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शूर्पणखा और खर-दूषण की सेना

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रामचरितमानसअरण्यकाण्डप्रसंग 4

पंचवटी में एक स्त्री आती है और दो भाइयों के बीच घूमकर रह जाती है। उसके नाक-कान कटते हैं, मानो उसके हाथ रावण को चुनौती भेजी गयी हो, और खर-दूषण की सेना चढ़ आती है।

लक्ष्मण ने प्रश्न किये थे, और राम ने भक्ति का मार्ग खोलकर रख दिया था। उसे सुनकर लक्ष्मण ने राम के चरणों में सिर नवाया। फिर कुछ दिन वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति की बातों में बीते। और फिर एक स्त्री आती है।

शूर्पणखा आती है, बोलती है, एक भाई से दूसरे भाई तक जाती है, फिर भयंकर रूप दिखाती है, और उसके नाक-कान कट जाते हैं।

वह विलाप करती हुई खर और दूषण के पास जाती है, और राक्षसों की सेना उसे आगे करके चढ़ आती है। आकाश धूल से भर जाता है। राम की आज्ञा पाकर लक्ष्मण सीता को लेकर पर्वत की कन्दरा में चले जाते हैं, और सेना को आते देखकर राम हँसकर धनुष चढ़ाते हैं।

शूर्पणखा, उसके भाई और पंचवटी

  • राम जो पंचवटी में रह रहे हैं। वे शूर्पणखा को लक्ष्मण के पास भेजते हैं, सीता को भयभीत देखकर लक्ष्मण को इशारा करते हैं, और राक्षसों की सेना के सामने हँसकर धनुष चढ़ाते हैं और पहला टंकार करते हैं।
  • लक्ष्मण छोटे भाई, जो राम के इशारे पर शूर्पणखा के नाक-कान काटते हैं। वे आज्ञा पाकर सीता को लेकर पर्वत की कन्दरा में चले जाते हैं।
  • सीता जिन्हें भयभीत देखकर राम लक्ष्मण को इशारा करते हैं, और जिन्हें फिर कन्दरा में ले जाया जाता है।
  • शूर्पणखा रावण की बहिन, जो पंचवटी में आती है, दोनों भाइयों के बीच घूमती है। नाक-कान कटने पर वह विलाप करती हुई अपने भाइयों के पास जाती है।
  • खर और दूषण शूर्पणखा के भाई, जिनके पास वह विलाप करती हुई जाती है और जो सुनते ही सेना बनाकर चढ़ आते हैं।
  • रावण शूर्पणखा का भाई, जिसे शूर्पणखा के हाथ मानो चुनौती भेजी जाती है।
  • काकभुशुण्डि जिन्हें पोद्दार की टीका इस प्रसंग के एक वचन का कहनेवाला बताती है, जो गरुड़ से कहा गया है।
  • गरुड़ जिन्हें बीच में एक बार सम्बोधित किया जाता है।

कुछ दिन बीते, और फिर वह आयी

भक्ति का उपदेश सुनकर लक्ष्मण को अत्यन्त सुख मिला, और उन्होंने राम के चरणों में सिर नवाया। इसी तरह वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति की बातों में कुछ दिन बीते।

शूर्पणखा रावण की बहिन है, हृदय की दुष्ट, और नागिन के समान भयानक। वह एक बार पंचवटी आती है। वह दोनों राजकुमारों को देखती है, और देखते ही विकल हो जाती है। टीका इस विकलता को काम से पीड़ित होना बताती है।

भाई, पिता, पुत्र

इसी बीच गरुड़ को सम्बोधित करके एक बात कही जाती है। स्त्री मनोहर पुरुष को देखकर विकल हो जाती है, चाहे वह भाई हो, पिता हो या पुत्र। वह अपने मन को रोक नहीं पाती, जैसे सूर्यकान्तमणि सूर्य को देखकर द्रवित हो जाती है। पोद्दार की टीका यह वचन काकभुशुण्डि का बताती है, और इसे शूर्पणखा जैसी राक्षसी पर रखती है, जो धर्मज्ञान से शून्य और काम से अंधी है।

सुन्दर रूप, और पहला वचन

वह सुन्दर रूप धरकर राम के पास जाती है, और बहुत मुसकराकर बोलती है।

शूर्पणखा कहती है: “आपके समान पुरुष नहीं, मेरे समान स्त्री नहीं, और यह जोड़ा विधाता ने सोच-विचारकर बनाया है।”

वह आगे कहती है, “मेरे योग्य पुरुष सारे जगत् में नहीं है, मैंने तीनों लोक खोज देखे। इसी से मैं अब तक कुमारी रही, और अब आपको देखकर मन कुछ माना है।”

एक भाई से दूसरे भाई तक

उत्तर देने से पहले राम सीता की ओर देखते हैं। राम कहते हैं, “मेरा छोटा भाई कुमार है।” वह लक्ष्मण के पास चली जाती है। लक्ष्मण उसे शत्रु की बहिन जानकर, और राम की ओर देखकर, मृदु वाणी से बोलते हैं।

वे कहते हैं, “हे सुन्दरी, सुनिये, मैं उनका दास हूँ। मैं पराधीन हूँ, मेरे साथ आपको सुभीता न होगा। प्रभु समर्थ हैं, कोसलपुर के राजा हैं, वे जो कुछ करें उन्हें सब फबता है।”

आकाश दुहकर दूध

लक्ष्मण आगे कहते हैं कि सेवक सुख चाहे, भिखारी सम्मान चाहे, व्यसनी धन चाहे, व्यभिचारी शुभ गति चाहे, लोभी यश चाहे, अभिमानी चारों फल चाहे। टीका उन्हें अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष बताती है। ये सब प्राणी आकाश को दुहकर दूध लेना चाहते हैं।

वह फिर राम के पास लौटती है, और राम उसे फिर लक्ष्मण के पास भेज देते हैं। लक्ष्मण कहते हैं, आपको वही बरेगा जो तिनका तोड़कर लज्जा छोड़ दे। टीका बताती है कि तिनका तोड़ना प्रतिज्ञा कर लेना है, और प्रतिज्ञा करके लज्जा छोड़ना निपट निर्लज्ज हो जाना।

नाक और कान

तब वह खिसियाकर, जिसे टीका क्रुद्ध होना बताती है, तीसरी बार राम के पास जाती है, और भयंकर रूप प्रकट करती है। सीता को भयभीत देखकर राम ने लक्ष्मण से इशारे से कह दिया। बड़ी फुर्ती से लक्ष्मण ने उसे बिना नाक-कान का कर दिया। मानो उसके हाथ रावण को चुनौती भेज दी गयी हो।

खर और दूषण के पास

बिना नाक-कान के वह विकराल हो जाती है। मानो पर्वत से गेरू की धारा बह रही हो। टीका इसमें बहता रक्त और काला पर्वत देखती है। उसी हाल में वह विलाप करती हुई खर और दूषण के पास पहुँचती है।

वहाँ वह कहती है: हे भाई, आपके पौरुष को धिक्कार है, आपके बल को धिक्कार है।

उन्होंने पूछा, तब उसने सब समझाकर कहा। सुनते ही राक्षस सेना तैयार कर लेते हैं। राक्षसों के झुंड के झुंड दौड़े, मानो पंखवाले काजल के पर्वतों का समूह हो।

आगे आगे वह, पीछे सारी सेना

सेना में अनेक प्रकार की सवारियाँ हैं, अनेक आकार, अनेक प्रकार के भयानक हथियार, और सब अपार। फिर उन्होंने शूर्पणखा को, नाक-कान कटी और अमङ्गल रूप वाली, सेना के आगे कर लिया। साथ-साथ अनगिनत भयानक अशकुन हो रहे हैं। वे उन्हें गिनते ही नहीं, सब मृत्यु के वश हैं। वे गरजते हैं, ललकारते हैं, आकाश में उड़ते हैं, और अपनी सेना देखकर योद्धा बहुत हर्षित होते हैं।

कोई कहता है कि दोनों भाइयों को जीता ही पकड़ लिया जाये, पकड़कर मार डाला जाये, और स्त्री को छीन लिया जाये। फिर आकाश धूल से भर जाता है, और राम लक्ष्मण को बुलाते हैं।

राम कहते हैं, “सीता को लेकर पर्वत की कन्दरा में जाइये। राक्षसों की भयानक सेना आ गयी है। सजग रहिये।” राम के वचन सुनकर लक्ष्मण हाथ में धनुष-बाण लिये सीता के साथ चल देते हैं।

धनुष चढ़ा

शत्रु की सेना को पास आते देखकर राम ने हँसकर कठिन धनुष चढ़ाया। धनुष चढ़ाकर वे सिर पर जटाओं का जूड़ा बाँध रहे हैं। वे ऐसे शोभित हैं जैसे पन्ने के पर्वत पर करोड़ों बिजलियों से दो साँप लड़ रहे हों।

कमर में तरकस कसकर, विशाल भुजाओं में धनुष लेकर और बाण सुधारकर राम ऐसे देख रहे हैं मानो हाथियों के बड़े झुंड को देखकर सिंह ताक रहा हो। टीका इन हाथियों को मतवाला बताती है।

राक्षस योद्धा बाग छोड़कर, “पकड़ो, पकड़ो” पुकारते हुए दौड़े आये, जैसे उगते सूर्य को अकेला देखकर दैत्य उसे घेर लेते हैं। टीका इन दैत्यों को मन्देह कहती है।

जो सेना सामने आकर रुक गयी

राम को देखकर राक्षसों की सेना थकित रह जाती है। वे उन पर बाण छोड़ ही नहीं पाते।

खर और दूषण मन्त्री को बुलाते हैं। वे कहते हैं कि यह कोई राजकुमार है, मनुष्यों का भूषण। वे आगे कहते हैं, “नाग, असुर, देवता, मनुष्य, मुनि, जितने हैं, हमने कितने ही देखे, जीते और मार डाले। हे सब भाइयो, सुनिये, जन्म भर में हमने ऐसी सुन्दरता नहीं देखी।”

वे कहते हैं, “यद्यपि इन्होंने हमारी बहिन को कुरूप कर दिया, फिर भी ये अनुपम पुरुष वध के योग्य नहीं हैं।” और राम को कहलाते हैं कि वे अपनी छिपायी हुई स्त्री तुरन्त दे दें और दोनों भाई जीते जी घर लौट जायें।

खर और दूषण मन्त्री से कहते हैं कि उनका यह कथन उसे सुनाकर उसका उत्तर सुनते ही शीघ्र लौट आयें। दूत जाकर राम को सन्देश सुनाते हैं, और राम सुनते ही मुसकरा देते हैं।

हम क्षत्रिय हैं

राम कहते हैं, “हम क्षत्रिय हैं, वन में शिकार करते हैं, और आप जैसे दुष्ट पशुओं को तो ढूँढ़ते ही फिरते हैं। बलवान् शत्रु को देखकर हम डरते नहीं, एक बार तो काल से भी लड़ लेते हैं।”

फिर वे कहते हैं: “यद्यपि हम मनुष्य हैं, पर दैत्यकुल का नाश करनेवाले और मुनियों की रक्षा करनेवाले हैं। बालक हैं, पर दुष्टों को दण्ड देनेवाले।”

वे कहते हैं, “यदि बल न हो तो घर लौट जाइये। संग्राम में पीठ दिखानेवाले को मैं नहीं मारता। रण में चढ़ आकर कपट-चतुराई करना और शत्रु पर कृपा करना परम कायरता है।”

दूतों ने लौटकर तुरन्त सब कह सुनाया, और सुनते ही खर-दूषण का हृदय अत्यन्त जल उठा।

पहला टंकार

हृदय जल उठा, और आज्ञा निकली कि उन्हें पकड़ लिया जाये। भयानक राक्षस योद्धा बाण, धनुष, तोमर, शक्ति, शूल, कृपाण, परिघ और फरसा लिये दौड़ पड़े।

राम ने पहले धनुष का कठोर, घोर और भयावह टंकार किया। उससे राक्षस बहरे और व्याकुल हो गये, और उस समय उन्हें कुछ होश न रहा।

फिर वे शत्रु को बलवान् जानकर सावधान होकर दौड़ते हैं। इसके बाद वे राम पर बहुत प्रकार के अस्त्र-शस्त्र बरसाने लगते हैं। राम ने उन हथियारों को तिल के समान काट डाला, और फिर धनुष को कान तक तानकर अपने तीर छोड़े।

शूर्पणखा, सेना और पहला टंकार

पंचवटी में कुछ दिन वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति की बातों में बीतते हैं, फिर एक स्त्री आती है। शूर्पणखा एक भाई से दूसरे भाई तक जाती है, फिर भयंकर रूप दिखाती है। सीता को भयभीत देखकर राम इशारा करते हैं, और लक्ष्मण उसके नाक-कान काट देते हैं, मानो उसके हाथ रावण को चुनौती भेजी गयी हो। वह खर और दूषण के पास जाती है, और उनकी सेना उसे आगे करके चढ़ आती है। राम सीता को लक्ष्मण के साथ कन्दरा में भेजते हैं, हँसकर धनुष चढ़ाते हैं, दूतों के सन्देश का उत्तर देते हैं, और धनुष का टंकार करते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा 17 से 19 (ख), और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।