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जयन्त का अपराध, अत्रि का आश्रम और अनसूया का उपदेश

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रामचरितमानसअरण्यकाण्डप्रसंग 1

कौए का वेष धरकर जयन्त सीता के चरण पर चोंच मारकर भागता है। अपने रूप में वह सब लोकों में भटकता है, और अन्त में राम के चरण पकड़कर बचता है।

रामचरितमानस का तीसरा सोपान गणेश को नमस्कार और शिव की वन्दना से खुलता है। फिर सीता और लक्ष्मण के साथ मार्ग में चलते राम का भजन है। फिर पार्वती से कहा जाता है कि राम के गुण गूढ़ हैं। पण्डित उनसे वैराग्य पाते हैं, और मूढ़ मोह में पड़ते हैं।

वक्ता पुरवासियों और भरत के प्रेम से मुड़कर वन के चरित्रों पर आते हैं। एक बार स्फटिक शिला पर बैठे राम अपने हाथों से बनाये फूलों के गहने सीता को पहनाते हैं, और एक कौआ सीता के चरण पर चोंच मारता है। आगे अत्रि दौड़कर राम से मिलते हैं और उनकी स्तुति करते हैं, और अनसूया सीता को पास बैठाकर, बहाने से, नारीधर्म की कुछ बातें कहती हैं।

मानस कौए की कथा यहीं, कथा के क्रम में कहता है। वाल्मीकि की रामायण में यह कथा बाद में आती है, लंका में हनुमान से कही गयी सीता की स्मृति बनकर।

कौआ, मुनि और ऋषिपत्नी

  • राम जो इस प्रसंग में अपने हाथों से फूलों के गहने बनाते हैं। फिर वे धनुष पर सींक का बाण चढ़ाते हैं, और शरण आये जयन्त को एक आँख का काना करके छोड़ देते हैं।
  • सीता जिनके चरण पर कौए की चोंच पड़ती है। अत्रि के आश्रम में वे अनसूया के चरण पकड़कर मिलती हैं, दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनती हैं, और उपदेश सुनकर उनके चरणों में सिर नवाती हैं।
  • लक्ष्मण जो राम और सीता के साथ मार्ग में चलते हैं, और अत्रि के आश्रम में साथ पहुँचते हैं।
  • जयन्त इन्द्र का पुत्र, जो कौए का वेष धरकर राम का बल देखना चाहता है। वह ब्रह्मलोक, शिवलोक और सब लोक घूमकर अन्त में राम की शरण आता है।
  • इन्द्र देवताओं के राजा और जयन्त के पिता, जो राम से विमुख पुत्र को अपने पास नहीं रखते।
  • नारद जिन्हें व्याकुल जयन्त पर दया आ जाती है, और जो उसे तुरन्त राम के पास भेज देते हैं।
  • अत्रि वे महामुनि जो राम के आने की ख़बर सुनते ही पुलकित होकर दौड़ पड़ते हैं। स्तुति में वे चरणों की भक्ति माँगते हैं, और फिर यह कि उनकी बुद्धि राम के चरण कभी न छोड़े।
  • अनसूया अत्रि की पत्नी, जो सीता को आशिष देकर पास बैठाती हैं और नित्य नये दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाती हैं। फिर उन्हीं के बहाने वे नारीधर्म की कुछ बातें कहती हैं, और कहती हैं कि यह कथा संसार के हित के लिये कही गयी है।
  • पार्वती जिन्हें शिव यह कथा सुना रहे हैं। आरम्भ में उन्हें सम्बोधित किया जाता है, और फिर वहाँ, जहाँ जयन्त छोड़ा जाता है।
  • गरुड़ जिन्हें बीच में सम्बोधित किया जाता है। पोद्दार की टीका इस वचन को काकभुशुण्डि का मानती है।
  • दुर्वासा वे ऋषि जिनका चक्र से भय जयन्त के त्रास की उपमा है।

पार्वती, ये गुण गूढ़ हैं

गणेश को नमस्कार और सीता के स्वामी राम की जय के साथ तीसरा सोपान आरम्भ होता है।

पहले शिव की वन्दना है: धर्म के वृक्ष की जड़, विवेक के समुद्र को आनन्द देनेवाले पूर्णचन्द्र, वैराग्य के कमल के सूर्य। वे पाप के घोर अन्धकार और ताप को हरनेवाले, ब्रह्मा के वंशज, कलंक मिटानेवाले और राजा राम के प्रिय हैं। मोह के बादलों के समूह को छिन्न-भिन्न करने में वे आकाश से उत्पन्न हैं। टीका इन्हें पवन का रूप बताती है। फिर राम का भजन है: मेघ जैसा सुन्दर और आनन्दघन शरीर, पीला वस्त्र, हाथों में धनुष-बाण, कमर पर तरकस, कमल जैसे बड़े नेत्र, मस्तक पर जटाजूट। वे सीता तथा लक्ष्मण के साथ मार्ग में चल रहे हैं, और आनन्द देनेवाले हैं। टीका उनके पीले वस्त्र को वल्कल का बताती है।

शिव पार्वती से कहते हैं कि राम के गुण गूढ़ हैं। पण्डित और मुनि उनसे वैराग्य पाते हैं। जो भगवान् से विमुख हैं और जिनका धर्म में प्रेम नहीं, वे मूढ़ मोह को पाते हैं।

फिर वक्ता कहते हैं, “पुरवासियों का और भरत का अनुपम और सुन्दर प्रेम मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार गाया। अब प्रभु के वे अत्यन्त पवित्र चरित्र सुनिये जो वे वन में करते हैं, और जो देवता, मनुष्य और मुनियों के मन को भाते हैं।”

फूलों के गहने और स्फटिक शिला

एक बार राम ने सुन्दर फूल चुनकर अपने हाथों से गहने बनाये, और सुन्दर स्फटिक शिला पर बैठकर आदर के साथ सीता को पहनाये।

इन्द्र का मूर्ख पुत्र कौए का वेष धरकर राम का बल देखना चाहता है, जैसे कोई महामन्दबुद्धि चींटी समुद्र की थाह पाना चाहे।

वह मूढ़ और मन्दबुद्धि, जो किसी प्रयोजन से कौआ बना था, सीता के चरण में चोंच मारकर भाग गया। जब रक्त बह चला, तब राम ने जाना, और धनुष पर सींक का बाण चढ़ाया। टीका प्रयोजन बताती है, राम के बल की परीक्षा।

अत्यन्त कृपालु से छल

राम अत्यन्त कृपालु हैं और दीनों पर सदा उनका प्रेम रहता है। उन्हीं से आकर उस अवगुणों के घर मूर्ख ने छल किया।

सब लोक, और बैठने तक को जगह नहीं

मन्त्र से प्रेरित होकर ब्रह्मबाण दौड़ा, और कौआ भयभीत होकर भाग चला। वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्र के पास पहुँचा, पर इन्द्र ने राम से विमुख उस पुत्र को नहीं रखा।

तब वह निराश हुआ और उसके मन में त्रास उपजा, वैसा ही जैसा दुर्वासा ऋषि को चक्र से हुआ था। फिर वह ब्रह्मलोक गया, शिवलोक गया, सब लोकों में घूमा, और थका हुआ, भय और शोक से व्याकुल होकर भागता फिरा।

किसी ने उससे बैठने तक को नहीं कहा। राम के द्रोही को कौन रख सकता है? पोद्दार की टीका के अनुसार इसके बाद काकभुशुण्डि गरुड़ को सम्बोधित करते हैं। वे कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति के लिये माता मृत्यु के समान हो जाती है, पिता यमराज के समान, और अमृत विष।

मित्र सैकड़ों शत्रुओं जैसी करनी करने लगता है। देवनदी गङ्गा उसके लिये वैतरणी हो जाती है। जो राम से विमुख हो, सारा जगत् उसके लिये आग से भी अधिक जलानेवाला हो जाता है।

दया कहीं से आ जाती है

नारद ने जयन्त को व्याकुल देखा और उन्हें दया आ गयी। संतों का चित्त बड़ा कोमल होता है।

नारद ने उसे तुरन्त राम के पास भेज दिया। उसने पुकारकर कहा, “हे शरणागत के हितकारी, मेरी रक्षा कीजिये।” फिर आतुर और भयभीत होकर उसने राम के चरण पकड़ लिये और कहा, “रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये, हे दयालु राम। आपका अतुलित बल और अतुलित सामर्थ्य मैं मन्दबुद्धि जान नहीं पाया था।”

जयन्त कहता है, “अपने किये कर्म का फल मैंने पा लिया। अब हे प्रभु, मेरी रक्षा कीजिये, मैं शरण तककर आया हूँ।” शिव पार्वती से कहते हैं कि कृपालु राम ने उसकी अत्यन्त आर्त्त वाणी सुनी और उसे एक आँख का काना करके छोड़ दिया।

उसने मोहवश द्रोह किया था, और यद्यपि उसका वध ही उचित था, पर राम ने कृपा करके उसे छोड़ दिया। उनके समान कृपालु और कौन होगा।

चित्रकूट पीछे छूट जाता है

चित्रकूट में बसकर राम ने बहुत से चरित्र किये, जो कानों को अमृत जैसे लगते हैं। फिर राम ने मन में ऐसा अनुमान किया, “भीड़ होगी। मुझे सब लोग जान गये हैं।”

सब मुनियों से विदा लेकर सीता के साथ दोनों भाई चले। जब राम अत्रि के आश्रम में पहुँचे, तो उनका आना सुनते ही महामुनि हर्षित हो गये।

अत्रि का शरीर पुलकित हो गया और वे उठकर दौड़े। उन्हें आते देखकर राम और भी जल्दी चले आये। राम दण्डवत् कर ही रहे थे कि मुनि ने उन्हें हृदय से लगा लिया, और प्रेम के आँसुओं से दोनों को नहला दिया। टीका इन दोनों को दोनों भाई बताती है। राम की छबि देखकर मुनि के नेत्र शीतल हुए, और वे उन्हें आदर से अपने आश्रम में ले आये। वहाँ पूजन करके, सुन्दर वचन कहकर, उन्होंने मूल और फल दिये, जो राम के मन को भाये।

अत्रि की स्तुति

राम आसन पर बैठ चुके हैं।

नेत्र भरकर राम की शोभा देखकर परम प्रवीण मुनिश्रेष्ठ हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे।

स्तुति में अत्रि राम को भक्तों पर स्नेह करनेवाले, कृपालु और कोमल स्वभाववाले कहकर नमस्कार करते हैं, और निष्काम लोगों को अपना धाम देनेवाले उनके चरणकमलों को भजते हैं। वे उनके साँवले रूप, कमल जैसे नेत्रों, लम्बी भुजाओं और धनुष-बाण का गुण गाते हैं: वे तीनों लोकों के स्वामी हैं, सूर्यवंश के भूषण, शिव के धनुष को तोड़नेवाले। वे मुनियों और संतों को आनन्द देनेवाले हैं, और देवताओं के शत्रु असुरों का नाश करनेवाले।

वे कहते हैं कि कामदेव के शत्रु उनकी वन्दना करते हैं, जिन्हें टीका शिव बताती है, और ब्रह्मा आदि देवता सेवा करते हैं। वे लक्ष्मी के पति को नमस्कार करते हैं, और उन्हें अपनी शक्ति और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ भजते हैं। टीका इस शक्ति को सीता बताती है। वे उन्हें इन्द्र का प्रिय छोटा भाई भी कहते हैं। पोद्दार की टीका उसे वामन के रूप में स्पष्ट करती है। जो डाह छोड़कर इन चरणों की सेवा करते हैं, वे सन्देहों की लहरों से भरे संसार-समुद्र में नहीं गिरते। जो एकान्तवासी इन्द्रियों को विषयों से हटाकर मुक्ति के लिये भजते हैं, वे अपने स्वरूप को पाते हैं।

फिर वे गिनाते हैं कि राम एक, अद्भुत, इच्छारहित, व्यापक, जगद्गुरु और सनातन हैं, तुरीय, जिसे टीका तीनों गुणों से परे बताती है। जो भाव के प्रिय, कुयोगियों के लिये दुर्लभ, भक्तों के लिये कल्पवृक्ष और पक्षपात से रहित हैं, उन्हें वे भजते हैं।

फिर अत्रि अनुपम रूपवाले, पृथ्वी के स्वामी और सीता के स्वामी राम को प्रणाम करते हैं और कहते हैं, “प्रसन्न होइये, मुझे अपने चरणकमलों की भक्ति दीजिये।” वे कहते हैं कि जो इस स्तुति को आदर से पढ़ते हैं, वे भक्ति पाकर राम का परमपद पाते हैं, इसमें सन्देह नहीं।

फिर सिर नवाकर और हाथ जोड़कर अत्रि कहते हैं, “हे नाथ, मेरी बुद्धि आपके चरणकमलों को कभी न छोड़े।”

अनसूया सीता को पास बैठाती हैं

शीलवती और विनम्र सीता ने अत्रि की पत्नी अनसूया के चरण पकड़कर उनसे भेंट की। ऋषिपत्नी के मन में बड़ा सुख हुआ। उन्होंने आशिष देकर सीता को अपने पास बैठा लिया, और ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाये जो नित्य नये, निर्मल और सुहावने बने रहते हैं।

ऋषिपत्नी मधुर और कोमल वाणी से, बहाने से, स्त्रियों के कुछ धर्म बखानने लगती हैं।

अनसूया कहती हैं कि हे राजकुमारी, माता, पिता और भाई सब हित करनेवाले हैं, और सब एक सीमा तक देते हैं। हे सीता, पति असीम देनेवाला है, और जो स्त्री ऐसे पति की सेवा नहीं करती वह अधम है।

वे कहती हैं कि धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री, इन चारों की परीक्षा विपत्ति के समय होती है। पति वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अन्धा, बहरा, क्रोधी या अत्यन्त दीन भी हो सकता है।

वे कहती हैं कि ऐसे पति का भी अपमान करने से स्त्री यमपुर में भाँति-भाँति के दुःख पाती है। शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम, यही स्त्री का एक धर्म, एक व्रत और एक नियम है।

फिर वे कहती हैं कि जगत् में चार प्रकार की पतिव्रताएँ हैं। वेद, पुराण और संत सब ऐसा कहते हैं।

उनके अनुसार उत्तम पतिव्रता के मन में यह बसा रहता है कि जगत् में दूसरा पुरुष स्वप्न में भी नहीं है। मध्यम पराये पुरुष को अपने सगे भाई, पिता या पुत्र की तरह देखती है। जो धर्म विचारकर और कुल की मर्यादा समझकर बची रहती है, उसे वेद निकृष्ट कहते हैं। और जो अवसर न मिलने से या भय से पतिव्रता बनी रहती है, उसे जगत् में अधम जानना चाहिये।

फिर वे कहती हैं कि पति को धोखा देकर पराये पुरुष से रति करनेवाली सौ कल्प तक रौरव नरक में पड़ी रहती है। क्षण भर के सुख के लिये सौ करोड़ जन्मों के दुःख को न समझनेवाली के समान दुष्टा कौन होगी? जो स्त्री छल छोड़कर पातिव्रत धर्म अपनाती है, वह बिना परिश्रम परम गति पाती है। और पति के प्रतिकूल चलनेवाली जहाँ भी जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर विधवा हो जाती है।

अनसूया कहती हैं कि स्त्री जन्म से ही अपवित्र है, किन्तु पति की सेवा करके अनायास शुभ गति पा लेती है। आज भी तुलसी का पौधा भगवान् को प्रिय है और चारों वेद उसका यश गाते हैं।

फिर वे कहती हैं, “हे सीता, सुनिये। आपका नाम स्मरण करके स्त्रियाँ पातिव्रत धर्म निभाती हैं। आपको राम प्राणों के समान प्रिय हैं। यह कथा मैंने संसार के हित के लिये कही है।”

विदा, और कलिकाल

सीता ने सुनकर परम सुख पाया और आदर से अनसूया के चरणों में सिर नवाया।

तब राम ने मुनि से कहा, “आज्ञा हो तो दूसरे वन में जाऊँ। मुझ पर निरन्तर कृपा करते रहियेगा, और अपना सेवक जानकर स्नेह न छोड़ियेगा।”

धर्मधुरन्धर राम के वचन सुनकर ज्ञानी मुनि प्रेम से बोले। “ब्रह्मा, शिव और सनकादि, सब परमार्थवादी जिनकी कृपा चाहते हैं, हे राम, आप वही हैं। आप निष्काम लोगों के प्रिय और दीनों के बन्धु हैं, और ऐसे कोमल वचन बोल रहे हैं। अब मैंने लक्ष्मी की चतुराई समझी, जिन्होंने सब देवताओं को छोड़कर आपको भजा। जिसके समान बड़ा कोई नहीं, उसका शील ऐसा क्यों न हो? मैं किस प्रकार कहूँ कि हे स्वामी, अब जाइये? हे नाथ, आप अन्तर्यामी हैं, आप कहिये।”

ऐसा कहकर धीर मुनि राम को देखते रह जाते हैं। नेत्रों से जल बह रहा है और शरीर पुलकित है। प्रेम से भरे वे अपने नेत्र राम के मुख पर लगाये रहते हैं। “मैंने ऐसे कौन से जप और तप किये थे कि मन, ज्ञान, गुण और इन्द्रियों से परे प्रभु के दर्शन हो गये?” पोद्दार की टीका इसे मुनि के मन का विचार बताती है। जप, योग और धर्म के समूह से मनुष्य अनुपम भक्ति पाता है। दास तुलसी राम के पवित्र चरित्र को रात-दिन गाते हैं।

राम का सुन्दर यश कलियुग के मैल का नाश करनेवाला, मन का दमन करनेवाला और सुख का मूल है। जो इसे आदर से सुनते हैं, उन पर राम प्रसन्न रहते हैं।

कठिन कलिकाल मैल का खज़ाना है। इसमें न धर्म है, न ज्ञान, न योग, न जप। जो सब भरोसे छोड़कर राम को भजते हैं, वे चतुर हैं।

कौए का छुटकारा, और अत्रि से विदा की माँग

जयन्त सब लोकों में भटका, और किसी ने उससे बैठने को नहीं कहा। राम के चरणों में उसे एक आँख का काना करके छोड़ दिया गया। राम चित्रकूट से चले, और अत्रि उठकर दौड़े और उन्हें अपने आश्रम में ले आये। मुनि ने स्तुति करके राम के चरणों की भक्ति माँगी, और फिर यह कि उनकी बुद्धि उन चरणों को कभी न छोड़े। अनसूया ने बहाने से, संसार के हित के लिये, नारीधर्म की कुछ बातें कहीं। जब राम ने दूसरे वन में जाने की आज्ञा माँगी, तो मुनि ने पूछा कि वे किस प्रकार कहें कि जाइये।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, आरम्भ के श्लोक और सोरठा, और दोहा 1 से सोरठा 6 (ख), और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।