अध्याय 10 · शुम्भ वध

देवी माहात्म्य

अध्याय 10 · शुम्भ वध · उत्तर चरित्र

निशुम्भ गिर चुका। अब अकेला रह गया शुम्भ, और गिरते भाई का शोक उसने ताने में ढाल दिया कि देवी तो दूसरों के बल पर लड़ रही हैं। उत्तर में अम्बिका ने ब्रह्माणी से ले कर समस्त मातृ-शक्तियों को अपने एक ही शरीर में समेट लिया और घोषित किया कि इस जगत में वे ही अकेली हैं, शेष सब उन्हीं की विभूतियाँ हैं। फिर छिड़ा वह अंतिम द्वंद्व, जिसमें एक-एक कर शुम्भ के सब आयुध कटते गए, मुष्टि-युद्ध आकाश तक जा पहुँचा, और अंत में देवी के शूल ने उसका वक्ष बेध कर उसे धरती पर पटक दिया।

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ऋषि कहते हैं, प्राणों के समान प्रिय भाई निशुम्भ को निहत और अपनी सेना को कटते देख कर शुम्भ क्रोध से जल उठा, और तब उसके मुख से ये कठोर वचन निकले।

1

ऋषिरुवाच ।
निशुम्भं निहतं दृष्ट्वा भ्रातरं प्राणसंमितम् ।
हन्यमानं बलं चैव शुम्भः क्रुद्धो ऽब्रवीद्वचः ॥ 1 ॥

सिंहवाहिनी देवी शस्त्र उठाए शुम्भ के सामने हैं, नीचे निशुम्भ और दैत्यों के शव पड़े हैं।

बोला वह, हे दुष्टा दुर्गा, बल के अहंकार में चूर हो कर इतना गर्व मत कीजिए। आप तो मानिनी की भाँति दूसरी शक्तियों के बल का आश्रय ले कर लड़ रही हैं, अपने अकेले के बूते पर नहीं। यही उसका अंतिम ताना था, और यही देवी की उस महान अद्वैत-घोषणा का निमित्त बन गया।

2 · ताना

बलावलेपाद् दुष्टे त्वं मा दुर्गे गर्वमावह ।
अन्यासां बलमाश्रित्य युध्यसे यातिमानिनी ॥ 2 ॥

श्री-देवी ने उत्तर दिया, इस समूचे जगत में हम ही एक हैं; हमसे भिन्न कोई दूसरी कहाँ है। देख रे दुष्ट, जिन्हें पराई शक्तियाँ समझा जा रहा है, वे सब हमारी ही विभूतियाँ हैं, और देखते-देखते वे सब हमीं में लौट कर समा रही हैं। यही समस्त सप्तशती का मूल स्वर है, कि सारी शक्तियाँ एक ही महाशक्ति की विभूति-मात्र हैं।

3 · देवी का उत्तर

श्रीदेव्युवाच ।
एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा ।
पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः ॥ 3 ॥

समस्त मातृशक्तियाँ प्रकाश की धाराएँ बनकर सिंहवाहिनी देवी के शरीर में समा रही हैं, शुम्भ देखता है।

वचन के साथ ही ब्रह्माणी आदि समस्त मातृ-देवियाँ देवी के शरीर में लीन हो गईं, और तब वहाँ केवल अकेली अम्बिका शेष रह गईं। फिर देवी ने कहा, हम अपनी विभूति के बल पर अनेक रूप धर कर यहाँ खड़ी थीं; अब उन सबको समेट कर एकाकी ही इस रण में टिकी हैं। आप स्थिर हो कर सामने आइए। शुम्भ का ताना उसी पर लौटा कर देवी ने अकेले के द्वंद्व की चुनौती दे डाली।

4 · 5

ऋषिरुवाच ।
ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम् ।
तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकैवासीत्तदाम्बिका ॥ 4 ॥
श्रीदेव्युवाच ।
अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता ।
तत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव ॥ 5 ॥

देवी और शुम्भ आमने-सामने शस्त्र भिड़ाए लड़ते हैं, एक ओर देवता, दूसरी ओर असुर सेना खड़ी है।

फिर समस्त देवों और असुरों के देखते-देखते देवी और शुम्भ का वह दारुण द्वंद्व आरम्भ हो गया, सप्तशती का अंतिम और एकाकी मुक़ाबला। तीक्ष्ण शर-वर्षा से, धारदार शस्त्रों से और अत्यंत दारुण अस्त्रों से दोनों का वह युद्ध ऐसा प्रचंड हो उठा कि समस्त लोकों के लिए भयंकर बन गया।

6 · 7

ऋषिरुवाच ।
ततः प्रववृते युद्धं देव्याः शुम्भस्य चोभयोः ।
पश्यतां सर्वदेवानामसुराणां च दारुणम् ॥ 6 ॥
शरवर्षैः शितैः शस्त्रैस्तथा चास्त्रैः सुदारुणैः ।
तयोर्युद्धमभूद् भूयः सर्वलोकभयङ्करम् ॥ 7 ॥

आकाश में देवी और शुम्भ के बाण आपस में टकराकर चिनगारियाँ बिखेरते हैं, सिंह झपट रहा है।

अम्बिका ने जो सैकड़ों दिव्य अस्त्र छोड़े, दैत्येन्द्र ने उनके प्रतिकार करने वाले अस्त्रों से उन सबको तोड़ डाला; इस घड़ी तक वह देवी के बराबर टिका रहा। पर जब उसने अपने दिव्य अस्त्र छोड़े, तो परमेश्वरी ने उन्हें केवल एक उग्र हुंकार के उच्चारण मात्र से, खेल ही खेल में चूर कर दिया। जो शुम्भ के लिए महायत्न था, वह देवी की लीला-भर था।

8 · 9

दिव्यान्यस्त्राणि शतशो मुमुचे यान्यथाम्बिका ।
बभञ्ज तानि दैत्येन्द्रस्तत्प्रतीघातकर्तृभिः ॥ 8 ॥
मुक्तानि तेन चास्त्राणि दिव्यानि परमेश्वरी ।
बभञ्ज लीलयैवोग्रहुङ्कारोच्चारणादिभिः ॥ 9 ॥

देवी की उठी हथेली से निकले तेज से शुम्भ के चलाए अस्त्र टूटकर बिखर जाते हैं।

तब उस असुर ने सैकड़ों बाणों से देवी को ढक डाला, पर कुपित हुई देवी ने अपने बाणों से उसका धनुष ही काट दिया। धनुष कटते ही दैत्येन्द्र ने शक्ति नामक आयुध उठाया, पर देवी ने अपने चक्र से उसे उसके हाथ में रहते ही काट गिराया। उसका पहला आयुध, फिर दूसरा, दोनों हाथ में ही छिन गए।

10 · 11

ततः शरशतैर्देवीमाच्छादयत सो ऽसुरः ।
सा च तत्कुपिता देवी धनुश्चिच्छेद चेषुभिः ॥ 10 ॥
छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रस्तथा शक्तिमथाददे ।
चिच्छेद देवी चक्रेण तामप्यस्य करे स्थिताम् ॥ 11 ॥

देवी का बाण शुम्भ के अस्त्र को बीच आकाश में काटकर चिनगारियों में बिखेर देता है।

फिर वह दैत्याधिप-ईश्वर शुम्भ खड्ग और सौ चन्द्र-चिह्नों से दमकती ढाल ले कर देवी की ओर झपटा। वह जैसे ही दौड़ा, चण्डिका ने अपने धनुष से छोड़े तीक्ष्ण बाणों से उसके खड्ग और सूर्य-किरणों-सी निर्मल उस ढाल को आते-आते ही काट डाला।

12 · 13

ततः खड्गमुपादाय शतचन्द्रं च भानुमत् ।
अभ्यधावत्तदा देवीं दैत्यानामधिपेश्वरः ॥ 12 ॥
तस्यापतत एवाशु खड्गं चिच्छेद चण्डिका ।
धनुर्मुक्तैः शितैर्बाणैश्चर्म चार्ककरामलम् ॥ 13 ॥

देवी के प्रहार से उछलते शुम्भ की तलवार और ढाल टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाती हैं।

देवी ने उसके घोड़ों और सारथि सहित उसका रथ भी गिरा दिया। अश्व-रहित, धनुष-कटा, सारथि-विहीन वह दैत्य अब अम्बिका के वध पर उतारू हो कर एक घोर मुद्गर उठा लाया। पर देवी ने उसके आते हुए उस मुद्गर को भी तीक्ष्ण बाणों से काट गिराया; तब भी वह वेग से मुट्ठी तान कर देवी पर टूट पड़ा। अब उसके पास कोई आयुध शेष न था, बस यह मुष्टि-युद्ध बाकी रह गया।

14 · 15

अश्वांश्च पातयामास रथं सारथिना सह ।
हताश्वः स तदा दैत्यश्छिन्नधन्वा विसारथिः ।
जग्राह मुद्गरं घोरमम्बिकानिधनोद्यतः ॥ 14 ॥
चिच्छेदापततस्तस्य मुद्गरं निशितैः शरैः ।
तथापि सो ऽभ्यधावत्तां मुष्टिमुद्यम्य वेगवान् ॥ 15 ॥

देवी के बाण शुम्भ की गदा को चूर करते हैं, नीचे उसका टूटा रथ और मृत अश्व पड़े हैं।

उस दैत्य-श्रेष्ठ ने देवी के हृदय पर मुट्ठी का प्रहार किया, और देवी ने भी अपनी हथेली से उसकी छाती पर वार कर दिया। हथेली के उस आघात से आहत हो कर दैत्य-राज भूमि पर गिर पड़ा, पर तत्काल फिर वैसा ही उठ खड़ा हुआ।

16 · 17

स मुष्टिं पातयामास हृदये दैत्यपुङ्गवः ।
देव्यास्तं चापि सा देवी तलेनोरस्यताडयत् ॥ 16 ॥
तलप्रहाराभिहतो निपपात महीतले ।
स दैत्यराजः सहसा पुनरेव तथोत्थितः ॥ 17 ॥

देवी की हथेली का प्रहार शुम्भ की छाती पर पड़ता है और वह पीछे लड़खड़ा जाता है।

अब उसने वह किया जो किसी ने पहले न देखा था। ऊँचा उछल कर, देवी को अपनी पकड़ में लिए हुए, वह सीधे आकाश में जा खड़ा हुआ। वहाँ बिना किसी आधार के भी चण्डिका उससे लड़ती रहीं। आकाश में दैत्य और चण्डिका ने परस्पर ऐसा मल्ल-युद्ध किया, जो सिद्धों और मुनियों ने भी पहली बार देखा, और जिसने उन्हें विस्मय में डाल दिया।

18 · आकाश-युद्ध

उत्पत्य च प्रगृह्योच्चैर्देवीं गगनमास्थितः ।
तत्रापि सा निराधारा युयुधे तेन चण्डिका ॥ 18 ॥

19

नियुद्धं खे तदा दैत्यश्चण्डिका च परस्परम् ।
चक्रतुः प्रथमं सिद्धमुनिविस्मयकारकम् ॥ 19 ॥

आकाश में देवी और शुम्भ के बीच मल्लयुद्ध छिड़ा है, चारों ओर ऋषि मुनि बादलों से देखते हैं।

बहुत देर तक उसके साथ आकाश में मल्ल-युद्ध कर के अम्बिका ने उसे उठाया, खूब घुमाया, और धरती पर पटक दिया। पर इस तरह फेंका गया वह दुष्टात्मा धरती छूते ही फिर वेग से मुट्ठी तान कर, चण्डिका के वध की इच्छा से दौड़ पड़ा। गिर कर भी न रुका, यही शुम्भ का अंतिम प्रयास था।

20 · 21

ततो नियुद्धं सुचिरं कृत्वा तेनाम्बिका सह ।
उत्पात्य भ्रामयामास चिक्षेप धरणीतले ॥ 20 ॥
स क्षिप्तो धरणीं प्राप्य मुष्टिमुद्यम्य वेगितः ।
अभ्यधावत दुष्टात्मा चण्डिकानिधनेच्छया ॥ 21 ॥

देवी शुम्भ के शरीर को सिर के ऊपर उठाकर पटकने को हैं, रणभूमि में सिंह दहाड़ता है।

तब समस्त दैत्य-जनों के उस ईश्वर को अपनी ओर आते देख कर देवी ने उसके वक्ष को शूल से बेध दिया और उसे पृथ्वी पर गिरा दिया। यही शुम्भ का अंत था, उत्तर चरित्र की परिणति। देवी के शूल-अग्र से बिंधा हुआ वह प्राण-रहित हो कर, समुद्रों, द्वीपों और पर्वतों सहित समस्त पृथ्वी को कँपाता हुआ धरती पर ढह पड़ा।

22 · शुम्भ वध

तमायान्तं ततो देवी सर्वदैत्यजनेश्वरम् ।
जगत्यां पातयामास भित्त्वा शूलेन वक्षसि ॥ 22 ॥

23

स गतासुः पपातोर्व्यां देवीशूलाग्रविक्षतः ।
चालयन् सकलां पृथ्वीं साब्धिद्वीपां सपर्वताम् ॥ 23 ॥

देवी अपने त्रिशूल से गिरते शुम्भ की छाती बेधती हैं, ऊपर ध्वजा और छत्र शोभित हैं।

उस दुरात्मा के मारे जाते ही समस्त संसार प्रसन्न हो उठा; जगत ने परम स्वस्थता पाई और आकाश निर्मल हो गया। पहले जो उल्का-सहित उत्पात के बादल छाए थे, वे शान्त पड़ गए, और उसके गिरते ही नदियाँ फिर अपने मार्ग पर बहने लगीं।

24 · 25

ततः प्रसन्नमखिलं हते तस्मिन् दुरात्मनि ।
जगत्स्वास्थ्यमतीवाप निर्मलं चाभवन्नभः ॥ 24 ॥
उत्पातमेघाः सोल्का ये प्रागासंस्ते शमं ययुः ।
सरितो मार्गवाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते ॥ 25 ॥

शुम्भ के शव पर त्रिशूल टिकाए देवी विजयी विराजती हैं, आकाश में अप्सराएँ नाचती हैं और पुष्प बरसते हैं।

उसके मारे जाने पर समस्त देव-गणों के मन हर्ष से छलक उठे, और गन्धर्वों ने मधुर गान छेड़ दिया। किसी ने वाद्य बजाए, अप्सरा-गण नृत्य में लीन हो गईं; पवित्र वायु बहने लगी और सूर्य अत्यंत प्रभामय हो उठा। सारी सृष्टि में मंगल छा गया।

26 · 27

ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः ।
बभूवुर्निहते तस्मिन् गन्धर्वा ललितं जगुः ॥ 26 ॥
अवादयंस्तथैवान्ये ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।
ववुः पुण्यास्तथा वाताः सुप्रभो ऽभूद्दिवाकरः ॥ 27 ॥

आगे

अध्याय 11, “नारायणी स्तुति।” शुम्भ-निशुम्भ के संहार के बाद देवताओं ने अम्बिका की दीर्घ स्तुति की, जिसके हर श्लोक का विश्राम है “नारायणी नमो ऽस्तु ते।” यही स्तुति दुर्गा-पूजा में नित्य पढ़ी जाती है।

दुर्गा सप्तशती, उत्तर चरित्र। मार्कण्डेय-पुराण के अंतर्गत अध्याय दस, श्रीदुर्गासप्तशती (देवी माहात्म्य) के तेरह अध्यायों में दसवाँ। मूल पाठ गीता प्रेस संस्करण के अनुसार।