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रामचरितमानसअरण्यकाण्डप्रसंग 11
नारद-संवाद और काण्ड का समापन
एक तालाब, एक पेड़ की छाया, और हाथ में वीणा लिये आया हुआ एक मुनि। विवाह से रोके जाने का प्रश्न, और उसका उत्तर। और संतों के लक्षण, जिनके बाद तीसरा सोपान पूरा होता है।
एक तालाब है, एक पेड़ की छाया, और दो भाई। एक मुनि वीणा लिये आते हैं, और उन्हीं की बातचीत पर काण्ड पूरा होता है।
उस बैठक में नारद रामनाम के लिये एक वर माँगते हैं। फिर पूछते हैं कि उन्हें विवाह क्यों नहीं करने दिया गया। और अन्त में संतों के लक्षण पूछते हैं।
यह रामचरितमानस की कथा है। वाल्मीकि की रामायण में नारद और राम की यह भेंट, यह वर, यह प्रश्न और यह उत्तर नहीं हैं।
देवर्षि नारद और दो भाई
- राम वे विरह में हैं, और प्रसन्न बैठे छोटे भाई से कथाएँ कह रहे हैं। जो कुछ कहते हैं, एक पेड़ की छाया में बैठकर कहते हैं।
- नारद देवर्षि, जो वीणा लेकर, गाते हुए आते हैं। वे राम से एक वर माँगते हैं, विवाह से रोके जाने का कारण पूछते हैं, और संतों के लक्षण पूछते हैं।
- लक्ष्मण छोटे भाई, जिनके साथ राम छाया में बैठते हैं और जिनसे कथाएँ कहते हैं, और जो आये हुए मुनि के चरण आदर के साथ धोते हैं।
एक तालाब, एक छाया, और एक चिन्ता
राम को एक बहुत सुन्दर तालाब दिखता है। वे उसमें स्नान करते हैं और परम सुख पाते हैं। फिर एक सुन्दर, उत्तम वृक्ष की छाया देखकर राम छोटे भाई के साथ उसके नीचे बैठ जाते हैं।
फिर वहाँ सब देवता और मुनि आते हैं, स्तुति करते हैं और अपने-अपने धाम लौट जाते हैं। राम परम प्रसन्न बैठे हैं और छोटे भाई से रसीली कथाएँ कह रहे हैं।
भगवान् को विरह में देखकर नारद के मन में विशेष सोच हुआ। वे सोचते हैं, “मेरे शाप को स्वीकार करके राम नाना प्रकार के दुःखों का भार सह रहे हैं।”
फिर वे सोचते हैं: “ऐसे प्रभु को जाकर देख तो लूँ। फिर ऐसा अवसर न बन आयेगा।”
वीणा हाथ में लिये हुए
फिर वे चल पड़ते हैं। हाथ में वीणा लिये वे वहाँ जाते हैं जहाँ राम सुखपूर्वक बैठे हैं। वे कोमल वाणी से, प्रेम के साथ, बखान-बखानकर रामचरित का गान करते आते हैं।
पहुँचकर वे दण्डवत् करते हैं, और राम उन्हें उठा लेते हैं और बहुत बार, टीका के अनुसार बहुत देर तक, हृदय से लगाये रखते हैं। फिर कुशल पूछकर राम उन्हें पास बिठाते हैं, और लक्ष्मण आदर के साथ आये हुए मुनि के चरण धोते हैं।
अब नारद बहुत प्रकार से विनती करते हैं। राम मन में प्रसन्न हैं, यह जानकर वे बोलते हैं। बोलने से पहले वे हाथ जोड़ लेते हैं।
नाम का वर
नारद कहते हैं, “हे स्वभाव से ही उदार राम, सुनिये। आप सुन्दर, अगम और सुगम वर देनेवाले हैं। हे स्वामी, मैं एक वर माँगता हूँ, वह मुझे दीजिये, यद्यपि अन्तर्यामी होने के नाते आप सब जानते ही हैं।”
राम कहते हैं, “हे मुनि, आप मेरा स्वभाव जानते ही हैं। क्या मैं अपने जनों से कभी कुछ छिपाव करता हूँ? मुझे ऐसी कौन-सी वस्तु प्रिय लगती है जिसे, हे मुनिश्रेष्ठ, आप नहीं माँग सकते? अपने जन के लिये मेरे पास कुछ भी अदेय नहीं है। यह विश्वास भूलकर भी मत छोड़िये।”
तब नारद हर्षित होकर कहते हैं, “मैं ऐसा वर माँगता हूँ, और यह धृष्टता करता हूँ।”
नारद माँगते हैं कि यद्यपि प्रभु के अनेक नाम हैं, और वेद कहते हैं कि वे सब एक से एक बढ़कर हैं, तो भी रामनाम सब नामों से बढ़कर हो। वह पापरूपी पक्षियों के समूह के लिये वधिक हो।
राम की भक्ति पूर्णिमा की रात है, उसमें रामनाम चाँद है और बाकी सब नाम तारे। जिस निर्मल आकाश में यह सब बसे, वह भक्त का हृदय है।
राम मुनि से कहते हैं, “एवमस्तु,” ऐसा ही हो, और नारद मन में अत्यन्त हर्षित होकर उनके चरणों में मस्तक नवाते हैं।
नारद का प्रश्न
राम को अत्यन्त प्रसन्न जानकर नारद फिर कोमल वाणी से एक प्रश्न पूछते हैं।
वे कहते हैं, “हे राम, सुनिये, जब आपने अपनी माया को प्रेरित करके मुझे मोहित किया था, तब मैं विवाह करना चाहता था। हे प्रभु, आपने मुझे किस कारण विवाह नहीं करने दिया?”
राम कहते हैं, “हे मुनि, सुनिये, मैं आपसे हर्ष के साथ कहता हूँ।” टीका इस कहने को हर्ष के साथ पढ़ती है।
जैसे माता बालक को
राम आगे कहते हैं, “जो समस्त आशा और भरोसा छोड़कर मुझको भजते हैं, मैं सदा उनकी वैसे ही रखवाली करता हूँ जैसे माता बालक की रक्षा करती है। छोटा बच्चा जब दौड़कर आग और साँप को पकड़ने जाता है, तब माता उसे अलग करके उसकी रक्षा करती है।”
राम कहते हैं, “सयाना हो जाने पर उस पुत्र पर माता प्रेम तो करती है, पर पिछली बात नहीं रहती।” टीका इसे यों पढ़ती है कि अब वह उसे बचाने की चिन्ता नहीं करती, क्योंकि वह माँ पर निर्भर न रहकर अपनी रक्षा आप करने लगता है। राम कहते हैं, “ज्ञानी मेरे सयाने पुत्र के समान है। अपने बल का मान न करनेवाला सेवक मेरे शिशु पुत्र के समान है।”
राम कहते हैं, “मेरे सेवक को केवल मेरा ही बल रहता है, और ज्ञानी को अपना बल होता है। पर काम और क्रोधरूपी शत्रु दोनों के लिये हैं।” टीका यह जोड़ती है कि भक्त के शत्रुओं को मारने की जिम्मेदारी भगवान् पर रहती है, क्योंकि वह उन्हीं के परायण होकर उन्हीं का बल मानता है। अपने बल को माननेवाले ज्ञानी के शत्रुओं के नाश की जिम्मेदारी उन पर नहीं है। राम कहते हैं कि ऐसा विचारकर पण्डित लोग उन्हीं को भजते हैं, और ज्ञान प्राप्त हो जाने पर भी भक्ति नहीं छोड़ते।
मोह की सेना, और उसकी ऋतुएँ
राम कहते हैं, “काम, क्रोध, लोभ और मद आदि मोह की प्रबल सेना है। इनमें मायारूपिणी नारी अत्यन्त दारुण और दुःख देनेवाली है। हे मुनि, सुनिये, पुराण, वेद और संत कहते हैं कि मोहरूपी वन के लिये स्त्री वसन्त है। जप, तप और नियमरूपी सारे जलाशयों को वह ग्रीष्म बनकर सोख लेती है। काम, क्रोध, मद और मत्सर मेढक हैं, और इनके लिये हर्ष देनेवाली वर्षा एक वही है। बुरी वासनाएँ कुमुदों का समूह हैं, और उनके लिये वह सदा सुख देनेवाली शरद् है। सारे धर्म कमलों के झुंड हैं, और नीच सुख देनेवाली वह हिम बनकर उन्हें जला डालती है। फिर ममतारूपी जवास का समूह स्त्रीरूपी शिशिर को पाकर लहलहा जाता है। पापरूपी उल्लुओं के समूह के लिये वह सुख देनेवाली घनी अँधियारी रात है। बुद्धि, बल, शील और सत्य सब मछलियाँ हैं, और स्त्री बंसी के समान है, ऐसा प्रवीण लोग कहते हैं। युवती अवगुणों की जड़, पीड़ा देनेवाली और सब दुःखों की खान है। इसलिये हे मुनि, मैंने जी में ऐसा जानकर आपको रोका था।”
मुनि की आँखें भर आयीं
राम के वचन सुनकर नारद के शरीर पर पुलक उठ आती है और आँखें भर आती हैं।
टीका के अनुसार वे मन ही मन कहते हैं: “कहिये तो, किस प्रभु की ऐसी रीति है, जिसका सेवक पर इतना ममत्व और इतना प्रेम हो? जो मनुष्य भ्रम छोड़कर ऐसे प्रभु को नहीं भजते, वे ज्ञान के कंगाल, दुर्बुद्धि और अभागे हैं।”
फिर नारद आदर के साथ कहते हैं, “हे विज्ञान-विशारद राम, सुनिये। हे नाथ, जन्म-मरण के भय का नाश करनेवाले, अब संतों के लक्षण कहिये।”
राम कहते हैं, “हे मुनि, सुनिये, मैं संतों के गुण कहता हूँ, जिनके कारण मैं उनके वश में रहता हूँ।”
संतों के लक्षण
राम कहते हैं कि संत छः विकारों को जीते हुए हैं, जिन्हें टीका काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर बताती है। वे पापरहित और कामनारहित हैं, निश्चल हैं, अकिंचन, पवित्र और सुख के धाम हैं।
वे असीम ज्ञानवान्, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान् और योगी हैं। वे सावधान, दूसरों को मान देनेवाले, अभिमान से रहित, धैर्यवान्, और धर्म के मार्ग में अत्यन्त निपुण हैं। टीका यह निपुणता धर्म के ज्ञान और आचरण, दोनों में बताती है।
संत गुणों के घर हैं, संसार के दुःखों से रहित, और सन्देह से छूटे हुए। और फिर राम कहते हैं, “मेरे चरणों को छोड़कर उन्हें न देह प्रिय है, न घर।”
संत अपने गुण कानों से सुनते हुए सकुचाते हैं, और दूसरों के गुण सुनकर विशेष हर्षित होते हैं। वे सम और शीतल हैं, नीति का कभी त्याग नहीं करते, सरल स्वभाव के हैं, और सभी से प्रेम रखते हैं।
वे जप, तप, व्रत, दम, संयम और नियम में लगे रहते हैं। गुरु, गोविन्द और ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम रखते हैं। और उनमें श्रद्धा, क्षमा, मैत्री, दया और मुदिता होती है, और राम के चरणों में निष्कपट प्रेम। मुदिता को टीका प्रसन्नता कहती है।
उनमें वैराग्य, विवेक, विनय, विज्ञान, और वेद तथा पुराण का यथार्थ ज्ञान होता है। दम्भ, अभिमान और मद वे कभी नहीं करते, और भूलकर भी कुमार्ग पर पैर नहीं रखते।
राम कहते हैं, “वे सदा मेरी लीलाएँ गाते और सुनते हैं, और बिना किसी कारण के दूसरों के हित में लगे रहते हैं। हे मुनि, सुनिये, संतों के जितने गुण हैं, उन्हें सरस्वती और वेद भी नहीं कह सकते।”
ब्रह्मलोक की ओर
शेष और शारदा भी नहीं कह सकते, इतना सुनते ही नारद ने राम के चरण पकड़ लिये। राम ने इस प्रकार अपने मुख से अपने भक्तों के गुण कहे।
नारद राम के चरणों में बार-बार सिर नवाकर ब्रह्मलोक चले जाते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि वे लोग धन्य हैं जो सब आशा छोड़कर हरि के रंग में रँग गये हैं।
जो लोग राम का पवित्र यश गाते और सुनते हैं, वे वैराग्य, जप और योग के बिना ही राम की दृढ़ भक्ति पाते हैं।
मन से कहा जाता है, “युवती का शरीर दीपक की लौ के समान है। हे मन, आप पतंगा न बनिये। काम और मद छोड़कर राम का भजन कीजिये, और सदा सत्संग कीजिये।”
मासपारायण का बाईसवाँ विश्राम ठीक यहीं पड़ता है। और यहीं कलियुग के सारे पापों का नाश करनेवाले रामचरितमानस का तीसरा सोपान समाप्त होता है।
नारद, नाम और संत
अरण्यकाण्ड एक पेड़ की छाया में पूरा होता है। नारद राम से वर माँगते हैं कि रामनाम सब नामों से बढ़कर हो, और राम कहते हैं, एवमस्तु। फिर वे पूछते हैं कि उन्हें विवाह क्यों नहीं करने दिया गया। राम माता और बालक की उपमा से उत्तर देते हैं, और कहते हैं कि उन्होंने ऐसा जानकर उन्हें रोका था। अन्त में राम संतों के लक्षण कहते हैं, जिनके कारण वे उनके वश में रहते हैं, और नारद ब्रह्मलोक चले जाते हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा 41 से 46 (ख), और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।