।
स्वल्पैरहोभिर्नृपते स्वं राज्यं प्राप्स्यते भवान् ।
हत्वा रिपूनस्खलितं तव तत्र भविष्यति ॥ 13 ॥

फिर देवी ने राजा का आगे का भविष्य खोल दिया। उन्होंने कहा कि इस देह के मरने के बाद आप फिर विवस्वान् देव, अर्थात सूर्य से जन्म पाएँगे, और इस पृथ्वी पर “सावर्णिक” नामक मनु हो कर आने वाले मन्वंतर के अधिपति बनेंगे। फिर वैश्य की ओर मुड़ कर बोलीं, हे श्रेष्ठ वैश्य, जो वर आपने हमसे चाहा, वह हम आपको देती हैं; आपकी परम संसिद्धि के लिए वही मुक्ति-दायक ज्ञान आपको प्राप्त होगा।

सिंह के साथ खड़ी देवी राजा और वैश्य के बीच, चरणों में छोटी मूर्ति, दीप और फलों का भोग।

14 · 15

मृतश्च भूयः सम्प्राप्य जन्म देवाद्विवस्वतः ।
सावर्णिको नाम मनुर्भवान् भुवि भविष्यति ॥ 14 ॥
वैश्यवर्य त्वया यश्च वरो ऽस्मत्तो ऽभिवाञ्छितः ।
तं प्रयच्छामि संसिद्ध्यै तव ज्ञानं भविष्यति ॥ 15 ॥

देवी के दर्शन के साथ आकाश में घोड़ों के रथ पर एक तेजोमयी आकृति, राजा और वैश्य प्रणाम करते।

मार्कण्डेय जी कहते हैं कि इस प्रकार उन दोनों को उनका इच्छित वर दे कर, और दोनों के भक्ति-भरे स्तवन के बीच ही, देवी तत्क्षण अंतर्धान हो गईं। यों देवी से वर पा कर वह क्षत्रिय-श्रेष्ठ सुरथ, अपनी इस देह के अंत के बाद सूर्य से जन्म पा कर, आगे “सावर्णि” नामक मनु होगा। यहीं समूचा देवी माहात्म्य अपने विश्राम पर आ जाता है। ओम् श्री-दुर्गायै नमः।

स्वर्णिम प्रकाश-स्तंभ में देवी प्रकट होती हुईं, नदी-तट पर राजा सुरथ और वैश्य समाधि हाथ जोड़े।

16 · 17

मार्कण्डेय उवाच ।
इति दत्त्वा तयोर्देवी यथाभिलषितं वरम् ।
बभूवान्तर्हिता सद्यो भक्त्या ताभ्यामभिष्टुता ॥ 16 ॥
एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः ।
सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः ॥ 17 ॥

देवी माहात्म्य पूरी, एक नज़र

तेरह अध्याय, सात सौ श्लोक। आरंभ एक राजा और एक वैश्य से होता है, इस प्रश्न से कि महामाया ज्ञानी को भी मोह में क्यों डाल देती है। फिर तीन चरित आते हैं, मधु-कैटभ का वध विष्णु से, महिषासुर का वध देव-तेज से उपजी देवी से, और शुम्भ-निशुम्भ का वध गौरी के कोश से प्रकट कौशिकी और फिर सप्त-मातृकाओं से। हर बार देवी नित्या ही रहती हैं, केवल आविर्भूत होती हैं। अंत में सुरथ और वैश्य को देवी से अपना-अपना मनचाहा वर मिलता है।

इसी ग्रंथ की प्रसिद्ध प्रतिज्ञा श्लोक 11.51 में आती है, “इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति, तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्।” अर्थात, जब-जब असुरों से बाधा उठेगी, तब-तब मैं अवतीर्ण हो कर शत्रुओं का संक्षय करूँगी। गीता के “यदा यदा हि धर्मस्य” की गूँज यहीं सुनाई देती है।

देवी माहात्म्य, मार्कण्डेय-पुराण के अध्याय 81 से 93।