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वियोग और तीन प्रबल शत्रु

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रामचरितमानसअरण्यकाण्डप्रसंग 10

राम आगे चल पड़े हैं, और कहते हैं कि वन के जोड़े मानो उनकी निन्दा करते हैं। फिर वे लक्ष्मण को काम, क्रोध और लोभ, इन तीन प्रबल शत्रुओं की बात बताते हैं।

पहले मन से एक बात कही जाती है, और उसके बाद पाँव आगे बढ़ते हैं।

फिर वन छूटता है और राम लक्ष्मण के साथ चल पड़ते हैं। दोनों अतुलित बल वाले हैं, मनुष्यों में सिंह, और राम विरही की तरह विषाद कर रहे हैं। पशु और पक्षी जोड़ों में हैं, और राम कहते हैं कि वे मानो उनकी निन्दा कर रहे हैं।

फिर राम लक्ष्मण को तीन अत्यन्त प्रबल दुष्ट गिनाते हैं, काम, क्रोध और लोभ, और यह भी कि किसका बल किस चीज़ पर टिका है। उसके बाद शिव पार्वती से अपना अनुभव कहते हैं।

विरही राम, लक्ष्मण और मदन

  • राम जो वन छोड़कर चल पड़ते हैं, विरही की तरह विषाद करते हैं और लक्ष्मण को उपदेश देते हैं।
  • लक्ष्मण छोटे भाई, जिन्हें राम वन की शोभा से लेकर तीन शत्रुओं तक सम्बोधित करते हैं।
  • सीता राम की प्रिया, जिनके बिना, राम कहते हैं, सुहावना वसन्त उन्हें भय उत्पन्न कर रहा है।
  • मदन कामदेव, जो वन, भौंरों और पक्षियों को साथ लेकर राम पर धावा बोलता है, और जिसकी सेना मानो हाथी, घोड़े, नगाड़े और भाट लिये डेरा डाले है।
  • शिव कथा सुनानेवाले, जो राम के वचनों के अन्त में पार्वती से बोलते हैं और अपना अनुभव कहते हैं।
  • पार्वती जिन्हें यह कथा सुनायी जा रही है।
  • मन जिसे महामंद कहकर पुकारा जाता है।

मन से कहा गया एक वाक्य

जो जाति से हीन थी और पापों की जन्मभूमि, ऐसी स्त्री को भी जिन्होंने मुक्त कर दिया, हे महामंद मन, ऐसे प्रभु को भूलकर क्या आप सुख चाहते हैं?

वन छूटा, और विषाद साथ चला

राम चल पड़ते हैं, और उस वन को भी छोड़ देते हैं।

दोनों भाई अतुलित बल वाले हैं, मनुष्यों में सिंह। राम विरही की तरह विषाद कर रहे हैं। विषाद करते हुए वे अनेक कथाएँ और संवाद कहते हैं।

राम कहते हैं, “लक्ष्मण, वन की शोभा तो देखिये, इसे देखकर किसका मन क्षुब्ध न होगा?”

फिर वे कहते हैं, “सारे पक्षी और पशुओं के झुंड अपनी स्त्रियों के साथ हैं, मानो वे सब मेरी निन्दा कर रहे हैं।”

मृगियों का वाक्य

राम कहते हैं, “हमें देखकर हिरनों के झुंड भागते हैं। तब हिरनियाँ हिरनों से कहती हैं कि उन्हें भय नहीं, वे हिरनों से पैदा हुए हैं, आनन्द करें, ये तो सोने का हिरन खोजने आये हैं।”

राम कहते हैं, “हाथी हथिनियों को अपने साथ लगाये चलते हैं, मानो मुझे शिक्षा दे रहे हों। भलीभाँति सोचे-समझे शास्त्र को भी बार-बार देखते रहना चाहिये। अच्छी तरह सेवा किये हुए राजा को भी अपने वश में नहीं समझना चाहिये। स्त्री को चाहे हृदय के भीतर ही क्यों न रखा जाय, युवती, शास्त्र और राजा वश में नहीं रहते।”

“हे तात, यह सुहावना वसन्त तो देखिये,” राम कहते हैं, “प्रिया के बिना यह मुझे भय उत्पन्न कर रहा है।”

टीका हाथियों की शिक्षा यह बताती है कि स्त्री को कभी अकेली नहीं छोड़ना चाहिये।

कामदेव का धावा

राम कहते हैं कि कामदेव ने उन्हें विरह से व्याकुल, बलहीन और बिलकुल अकेला जानकर वन, भौंरों और पक्षियों को साथ लेकर उन पर धावा बोल दिया। वे कहते हैं कि उसका दूत उन्हें भाई के साथ देखकर चला गया, और उसकी बात सुनकर तब कामदेव ने मानो सेना को रोककर डेरा डाल दिया।

कामदेव का डेरा

राम उस डेरे का ब्योरा उपमाओं में देते हैं। विशाल वृक्षों पर उलझी लताएँ मानो तरह-तरह के तंबू तान दिये गये हों। केले और ताड़ सुन्दर ध्वजाएँ और पताकाएँ हैं। इस डेरे को देखकर वही मोहित नहीं होता जिसका मन धीर है।

अनेक वृक्ष अनेक ढंग से फूले हैं, मानो तीरंदाज़ तरह-तरह की वर्दियाँ पहने हों। कहीं-कहीं सुन्दर वृक्ष शोभा दे रहे हैं, मानो योद्धा अलग-अलग होकर छावनी डाले हों।

कूकती हुई कोयलें मानो मतवाले हाथी हैं। ढेक और महोख ऊँट और खच्चर हैं। मोर, चकोर और तोते सुन्दर घोड़े हैं, और कबूतर और हंस सब ताज़ी घोड़े हैं।

तीतर और बटेर पैदल सेना के झुंड हैं। पर्वतों की शिलाएँ रथ हैं, झरने नगाड़े, और पपीहे भाट, जो गुणों के समूह का बखान करते हैं।

भौंरों की गुंजार भेरी और शहनाई है। शीतल, मन्द और सुगन्धित हवा दूत बनकर आयी है। चतुरङ्गिणी सेना साथ लिये कामदेव सबको चुनौती देता घूम रहा है।

जो धीर रहे, उसी की लीक

राम लक्ष्मण से कहते हैं कि कामदेव की इस सेना को देखकर भी जो धीर बने रहते हैं, संसार में लीक उन्हीं की बनती है। टीका इस लीक को वीरों में प्रतिष्ठा बताती है। राम कहते हैं कि इस कामदेव का एक परम बल है, स्त्री। उससे जो बच जाय वही बड़ा योद्धा है।

तीन प्रबल खल

राम कहते हैं, “हे तात, काम, क्रोध और लोभ, ये तीन अत्यन्त प्रबल दुष्ट हैं।”

राम आगे कहते हैं, “ये विज्ञान के धाम मुनियों के मन को भी एक निमिष में क्षुब्ध कर देते हैं। लोभ का बल इच्छा और दम्भ है, काम का बल केवल स्त्री, और क्रोध का बल कठोर वचन। श्रेष्ठ मुनि विचार करके ऐसा कहते हैं।”

जिनकी दया से ये छूटते हैं

शिव पार्वती से कहते हैं कि राम गुणों से परे हैं, चराचर के स्वामी हैं, और सबके भीतर की जाननेवाले हैं। शिव कहते हैं कि राम ने कामी लोगों की दीनता दिखलायी और धीर पुरुषों के मन में वैराग्य दृढ़ किया। टीका इसे ऊपर कही बातों से जोड़ती है।

शिव कहते हैं कि क्रोध, काम, लोभ, मद और माया, ये सब राम की दया से छूट जाते हैं। जिस पर वह नट प्रसन्न हो, वही मनुष्य इस इन्द्रजाल में नहीं भूलता। टीका नट को नटराज भगवान् कहती है, और इन्द्रजाल को माया।

फिर शिव कहते हैं: “पार्वती, मैं अपना अनुभव कहता हूँ: भगवान् का भजन ही सत्य है, यह सारा जगत् स्वप्न है।”

फिर राम पंपा नामक सुन्दर और गहरे सरोवर के तीर पर गये।

पंपा का तट

उसका जल संतों के हृदय जैसा निर्मल है। मन को हरनेवाले चार सुन्दर घाट बँधे हैं। जहाँ-तहाँ तरह-तरह के पशु जल पी रहे हैं, मानो किसी उदार दानी के घर याचकों की भीड़ लगी हो।

घनी पुरइनों, यानी कमल के पत्तों, की आड़ में जल का जल्दी पता नहीं चलता, जैसे माया से ढका होने के कारण निर्गुण ब्रह्म नहीं दीखता। उस अत्यन्त अथाह जल में सब मछलियाँ सदा एक-सी सुखी रहती हैं, जैसे धर्मशील पुरुषों के सब दिन सुख से बीतते हैं।

रंग-बिरंगे कमल खिले हैं और बहुत से भौंरे मीठे स्वर में गुंजार कर रहे हैं। जल के मुर्गे और राजहंस बोल रहे हैं, मानो राम को देखकर उनकी प्रशंसा कर रहे हों।

चक्रवाक, बगुले और पक्षियों का समुदाय है। सुन्दर पक्षियों की सुहावनी बोली मानो रास्ते से जाते पथिक को बुलाये ले रही हो। झील के पास मुनियों ने आश्रम बना रखे हैं, और चारों ओर वन के सुन्दर वृक्ष हैं: चम्पा, मौलसिरी, कदम्ब, तमाल, पाटल, कटहल, ढाक और आम। बहुत से वृक्ष नये पत्तों और फूलों से लदे हैं, और उन पर भौंरों के समूह गा रहे हैं। और शीतल, मन्द और सुगन्धित हवा स्वभाव से ही लगातार बहती है। कोयलें “कुहू कुहू” बोलती हैं, और उनकी रसीली बोली सुनकर मुनियों का ध्यान भी टूट जाता है।

फलों के बोझ से झुके हुए

फलों के बोझ से झुककर सारे वृक्ष पृथ्वी के पास आ लगे हैं। जैसे परोपकारी पुरुष बड़ी सम्पत्ति पाकर झुक जाते हैं।

विषाद, उपदेश और पंपा

पहले मन से एक बात कही जाती है। फिर राम आगे चलते हैं, और विरही की तरह विषाद करते हुए लक्ष्मण से बहुत सी बातें कहते हैं। वे कहते हैं कि वन के जोड़े मानो उनकी निन्दा करते हैं, और कामदेव ने धावा बोला और फिर मानो सेना रोककर डेरा डाल दिया। फिर राम लक्ष्मण को काम, क्रोध और लोभ, इन तीन प्रबल दुष्टों और उनके बल की बात बताते हैं। शिव पार्वती से कहते हैं कि क्रोध, काम, लोभ, मद और माया राम की दया से छूटते हैं, और अपना अनुभव कहते हैं कि भगवान् का भजन ही सत्य है। अन्त में राम पंपा सरोवर के तट पर पहुँचते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा 36 से 40, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।