तुलसीदासरामचरितमानसतृतीय सोपान
अरण्यकाण्ड
वह काण्ड जिसमें वन पहली बार सुन्दर नहीं, खाली लगने लगता है, क्योंकि उसमें से एक व्यक्ति उठा ली जाती हैं।
रामचरितमानस का तीसरा सोपान वह जगह है जहाँ कथा अपना स्वर बदलती है। अब तक वन एक आश्रय था, ऋषियों का घर, जहाँ राम अतिथि की तरह जाते थे। इसी काण्ड के बीच वही वन अचानक एक ऐसी जगह बन जाता है जहाँ से कोई उठा लिया जा सकता है। वहाँ पुकारने पर कोई उत्तर नहीं आता।

यहाँ हर प्रसंग अपना पूरा पन्ना है। उसकी हिन्दी कथा गीता प्रेस के पाठ और हनुमानप्रसाद पोद्दार की टीका के सहारे लिखी गयी है।
प्रसंग-दर-प्रसंग पढ़िए
- जयन्त का अपराध, अत्रि का आश्रम और अनसूया का उपदेशदोहा 1 से सोरठा 6 (ख)
कौए का वेष धरकर जयन्त सीता के चरण पर चोंच मारकर भागता है। अपने रूप में वह सब लोकों में भटकता है, और अन्त में राम के चरण पकड़कर बचता है। - शरभंग, मुनियों की अस्थियाँ और प्रतिज्ञादोहा 7 से 11
ब्रह्मलोक जाते हुए एक मुनि सुनते हैं कि राम वन में आयेंगे। वे दिन-रात राम की राह देखते हैं। आगे वन में राम हड्डियों का ढेर देखते हैं। मुनियों का उत्तर सुनकर राम की आँखों में जल छा जाता है, और वे भुजा उठाकर प्रण करते हैं। - अगस्त्य, पंचवटी और लक्ष्मण-गीतादोहा 12 से 16
अगस्त्य के आश्रम में राम का प्रश्न, जिसके उत्तर में ऋषि पंचवटी का पता देते हैं। गोदावरी के किनारे छायी हुई एक पर्णकुटी। और उसी कुटी में छोटे भाई का प्रश्न, जिसका उत्तर राम स्वयं देते हैं। - शूर्पणखा और खर-दूषण की सेनादोहा 17 से 19
पंचवटी में एक स्त्री आती है और दो भाइयों के बीच घूमकर रह जाती है। उसके नाक-कान कटते हैं, मानो उसके हाथ रावण को चुनौती भेजी गयी हो, और खर-दूषण की सेना चढ़ आती है। - खर, दूषण और त्रिशिरा का वधदोहा 20 से 22
चौदह हज़ार के सामने एक अकेली आकृति खड़ी है। जो सेना उसे मारने दौड़ती है वह उसी का नाम पुकारती हुई मरती है। - स्वर्ण-मृग और मारीचदोहा 23 से 26
लक्ष्मण के वन जाते ही राम सीता से अग्नि में निवास करने को कहते हैं। सीता अपना प्रतिबिंब वहाँ रखकर अग्नि में समा जाती हैं। उधर समुद्र के तट पर मारीच मन ही मन राम के हाथों मरना चुनता है। - सीता-हरण और जटायुदोहा 27 से 29 (क)
वन सूना होते ही द्वार पर एक यति आ खड़ा होता है। जो आकाश-मार्ग से उठा ले जाया जाता है उसके पीछे एक बूढ़ा पक्षी अकेला उड़ता है। - राम का विलाप और जटायु का गमनदोहा 29 (ख) से 32
गोदावरी के तट पर आश्रम सूना मिलता है। राम लताओं, पेड़ों, पक्षियों और पशुओं से सीता का पता पूछते चलते हैं। आगे रास्ते में घायल जटायु बताता है कि रावण सीता को लेकर दक्षिण दिशा को गया है। - कबन्ध, शबरी और नवधा भक्तिदोहा 33 से 35
जटायु की क्रिया कर चुकने के बाद दोनों भाई आगे बढ़ते हैं। रास्ते में एक शाप कटता है, और फिर एक वन के आश्रम में नवधा भक्ति के वे नौ अंग कहे जाते हैं। - वियोग और तीन प्रबल शत्रुदोहा 36 से 40
राम आगे चल पड़े हैं, और वन के जोड़े मानो उनकी निन्दा करते हैं। फिर वे स्वयं लक्ष्मण को काम, क्रोध और लोभ, इन तीन प्रबल शत्रुओं की बात बताते हैं। - नारद-संवाद और काण्ड का समापनदोहा 41 से 46
एक तालाब के किनारे की छाया, हाथ में वीणा लिये आया हुआ एक मुनि। विवाह से रोके जाने का वह पुराना प्रश्न, और उसका उत्तर। और संतों के लक्षण, जिनके बाद तीसरा सोपान पूरा होता है।
यह तुलसी का राम-चरित है, वाल्मीकि का नहीं
इस स्थल पर वाल्मीकि रामायण अलग से पूरी पढ़ी जा सकती है, और दोनों को एक मान लेना ठीक नहीं होगा। तुलसीदास सोलहवीं शताब्दी में अवधी में लिख रहे थे, वाल्मीकि उनसे बहुत पहले संस्कृत में। कई प्रसंग दोनों में हैं, पर उनका रंग, क्रम और कभी-कभी ब्योरा भी अलग है। जो यहाँ कहा गया है, वह मानस का कहा हुआ है।
आधार: श्रीरामचरितमानस, तृतीय सोपान (अरण्यकाण्ड), गीता प्रेस संस्करण, हनुमानप्रसाद पोद्दार की टीका के साथ पढ़ा गया।