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रामचरितमानसअरण्यकाण्डप्रसंग 5
खर, दूषण और त्रिशिरा का वध
चौदह हज़ार के सामने एक अकेली आकृति खड़ी है। जो सेना उसे मारने दौड़ती है वह उसी का नाम पुकारती हुई मरती है।
सीता लक्ष्मण के साथ पर्वत की कन्दरा में थीं। राम ने राक्षसों के हथियार काटकर तिल के समान कर दिये थे, और फिर धनुष कान तक खींचकर अपने तीर छोड़े थे। आगे तीन भाइयों की धमकी है, कटकर फिर उठते योद्धा हैं, और चौदह हज़ार के सामने एक को देखकर डरे हुए देवता हैं।
तीन भाई, और रावण
- राम जिनके तीखे बाण योद्धाओं को काटते हैं, और वे फिर उठ खड़े होते हैं। वे पल भर में शत्रुओं के बाण रोककर हर सेनापति के हृदय में दस-दस बाण मारते हैं। देवताओं और मुनियों को भयभीत देखकर वे एक बड़ा कौतुक करते हैं, और शत्रु एक-दूसरे को राम देखकर लड़ मरते हैं। युद्ध जीतकर वे पंचवटी में रहते हैं।
- लक्ष्मण युद्ध के समय सीता के साथ कन्दरा में हैं, और युद्ध जीत लिये जाने पर उन्हें लेकर लौटते हैं।
- सीता जिन्हें युद्ध के बाद लक्ष्मण ले आते हैं, जो राम को देखते-देखते अघाती नहीं, और जिनका वर्णन शूर्पणखा रावण के सामने करती है।
- खर तीन भाइयों में एक, जिनके नाम टीका बताती है। तीनों भाई भागनेवाले को अपने हाथों मारने की धमकी देते हैं। अपनी सेना को व्याकुल देखकर खर, त्रिशिरा और दूषण के साथ मुड़ता है।
- दूषण दूसरा भाई, जो खर के साथ लड़ता है, और जिसका वध सुनकर रावण के अङ्ग जल उठते हैं।
- त्रिशिरा तीसरा भाई, जो अपनी सेना को व्याकुल देखकर खर और दूषण के साथ मुड़ता है।
- शूर्पणखा खर और दूषण का धुआँ देखकर रावण के पास जाती है, और उसे उकसाती है। वह उसे नीति सुनाती है, सभा के बीच पड़ी रोती है, और दशरथ के दो पुत्रों और उनके साथ की युवती का वर्णन करती है।
- रावण जिसे शूर्पणखा उकसाती है, और जिससे वह सभा के बीच व्याकुल पड़ी रो-रोकर कहती है। खर, दूषण और त्रिशिरा का वध सुनकर उसके सारे अङ्ग जल उठते हैं। वह शूर्पणखा को समझाकर बहुत प्रकार से अपना बल बखानता है, और अत्यन्त चिन्ता के वश महल में जाता है। उसे रात भर नींद नहीं आती।
बाण, मानो साँप फुफकारते हों
तब भयानक बाण ऐसे चले मानो बहुत से साँप फुफकारते हुए जा रहे हों। राम संग्राम में क्रुद्ध हुए, और अत्यन्त तीक्ष्ण बाण चलने लगे।
जो रण से भागेगा
अत्यन्त तीखे बाणों को देखकर राक्षस वीर पीठ दिखाकर भाग चले। तब तीनों भाई क्रुद्ध होते हैं, जिन्हें टीका खर, दूषण और त्रिशिरा बताती है।
वे कहते हैं, “जो रण से भागकर जायगा, उसका वध हम अपने हाथों करेंगे।” तब भागते हुए राक्षस मन में मरना ठानकर लौटे, और सामने होकर अनेक प्रकार के हथियारों से प्रहार करने लगे।
कटते हैं, और फिर उठ खड़े होते हैं
शत्रु को अत्यन्त कुपित जानकर राम धनुष पर बाण चढ़ाकर बहुत से नाराच छोड़ते हैं, और विकट पिशाच कटने लगते हैं। टीका इन पिशाचों को राक्षस पढ़ती है। छाती, सिर, भुजा, हाथ और पैर जहाँ-तहाँ पृथ्वी पर गिरने लगते हैं। बाण लगते ही वे चिग्घाड़ते हैं, जिसे टीका हाथी की चिग्घाड़ कहती है। उनके धड़ पहाड़ों के समान गिरते हैं।
योद्धाओं के शरीर कटकर सौ टुकड़े हो जाते हैं, और वे छल करके फिर उठ खड़े होते हैं। आकाश में बहुत सी भुजाएँ और सिर उड़ रहे हैं, और बिना सिर के धड़ दौड़ रहे हैं। पक्षी, चील, कौए और सियार कठोर और भयंकर कट-कट शब्द कर रहे हैं। सियार कटकटा रहे हैं, भूत, प्रेत और पिशाच खोपड़ियाँ बटोर रहे हैं, या टीका के दूसरे अर्थ में खप्पर भर रहे हैं। वीर-वैताल खोपड़ियों पर ताल दे रहे हैं और योगिनियाँ नाच रही हैं।
राम के प्रचण्ड बाण योद्धाओं के वक्ष, भुजा और सिर काटते हैं। धड़ जहाँ-तहाँ गिरते हैं, और उठकर लड़ते हैं। वे भयंकर स्वर में पुकारते हैं, “पकड़ो, पकड़ो”।
चौदह हज़ार, और एक
गीध अँतड़ियों को पकड़कर उड़ते हैं, और पिशाच उन्हें हाथ में पकड़कर दौड़ते हैं। टीका एक छोर गीधों को और दूसरा पिशाचों को देती है। मानो संग्राम रूपी नगर के निवासी बहुत से बालक पतंग उड़ा रहे हों।
अनेक योद्धा मारे और पछाड़े गये, और बहुत से, जिनके हृदय विदीर्ण हो गये हैं, पड़े कराह रहे हैं। अपनी सेना को व्याकुल देखकर त्रिशिरा, खर, दूषण आदि योद्धा मुड़ते हैं।
अनगिनत राक्षस क्रोध करके बाण, शक्ति, तोमर, फरसा, शूल और कृपाण एक ही बार में राम पर छोड़ने लगते हैं। राम पल भर में शत्रुओं के बाण रोककर और उन्हें ललकारकर अपने बाण छोड़ते हैं। वे सब राक्षस सेनापतियों के हृदय में दस-दस बाण मारते हैं।
योद्धा पृथ्वी पर गिरते हैं, उठकर भिड़ते हैं, और मरते नहीं। वे बहुत घनी माया रचते हैं। चौदह हज़ार प्रेतों को और अकेले अयोध्यानाथ राम को देखकर देवता डरते हैं। टीका इन प्रेतों को राक्षस पढ़ती है।

देवताओं और मुनियों को भयभीत देखकर माया के स्वामी राम एक बड़ा कौतुक करते हैं। शत्रुओं की सेना एक-दूसरे को राम के रूप में देखने लगती है। युद्ध करके वह सेना लड़ मरती है।
राम राम कहते हुए
राम राम कहकर वे शरीर छोड़ते हैं और निर्वाण पद पाते हैं। टीका के अनुसार वे यों कह रहे हैं, “यही राम है, इसे मारो।”
यह उपाय करके कृपानिधान राम ने, जो कृपा के भण्डार हैं, शत्रुओं को क्षण भर में मार डाला। देवता हर्षित होकर फूल बरसाते हैं और आकाश में नगाड़े बजते हैं। फिर वे सब स्तुति कर-करके अनेक विमानों पर सुशोभित होकर चले जाते हैं।
और तब सीता लौट आयीं
जब राम ने युद्ध में शत्रुओं को जीत लिया, तब देवता, मनुष्य और मुनि, सबका भय बीत गया। तब लक्ष्मण सीता को ले आते हैं। चरणों में पड़ते हुए उन्हें राम ने हर्षित होकर हृदय से लगा लिया।
सीता राम के साँवले और कोमल शरीर को परम प्रेम से देख रही हैं, और नेत्र अघाते नहीं।
पंचवटी में बसकर राम ऐसे चरित्र करने लगे जो देवताओं और मुनियों को सुख देते हैं।
धुआँ देखकर
खर-दूषण का धुआँ देखकर शूर्पणखा रावण के पास गयी। टीका इस धुएँ को विध्वंस पढ़ती है।
वह रावण को उकसाती है, जिसे टीका भड़काना कहती है। भारी क्रोध करके वह कहती है कि रावण ने देश और ख़ज़ाने की सुध भुला दी है।
जो नीति बहिन सुनाती है
इसके बाद वह नीति सुनाती है। वह कहती है कि राजा मदिरा पीकर दिन-रात पड़ा सोता रहता है, और उसे यह ख़बर नहीं कि शत्रु सिर पर खड़ा है।
नीति के बिना राज्य, धर्म के बिना धन, भगवान् को समर्पित किये बिना सत्कर्म, और विवेक उपजाये बिना विद्या। पढ़ने का, करने का और पाने का, तीनों का फल श्रम रह जाता है।
फिर वह कहती है कि सङ्ग से संन्यासी, बुरी सलाह से राजा, मान से ज्ञान और मदिरापान से लज्जा नष्ट होती है। नम्रता के बिना प्रीति, और मद से गुणवान, शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
वह कहती है, “नीति मैंने ऐसी सुनी है।”
सभा के बीच पड़ी हुई
फिर वह छह चीज़ें गिनाती है जिन्हें छोटा करके नहीं आँकना चाहिये। शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, स्वामी और सर्प।
ऐसा कहकर वह अनेक प्रकार से विलाप करके रोने लगती है। वह सभा के बीच व्याकुल होकर पड़ी है और बहुत प्रकार से रो-रोकर कह रही है। वह कहती है, “आपके जीते-जी, रावण, क्या मेरी ऐसी दशा हो?”
किसने नाक और कान काटे
सुनते ही सभासद अकुला उठे, और उन्होंने उसे समझाया, और बाँह पकड़कर उठाया। फिर रावण बोलता है। वह उसे अपनी बात कहने को कहता है, और पूछता है कि किसने नाक-कान काटे।
वह कहती है कि अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र, पुरुषों में सिंह के समान, वन में खेलने आये हैं। टीका इस खेलने को शिकार खेलना बताती है।
वह आगे कहती है, “मुझे उनकी करनी से ऐसा समझ पड़ा है कि वे पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर देंगे।”
वह रावण को नाम लेकर कहती है कि उन्हीं की भुजाओं का बल पाकर मुनि वन में निर्भय होकर विचरने लगे हैं। फिर वह कहती है कि वे देखने में बालक हैं, पर हैं काल के समान। वे परम धीर हैं, धनुर्धर हैं, और अनेक गुणों से युक्त हैं।
राम, ऐसा उनका नाम है
वह कहती है कि दोनों भाइयों का बल और प्रताप अतुलनीय है, वे दुष्टों का वध करने में लगे हैं, और देवताओं तथा मुनियों को सुख देनेवाले हैं। फिर वह बताती है कि वे शोभा के धाम हैं, और “राम” ऐसा उनका नाम है।
फिर वह कहती है कि उनके साथ एक युवती है, जिसे टीका तरुणी सुन्दरी कहती है। वह कहती है कि विधाता ने उस स्त्री को ऐसी रूप की राशि बनाया है कि सौ करोड़ रति उस पर निछावर हैं। टीका रति को कामदेव की पत्नी बताती है।
वह कहती है, “उन्हीं के छोटे भाई ने मेरे नाक-कान काट डाले। यह सुनकर कि मैं आपकी बहिन हूँ, उन्होंने हँसी उड़ायी।”
जिस रात नींद नहीं आयी
वह कहती है, “खर और दूषण सुनकर पुकार उठे। उन्होंने क्षण भर में सारी सेना को मार डाला।” टीका इसे यों पढ़ती है कि उसकी पुकार सुनकर वे सहायता करने आये।
खर, दूषण और त्रिशिरा का वध सुनकर रावण के सारे अङ्ग जल उठे।
रावण शूर्पणखा को समझाकर बहुत प्रकार से अपना बल बखानता है। वह अत्यन्त चिन्ता के वश महल में गया, और उसे रात भर नींद नहीं पड़ी।
बाण, उपाय, और रावण की रात
राम के बाण ऐसे चलते हैं मानो साँप फुफकार रहे हों, और राक्षसों की सेना भाग चलती है। तीनों भाई भागनेवालों को धमकाते हैं, और वह मरना ठानकर लौटती है। कटे हुए योद्धा छल से फिर उठ खड़े होते हैं, और चौदह हज़ार के सामने अकेले राम को देखकर देवता डरते हैं। तब राम ऐसा कौतुक करते हैं कि शत्रु एक-दूसरे को राम देखकर लड़ मरते हैं, और राम राम कहकर निर्वाण पद पाते हैं। लक्ष्मण सीता को ले आते हैं। धुआँ देखकर शूर्पणखा रावण के पास जाती है, उसे नीति सुनाती है, और सभा के बीच रोती है। खर, दूषण और त्रिशिरा का वध सुनकर रावण के अङ्ग जल उठते हैं, और उस रात उसे नींद नहीं आती।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा 20 (क) से पहले के छन्द और दोहा 20 (क) से 22, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।