रामचरितमानस · अरण्यकाण्ड · नारद-संवाद और काण्ड का समापन
नारद-संवाद और काण्ड का समापन
एक तालाब के किनारे की छाया, हाथ में वीणा लिये आया हुआ एक मुनि, बरसों पुराना वह प्रश्न जिसका उत्तर डाँट नहीं निकलता, और संत के लक्षणों की वह माला जिस पर तीसरा सोपान पूरा होता है।
अरण्यकाण्ड यहाँ पूरा होता है, और जिस चीज़ पर पूरा होता है वह कोई लड़ाई नहीं है। इस काण्ड में जितना घट सकता था घट चुका। वन में जो मिलना था मिल चुका, जो छिनना था छिन चुका, और अब जो बचा है वह एक तालाब, एक पेड़ की छाया, और दो भाई हैं। इन्हीं आख़िरी छ: दोहों में तुलसी न कोई राक्षस लाते हैं, न कोई धनुष उठवाते हैं। वे बस एक मुनि को वीणा हाथ में लिये हुए वहाँ भेज देते हैं, और जो बातचीत होती है उसी पर काण्ड की चादर तह होकर रख दी जाती है।
इस पन्ने पर तीन चीज़ें होती हैं और तीनों एक ही बैठक में होती हैं। पहले नारद एक वर माँगते हैं, और वह वर अपने लिये नहीं माँगते। फिर वे एक बहुत पुराना प्रश्न पूछते हैं, इतना पुराना कि उसका घाव उन्होंने बरसों ढोया है, और उसका उत्तर जैसा वे सोचकर आये होंगे वैसा बिलकुल नहीं निकलता। और अन्त में वे यह पूछते हैं कि संत किसे कहते हैं, और उत्तर में जो आता है वह इस काण्ड का सबसे लम्बा और सबसे धीमा हिस्सा है।
ध्यान रखने की बात वही है जो हर पन्ने पर रहती है। यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। नारद और राम की यह भेंट, यह वर, यह प्रश्न और यह उत्तर तुलसी की अपनी बुनावट है, और इसे किसी दूसरी रामकथा की स्मृति से जोड़कर नहीं पढ़ना चाहिये। जो यहाँ लिखा है वही यहाँ है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम इस पन्ने पर वे विरह में हैं और फिर भी प्रसन्न बैठे हैं, और जो कुछ कहते हैं वह किसी सभा में नहीं, एक पेड़ की छाया में कहते हैं।
- नारद देवर्षि, जो वीणा लेकर आते हैं, गाते हुए आते हैं, और तीन बार बोलते हैं: एक बार वर माँगने, एक बार अपनी पुरानी चोट दिखाने, और एक बार संतों के लक्षण पूछने।
- लक्ष्मण छोटे भाई, जो इस पूरे संवाद में एक शब्द नहीं बोलते और केवल एक काम करते हैं, आये हुए मुनि के चरण धोते हैं।
एक तालाब, एक छाया, और एक चिन्ता
पन्ना एक स्नान से खुलता है। चलते-चलते राम को एक बहुत सुन्दर तालाब दिखायी देता है, वे उसमें स्नान करते हैं, और तुलसी उस स्नान का फल एक ही शब्द में बाँध देते हैं, परम सुख। फिर एक उत्तम वृक्ष की छाया दिखती है और दोनों भाई उसके नीचे बैठ जाते हैं। इतनी छोटी-सी बात है कि पढ़ते हुए आगे निकल जाने का मन करता है, पर रुकिये। इस पूरे काण्ड में इससे पहले ऐसा कोई ठहराव नहीं आया जहाँ कोई कहीं जा न रहा हो, किसी को ढूँढ़ न रहा हो, किसी से लड़ न रहा हो।
फिर वहाँ सब देवता और मुनि आते हैं। वे स्तुति करते हैं और अपने-अपने धाम लौट जाते हैं। तुलसी उनके आने का कारण नहीं बताते और उनकी स्तुति भी नहीं सुनाते। वे बस इतना कहते हैं कि आये, स्तुति की, चले गये। इसके बाद जो पंक्ति आती है वही इस पन्ने की जड़ है: कृपालु परम प्रसन्न बैठे हैं और छोटे भाई से रसीली कथाएँ कह रहे हैं।
अब इस दृश्य पर एक और परत रखिये। छाया में बैठनेवाले दो ही हैं, राम और अनुज। तीसरा कोई नहीं है, और जो नहीं है उसका न होना ही इस काण्ड की सबसे बड़ी घटना रही है। इसलिये जब अगली ही चौपाई में कोई ऊपर से देखता है, तो उसे जो दिखता है वह प्रसन्नता नहीं है। उसे विरह दिखता है।
देखनेवाले नारद हैं, और जो उनके मन में उठता है वह चिन्ता है, जिज्ञासा नहीं। वे यह नहीं सोचते कि प्रभु किस दशा में हैं। वे यह सोचते हैं कि इस दशा के पीछे कौन है। और उत्तर उन्हें अपने ही भीतर मिलता है।
बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी॥
चौपाई १
मोर साप करि अंगीकारा । सहत राम नाना दुख भारा॥
भगवान् को विरहयुक्त देखकर नारद के मन में विशेष सोच हुआ। और सोच का रूप यह है: मेरे ही शाप को स्वीकार करके राम नाना प्रकार के दुःखों का भार सह रहे हैं। यहाँ एक पूरी पुरानी कथा एक आधी चौपाई में बाँध दी गयी है। नारद जानते हैं कि उनका दिया हुआ शाप इस वनवास के, इस वियोग के, इस भटकन के पीछे कहीं खड़ा है। जो देखने आया था वह अब अपने को कारण के कठघरे में पा रहा है।
और इसी जगह तुलसी एक बहुत बारीक काम करते हैं। वे नारद को पछतावे में डूबने नहीं देते। अगली ही साँस में नारद का मन पलटता है और एक दूसरी बात सोचता है, जो पछतावे से कहीं अधिक व्यावहारिक है। ऐसे प्रभु को जाकर देख तो लूँ, फिर ऐसा अवसर बन आयेगा या नहीं, कौन जाने।
सार: राम एक तालाब में स्नान करके वृक्ष की छाया में लक्ष्मण के साथ बैठे हैं, देवता और मुनि स्तुति करके लौट चुके हैं, और वे प्रसन्न होकर कथा कह रहे हैं। ऊपर से देखते हुए नारद को उनका विरह दिखता है और यह याद आता है कि यह सारा भार उनके ही शाप को स्वीकार करने से आया है।
वीणा हाथ में लिये हुए
फिर वे चल पड़ते हैं, और जिस तरह चलते हैं वही उनका परिचय है। हाथ में वीणा है। वे वहाँ जाते हैं जहाँ प्रभु सुखपूर्वक बैठे हैं। और रास्ते भर वे चुप नहीं हैं। कोमल वाणी से, प्रेम के साथ, बखान-बखानकर वे रामचरित का गान करते हुए आ रहे हैं। यानी जिसके पास वे जा रहे हैं उसी का यश गाते हुए जा रहे हैं, और यह उन्हें अटपटा नहीं लगता।
पहुँचकर वे दण्डवत् करते हैं। और यहाँ जो होता है उसे तुलसी बहुत कम शब्दों में कह देते हैं और इतने कम शब्दों में कि उन्हें दुबारा पढ़ना पड़ता है। दण्डवत् करते देखकर राम ने उन्हें उठा लिया और बहुत देर तक हृदय से लगाये रखा। बहुत देर तक। यह माप किसी और के लिये इस काण्ड में नहीं आया।
फिर कुशल पूछकर पास बिठा लिया जाता है, और तब लक्ष्मण आगे बढ़ते हैं। वे आदर के साथ आये हुए मुनि के चरण धोते हैं। इस पूरे प्रसंग में लक्ष्मण एक शब्द नहीं बोलेंगे। वे जो कुछ कहना चाहते हैं वह इसी एक काम में कह चुके हैं, और इसके बाद वे उसी छाया में बैठकर वही सुनेंगे जो हम सुनने जा रहे हैं।
अब नारद बहुत प्रकार से विनती करते हैं। विनती पहले, माँग बाद में, और बीच में एक तसल्ली: प्रभु मन में प्रसन्न हैं, यह जान लेने के बाद ही वे बोलते हैं। और बोलने से पहले हाथ जोड़ लेते हैं। तुलसी उन जुड़े हुए हाथों के लिये एक ही उपमा देते हैं, कमल।
नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि।
दोहा ४१
नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि॥ ४१॥
सार: नारद वीणा लिये, रामचरित गाते हुए वहाँ पहुँचते हैं। दण्डवत् करते ही राम उन्हें उठाकर बहुत देर तक हृदय से लगाये रखते हैं, कुशल पूछकर पास बिठाते हैं, और लक्ष्मण आदर से उनके चरण धोते हैं। तब बहुत प्रकार की विनती करके, प्रभु को प्रसन्न जानकर, नारद हाथ जोड़कर बोलते हैं।
एक वर, जो अपने लिये नहीं माँगा गया
जो पहला वाक्य वे कहते हैं वह माँग नहीं है, वह पहचान है। हे स्वभाव से ही उदार रघुनाथ, सुनिये। यह उदारता उन्होंने अभी-अभी अपने ऊपर नापी है, क्योंकि जिसे शाप दिया था वही अभी उन्हें हृदय से लगाकर बैठा है। और फिर वे एक बात कहते हैं जो इस वर के पूरे स्वाद को खोल देती है। आप सुन्दर वर भी देते हैं, अगम वर भी और सुगम भी। यानी जो मिल नहीं सकता वह भी, और जो सहज मिल जाता है वह भी।
सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक॥
चौपाई २
देहु एक बर मागउँ स्वामी । जद्यपि जानत अंतरजामी॥
हे स्वामी, मैं एक वर माँगता हूँ, वह मुझे दीजिये, यद्यपि अन्तर्यामी होने के नाते आप सब जानते ही हैं। यह अन्तिम आधी पंक्ति ही सारा शिष्टाचार है। माँगनेवाला जानता है कि जिससे माँग रहा है वह माँग को पहले से जानता है, और फिर भी माँगता है, क्योंकि माँगना अपने आप में एक सम्बन्ध है।
उत्तर में जो आता है वह वर से पहले एक उलाहना है, और बहुत मीठा उलाहना है। राम कहते हैं कि मुनि मेरा स्वभाव जानते ही हैं, फिर यह पूछते हैं कि क्या मैं अपने जनों से कभी कुछ छिपाव करता हूँ। और फिर वह प्रश्न, जो प्रश्न के रूप में सबसे बड़ा वरदान है: मुझे ऐसी कौन-सी वस्तु प्रिय लगती है जिसे, हे मुनिश्रेष्ठ, आप नहीं माँग सकते। इसके बाद वे एक पंक्ति और जोड़ते हैं, कि अपने जन के लिये मेरे पास कुछ भी अदेय नहीं है, और यह विश्वास भूलकर भी मत छोड़िये।
यह पूरा उत्तर देने के बाद ही नारद हर्षित होते हैं, और तब जो कहते हैं उसमें वे अपनी ओर से एक शब्द जोड़ते हैं: ढिठाई। मैं ऐसा वर माँगता हूँ, और यह धृष्टता करता हूँ। जो माँगने जा रहे हैं उसे वे स्वयं धृष्टता कह रहे हैं, और सुनने के बाद समझ में आता है कि क्यों, क्योंकि वे प्रभु के ही नामों के बीच एक को ऊपर बिठाने जा रहे हैं।
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका॥
चौपाई ३
राम सकल नामन्ह तें अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥
यद्यपि प्रभु के अनेकों नाम हैं, और वेद कहते हैं कि वे सब एक से एक बढ़कर हैं, तो भी हे नाथ, रामनाम सब नामों से बढ़कर हो, और पापरूपी पक्षियों के समूह के लिये यह वधिक के समान हो। तुलसी की यह उपमा देखिये। पाप को उन्होंने चिड़ियों का झुंड कहा है, कोई पहाड़ नहीं, कोई अन्धकार नहीं। झुंड, जो एक साथ उड़ता है, एक साथ उतरता है, और जिसके सामने एक ही चीज़ काम आती है, बहेलिया।
और फिर वे इस वर को एक दूसरी तस्वीर में रख देते हैं, जो इस पूरे पन्ने की सबसे सुन्दर चीज़ है। भक्ति को वे पूर्णिमा की रात कहते हैं। उस रात में रामनाम पूरा चाँद है और बाकी सब नाम तारे हैं। और जिस आकाश में यह सब बसे, वह आकाश भक्त का हृदय है।
राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम।
दोहा ४२ (क)
अपर नाम उडगन बिमल बसहुँ भगत उर ब्योम॥ ४२ (क)॥
एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ।
तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ॥ ४२ (ख)॥
इस दोहे के बाद जो अर्ध-दोहा आता है वह इस पूरे संवाद का सबसे छोटा हिस्सा है और सबसे बड़ा। कृपासागर रघुनाथ मुनि से केवल इतना कहते हैं, ऐसा ही हो, और तब नारद मन में अत्यन्त हर्षित होकर प्रभु के चरणों में मस्तक नवाते हैं। उतना ही। जो वर माँगा गया वह अपने लिये नहीं था, और जिसने दिया उसने उसे एक शब्द में दे दिया।
सार: नारद राम को स्वभाव से उदार और अगम तथा सुगम दोनों प्रकार के वर देनेवाला कहकर एक वर माँगते हैं। राम कहते हैं कि अपने जन के लिये उनके पास कुछ अदेय नहीं। तब नारद यह वर माँगते हैं कि रामनाम सब नामों से बढ़कर हो, भक्तिरूपी पूर्णिमा में वही पूर्ण चन्द्रमा हो और शेष नाम तारे, और यह सब भक्त के हृदयरूपी आकाश में बसे। राम केवल एक वाक्य कहते हैं, ऐसा ही हो।
वह पुराना प्रश्न
अब पन्ना पलटता है। नारद रघुनाथ को अत्यन्त प्रसन्न देखते हैं, और तब जो पूछते हैं वह वर्षों से भीतर बैठा हुआ है। तुलसी उनकी वाणी को फिर वही विशेषण देते हैं जो पहले दिया था, कोमल। यानी प्रश्न कठोर है और स्वर कोमल है, और यही इस पूरे हिस्से की चाल है।
प्रश्न का पहला आधा एक याद दिलाना है। हे रघुनाथ, सुनिये, जब आपने अपनी माया को प्रेरित करके मुझे मोहित किया था। इस एक पंक्ति में वह सारी पुरानी कथा है जिसे नारद ने कभी भोगा था, और उसे वे किसी दोषारोपण के स्वर में नहीं कहते, केवल तिथि की तरह रखते हैं। और उसी के सहारे वह प्रश्न आता है जो उन्होंने कभी किसी से नहीं पूछा।
तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा । प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा॥
चौपाई ४
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा॥
तब मैं विवाह करना चाहता था। हे प्रभु, आपने मुझे किस कारण विवाह नहीं करने दिया। सीधा प्रश्न है, और उसके भीतर एक छोटी-सी शिकायत बैठी हुई है, जैसी हर पुराने घाव में रहती है। अब उत्तर सुनिये, और उत्तर सुनने से पहले एक शब्द पर रुकिये, क्योंकि उसी शब्द से इस पूरे उत्तर का रंग तय होता है।
राम कहते हैं, हे मुनि, सुनो, मैं यह हर्ष के साथ कह रहा हूँ। हर्ष के साथ। यह डाँट नहीं है, सफ़ाई नहीं है, और अपने किये का बचाव भी नहीं है। यह वह बात है जो कहते हुए कहनेवाले को अच्छा लग रहा है। और तब वे सीधे उत्तर पर नहीं आते। वे पहले यह बताते हैं कि वे किनकी बात कर रहे हैं: जो समस्त आशा और भरोसा छोड़कर केवल मुझको ही भजते हैं।
सार: नारद याद दिलाते हैं कि एक बार राम ने माया प्रेरित करके उन्हें मोहित किया था, और पूछते हैं कि उस समय विवाह करने से उन्हें किस कारण रोका गया। राम उत्तर हर्ष के साथ शुरू करते हैं और पहले उन लोगों का परिचय देते हैं जो सारा भरोसा छोड़कर केवल उन्हीं को भजते हैं।
जैसे माता बालक को
और फिर वह उपमा आती है जिसके लिये यह पूरा प्रसंग याद रखा जाता है। उत्तर न्याय की भाषा में नहीं आता, दण्ड की भाषा में नहीं आता, नियम की भाषा में भी नहीं आता। वह रसोई और आँगन की भाषा में आता है, और उसमें एक माँ है और एक बच्चा है।
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी । जिमि बालक राखइ महतारी॥
चौपाई ५
गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई । तहँ राखइ जननी अरगाई॥
मैं सदा उनकी वैसे ही रखवाली करता हूँ जैसे माता बालक की रक्षा करती है। छोटा बच्चा जब दौड़कर आग और साँप को पकड़ने जाता है, तब वहाँ माता उसे अलग करके बचा लेती है। इस चित्र को धीरे पढ़िये, क्योंकि इसमें बच्चे का कोई अपराध नहीं है। वह बुरा नहीं है। वह बस छोटा है। आग सुन्दर लगती है, साँप चलता हुआ सुन्दर लगता है, और हाथ अपने आप बढ़ जाता है।
और माता जो करती है उसमें भी कोई क्रोध नहीं है। वह समझाती नहीं, डाँटती नहीं, और यह भी नहीं कहती कि देखा, मैंने पहले कहा था। वह बस हाथ बढ़ाकर अलग कर देती है। बच्चे को उस क्षण यह बुरा लगता है, और लगना ही चाहिये, क्योंकि उसकी पकड़ छूट रही है। यही वह जगह है जहाँ नारद का पुराना प्रश्न बैठता है, और जहाँ बैठते ही वह प्रश्न से बदलकर उत्तर हो जाता है।
यह कहकर राम रुकते नहीं। वे उसी घर की अगली तस्वीर दिखाते हैं, जो कुछ बरस बाद की है, और उसी से सारा भेद खुलता है।
प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता॥
चौपाई ६
मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी॥
सयाना हो जाने पर उस पुत्र पर माता प्रेम तो करती है, परन्तु पिछली बात नहीं रहती। टीका इसे खोलकर कहती है: अब वह उसे बचाने की चिन्ता नहीं करती, क्योंकि वह माँ पर निर्भर न रहकर अपनी रक्षा आप करने लगता है। प्रेम घटा नहीं है। पहरा हट गया है। और फिर वह पंक्ति आती है जिसमें राम अपने दोनों प्रकार के जनों को इसी घर में बिठा देते हैं। ज्ञानी मेरे सयाने पुत्र के समान है, और अपने बल का मान न करनेवाला सेवक मेरे शिशु पुत्र के समान है।
ध्यान दीजिये कि इसमें कोई नीचा नहीं है। दोनों पुत्र हैं। दोनों उसी माता के हैं। भेद केवल इतना है कि एक अपने पैरों पर खड़ा है और दूसरा गोद में है, और गोद में रहनेवाले पर नज़र ज़्यादा रहती है। नारद ने अपने को किस श्रेणी में पाया होगा, यह इसी उत्तर से निकल आता है, और उसी के साथ यह भी कि जो रोक लगी थी वह सज़ा नहीं थी, पहरा था।
जनहि मोर बल निज बल ताही । दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही॥
चौपाई ७
यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं । पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं॥
मेरे सेवक को केवल मेरा ही बल रहता है, और ज्ञानी को अपना बल होता है। पर काम और क्रोधरूपी शत्रु दोनों के लिये हैं। टीका इस सन्तुलन को खोलकर रख देती है: भक्त के शत्रुओं को मारने की जिम्मेदारी प्रभु पर रहती है, क्योंकि वह उन्हीं के परायण होकर उन्हीं का बल मानता है, और अपने बल को माननेवाले ज्ञानी के शत्रुओं के नाश की जिम्मेदारी उन पर नहीं है।
और इसी से वह निष्कर्ष निकलता है जिस पर यह पूरा हिस्सा टिका है। ऐसा विचारकर बुद्धिमान लोग मुझको ही भजते हैं, और ज्ञान प्राप्त हो जाने पर भी भक्ति को नहीं छोड़ते। यह वाक्य ज्ञान के विरुद्ध नहीं है। यह केवल इतना कहता है कि ज्ञान मिल जाने के बाद भी गोद छोड़ने की कोई जल्दी नहीं होनी चाहिये।
सार: राम कहते हैं कि जो सब भरोसा छोड़कर उन्हीं को भजते हैं उनकी वे वैसी ही रखवाली करते हैं जैसे माता शिशु की, जो दौड़कर आग और साँप को पकड़ने जाता है। सयाने पुत्र पर माता प्रेम तो करती है पर वह पहरा नहीं रहता। ज्ञानी सयाने पुत्र जैसा है और अमानी सेवक शिशु जैसा। काम और क्रोध दोनों के शत्रु हैं, इसलिये बुद्धिमान ज्ञान पाकर भी भक्ति नहीं छोड़ते। नारद को रोका गया था, दण्ड नहीं दिया गया था।
मोह की सेना, और उसकी ऋतुएँ
अब राम उस शत्रु का नाम लेते हैं जिससे उन्होंने नारद को बचाया था, और उसे सेना के रूप में गिनाते हैं। यह गिनती इस काण्ड में पहले भी आ चुकी है, पर यहाँ उसका ढाँचा अलग है। यहाँ एक सेनापति है और उसकी टुकड़ियाँ हैं।
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।
दोहा ४३
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि॥ ४३॥
काम, क्रोध, लोभ और मद आदि मोह की प्रबल सेना है। और इनमें सबसे दारुण दुःख देनेवाली मायारूपिणी नारी है। यह पंक्ति कठोर है, और इसे नरम करके पढ़ने का कोई तरीका नहीं है। पर यह भी देख लेना चाहिये कि यह किससे, किसको, और किस प्रश्न के उत्तर में कही जा रही है। पूछनेवाला एक मुनि है, प्रश्न यह था कि मुझे विवाह से क्यों रोका गया, और उत्तर देनेवाला उसी विवाह न होने का कारण बता रहा है। यह उपदेश उसी दरवाज़े से भीतर आता है जिस दरवाज़े से प्रश्न आया था।
और फिर तुलसी वह करते हैं जो उनसे बेहतर कोई नहीं कर सकता। वे पूरे तर्क को छोड़कर ऋतुओं में उतर जाते हैं, और छ: ऋतुएँ एक के बाद एक चला देते हैं। मोहरूपी वन के लिये यह वसन्त है, जिसमें वह वन लहलहा उठता है। जप, तप और नियमरूपी जितने जलाशय हैं, उनके लिये यह ग्रीष्म है, जो सबको सोख लेता है।
काम, क्रोध, मद और मत्सर मेढक हैं, और इनके लिये यह वर्षा है, जिसमें वे हर्ष से भर उठते हैं। बुरी वासनाएँ कुमुदों का समूह हैं, और उनके लिये यह शरद् है, जो सदा सुख देती है। सारे धर्म कमलों के झुंड हैं, और उनके लिये यह हिम है, जो उन्हें जला डालती है। और ममतारूपी जवास, जो हरी ऋतुओं में सूखता है, इस शिशिर को पाकर लहलहा जाता है। छ: ऋतुएँ, और हर ऋतु उसी के लिये वरदान है जिसे नहीं बढ़ना चाहिये।
फिर तुलसी ऋतुओं से निकलकर दो और तस्वीरें रखते हैं, और ये दोनों रात और पानी की हैं।
पाप उलूक निकर सुखकारी । नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी॥
चौपाई ८
बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना॥
पापरूपी उल्लुओं के समूह के लिये यह घोर अँधियारी रात है। और फिर वह उपमा जो इस पूरे हिस्से में सबसे धीमी और सबसे तीखी है: बुद्धि, बल, शील और सत्य, ये चारों मछलियाँ हैं, और उन्हें फँसाने के लिये यह बंसी है, ऐसा चतुर पुरुष कहते हैं। चार बड़ी चीज़ें, जिन पर आदमी अपने जीवन का पूरा भरोसा रखता है, यहाँ पानी के भीतर तैरती हुई मछलियाँ हो जाती हैं, और उनका काँटा ऊपर से लटका हुआ है।
अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।
दोहा ४४
ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि॥ ४४॥
और इस पूरे लम्बे चित्रण का अन्त उसी वाक्य पर होता है जिससे यह सब शुरू हुआ था। इसलिये हे मुनि, मैंने जी में ऐसा जानकर आपको रोका था। यानी यह सारा वर्णन कोई स्वतन्त्र उपदेश नहीं था। यह उस एक प्रश्न का उत्तर था जो बरसों पहले पूछा जाना चाहिये था, और आज पूछा गया।
सार: राम मोह की सेना गिनाते हैं और मायारूपिणी नारी को उसमें सबसे दुःखद बताते हैं। फिर छ: ऋतुओं की माला चलती है, जिसमें मोहवन के लिये वसन्त, जप-तप के जलाशयों के लिये ग्रीष्म, काम-क्रोध के मेढकों के लिये वर्षा, कुवासना के कुमुदों के लिये शरद्, धर्म के कमलों के लिये हिम और ममता के जवास के लिये शिशिर आती है। अन्त में वही कारण दुहराया जाता है, इसीलिये मैंने रोका था।
मुनि की आँखें भर आयीं
अब पूरे प्रसंग का सबसे सुन्दर क्षण आता है, और वह एक भी शब्द से नहीं बनता। नारद कुछ नहीं कहते। उनके शरीर पर पुलक उठ आती है और आँखें भर आती हैं। जिस प्रश्न को वे शिकायत की तरह लेकर आये थे, वह उत्तर सुनकर कृतज्ञता में बदल गया है।
सुनि रघुपति के बचन सुहाए । मुनि तन पुलक नयन भरि आए॥
चौपाई ९
कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती॥
और फिर वे मन ही मन जो कहते हैं वही इस पन्ने का असली सार है। कहिये तो, किस प्रभु की ऐसी रीति है जिसका सेवक पर इतना ममत्व और इतना प्रेम हो। यह वाक्य पूछने के रूप में है पर पूछता कुछ नहीं। यह केवल एक आदमी का अपने भीतर हैरान रह जाना है।
उसके तुरन्त बाद वे एक और बात जोड़ते हैं, जो इस कोमलता के बीच अचानक कड़ी लगती है। जो मनुष्य भ्रम को त्यागकर ऐसे प्रभु को नहीं भजते, वे ज्ञान के कंगाल हैं, दुर्बुद्धि हैं और अभागे हैं। यह क्रोध नहीं है। यह उस आदमी की बात है जिसे अभी-अभी कुछ मिला है और जिसे यह समझ नहीं आ रहा कि कोई इसे छोड़ क्यों देगा।
और तब वे तीसरी बार बोलते हैं, और इस बार आदर के साथ बोलते हैं। वे राम को विज्ञान में विशारद कहकर पुकारते हैं, और जो प्रश्न रखते हैं वह अपने लिये नहीं है। पहला प्रश्न उनका अपना घाव था। यह प्रश्न सब के लिये है।
संतन्ह के लच्छन रघुबीरा । कहहु नाथ भव भंजन भीरा॥
चौपाई १०
सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ । जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ॥
हे रघुवीर, हे जन्म-मरण के भय का नाश करनेवाले नाथ, अब संतों के लक्षण कहिये। और उत्तर की पहली ही पंक्ति में राम वह बात कह देते हैं जिससे आगे की सारी सूची का अर्थ बदल जाता है। सुनो मुनि, मैं संतों के गुण कहता हूँ, जिनके कारण मैं उनके वश में रहता हूँ।
इस आधी पंक्ति को दुबारा पढ़िये। जो कुछ अब आनेवाला है वह अच्छे आदमी की सूची नहीं है। वह उन चीज़ों की सूची है जिनसे भगवान् बँध जाते हैं। सूची कहनेवाला स्वयं बँधा हुआ है और अपने बन्धन के कारण गिना रहा है।
सार: उत्तर सुनकर नारद रोमांचित हो जाते हैं और उनकी आँखें भर आती हैं। वे मन में कहते हैं कि किस प्रभु की ऐसी रीति है। फिर आदर के साथ वे राम से संतों के लक्षण पूछते हैं, और राम उत्तर की पहली पंक्ति में ही यह कह देते हैं कि ये वे गुण हैं जिनके कारण वे स्वयं संतों के वश में रहते हैं।
संत का चित्र
जो अब आता है, उसे सूची की तरह पढ़ा जा सकता है और उसी में उसका सारा रस मर जाता है। यह चित्र है। तुलसी इसे एक साँस में नहीं बनाते, एक रंग के ऊपर दूसरा रंग रखते जाते हैं, और जब तक आप गिनना बन्द नहीं करते तब तक चेहरा नहीं उभरता। सबसे अच्छा तरीका यही है कि इसे पढ़ते हुए किसी ऐसे आदमी को याद कर लीजिये जिसे आप जानते हैं, और फिर हर पंक्ति को उसी चेहरे पर रखते जाइये।
पहला रंग जीत का है। छ: विकारों को जीते हुए, यानी काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर, इन छहों को। इसके बाद जो आता है वह जीत का फल है, पापरहित और कामनारहित। फिर ठहराव, निश्चल। फिर वह शब्द जो तुलसी बहुत सोचकर रखते हैं, अकिंचन, जिसके पास कुछ नहीं है। और उसी के बगल में सुखधाम, सुख का घर। जिसके पास कुछ नहीं है वही सुख का घर है, और यह विरोध नहीं है, यही चित्र का केन्द्र है।
षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा॥
चौपाई ११
अमित बोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी॥
आगे रंग गहरे होते जाते हैं। असीम ज्ञानवान्, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान्, योगी। इसमें कवि का आना ध्यान खींचता है, क्योंकि यह किसी चारित्रिक गुण की सूची में सामान्यतः नहीं आता। फिर सावधान, दूसरों को मान देनेवाले, अभिमान से रहित, धैर्यवान्, और धर्म के ज्ञान तथा आचरण दोनों में अत्यन्त निपुण। यह अन्तिम जोड़ा महत्त्व का है, ज्ञान अलग और गति अलग, और संत दोनों में प्रवीण है।
और इस पूरे पहले हिस्से पर मुहर दोहे में लगती है, जहाँ तीन शब्द रखकर तुलसी सब समेट लेते हैं और फिर एक ऐसी बात कहते हैं जो सूची से बाहर की है।
गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।
दोहा ४५
तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह॥ ४५॥
गुणों के घर, संसार के दुःखों से रहित, और सन्देह से पूरी तरह छूटे हुए। और फिर वह पंक्ति: मेरे चरणकमलों को छोड़कर उन्हें न देह प्रिय है, न घर। यहाँ चित्र गुण से हटकर प्रीति पर आ जाता है, और यही इसे सूची होने से बचाता है। जो कुछ ऊपर गिनाया गया वह किसी अभ्यास से नहीं आया। वह इसी एक प्रीति के पीछे-पीछे चला आया है।
अब दूसरा हिस्सा शुरू होता है, और उसका पहला रंग सबसे बारीक है। यह किसी बड़े त्याग की बात नहीं करता। यह इस बात की करता है कि आदमी अपनी तारीफ़ सुनते समय क्या करता है।
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं । पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं॥
चौपाई १२
सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहि सन प्रीती॥
अपने गुण कानों से सुनते हुए सकुचाते हैं, और दूसरों के गुण सुनकर विशेष हर्षित होते हैं। इसे किसी परीक्षा की तरह अपने ऊपर रखकर देखिये, यह सबसे छोटा और सबसे कठिन लक्षण है। आगे: सम और शीतल हैं, न्याय का कभी त्याग नहीं करते, सरल स्वभाव के हैं, और सभी से प्रेम रखते हैं। सम और शीतल, ये दो शब्द साथ आये हैं। एक भीतर की तुला है और दूसरा छूने पर मिलनेवाला अनुभव।
फिर साधना के रंग आते हैं, और वे भी माला की तरह ही आते हैं। जप, तप, व्रत, दम, संयम और नियम में लगे रहते हैं। गुरु, गोविन्द और ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम रखते हैं। और फिर वह पाँच का समूह जो तुलसी बहुत सलीके से रखते हैं: श्रद्धा, क्षमा, मैत्री, दया और मुदिता, और इन सबके ऊपर प्रभु के चरणों में निष्कपट प्रेम। मुदिता का अर्थ खोलकर टीका प्रसन्नता कहती है, और वह किसी के सुख पर होनेवाली प्रसन्नता है।
उसके बाद समझ के रंग हैं। वैराग्य, विवेक, विनय, विज्ञान, और वेद तथा पुराण का यथार्थ ज्ञान। यथार्थ, यानी जैसा है वैसा, न बढ़ाकर, न घटाकर। और फिर दो निषेध, जो इस पूरे चित्र में अकेले निषेध हैं। दम्भ, अभिमान और मद वे कभी नहीं करते, और भूलकर भी कुमार्ग पर पैर नहीं रखते। भूलकर भी, यह जोड़ ही इस पंक्ति का वज़न है।
गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला॥
चौपाई १३
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते । कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते॥
सदा मेरी लीलाएँ गाते और सुनते हैं, और बिना किसी कारण के दूसरों के हित में लगे रहते हैं। हेतु रहित, यही वह कील है जिस पर पूरा चित्र टँगा हुआ है। भलाई किसी बदले के लिये नहीं, किसी कृतज्ञता के लिये नहीं, किसी फल के लिये नहीं। और फिर राम स्वयं यह कहकर चित्र बन्द कर देते हैं कि संतों के जितने गुण हैं उन्हें सरस्वती और वेद भी नहीं कह सकते।
इस वाक्य के साथ वह पूरी सूची अपने आप सूची नहीं रह जाती। जिसे कहनेवाला ही अधूरा कह रहा है, उसे गिनकर पूरा करने की कोशिश बेकार है। जो गिनाया गया वह उतना ही है जितना गिनाया जा सकता था, और चित्र इसीलिये बना क्योंकि उसे पूरा नहीं किया गया।
सार: राम संतों के गुण गिनाते हैं, छ: विकारों की जीत से लेकर अकिंचनता, मिताहार, मानदता और धर्म में प्रवीणता तक, और दोहे में कहते हैं कि उनके चरणों को छोड़कर संतों को न देह प्रिय है न घर। फिर अपनी प्रशंसा पर सकुचाना, दूसरों की सुनकर हर्षित होना, जप-तप-नियम, श्रद्धा, क्षमा, मैत्री, दया, मुदिता, वैराग्य, विवेक, वेद-पुराण का यथार्थ ज्ञान, दम्भ और मद का पूर्ण अभाव, और बिना कारण परहित में लगे रहना। अन्त में वे कहते हैं कि ये गुण सरस्वती और वेद भी पूरे नहीं कह सकते।
छन्द, और ब्रह्मलोक की ओर
इसके बाद एक छन्द आता है, और वही इस काण्ड का अन्तिम दृश्य है। उसमें जो घटता है वह इतना है। शेष और शारदा भी नहीं कह सकते, इतना सुनते ही नारद ने राम के चरणकमल पकड़ लिये। पूरी बातचीत में उन्होंने बहुत कुछ कहा था, बहुत कुछ माँगा था, एक पुराना घाव भी खोल दिया था। अन्त में जो किया वह कहना नहीं था। वह पकड़ना था।
उन्होंने प्रश्न पूछा था, उत्तर मिला था, और उत्तर के अन्त में जब कहनेवाले ने स्वयं हार मान ली तब सुननेवाले के पास कहने को कुछ नहीं बचा। तुलसी लिखते हैं कि दीनबन्धु कृपालु प्रभु ने इस प्रकार अपने श्रीमुख से अपने भक्तों के गुण कहे। अपने मुख से, अपने भक्तों के गुण। यह वाक्य इस पूरे प्रसंग की सबसे मीठी टिप्पणी है।
और फिर विदाई। नारद भगवान् के चरणों में बार-बार सिर नवाकर ब्रह्मलोक चले जाते हैं। वे जैसे आये थे वैसे ही जाते हैं, वीणा लिये, बिना किसी हलचल के। जिस चोट को लेकर आये थे वह अब चोट नहीं रही, और जो वर माँगा था वह अपने लिये था ही नहीं। इसी छन्द के अन्त में तुलसीदास अपनी ओर से एक पंक्ति जोड़ते हैं, कि वे लोग धन्य हैं जो सब आशा छोड़कर केवल हरि के रंग में रँग गये हैं।
अन्त में दो अर्ध-दोहे आते हैं और काण्ड बन्द हो जाता है। पहला फल कहता है: जो लोग रावण के शत्रु का पवित्र यश गायेंगे और सुनेंगे, वे वैराग्य, जप और योग के बिना ही राम की दृढ़ भक्ति पा लेंगे। इस वाक्य का हिसाब देखिये। तीन बड़ी चीज़ें, जिन्हें साधने में पूरा जीवन बीत जाता है, यहाँ शर्त की सूची से हटा दी गयी हैं, और उनकी जगह दो ही काम बचे हैं, गाना और सुनना। और दूसरा अर्ध-दोहा वह है जिसमें कहनेवाला अपने ही मन को सम्बोधित करता है: युवती का शरीर दीपक की लौ के समान है, हे मन, उसका पतंगा मत बन, काम और मद छोड़कर राम का भजन कर और सदा सत्संग कर। जो उपदेश पूरे पन्ने पर एक मुनि को दिया जा रहा था, वह अन्तिम पंक्ति में मुड़कर अपने ही मन पर आ गिरता है।
और फिर वह पंक्ति जो हर सोपान के अन्त में आती है। मासपारायण का बाईसवाँ विश्राम यहीं पड़ता है, और छपी हुई अन्तिम पंक्ति यह कहती है कि कलियुग के सारे पापों का नाश करनेवाले श्रीरामचरितमानस का तीसरा सोपान यहाँ समाप्त हुआ। समाप्त, विश्राम नहीं। पर विश्राम भी उसी पंक्ति के ऊपर लिखा हुआ है, और दोनों एक साथ पढ़े जाते हैं।
सार: संतों के गुण सुनकर नारद राम के चरण पकड़ लेते हैं, और बार-बार सिर नवाकर ब्रह्मलोक लौट जाते हैं। काण्ड का अन्त दो अर्ध-दोहों पर होता है, जिनमें पहला राम के यश को सुनने और गाने का फल कहता है और दूसरा अपने ही मन को काम और मद छोड़कर सत्संग करने को कहता है। यहीं मासपारायण का बाईसवाँ विश्राम है और यहीं तीसरा सोपान पूरा होता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस काण्ड को पीछे मुड़कर देखिये तो एक बात चौंकाती है। जिस काण्ड में सबसे बड़ा नुक़सान हुआ, वही काण्ड सबसे शान्त पन्ने पर बन्द होता है। कोई प्रतिज्ञा नहीं दुहरायी जाती, कोई धमकी नहीं दी जाती, किसी सेना का नाम नहीं लिया जाता। एक तालाब है, एक छाया है, एक आया हुआ मेहमान है, और घण्टों की बातचीत है। तुलसी को मालूम है कि पाठक कहाँ से आ रहा है और उसे किस चीज़ की ज़रूरत है, और वे उसे वही देते हैं।
और जो सबसे देर तक साथ रहता है वह न वर है, न सूची। वह वही आँगन है। एक बच्चा है जो आग की तरफ़ हाथ बढ़ा रहा है, और एक माँ है जो उसे बिना कुछ कहे हटा देती है। जिसने हाथ बढ़ाया था उसे उस समय यह रोक ही लगी थी, और बरसों बाद जब उसने पूछा कि मुझे क्यों रोका गया, तो उत्तर हर्ष के साथ आया, दण्ड के स्वर में नहीं। इस पूरे पन्ने का यही एक वाक्य है जिसे घर ले जाया जा सकता है।
यहाँ से आगे का रास्ता खुला है। अरण्यकाण्ड के बाद किष्किन्धाकाण्ड आता है, जो इस संग्रह में पाँच प्रसंगों में रखा गया है, और उसके बाद सुन्दरकाण्ड, जो नौ प्रसंगों में। जो खोज इस वन में अधूरी रह गयी, वह उधर आगे बढ़ती है। दरवाज़ा बस खुला छोड़ा जा रहा है, और उसके उस पार जाने की कोई जल्दी नहीं है।
तीसरा सोपान यहीं पूरा हुआ। जिस पन्ने पर वह पूरा हुआ, उस पर कोई विजय नहीं है, कोई वरदान की गड़गड़ाहट नहीं है, और कोई भविष्यवाणी भी नहीं है। बस इतना है कि एक आया, बैठा, पूछा, रोया, और लौट गया, और लौटते समय उसके पास वह उत्तर था जिसकी उसे बरसों से ज़रूरत थी।
और शायद इसीलिये तुलसी ने काण्ड का अन्त संतों के चित्र पर किया है। जिस वन में इतना कुछ छिन गया, उसी वन के आख़िरी पन्ने पर वे यह बताकर उठते हैं कि किन लोगों के वश में भगवान् रहते हैं। उन गुणों में एक भी ऐसा नहीं है जो किसी को जन्म से मिलता हो, और एक भी ऐसा नहीं है जिसे गिनकर पूरा किया जा सके। यही इस पन्ने की आख़िरी उदारता है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा ४१ से ४६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।