रामचरितमानस · अरण्यकाण्ड · वियोग और तीन प्रबल शत्रु
वियोग और तीन प्रबल शत्रु
राम आगे चल पड़े हैं और वन उन्हें चिढ़ाने लगा है। और जो उपदेश इस पीड़ा के ठीक बाद आता है, वह किसी ने राम को नहीं दिया। वह राम ने दिया है।
यह प्रसंग एक दोहे से खुलता है जो कथा के भीतर किसी पात्र से नहीं कहा जा रहा। पिछला प्रसंग जहाँ ठहरा था, वहाँ एक स्त्री थी जिसे प्रभु ने अपना लिया था। उसी के तुरन्त बाद तुलसी कथा से मुँह फेरकर सीधे मन को सम्बोधित कर लेते हैं, और जो कहते हैं वह प्रशंसा नहीं, फटकार है। पन्ने की पहली आवाज़ यही फटकार है, और उसके बाद ही पाँव आगे बढ़ते हैं।
फिर वन छूटता है और दो भाई आगे चल पड़ते हैं। तुलसी एक ही पंक्ति में दो बातें रख देते हैं जिन्हें वे आपस में मिलाने की कोशिश नहीं करते: ये दोनों अतुलित बल वाले हैं, मनुष्यों में सिंह के समान, और इनमें से एक विरही की तरह विषाद कर रहा है। आगे का सारा पन्ना उसी विषाद के भीतर से बोला गया है। वन वही है जो पहले था, हरा और भरा और सुन्दर, पर इस घड़ी वह देखनेवाले को चुभता है। पशु जोड़ों में हैं, पक्षी जोड़ों में हैं, और जोड़ों में होना ही ताना बन जाता है।
और जहाँ पीड़ा सबसे घनी होती है, ठीक वहीं तुलसी उपदेश रख देते हैं। तीन अत्यन्त प्रबल दुष्ट गिनाये जाते हैं, काम, क्रोध और लोभ, और यह भी बताया जाता है कि इनमें से किसका बल किस चीज़ पर टिका है। इस पन्ने पर ध्यान रखने लायक एक ही बात है, और वह बात दिशा की है। यह उपदेश किसी ने शोक में डूबे हुए व्यक्ति को सान्त्वना के तौर पर नहीं दिया। जो शोक में है, वही बोल रहा है। सुननेवाला छोटा भाई है, और कहनेवाला वही है जिसने अभी-अभी कहा था कि प्रिया के बिना यह सुहावना वसन्त भय पैदा कर रहा है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम इस प्रसंग में वे चलते भी हैं, विलाप भी करते हैं और उपदेश भी देते हैं, और तीनों काम एक ही साँस में होते हैं।
- लक्ष्मण छोटे भाई, जिन्हें इस पूरे पन्ने पर सम्बोधित किया जाता है और जो एक शब्द नहीं बोलते। उनका साथ होना ही एक घटना बन जाता है।
- वह प्रिया, जिनका नाम एक बार भी नहीं आता इस पूरे प्रसंग में उनके लिये केवल एक शब्द आता है, प्रिया, और उस एक शब्द के इर्द-गिर्द सारा विषाद घूमता है।
- मदन कामदेव, जो इस पन्ने पर एक व्यक्ति नहीं, एक चढ़ आयी हुई सेना है, जिसके पास हाथी भी हैं, घोड़े भी, नगाड़े भी और भाट भी।
- शिव वे सुनानेवाले, जो बीच में एक बार खुलकर सामने आ जाते हैं और अपना अनुभव अपने नाम से कह देते हैं।
- उमा पार्वती, जिन्हें सम्बोधित करके यह सारी कथा कही जा रही है और जिनका नाम आते ही स्वर बदल जाता है।
- मन इस प्रसंग का सबसे पहला श्रोता, जिसे पहले ही दोहे में महामंद कहकर पुकारा जाता है।
मन से कहा गया एक वाक्य
पिछले प्रसंग का अन्त एक बहुत बड़ी बात पर हुआ था, और तुलसी उस बात को वहीं छोड़कर आगे नहीं बढ़ते। वे एक पल रुकते हैं, कथा से आँख हटाते हैं, और सीधे उस मन से बात करने लगते हैं जो यह कथा सुन रहा है। दोहे में न कोई नाम है, न कोई सम्बोधन किसी पात्र का। जिस स्त्री की चर्चा है उसका नाम तक इस दोहे में नहीं आता। आती है केवल उसकी दशा, और उसके बदले हुए भाग्य की गवाही।
जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि।
दोहा ३६
महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि॥ ३६॥
पहली पंक्ति में तीन बातें एक साथ रखी गयी हैं और तीनों नीचे की ओर गिरती हुई हैं। जाति से हीन। पापों की जन्मभूमि। और स्त्री। इन तीनों को गिनाकर तुलसी यह नहीं कहते कि फिर भी उसे स्वीकार कर लिया गया। वे और आगे जाते हैं, वे कहते हैं कि उसे मुक्त कर दिया गया। जो सबसे नीचे गिना गया था, उसी को सबसे ऊँचा दे दिया गया, और यह काम जिन्होंने किया उनका नाम भी यहाँ नहीं लिया जाता, केवल प्रभु कहकर काम चला लिया जाता है।
और फिर दूसरी पंक्ति आती है, और वहाँ स्वर एकदम पलट जाता है। अब कोई कथा नहीं कही जा रही, अब एक फटकार पड़ रही है, और वह फटकार मन पर पड़ रही है। महामंद, यानी अत्यन्त मन्दबुद्धि। तुलसी अपने ही मन से पूछते हैं कि ऐसे प्रभु को भुलाकर सुख की आशा किस बल पर की जा रही है। प्रश्न का उत्तर नहीं दिया जाता, क्योंकि प्रश्न उत्तर के लिये पूछा ही नहीं गया। वह छोड़ दिया जाता है, और उसी अधूरेपन में वह देर तक टँगा रहता है।
इस दोहे की जगह देखने लायक है। यह वहाँ रखा गया है जहाँ से कथा फिर चल पड़ेगी, यानी विदा की जगह पर। जो अभी-अभी देखा गया है उसका हिसाब यहीं चुका लिया जाता है, और हिसाब चुकाने का तरीका यह है कि कवि किसी और को नहीं, अपने आपको कठघरे में खड़ा कर लेता है। आगे जो पन्ना आता है वह पीड़ा का पन्ना है, और उसकी भूमिका इसी एक झिड़की से बनती है।
सार: प्रसंग एक दोहे से खुलता है जिसमें कथा नहीं, एक फटकार है। जाति से हीन और पापों की जन्मभूमि कही गयी स्त्री तक को जिन्होंने मुक्त कर दिया, उन प्रभु को भुलाकर सुख चाहनेवाले मन को महामंद कहकर पुकारा जाता है।
वन छूटा, और विषाद साथ चला
अब कथा लौटती है, और लौटते ही चल पड़ती है। जिस वन में अभी वह सब हुआ था, वह भी पीछे छूट जाता है। तुलसी ने यहाँ एक छोटा सा शब्द रखा है, सोऊ, यानी उसको भी। पहले भी वन छूटे थे, यह भी छूट गया। ठहरने की कोई जगह इस काण्ड में अब बची नहीं है।
चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ॥
चौपाई १
बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा॥
इस एक चौपाई में दो वाक्य आमने-सामने रख दिये गये हैं और उनके बीच कोई पुल नहीं बनाया गया। पहले वाक्य में दोनों भाई अतुलित बल वाले हैं, मनुष्यों में सिंह के समान। दूसरे वाक्य में प्रभु विरही की तरह विषाद कर रहे हैं। तुलसी यह नहीं समझाते कि इतना बल और इतना विषाद एक ही देह में कैसे रहते हैं। वे दोनों को साथ लिख देते हैं और पढ़नेवाले पर छोड़ देते हैं।
और एक शब्द पर रुकना ज़रूरी है, इव। विरही की तरह। यह उपमा है, पहचान नहीं। तुलसी यह नहीं कहते कि प्रभु विरही हैं, वे कहते हैं कि विरही की तरह विषाद करते हैं। यह अन्तर बहुत महीन है और पूरे पन्ने पर टिका रहता है। आगे जितनी बार पीड़ा बोलेगी, उतनी बार यह शब्द पीछे खड़ा रहेगा।
और विषाद का तरीका क्या है। रोना नहीं, चुप हो जाना नहीं। बोलना। अनेक कथाएँ और अनेक संवाद। जो भीतर भरा है वह वाणी के रास्ते बाहर आ रहा है, और वाणी का श्रोता केवल एक है, साथ चलता हुआ छोटा भाई। इस पूरे प्रसंग में लक्ष्मण एक शब्द नहीं बोलते। उनका काम सुनना है, और सुनना भी कम काम नहीं है।
लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा॥
चौपाई २
नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा॥
पहली पंक्ति में पूरी तरह प्रशंसा है। लक्ष्मण, वन की शोभा तो देखिये, इसे देखकर किसका मन क्षुब्ध न होगा। यहाँ छोभा का अर्थ खिल उठना भी है और हिल जाना भी, और आगे की पंक्ति पढ़ते ही यह साफ़ हो जाता है कि इस घड़ी कौन सा अर्थ काम कर रहा है।
क्योंकि दूसरी पंक्ति में वही सुन्दरता मुड़कर चुभने लगती है। सारे पक्षी और पशुओं के झुंड स्त्री सहित हैं। यह एक निरा तथ्य है, वन में यह रोज़ होता है, इसमें कुछ नया नहीं। पर आगे जो जुड़ता है वह तथ्य नहीं है, वह पढ़ना है। मानो वे सब मेरी निन्दा कर रहे हैं। पशु कुछ नहीं कह रहे। कहना सुननेवाले के भीतर हो रहा है।
यही इस पूरे हिस्से की बनावट है। वन नहीं बदला। वन वैसा ही है जैसा पिछले पन्ने पर था। जो बदला है वह देखनेवाली आँख है, और तुलसी उस आँख का पक्ष नहीं लेते और उसका मज़ाक भी नहीं उड़ाते। वे बस दिखाते हैं कि जिसके भीतर कुछ टूटा हुआ हो, उसके सामने सारी दुनिया गवाही देने लगती है।
सार: राम वह वन भी छोड़कर आगे चलते हैं। दोनों भाई अतुलित बल वाले हैं और उनमें से एक विरही की तरह विषाद करता हुआ अनेक कथाएँ कहता जाता है। वन की शोभा दिखाते हुए वे कहते हैं कि सारे पशु-पक्षी जोड़ों में हैं, मानो वे सब मेरी निन्दा कर रहे हों।
मृगियों का वाक्य
और फिर एक दृश्य आता है जो इस पूरे काण्ड की सबसे तीखी चोट है, और वह चोट बिना किसी ऊँची आवाज़ के दी जाती है। दो आदमी वन में चल रहे हैं। हिरनों का झुंड उन्हें देखकर भागता है। इतना ही दृश्य है। इसके आगे जो है वह दृश्य नहीं है, वह सुननेवाले के कान में बनी हुई बात है।
हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं॥
चौपाई ३
तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए॥
हिरनियाँ भागते हुए हिरनों को दिलासा देती हैं। डरने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि ये साधारण हिरनों से पैदा हुए हैं, इन्हें कोई खतरा नहीं। आनन्द करें। ये जो दो आये हैं, ये तो सोने का हिरन खोजने निकले हैं। वह सोने का हिरन इसी काण्ड में पीछे आ चुका है, और उसके पीछे जो गया था वह आज इस वन में इसी तरह चल रहा है।
यह वाक्य किसी शत्रु ने नहीं कहा। यह किसी व्यंग्य करनेवाले ने नहीं कहा। यह हिरनियों के मुँह में रखा गया है, और हिरनियाँ बोलती नहीं हैं। यानी यह वाक्य भी उसी भीतर से निकला है जो अभी-अभी कह चुका है कि सब मेरी निन्दा कर रहे हैं। जो सबसे कड़ी बात इस पन्ने पर कही जाती है, वह अपने ही मुँह से अपने ही ऊपर कही गयी है, और उसमें कोई सफ़ाई नहीं जोड़ी गयी।
तुलसी यहाँ एक शब्द भी बचाव का नहीं लिखते। न यह कि ऐसा हुआ ही क्यों, न यह कि दोष किसका था, न यह कि उस मृग के पीछे जाने में क्या विवशता थी। उलाहना खड़ा कर दिया जाता है और खड़ा ही छोड़ दिया जाता है। इसके बाद ही वे पीड़ा को नीति की ओर मोड़ते हैं, और मोड़ने का पुल हाथी बनते हैं।
संग लाइ करिनीं करि लेहीं । मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं॥
चौपाई ४
हाथी हथिनियों को अपने साथ लगाये चलते हैं, और देखनेवाले को लगता है कि वे उसे शिक्षा दे रहे हैं। शिक्षा क्या है, यह तुलसी अगली पंक्तियों में खोलते हैं, और वहाँ स्वर पूरी तरह बदल जाता है। अब यह विलाप नहीं है, यह नीति है। भलीभाँति सोचे-समझे हुए शास्त्र को भी बार-बार देखते रहना चाहिये, वह एक बार पढ़कर छोड़ देने की चीज़ नहीं है। और जिस राजा की अच्छी तरह सेवा कर ली गयी हो, उसे भी अपने वश में समझ लेना भूल है।
राखिअ नारि जदपि उर माहीं । जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं॥
चौपाई ५
देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा॥
तीसरी बात इसी क्रम में आती है और तीनों को एक सूत्र में बाँध देती है। स्त्री को चाहे हृदय के भीतर ही क्यों न रखा जाय, युवती, शास्त्र और राजा, ये तीनों किसी के वश में नहीं रहते। यह नीति कठोर लगती है और है भी, पर ध्यान देने की बात यह है कि यह किस घड़ी बोली जा रही है। जिसने अभी कहा था कि वन मेरी निन्दा कर रहा है, वही अब शास्त्र और राज्य और गृहस्थी का नियम गिना रहा है।
और गिनाते-गिनाते वह फिर फिसल जाता है। अन्तिम पंक्ति में नीति टूट जाती है और पीड़ा वापस आ जाती है। लक्ष्मण, यह सुहावना वसन्त तो देखिये, प्रिया के बिना यह मुझे भय उत्पन्न कर रहा है। सुहावना और भय, ये दोनों शब्द एक ही साँस में रखे गये हैं। जो चीज़ सबको सुख देती है, वही इस घड़ी डरा रही है, और डरने का कारण बाहर नहीं है।
सार: हिरनों को भागते देख हिरनियाँ कहती हैं कि ये तो सोने का मृग खोजने आये हैं, इनसे भय नहीं। फिर हाथियों को देखकर राम नीति कहते हैं कि शास्त्र को बार-बार देखना चाहिये, सेवा किये हुए राजा को वश में नहीं समझना चाहिये, और युवती, शास्त्र तथा राजा किसी के वश में नहीं रहते। अन्त में वे कहते हैं कि प्रिया के बिना यह सुन्दर वसन्त भय उत्पन्न कर रहा है।
बगमेल
और यहाँ से चित्र बदल जाता है। अब तक वसन्त एक ऋतु था, जिसमें फूल थे और भौंरे थे और कोयलें थीं। अगली ही पंक्ति में वह एक सेना बन जाता है, और सेना का सेनापति कामदेव है। यह उपमा तुलसी एक बार खड़ी करके छोड़ते नहीं, वे इसे कई चौपाइयों तक खींचते हैं और उसका एक-एक अंग गिनाते हैं। पर शुरुआत एक ही शब्द से होती है।
बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।
दोहा ३७ (क)
सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल॥ ३७ (क)॥
देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात।
डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात॥ ३७ (ख)॥
बगमेल का अर्थ है एक साथ धावा बोल देना, टूट पड़ना। और धावा किस पर बोला गया, यह पहली पंक्ति बताती है। विरह से व्याकुल, बलहीन, और बिलकुल अकेला। तीनों बातें एक साथ जान ली गयीं, और तभी हमला हुआ। कामदेव ने वन को साथ लिया, भौंरों को साथ लिया, पक्षियों को साथ लिया। यानी जिस जगह पीड़ित व्यक्ति खड़ा था, उसी जगह की हर चीज़ उसके विरुद्ध कर दी गयी।
और यहीं वह बात आती है जो इस पूरे प्रसंग को सम्भालती है। कामदेव का दूत आगे भेजा गया था, और उस दूत ने देखा कि जिसे अकेला समझा गया था वह अकेला नहीं है, भाई साथ है। यह खबर लेकर वह लौटा, और खबर सुनकर कामदेव ने चढ़ाई रोक दी और सेना को ठहराकर डेरा डाल दिया। हमला हुआ ही नहीं, वह डेरे पर रुक गया।
इस एक ब्योरे से पूरा पन्ना पलट जाता है। दोहे की पहली पंक्ति में शब्द आया था निपट अकेल, बिलकुल अकेला। वह आकलन कामदेव का था, और वही आकलन गलत निकला। जो साथ चल रहा था, जो एक शब्द नहीं बोल रहा था, जिसका काम केवल सुनना था, उसी की उपस्थिति से सेना ठहर गयी। तुलसी इस बात पर कोई टिप्पणी नहीं करते। वे बस डेरा डलवा देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।
सार: विरह से व्याकुल, बलहीन और बिलकुल अकेला जानकर कामदेव ने वन, भौंरों और पक्षियों को साथ लेकर धावा बोल दिया। पर उसका दूत यह देख गया कि भाई साथ है, और वह बात सुनकर कामदेव ने सेना को रोककर डेरा डाल दिया।
वसन्त की सेना
डेरा पड़ चुका है, तो अब उस डेरे का ब्योरा आता है, और तुलसी उसे ऐसे गिनाते हैं जैसे कोई सेनापति दूसरी सेना की गिनती कर रहा हो। विशाल वृक्षों पर लताएँ उलझी हुई हैं, और वे ऐसी दिखती हैं मानो तरह-तरह के तंबू तान दिये गये हों। केले और ताड़ के ऊँचे पत्ते ध्वजाएँ और पताकाएँ हैं। और इस डेरे को देखकर वही नहीं मोहित होता जिसका मन धीर है, बाकी सब बँध जाते हैं।
फिर सिपाही गिने जाते हैं। अनेक वृक्ष अनेक ढंग से फूले हुए हैं, और वे ऐसे लगते हैं मानो अलग-अलग वर्दी पहने हुए बहुत से तीरंदाज़ खड़े हों। कहीं-कहीं जो सुन्दर वृक्ष शोभा दे रहे हैं, वे मानो अलग-अलग छावनी डाले हुए योद्धा हैं। यह उपमा जितनी आगे बढ़ती है उतनी ही सघन होती जाती है, और हर बार वही चीज़ दिखायी जाती है जो पहले से वहाँ थी, बस नाम बदलकर।
कूजत पिक मानहुँ गज माते । ढेक महोख ऊँट बिसराते॥
चौपाई ६
मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी॥
अब सवारियाँ आती हैं, और वे क्रम से आती हैं, जैसे किसी सचमुच की सेना में आती हैं। कोयलों की कूक मतवाले हाथियों की चिंघाड़ है। ढेक और महोख ऊँट और खच्चर हैं, यानी बोझ ढोनेवाले जानवर, जिनके बिना कोई सेना चल नहीं सकती। और मोर, चकोर, तोते, कबूतर और हंस सब ताज़ी घोड़े हैं, यानी सबसे तेज़ और सबसे सुन्दर सवारी। पक्षियों का पूरा वन एक अस्तबल में बदल दिया गया है।
पैदल सिपाही भी हैं। तीतर और बटेर के झुंड पैदल सेना हैं, और इसी जगह तुलसी एक बार हाथ खड़े कर देते हैं और कहते हैं कि कामदेव की सेना का वर्णन हो ही नहीं सकता। फिर भी वे गिनते रहते हैं। पर्वतों की शिलाएँ रथ हैं। झरने नगाड़े हैं। और पपीहे भाट हैं, जो आगे-आगे चलकर विरदावली गाते हैं।
मधुकर मुखर भेरि सहनाई । त्रिबिध बयारि बसीठीं आई॥
चौपाई ७
चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें । बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें॥
अब बाजे। भौंरों की गुंजार भेरी और शहनाई है। और फिर एक बहुत सुन्दर पंक्ति आती है। शीतल, मन्द और सुगन्धित हवा दूत बनकर आयी है। वही हवा जो सबको अच्छी लगती है, यहाँ सन्देश लेकर आया हुआ राजदूत है, और राजदूत युद्ध से पहले ही आते हैं। इस तरह चारों अंग पूरे हो जाते हैं, हाथी, घोड़े, रथ और पैदल, और चतुरङ्गिणी सेना लेकर कामदेव सबको चुनौती देता हुआ घूम रहा है।
ध्यान देने की बात यह है कि चुनौती किसी एक को नहीं दी जा रही। सबहि, सबको। यह उपमा अब उस एक वन से निकलकर सब पर लागू हो गयी है। जो भी कहीं भी वसन्त देखता है, वह इसी सेना के सामने खड़ा है, और उसे यह मालूम भी नहीं होता कि वह किसी युद्ध में है।
सार: वसन्त का सारा वन कामदेव की सेना बना दिया जाता है। लताएँ तंबू हैं, केला और ताड़ ध्वजा-पताका, फूले वृक्ष तीरंदाज़, कोयलें मतवाले हाथी, मोर और हंस ताज़ी घोड़े, तीतर और बटेर पैदल सेना, शिलाएँ रथ, झरने नगाड़े, पपीहे भाट, भौंरे भेरी और शहनाई, और शीतल मन्द सुगन्ध हवा दूत। इसी चतुरङ्गिणी सेना के साथ कामदेव सबको चुनौती देता फिरता है।
जो धीर रहे, उसी की लीक
और अब वह मोड़ आता है जिसके लिये यह सारी सेना खड़ी की गयी थी। इतनी देर तक जो एक सुन्दर चित्र लग रहा था, वह अचानक एक प्रश्न बन जाता है। सेना सामने है, तो उसके सामने खड़ा कौन है, और वह कैसा है।
लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका॥
चौपाई ८
एहि कें एक परम बल नारी । तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी॥
पहली पंक्ति में कोई निन्दा नहीं है और कोई भय नहीं है। जो कामदेव की इस सेना को देखकर भी धीर बने रहते हैं, संसार में लीक उन्हीं की बनती है। लीका यानी वह निशान जो रह जाता है, वह प्रतिष्ठा जिससे आदमी पहचाना जाता है। यह जीत की बात नहीं है, यह टिके रह जाने की बात है।
दूसरी पंक्ति में पूरी सेना एक ही जगह सिमट जाती है। इस कामदेव का सबसे बड़ा बल एक ही है, स्त्री। जो उससे बच जाय, वही बड़ा योद्धा है। इतनी देर हाथी गिने गये, घोड़े गिने गये, रथ और नगाड़े और भाट गिने गये, और अन्त में कहा जाता है कि असली बल इन सबमें नहीं है, वह एक ही जगह है। बाकी सब साज है।
और यहीं इस पन्ने की सबसे कड़ी बात है, जिसे तुलसी कहते नहीं और जो कहे बिना साफ़ है। यह वाक्य किसने कहा। उसी ने, जिसने चन्द पंक्ति पहले कहा था कि प्रिया के बिना यह वसन्त भय उत्पन्न कर रहा है। कोई सिद्ध पुरुष पास बैठकर दुखी आदमी को समझा नहीं रहा। जो दुख में है, वही समझा रहा है, और जिसे समझाया जा रहा है वह चुप है।
सार: राम कहते हैं कि कामदेव की इस सेना को देखकर भी जो धीर बने रहते हैं, जगत् में उन्हीं की लीक बनती है। इस कामदेव का एक ही बड़ा बल है, स्त्री, और उससे जो बच जाय वही श्रेष्ठ योद्धा है।
तीन प्रबल खल
अब तक बात एक ही शत्रु की थी। अगले दोहे में वह एक शत्रु तीन हो जाता है, और वाक्य पूरी तरह सूत्र बन जाता है। सम्बोधन वही रहता है, तात, यानी वही छोटा भाई जो साथ चल रहा है और सुन रहा है। बात उसके लिये कही जा रही है, पर बात उसके अकेले के लिये नहीं है।
तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ।
दोहा ३८ (क)
मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ॥ ३८ (क)॥
लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि।
क्रोध कें परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि॥ ३८ (ख)॥
तीन गिनाये जाते हैं, काम, क्रोध और लोभ, और तीनों के साथ दो विशेषण लगते हैं। अति प्रबल, यानी बहुत बलवान्, और खल, यानी दुष्ट। पहला विशेषण इन्हें कम आँकने से रोकता है और दूसरा इनसे दोस्ती करने से रोकता है। जो बलवान् हो और दुष्ट भी हो, उससे न लड़े बिना काम चलता है और न उसे अपना माने बिना।
और फिर दूसरी पंक्ति इनका कद बताती है। ये विज्ञान के धाम मुनियों के मन को भी पल भर में क्षुब्ध कर देते हैं। तुलसी ने सबसे बड़ा उदाहरण चुना है। जिन्होंने जान लिया है, जिनका मन विज्ञान का घर बन चुका है, उनके मन को भी। और समय भी सबसे छोटा चुना है, एक निमिष। बरसों की साधना और पलक झपकने का समय, दोनों एक ही पंक्ति में रख दिये गये हैं।
इसके बाद तुलसी एक और काम करते हैं, जो इस उपदेश को केवल चेतावनी से आगे ले जाता है। वे तीनों का बल अलग-अलग करके बताते हैं। लोभ का बल इच्छा और दम्भ है। काम का बल केवल स्त्री है। और क्रोध का बल कठोर वचन हैं। और यह अपनी ओर से नहीं कहा जाता, यह कहकर कहा जाता है कि श्रेष्ठ मुनि विचार करके ऐसा कहते हैं।
शत्रु का बल जान लेना आधी लड़ाई है, क्योंकि जो बल पर टिका हो वह बल हटते ही गिर जाता है। इसीलिये यह गिनती सूखी नहीं लगती। और काम के बारे में जो कहा गया, वह वही है जो अभी चौपाई में कहा जा चुका था, कि इसका एक ही परम बल है। एक बात दो बार कही गयी है, और दूसरी बार वह और छोटी और और साफ़ कर दी गयी है।
सार: राम कहते हैं कि काम, क्रोध और लोभ, ये तीन अत्यन्त प्रबल दुष्ट हैं और ये विज्ञान के धाम मुनियों के मन को भी पल भर में क्षुब्ध कर देते हैं। लोभ का बल इच्छा और दम्भ है, काम का बल केवल स्त्री, और क्रोध का बल कठोर वचन।
जिनकी दया से ये छूटते हैं
इसी जगह स्वर बदलता है, और बदलने की सूचना एक नाम से मिलती है। अब तक तात कहा जा रहा था, अब उमा कहा जाता है। यानी अब हम पंचवटी के आगे वाले वन में नहीं हैं, हम वहाँ हैं जहाँ शिव यह सारी कथा पार्वती को सुना रहे हैं। और सुनानेवाले को यह बताना ज़रूरी लगता है कि जो अभी-अभी कहा गया, वह किसने कहा और क्यों कहा।
गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी॥
चौपाई ९
कामिन्ह कै दीनता देखाई । धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई॥
पहली पंक्ति में तीन बातें हैं और तीनों एक ही ओर इशारा करती हैं। गुणों से परे। चराचर के स्वामी। सबके भीतर की जाननेवाले। यह उस व्यक्ति का परिचय है जो अभी-अभी वन में विलाप कर रहा था, और यह परिचय ठीक उसी जगह दिया जाता है जहाँ पढ़नेवाले के मन में सन्देह उठ सकता था।
और दूसरी पंक्ति सन्देह का उत्तर देती है। यह सब कहकर उन्होंने कामी लोगों की दीनता दिखलायी और धीर पुरुषों के मन में वैराग्य को दृढ़ किया। यानी जो पीड़ा दिखायी दी, वह किसी की बेबसी नहीं थी, वह दिखायी गयी बेबसी थी, और वह हमारी है। वियोग में जो शब्द निकले, उन्हीं से एक पाठ बन गया, और पाठ दो तरह के लोगों तक पहुँचा। जो काम के वश में हैं वे अपनी हालत पहचान लें, और जो धीर हैं उनका वैराग्य और पक्का हो जाय।
क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम कीं दाया॥
चौपाई १०
सो नर इंद्रजाल नहिं भूला । जा पर होइ सो नट अनुकूला॥
अब सूची और लम्बी हो जाती है। क्रोध, काम, लोभ, मद और माया। तीन से पाँच। और इनके छूटने का उपाय कोई विधि नहीं बतायी जाती, कोई अभ्यास नहीं गिनाया जाता, कोई तपस्या का क्रम नहीं दिया जाता। एक ही शब्द रखा जाता है, दया। ये सब श्रीराम की दया से छूट जाते हैं।
और दूसरी पंक्ति में वह उपमा आती है जो सब कुछ अपनी जगह पर बिठा देती है। जिस पर वह नट प्रसन्न हो, वही मनुष्य इस इन्द्रजाल में नहीं भूलता। नट वही है जिसने यह सारा खेल रचा है। खेल रचनेवाले को पहचान लेने पर खेल टूटता नहीं, पर वह धोखा देना छोड़ देता है। इसीलिये यहाँ भागने की बात नहीं है, प्रसन्न होने की बात है।
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना॥
चौपाई ११
पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा । पंपा नाम सुभग गंभीरा॥
और अब सुनानेवाला अपनी ओर से हस्ताक्षर कर देता है। उमा, मैं अपना अनुभव कहता हूँ। यह शास्त्र का हवाला नहीं है, यह सुनी हुई बात नहीं है। हरि का भजन ही सत्य है, यह सारा जगत् स्वप्न है। पूरे प्रसंग की सबसे बड़ी बात सबसे छोटे वाक्य में आती है, और उसके साथ कोई प्रमाण नहीं जोड़ा जाता, केवल एक गवाही जोड़ी जाती है, अपनी।
और उसी चौपाई की दूसरी पंक्ति में कथा फिर चल पड़ती है, बिना किसी विराम के। फिर प्रभु पंपा नामक सुन्दर और गहरे सरोवर के तीर पर गये। जगत् को स्वप्न कहनेवाला वाक्य और आगे के कदम का ब्योरा एक ही चौपाई में साथ-साथ रखे गये हैं। तुलसी इन दोनों के बीच कोई दीवार नहीं खड़ी करते। कथा चलती रहती है और सत्य भी उसी के भीतर चलता रहता है।
सार: शिव उमा से कहते हैं कि राम गुणातीत, चराचर के स्वामी और सबके अन्तर्यामी हैं, और यह सब कहकर उन्होंने कामियों की दीनता दिखलायी तथा धीरों के मन में वैराग्य दृढ़ किया। क्रोध, काम, लोभ, मद और माया राम की दया से छूट जाते हैं। हरि का भजन ही सत्य है और जगत् स्वप्न है। इसके बाद प्रभु पंपा सरोवर के तीर पर पहुँचते हैं।
पंपा का तट
पंपा के आते ही पन्ने का रंग बदल जाता है, और बदलाव किसी घोषणा से नहीं आता। अब तक जो कुछ दिखाया गया था वह सेना था। अब जो दिखाया जाता है वह जल है, और जल के साथ ठहराव आता है। पहली ही उपमा बता देती है कि इस सरोवर को किस तरह पढ़ा जाना है।
संत हृदय जस निर्मल बारी । बाँधे घाट मनोहर चारी॥
चौपाई १२
जल संतों के हृदय जैसा निर्मल है। यह उपमा इस पूरे वर्णन की कुंजी है। जो आगे आयेगा वह केवल एक झील का ब्योरा नहीं रहेगा, हर चीज़ के साथ एक अर्थ लगा हुआ आयेगा। और चार सुन्दर घाट बँधे हुए हैं, यानी उतरने की जगह बनी हुई है। जहाँ-तहाँ तरह-तरह के पशु जल पी रहे हैं, और वह दृश्य ऐसा है मानो किसी उदार दानी के घर पर याचकों की भीड़ लगी हो।
पुरइनि सघन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म।
दोहा ३९ (क)
मायाछन्न न देखिऐ जैसें निर्गुन ब्रह्म॥ ३९ (क)॥
सुखी मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं।
जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं॥ ३९ (ख)॥
घनी पुरइनों की आड़ में जल का जल्दी पता नहीं चलता। जो सामने ही भरा हुआ है, वही पत्तों के नीचे छिपा रह जाता है। और उपमा तुरन्त आती है, जैसे माया से ढका होने के कारण निर्गुण ब्रह्म नहीं दीखता। कमल के पत्तों में कोई दोष नहीं है, वे वहीं उगे हैं जहाँ उन्हें उगना था। दोष ढकने में भी नहीं है। बात केवल इतनी है कि जो है वह दिखता नहीं, और न दिखने का कारण उसका न होना नहीं है।
और उसी दोहे का दूसरा हिस्सा इस झील के भीतर ले जाता है। उस अत्यन्त अथाह जल में सब मछलियाँ सदा एक-सी सुखी रहती हैं, जैसे धर्मशील पुरुषों के सब दिन सुख से बीतते हैं। यहाँ दो शब्द साथ रखे गये हैं, अथाह और एकरस। जो गहरे में है वह ऊपर के मौसमों से नहीं हिलता, और उसका सुख किसी घटना पर टिका हुआ नहीं होता।
इसके बाद वर्णन खुलकर फैलता है। रंग-बिरंगे कमल खिले हुए हैं और बहुत से भौंरे मीठे स्वर में गुंजार कर रहे हैं। जल के मुर्गे और राजहंस बोल रहे हैं, और लगता है मानो प्रभु को देखकर वे उनकी प्रशंसा कर रहे हों। यह वही वन है जो कुछ पन्ने पहले निन्दा कर रहा था। अब वही प्रशंसा कर रहा है, और बीच में केवल एक चीज़ बदली है।
चक्रवाक और बगुले और पक्षियों का समुदाय देखते ही बनता है, उसका वर्णन नहीं हो सकता। पक्षियों की बोली इतनी सुहावनी है कि लगता है वह रास्ते से जाते हुए पथिक को बुलाये ले रही हो। झील के पास मुनियों ने आश्रम बना रखे हैं और चारों ओर वन के सुन्दर वृक्ष हैं, चम्पा, मौलसिरी, कदम्ब, तमाल, पाटल, कटहल, ढाक और आम। बहुत से वृक्ष नये पत्तों और फूलों से लदे हैं और उन पर भौंरों के समूह गा रहे हैं। और हवा, जो कुछ पन्ने पहले कामदेव की दूत थी, यहाँ स्वभाव से ही शीतल, मन्द और सुगन्धित होकर लगातार बहती रहती है।
कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं । सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं॥
चौपाई १३
और अन्त में वही कोयल फिर आती है। कुछ चौपाइयों पहले इसकी कूक मतवाले हाथी की चिंघाड़ थी, यानी हमलावर सेना की सवारी। यहाँ उसी कूक को सुनकर मुनियों का ध्यान टूट जाता है। पक्षी वही है, बोली वही है, और दोनों बार उसका असर उन पर पड़ता है जो सुन रहे हैं। तुलसी इस जोड़ को कहीं समझाते नहीं। वे दोनों दृश्य एक ही पन्ने पर रख देते हैं और छोड़ देते हैं।
सार: पंपा का जल संतों के हृदय जैसा निर्मल है और उसके चार सुन्दर घाट बँधे हैं। पुरइनों की आड़ में जल वैसे ही छिपा रहता है जैसे माया से ढका निर्गुण ब्रह्म नहीं दीखता, और अथाह जल में मछलियाँ वैसे ही एकरस सुखी हैं जैसे धर्मशील पुरुषों के दिन। चारों ओर कमल, भौंरे, पक्षी, मुनियों के आश्रम और सुगन्धित हवा है, और कोयल की रसीली बोली सुनकर मुनियों का ध्यान भी टूट जाता है।
फलों के बोझ से झुके हुए
और प्रसंग जिस दोहे पर समाप्त होता है, वह इस पूरे वर्णन में सबसे सादा है और सबसे देर तक याद रहता है। कोई सेना नहीं, कोई उपदेश नहीं, कोई सम्बोधन नहीं। बस एक दृश्य, और उसके साथ एक तुलना।
फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ।
दोहा ४०
पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ॥ ४०॥
फलों के बोझ से झुककर सारे वृक्ष पृथ्वी के पास आ लगे हैं। यह सीधी बात है, यह हर बगीचे में दिखती है। और इसके साथ जो तुलना रखी गयी है वह इसे पलटकर आदमी पर लगा देती है। जैसे परोपकारी पुरुष बड़ी सम्पत्ति पाकर झुक जाते हैं।
इस उपमा में एक बात छिपी हुई है जो कही नहीं गयी। वृक्ष अपने फल नहीं खाता। जो बोझ उसे झुका रहा है, वह बोझ किसी और के लिये है। इसीलिये यहाँ पर उपकारी कहा गया, केवल धनी नहीं। सम्पत्ति अपने आप किसी को नहीं झुकाती, वह प्रायः ऊँचा उठा देती है। झुकाती वह तब है जब पानेवाला जानता हो कि यह उसके अकेले के लिये नहीं आयी।
सार: फलों के बोझ से सारे वृक्ष झुककर धरती के पास आ लगे हैं, जैसे परोपकारी पुरुष बड़ी सम्पत्ति पाकर विनय से झुक जाते हैं। इसी दोहे पर यह प्रसंग पूरा होता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने की बनावट में सबसे ध्यान खींचनेवाली चीज़ उसका क्रम है। पहले पीड़ा, फिर उपदेश। और उपदेश किसी तीसरे ने आकर नहीं दिया। न कोई मुनि आया, न कोई सिद्ध, न आकाशवाणी हुई। जो शोक में था, वही बोला, और बोलते-बोलते वही कह गया जिसे संसार आगे सदियों तक दुहराता रहा। दुख और ज्ञान इस पन्ने पर आमने-सामने नहीं खड़े हैं, वे एक ही मुँह से निकल रहे हैं।
दूसरी बात वह अकेलापन है जो अकेलापन था ही नहीं। कामदेव ने जिसे निपट अकेला जानकर धावा बोला, उसके साथ एक आदमी चल रहा था जो पूरे प्रसंग में एक शब्द नहीं बोलता। उसी के होने से सेना रुक गयी। तुलसी इस बात को कहीं बड़ा करके नहीं लिखते, वे उसे दूत के मुँह से एक सूचना की तरह रख देते हैं। पर जो पूरा पन्ना पढ़ चुका होता है, उसे दिख जाता है कि इस पन्ने की सबसे बड़ी सुरक्षा कोई अस्त्र नहीं थी, साथ था।
और तीसरी बात वह वन है जो दो बार दिखाया जाता है और दोनों बार एक ही रहता है। शुरू में वही वन जोड़ों से भरा हुआ था और निन्दा कर रहा था। अन्त में वही वन पक्षियों से भरा हुआ है और प्रशंसा कर रहा है। पेड़ नहीं बदले, कोयलें नहीं बदलीं, भौंरे नहीं बदले। यह पन्ना किसी जगह के बदलने की कथा नहीं है। यह उस आँख की कथा है जिससे जगह देखी जाती है, और उस आँख को ठीक करनेवाली बात इसी पन्ने के बीच में लिखी हुई है।
इस प्रसंग के बाद कथा एक नयी जगह पर खड़ी है। अब तक का अरण्यकाण्ड घने वनों में बीता था, आश्रमों में, कुटियों में, राक्षसों के बीच। अब सामने एक खुला सरोवर है, जिसके घाट बँधे हुए हैं और जिसके किनारे मुनियों के आश्रम हैं। जिस राह पर पाँव पड़े हैं वह आगे किष्किन्धा की ओर जाती है, पर इस पन्ने पर उसका नाम तक नहीं आता। तुलसी केवल यहाँ तक लाकर छोड़ देते हैं, और छोड़ने की जगह जल के किनारे चुनते हैं।
और एक बात रह जाती है जो इस पन्ने पर बार-बार लौटती है। जो सबसे बलवान् बताया गया, वही सबसे छोटी जगह पर टिका हुआ निकला। कामदेव की पूरी चतुरङ्गिणी सेना गिनायी गयी, हाथी, घोड़े, रथ, पैदल, बाजे, भाट और दूत, और अन्त में कहा गया कि इसका असली बल तो एक ही है। लोभ का बल इच्छा, क्रोध का बल कठोर वचन। हर शत्रु का एक ही सहारा है, और सहारा जान लेने पर लड़ाई का नक्शा बदल जाता है। यह गिनती किसी शास्त्रसभा में नहीं की गयी। यह चलते-चलते, वन में, विषाद के बीच, एक भाई से दूसरे भाई को कही गयी।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा ३६ से ४०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।