देवी

सौ बरस का युद्ध हार चुके देवता विष्णु और शिव के सामने खड़े हैं, और महिषासुर इन्द्र के आसन पर बैठा है। शिकायत सुनते ही दोनों की भौंहें तनती हैं, और तब वह घटता है जिसकी कोई सेना कल्पना नहीं कर सकती थी। मार्कण्डेय पुराण के भीतर बैठा देवी माहात्म्य उस क्षण को जिस तरह कहता है, वह इस साइट के पन्ने पर ज्यों का त्यों है, “सब देवों का तेज मिल कर जलते पर्वत-सा एक पुंज बना, और उसी से एक देवी प्रकट हुईं।” शिव का तेज मुख बना, विष्णु का भुजाएँ, इन्द्र का कटि, और हर देव ने अपना अस्त्र अर्पित किया। ध्यान दीजिए, देवी किसी की रचना नहीं हैं, वे वह हैं जो सबके भीतर पहले से था और संकट के दिन एक जगह इकट्ठा होकर सिंह पर सवार हो गया। उनका पहला रौद्र नाद हुआ तो तीनों लोक काँप उठे, और देवताओं ने उसी काँपते क्षण में पहली बार चैन की साँस ली।

देवी माहात्म्य तीन चरित्रों में चलता है, और तीनों में देवी का ढंग अलग है। प्रथम चरित्र में वे युद्ध ही नहीं करतीं, वे योगनिद्रा हैं, जो विष्णु की पलकों से उतरती हैं ताकि वे जागें और मधु-कैटभ से लड़ें। वहाँ देवी शक्ति का वह रूप हैं जो स्वयं मंच पर आए बिना सारा मंच चलाता है। मध्यम चरित्र में वे महिषासुर के सामने प्रकट योद्धा हैं, वह असुर जो रूप बदल बदलकर लड़ता है, कभी भैंसा, कभी सिंह, कभी हाथी, और देवी हर रूप के साथ अपना उत्तर बदलती जाती हैं, पाश, खड्ग, धनुष, और अन्त में पैर से दबाकर शूल। और उत्तर चरित्र में, शुम्भ-निशुम्भ के विरुद्ध, कथा अपना सबसे गहरा रहस्य खोलती है। रक्तबीज सामने आता है, जिसके रक्त की हर बूँद से एक नया असुर उगता है। जितना काटिए, शत्रु उतना बढ़े। तब देवी के ललाट से काली प्रकट होती हैं, और उपाय बल नहीं, प्रज्ञा बनती है, काली अपना मुख फैलाकर हर बूँद धरती तक पहुँचने से पहले पी जाती हैं। स्रोत सूखा, तो सेना सूखी। जो समस्या काटने से दुगनी होती हो, उसे काटना छोड़कर उसका पोषण बन्द कीजिए, देवी माहात्म्य यह पाठ हज़ार बरस से पढ़ा रहा है।

और जब शुम्भ अन्तिम द्वन्द्व में देवी को ताना देता है कि आप तो दूसरों के बल पर लड़ रही हैं, तो देवी की वह घोषणा आती है जो पूरे ग्रन्थ की कुंजी है, ये सब मेरी ही विभूतियाँ हैं, और सारी सहायिकाएँ उनके भीतर समा जाती हैं। एक ही बची रहती हैं, अकेली। विजय के बाद देवता नारायणी की स्तुति गाते हैं, सोलह बार वही टेक लौटती है, नारायणि नमोऽस्तु ते। और उसी स्तुति में वह पंक्ति आती है जो साइट के पन्ने पर पढ़ते हुए ठहरा देती है, “जगत की समस्त स्त्रियाँ आपका ही रूप”। यह अलंकार नहीं, देवी माहात्म्य का सीधा दर्शन है, शक्ति कहीं बाहर से नहीं आती, वह हर उस देह में पहले से बसी है जिसे संसार दुर्बल समझने की भूल करता है।

रण के बाहर देवी

पर देवी केवल रणभूमि की नहीं हैं। योग वासिष्ठ की ज्ञान-कथाओं में वही स्त्री-तत्व दूसरा काम करता दिखता है, वहाँ वह मारता नहीं, जगाता है। लीला की कथा में रानी अपने मृत पति के लिए सरस्वती से वर माँगती है, और देवी उसे रोने से आगे ले जाकर संसारों के भीतर संसार दिखाती हैं, जब तक मृत्यु का भ्रम ही न टूट जाए। और चूड़ाला की कथा में तो स्त्री स्वयं गुरु हो जाती है, रानी जो भीतर जाग चुकी है, पर राजा जिसकी बात मानने को तैयार नहीं, तो वह ब्राह्मण-बालक का रूप धरकर बरसों अपने ही पति को राह दिखाती है। ज्ञान वही था, केवल वेश बदलना पड़ा, क्योंकि सुनने वाला रूप देखकर सुनता था। देवी माहात्म्य की काली और योग वासिष्ठ की चूड़ाला एक ही सत्य के दो छोर हैं, शक्ति वह रूप धर लेती है जिस रूप में उसे स्वीकार किया जा सके। और जो इस तत्व को नामों में जपना चाहे, उसके लिए ब्रह्माण्ड पुराण का ललिता सहस्रनाम है, एक हज़ार नाम, एक ही देवी, ललित यानी खेलती हुई।

देवी माहात्म्य का अन्त भी एक वर से होता है, और वह वर बहुत कुछ कह जाता है। राजा सुरथ राज्य माँगता है, वैश्य समाधि मुक्ति, और देवी दोनों को उनका माँगा दे देती हैं, बिना किसी को छोटा कहे। संसार चाहिए तो वह भी माता के हाथ से, और संसार से छूटना हो तो वह भी। द्वार एक ही है, माँग अपनी अपनी।

उनकी राह

मधु-कैटभ वध · योगनिद्रा का पहला दर्शन, जहाँ देवी लड़ती नहीं, लड़ने वाले को जगाती हैं।

देवी की उत्पत्ति · सब देवों का तेज एक पुंज बना, और सिंह पर सवार उत्तर प्रकट हुआ।

महिषासुर-वध · रूप बदलते असुर के हर रूप का अलग उत्तर, नवरात्र की केन्द्रीय कथा।

रक्तबीज-वध · जो काटने से दुगना हो, उसका स्रोत सुखाइए, काली के फैले मुख का पाठ।

नारायणी स्तुति · सोलह बार लौटती वही पुकार, और हर स्त्री में देवी का दर्शन।

सुरथ और वैश्य को वरदान · एक को राज्य, एक को मुक्ति, माता के द्वार पर दोनों माँगें सुनी जाती हैं।

लीला और पद्म · सरस्वती के संग एक रानी की वह यात्रा, जो संसार के भीतर संसार खोलती चलती है।

चूड़ाला · रानी जो गुरु बनी, और जिसने ज्ञान देने के लिए अपना रूप तक बदल लिया।

ललिता सहस्रनाम · एक हज़ार नामों में वही एक देवी, जपने वालों के लिए बिछा हुआ मार्ग।

देवी माहात्म्य का मुख्य पृष्ठ · तेरह अध्यायों की पूरी सप्तशती-कथा, तीनों चरित्र एक ही आँगन में।

संकट के नाप का उत्तर

देवी की कथाओं में हमें सबसे अधिक यह बात सधी हुई लगती है कि उनका हर उत्तर संकट के ठीक नाप का होता है, न कम, न अधिक। मधु-कैटभ के लिए केवल जागरण चाहिए था, तो केवल जागरण मिला। महिषासुर बल से लड़ा तो बल मिला, रक्तबीज गणित से लड़ा तो गणित मिला, और शुम्भ ने अकेलेपन का ताना दिया तो अकेलापन ही उत्तर बन गया। भय के बारे में देवी माहात्म्य की सीख इतनी सी है कि संकट के दिन अपनी बिखरी हुई शक्तियों को एक जगह करना ही प्रकट होना है, देवता अलग अलग हारते रहे और एक होकर देवी हो गए। और चूड़ाला की ओर से इसमें एक पंक्ति और जुड़ती है, कि सामर्थ्य का अहंकार भी मत पालिए, ज़रूरत हो तो वेश बदलकर, नाम छोड़कर, बिना श्रेय के भी अपना काम कीजिए, क्योंकि काम का होना श्रेय के मिलने से बड़ा है। जो शक्ति हर स्त्री में, हर घर में, हर साँस में पहले से बैठी है, उसे पहचान लेना ही देवी का असली दर्शन है, बाक़ी सब उत्सव है।