रामचरितमानस · अरण्यकाण्ड · खर, दूषण और त्रिशिरा का वध
खर, दूषण और त्रिशिरा का वध
चौदह हज़ार के सामने एक अकेली आकृति खड़ी है, और जो सेना उसे मारने दौड़ती है वह उसी का नाम पुकारती हुई मरती है। तुलसी की दिलचस्पी युद्ध में नहीं है, उस एक बात में है जो मरते हुए मुँह से निकल जाती है।
पिछला पन्ना एक आवाज़ पर छूटा था। धनुष चढ़ चुका था, सिर पर जटाओं का जूड़ा बँध चुका था, कमर में तरकश कस लिया गया था, और उस एक टंकार से राक्षसों की सारी सेना की सुध जाती रही थी। जानकी पर्वत की कन्दरा में भेज दी गयी थीं, लक्ष्मण उनके साथ थे, और जो सामने अकेला बचा था उसके चारों ओर घेरा पड़ चुका था। यह पन्ना ठीक वहीं से उठता है, और उठते ही अपनी चाल बदल देता है।
चाल बदलने का काम छन्द करता है। यहाँ चौपाई हट जाती है और छोटे-छोटे छन्द आ जाते हैं, जिनकी पंक्तियाँ आधी लम्बाई की हैं और जिनका वेग पढ़ने से नहीं, बोलने से खुलता है। सात छन्द एक साँस में निकल जाते हैं, फिर एक बड़ा छन्द आता है जो चार बार लौटता है, और तब जाकर दोहा आता है। कथावाचक जब यह हिस्सा सुनाता है तो सुननेवाले की साँस तेज़ हो जाती है, और यही तुलसी का इरादा है। इस पन्ने पर गद्य उस वेग के पीछे-पीछे चलेगा, उसे रोककर नहीं।
पर जिस बात के लिये यह प्रसंग याद रखा जाता है वह युद्ध नहीं है। कौन किस पर टूटा, किसने कितने बाण छोड़े, किसका सिर कहाँ गिरा, इस सबका ब्योरा तुलसी देते तो हैं पर उसमें ठहरते नहीं। वे जिस जगह ठहरते हैं वह दोहा बीस है, और वहाँ एक ऐसी बात लिखी गयी है जो युद्ध के किसी भी वर्णन से अलग है। जो मरने आये थे वे मरते हुए एक नाम कह रहे थे, और उस नाम ने उनके साथ वह किया जो उनके सारे जीवन ने नहीं किया था। यह पन्ना असल में उसी एक दोहे की ओर चढ़ता है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम पंचवटी में अकेले खड़े हैं और उनके सामने चौदह हज़ार की सेना है। इस प्रसंग में वे दो काम करते हैं, एक बाण से और एक माया से, और दूसरा काम पहले से बड़ा है।
- लक्ष्मण युद्ध के समय जानकी के साथ कन्दरा में हैं, और युद्ध जीत लिये जाने पर उन्हें लेकर लौटते हैं।
- सीता इस पन्ने पर एक ही चौपाई में आती हैं, और उस एक चौपाई में इतनी देर तक देखती हैं कि नेत्र अघाते ही नहीं।
- खर जनस्थान के तीन भाइयों में एक, जो भागती हुई सेना को अपने हाथों मारने की धमकी देकर लौटाता है और स्वयं भी लौटता है।
- दूषण दूसरा भाई, जिसका नाम इस प्रसंग में खर के साथ ही जुड़कर आता है और जिसका वध सुनकर लङ्का में आग लग जाती है।
- त्रिशिरा तीसरा भाई, जो अपनी सेना को व्याकुल देखकर लौटकर सामने आता है।
- शूर्पणखा कटी हुई नाक और कान लेकर अब लङ्का पहुँचती है, और वहाँ जो बोलती है वह रोना कम और नीति का पाठ अधिक है।
- रावण इस प्रसंग में पहली बार सामने आता है, सभा के बीच अपना बल बखानता है, और फिर महल में जाकर सारी रात जागता रहता है।
बाण, जो फुफकारते हुए गये
घेरा पड़ चुका था और अस्त्र-शस्त्र बरसाये जा चुके थे। अब जो होता है वह उत्तर है, और उत्तर के लिये तुलसी छन्द उठाते हैं। पहली ही पंक्ति में बाण चलते हैं, और उनके साथ एक उपमा आती है जो कान से पकड़ी जाती है, आँख से नहीं।
तब चले बान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल॥
छंद १
कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम॥
उपमा साँपों की है, पर उसमें साँपों का दिखना नहीं है, उनका सुनाई देना है। फुंकरत, यानी फुफकारते हुए। बाण हवा में जिस आवाज़ के साथ जाता है वह आवाज़ इस एक शब्द में बन्द कर दी गयी है, और जिसने कभी सर्प की फुफकार सुनी है उसके लिये यह उपमा समझाने की चीज़ नहीं रह जाती। और साँप एक नहीं है, बहु ब्याल हैं, बहुत सारे। तरकश खाली होकर आकाश भर रहा है।
दूसरी पंक्ति में एक शब्द है जिस पर रुकना चाहिये। कोपेउ समर श्रीराम। श्रीराम संग्राम में क्रुद्ध हुए। पूरे मानस में यह वाक्य गिनी हुई जगहों पर आता है, और तुलसी इसे यूँ ही नहीं रख देते। अब तक जो हुआ था वह बचाव था, धनुष चढ़ाना, टंकार, घेरे को खड़े रहकर सह लेना। अब पहली बार वह पक्ष आगे बढ़ता है, और बढ़ते ही बाण अत्यन्त तीक्ष्ण हो जाते हैं। निसित निकाम, यानी तीखे, और तीखेपन में कोई कमी नहीं।
सार: घेरे के भीतर से उत्तर निकलता है। भयानक बाण ऐसे चलते हैं मानो बहुत से साँप फुफकारते हुए जा रहे हों, श्रीराम संग्राम में क्रुद्ध होते हैं, और अत्यन्त तीक्ष्ण बाण छूटते हैं।
जो रण से भागेगा
अब जो होता है वह किसी वीरगाथा में कम ही लिखा जाता है। सेना भागती है। और भागती इसलिये है कि उसने बाण देख लिये हैं, न कि इसलिये कि वह हार गयी है। तुलसी इसे छिपाते नहीं और सजाते भी नहीं।
अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर॥
छंद २
भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ॥
मुरि चले निसिचर बीर। राक्षस वीर मुड़कर चल दिये, यानी पीठ दिखाकर। जिन्हें एक पंक्ति पहले तक वीर कहा जा रहा था वही अब मुड़ रहे हैं, और तुलसी उनसे वीर शब्द वापस नहीं लेते। यह उनकी आदत है। वे किसी को उसके सबसे बुरे क्षण से नहीं नापते।
और यहीं तीनों भाई क्रुद्ध होते हैं। खर, दूषण और त्रिशिरा। उनका क्रोध सामनेवाले पर नहीं है, अपनी ही सेना पर है, और जो वे कहते हैं वह अगली पंक्ति में जाकर पूरा होता है। छन्द की यह बनावट देखने लायक है। वाक्य एक छन्द में शुरू होकर दूसरे में खत्म होता है, इसलिये सुननेवाले को रुकने का मौका ही नहीं मिलता।
तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि॥
छंद ३
आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार॥
जो रण से भागकर जायगा, उसका वध हम अपने हाथों करेंगे। धमकी सीधी है और उसमें कोई भाषण नहीं है। पर असर जो हुआ वह उससे भी सीधा लिखा गया है, और इस पन्ने की सबसे ठंडी पंक्ति यही है। फिरे मरन मन महुँ ठानि। वे लौटे, मन में मरना ठानकर।
यानी लौटनेवाले को यह भ्रम नहीं है कि वह जीत जायगा। उसे दो मौतों में से एक चुननी थी और उसने सामनेवाली चुन ली। पीछे अपने भाई का हाथ है, आगे वह धनुष है। इस वाक्य के बाद जो कुछ होता है, वह सब इसी चुनाव के भीतर होता है, और आगे चलकर यही चुनाव उनके काम आयेगा, हालाँकि उस समय किसी को इसका पता नहीं। मरना ठानकर वे सामने आ गये, और सामने आकर अनेकों प्रकार के हथियारों से प्रहार करने लगे।
सार: तीक्ष्ण बाण देखकर राक्षस वीर पीठ दिखाकर भागते हैं। तब खर, दूषण और त्रिशिरा तीनों भाई क्रुद्ध होकर कहते हैं कि जो रण से भागेगा उसका वध हम अपने हाथों करेंगे। भागते हुए राक्षस मन में मरना ठानकर लौट पड़ते हैं और सामने होकर अनेकों हथियारों से प्रहार करते हैं।
कटते हैं, और फिर उठ खड़े होते हैं
शत्रु को अत्यन्त कुपित जानकर प्रभु धनुष पर बाण चढ़ाते हैं और बहुत से नाराच छोड़ते हैं। नाराच लोहे का पूरा बाण होता है, फल से लेकर पंख तक, और उसका नाम ही उसका वज़न बता देता है। इन्हीं से भयानक राक्षस कटने लगते हैं। यहाँ से छन्द का रंग बदल जाता है और वह कुछ देर तक केवल दिखाता है, कहता कुछ नहीं।
छाती, सिर, भुजा, हाथ और पैर जहाँ-तहाँ पृथ्वी पर गिरने लगते हैं। बाण लगते ही वे हाथी की तरह चिग्घाड़ते हैं, और उनके पहाड़ जैसे धड़ कट-कटकर गिर रहे हैं। इस चित्र में जो चीज़ काम करती है वह आकार है। राक्षस बड़े हैं, इसलिये उनका गिरना भी बड़ा है, और गिरने की आवाज़ भी। हाथी की चिग्घाड़ और पहाड़ का ढहना, दोनों उपमाएँ कान की हैं।
और तब वह बात आती है जो इस युद्ध को बाकी युद्धों से अलग कर देती है। योद्धाओं के शरीर कटकर सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं, और वे फिर माया करके उठ खड़े होते हैं। पुनि उठत करि पाषंड। आकाश में बहुत सी भुजाएँ और सिर उड़ रहे हैं, और बिना सिर के धड़ दौड़ रहे हैं। यह वह लड़ाई है जिसमें मारना काम नहीं आता, क्योंकि मरा हुआ फिर खड़ा हो जाता है। ऊपर चील और कौए मँडरा रहे हैं, नीचे सियार, और तीनों मिलकर वह कठोर कट-कट शब्द कर रहे हैं जिससे रणभूमि भर जाती है।
अब सात छोटे छन्द पूरे हो चुके हैं और तुलसी छन्द का माप बदल देते हैं। पंक्तियाँ लम्बी हो जाती हैं, और उनके साथ दृश्य भी चौड़ा हो जाता है। जो अब तक शरीरों का ब्योरा था, वह अब पूरी रणभूमि का नक़्शा बन जाता है।
कटकटहिं जंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं।
छंद ४
बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं॥
रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा।
जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा॥
अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं। संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं॥॥ २॥
सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं। करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं॥॥ ३॥
महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी। सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी॥॥ ४॥
सियार कटकटा रहे हैं, भूत, प्रेत और पिशाच खोपड़ियाँ बटोर रहे हैं, या कहिये अपने खप्पर भर रहे हैं। वीर-वैताल खोपड़ियों पर ताल दे रहे हैं और योगिनियाँ नाच रही हैं। यह वर्णन डरावना है, पर ध्यान दीजिये कि यह उत्सव की भाषा में है। ताल, नाच, बटोरना। जिनके लिये यह रणभूमि है उनके लिये यह श्मशान है, और जिनके लिये यह श्मशान है उनके लिये यह भोज है।
और उसी छन्द की दूसरी आधी में वह चीज़ लौट आती है जो छूटी नहीं थी। रघुवीर के प्रचण्ड बाण योद्धाओं के वक्ष, भुजा और सिर के टुकड़े-टुकड़े कर डालते हैं, धड़ जहाँ-तहाँ गिरते हैं, फिर उठते हैं, फिर लड़ते हैं, और भयंकर स्वर में पुकारते हैं, पकड़ो, पकड़ो। धरु धरु। बिना सिर के धड़ पुकार रहे हैं कि पकड़ो। इससे अधिक साफ़ तरीक़े से यह नहीं कहा जा सकता था कि यहाँ मृत्यु काम नहीं कर रही।
सार: नाराच बाणों से राक्षस कटने लगते हैं, अंग जहाँ-तहाँ गिरते हैं, पर कटे हुए योद्धा माया करके फिर उठ खड़े होते हैं। सियार, भूत, प्रेत और पिशाच खोपड़ियाँ बटोरते हैं, वैताल ताल देते हैं, योगिनियाँ नाचती हैं, और बिना सिर के धड़ पकड़ो-पकड़ो पुकारते हुए दौड़ते हैं।
चौदह हज़ार, और एक
अगले चरण में तुलसी एक उपमा रखते हैं जो इस पूरे काण्ड में सबसे अजीब है, और जिसे पढ़कर पहली बार पाठक का जी काँपता है। गीध अँतड़ियों का एक छोर पकड़कर उड़ते हैं और उसी का दूसरा छोर पकड़कर पिशाच नीचे दौड़ते हैं। और इसे देखकर कवि कहता है कि ऐसा लगता है मानो संग्राम रूपी नगर के निवासी बहुत से बालक पतंग उड़ा रहे हों।
इस उपमा की क्रूरता यह नहीं है कि वह भयानक है। क्रूरता यह है कि वह निर्दोष है। पतंग उड़ाते बच्चे, डोर, आकाश, और नीचे दौड़ता हुआ लुटेरा। एक ऐसा दृश्य जो किसी भी शहर की छत पर किसी भी शाम दिख जाय। उसी को उठाकर रणभूमि पर रख दिया गया है, और उससे वह बात कही गयी है जो सीधे कहने पर सह्य नहीं होती। अनेकों योद्धा मारे और पछाड़े गये, और बहुत से, जिनके हृदय विदीर्ण हो गये हैं, पड़े कराह रहे हैं। अपनी सेना को इस हाल में देखकर त्रिशिरा और खर-दूषण लौटकर सामने आते हैं।
और तब सब एक साथ टूटते हैं। अनगिनत राक्षस क्रोध करके बाण, शक्ति, तोमर, फरसा, शूल और कृपाण एक ही बार में छोड़ने लगते हैं। छह नाम एक पंक्ति में, और छहों एक साथ। उत्तर उतनी ही जल्दी आता है। प्रभु पल भर में शत्रुओं के बाण काट देते हैं, फिर ललकारकर अपने बाण छोड़ते हैं, और सब राक्षस सेनापतियों के हृदय में दस-दस बाण मारते हैं। गिनती यहाँ पहली बार आती है, और दस-दस कहकर तुलसी यह बता देते हैं कि अब खेल नहीं हो रहा।
पर इससे भी बात नहीं बनती। योद्धा गिरते हैं, उठकर भिड़ते हैं, मरते नहीं, और बहुत प्रकार की अत्यन्त घनी माया रचते हैं। और यहाँ, इस सारे शोर के बीच, कथा अचानक ऊपर देखती है। देवता डरने लगते हैं। उनका डर किसी अपशकुन से नहीं आता, एक हिसाब से आता है। प्रेत चौदह हज़ार हैं, और अयोध्या के स्वामी अकेले हैं।
यह गिनती इस पन्ने की धुरी है। चौदह हज़ार बनाम एक। और देवताओं का डर बेतुका नहीं है, क्योंकि वे जो देख रहे हैं उसमें मरनेवाला कोई मर ही नहीं रहा। बाण अपना काम कर रहे हैं और फिर भी सेना घट नहीं रही। ऐसे युद्ध का कोई अन्त नहीं होता, केवल थकान होती है, और थकान अकेले को पहले आती है। देवता यही सोचकर डरते हैं।
देवताओं और मुनियों को भयभीत देखकर मायापति प्रभु एक बड़ा कौतुक करते हैं। यह शब्द ध्यान से देखिये, कौतुक। खेल, तमाशा, हाथ की सफ़ाई। और वह कौतुक यह है कि शत्रुओं की सेना एक-दूसरे को राम रूप में देखने लगती है। जिसके सामने जो खड़ा है वही राम दिखता है। और तब वह सेना आपस में ही युद्ध करके लड़ मरती है। चौदह हज़ार को मारने का उपाय यह निकला कि उन्हें राम दिखा दिया जाय।
सार: गीध और पिशाच अँतड़ियों की डोर से पतंग उड़ाते बालकों जैसे दिखते हैं। अपनी सेना को व्याकुल देखकर त्रिशिरा और खर-दूषण लौटते हैं, अनगिनत राक्षस छह प्रकार के शस्त्र एक साथ छोड़ते हैं, प्रभु सबके बाण काटकर सेनापतियों के हृदय में दस-दस बाण मारते हैं। फिर भी कोई मरता नहीं। चौदह हज़ार के सामने एक को देखकर देवता डरते हैं, तब प्रभु कौतुक करते हैं और शत्रु सेना एक-दूसरे को राम देखकर आपस में लड़ मरती है।
राम राम कहि तनु तजहिं
अब वह दोहा आता है जिसके लिये यह सारा प्रसंग लिखा गया है। और वह इतना छोटा है कि जल्दी पढ़नेवाला उसके ऊपर से निकल जाता है।
राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान।
दोहा २० (क)
करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान॥ २० (क)॥
हरषित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान।
अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान॥ २० (ख)॥
राम राम कहकर वे शरीर छोड़ते हैं और निर्वाण पद पाते हैं। पर यह समझ लेना ज़रूरी है कि वे यह नाम किस हाल में ले रहे हैं। टीका इसे कोष्ठक में खोलकर रख देती है। वे एक-दूसरे को राम देख रहे हैं, और जो वाक्य उनके मुँह से निकल रहा है वह यह है कि यही राम है, इसे मारो। यानी वे प्रार्थना नहीं कर रहे। वे पहचान रहे हैं, और पहचानकर हमला कर रहे हैं।
और वही नाम, उसी मुँह से, उसी क्रोध में, उन्हें वहाँ पहुँचा देता है जहाँ पहुँचने के लिये लोग जन्म बिता देते हैं। तुलसी इस पर कोई टिप्पणी नहीं करते। वे यह नहीं कहते कि देखिये, नाम की महिमा ऐसी है। वे केवल घटना लिख देते हैं, और घटना अपनी बात आप कह लेती है। नाम को इसकी परवाह नहीं कि वह किस भाव से लिया गया। वह जिसका नाम है, वह पहले से जानता है कि उसे पुकारा जा रहा है।
दूसरी पंक्ति में एक और शब्द है जो चुपचाप बहुत कुछ कह जाता है। करि उपाय। उपाय करके शत्रुओं को क्षण भर में मार डाला। उपाय, यानी युक्ति, तरकीब। यह वीरता का शब्द नहीं है, बुद्धि का शब्द है। और उसके साथ जो विशेषण आया है वह कृपानिधान है, दया का ख़ज़ाना। मारने की पंक्ति में दया का नाम रखा गया है, और यह लापरवाही से नहीं रखा गया। जिस उपाय से वे मारे गये उसी उपाय से वे तरे भी, इसलिये वह उपाय वध का भी है और कृपा का भी।
इसके तुरन्त बाद आकाश खुल जाता है। देवता हर्षित होकर फूल बरसाते हैं और आकाश में नगाड़े बजते हैं। जो एक क्षण पहले डर रहे थे वे अब बाजे बजा रहे हैं। फिर वे सब स्तुति कर-करके अनेकों विमानों पर सुशोभित होते हुए लौट जाते हैं। रणभूमि खाली हो जाती है, शोर थम जाता है, और पंचवटी फिर वही जगह बन जाती है जो थी।
सार: शत्रु राम-राम कहते हुए शरीर छोड़ते हैं और निर्वाण पद पाते हैं, और कृपानिधान उपाय करके क्षण भर में उन्हें मार डालते हैं। देवता हर्षित होकर फूल बरसाते हैं, आकाश में नगाड़े बजते हैं, और वे सब स्तुति करके विमानों पर लौट जाते हैं।
और तब सीता लौट आयीं
युद्ध के बाद का पहला वाक्य किसी विजय का नहीं है। वह भय के हट जाने का है, और उसमें तीन कोटियाँ गिनायी गयी हैं।
जब रघुनाथ समर रिपु जीते । सुर नर मुनि सब के भय बीते॥
चौपाई १
तब लछिमन सीतहि लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए॥
देवता, मनुष्य और मुनि, तीनों का भय बीत गया। ध्यान दीजिये कि जिनके लिये यह युद्ध लड़ा गया उनमें मनुष्य भी हैं, और मनुष्य इस कथा में अब तक कहीं दिखाई नहीं दिये थे। दण्डक वन में मनुष्य बचे ही कहाँ थे। वे गिनती में इसलिये हैं कि जिस भय को हटाया जा रहा है वह किसी एक वर्ग का नहीं था।
और तब लक्ष्मण सीता को ले आते हैं। कन्दरा से लौटना इस पन्ने पर एक ही पंक्ति में निपट जाता है, और उसके बाद जो चरणों में पड़े, उन्हें प्रभु ने हर्षित होकर उठाकर हृदय से लगा लिया। यह मिलन का कोई बड़ा दृश्य नहीं है। पड़ना, उठाना, लगा लेना। तीन क्रियाएँ, एक पंक्ति। पर आगे इसी काण्ड में एक ऐसी घड़ी आयेगी जब यह लौटना नहीं होगा, और तब पढ़नेवाले को यह पंक्ति याद आयेगी।
सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता॥
चौपाई २
पंचबटीं बसि श्रीरघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक॥
सीता श्याम और कोमल शरीर को देख रही हैं, परम प्रेम के साथ, और नेत्र अघाते नहीं। लोचन न अघाता। अघाना भोजन का शब्द है, तृप्त हो जाना, भर जाना। आँखें देख रही हैं और भर नहीं रहीं। अभी-अभी जो हुआ है उसका कोई ज़िक्र नहीं है, कोई प्रश्न नहीं है, कोई चोट नहीं खोजी जा रही। बस देखना है, और वह देखना पूरा नहीं होता।
और फिर एक पंक्ति में दिन बीत जाते हैं। पंचवटी में बसकर श्रीरघुनायक ऐसे चरित्र करने लगे जो देवताओं और मुनियों को सुख देते हैं। न गिनती दी गयी, न ब्योरा। वही तरीक़ा जो तुलसी बार-बार काम में लाते हैं। जब कुछ बुरा नहीं हो रहा होता, तब समय बहुत तेज़ चलता है।
सार: युद्ध जीत लिये जाने पर देवता, मनुष्य और मुनि, सबका भय मिट जाता है। लक्ष्मण सीता को ले आते हैं, चरणों में पड़नेवालों को प्रभु उठाकर हृदय से लगा लेते हैं, सीता के नेत्र देखते-देखते अघाते नहीं, और पंचवटी में बसकर श्रीरघुनायक सुखदायक चरित्र करते रहते हैं।
धुआँ देखकर
अब कथा एक ही चौपाई में सैकड़ों कोस चल देती है। जो पंचवटी में हुआ उसकी ख़बर लङ्का तक कैसे पहुँची, इसके लिये तुलसी न कोई दूत भेजते हैं, न कोई सन्देश लिखवाते हैं। वे एक शब्द रखते हैं, और उस शब्द से काम चल जाता है।
धुआँ देखि खरदूषन केरा । जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा॥
चौपाई ३
बोली बचन क्रोध करि भारी । देस कोस कै सुरति बिसारी॥
धुआँ देखि खरदूषन केरा। खर-दूषण का धुआँ देखकर। टीका इसे विध्वंस कहकर खोलती है, और वह ठीक भी है, पर मूल शब्द जो देता है वह अर्थ से आगे की चीज़ है। धुआँ वह होता है जो आग बुझ जाने पर भी दिखता रहता है, और दूर से दिखता है। जिस जगह कुछ जल चुका हो उसका पता पास जाकर नहीं, क्षितिज पर देखकर चलता है। शूर्पणखा ने वही देखा, और देखकर वह लङ्का की ओर चल दी।
और वहाँ पहुँचकर वह रावण को भड़काती है। यह शब्द टीका का है, भड़काना, और इस प्रसंग का सारा ढंग इसी शब्द में है। वह फ़रियाद लेकर नहीं आयी, वह आग लेकर आयी है। उसका पहला वाक्य अपनी चोट का नहीं है, राज-काज का है। भारी क्रोध करके वह कहती है कि देश और कोश की सुध ही भुला दी गयी है।
यह चतुराई है और सोची हुई है। पिछले पन्ने पर खर और दूषण के सामने खड़े होकर उसने उनके पौरुष पर चोट की थी, क्योंकि वे योद्धा थे। यहाँ जिसके सामने वह खड़ी है वह राजा है, इसलिये चोट राज्य पर की जा रही है। एक ही स्त्री, एक ही चोट, पर सुननेवाले के हिसाब से अलग-अलग जगह हाथ रखा जा रहा है।
सार: खर-दूषण का धुआँ देखकर शूर्पणखा लङ्का जाती है और रावण को भड़काती है। भारी क्रोध करके वह पहली बात अपनी चोट की नहीं, देश और कोश की सुध भुला दिये जाने की कहती है।
जो नीति बहिन सुनाती है
इसके बाद जो आता है वह विलाप नहीं है। वह नीति है, और इतनी कसी हुई नीति है कि इसे कथा से निकालकर अलग रख दिया जाय तो भी यह अपने आप में पूरी रहेगी। बहन भाई को सुना रही है, और सुनाने का ढंग किसी मन्त्री का है।
करसि पान सोवसि दिनु राती । सुधि नहिं तव सिर पर आराती॥
चौपाई ४ और ५
राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा । हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा॥
बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ । श्रम फल पढ़ें किएँ अरु पाएँ॥
संग तें जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा॥
पहली फटकार आदत पर है। मदिरा पी लेता है और दिन-रात पड़ा सोता रहता है, और यह ख़बर नहीं कि शत्रु सिर पर खड़ा है। आराती यानी शत्रु। एक सोते हुए राजा का चित्र, और उसके सिरहाने खड़ी हुई तलवार।
और तब सूची शुरू होती है, जिसमें चार बातें जोड़े में रखी गयी हैं। नीति के बिना राज्य, धर्म के बिना धन, हरि को समर्पित किये बिना सत्कर्म, और विवेक उपजाये बिना विद्या। चारों में एक ही बनावट है। मेहनत पूरी होती है, नतीजा शून्य होता है। पढ़ने का, करने का और पाने का, तीनों का फल केवल श्रम रह जाता है। श्रम फल पढ़ें किएँ अरु पाएँ।
फिर दूसरी सूची आती है, और इसकी बनावट और भी चुस्त है। किससे क्या नष्ट होता है, यही एक ढाँचा चार बार चलाया जाता है। सङ्ग से संन्यासी, बुरी सलाह से राजा, मान से ज्ञान, और मदिरापान से लज्जा। इसमें दूसरा जोड़ा सीधे सुननेवाले पर है और चौथा भी उसी पर, और दोनों के बीच में दो ऐसे जोड़े रख दिये गये हैं जिनसे उसका कोई लेना-देना नहीं। चोट को बीच में छिपाकर पहुँचाने का यह पुराना तरीक़ा है।
प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहिं बेगि नीति अस सुनी॥
चौपाई ६
और अन्तिम जोड़ा दो को एक साथ समेटता है। नम्रता न हो तो प्रीति नष्ट हो जाती है, और मद हो तो गुणवान नष्ट हो जाता है। छहों जोड़े गिन लीजिये तो एक बात निकलती है। इनमें से कोई भी नाश बाहर से नहीं आता। संन्यासी को सङ्ग मारता है, राजा को सलाह, ज्ञान को अभिमान, लज्जा को प्याला, प्रीति को अकड़ और गुणी को अपना ही मद। शत्रु का नाम पूरी सूची में एक बार भी नहीं आता। और यह बात एक ऐसी सभा में कही जा रही है जिसका स्वामी आगे चलकर ठीक इसी तरह जायगा।
अन्त में वह एक पंक्ति जोड़ती है जो सारी सूची को उसकी जगह पर बिठा देती है। नीति अस सुनी। नीति मैंने ऐसी सुनी है। यानी यह मेरी अपनी बात नहीं है, यह चली आयी हुई बात है। अपनी बात कहने पर बहस हो सकती है, सुनी हुई बात पर नहीं।
सार: शूर्पणखा नीति सुनाती है। मदिरा और नींद में डूबे राजा को यह ख़बर नहीं कि शत्रु सिर पर है। नीति बिना राज्य, धर्म बिना धन, हरि को समर्पित किये बिना सत्कर्म और विवेक बिना विद्या, चारों का फल केवल श्रम है। सङ्ग से संन्यासी, कुमन्त्र से राजा, मान से ज्ञान, मदिरा से लज्जा, नम्रता न होने से प्रीति और मद से गुणी, सब शीघ्र नष्ट होते हैं।
सभा के बीच पड़ी हुई
नीति का आख़िरी वाक्य एक सोरठे में आता है, और वह सूची से भी छोटा है। छह चीज़ें गिनायी गयी हैं जिन्हें छोटा करके नहीं आँकना चाहिये।
रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि।
सोरठा २१ (क)
अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन॥ २१ (क)॥
शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, स्वामी और सर्प। इन छहों में एक बात साझा है। हर एक बढ़ता है, और हर एक चुपचाप बढ़ता है। चिनगारी छोटी होती है, रोग की शुरुआत हल्की होती है, पाप पहली बार में मामूली लगता है, और साँप जब तक काटे नहीं तब तक रस्सी जैसा पड़ा रहता है। इस सूची में स्वामी का नाम रखा जाना सबसे तीखा है, क्योंकि जो यह सूची सुन रहा है वह स्वयं स्वामी है, और जिसकी बात हो रही है वह भी स्वामी है।
और ऐसा कहकर वह अनेक प्रकार से विलाप करके रोने लगती है। यहाँ क्रम देखने लायक है। पहले नीति, फिर रोना। फ़रियादी पहले रोता है और फिर बात कहता है। इस स्त्री ने उलटा किया। उसने पहले पूरा भाषण पूरा किया, और जब हर तीर चल चुका, तब वह गिरी।
सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ।
दोहा २१ (ख)
तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ॥ २१ (ख)॥
सभा के बीच में व्याकुल होकर पड़ी हुई, बहुत प्रकार से रो-रोकर कह रही है। जगह पर ध्यान दीजिये, सभा के बीच। एकान्त में नहीं, भाई के कमरे में नहीं। दरबार भरा हुआ है, मन्त्री बैठे हैं, सेनापति बैठे हैं, और लङ्का के राजा की बहन उनके सामने ज़मीन पर पड़ी है। यह रोना जितना दुख का है उतना ही आयोजन का भी।
और दूसरी पंक्ति में वह वाक्य आता है जिसे सुनकर किसी भी राजा के लिये चुप रहना असम्भव हो जाता है। दशकन्धर के जीते-जी उसकी बहन की ऐसी दशा हो, यह कैसे हो सकता है। इसमें अपमान केवल उसका नहीं है, सुननेवाले का है, और वह अपमान भरी सभा के सामने रखा गया है।
सार: शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, स्वामी और सर्प को छोटा करके नहीं आँकना चाहिये, यह कहकर वह विलाप करती है। भरी सभा के बीच व्याकुल पड़ी हुई वह रो-रोकर कहती है कि दशकन्धर के जीते-जी उसकी यह दशा कैसे हुई।
किसने नाक और कान काटे
उत्तर पहले सभा से आता है, राजा से बाद में। और यह क्रम बताता है कि दृश्य किसने जीत लिया है।
सुनत सभासद उठे अकुलाई । समुझाई गहि बाँह उठाई॥
चौपाई ७
कह लंकेस कहसि निज बाता। केइँ तव नासा कान निपाता॥
सुनते ही सभासद अकुला उठे। उन्होंने बाँह पकड़कर उठाया और समझाया। इसके बाद लङ्कापति बोलता है, और उसका पहला वाक्य आश्चर्य का नहीं है, जानकारी का है। अपनी बात तो कहिये, किसने नाक-कान काटे। यानी वह यह नहीं पूछ रहा कि यह कैसे हुआ, वह नाम पूछ रहा है। राजा का प्रश्न हमेशा नाम पूछता है, क्योंकि नाम मिलने पर आगे क्या करना है यह तय हो जाता है।
और उत्तर में वह नाम तुरन्त नहीं देती। पहले परिचय देती है, और परिचय राजा की भाषा में देती है। अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र, पुरुषों में सिंह के समान, वन में खेलने आये हैं। ध्यान दीजिये कि उसने यह नहीं कहा कि वे तपस्वी हैं या वनवासी हैं। उसने राजवंश बताया, और उसके बाद कहा कि खेलने आये हैं। जो लोग वन में शिकार खेलने निकलते हैं वे रहने नहीं आते, और यह बात लङ्का के लिये बुरी ख़बर है।
और फिर वह अपना अनुमान रखती है, जो इस पूरे प्रसंग का सबसे साफ़ वाक्य है। मुझे उनकी करनी से ऐसा समझ पड़ा है कि वे पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर देंगे। यह डर नहीं है, यह हिसाब है। उसने एक दिन में एक सेना का अन्त होते देखा है और उसी से आगे की रेखा खींच ली है।
जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन । अभय भए बिचरत मुनि कानन॥
चौपाई ८
देखत बालक काल समाना । परम धीर धन्वी गुन नाना॥
जिनकी भुजाओं का बल पाकर मुनि लोग वन में निर्भय होकर विचरने लगे हैं। यह वाक्य सीधे रावण की ओर देखकर कहा गया है, और इसमें उसका नाम भी लिया गया है, दसानन। वह यह याद दिला रही है कि जिन मुनियों को अब तक लङ्का का डर था वे अब बेख़ौफ़ घूम रहे हैं, और यह बदलाव किसी सन्धि से नहीं आया, किसी की भुजाओं से आया।
और फिर वह वाक्य जो इस पूरे वर्णन को याद रहने लायक बनाता है। देखत बालक काल समाना। देखने में बालक हैं, पर हैं काल के समान। दोनों बातें एक ही पंक्ति में, बिना किसी जोड़ के, बिना किसी सफ़ाई के। और इसके बाद तीन गुण गिनाये गये हैं, परम धीर, श्रेष्ठ धनुर्धर और अनेकों गुणों से युक्त। धीरज पहले रखा गया है, धनुष बाद में। जिसने उन्हें लड़ते देखा है वह यह क्रम यूँ ही नहीं चुनता।
सार: सभासद अकुलाकर उसकी बाँह पकड़कर उठाते और समझाते हैं। लङ्कापति पूछता है कि किसने नाक-कान काटे। वह बताती है कि अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र वन में आये हैं और पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर देंगे, जिनका बल पाकर मुनि निर्भय घूम रहे हैं, जो देखने में बालक हैं पर काल के समान हैं।
राम, ऐसा उनका नाम है
और अब वह नाम आता है जो लङ्का की सभा में पहली बार बोला जा रहा है।
अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता॥
चौपाई ९
सोभा धाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा॥
दोनों भाइयों का बल और प्रताप अतुलनीय है, वे दुष्टों का वध करने में लगे हैं, और देवताओं तथा मुनियों को सुख देनेवाले हैं। तीन बातें, और तीनों लङ्का के लिये उलटी हैं। जिसे यह सभा दुष्ट कहती है उसका वध हो रहा है, और जिन्हें यह सभा शत्रु मानती है उन्हें सुख मिल रहा है। फिर शोभा का धाम कहा गया, और तब नाम रखा गया। सोभा धाम राम अस नामा।
यह वाक्य जिस चाल से आता है वह ध्यान खींचता है। पूरा वर्णन हो चुका है, प्रशंसा हो चुकी है, और नाम सबसे आख़िर में रखा गया है, जैसे कोई सबसे भारी चीज़ सबसे बाद में मेज़ पर रखता है। और उसी साँस में, बिना कोई अन्तर दिये, अगला वाक्य आता है। उनके साथ एक तरुणी स्त्री है।
रूप रासि बिधि नारि सँवारी । रति सत कोटि तासु बलिहारी॥
चौपाई १०
तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा॥
विधाता ने उस स्त्री को ऐसी रूप की राशि बनाया है कि सौ करोड़ रति उस पर निछावर हैं। रति कामदेव की पत्नी हैं, यानी सुन्दरता का जो सबसे ऊँचा माप इस सभा को मालूम है वही उठाया गया, और फिर उसे सौ करोड़ से गुणा करके निछावर कर दिया गया। यह वर्णन फ़रियाद के बीच में क्यों आया, इसका कोई कारण नहीं दिया गया, और कारण की ज़रूरत भी नहीं है। जो सुनना था वह सुन लिया गया है।
और तब, इस सारे वर्णन के बाद, वह अपनी बात पर लौटती है। उन्हीं के छोटे भाई ने मेरे नाक-कान काट डाले, और यह सुनकर कि मैं इस घर की बहन हूँ, उन्होंने हँसी उड़ायी। पूरे भाषण में उसकी अपनी चोट को सबसे कम जगह मिली है, और वह जगह भी ऐसी है जहाँ वह किसी और बात के पीछे आती है। जिसे उकसाना हो उसे अपनी पीड़ा नहीं दिखायी जाती, उसका अपमान दिखाया जाता है।
सार: वह बताती है कि दोनों भाई अतुलित बल और प्रताप वाले हैं, दुष्टों का वध करते हैं, देवताओं और मुनियों को सुख देते हैं, शोभा के धाम हैं और उनका नाम राम है। उनके साथ एक ऐसी सुन्दरी है जिस पर सौ करोड़ रति निछावर हैं। उन्हीं के छोटे भाई ने उसके नाक-कान काटे और बहन कहने पर हँसी उड़ायी।
जिस रात नींद नहीं आयी
अब वह ख़बर आती है जिसके लिये यह सारा भाषण ज़मीन तैयार कर रहा था। और वह दो वाक्यों में निपट जाती है।
खर दूषन सुनि लगे पुकारा । छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा॥
चौपाई ११
खर दूषन तिसिरा कर घाता। सुनि दससीस जरे सब गाता॥
मेरी पुकार सुनकर खर-दूषण सहायता करने आये, पर उन्होंने क्षण भर में सारी सेना को मार डाला। छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा। पूरा कटक, यानी पूरी सेना, क्षण भर में। जो हिस्सा हमने सात छन्दों में पढ़ा, वह यहाँ आधी पंक्ति में सुना दिया जाता है, और आधी पंक्ति में सुनाये जाने से वह और बड़ा लगता है।
और फिर तीन नाम एक साथ गिनाये जाते हैं, खर, दूषण और त्रिशिरा, और उनके साथ जो क्रिया आती है वह वध है। यह सुनकर दशशीश के सारे अङ्ग जल उठे। जरे सब गाता। क्रोध यहाँ मन का नहीं कहा गया, देह का कहा गया है। अङ्ग जलना एक शारीरिक बात है, और तुलसी इसे इसीलिये चुनते हैं, क्योंकि जो आग भीतर लगी है वह आगे चलकर एक पूरे नगर को जलायेगी।
सूपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति।
दोहा २२
गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति॥ २२॥
और अब इस प्रसंग का आख़िरी दोहा, जिसमें दो आदमी हैं और दोनों एक ही हैं। पहली पंक्ति में वह राजा है जो बहन को समझाता है और बहुत प्रकार से अपना बल बखानता है। भरी सभा है, मन्त्री हैं, और उनके सामने घोषणा हो रही है कि चिन्ता की कोई बात नहीं। दूसरी पंक्ति में वही आदमी महल के भीतर है, और वहाँ कोई सुननेवाला नहीं है।
गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति। अत्यन्त चिन्ता के वश महल में गया, और सारी रात नींद नहीं पड़ी। तुलसी यह नहीं बताते कि वह क्या सोचता रहा। वे केवल इतना लिखते हैं कि नींद नहीं आयी, और उतने से पूरा भीतरी हाल खुल जाता है। जिस आदमी ने अभी-अभी सभा में अपना बल बखाना है वही रात भर करवटें बदल रहा है।
और यहाँ एक चीज़ है जिसे तुलसी कहते नहीं। सभा में जो कुछ सुनाया गया उसमें सबसे अधिक जगह किस बात को मिली थी, यह याद कीजिये। बल का वर्णन था, प्रताप का था, काल के समान होने का था, पर सबसे विस्तार से जो कहा गया वह उस स्त्री का रूप था जिस पर सौ करोड़ रति निछावर हैं। नींद किस बात से उड़ी, यह पन्ना नहीं बताता। अगला पन्ना बताता है।
सार: खर, दूषण और त्रिशिरा के वध की ख़बर सुनकर रावण के सारे अङ्ग जल उठते हैं। वह शूर्पणखा को समझाकर बहुत प्रकार से अपना बल बखानता है, फिर अत्यन्त चिन्ता में डूबा हुआ महल जाता है, और उसे सारी रात नींद नहीं आती।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने को पढ़कर जो बात सबसे देर तक साथ रहती है वह किसी बाण की नहीं है। वह उपाय शब्द की है। चौदह हज़ार ऐसे योद्धा जो कटकर भी उठ खड़े होते हैं, उनका अन्त हथियार से नहीं होता। वह इस तरह होता है कि हर एक को उसके सामनेवाले में वही दिख जाता है जिसे वह मारने आया था। यह लड़ाई जीतने का तरीक़ा नहीं है, यह लड़ाई को बेमानी कर देने का तरीक़ा है। जिस सेना को आपस में लड़ा दिया गया उसे अन्त में हराया किसने, यह कहना कठिन है।
दूसरी बात वह दोहा है। मानस में नाम की महिमा जगह-जगह कही गयी है, प्रायः भक्तों के सन्दर्भ में, प्रायः स्तुति के रूप में। यहाँ वह किसी उपदेश में नहीं आती, एक रणभूमि के बीच में आती है, और जिनके साथ घटती है वे भक्त नहीं हैं। वे मारने आये थे, वे गाली की तरह वह नाम ले रहे थे, और उन्हें निर्वाण पद मिल गया। इस एक दोहे ने वह सारा हिसाब उलट दिया जिसके सहारे हम तय करते हैं कि किसे क्या मिलना चाहिये।
और तीसरी बात दो चुपचाप रखे गये दृश्यों का जोड़ा है। एक तरफ़ पंचवटी है, जहाँ युद्ध के तुरन्त बाद कोई विजय-घोष नहीं है, केवल एक स्त्री है जो देखती जा रही है और जिसकी आँखें भरती नहीं। दूसरी तरफ़ लङ्का है, जहाँ कुछ भी नहीं हुआ, कोई युद्ध नहीं हुआ, कोई घाव नहीं लगा, और फिर भी राजा को रात भर नींद नहीं आती। तुलसी दोनों को एक ही पन्ने पर रखकर छोड़ देते हैं। जिसके पास सब कुछ है वह जाग रहा है, और जिसके पास एक कुटी है वह अघाया नहीं जा रहा।
इस प्रसंग तक आते-आते अरण्यकाण्ड की दिशा बदल चुकी है। अब तक वन ऋषियों का था, आश्रमों का था, उपदेशों का था। इस पन्ने पर वही वन पहली बार रणभूमि बनता है, और बनते ही फिर शान्त भी हो जाता है। पर जो शान्ति लौटती है वह पहलेवाली शान्ति नहीं है, क्योंकि इस बीच एक ख़बर समुद्र पार चली गयी है और एक सभा में कुछ ऐसा कह दिया गया है जिसे वापस नहीं लिया जा सकता।
और आख़िर में एक बात जो इस पूरे पन्ने पर अनकही रह जाती है। जिन चौदह हज़ार को मारा गया उन्हें जो मिला, वह लङ्का में किसी को मालूम नहीं। वहाँ केवल इतना पहुँचा कि सेना मारी गयी और तीन भाई मारे गये। जो सबसे बड़ी बात इस युद्ध में घटी थी वह ख़बर बनकर कहीं नहीं गयी। शूर्पणखा उसे नहीं ले जा सकती थी, क्योंकि उसने वह देखा ही नहीं था। रावण उसे नहीं जान सकता था, क्योंकि उसके पास पहुँचनेवाली ख़बरें बल की ख़बरें थीं। इसीलिये वह रात भर उस चीज़ की चिन्ता में जागता रहा जो उसका असली संकट थी ही नहीं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा २० से २२, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।