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जयन्त का अपराध, अत्रि का आश्रम और अनसूया का उपदेश

रामचरितमानस · अरण्यकाण्ड · जयन्त का अपराध, अत्रि का आश्रम और अनसूया का उपदेश

जयन्त का अपराध, अत्रि का आश्रम और अनसूया का उपदेश

एक कौआ सीता के चरण पर चोंच मारकर भागता है, तीनों लोक नाप आता है, और अन्त में उन्हीं चरणों में गिरकर बचता है जिन पर उसने चोट की थी।

रामचरितमानस का तीसरा सोपान यहाँ से खुलता है, और तुलसी इसे किसी घटना से नहीं खोलते। वे पहले दो संस्कृत श्लोक रखते हैं, और दोनों को साथ रखकर पढ़ने पर एक बात अपने आप खुल जाती है। पहले श्लोक में, जो शंकरजी की वन्दना है, लगभग सब कुछ रूपक है: वृक्ष, समुद्र, कमल, अन्धकार, बादलों का समूह। दूसरे श्लोक में एक भी रूपक नहीं है। वहाँ केवल एक व्यक्ति है और उसका हुलिया है, वस्त्र, धनुष, तरकस, नेत्र, जटाजूट, और साथ चलते हुए दो और लोग। जिस काण्ड में आगे वन, आश्रम, मुनि और असुर आयेंगे, वह इसी उतार से शुरू होता है, विचार से चित्र की ओर।

और उस दूसरे श्लोक में अन्तिम सम्बोधन से ठीक पहले एक शब्द आता है जिस पर ध्यान जाना चाहिये: पथिगत, यानी रास्ते में चलते हुए। यही इस काण्ड का स्वर है। यहाँ कोई सिंहासन नहीं है, कोई नगर नहीं, कोई सभा नहीं। तीन लोग एक रास्ते पर चल रहे हैं, और रास्ते में जो मिलता जाता है वही कथा बनती जाती है। इस पन्ने पर उन्हें तीन चीज़ें मिलती हैं। पहली, एक कौआ, जो सचमुच कौआ नहीं है। दूसरी, एक मुनि का आश्रम, जिसका स्वामी उनका आना सुनते ही दौड़ पड़ता है। और तीसरी, उसी आश्रम की गृहिणी, जो सीताजी को अपने पास बैठाकर वह कहती हैं जो इस पूरे काण्ड का सबसे लम्बा उपदेश है।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और इस पन्ने पर उतना ही है जितना इन चौपाइयों में है। दोहा एक से दोहा छः तक। जहाँ तुलसी नाम नहीं लेते वहाँ हम नाम नहीं जोड़ेंगे, और जो वे नहीं कहते उसे किसी दूसरी रामकथा से उठाकर यहाँ नहीं रखेंगे।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • राम जो इस प्रसंग में अपने हाथों से फूलों के गहने बनाते हैं, फिर सरकंडे का बाण चढ़ाते हैं, और उसी बाण को एक आँख पर रोक देते हैं।
  • सीता जिनके चरण पर चोट पड़ती है, जिन्हें दिव्य वस्त्र मिलते हैं, जिन्हें उपदेश मिलता है, और जो इस पूरे पन्ने पर एक शब्द नहीं बोलतीं।
  • लक्ष्मण जिनका नाम इस पन्ने पर केवल आरम्भ के संस्कृत श्लोक में आता है, और आगे चौपाइयों में वे केवल दोनों भाइयों का आधा भाग हैं।
  • जयन्त देवराज इन्द्र का पुत्र, जो कौए का वेष धरकर बल की परीक्षा लेने आता है और तीनों लोक घूमकर वहीं लौटता है जहाँ से भागा था।
  • इन्द्र सुरपति, जो अपने ही बेटे को अपने घर में जगह नहीं देते।
  • नारद जिन्हें व्याकुल जयन्त पर दया आ जाती है, और जो उसे सीधे उसी दरवाज़े पर भेज देते हैं जिससे वह भाग रहा था।
  • अत्रि वे महामुनि जो आगमन की ख़बर सुनते ही पुलकित होकर दौड़ पड़ते हैं, और बारह छन्दों की स्तुति के अन्त में केवल एक वस्तु माँगते हैं।
  • अनसूया अत्रि की पत्नी, जो सीताजी को नित्य नये दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाकर, उन्हीं के बहाने, संसार को नारीधर्म सुनाती हैं।
  • उमा पार्वती, जिन्हें शिवजी यह पूरी कथा सुना रहे हैं, और जिनसे पहला ही सोरठा कहा जाता है।
  • गरुड़ हरिजान, जिन्हें बीच में एक और वक्ता सम्बोधित कर उठता है, जिससे पता चलता है कि यह कथा कई मुँह से होकर हम तक आ रही है।
  • दुर्वासा वे ऋषि जिनका नाम यहाँ केवल एक उपमा में आता है, चक्र के भय के साथ।

उमा, ये गुण गूढ़ हैं

गणेशजी को नमस्कार करके, और जानकीवल्लभ की जय बोलकर, तीसरा सोपान आरम्भ होता है। पहली दो पंक्तियाँ संस्कृत की हैं और उन्हीं से यह पूरा काण्ड खुलता है।

मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्। मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं वन्दे ब्रह्मकुलं कलङ्कशमनं श्रीरामभूपप्रियम्॥ १॥
सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम्। राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे॥ २॥

श्लोक १ और २

पहले श्लोक का अर्थ यह है: धर्मरूपी वृक्ष के मूल, विवेकरूपी समुद्र को आनन्द देनेवाले पूर्णचन्द्र, वैराग्यरूपी कमल के सूर्य, पापरूपी घोर अन्धकार को निश्चय ही मिटानेवाले, तीनों तापों को हरनेवाले, मोहरूपी बादलों के समूह को छिन्न-भिन्न करने की क्रिया में आकाश से उत्पन्न पवनस्वरूप, ब्रह्माजी के वंशज तथा कलङ्क के नाशक, महाराज रामचन्द्रजी के प्रिय श्रीशङ्करजी की मैं वन्दना करता हूँ। और दूसरे का: जिनका शरीर जल भरे मेघों के समान साँवला और आनन्दघन है, जो वल्कल का सुन्दर पीत वस्त्र धारण किये हैं, जिनके हाथों में बाण और धनुष हैं, कमर उत्तम तरकस के भार से सुशोभित है, कमल के समान विशाल नेत्र हैं और मस्तक पर जटाजूट है, उन सीताजी तथा लक्ष्मणजी सहित मार्ग में चलते हुए अत्यन्त शोभायमान रामचन्द्रजी को मैं भजता हूँ।

दोनों श्लोकों में क्रियापद दो हैं और वे अलग-अलग हैं। शंकरजी के लिये वन्दे, यानी वन्दना करता हूँ। राम के लिये भजे, यानी भजता हूँ। और जिस राम का भजन किया जा रहा है वे कहीं बैठे हुए नहीं हैं। वे चल रहे हैं, और उनके पीछे-आगे दो लोग और हैं। पूरे काण्ड में यही तीन आगे बढ़ते रहेंगे, और जो भी मिलेगा रास्ते में मिलेगा।

इसके तुरन्त बाद तुलसी जो पहली बात कहते हैं वह कथा नहीं है, चेतावनी है। और वह चेतावनी शिवजी के मुँह से पार्वती के लिये निकलती है, इसलिये उसे टाला भी नहीं जा सकता। साधारण नियम यह माना जाता है कि अच्छी कथा सबका भला करती है। यहाँ ठीक उलटी बात रख दी जाती है।

उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति।
पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति॥

सोरठा

हे उमा, रामजी के गुण गूढ़ हैं। पण्डित और मुनि उन्हें समझकर वैराग्य पा जाते हैं, और जो भगवान् से विमुख हैं तथा जिनका धर्म में प्रेम नहीं है, वे उन्हीं गुणों को सुनकर मोह को प्राप्त होते हैं। एक ही कथा, और दो बिलकुल उलटे फल। गूढ़ यहाँ कठिन के अर्थ में नहीं है, ढके हुए के अर्थ में है। जो ढका हुआ है वह सबके सामने पड़ा है, पर खुलता उसी पर है जो खोलने की पात्रता साथ लेकर आया हो। इसलिये इस काण्ड को पढ़ते हुए जहाँ-जहाँ पाँव ठिठकें, वहाँ यह याद रखना काम आता है कि ठिठकन की सूचना पहले ही दे दी गयी थी।

इसके बाद वे पीछे मुड़कर देखते हैं, और फिर आगे का वादा करते हैं। यह उनकी पुरानी आदत है: हर सोपान के आरम्भ में पिछले सोपान का सिरा पकड़कर नये में जोड़ देना, ताकि कथा कहीं से टूटी हुई न लगे। पहली ही चौपाई में वे कहते हैं कि पुरवासियों का और भरतजी का अनुपम तथा सुन्दर प्रेम मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार गा लिया। अब प्रभु के वे अत्यन्त पवित्र चरित्र सुनिये जिन्हें वे वन में कर रहे हैं, और जो देवता, मनुष्य तथा मुनि, तीनों के मन को भाते हैं। वादे पर ध्यान दीजिये। न युद्ध का वादा है, न राज्य का, न किसी बड़ी घटना का। वादा केवल चरित्र का है, और चरित्र का ठिकाना वन बताया गया है। अयोध्या में जो कुछ हुआ था वह सब महल, सभा और नगर के भीतर हुआ था। अब जो होगा वह पेड़ों के नीचे होगा, और उसका पहला दृश्य इतना छोटा है कि उसे कथा कहने में भी संकोच होता है।

सार: तीसरा सोपान दो संस्कृत श्लोकों से खुलता है, शंकर की वन्दना और रास्ते पर चलते हुए राम का चित्र। फिर शिवजी पार्वती से कहते हैं कि रामजी के गुण गूढ़ हैं, वही गुण पण्डित और मुनि को वैराग्य देते हैं और विमुख को मोह। इसके बाद तुलसी भरत तथा पुरवासियों के प्रेम का गान समाप्त मानकर वन के चरित्रों का वादा करते हैं।

फूलों के गहने और स्फटिक शिला

पहला चरित्र इतना घरेलू है कि पहली बार पढ़ने पर उसका बड़प्पन हाथ से निकल जाता है। इसमें कोई शत्रु नहीं है, कोई सङ्कट नहीं है, कोई माँग नहीं है। केवल एक दिन है, कुछ फूल हैं, एक पत्थर है, और दो लोग हैं।

एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए॥
सीतहि पहिराए प्रभु सादर । बैठे फटिक सिला पर सुंदर॥

चौपाई १

एक बार सुन्दर फूल चुनकर रामजी ने अपने हाथों से भाँति-भाँति के गहने बनाये, और सुन्दर स्फटिक शिला पर बैठे हुए प्रभु ने आदर के साथ वे गहने सीताजी को पहनाये। इन दो अर्धालियों में तीन शब्द ऐसे हैं जिन पर रुकना चाहिये। पहला है चुनि। फूल तोड़े नहीं गये, चुने गये, और चुनने में समय लगता है तथा पसन्द लगती है। दूसरा है निज कर, यानी अपने हाथ से। किसी सखी ने नहीं बनाये, किसी सेवक ने नहीं। और तीसरा है सादर

तीसरा शब्द ही सबसे बड़ा है। पति पत्नी को गहना पहनाता है तो उसमें प्रेम रहता है, अधिकार रहता है, कभी-कभी दिखावा भी रहता है। आदर बहुत कम रहता है। तुलसी ने यहाँ ठीक वही शब्द रखा है जो साधारणतः बड़ों के लिये बचाकर रखा जाता है। जिनके आगे तीनों लोक झुकते हैं, वे वनवास की एक शिला पर बैठकर, फूलों के गहने बनाकर, आदर के साथ पहना रहे हैं। और यह सारा दृश्य दो पंक्तियों में निपटा दिया जाता है, क्योंकि आगे जो होनेवाला है उसका पूरा भार इसी कोमलता पर टिकना है।

इन चौपाइयों में यह नहीं बताया गया कि वह स्फटिक शिला कहाँ थी। स्थान का पता थोड़ी देर बाद चलता है, जब तुलसी कहते हैं कि रघुनाथजी चित्रकूट में बसकर अनेक चरित्र करते रहे। यानी यह सब उसी बसेरे का एक दिन है। और उसी दिन ऊपर से किसी की दृष्टि इस शिला पर आ पड़ती है।

सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा॥
जिमि पिपीलिका सागर थाहा । महा मंदमति पावन चाहा॥

चौपाई २

देवराज इन्द्र का मूर्ख पुत्र कौए का रूप धरकर रघुनाथजी का बल देखना चाहता है, जैसे कोई महामन्दबुद्धि चींटी समुद्र की थाह पाना चाहती हो। तुलसी ने अपराधी का नाम अभी नहीं लिया है, केवल सुरपति सुत कहा है, और उसके साथ एक शब्द जोड़ दिया है, सठ। नाम आगे आयेगा, पहचान पहले आ गयी। और जो उपमा दी गयी है वह बहुत मारक है। चींटी के लिये थाह लेने का प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि वह उस जल में उतर ही नहीं सकती। उसका पूरा शरीर उस थाह के सामने कुछ नहीं है, इसलिये उसकी जिज्ञासा भी कुछ नहीं है। परीक्षा लेनेवाले का नाप परीक्षा शुरू होने से पहले ही बता दिया गया।

और फिर वह वही करता है जो कौआ करता है, यानी वह वहीं चोट करता है जहाँ सबसे कोमल जगह दिखायी देती है।

सीता चरन चोंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा॥
चला रुधिर रघुनायक जाना । सींक धनुष सायक संधाना॥

चौपाई ३

वह मूढ़ और मन्दबुद्धि, जो कारण से कौआ बना था, सीताजी के चरणों में चोंच मारकर भाग गया। जब रक्त बह चला, तब रघुनाथजी ने जाना, और धनुष पर सींक का बाण सन्धान किया। यहाँ दो शब्द ध्यान माँगते हैं। पहला कारन कागा है, यानी वह स्वभाव से कौआ नहीं था, किसी प्रयोजन से कौआ बना था, और वह प्रयोजन पिछली ही चौपाई में बता दिया गया है। दूसरा सींक है, सरकंडे की एक तीली। थोड़ी देर बाद इसी पन्ने पर एक मुनि इन्हीं को महादेवजी के धनुष का तोड़नेवाला कहकर स्तुति करेगा, और यहाँ उसी धनुर्धर की डोरी पर एक सरकंडा चढ़ रहा है। शस्त्र का चुनाव अपराध के नाप का है, अपराधी के पिता के पद का नहीं।

और एक बात, जो इस अर्धाली की सबसे मार्मिक है। राम ने कौए को आते नहीं देखा, चोंच मारते नहीं देखा। तुलसी लिखते हैं कि जब रक्त बह चला, तब जाना। जिस क्षण तक चोट केवल चोट थी, उस क्षण तक ध्यान वहाँ था ही नहीं। ध्यान तब गया जब लहू दिखा।

सार: फूल चुनकर राम अपने हाथों से गहने बनाते हैं और स्फटिक शिला पर बैठकर आदर के साथ सीताजी को पहनाते हैं। उसी समय इन्द्र का पुत्र कौए का वेष धरकर बल की परीक्षा लेने आता है, जिसे तुलसी समुद्र की थाह लेने चली चींटी कहते हैं। वह सीताजी के चरण में चोंच मारकर भागता है, और रक्त बहते देखकर राम धनुष पर सरकंडे का बाण चढ़ाते हैं।

दोहा एक, जिसमें अपराध तौला जाता है

अब तुलसी कथा को क्षण भर के लिये रोक देते हैं। बाण चढ़ चुका है, कौआ भाग रहा है, और ठीक उसी क्षण में वे एक दोहा रखकर पूरा हिसाब सामने रख देते हैं। इस दोहे में कोई घटना नहीं है। इसमें केवल दो पक्षों का परिचय है, और यहाँ परिचय ही निर्णय है।

अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह।
ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह॥ १॥

दोहा १

रघुनाथजी, जो अत्यन्त कृपालु हैं और जिनका दीनों पर सदा प्रेम रहता है, उन्हीं से आकर उस अवगुणों के घर मूर्ख ने छल किया। ध्यान दीजिये कि अपराध का नाम क्या रखा गया है। हिंसा नहीं, अपमान नहीं, विद्रोह नहीं। छलु। छल का अर्थ है कि वह सामने नहीं आया, वेष बदलकर आया। और जिसके साथ यह छल किया गया, उसका परिचय दो ही विशेषणों में बाँध दिया गया है: अत्यन्त कृपालु, और दीनों पर सदा स्नेह रखनेवाला। तुलसी यह नहीं कह रहे कि किसी बलवान् से पंगा लिया गया। वे कह रहे हैं कि जो सबसे नरम था, उसी को धोखे से छुआ गया।

और इसी दोहे में वह बात भी रखी है जो आगे की पूरी दौड़ का कारण बनेगी। जिसने छल किया उसे अवगुन गेह कहा गया है, अवगुणों का घर। घर शब्द पर रुकिये। अवगुण उसके पास नहीं हैं, अवगुण उसमें रहते हैं। और जो चीज़ किसी के भीतर रहती है वह उसके साथ-साथ चलती है। अगली चौपाइयों में वह उसके साथ-साथ तीनों लोकों तक जायगी, और हर दरवाज़े पर उससे पहले पहुँच जायगी।

तीनों लोक, और बैठने तक को जगह नहीं

मन्त्र से प्रेरित होकर ब्रह्मबाण दौड़ा, और कौआ भयभीत होकर भाग चला। यहाँ एक बात साफ़ कर लेनी चाहिये। छूटने के बाद उसे रोकने का प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि जो छूटा है वह ब्रह्मबाण है। भागते-भागते उसने अपना असली रूप धर लिया और सीधा पिता के पास पहुँचा। और वहीं इस कथा की पहली सचमुच डरावनी बात होती है। इन्द्र ने उसे रखा नहीं। कारण तुलसी आधी पंक्ति में लिख देते हैं: रामजी का विरोधी जानकर।

अपने घर से निकाला जाना और शत्रु के घर से निकाला जाना, दोनों एक बात नहीं हैं। देवराज का पद इतना बड़ा है कि वे चाहते तो बेटे को छिपा लेते। उन्होंने छिपाया नहीं। इसके बाद वह निराश हुआ और उसके मन में त्रास उत्पन्न हुआ, और उस त्रास को नापने के लिये तुलसी एक ही उपमा देते हैं: जैसे दुर्वासा ऋषि को चक्र से भय हुआ था। फिर वह ब्रह्मलोक गया, शिवपुर गया, समस्त लोकों में घूमा, और थका हुआ, भय तथा शोक से व्याकुल, भागता फिरा।

और इसके बाद जो पंक्ति आती है वह इस पूरे प्रसंग की सबसे सूनी पंक्ति है। किसी ने उसे बैठने तक को नहीं कहा। रखने की बात तो दूर रही, बैठने का शिष्टाचार भी किसी ने नहीं निभाया, क्योंकि रामजी के द्रोही को कौन रख सकता है। और यहीं कथा के भीतर एक दूसरा वक्ता बोल उठता है। चौपाई में सम्बोधन हरिजाना है, और इस संस्करण की टीका इसे काकभुशुण्डिजी का वचन मानती है, जो गरुड़जी से कह रहे हैं। जो बात कही जाती है वह यह है कि ऐसे मनुष्य के लिये माता मृत्यु के समान हो जाती है, पिता यमराज के समान, और अमृत विष हो जाता है।

यह सूची यहीं नहीं रुकती। अगली चौपाई उसे उसके अन्तिम छोर तक ले जाती है, और बीच में एक बार फिर सुननेवाले को पुकार लेती है।

मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी॥
सब जगु ताहि अनलहु ते ताता । जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता॥

चौपाई ४

मित्र सैकड़ों शत्रुओं जैसी करनी करने लगता है। देवनदी गङ्गा उसके लिये वैतरणी हो जाती है। हे भाई, सुनिये, जो रघुनाथजी से विमुख होता है, समस्त जगत् उसके लिये अग्नि से भी अधिक जलानेवाला हो जाता है। इस चौपाई में कहीं कोई दण्ड नहीं दिया जा रहा। यह नहीं लिखा कि माता को कठोर कर दिया गया, या गङ्गा को बदल दिया गया। माता वही है, गङ्गा वही है, मित्र वही है। बदला केवल देखनेवाला है, और उसके बदलते ही सब कुछ बदल गया। जो जगत् किसी के लिये शीतल है वही किसी के लिये आग है, और दोनों बातें एक ही समय में सच हैं।

सार: ब्रह्मबाण के पीछे पड़ते ही जयन्त अपना रूप धरकर पिता इन्द्र के पास जाता है, पर इन्द्र उसे रामविमुख जानकर नहीं रखते। वह ब्रह्मलोक, शिवपुर और सब लोकों में भागता फिरता है और कहीं उससे बैठने तक को नहीं कहा जाता। इसी बीच कथा का दूसरा वक्ता गरुड़जी से कहता है कि रामद्रोही के लिये माता मृत्यु, पिता यम, अमृत विष, मित्र शत्रु, गङ्गा वैतरणी और सारा जगत् आग हो जाता है।

दया कहीं से आ जाती है

अब इस कथा में वह आता है जिसका इस झगड़े से कोई लेना-देना नहीं है। नारदजी ने जयन्त को व्याकुल देखा और उन्हें दया आ गयी। तुलसी कारण भी साथ ही लिख देते हैं, क्योंकि संतों का चित्त बड़ा कोमल होता है। और यही पहली जगह है जहाँ इस पन्ने पर उसका नाम लिया जाता है। ध्यान दीजिये कि नाम किस क्षण मिला। जब तक वह छल कर रहा था तब तक वह सुरपति सुत था, सठ था, मूढ़ था, अवगुन गेह था। जिस क्षण किसी को उस पर दया आयी, उसी क्षण उसे नाम मिल गया।

नारदजी ने उसे समझाकर तुरन्त रामजी के ही पास भेज दिया। यह सलाह देखने में सीधी है और सोचने में असाधारण। जिससे बचने के लिये उसने तीनों लोक नाप डाले, उसी के पास जाने को कहा गया। और सच पूछिये तो यही एक जगह बची भी थी, क्योंकि बाक़ी सब दरवाज़े वह देख चुका था। उसने जाकर पुकारकर कहा, हे शरणागत के हितकारी, मेरी रक्षा कीजिये। फिर आतुर और भयभीत होकर उसने चरण पकड़ लिये, और वही वाक्य दोहराया जो ऐसे क्षणों में अपने आप निकलता है, त्राहि त्राहि। उसके बाद उसने वह स्वीकार किया जो इस पूरी दौड़ का सार है: आपका अतुलित बल और आपकी अतुलित प्रभुता, मैं मन्दबुद्धि जान नहीं पाया।

जिन चरणों पर उसने चोंच मारी थी, वही चरण उसने पकड़ रखे हैं। तुलसी इस पर एक शब्द टिप्पणी नहीं करते। वे सीधे अगली चौपाई पर चले जाते हैं, जिसमें निर्णय आ जाता है।

निज कृत कर्म जनित फल पायउँ । अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ॥
सुनि कृपाल अति आरत बानी । एकनयन करि तजा भवानी॥

चौपाई ५

अपने किये हुए कर्म से उत्पन्न फल मैंने पा लिया, अब हे प्रभु, मेरी रक्षा कीजिये, मैं शरण तककर आया हूँ। यह सुनाकर शिवजी पार्वती से कहते हैं कि कृपालु ने उसकी अत्यन्त आर्त्त वाणी सुनी और उसे एक आँख का काना करके छोड़ दिया। यहाँ तीन बातें एक साथ निभायी जा रही हैं। ब्रह्मबाण व्यर्थ नहीं जा सकता, इसलिये कुछ न कुछ लेना ही था। शरण में आया हुआ मारा नहीं जा सकता, इसलिये प्राण नहीं लिये जा सकते थे। बीच का रास्ता एक आँख है। और जिस वस्तु के लोभ में वह आया था, यानी देखने के, ठीक उसी के आधे हिस्से से उसे हाथ धोना पड़ा।

यह बात कहने में जितनी सधी हुई लगती है, चौपाई में उतनी ही तेज़ है। एकनयन करि तजा, इन चार शब्दों में दण्ड भी है और क्षमा भी, और दोनों को अलग करके दिखाया भी नहीं गया है। इसके बाद तुलसी स्वयं सामने आकर एक सोरठे में अपना निर्णय रख देते हैं।

कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित।
प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम॥ २॥

सोरठा २

उसने मोहवश द्रोह किया था, इसलिये यद्यपि उसका वध ही उचित था, पर प्रभु ने कृपा करके उसे छोड़ दिया। रघुवीर के समान कृपालु और कौन होगा। दो बातें साथ रखी गयी हैं और दोनों को सच माना गया है। वध उचित था, यह छिपाया नहीं गया। और वध हुआ नहीं, इसे कृपा कहा गया। तुलसी यह नहीं कहते कि अपराध छोटा था, और यह भी नहीं कहते कि दण्ड पूरा हुआ। वे एक प्रश्न छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं, और वह प्रश्न आगे पूरे काण्ड के ऊपर टँगा रहता है।

सार: नारदजी को व्याकुल जयन्त पर दया आती है और वे उसे सीधे रामजी के पास भेज देते हैं। वह चरण पकड़कर अपनी मन्दबुद्धि स्वीकार करता है और कहता है कि अपने कर्म का फल पा लिया। रामजी उसकी आर्त्त वाणी सुनकर उसे एक आँख का काना करके छोड़ देते हैं, और तुलसी सोरठे में कहते हैं कि वध उचित था फिर भी कृपा हुई।

चित्रकूट पीछे छूट जाता है

जयन्त का प्रसंग समाप्त होते ही तुलसी एक लम्बा समय दो पंक्तियों में लाँघ जाते हैं। चित्रकूट में बसकर रघुनाथजी ने बहुत से चरित्र किये, जो कानों को अमृत के समान लगते हैं। कितने दिन बीते, कौन से चरित्र हुए, यह कुछ नहीं बताया जाता। और फिर एक विचार आता है, जो इस पूरी रामकथा के सबसे शान्त विचारों में से है। रामजी ने मन में अनुमान किया कि अब मुझे सब लोग जान गये हैं, इसलिये यहाँ बड़ी भीड़ हो जायगी।

जिस कारण से वे चित्रकूट छोड़ रहे हैं वह न शत्रु है, न अभाव, न कोई आदेश। कारण यह है कि वहाँ लोग आने लगे हैं। भरतजी आकर लौट चुके हैं, नगर का रास्ता खुल चुका है, और अब वह वन वन नहीं रह गया। जो वनवास भीड़ में बदलने लगे वह वनवास नहीं रहता, इसलिये वे आगे बढ़ जाते हैं।

सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई । सीता सहित चले द्वौ भाई॥
अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ॥

चौपाई ६

सब मुनियों से विदा लेकर सीताजी सहित दोनों भाई चले। जब प्रभु अत्रिजी के आश्रम में गये, तो उनका आना सुनते ही महामुनि हर्षित हो गये। विदा किससे ली गयी, इस पर ध्यान दीजिये। चित्रकूट में केवल वे तीन नहीं थे, वहाँ मुनियों की एक पूरी बस्ती थी, और जाते समय सबसे कहकर जाया गया। जो चुपचाप निकल जाना चाहता है वह विदा नहीं लेता।

इसके बाद जो होता है वह इस पन्ने का सबसे तेज़ दृश्य है, और उसमें दौड़ दोनों ओर से है। अत्रिजी का शरीर पुलकित हो गया और वे उठकर दौड़े। उन्हें दौड़े आते देखकर रामजी और भी शीघ्रता से चले आये। दण्डवत् करते हुए ही मुनि ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया, और प्रेम के आँसुओं से दोनों भाइयों को नहला दिया। फिर उनकी छबि देखकर मुनि के नेत्र शीतल हुए, और वे उन्हें आदर के साथ अपने आश्रम में ले आये। वहाँ पूजन करके, सुन्दर वचन कहकर, उन्होंने मूल और फल दिये, जो प्रभु के मन को बहुत रुचे।

यहाँ एक छोटी-सी बात पर ध्यान जाना चाहिये। जो दण्डवत् कर रहा था वह भूमि तक पहुँच भी नहीं पाया। मुनि ने बीच में ही उठा लिया। मिलने में जो जल्दी दोनों ओर से दिखायी देती है, वही इस पूरे आश्रम-प्रसंग का स्वर तय कर देती है। यहाँ कोई किसी की प्रतीक्षा नहीं कर रहा। दोनों एक दूसरे की ओर दौड़ रहे हैं, और जो फल और मूल परोसे जाते हैं वे उसी दौड़ के बाद का शान्त हिस्सा हैं।

सार: चित्रकूट में अनेक चरित्र करने के बाद राम सोचते हैं कि अब सब लोग जान गये हैं और यहाँ भीड़ हो जायगी, इसलिये सब मुनियों से विदा लेकर तीनों आगे बढ़ते हैं। अत्रिजी के आश्रम पहुँचने पर मुनि पुलकित होकर दौड़ पड़ते हैं, दण्डवत् बीच में ही रोककर हृदय से लगा लेते हैं, आँसुओं से दोनों भाइयों को नहला देते हैं, और आश्रम में ले जाकर पूजन करके मूल और फल देते हैं।

बारह छन्दों की स्तुति

प्रभु आसन पर विराज चुके हैं। अब आश्रम में वह होता है जिसके लिये मुनि जीवन भर बैठे थे, और तुलसी उसे एक सोरठे में बाँध देते हैं।

प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि।
मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत॥ ३॥

सोरठा ३

नेत्र भरकर उनकी शोभा देखकर परम प्रवीण मुनिश्रेष्ठ हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे। इसके बाद बारह छन्द आते हैं, और वे संस्कृत में हैं। यह अपने आप में एक सूचना है। अवधी की बहती हुई धारा में तुलसी अचानक संस्कृत ले आते हैं, क्योंकि बोलनेवाला कौन है, यह भाषा से ही बता देना है। जो मुनि अभी दौड़कर गले लगा था, वह अब अपने घर की भाषा में खड़ा है।

स्तुति सम्बोधन से खुलती है। हे भक्तवत्सल, हे कृपालु, हे कोमल स्वभाववाले, मैं आपको नमस्कार करता हूँ, और निष्काम पुरुषों को अपना परमधाम देनेवाले आपके चरणकमलों को भजता हूँ। इसके बाद रूप आता है। आप नितान्त सुन्दर श्याम हैं, संसाररूपी समुद्र को मथने के लिये मन्दराचल हैं, आपके नेत्र खिले हुए कमल के समान हैं, और आप मद आदि दोषों से छुड़ानेवाले हैं। फिर पराक्रम आता है। आपकी लम्बी भुजाओं का पराक्रम और आपका ऐश्वर्य बुद्धि की पकड़ से परे है। आप तरकस तथा धनुष-बाण धारण करनेवाले तीनों लोकों के स्वामी हैं, सूर्यवंश के भूषण हैं, महादेवजी के धनुष को तोड़नेवाले हैं, मुनिराजों और संतों को आनन्द देनेवाले हैं, तथा देवताओं के शत्रुओं के समूह का नाश करनेवाले हैं।

आगे के छन्दों में स्तुति भीतर की ओर मुड़ती जाती है। आप कामदेव के शत्रु महादेवजी के द्वारा वन्दित हैं, ब्रह्मा आदि देवताओं से सेवित हैं, विशुद्ध ज्ञानमय विग्रह हैं, और समस्त दोषों को नष्ट करनेवाले हैं। हे लक्ष्मीपते, हे सुखों की खान और सत्पुरुषों की एकमात्र गति, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे शचीपति इन्द्र के प्रिय छोटे भाई, स्वरूपाशक्ति सीताजी तथा छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित आपको भजता हूँ। पोद्दार यहाँ इन्द्र के प्रिय छोटे भाई को वामनजी के रूप में स्पष्ट करते हैं। जो मनुष्य डाह छोड़कर आपके चरणकमलों का सेवन करते हैं, वे तर्क-वितर्क की तरङ्गों से भरे संसारसमुद्र में नहीं गिरते। जो एकान्तवासी इन्द्रियों को विषयों से हटाकर प्रसन्नता के साथ मुक्ति के लिये आपको भजते हैं, वे अपने ही स्वरूप को प्राप्त होते हैं।

फिर वे गिनाते हैं कि जिसकी स्तुति हो रही है वह क्या है। आप एक हैं, अद्भुत हैं, इच्छारहित हैं, सबके स्वामी हैं, व्यापक हैं, जगद्गुरु हैं, सनातन हैं, तीनों गुणों से सर्वथा परे हैं, और अपने स्वरूप में स्थित हैं। आप भाव के प्रिय हैं, विषयी पुरुषों के लिये अत्यन्त दुर्लभ हैं, अपने भक्तों के लिये कल्पवृक्ष हैं, पक्षपात से रहित हैं, और सदा सुखपूर्वक सेवन करने योग्य हैं। इतना कहकर मुनि वहाँ पहुँचते हैं जहाँ हर सच्ची स्तुति पहुँचती है, यानी माँगने पर। और जो माँगा जाता है वह इतना छोटा है कि उसके आगे पूरी स्तुति केवल भूमिका लगने लगती है।

अनूप रूप भूपतिं । नतोऽहमुर्विजा पतिं।
प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे॥ ११॥

छन्द ११

हे अनुपम सुन्दर, हे पृथ्वीपति, हे जानकीनाथ, मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मुझ पर प्रसन्न होइये, मैं आपको नमस्कार करता हूँ, मुझे अपने चरणकमलों की भक्ति दीजिये। ग्यारह छन्दों तक जिसने आपको तीनों लोकों का स्वामी, गुणों से परे, जगद्गुरु और सनातन कहा, वह अन्त में एक ही वस्तु माँगता है, चरणों की भक्ति। और बारहवें छन्द में वह इस स्तुति का फल बता देता है, कि जो मनुष्य इसे आदरपूर्वक पढ़ते हैं, वे आपकी भक्ति से युक्त होकर आपके परमपद को प्राप्त होते हैं, इसमें सन्देह नहीं है।

स्तुति समाप्त हो जाती है, पर मुनि की बात समाप्त नहीं होती। बारह छन्दों के बाद वे फिर सिर नवाते हैं और हाथ जोड़कर एक और वाक्य कहते हैं। यही वाक्य इस पूरे आश्रम-प्रसंग का सार है, और यह भी दिखाता है कि माँगनेवाले को अपने विषय में क्या मालूम है।

बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि।
चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि॥ ४॥

दोहा ४

विनती करके, फिर सिर नवाकर, हाथ जोड़कर मुनि ने कहा, हे नाथ, मेरी बुद्धि आपके चरणकमलों को कभी न छोड़े। जो माँगा जा रहा है उसमें एक चतुराई है। वे यह नहीं कह रहे कि मैं कभी न छोड़ूँ। वे बुद्धि की बात कर रहे हैं, यानी उस वस्तु की जो सबसे पहले फिसलती है और जिस पर किसी का पूरा वश नहीं चलता। जिसने अभी-अभी ब्रह्मा और शिवजी के वन्दित का स्तवन किया है, वह अपने ही मन का भरोसा नहीं कर रहा, और इसीलिये उसे भी माँग के खाते में डाल दे रहा है।

सार: आसन पर विराजे प्रभु की शोभा नेत्र भरकर देखकर अत्रिजी बारह संस्कृत छन्दों में स्तुति करते हैं, जिसमें भक्तवत्सल से लेकर तुरीय और जगद्गुरु तक सब सम्बोधन आते हैं। अन्त में वे केवल चरणकमलों की भक्ति माँगते हैं, और स्तुति का फल बताकर, फिर सिर नवाकर, यह प्रार्थना करते हैं कि उनकी बुद्धि कभी उन चरणों को न छोड़े।

अनसूया सीताजी को पास बैठाती हैं

अब कथा घर के भीतर चली जाती है। जितनी देर बाहर आसन, स्तुति और दर्शन चल रहा था, उतनी देर में भीतर एक और भेंट हो चुकी है। परम शीलवती और विनम्र सीताजी ने अनसूयाजी के चरण पकड़कर उनसे भेंट की। ऋषिपत्नी के मन में बड़ा सुख हुआ। उन्होंने आशिष देकर उन्हें अपने पास बैठा लिया, और ऐसे दिव्य वस्त्र तथा आभूषण पहनाये जो नित्य नये, निर्मल और सुहावने बने रहते हैं।

यह ब्योरा यों ही नहीं आया है। थोड़ी देर पहले इसी पन्ने पर फूलों के गहने पहनाये गये थे, जो साँझ तक मुरझा जाते। अब वे गहने मिल रहे हैं जो कभी मैले नहीं होते। पर तुलसी इस पर ठहरते नहीं। वे तुरन्त आगे बढ़ जाते हैं, और जो आगे आता है वह इस काण्ड का सबसे लम्बा उपदेश है। ऋषिपत्नी मधुर तथा कोमल वाणी से स्त्रियों के कुछ धर्म बखानने लगीं, और तुलसी बीच में एक शब्द रख देते हैं, ब्याज, यानी बहाना। सुननेवाली सामने बैठी हैं, पर कहा किसी और के लिये जा रहा है।

मातु पिता भ्राता हितकारी । मितप्रद सब सुनु राजकुमारी॥
अमित दानि भर्ता बयदेही । अधम सो नारि जो सेव न तेही॥

चौपाई ७

हे राजकुमारी, सुनिये, माता, पिता और भाई, ये सब हित करनेवाले हैं, परन्तु ये सब एक सीमा तक ही देनेवाले हैं। हे वैदेही, पति असीम देनेवाला है। वह स्त्री अधम है जो ऐसे पति की सेवा नहीं करती। हिसाब जिस तराज़ू पर रखा गया है वह मित और अमित का है। माता-पिता और भाई जो देते हैं उसकी एक हद है, और जो हद के पार है उसका नाम यहाँ पति रखा गया है। इसके बाद जो कुछ कहा जायगा वह सब इसी एक तराज़ू से नापा जायगा।

आगे परीक्षा की बात आती है। धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री, इन चारों की परीक्षा विपत्ति के समय ही होती है। और फिर एक सूची आती है जिसमें कहीं कोई कोमलता नहीं है: वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अन्धा, बहरा, क्रोधी, और अत्यन्त दीन। सूची अगली अर्धाली में जाकर पूरी होती है, और वहीं उसका निष्कर्ष भी आ जाता है।

ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना॥
एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥

चौपाई ८

ऐसे भी पति का अपमान करने से स्त्री यमपुर में भाँति-भाँति के दुःख पाती है। शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना, स्त्री के लिये बस यही एक धर्म है, यही एक व्रत है, और यही एक नियम है। जो आठ अवस्थाएँ अभी गिनायी गयी थीं, वे छूट का कारण नहीं बनतीं। वे उस परीक्षा का ब्योरा बनती हैं जिसकी बात एक पंक्ति पहले कही गयी थी। और तीन शब्द, काया, वचन और मन, सेवा को केवल बाहरी काम रहने भी नहीं देते।

अब अनसूयाजी वर्गीकरण पर आती हैं। जगत् में चार प्रकार की पतिव्रताएँ हैं, और इस बात के लिये वे तीन गवाह रखती हैं: वेद, पुराण और संत।

जग पतिब्रता चारि बिधि अहहीं । बेद पुरान संत सब कहहीं॥
उत्तम के अस बस मन माहीं । सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं॥

चौपाई ९

उत्तम श्रेणी की पतिव्रता के मन में यह बसा रहता है कि जगत् में दूसरा पुरुष स्वप्न में भी नहीं है। मध्यम पराये पति को वैसे देखती है जैसे अपना सगा भाई, पिता या पुत्र, यानी समान अवस्थावाले को भाई के रूप में, बड़े को पिता के रूप में, और छोटे को पुत्र के रूप में। जो धर्म विचारकर और अपने कुल की मर्यादा समझकर बची रहती है, उसे वेद निकृष्ट कहते हैं। और जो अवसर न मिलने से या भय से पतिव्रता बनी रहती है, उसे जगत् में अधम जानना चाहिये।

इसके बाद दण्ड की बात आती है, और वह बिना किसी मुलायमियत के कही जाती है। पति को धोखा देकर जो पराये पति से रति करती है, वह सौ कल्प तक रौरव नरक में पड़ी रहती है। जो क्षण भर के सुख के लिये सौ करोड़ जन्मों के दुःख को नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कोई नहीं। और जो पति के प्रतिकूल चलती है, वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर विधवा हो जाती है। इसी के साथ दूसरी ओर का पलड़ा भी रख दिया जाता है: जो छल छोड़कर पातिव्रत धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना किसी परिश्रम के परम गति पा लेती है।

और फिर वह सोरठा आता है जिस पर इस पूरे उपदेश का भार टिका हुआ है।

सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।
जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय॥ ५ (क)॥
सुनु सीता तव नाम सुमिरि नारि पतिब्रत करहिं।
तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित॥ ५ (ख)॥

सोरठा ५ (क)

स्त्री जन्म से ही अपवित्र है, किन्तु पति की सेवा करके वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है। इसी धर्म के कारण आज भी तुलसीजी भगवान् को प्रिय हैं और चारों वेद उनका यश गाते हैं। दृष्टान्त पर ध्यान दीजिये। जो पौधा घर-घर के आँगन में लगा हुआ है और जिसके बिना ठाकुरजी का भोग नहीं लगता, उसी का नाम लेकर बात पूरी की जा रही है। बात किसी दूर के शास्त्र से नहीं, आँगन से उठायी गयी है।

और इसके तुरन्त बाद अनसूयाजी एक और सोरठा कहती हैं, जिसमें वे स्वयं साफ़ कर देती हैं कि यह सारा उपदेश किसके लिये था। वे कहती हैं कि सीताजी का नाम स्मरण करके ही स्त्रियाँ पातिव्रत धर्म का पालन करेंगी, और रामजी तो उन्हें प्राणों के समान प्रिय हैं ही; यह कथा तो संसार के हित के लिये कही गयी है। यानी जिन्हें सुनाया जा रहा था, उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं थी। वे वही खूँटी थीं जिस पर यह पूरा उपदेश टाँगा गया, और तुलसी ने पहले ही उसे ब्याज कह दिया था।

सार: भीतर सीताजी अनसूयाजी के चरण पकड़कर मिलती हैं, और ऋषिपत्नी उन्हें पास बैठाकर नित्य नये दिव्य वस्त्र तथा आभूषण पहनाती हैं। फिर उन्हीं के बहाने वे नारीधर्म कहती हैं: माता-पिता मित देनेवाले, पति अमित देनेवाला; काया, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम ही एक धर्म, व्रत और नियम; चार प्रकार की पतिव्रताएँ, उनके फल और दण्ड। अन्त में वे स्वयं कह देती हैं कि यह कथा संसार के हित के लिये कही गयी है।

विदा, और कलिकाल के लिये दो पंक्तियाँ

जानकीजी ने सुनकर परम सुख पाया और आदरपूर्वक उनके चरणों में सिर नवाया। उन्होंने कुछ कहा नहीं। इस पूरे पन्ने पर उनका एक भी वचन नहीं है। चोंच की चोट भी उन्होंने चुपचाप सही, गहने भी चुपचाप पहने, और उपदेश भी चुपचाप लिया। तुलसी उन्हें इस प्रसंग में एक भी पंक्ति नहीं देते, और उनका सिर नवाना ही उनका पूरा उत्तर है।

बाहर आसन पर कृपा की खान ने मुनि से कहा, आज्ञा हो तो अब दूसरे वन में जाऊँ। मुझ पर निरन्तर कृपा करते रहियेगा, और अपना सेवक जानकर स्नेह न छोड़ियेगा। यह वाक्य किसने कहा है, इस पर ठहरना चाहिये। जिनकी अभी-अभी बारह छन्दों में स्तुति हुई है, वे आज्ञा माँग रहे हैं, अपने को सेवक कह रहे हैं, और साथ में यह भी माँग रहे हैं कि स्नेह बना रहे। इसी को धर्मधुरन्धर की वाणी कहा गया है।

ज्ञानी मुनि का उत्तर प्रेम से भरा है। ब्रह्मा, शिवजी और सनकादि, सब परमार्थवादी जिनकी कृपा चाहते हैं, हे रामजी, आप वही हैं, निष्काम पुरुषों के भी प्रिय और दीनों के बन्धु, और आप ऐसे कोमल वचन बोल रहे हैं। अब मैंने लक्ष्मीजी की चतुराई समझी, जिन्होंने सब देवताओं को छोड़कर आपको ही भजा। जिसके समान बड़ा और कोई नहीं है, उसका शील भला ऐसा क्यों न होगा। और अन्त में वे हार मान लेते हैं। मैं किस प्रकार कहूँ कि हे स्वामी, अब जाइये। हे नाथ, आप अन्तर्यामी हैं, आप ही कहिये।

ऐसा कहकर वे धीर मुनि प्रभु को देखते रह जाते हैं। नेत्रों से जल बह रहा है और शरीर पुलकित है। यहाँ तुलसी एक छन्द रखकर उनके मन की बात भी सुना देते हैं। मुनि सोच रहे हैं कि मैंने ऐसे कौन से जप और तप किये थे, जिनके कारण मन, ज्ञान, गुण और इन्द्रियों से परे प्रभु के दर्शन हो गये। इसी छन्द के अन्त में तुलसीदास अपनी ओर से जोड़ देते हैं कि जप, योग और धर्म के समूह से मनुष्य अनुपम भक्ति पाता है, और यह सेवक रघुवीर के पवित्र चरित्र को रात-दिन गाता है।

इसके बाद प्रसंग बन्द होता है, और बन्द करने का ढंग देखने लायक है। तुलसी आश्रम से निकलकर सीधे पढ़नेवाले की ओर मुड़ जाते हैं। वे कहते हैं कि रामचन्द्रजी का सुन्दर यश कलियुग के पापों का नाश करनेवाला, मन को दमन करनेवाला और सुख का मूल है, और जो लोग इसे आदरपूर्वक सुनते हैं, उन पर रामजी प्रसन्न रहते हैं। और उसके बाद वह सोरठा आता है जिससे यह पूरा प्रसंग समाप्त होता है।

कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप।
परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर॥ ६ (ख)॥

सोरठा ६ (ख)

यह कठिन कलिकाल पापों का खज़ाना है। इसमें न धर्म है, न ज्ञान है, न योग है, न जप। इसमें तो जो सब भरोसे छोड़कर रामजी को ही भजते हैं, वही चतुर हैं। पूरे पन्ने का हिसाब इसी सोरठे में चुकता हो जाता है। जयन्त ने अपना बल आज़माया और आँख गँवायी। अत्रिजी ने जीवन भर का साधन सामने रखकर भी केवल भक्ति माँगी। और यहाँ अन्त में कह दिया जाता है कि इस काल में साधन का खाता ही ख़ाली है, इसलिये जो भरोसा छोड़ देता है वही समझदार है।

सार: सीताजी सिर नवाकर उपदेश ग्रहण करती हैं, और राम मुनि से दूसरे वन में जाने की आज्ञा माँगते हैं। अत्रिजी उत्तर देते हैं कि जिनकी कृपा ब्रह्मा, शिवजी और सनकादि चाहते हैं वे यही हैं, और वे विदा कहने में असमर्थ होकर कहते हैं कि आप अन्तर्यामी हैं, आप ही कहिये। छन्द में उनके आँसू और पुलक के साथ तुलसी अपनी बात जोड़ते हैं, और प्रसंग इस सोरठे पर बन्द होता है कि कलिकाल में सब भरोसे छोड़कर रामजी को भजनेवाले ही चतुर हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने को दुबारा पढ़िये तो एक ही वस्तु बार-बार सामने आती है, और वह चरण हैं। कथा की पहली घटना एक चोंच है, जो सीताजी के चरणों पर पड़ती है। फिर जयन्त तीनों लोक घूमकर आता है और रामजी के चरण पकड़ लेता है। फिर अत्रिजी बारह छन्दों की स्तुति करके अन्त में चरणकमलों की भक्ति माँगते हैं, और दोहे में यह माँगते हैं कि बुद्धि उन चरणों को कभी न छोड़े। फिर सीताजी अनसूयाजी के चरण पकड़कर मिलती हैं, और उपदेश सुनकर उन्हीं चरणों में सिर नवाती हैं। और उपदेश का सार भी यही निकलता है कि काया, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम हो। तुलसी कहीं इस दोहराव की ओर उँगली नहीं उठाते। वे बस उसे छह दोहों तक चलने देते हैं।

दूसरी बात माँगने की है, और इस पन्ने पर दो लोग माँगते हैं। एक के पास कुछ नहीं है। वह पिता के घर से निकाला जा चुका है, तीनों लोक नाप चुका है, और कहीं बैठने तक को नहीं कहा गया। वह प्राण माँगता है और उसे प्राण मिल जाते हैं, एक आँख की क़ीमत पर। दूसरे के पास सब कुछ है। वह महामुनि है, उसका आश्रम है, उसकी वाणी संस्कृत में बहती है, और वह अपनी तपस्या के बल पर कुछ भी माँग सकता था। वह केवल भक्ति माँगता है, और उसे भी अपनी बुद्धि का भरोसा नहीं, इसलिये वह बुद्धि को भी माँग में डाल देता है। खाली हाथ वाला जीवन पाता है, भरे हाथ वाला अपने हाथ खाली कर देता है।

और तीसरी बात, जिस पर इस पन्ने की पूरी बनावट टिकी है, वह क्रम है। तुलसी ने अपराध से ठीक पहले फूलों के गहने रखे हैं। यह संयोग नहीं हो सकता। अगर छल सीधे कथा के आरम्भ में होता तो वह केवल एक मूर्खता होती। उससे पहले वह दृश्य रख देने से वह चोट नाप में आ जाती है। जो हाथ फूल चुनकर, गहने बनाकर, आदर के साथ पहना रहा था, उसी दृश्य में से चोंच निकलती है और उसी हाथ में सरकंडा आ जाता है। और जब अन्त में उसी हाथ ने दण्ड देकर छोड़ भी दिया, तब सोरठे में जो प्रश्न पूछा गया, वह और किसी तरह पूछा ही नहीं जा सकता था।

इस प्रसंग से जो चित्र सबसे देर तक साथ रहता है वह वह कौआ है जो तीनों लोक नापकर वहीं लौटा जहाँ से भागा था। ब्रह्मलोक, शिवपुर, सब लोक, और सब जगह वही एक उत्तर, कि रामजी के द्रोही को कौन रख सकता है। जिस घर में जन्म हुआ था वहाँ भी जगह नहीं मिली, और अन्त में जगह वहीं मिली जहाँ अपराध किया गया था। यह छूट नहीं थी, क्योंकि आँख गयी। और यह दण्ड भी नहीं था, क्योंकि प्राण बचे। तुलसी दोनों नामों में से एक भी नहीं चुनते। वे केवल इतना कहकर आगे बढ़ जाते हैं कि मोहवश किया गया द्रोह था, वध उचित था, और छोड़ दिया गया।

और उसी पन्ने के दूसरे छोर पर एक आश्रम है जहाँ सब कुछ उलटा है। वहाँ कोई किसी से बचकर नहीं भाग रहा, वहाँ दोनों एक दूसरे की ओर दौड़ रहे हैं। वहाँ दण्डवत् बीच में ही रोक लिया जाता है, आँसुओं से नहला दिया जाता है, फल और मूल परोसे जाते हैं, और भीतर एक स्त्री दूसरी को अपने पास बैठाकर नित्य नये आभूषण पहना देती है। एक ही तीसरे सोपान के पहले पन्ने पर तुलसी ये दोनों दुनियाएँ रख देते हैं, और दोनों के बीच में कोई पुल नहीं बनाते। जो इस पन्ने पर मिलता है वह यही है कि दरवाज़ा एक ही है, और वह किसी के लिये बन्द नहीं किया गया, यहाँ तक कि उसके लिये भी नहीं जिसने उसी दरवाज़े पर चोट की थी।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा १ से ६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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