रामचरितमानस · अरण्यकाण्ड · सीता-हरण और जटायु
सीता-हरण और जटायु
वन सूना होते ही द्वार पर एक यति आ खड़ा होता है, और जो आकाश-मार्ग से उठा ले जाया जाता है उसके पीछे एक बूढ़ा पक्षी अकेला उड़ता है।
अरण्यकाण्ड यहाँ तक जिस चाल से चला था, वह चाल इस प्रसंग में टूट जाती है। अब तक वन एक ऐसी जगह था जहाँ ऋषि मिलते थे, उपदेश होता था, और जो राक्षस सामने आता था वह सामने से आता था। इस पन्ने पर कुछ भी सामने से नहीं आता। जो मृग आता है वह मृग नहीं है, जो स्वर पुकारता है वह उसका अपना स्वर नहीं है, और जो अतिथि द्वार पर आ खड़ा होता है वह जिस वेष में आता है उस वेष का उसे एक कण भी अधिकार नहीं। छल यहाँ अपनी पूरी कारीगरी के साथ खड़ा है, और वह कुरूप नहीं है, वह सोने का बना हुआ है।
पिछले प्रसंग में जो हो चुका है उसे यहाँ दोहराने की आवश्यकता नहीं, केवल याद रखने की है। लक्ष्मण के फल-मूल लेने चले जाने पर राम ने जानकी से हँसकर कहा था कि वे अब एक ललित नरलीला करेंगे, और जब तक निशाचरों का नाश हो तब तक जानकी अग्नि में निवास करें। सीता ने प्रभु के चरण हृदय में धरकर वैसा ही किया और अपना प्रतिबिंब वहाँ छोड़ दिया, वैसा ही शील, वैसा ही रूप, वैसी ही विनीत। वह मर्म लक्ष्मण तक नहीं जानते थे। आगे जो कुछ होता है वह इसी एक बात पर टिका हुआ है, और तुलसी उसे बार-बार याद नहीं दिलाते। वे सीधे कथा कहते चलते हैं, और हम भी वैसे ही चलेंगे।
इस पन्ने पर तीन दोहों की कथा है। मारीच का सोने का मृग बनना, छाल की माँग, राम का सब जानते हुए भी हर्षित होकर उठना, माया-मृग के पीछे वह दौड़ जिसे पढ़कर पाँव के नीचे से भूमि खिसकती है, मरते हुए मारीच की वह पुकार जो उसकी नहीं थी, लक्ष्मण का मन डोलना, यति के वेष में रावण का आना, हरण, आकाश में विलाप, गीधराज जटायु का अकेला युद्ध, उसके पंखों का कटना, और अन्त में अशोक वृक्ष के नीचे वह ठहराव जिस पर यह प्रसंग समाप्त हो जाता है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम रघुकुल के तिलक, जो सामने खड़े कपट का सारा कारण जानते हुए भी उसके पीछे दौड़ते हैं।
- सीता वैदेही, जिन्हें राम ने अग्नि में रख दिया था और जिनका प्रतिबिंब वन में रह गया था।
- लक्ष्मण पहरे पर छोड़े गये भाई, जिनसे बुद्धि और विवेक से रखवाली करने को कहा गया था।
- मारीच वह निशाचर जो सोने का कपटमृग बना, और मरते समय जिसने पहले लक्ष्मण का नाम पुकारा और फिर मन में राम का स्मरण किया।
- रावण निशाचरों का स्वामी, जो सूना मौका देखकर यति के वेष में आया और जिसे तुलसी उसी क्षण कुत्ते की उपमा दे देते हैं।
- जटायु गीधराज, बूढ़ा पक्षी, जो आर्त वाणी से पहचान लेता है और अकेले उस रथ को रोक देता है।
- खगेश पक्षियों के स्वामी गरुड़, जिन्हें सम्बोधन करके पोद्दार की टीका के अनुसार यह चौपाई कही जा रही है।
- वानर पर्वत पर बैठे हुए वे जीव, जिन्हें देखकर आकाश से एक वस्त्र नीचे डाला गया।
सोने का मृग
कथा यहाँ एक ऐसी जगह से शुरू होती है जहाँ सब कुछ सुन्दर दिखता है और कुछ भी सच्चा नहीं है। रावण उस वन के निकट पहुँच चुका है जिसमें राम रहते हैं, और उसके साथ जो आया है वह अब अपने रूप में नहीं रहेगा। मारीच को जो काम मिला है वह लड़ने का नहीं, दिखने का है। और वह दिखने का काम इतनी कारीगरी से करता है कि तुलसी उसका वर्णन करने से बीच में ही हाथ खींच लेते हैं।
तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ॥
चौपाई १
अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई॥
दसों सिरवाला उस वन के निकट गया, और मारीच कपटमृग बन गया। इसके बाद जो आधी पंक्ति आती है वह वर्णन नहीं, वर्णन से इनकार है, अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। जो कहा जा सकता था वह इतना ही है कि देह सोने की थी और मणियों से जड़कर बनायी गयी थी। ध्यान देने की बात यह है कि कपट यहाँ कुरूप नहीं है। वह इतना सुन्दर है कि उसे देखकर आँख ठहर जाती है, और यही उसका पूरा बल है।
वन में उस समय कौन है, यह ध्यान में रखिये। राम हैं, लक्ष्मण हैं, और वह रूप है जो वहाँ रह गया था। सोने का मृग सामने से निकलता है, और सबसे पहले जिसकी दृष्टि उस पर पड़ती है वही उसे चाहती भी है। चाहने में कोई अपराध नहीं है, और तुलसी उसे अपराध की तरह लिखते भी नहीं। वे उसे उतनी ही कोमलता से लिखते हैं जितनी कोमलता उस वचन में है।
सीता परम रुचिर मृग देखा। अंग अंग सुमनोहर बेषा॥
चौपाई २
सुनहु देव रघुबीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुंदर छाला॥
परम सुन्दर मृग देखा गया, जिसके अंग अंग का वेष अत्यन्त मनोहर था। और जो वचन निकलता है वह बहुत धीमा है। हे देव, हे कृपालु रघुवीर, सुनिये, इस मृग की छाल बहुत ही सुन्दर है। इसमें न हठ है, न माँग का स्वर। केवल इतना कहा गया है कि यह सुन्दर है। कहनेवाली जानती हैं कि जिससे कहा जा रहा है उसके आगे इतना कह देना ही बहुत है।
अगली ही चौपाई में वह बात माँग बन जाती है, और माँग जिस सम्बोधन के साथ रखी जाती है वह इस पूरे प्रसंग का सबसे नुकीला शब्द है।
सत्यसंध प्रभु बधि करि एही । आनहु चर्म कहति बैदेही॥
चौपाई ३
तब रघुपति जानत सब कारन । उठे हरषि सुर काजु सँवारन॥
सत्यसंध कहकर बुलाया गया है, अर्थात् वह, जिसकी प्रतिज्ञा कभी झूठी नहीं पड़ती। इसको मारकर इसका चर्म ले आइये, वैदेही कहती हैं। और तब वह अर्धाली आती है जो पूरे दृश्य का ताला खोल देती है। तब रघुपति, सब कारण जानते हुए, हर्षित होकर उठे। जानते हुए। यानी जो सामने खड़ा है वह मृग नहीं है, यह पहले से मालूम है। फिर भी वे उठते हैं, और खिन्न होकर नहीं उठते, हर्ष से उठते हैं।
हर्ष का कारण भी उसी चरण में रख दिया गया है, सुर काजु सँवारन। इसी एक अर्धाली से यह सारा दृश्य दो तहों में बँट जाता है। ऊपर की तह में एक गृहस्थ अपनी पत्नी की इच्छा पूरी करने जा रहा है। नीचे की तह में वह काम शुरू हो रहा है जिसके लिये यह सारा वनवास रचा गया था। दोनों तहें एक साथ चलती हैं, और तुलसी नीचे की तह को कभी छिपाते नहीं।
सार: रावण उस वन के निकट पहुँचा और मारीच सोने का कपटमृग बन गया। सीता ने उसे देखकर उसकी छाल माँगी, और राम सारा कारण जानते हुए भी हर्षित होकर उठे, क्योंकि उठना देवताओं का काम बनाने के लिये था।
जो पकड़ में नहीं आता
उठने के बाद जो होता है वह शिकार की तैयारी जैसा है, और युद्ध की तैयारी जैसा भी। कमर में फेंट बाँधी गयी, हाथ में धनुष लिया गया, उस पर सुन्दर बाण चढ़ाया गया। फिर लक्ष्मण को समझाकर कहा गया, और उस कहने में आगे की सारी कथा का बीज है। वन में बहुत से निशाचर फिरते हैं, इसलिये सीता की रखवाली कीजिये, और रखवाली बुद्धि तथा विवेक से कीजिये, बल और समय का विचार करके।
यह आदेश साधारण नहीं है। इसमें पहरे की बात भी है और यह भी कि पहरा अपनी समझ से देना है। बल कितना है और समय कैसा है, दोनों तौलकर काम करना है। आगे जो होगा उसमें यही वाक्य कसौटी बनकर लौटेगा। आदेश पूरा होते ही मृग भाग चला, और प्रभु धनुष चढ़ाकर उसके पीछे दौड़े। यहीं तुलसी वह पंक्ति रखते हैं जिसे पढ़ते समय पाँव के नीचे से भूमि खिसक जाती है।
निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा॥
चौपाई ४
कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई । कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई॥
वेद जिनके विषय में नेति नेति कहकर रह जाते हैं, और शिव तक जिन्हें ध्यान में नहीं पाते, वे माया के बनाये हुए एक मृग के पीछे दौड़ रहे हैं। यह उपहास नहीं है। यह तुलसी का सबसे बड़ा आश्चर्य है, और वे इसे छिपाने की जगह पूरे आकार में सामने रख देते हैं। जो मन और वाणी से परे है वह इस समय एक हिरन के पीछे हाँफता हुआ दौड़ रहा है, और यही उस नरलीला का मूल्य है।
मृग की चाल भी देखिये। कभी वह निकट आ जाता है, फिर दूर भाग जाता है, कभी प्रकट हो जाता है, कभी छिप जाता है। जो हाथ आता हुआ लगे और हाथ न आये, माया का स्वभाव इससे अधिक सीधे नहीं लिखा जा सकता। इसी तरह प्रकट होते और छिपते हुए, बहुतेरे छल करते हुए वह प्रभु को दूर ले गया, और दूर ले जाना ही उसका असली काम था।
दूरी बन जाने के बाद निशाना साधकर एक कठोर बाण छोड़ा गया। मारीच घोर शब्द करके पृथ्वी पर गिर पड़ा। अब उसके पास जितनी घड़ी बची है उतने में उसे वह करना है जिसके लिये रावण उसे यहाँ तक लाया था, और वह काम एक ही शब्द में पूरा हो जाता है।
लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा॥
चौपाई ५
प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा । सुमिरेसि रामु समेत सनेहा॥
पहले उसने लक्ष्मण का नाम लिया। ऊँचे स्वर में, इसलिये कि वह स्वर वहाँ तक पहुँचे। पूरा हरण इसी एक नाम पर खड़ा है, और वह नाम राम का नहीं, लक्ष्मण का है, क्योंकि जिसे पहरे से हटाना है वही लक्ष्मण हैं। पीछे उसने मन में राम का स्मरण किया। बाहर का काम कपट का था, भीतर का काम प्रेम का। दोनों एक ही साँस में हुए।
प्राण छोड़ते समय उसने अपनी असली देह प्रकट कर दी, और प्रेम सहित राम का स्मरण किया। मरते हुए उसने वह कर दिया जो जीते जी नहीं कर सका था, अपना सच्चा रूप सामने रख देना। आगे की चौपाई में तुलसी कहते हैं कि सुजान राम ने उसके भीतर का प्रेम पहचान लिया और उसे वह गति दी जो मुनियों को भी दुर्लभ है। पहचानने की बात पर ठहरिये। बाहर जो था वह शुद्ध छल था, भीतर जो था वह प्रेम था, और जो देखा गया वह भीतर वाला था।
बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ।
दोहा २७
निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ॥ २७॥
देवता बहुत से फूल बरसा रहे हैं और प्रभु के गुणों की गाथाएँ गा रहे हैं। पर गाया क्या जा रहा है, यह देखिये। किसी बड़े संहार की प्रशंसा नहीं हो रही। गाया यह जा रहा है कि दीनबन्धु रघुनाथ ने असुर को अपना पद दे दिया। जिस बाण से वह गिरा उसी बाण से वह पहुँचा, और मारने तथा देने के बीच का अन्तर इस एक दोहे में मिट गया है।
सार: लक्ष्मण को बुद्धि और विवेक से रखवाली करने का आदेश देकर राम माया-मृग के पीछे दौड़े। छल करते हुए वह उन्हें दूर ले गया, बाण लगते ही गिरा, मरते समय उसने पहले लक्ष्मण का नाम पुकारा और फिर मन में राम का स्मरण किया, और उसे वह गति मिली जो मुनियों को भी दुर्लभ है।
एक पुकार, और एक मुसकान
उधर वह पुकार अपना काम कर चुकी थी। दुष्ट को मारकर रघुवीर तुरन्त लौट पड़े, हाथ में धनुष और कमर में तरकस शोभा दे रहा है। पर लौटने में जितनी देर लगती है, उतनी देर में पीछे बहुत कुछ हो चुका होता है। वह आर्त वाणी वहाँ तक पहुँची, सुनी गयी, और सुनते ही अत्यन्त भयभीत होकर लक्ष्मण से वचन कहे गये।
जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता॥
चौपाई ६
भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई । सपनेहुँ संकट परइ कि सोई॥
शीघ्र जाइये, भ्राता बड़े संकट में हैं। उत्तर हँसी के साथ आता है, और सम्बोधन माता का है। जिनके भौंहों के इशारे मात्र से सारी सृष्टि का लय हो जाता है, वे क्या स्वप्न में भी संकट में पड़ सकते हैं। तर्क की दृष्टि से यह उत्तर पूरा है। इसमें एक भी छेद नहीं है। और आगे जो होता है उससे पता चलता है कि उस घड़ी पूरे तर्क का कोई मोल नहीं था।
क्योंकि सामने जो खड़ी हैं वे इस समय तर्क सुनने की स्थिति में नहीं हैं। भय अपनी ही भाषा में बोलता है, और उस भाषा में चोट भी होती है। लक्ष्मण का उत्तर जितना सही था, उतना ही वह उस क्षण के लिये बेकार था, और यही इस दृश्य का पूरा दुःख है।
मरम बचन जब सीता बोला । हरि प्रेरित लछिमन मन डोला॥
चौपाई ७
बन दिसि देव सौंपि सब काहू । चले जहाँ रावन ससि राहू॥
मर्म वचन, अर्थात् वे वचन जो सीधे हृदय में चुभ जायें। तुलसी यह नहीं बताते कि वे वचन क्या थे। वे उन्हें कहीं लिखते ही नहीं, और यह न लिखना जान-बूझकर है। वे केवल इतना कहते हैं कि जब ऐसे वचन कहे गये तब लक्ष्मण का मन डोल गया, और डोलने का कारण भी उसी अर्धाली में रख देते हैं, हरि प्रेरित। प्रेरणा हरि की थी।
इन दो शब्दों से दोष का सारा हिसाब बदल जाता है। जो होने जा रहा है वह किसी की चूक से नहीं हो रहा, और न किसी की कठोरता से। फिर भी लक्ष्मण जाते समय जितना कर सकते थे उतना करते हैं। वे वन और दिशाओं के देवताओं को, सबको, सौंपकर जाते हैं। पहरा हटा नहीं, पहरा बदल गया।
और वे वहाँ गये जहाँ रावण रूपी चन्द्रमा के लिये राहु बने हुए राम थे। यह उपमा जितनी सुन्दर है उतनी ही दूर तक जाती है, क्योंकि राहु चन्द्रमा को इसी क्षण नहीं पकड़ता। वह अपने समय पर पकड़ता है, देर से पकड़ता है, और पकड़ लेने पर छोड़ता नहीं।
सार: मरते हुए मारीच की पुकार वहाँ तक पहुँची। लक्ष्मण ने हँसकर कहा कि जिनके भ्रुकुटि-विलास से सृष्टि का लय होता है वे संकट में नहीं पड़ सकते, पर मर्म वचन सुनते ही हरि की प्रेरणा से उनका मन डोल गया, और वे वन तथा दिशाओं के देवताओं को सौंपकर चल दिये।
सूना मौका और यति का वेष
वह ठौर अब खाली है। इस पूरी कथा में इससे सूना क्षण कोई दूसरा नहीं है, और जो प्रतीक्षा कर रहा था वह ठीक इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था। तुलसी इस घड़ी को लम्बा नहीं करते। वे एक ही चरण में बता देते हैं कि सूनापन देखा गया, और दूसरे चरण में बता देते हैं कि वह किस वेष में आया।
सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा॥
चौपाई ८
जाकें डर सुर असुर डेराहीं । निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं॥
सूना मौका देखकर दसकन्धर निकट आया, और यति के वेष में आया। संन्यासी का वेष, अर्थात् वह वेष जिससे कोई डरता नहीं, जिसके सामने द्वार अपने आप खुल जाता है, और जिसे देखकर हाथ भिक्षा के लिये बढ़ते हैं। छल ने यहाँ दूसरी बार अपना रूप चुना है, और दोनों बार उसने वही रूप चुना जिस पर विश्वास किया जाता है।
इसके तुरन्त बाद तुलसी उसका असली परिचय भी दे देते हैं, और वह परिचय छोटा नहीं है। जिसके डर से देवता और असुर तक ऐसे डरते हैं कि रात में नींद नहीं आती और दिन में अन्न नहीं खाया जाता। इतना भय जिसने फैलाया है वह इस समय किस मुद्रा में है, यह अगली चौपाई बताती है, और वह पूरे रामचरितमानस की सबसे निर्मम उपमाओं में गिनी जायेगी।
सो दससीस स्वान की नाईं । इत उत चितइ चला भड़िहाईं॥
चौपाई ९
इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा॥
वही दस सिरवाला कुत्ते की तरह इधर उधर ताकता हुआ भड़िहाई के लिये चला। पोद्दार की टीका उस शब्द का अर्थ खोलकर रख देती है, सूना पाकर कुत्ता चुपके से बरतनों में मुँह डालकर कुछ चुरा ले जाता है, उसी को भड़िहाई कहते हैं। जिसके नाम से देवता और असुर काँपते हैं, उसकी तुलना बरतन सूँघते हुए कुत्ते से की गयी है, और यह तुलना गाली देने के लिये नहीं रखी गयी।
उसका कारण दूसरी अर्धाली में है, और वहाँ सम्बोधन ही बदल जाता है। हे खगेश, कुमार्ग पर पैर रखते ही शरीर में न तेज रह जाता है, न बुद्धि, न बल का लेश। पोद्दार की टीका के अनुसार यह वचन पक्षियों के स्वामी गरुड़ से कहा जा रहा है। कथा बीच में रुकती है, सुननेवाले की ओर मुड़ती है, और एक नियम बताकर फिर आगे चल देती है।
इस नियम को पकड़ लीजिये, क्योंकि इसके बिना आगे का सारा युद्ध समझ में नहीं आयेगा। रावण का बल किसी शाप से नहीं घटा। वह उसी क्षण चला गया जिस क्षण उसने वह पहला पग रखा। जो आगे हारेगा वह वही है जो अभी यहाँ, इस सूने आँगन में, अपनी सारी शक्ति एक चोरी में लगा रहा है।
इसके बाद वह बहुत कुछ बोलता है। अनेक प्रकार की सुहावनी कथाएँ रचकर उसने राजनीति दिखायी, भय दिखाया और प्रीति दिखायी। तीनों उपाय एक साथ, जैसे किसी को घेरने के तीन घेरे। उत्तर में जो मिलता है वह छोटा है और सीधा है। हे यति गोसाईं, सुनिये, जो वचन कहे गये वे दुष्ट के से वचन हैं। वेष अभी उतरा नहीं है, पर भीतर बैठा हुआ पहचान लिया गया है।
सार: सूना मौका देखकर रावण यति के वेष में आया। तुलसी उसे चोरी करते कुत्ते की उपमा देकर खगेश से कहते हैं कि कुमार्ग पर पैर रखते ही तेज, बुद्धि और बल का लेश भी नहीं बचता। उसने राजनीति, भय और प्रीति तीनों दिखायीं, और उत्तर मिला कि ये वचन दुष्ट के से वचन हैं।
जब वेष उतरा
पहचान लिये जाने के बाद वेष रखने का कोई अर्थ नहीं बचता। तब रावण ने अपना असली रूप दिखाया, और जब अपना नाम सुनाया तब भय हुआ। तुलसी इसे छिपाते नहीं। वे लिखते हैं कि नाम सुनते ही वे सभय हो गयीं, और यह लिख देना उन्हें छोटा नहीं करता, क्योंकि उसके तुरन्त बाद जो होता है वह भय से बड़ा है। गहरा धीरज धरकर वचन निकलता है कि वह दुष्ट वहीं खड़ा रहे, प्रभु आ गये।
जो सहारा सामने नहीं है, उसी का नाम लेकर ललकारा जा रहा है। और अगले ही चरण में वह उपमा आती है जिसमें भय की जगह निर्णय बोलता है।
जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा । भएसि कालबस निसिचर नाहा॥
चौपाई १०
सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना॥
जैसे सिंह की पत्नी को कोई तुच्छ खरगोश चाहे, वैसे ही निशाचरों के स्वामी ने चाहा है, और इसी चाह से वह कालबस हो गया। उपमा में दो बातें एक साथ बँधी हैं, कौन कौन है और अन्त क्या होगा। खरगोश के मरने की घोषणा उसी वाक्य में है जिसमें उसकी चाह का उल्लेख है। इससे छोटे शब्दों में इतना बड़ा निर्णय सुनाना कठिन है।
इसके बाद वह आधी पंक्ति आती है जिस पर पढ़नेवाला रुक जाता है। वचन सुनते ही दस सिरवाले को क्रोध आया, और मन में उसने चरणों की वन्दना करके सुख माना। क्रोध ऊपर था, वन्दना भीतर थी। तुलसी का रावण कभी पूरी तरह अन्धा नहीं है। जिसे वह भीतर जानता है, उसे बाहर मानने से वह जीवन भर इनकार करता रहता है, और यही उसका सारा दुर्भाग्य है।
क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ।
दोहा २८
चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ॥ २८॥
क्रोध में भरकर उसने रथ पर बैठा लिया और आकाश मार्ग से बड़ी उतावली के साथ चला। दोहे का अन्तिम चरण वह है जो इस पूरे हरण का रंग बदल देता है, भयँ रथ हाँकि न जाइ। डर के मारे उससे रथ हाँका नहीं जा रहा। जीत का क्षण है, सामने कोई रोकनेवाला नहीं है, और हाथ काँप रहे हैं। जो चोरी करके भाग रहा है उसे अपनी चोरी का मूल्य पहले से मालूम है।
सार: पहचाने जाने पर रावण ने अपना रूप और अपना नाम प्रकट किया। भय हुआ, पर धीरज धरकर उत्तर मिला कि सिंह की पत्नी को चाहनेवाला खरगोश काल के वश हो चुका है। क्रोध में उसने रथ पर बैठाकर आकाश-मार्ग पकड़ा, पर डर के मारे रथ हाँका नहीं जा रहा था।
आकाश में विलाप
अब कुछ देर के लिये कथा आकाश में चलती है। नीचे वन है, ऊपर एक रथ है, और उस रथ से जो स्वर आ रहा है वह विलाप है। पहला विलाप पुकार का है। हा जगत् के अद्वितीय वीर रघुराज, किस अपराध से दया भुला दी। हा दुःखों के हरनेवाले, हा शरण में आये हुए को सुख देनेवाले, हा रघुकुल रूपी कमल के सूर्य। एक एक नाम गिनाया जा रहा है, और हर नाम एक याद दिलाना है, क्योंकि हर नाम में एक वचन छिपा हुआ है।
हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा । सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा॥
चौपाई ११
बिबिध बिलाप करति बैदेही । भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही॥
और फिर पुकार दूसरी ओर मुड़ जाती है, और जो कहा जाता है वह क्षमा है। लक्ष्मण का दोष नहीं है, रोष मैंने किया और वही फल पाया। थोड़ी देर पहले जो मर्म वचन कहे गये थे, उनका हिसाब यहाँ स्वयं चुका दिया जाता है और किसी दूसरे के खाते में नहीं डाला जाता। संकट की घड़ी में सबसे कठिन काम यही होता है, और वह यहाँ बिना किसी के कहे हो जाता है।
इसके बाद वह अर्धाली आती है जिसमें पूरे अरण्यकाण्ड का दुःख बँध गया है। कृपा तो बहुत है, पर स्नेही प्रभु दूर हैं। शिकायत कृपा से नहीं है, दूरी से है। जो चाहिये वह सब है, केवल वहाँ नहीं है जहाँ इस समय चाहिये। यह विलाप उसी रूप का है जिसे राम वन में छोड़ गये थे, और तुलसी उसे बिना किसी टिप्पणी के बहने देते हैं।
आगे का प्रश्न और भी अकेला है। मेरी यह विपत्ति प्रभु को कौन सुनावे। इसके साथ एक कठोर उपमा आती है, यज्ञ का पुरोडास गदहा खाना चाहता है, अर्थात् जो हवि देवताओं के लिये बनी है उसे एक पशु चाट लेना चाहता है। और तब तुलसी एक पंक्ति में बता देते हैं कि यह विलाप कितना भारी था। उसे सुनकर चराचर सब जीव दुखी हो गये। जड़ भी, चेतन भी।
सार: आकाश में जाते हुए विलाप में पहले राम के नाम पुकारे गये, फिर लक्ष्मण को निर्दोष कहकर रोष का फल अपने ऊपर लिया गया, और अन्त में यह कि कृपा तो बहुत है पर स्नेही प्रभु दूर हैं। वह विलाप सुनकर जड़-चेतन सब दुखी हो गये।
गीधराज
उस विलाप को एक और कान सुन रहा था। नीचे, उसी मार्ग में, एक बूढ़ा पक्षी था, जिसे तुलसी गीधराज कहते हैं। उसके पास न कोई साथी था, न अस्त्र, न वह आयु जिसमें युद्ध लड़ा जाता है। उसके पास केवल कान थे, और कान ने वह कर दिया जो किसी सेना ने नहीं किया।
गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी॥
चौपाई १२
अधम निसाचर लीन्हें जाई । जिमि मलेछ बस कपिला गाई॥
आर्त वाणी सुनकर गीधराज ने पहचान लिया कि ये रघुकुलतिलक की पत्नी हैं। पहचान रूप से नहीं हुई, स्वर से हुई। किसी ने बताया नहीं, किसी ने पुकारकर नाम नहीं लिया। और जो दृश्य उसने देखा उसे तुलसी एक ही उपमा में बाँध देते हैं, अधम निशाचर उन्हें लिये जा रहा है, जैसे कपिला गाय म्लेच्छ के वश में पड़ गयी हो। उपमा में गाय की असहायता भी है और उस वस्तु के अपवित्र हाथों में पड़ने का दुःख भी जो सबसे पवित्र मानी जाती है।
जो वचन वह सबसे पहले कहता है, वह लड़ाई का वचन नहीं है। हे सीते पुत्री, भय मत कीजिये, मैं इस जातुधान का नाश करूँगा। पुत्री कहकर बुलाया गया है, और यह सम्बोधन उस युद्ध का पूरा कारण बन जाता है जो अभी होने वाला है। इतना कहकर वह क्रोध में भरकर ऐसे दौड़ा जैसे पर्वत की ओर वज्र छूटता है, और दौड़ते हुए ललकारा कि वह दुष्ट खड़ा क्यों नहीं होता, निडर होकर चल दिया, पहचाना ही नहीं कि सामने कौन है।
उसे यमराज के समान आता देखकर रावण घूमा और मन में अनुमान लगाने लगा। यह मैनाक पर्वत है, या पक्षियों का स्वामी गरुड़। फिर उसने स्वयं ही दूसरा अनुमान काट दिया, गरुड़ तो अपने स्वामी सहित मेरे बल को जानता है, इसलिये वह नहीं हो सकता। पास आने पर पहचान हो गयी, और पहचानते ही स्वर बदल गया। यह तो जरठ जटायु है, यह मेरे हाथ रूपी तीर्थ में देह छोड़ेगा।
यह सुनते ही गीध क्रोध में भरकर बड़े वेग से दौड़ा, और जो कहा वह सीख के रूप में कहा। जानकी को छोड़कर कुशल से अपने घर लौट जाये, नहीं तो बहुत भुजाओं वाले का यह हाल होगा कि राम के क्रोध रूपी अत्यन्त घोर अग्नि में उसका सारा कुल पतंगे की तरह जलकर राख हो जायेगा। योद्धा रावण कोई उत्तर नहीं देता। यह चुप्पी किसी भी उत्तर से भारी है, क्योंकि जो कहा गया उसे काटने के लिये उसके पास कुछ था ही नहीं। तब गीध क्रोध करके दौड़ा।
धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा । सीतहि राखि गीध पुनि फिरा॥
चौपाई १३
चोचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही॥
उसने बाल पकड़कर उसे रथ से नीचे कर दिया और वह पृथ्वी पर आ गिरा। और तुरन्त जो अगला काम होता है वह युद्ध से पहले का काम है, गीध ने सीता को एक ओर बैठाया और तब लौटा। पहले उन्हें सुरक्षित रखना, फिर लड़ना। बूढ़े पक्षी को यह क्रम किसी ने सिखाया नहीं था। इसके बाद चोंचों से मार मारकर उसने उस देह को विदीर्ण कर डाला, और एक घड़ी भर रावण मूर्च्छित पड़ा रहा।
एक क्षण के लिये यह कथा उलट जाती है। जिस रथ को देवता नहीं रोक सके, उसे एक बूढ़े पक्षी ने अकेले रोक दिया, और हरण वहीं का वहीं रुक गया। यह प्रसंग का सबसे ऊँचा क्षण है, और सबसे छोटा भी, क्योंकि होश लौटते ही वह सब पलट जाता है।
तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना॥
चौपाई १४
काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी॥
खिसियाये हुए निशाचर ने क्रोध में भरकर अत्यन्त भयानक कटार निकाली और पंख काट डाले। पंख कटते ही पक्षी पृथ्वी पर गिर पड़ा। और गिरते समय उसने जो किया, वही उसकी सारी कथा है। उसने राम का स्मरण किया, उनकी अद्भुत करनी का स्मरण किया। हार की घड़ी में उसका मन वहीं गया जिसके लिये वह लड़ा था, और शरीर के काम आने की क्षमता चली जाने पर भी स्मरण की क्षमता उससे कोई नहीं छीन सका।
सार: आर्त वाणी सुनकर गीधराज ने उन्हें पहचान लिया, पुत्री कहकर अभय दिया, और अकेले रथ पर टूट पड़ा। बाल पकड़कर रावण को नीचे गिराया, सीता को एक ओर बैठाकर लौटा और चोंचों से उसकी देह विदीर्ण कर दी। होश आने पर रावण ने कटार से उसके पंख काट डाले, और वह राम का स्मरण करता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा।
अशोक वन
रास्ता फिर खुल गया। सीता को दुबारा रथ पर चढ़ाकर वह उतावली से चला, और तुलसी उसके साथ एक छोटी सी बात जोड़ देते हैं, उसका भय थोड़ा न था। पंख काटकर भी वह निर्भय नहीं हुआ। ऊपर आकाश में विलाप चलता रहा, और उस विलाप के लिये जो उपमा आती है वह इस पूरे काण्ड की उपमा है, मानो व्याध के वश में पड़ी हुई कोई भयभीत मृगी हो।
और तभी नीचे कुछ दिखाई देता है। न कोई नगर, न कोई मनुष्य। बस एक पर्वत पर बैठे हुए कुछ वानर।
गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी । कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी॥
चौपाई १५
एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ । बन असोक महँ राखत भयऊ॥
पर्वत पर बैठे वानरों को देखकर हरि का नाम लेकर वस्त्र नीचे डाल दिया गया। एक ही अर्धाली में दो काम हुए। नाम लिया गया, और चिह्न छोड़ा गया। जो डाला गया वह सन्देश नहीं था, उस पर कुछ लिखा हुआ नहीं था, और किसके हाथ पड़ेगा यह डालनेवाली नहीं जानती थीं। इतनी ऊँचाई से गिराया हुआ वस्त्र किस पत्थर पर जा पड़ेगा, इसका हिसाब कोई नहीं लगा सकता। फिर भी वह डाला गया, और यही उस घड़ी में किया जा सकने वाला अकेला काम था।
इसी प्रकार वह उन्हें ले गया, और अशोक वन में ले जाकर रख दिया। चौपाई का अन्तिम चरण बहुत सादा है, जैसे कोई यात्रा का अन्त लिख रहा हो। पर उस वन का नाम ध्यान से देखिये। अशोक, अर्थात् जिसमें शोक न हो। इस पूरी कथा में जो नाम सबसे अधिक उलटा पड़ता है, वही नाम उस जगह को मिला है जहाँ उन्हें रख दिया गया।
हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ।
दोहा २९
तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ॥ २९ (क)॥
दोहा बताता है कि वहाँ पहुँचकर भी उसने वही किया जो उस सूने वन में किया था। बहुत प्रकार से भय दिखाया और प्रीति दिखायी, वही दो उपाय, और दोनों बार वही परिणाम निकला। अन्त में जो शब्द तुलसी उसके लिये रखते हैं वह पराजय का शब्द है, हारि परा खल। सारा बल, सारा छल, सारा आकाश-मार्ग, और अन्त में वह हार गया।
हारकर उसने अशोक वृक्ष के नीचे यत्न कराके रखवा दिया। यही इस प्रसंग की अन्तिम गति है। जिसने उठाया वह हारा हुआ है, और जो उठायी गयीं वे उस वृक्ष के नीचे बैठी हैं जिसका नाम शोक के न होने पर रखा गया है। कथा यहीं रुकती है, और आगे का पन्ना अशोक वन में नहीं खुलता, उस सूनी जगह पर खुलता है जहाँ दो भाई लौटकर आ रहे हैं।
सार: सीता को फिर रथ पर चढ़ाकर रावण उतावली से चला। पर्वत पर बैठे वानरों को देखकर हरि का नाम लेकर वस्त्र नीचे डाल दिया गया। भय और प्रीति दोनों दिखाकर हार जाने के बाद उसने उन्हें अशोक वृक्ष के नीचे यत्न कराके रख दिया।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग में दो पहरे हैं, और दोनों के साथ तुलसी बड़ी सावधानी से चलते हैं। पहला पहरा आज्ञा से बना था, बुद्धि और विवेक से, बल और समय का विचार करके। वह टूटा, और तुलसी उसके टूटने का कारण किसी की कठोरता में नहीं रखते, वे दो शब्द रखकर आगे चले जाते हैं, हरि प्रेरित। दूसरा पहरा किसी आज्ञा से नहीं बना था। एक बूढ़े पक्षी ने एक स्वर सुना और उड़ चला। पहले वाले के पास बल था और उसे जाना पड़ा। दूसरे के पास कुछ नहीं था और उसने रथ रोक दिया।
और इस पूरे पन्ने पर रावण एक बार भी वह नहीं पा सका जो वह लेने आया था। उसे न वह स्वीकृति मिली जो वह राजनीति, भय और प्रीति से माँग रहा था, न वह भय मिला जो वह अपना नाम सुनाकर उत्पन्न करना चाहता था, न वह चुप्पी मिली जो हरण के बाद चाहिये होती है। उसे मिला एक काँपता हुआ हाथ, एक बूढ़े पक्षी की चोंच, और अन्त में दोहे का वह शब्द जिससे बचने के लिये वह इतनी दूर से यहाँ तक आया था।
मारीच ने वह पाया जो रावण अपने सारे बल से नहीं पा सका। छल करते हुए, कपट का शरीर पहने हुए, उसने मरते समय एक बार भीतर से स्मरण किया, और जो देखा जाता है वह भीतर वाला है। देवताओं ने फूल उसी पर बरसाये। इस काण्ड में जो सबसे बड़ा अन्तर है वह बल का नहीं, दिशा का है। जो उसी ओर मुड़ गया वह पहुँच गया, चाहे वह राक्षस ही क्यों न हो, और जो अन्त तक दूसरी ओर मुड़ा रहा वह जीतकर भी हारा हुआ लौटा।
इस पन्ने को पढ़ चुकने के बाद जो चित्र देर तक साथ रहता है वह उस गिरते हुए वस्त्र का है। ऊपर एक रथ उड़ा जा रहा है, नीचे एक पर्वत पर कुछ वानर बैठे हैं जो किसी को नहीं जानते, और उन दोनों के बीच हवा में एक कपड़ा गिर रहा है जिस पर न कोई नाम है, न कोई पता। जिसने डाला उसने केवल इतना किया कि हरि का नाम लिया और हाथ छोड़ दिया। इससे आगे उसके हाथ में कुछ था ही नहीं।
और जटायु वहीं पड़ा है, पंख कटे हुए, उठ सकने की स्थिति में नहीं। वह जीता नहीं, वह रोक भी नहीं सका, और फिर भी इस काण्ड में उसके जैसा कोई दूसरा नहीं है। उसने एक स्वर सुना, पहचान लिया, पुत्री कहकर अभय दिया और उड़ चला। बुद्धि और विवेक से बल तथा समय तौलने का आदेश उसे किसी ने नहीं दिया था, और यदि दिया गया होता तो शायद वह उड़ता भी नहीं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा २७ से २९, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।