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सीता-हरण और जटायु

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रामचरितमानसअरण्यकाण्डप्रसंग 7

सूना मौका देखकर एक यति निकट आ जाता है। सीता आकाश-मार्ग से ले जायी जाती हैं, और एक बूढ़ा पक्षी रावण से युद्ध करता है।

मारीच कपटमृग बनता है, और रावण यति का वेष धरकर निकट आता है।

पिछले प्रसंग में राम के कहने पर सीता अग्नि में निवास करने चली गयी थीं, और अपना प्रतिबिंब वहाँ छोड़ गयी थीं।

यह कथा रामचरितमानस की है। यहाँ मरता हुआ मारीच पहले लक्ष्मण का नाम लेता है। सीता लक्ष्मण से जाने को कहती हैं, और वे राम के पास चले जाते हैं। रावण सीता को रथ पर बैठाकर आकाश-मार्ग से ले जाता है। जटायु उससे युद्ध करता है, और रावण उसके पंख काट डालता है। फिर रावण सीता को अशोक वृक्ष के नीचे रखता है।

मारीच, रावण और जटायु

  • राम जो सब कारण जानते हुए हर्षित होकर उठते हैं, और माया के मृग के पीछे दौड़ते हैं।
  • सीता जो सोने के मृग का चमड़ा माँगती हैं, और पुकार सुनकर लक्ष्मण से जाने को कहती हैं। रावण के रथ से विलाप करती हुई वे पर्वत पर बैठे वानरों को देखकर अपना वस्त्र डाल देती हैं।
  • लक्ष्मण पहरे पर छोड़े गये भाई, जिनसे बुद्धि और विवेक से रखवाली करने को कहा गया था।
  • मारीच वह निशाचर जो सोने का कपटमृग बना, और मरते समय जिसने पहले लक्ष्मण का नाम लिया और फिर मन में राम का स्मरण किया।
  • रावण निशाचरों का राजा, जो सूना मौका देखकर यति के वेष में आया और कुत्ते की तरह इधर-उधर ताकता हुआ चोरी को चला।
  • जटायु गीधों का राजा, बूढ़ा पक्षी, जो आर्त वाणी सुनकर सीता को राम की पत्नी के रूप में पहचान लेता है, रावण को बाल पकड़कर रथ से नीचे गिरा देता है, और पंख कटकर गिर पड़ता है।
  • गरुड़ जिनसे, पोद्दार की टीका के अनुसार, काकभुशुण्डि कुमार्ग की बात कहते हैं। रावण जटायु को आता देखकर जिन पक्षियों के स्वामी का अनुमान करता है, उन्हें टीका गरुड़ बताती है।
  • वानर पर्वत पर बैठे हुए वे जीव, जिन्हें देखकर आकाश से एक वस्त्र नीचे डाला गया।

सोने का मृग

रावण उस वन के निकट गया, और मारीच कपटमृग बन गया। उसका शरीर सोने का था और मणियों से जड़कर बनाया गया था।

सीता ने वह परम सुन्दर मृग देखा, जिसके अंग-अंग की छटा अत्यन्त मनोहर थी। वे कहने लगीं, “हे देव, कृपालु राम, सुनिये। इस मृग की छाल बहुत सुन्दर है।”

सीता राम को सत्यप्रतिज्ञ प्रभु कहकर पुकारती हैं, और कहती हैं कि इसको मारकर इसका चमड़ा ला दीजिये। तब राम, सब कारण जानते हुए, देवताओं का काम सँवारने के लिये हर्षित होकर उठे। टीका इसे मारीच के कपटमृग बनने का सब कारण बताती है।

जो पकड़ में नहीं आता

राम ने मृग को देखकर कमर में फेंट बाँधी, हाथ के धनुष पर सुन्दर बाण चढ़ाया। उन्होंने लक्ष्मण को समझाकर कहा, “हे भाई, वन में बहुत से निशाचर फिरते हैं। सीता की रखवाली कीजिये, बुद्धि और विवेक से बल और समय का विचार करते हुए।”

राम को देखकर मृग भाग चला, और राम धनुष चढ़ाकर उसके पीछे दौड़े। वेद जिन्हें नेति कहते हैं, और शिव जिन्हें ध्यान में नहीं पाते, वे माया से बने एक मृग के पीछे दौड़ रहे हैं। वह मृग कभी निकट आ जाता है, फिर दूर भाग जाता है। कभी प्रकट होता है, कभी छिप जाता है। इसी तरह प्रकट होते और छिपते, बहुतेरे छल करते हुए वह राम को दूर ले गया।

तब राम ने निशाना साधकर एक कठोर बाण मारा, और मारीच घोर शब्द करके पृथ्वी पर गिर पड़ा। पहले लक्ष्मण का नाम लेकर, पीछे उसने मन में राम का स्मरण किया।

प्राण छोड़ते समय उसने अपना शरीर प्रकट कर दिया, और प्रेम सहित राम का स्मरण किया। टीका इसे उसका राक्षसी शरीर बताती है। सुजान राम ने उसके हृदय का प्रेम पहचान लिया और उसे वह गति दी जो मुनियों को दुर्लभ है।

देवता बहुत से फूल बरसा रहे हैं और राम के गुणों की गाथा गा रहे हैं। दीनों के बन्धु राम ने असुर को अपना पद दे दिया। टीका इसे देवताओं का गान बताती है।

एक पुकार, और एक मुसकान

दुष्ट को मारकर राम तुरन्त लौट पड़े, हाथ में धनुष और कमर में तरकस। जब सीता ने वह आर्त वाणी सुनी, तब वे अत्यन्त भयभीत होकर लक्ष्मण से कहने लगीं। टीका इसे मरते समय मारीच की “हा लक्ष्मण” की आवाज़ बताती है।

सीता कहती हैं, शीघ्र जाइये, आपके भाई बड़े संकट में हैं। लक्ष्मण हँसकर उत्तर देते हैं। हे माता, सुनिये, जिनकी भृकुटि के विलास से सृष्टि का लय हो जाता है, वे क्या स्वप्न में भी संकट में पड़ सकते हैं?

जब सीता ने मर्म वचन कहे, तब भगवान् की प्रेरणा से लक्ष्मण का मन डोल गया। वे सीता को वन और दिशाओं के देवताओं को, सबको, सौंपकर वहाँ चले जहाँ रावण-चन्द्रमा के राहु राम थे।

सूना मौका और यति का वेष

सूना मौका देखकर रावण यति के वेष में निकट आया। उसके डर से देवता और दैत्य डरते हैं। उन्हें रात को नींद नहीं आती, और वे दिन में अन्न नहीं खाते।

वही रावण कुत्ते की तरह इधर-उधर ताकता हुआ भड़िहाई के लिये चला। पोद्दार की टीका के अनुसार सूना पाकर कुत्ता चुपके से बरतनों में मुँह डालकर कुछ चुरा ले जाता है, उसे भड़िहाई कहते हैं।

टीका के अनुसार यहाँ काकभुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं कि इस प्रकार कुमार्ग पर पैर रखते ही शरीर में न तेज रह जाता है, न बुद्धि, न बल का लेश।

अनेक प्रकार की सुहावनी कथाएँ रचकर उसने राजनीति, भय और प्रीति दिखायी। सीता ने कहा, “हे यति गोसाईं, सुनिये। आपने दुष्ट जैसे वचन कहे हैं।”

जब वेष उतरा

तब रावण ने अपना रूप दिखाया, और जब अपना नाम सुनाया तब सीता भयभीत हो गयीं। सीता गहरा धीरज धरकर कहती हैं कि प्रभु आ गये हैं, और वह दुष्ट वहीं खड़ा रहे। सीता कहती हैं कि जैसे सिंह की पत्नी को कोई तुच्छ खरगोश चाहे, वैसे ही निशाचरों का राजा काल के वश हो गया है।

वचन सुनते ही रावण को क्रोध आया, और मन में उसने चरणों की वन्दना करके सुख माना। टीका चरण सीता के बताती है। क्रोध में भरकर उसने सीता को रथ पर बैठा लिया और आकाश मार्ग से उतावली के साथ चला। डर के मारे उससे रथ हाँका नहीं जाता था।

आकाश में विलाप

टीका के अनुसार सीता विलाप कर रही थीं, “हा जगत् के अद्वितीय वीर राम, किस अपराध से आपने दया भुला दी? हे दुःख हरनेवाले, हे शरणागत को सुख देनेवाले, हा रघुकुल-कमल के सूर्य!”

सीता कहती हैं, “हा लक्ष्मण, आपका दोष नहीं है। मैंने क्रोध किया, उसी का फल पाया।”

वे बहुत प्रकार से विलाप करती हैं, “प्रभु की कृपा बहुत है, और स्नेही प्रभु दूर हैं। मेरी विपत्ति प्रभु को कौन सुनाये? यज्ञ का अन्न गदहा खाना चाहता है।” उनका भारी विलाप सुनकर चराचर सब जीव दुखी हो गये।

गीधराज

आर्त वाणी सुनकर गीधराज ने पहचान लिया कि ये राम की पत्नी हैं। अधम निशाचर उन्हें लिये जा रहा है, जैसे कपिला गाय म्लेच्छ के वश में हो।

जटायु कहता है: “हे सीते, पुत्री, भय मत कीजिये, मैं इस राक्षस का नाश करूँगा।” फिर वह पक्षी क्रोध में भरकर ऐसे दौड़ा जैसे पर्वत की ओर वज्र छूटता है, और ललकारा कि दुष्ट खड़ा क्यों नहीं होता। निडर होकर चल दिया, क्या उसने जटायु को पहचाना नहीं?

उसे यमराज के समान आता देखकर रावण घूमा, और मन में अनुमान करने लगा, “यह मैनाक पर्वत है, या पक्षियों का स्वामी? वह अपने स्वामी सहित मेरे बल को जानता है।” टीका पक्षियों के स्वामी को गरुड़ और उनके स्वामी को विष्णु बताती है। रावण ने उसे पहचान लिया, और टीका के अनुसार बोला, “यह तो बूढ़ा जटायु है। यह मेरे हाथ रूपी तीर्थ में देह छोड़ेगा।”

यह सुनते ही गीध क्रोध में भरकर दौड़ा, और बोला, “रावण, मेरी सिखावन सुनिये। सीता को छोड़कर कुशल से घर जाइये। नहीं तो, हे बहुत भुजाओंवाले, ऐसा होगा। राम के क्रोध की अत्यन्त घोर अग्नि में आपका सारा वंश पतंगा हो जायेगा।” योद्धा रावण कोई उत्तर नहीं देता। तब गीध क्रोध करके दौड़ा।

उसने बाल पकड़कर रावण को रथ से नीचे उतार लिया, और वह पृथ्वी पर गिर पड़ा। गीध ने सीता को अलग रखा, और तब लौटा। टीका कहती है कि उसने उन्हें एक ओर बैठाया। फिर चोंचों से मार-मारकर उसने रावण का शरीर विदीर्ण कर डाला, और एक दण्ड भर, जिसे टीका एक घड़ी कहती है, रावण मूर्च्छित पड़ा रहा।

खिसियाये हुए रावण ने क्रोध में भरकर अत्यन्त भयानक कृपाण निकाली और जटायु के पंख काट डाले। पंख कटने पर वह पक्षी, अद्भुत करनी करके, राम का स्मरण करता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा। टीका इस अद्भुत करनी को राम की लीला बताती है।

अशोक वन

सीता को दुबारा रथ पर चढ़ाकर रावण उतावली से चला। उसका भय कम न था। सीता आकाश में विलाप करती जा रही हैं, मानो व्याध के वश में पड़ी कोई भयभीत हिरनी हो।

पर्वत पर बैठे वानरों को देखकर सीता ने भगवान् का नाम लेकर वस्त्र नीचे डाल दिया।

इसी प्रकार रावण सीता को ले गया, और अशोक वन में ले जाकर रख दिया। बहुत प्रकार से भय और प्रीति दिखाकर वह दुष्ट हार गया। तब उसने यत्न कराके सीता को अशोक वृक्ष के नीचे रखा। टीका यत्न को सब व्यवस्था ठीक कराना बताती है।

गिरता वस्त्र

इस प्रसंग में मारीच सोने का कपटमृग बनता है, और सीता उसका चमड़ा माँगती हैं। राम लक्ष्मण को सीता की रखवाली सौंपकर उसके पीछे जाते हैं। मरता हुआ मारीच पहले लक्ष्मण का नाम लेता है, फिर मन में राम का स्मरण करता है, और राम उसे मुनियों को दुर्लभ गति देते हैं। सीता लक्ष्मण से जाने को कहती हैं, और वे राम के पास चले जाते हैं। रावण यति के वेष में आता है, फिर अपना रूप दिखाकर सीता को रथ पर बैठाकर आकाश मार्ग से ले चलता है। जटायु उसे बाल पकड़कर रथ से गिराता है, और रावण उसके पंख काट डालता है। सीता पर्वत पर बैठे वानरों को देखकर वस्त्र डाल देती हैं, और रावण उन्हें अशोक वृक्ष के नीचे रख देता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा 27 से 29 (क), और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।