Lulla Family

शूर्पणखा और खर-दूषण की सेना

रामचरितमानस · अरण्यकाण्ड · शूर्पणखा और खर-दूषण की सेना

शूर्पणखा और खर-दूषण की सेना

पंचवटी में एक स्त्री आती है और दो भाइयों के बीच घूमकर रह जाती है। आगे जो होता है वह तीन दोहों में निपट जाता है, और उसी से वह बैर खुलता है जो लङ्का तक जाता है।

यह प्रसंग वहीं से उठता है जहाँ पिछला छूटा था। लक्ष्मण ने प्रश्न किये थे, प्रभु ने भक्ति का मार्ग खोलकर रख दिया था, और वह सुनकर लक्ष्मण ने चरणों में सिर नवा दिया था। उसके बाद पंचवटी में कुछ दिन बीते, और जो बातें होती रहीं वे चार थीं, वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति। तुलसी उन दिनों का कोई ब्योरा नहीं देते, कोई गिनती नहीं देते। वे बस इतना कहकर आगे बढ़ जाते हैं कि इसी प्रकार कुछ दिन बीत गये। और फिर, बिना किसी भूमिका के, बिना किसी शकुन के, एक स्त्री कथा में आ जाती है।

इस पन्ने पर तीन दोहों की कथा है, और तुलसी यहाँ कहीं नहीं ठहरते। शूर्पणखा आती है, बोलती है, दो बार लौटायी जाती है, तीसरी बार अपना असली रूप दिखाती है, और उसी घड़ी उसका नाक-कान कट जाता है। यह सब एक ही दोहे तक आते-आते हो चुका होता है। न कोई लम्बा संवाद, न कोई कारण गिनाया जाता है, न कोई निर्णय सुनाया जाता है कि यह ठीक हुआ या नहीं। जो हुआ, वह लिख दिया गया। पढ़नेवाला जितनी देर रुककर सोचना चाहे सोचता रहे, कवि नहीं रुकता।

और फिर कथा दूसरी ओर से चौड़ी हो जाती है। एक कटी हुई नाक खर और दूषण तक पहुँचती है, और वहाँ से जो सेना निकलती है वह आकाश को धूल से भर देती है। उस सारी सेना के सामने तुलसी अकेले राम को खड़ा करते हैं। लक्ष्मण आज्ञा पाकर जानकी को लेकर कन्दरा में चले जाते हैं। भीड़ जितनी बड़ी होती जाती है, उसके सामने खड़ी आकृति उतनी ही अकेली दिखायी जाती है, और यही इस पन्ने की बनावट है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • राम कोसलराज दशरथ के पुत्र, जो पंचवटी में रह रहे हैं और इस प्रसंग के अन्त में अकेले ही राक्षसों की पूरी सेना के सामने खड़े होते हैं।
  • लक्ष्मण छोटे भाई, जिनके हाथ से वह काम होता है जिससे यह सारा बैर खुलता है, और जो आज्ञा पाकर जानकी को लेकर पर्वत की कन्दरा में चले जाते हैं।
  • सीता जनकनन्दिनी, जिनका भयभीत हो जाना उस दोहे का तात्कालिक कारण बनता है, और जिन्हें फिर कन्दरा में ले जाया जाता है।
  • शूर्पणखा रावण की बहिन, जो पंचवटी में आती है, दोनों भाइयों के बीच घूमती है, और कटी हुई नाक लेकर अपने भाइयों के पास लौटती है।
  • खर और दूषण शूर्पणखा के भाई, जिनके पास वह विलाप करती हुई जाती है और जो सुनते ही सेना बनाकर चढ़ आते हैं।
  • रावण लङ्का का स्वामी, जिसका नाम इस प्रसंग में केवल एक बार आता है, पर उसी एक बार में उसे चुनौती भेज दी जाती है।
  • काकभुशुण्डि वे सुनानेवाले, जिनका स्वर इस प्रसंग में एक बार बीच में खुलकर सामने आ जाता है।
  • गरुड़ उरगारी, साँपों के शत्रु, जिन्हें सम्बोधित करके यह सारी कथा कही जा रही है।

कुछ दिन बीते, और फिर वह आयी

भक्ति का वह उपदेश सुनकर लक्ष्मण को जो सुख मिला, तुलसी उसे नापते नहीं। वे कहते हैं कि अत्यन्त सुख मिला, और लक्ष्मण ने प्रभु के चरणों में सिर नवा दिया। इसी तरह कुछ दिन बीत गये, और पंचवटी में उन दिनों का रंग वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति का था। इसके तुरन्त बाद जो चौपाई आती है वह उस रंग को एक ही झटके में बदल देती है, और बदलने के लिये उसे किसी भूमिका की ज़रूरत नहीं पड़ती।

सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी॥
पंचबटी सो गइ एक बारा । देखि बिकल भइ जुगल कुमारा॥

चौपाई १

परिचय में एक भी शब्द व्यर्थ नहीं है। पहले नाम, फिर सम्बन्ध, फिर स्वभाव। वह रावण की बहिन है, यह बात पहली ही पंक्ति में रख दी जाती है, ताकि पढ़नेवाला जान ले कि जो अभी होने जा रहा है उसका तार कहाँ तक जुड़ा हुआ है। फिर हृदय का हाल, दुष्ट। फिर उपमा, नागिन के समान दारुण। तुलसी उसका मुँह नहीं दिखाते, उसके वस्त्र नहीं दिखाते, उसकी आयु नहीं बताते। वे भीतर की बात बताकर आगे बढ़ जाते हैं।

और फिर वह पंचवटी आती है। एक बार, यह शब्द रखा गया है, यानी कोई नियमित आना-जाना नहीं, कोई पुरानी जान-पहचान नहीं। वह वहाँ पहुँचती है और दोनों राजकुमारों को देखती है। देखते ही जो होता है उसके लिये तुलसी एक ही शब्द रखते हैं, बिकल। टीका उस विकलता को खोलकर बताती है कि यह काम से पीड़ित होना है। और ध्यान रहे, एक को देखकर नहीं, दोनों को देखकर। आगे की सारी घटना इसी एक शब्द से निकलती है।

सार: भक्तियोग सुनकर लक्ष्मण ने सिर नवाया और पंचवटी में कुछ दिन वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति की बातों में बीते। फिर रावण की बहिन शूर्पणखा एक बार वहाँ आती है और दोनों राजकुमारों को देखकर विकल हो जाती है।

भ्राता, पिता, पुत्र

यहाँ कथा एक पल के लिये रुकती है, और रुककर सुनानेवाला अपनी ओर से एक बात कह देता है। यह वाक्य पंचवटी में नहीं कहा जा रहा। यह वहाँ कहा जा रहा है जहाँ काकभुशुण्डि गरुड़ को यह सारी कथा सुना रहे हैं। सम्बोधन ही बता देता है कि स्वर बदल गया है, उरगारी, साँपों के शत्रु, यानी गरुड़।

भ्राता पिता पुत्र उरगारी । पुरुष मनोहर निरखत नारी॥
होइ बिकल सक मनहि न रोकी । जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी॥

चौपाई २

कही हुई बात कड़ी है और उसे नरम करके नहीं कहा गया। ऐसी स्त्री, जिसे टीका धर्मज्ञान से शून्य और काम से अंधी बताती है, मनोहर पुरुष को देखकर विकल हो जाती है, चाहे वह पुरुष भाई हो, पिता हो या पुत्र हो, और वह अपने मन को रोक नहीं पाती। यह वाक्य किसी एक स्त्री का लेखा-जोखा नहीं है। यह उस दशा का वर्णन है जिसमें सम्बन्ध का नाम याद नहीं रहता।

और फिर उपमा आती है, और उपमा ही इस चौपाई को याद रह जाने लायक बनाती है। सूर्यकान्तमणि सूर्य को देखकर द्रवित हो जाती है। वह पत्थर है, ठोस है, ठंडी पड़ी है, पर जिस चीज़ से उसका सारा स्वभाव बना है वही सामने आ जाये तो वह पिघल जाती है। इसमें दोष मणि का नहीं है और सूर्य का भी नहीं। यह बस वैसा ही होता है। तुलसी यहाँ किसी को कोसते नहीं, वे एक नियम रख देते हैं, और नियम रखकर तुरन्त कथा में लौट आते हैं।

सार: सुनानेवाले यहाँ गरुड़ से कहते हैं कि ऐसी स्त्री मनोहर पुरुष को देखकर विकल हो जाती है, वह भाई हो, पिता हो या पुत्र हो, और मन को रोक नहीं पाती, जैसे सूर्यकान्तमणि सूर्य को देखकर पिघल जाती है।

सुन्दर रूप, और पहला वचन

जो रूप उसका अपना था उससे काम नहीं चलता, इसलिये वह रूप बदल लेती है। सुन्दर रूप धरकर वह प्रभु के पास जाती है। और वहाँ पहुँचकर जो पहला काम करती है वह बोलना नहीं है, मुसकराना है, और बहुत मुसकराना है। तुलसी वह मुसकान पहले दर्ज करते हैं और उसके बाद ही वचन आने देते हैं।

रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई । बोली बचन बहुत मुसुकाई॥
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी । यह सँजोग बिधि रचा बिचारी॥

चौपाई ३

पहली ही पंक्ति में सारा प्रस्ताव आ जाता है। आपके समान पुरुष नहीं, मेरे समान स्त्री नहीं, और यह जोड़ा विधाता ने सोच-विचारकर बनाया है। यह माँग नहीं है, यह घोषणा है। इसमें अनुमति नहीं माँगी जा रही, इसमें एक बनी-बनायी बात सुनायी जा रही है, और उस बात की साक्षी में सीधे विधाता को खड़ा कर दिया गया है।

आगे की पंक्तियों में वह अपनी ओर से प्रमाण देती है। मेरे योग्य पुरुष सारे जगत् में नहीं है, तीनों लोक खोज देखे। इसी कारण मैं अब तक कुमारी रही। और अब आपको देखकर मन कुछ माना है। इस पूरे भाषण में वह एक बार भी यह नहीं पूछती कि सामने खड़े व्यक्ति की अपनी इच्छा क्या है। तीन लोक की खोज का हिसाब है, अविवाहित रह जाने का कारण है, अपने मन के मान जाने की सूचना है, और बस।

और उसे यह मालूम नहीं कि जिस कुटी के सामने वह खड़ी है वहाँ कोई तीसरा भी है। यह बात तुलसी अगली ही चौपाई में खोलते हैं, और वे उसे किसी संवाद से नहीं खोलते। वे उसे एक दृष्टि से खोलते हैं।

सार: वह सुन्दर रूप धरकर प्रभु के पास आती है और बहुत मुसकराकर कहती है कि आपके समान पुरुष और मेरे समान स्त्री कोई नहीं, यह जोड़ा विधाता ने विचारकर रचा है, तीनों लोक खोजने पर भी योग्य वर न मिला, इसी से मैं अब तक कुमारी रही।

एक भाई से दूसरे भाई तक

उत्तर में प्रभु कोई उपदेश नहीं देते और कोई डाँट नहीं देते। वे पहले सीता की ओर देखते हैं। वह देखना ही आधा उत्तर है, और उसके बाद जो वाक्य निकलता है वह छोटा सा है।

सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता॥
गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी॥

चौपाई ४

मेरा छोटा भाई कुमार है। इतना ही। न मना किया गया, न हाँ कही गयी, न कोई कारण गिनाया गया। एक तथ्य रख दिया गया और बात आगे सरका दी गयी। वह उसे संकेत मानकर लक्ष्मण के पास चली जाती है। और लक्ष्मण उसे पहचान लेते हैं, यह तुलसी साफ़ लिखते हैं, शत्रु की बहिन जानकर। जान लेने के बाद भी जो वाणी निकलती है वह मृदु है, और बोलने से पहले वे एक बार प्रभु की ओर देख लेते हैं।

सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा॥
प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा । जो कछु करहिं उनहि सब छाजा॥

चौपाई ५

लक्ष्मण का उत्तर विनय में लिपटा हुआ है और भीतर से पूरी तरह बन्द है। मैं तो उनका दास हूँ, पराधीन हूँ, मेरे साथ सुभीता न होगा। और फिर वे बात को वापस उसी ओर मोड़ देते हैं जहाँ से वह आयी थी। प्रभु समर्थ हैं, कोसलपुर के राजा हैं, वे जो कुछ करें उन्हें सब फबता है। इसमें एक भी कठोर शब्द नहीं है, फिर भी यह पूरा इनकार है।

इस आने-जाने में एक बात छिपी हुई है जिसे तुलसी कहते नहीं। दोनों भाई एक दूसरे की ओर इशारा कर रहे हैं, और दोनों में से किसी ने अब तक सीधे मना नहीं किया। यह शिष्टता है, और शिष्टता की एक सीमा होती है। वह सीमा आगे आती है, और जब आती है तो एक ही पंक्ति में आ जाती है।

सार: प्रभु सीता की ओर देखकर कहते हैं कि मेरा छोटा भाई कुमार है। वह लक्ष्मण के पास जाती है, और लक्ष्मण उसे शत्रु की बहिन जानकर भी मृदु वाणी से कहते हैं कि मैं तो उनका दास हूँ और पराधीन हूँ, प्रभु समर्थ हैं और वे जो करें उन्हें सब फबता है।

आकाश दुहकर दूध

लक्ष्मण अपनी बात एक सूत्र में बाँध देते हैं, और यह सूत्र मानस की सबसे अधिक दोहरायी जानेवाली पंक्तियों में गिना जाता है। वे छह लोग गिनाते हैं जो ठीक वही माँग रहे हैं जो उनकी दशा में मिल ही नहीं सकता।

सेवक सुख चह मान भिखारी । ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी॥
लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी॥

चौपाई ६

सेवक सुख चाहे, भिखारी सम्मान चाहे, व्यसनी धन चाहे, व्यभिचारी शुभ गति चाहे, लोभी यश चाहे, अभिमानी चारों फल चाहे। छह दशाएँ और छह माँगें, और हर जोड़े में माँग ठीक उसी वस्तु की है जिसे उस दशा ने अपने हाथ से छोड़ा है। फिर अन्तिम पंक्ति सब पर एक साथ गिरती है। ये सब प्राणी आकाश को दुहकर दूध लेना चाहते हैं।

उपमा का बल इसी में है कि वह किसी को गाली नहीं देती। आकाश दुहने में कोई पाप नहीं है, बस दूध नहीं निकलता। और ध्यान देने की बात यह है कि लक्ष्मण ने अभी अपने बारे में जो कहा था, कि मैं दास हूँ और पराधीन हूँ, वही इस सूची की पहली पंक्ति है। वे अपने को भी उसी सूची में सबसे ऊपर रखकर उत्तर दे रहे हैं।

पर उत्तर सुना नहीं जाता। वह फिर राम के पास लौटती है, और वहाँ से फिर लक्ष्मण के पास भेज दी जाती है। यह दूसरा चक्कर है, और दूसरे चक्कर में लक्ष्मण की भाषा से वह कोमलता निकल जाती है जो पहली बार थी।

पुनि फिरि राम निकट सो आई । प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई॥
लछिमन कहा तोहि सो बरई । जो तृन तोरि लाज परिहरई॥

चौपाई ७

आपको वही बरेगा जो तिनका तोड़कर लज्जा छोड़ दे। टीका बताती है कि तिनका तोड़ना प्रतिज्ञा कर लेना है, और लज्जा को प्रतिज्ञा करके छोड़ना निपट निर्लज्ज हो जाना है। यह अब विनय नहीं है। यह सीधी बात है, और इसमें जो शर्त रखी गयी है वह शर्त की तरह नहीं, ताने की तरह रखी गयी है।

सार: लक्ष्मण छह ऐसे लोगों की सूची देते हैं जो असम्भव माँगते हैं और कहते हैं कि ये सब आकाश दुहकर दूध चाहते हैं। वह फिर राम के पास जाती है, फिर लक्ष्मण के पास भेजी जाती है, और इस बार लक्ष्मण कहते हैं कि आपको वही बरेगा जो तृण तोड़कर लज्जा त्याग दे।

नाक और कान

दो बार लौटाये जाने के बाद जो बचता है वह क्रोध है। तुलसी उसके लिये एक ठेठ शब्द रखते हैं, खिसिआनि। जो झेंपकर चिढ़ गया हो, जिसकी बात सबके सामने कट गयी हो। इसी दशा में वह तीसरी बार राम के पास जाती है, और इस बार जो लेकर जाती है वह प्रस्ताव नहीं है।

तब खिसिआनि राम पहिं गई । रूप भयंकर प्रगटत भई॥
सीतहि सभय देखि रघुराई । कहा अनुज सन सयन बुझाई॥

चौपाई ८

सुन्दर रूप उतर जाता है और भयंकर रूप सामने आ जाता है। और उसी क्षण तुलसी की दृष्टि एक दूसरी जगह चली जाती है, जहाँ कोई और खड़ा है। सीता भयभीत हो जाती हैं। इस पूरे प्रसंग में यही सबसे भारी पंक्ति है, क्योंकि इसके बाद जो होता है उसका तात्कालिक कारण यही है। रघुनाथजी ने सीता को भयभीत देखा। उन्होंने कोई वचन नहीं कहा। उन्होंने लक्ष्मण को इशारे से समझा दिया।

इशारा क्या था, तुलसी नहीं लिखते। उसके बाद जो हुआ वह लिखते हैं, और वह एक ही दोहे में लिख देते हैं।

लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि।
ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि॥ १७॥

दोहा १७

अति लाघव से, यानी बड़ी फुर्ती से। इस एक शब्द में सारा ढंग आ जाता है। कोई ललकार नहीं, कोई तैयारी नहीं, कोई विलम्ब नहीं। वह काम हो जाता है और तब तक हो चुका होता है जब तक कोई कुछ कह सके।

और तब तुलसी दूसरी पंक्ति में वह बात रखते हैं जो इस पूरे काण्ड को आगे धकेल देती है। मानो उसके हाथ रावण को चुनौती भेज दी हो। नाक-कान कटी हुई वह स्त्री अब एक सन्देश है, और सन्देश का पता लङ्का है। रावण अभी कथा में सामने नहीं आया है, पर उसका नाम यहाँ रख दिया गया, और रखते ही यह झगड़ा दो लोगों का नहीं रह जाता।

तुलसी यहाँ कुछ नहीं जोड़ते। वे यह नहीं कहते कि यह उचित था, और यह भी नहीं कहते कि यह कठोर था। न उसका पक्ष लेते हैं, न लक्ष्मण की सफ़ाई देते हैं। जो किया गया वह लिख दिया गया, और अगली पंक्ति तुरन्त दूसरी दिशा में चल पड़ती है।

सार: दो बार लौटायी जाकर वह खिसियाकर राम के पास जाती है और भयंकर रूप प्रकट करती है। सीता को भयभीत देखकर रघुनाथजी लक्ष्मण को इशारे से समझा देते हैं, और लक्ष्मण बड़ी फुर्ती से उसे बिना नाक-कान का कर देते हैं, मानो उसके हाथ रावण को चुनौती दे दी हो।

खर और दूषण के पास

अब न वह रूप बचा है जो उसने धरा था और न वह जो उसने दिखाया था। जो बचा है वह विकराल है, और उसका वर्णन तुलसी एक चित्र से करते हैं।

नाक कान बिनु भइ बिकरारा । जनु स्रव सैल गेरु कै धारा॥
खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता॥

चौपाई ९

मानो काले पर्वत से गेरू की धारा बह रही हो। रंगों का मेल देखिये। देह काली, बहता हुआ रक्त लाल, और दोनों का जोड़ पर्वत और गेरू में बाँध दिया गया। यह उपमा दया नहीं जगाती और घृणा भी नहीं जगाती, वह बस दिखा देती है। और उसी हाल में वह विलाप करती हुई खर और दूषण तक पहुँचती है।

वहाँ पहुँचकर वह जो पहला वाक्य कहती है उसमें अपनी चोट नहीं है, भाइयों का अपमान है। आपके पौरुष को धिक्कार है, आपके बल को धिक्कार है। यह फ़रियाद नहीं है, यह उकसावा है। वह जानती है कि जिनके सामने वह खड़ी है उन्हें किस बात से चलाया जा सकता है, और वह सीधे उसी जगह हाथ रखती है।

तेहिं पूछा सब कहेसि बुझाई । जातुधान सुनि सेन बनाई॥
धाए निसिचर निकर बरूथा । जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा॥

चौपाई १०

उन्होंने पूछा, तब उसने सब समझाकर कहा। पूरा वृत्तान्त तुलसी दोहराते नहीं, वे बस इतना लिखते हैं कि उसने समझाकर कहा। और सुनते ही सेना तैयार हो जाती है। कोई सभा नहीं बैठती, कोई विचार नहीं होता, कोई दूत पहले नहीं भेजा जाता। सुना, और सेना बन गयी।

फिर वह उपमा आती है जो इस पूरे प्रसंग में सबसे ज़ोर से बजती है। राक्षसों के झुंड के झुंड दौड़े, मानो काजल के पर्वतों का समूह पंख लगाकर उड़ रहा हो। पर्वत जितने बड़े, काजल जितने काले, और पंखवाले, यानी उनका बड़ा होना उन्हें धीमा नहीं करता। जो वस्तु स्वभाव से टस से मस नहीं होती वह उड़ती हुई चली आ रही है।

सार: नाक-कान बिना वह विकराल हो जाती है, मानो काले पर्वत से गेरू की धारा बह रही हो, और विलाप करती हुई खर-दूषण के पास जाकर उनके पौरुष और बल को धिक्कारती है। पूछने पर सब समझाकर कहती है, और सुनते ही राक्षस सेना बनाकर झुंड के झुंड दौड़ पड़ते हैं।

आगे आगे वह, पीछे सारी सेना

आगे की चौपाई में सेना का ब्योरा है, और ब्योरा गिनती से नहीं, विविधता से बनाया गया है। अनेक प्रकार की सवारियाँ, अनेक आकार, अनेक प्रकार के भयानक हथियार, और सब अपार। संख्या कहीं नहीं दी जाती। तुलसी संख्या देने के बदले नाना शब्द को बार-बार रखते हैं, और गिनती अपने आप बड़ी होती चली जाती है।

और फिर एक बात जो सेना की रचना से नहीं, किसी दूसरी ही समझ से निकली है। उन्होंने शूर्पणखा को आगे कर लिया। नाक-कान कटी हुई, अमङ्गल रूप। सेना के सबसे आगे उसे रखना न सुरक्षा है और न सम्मान। वह वहाँ ध्वजा की तरह रखी गयी है, ताकि दिखती रहे कि किस बात का बदला लेने ये लोग निकले हैं।

साथ साथ अशकुन हो रहे हैं, अनगिनत और भयकारी। तुलसी लिखते हैं कि वे उन्हें गिनते ही नहीं, और गिनते क्यों नहीं, इसका कारण भी उसी पंक्ति में रख देते हैं। सब मृत्यु के वश हैं। जिसका समय आ चुका हो उसे चेतावनी दिखती नहीं। वे गरजते हैं, ललकारते हैं, आकाश में उड़ते हैं, और अपनी ही सेना को देखकर योद्धा हर्षित होते जाते हैं।

कोई कहता है दोनों भाइयों को जीता ही पकड़ लो, पकड़कर मार डालो, और स्त्री को छीन लो। यह वाक्य किसी सेनापति का नहीं है, यह किसी का भी हो सकता है, तुलसी नाम नहीं देते। इसके तुरन्त बाद आकाश धूल से भर जाता है, और उसी धुँधलके में राम लक्ष्मण को बुलाते हैं।

लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर । आवा निसिचर कटकु भयंकर॥
रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी॥

चौपाई ११

आज्ञा में तीन बातें हैं और तीनों छोटी हैं। जानकी को लेकर पर्वत की कन्दरा में जाइये, राक्षसों की भयानक सेना आ गयी है, सजग रहिये। इसमें कोई योजना नहीं है, कोई व्यूह नहीं है, सहायता का कोई प्रबन्ध नहीं है। और लक्ष्मण कुछ पूछते नहीं। वे हाथ में धनुष-बाण लेकर सीता के साथ चल देते हैं। जो पीछे रह जाता है, वह अकेला रह जाता है।

सार: नाना सवारियों और नाना हथियारोंवाली अपार सेना शूर्पणखा को आगे करके चलती है, अनगिनत अशकुन होते हैं जिन्हें मृत्यु के वश वे गिनते तक नहीं, और आकाश धूल से भर जाता है। राम लक्ष्मण को आज्ञा देते हैं कि जानकी को लेकर पर्वत की कन्दरा में जायें और सजग रहें।

धनुष चढ़ा

शत्रु की सेना चली आ रही है, यह देखकर राम क्या करते हैं, इसके लिये तुलसी एक ही शब्द रखते हैं। हँसकर। हँसकर उन्होंने कठिन धनुष चढ़ाया। इस दृश्य की सबसे असामान्य बात यही हँसी है, क्योंकि सामने जो खड़ा है उसमें हँसने लायक कुछ भी नहीं है।

और इसके बाद छंद आता है। मानस में छंद प्रायः वहाँ आता है जहाँ चौपाई की चाल किसी दृश्य को सँभाल नहीं पाती। यहाँ वही हुआ है, और चार चित्र एक के बाद एक खुलते चले जाते हैं।

कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों।
मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों॥
कटि कसि निषंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै।
चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै॥

छंद १

पहला चित्र बालों का है। कठिन धनुष चढ़ाकर वे सिर पर जटाओं का जूड़ा बाँध रहे हैं, और वह बाँधना ऐसा लगता है जैसे पन्ने के पर्वत पर करोड़ों बिजलियों के बीच दो साँप लड़ रहे हों। हरा पर्वत देह है, बिजली चमक है, और दो साँप दो उठी हुई भुजाएँ। यह उपमा गति की है, रूप की नहीं। जूड़ा बँधते समय भुजाएँ जो हरकत करती हैं, वही पकड़ी गयी है।

दूसरा चित्र कमर का है, तरकश कसा जा रहा है। तीसरा हाथों का, विशाल भुजाओं में धनुष लिया जा रहा है और बाण सुधारे जा रहे हैं। और चौथा चित्र आँखों का, और वही सबसे बड़ा है। प्रभु सामने देख रहे हैं, मानो मतवाले हाथियों का समूह आता देखकर सिंह उनकी ओर ताक रहा हो। हाथियों का झुंड बड़ा है, यह उपमा उसे छोटा नहीं करती। वह बस इतना बता देती है कि देखनेवाला भाग नहीं रहा।

आइ गए बगमेल धरहु धरहु धावत सुभट।
जथा बिलोकि अकेल बाल रबिहि घेरत दनुज॥ १८॥

सोरठा १८

और यहाँ दोनों ओर की चालें आमने सामने रख दी जाती हैं। वे बाग छोड़कर दौड़े आये, पकड़ो पकड़ो पुकारते हुए, और चारों ओर से घेर लिया। उपमा फिर आकाश से आती है। जैसे उगते हुए सूर्य को अकेला देखकर दैत्य घेर लेते हैं। बाल रबि, यानी अभी अभी उठा हुआ सूर्य। उसे अकेला देखकर घेरा जाता है, और घेरनेवाले हर बार बहुत होते हैं।

सार: शत्रुदल को आते देखकर राम हँसकर कठिन धनुष चढ़ाते हैं, जटाजूट बाँधते हैं, तरकश कसते हैं और उस भीड़ की ओर वैसे देखते हैं जैसे सिंह हाथियों के समूह की ओर। राक्षस योद्धा पकड़ो पकड़ो पुकारते हुए दौड़कर उन्हें घेर लेते हैं, जैसे दैत्य बालसूर्य को घेर लेते हैं।

जो सेना सामने आकर रुक गयी

घेर तो लिया, पर उसके बाद जो होता है वह किसी युद्ध-वर्णन जैसा नहीं है। प्रभु को देखकर राक्षसों की सेना थकित रह जाती है। वे बाण छोड़ ही नहीं पाते। तुलसी कारण बताने में एक शब्द भी खर्च नहीं करते। वे केवल घटना रख देते हैं, देखा, और रुक गये।

यह देखकर खर और दूषण मन्त्री को बुलाते हैं। उनकी पहली बात यह नहीं है कि आक्रमण कैसे किया जाये। उनकी पहली बात यह है कि यह कोई राजकुमार है, मनुष्यों का भूषण है। और फिर वे जो कहते हैं उसमें उनके पूरे जीवन का हिसाब है। नाग, असुर, देवता, मनुष्य, मुनि, जितने भी हैं, कितने ही देखे, कितने ही जीते, कितने ही मार डाले। और फिर, हे सब भाइयो, सुनो, जन्म भर में ऐसी सुन्दरता कहीं नहीं देखी। यह प्रशंसा शत्रु के मुँह से निकल रही है, और इसीलिये इसका वज़न है।

इसके बाद जो सन्देश तय होता है उसमें दो वाक्य एक साथ रखे गये हैं, और वे आपस में मेल नहीं खाते।

जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा॥
देहु तुरत निज नारि दुराई । जीअत भवन जाहु द्वौ भाई॥

चौपाई १२

पहला वाक्य यह है कि यद्यपि इन्होंने हमारी बहिन को कुरूप कर दिया, तो भी ये अनुपम पुरुष वध के योग्य नहीं हैं। दूसरा यह कि छिपायी हुई अपनी स्त्री तुरन्त दे दो और दोनों भाई जीते जी घर लौट जाओ। पहले वाक्य में सौन्दर्य के आगे एक झुकाव है, दूसरे में ठीक वही माँग है जिससे यह सारा झगड़ा शुरू हुआ था। जिसे वध के योग्य नहीं माना जा रहा, उसी से उसकी स्त्री माँगी जा रही है।

और यहाँ एक शब्द ध्यान खींचता है, दुराई, यानी छिपायी हुई। उन्हें मालूम है कि स्त्री सामने नहीं है। लक्ष्मण अभी अभी उन्हें कन्दरा में ले गये हैं। खर और दूषण अपने मन्त्री से कहते हैं कि मेरा यह कथन उसे सुनाओ और उसका उत्तर सुनकर शीघ्र लौट आओ। दूत जाते हैं, सन्देश सुनाते हैं, और राम उसे सुनते ही मुसकरा देते हैं।

सार: प्रभु को देखकर राक्षसों की सेना थकित रह जाती है और बाण नहीं छोड़ पाती। खर-दूषण मन्त्री को बुलाकर कहते हैं कि ऐसी सुन्दरता उन्होंने जन्म भर में नहीं देखी, यह पुरुष वध के योग्य नहीं है, इससे कहो कि अपनी छिपायी हुई स्त्री दे दे और दोनों भाई जीते जी घर लौट जायें।

हम छत्री हैं

उत्तर उसी तौल का आता है जिस तौल में सन्देश गया था। सन्देश में शिकार की भाषा नहीं थी, उत्तर में शिकार की भाषा है, और वह पहली ही पंक्ति में आ जाती है।

हम छत्री मृगया बन करहीं । तुम्ह से खल मृग खोजत फिरहीं॥
रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं । एक बार कालहु सन लरहीं॥

चौपाई १३

हम क्षत्रिय हैं, वन में शिकार करते हैं, और आप जैसे दुष्ट पशुओं को तो ढूँढ़ते ही फिरते हैं। एक ही वाक्य में अपना काम बता दिया गया, अपना ठिकाना बता दिया गया, और सामनेवाले की जगह भी तय कर दी गयी। इसके बाद दूसरी पंक्ति और आगे चली जाती है। बलवान् शत्रु को देखकर हम डरते नहीं, एक बार तो काल से भी लड़ लेते हैं।

फिर वह वाक्य आता है जो इस उत्तर को केवल ललकार नहीं रहने देता। यद्यपि हम मनुष्य हैं, पर दैत्यकुल का नाश करनेवाले और मुनियों की रक्षा करनेवाले हैं। बालक हैं, पर दुष्टों को दण्ड देनेवाले हैं। मनुष्य और बालक, दोनों शब्द उन्होंने स्वयं अपने लिये रखे हैं, और दोनों के साथ साथ वह काम रख दिया है जो वे करते हैं। इसमें अपनी बड़ाई नहीं है, इसमें अपना काम गिनाया गया है।

और उसी साँस में एक छूट भी दे दी जाती है। यदि बल न हो तो घर लौट जाइये, क्योंकि संग्राम में पीठ दिखानेवाले को मैं नहीं मारता। छूट देकर तुरन्त वे दो बातें कायरता बता देते हैं। रण में चढ़ आकर कपट-चतुराई करना, और शत्रु पर दया दिखाना। यानी लौटने का रास्ता खुला है, पर सामने आ जाने के बाद दोनों ओर से कोई नरमी नहीं बचती।

दूतों ने लौटकर तुरन्त सब कह सुनाया, और सुनते ही खर-दूषण का हृदय अत्यन्त जल उठा। यह वह जगह है जहाँ बातचीत समाप्त हो जाती है। सन्देश गया था, उत्तर आ गया, और उत्तर ने जो किया वह सन्धि नहीं थी।

सार: राम उत्तर भेजते हैं कि हम क्षत्रिय हैं, वन में ऐसे ही दुष्ट पशुओं का शिकार करते फिरते हैं, बलवान् शत्रु से डरते नहीं, और यदि बल न हो तो लौट जाओ, क्योंकि रण से मुँह मोड़नेवाले को मैं नहीं मारता। दूतों से यह सुनकर खर-दूषण का हृदय जल उठा।

पहला टंकार

यहाँ फिर छंद आता है, और फिर उसी कारण से। जो होने जा रहा है उसकी चाल चौपाई से तेज़ है, इसलिये चाल बदल दी जाती है।

उर दहेउ कहेउ कि धरहु धाए बिकट भट रजनीचरा।
सर चाप तोमर सक्ति सूल कृपान परिघ परसु धरा॥
प्रभु कीन्हि धनुष टकोर प्रथम कठोर घोर भयावहा।
भए बधिर ब्याकुल जातुधान न ग्यान तेहि अवसर रहा॥

छंद २

हृदय जल उठा, और आज्ञा निकली, पकड़ लो। और फिर हथियारों की सूची आती है, और सूची सुनाने का अपना असर होता है। बाण, धनुष, तोमर, शक्ति, शूल, कृपाण, परिघ और फरसा। आठ नाम, आठ अलग ढंग की मार, और सब एक साथ दौड़ते हुए।

और उस सारी दौड़ के सामने जो पड़ता है वह एक आवाज़ है। प्रभु ने पहले धनुष का टंकार किया, कठोर, घोर और भयावह। पहले, यह शब्द ध्यान से पढ़ने लायक है। बाण बाद में। सबसे पहले केवल डोरी की आवाज़। और उस आवाज़ से राक्षस बहरे हो गये, व्याकुल हो गये, और उस समय उन्हें कुछ होश ही न रहा। सेना अभी तक अछूती है, एक भी बाण नहीं चला, और वह अपनी सुध खो चुकी है।

सावधान होइ धाए जानि सबल आराति।
लागे बरषन राम पर अस्त्र सस्त्र बहुभाँति॥ १९ (क)॥
तिन्ह के आयुध तिल सम करि काटे रघुबीर।
तानि सरासन श्रवन लगि पुनि छाँड़े निज तीर॥ १९ (ख)॥

दोहा १९ (क)

फिर वे सँभलते हैं, और तुलसी उस सँभलने का कारण भी लिख देते हैं, शत्रु को बलवान् जानकर। पहले उन्होंने उसे राजकुमार समझा था, फिर सुन्दर समझा था, फिर वध के अयोग्य समझा था। अब वे उसे बलवान् जानते हैं, और तभी सावधान होकर दौड़ते हैं। यह उनका पहला सच्चा अनुमान है, और वह टंकार सुनने के बाद आया है।

इसके बाद वे राम पर बहुत प्रकार के अस्त्र-शस्त्र बरसाने लगते हैं। यह प्रसंग यहीं आकर ठहरता है, हवा में गिरते हुए हथियारों पर। आगे की पंक्तियाँ बताती हैं कि रघुवीर ने उन हथियारों को तिल के समान काट डाला और फिर धनुष को कान तक तानकर अपने तीर छोड़े। उन छूटे हुए तीरों से जो होता है वह अगले प्रसंग की कथा है।

सार: खर-दूषण की आज्ञा पाकर राक्षस योद्धा तरह-तरह के हथियार लेकर दौड़ते हैं, पर राम के पहले ही धनुष-टंकार से बहरे और व्याकुल हो जाते हैं। फिर शत्रु को बलवान् जानकर सावधान होकर दौड़ते हैं और राम पर बहुत प्रकार के अस्त्र-शस्त्र बरसाने लगते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग को पढ़ते हुए जो बात देर तक साथ रहती है वह इसकी चाल है। तीन दोहों के भीतर एक स्त्री का आना, दो बार लौटाया जाना, एक भयंकर रूप, एक कटी हुई नाक, एक सेना का उठ खड़ा होना और एक धनुष का चढ़ना, सब आ जाता है। तुलसी कहीं ठहरकर यह नहीं बताते कि इसमें किसका दोष अधिक था। वे न शूर्पणखा की सफ़ाई देते हैं, न उसकी निन्दा बढ़ाते हैं, न लक्ष्मण का हाथ रोकते हैं, न उसे सराहते हैं। वे केवल एक बात करते हैं, और वह दोहे की दूसरी पंक्ति में है, कि यह काम एक चुनौती बन गया, और उस चुनौती का पता लङ्का है।

दूसरी बात जो साथ रहती है वह गिनती और अकेलेपन का जोड़ा है। इस पन्ने पर सेना बार-बार बड़ी की जाती है। झुंड के झुंड, नाना सवारियाँ, नाना आकार, अपार हथियार, आकाश भर देनेवाली धूल। और उसी पन्ने पर लक्ष्मण को हटा दिया जाता है, जानकी को कन्दरा में भेज दिया जाता है, और जो बचता है वह एक आदमी है जो सिर पर जटाओं का जूड़ा बाँध रहा है। बड़ी संख्या तुलसी इसीलिये खड़ी करते हैं कि उसके सामने वह एक आकृति साफ़ दिख सके।

और तीसरी बात वह हँसी है। सेना को आते देखकर हँसना, और दूत का सन्देश सुनकर मुसकरा देना। इस पूरे प्रसंग में सबसे शान्त चेहरा उसी का है जिसके चारों ओर घेरा डाला जा रहा है। उस घेरे के भीतर से जो पहली चीज़ बाहर निकलती है वह बाण नहीं है, धनुष की एक आवाज़ है, और उतने भर से पूरी सेना की सुध जाती रहती है। आगे जो होगा वह इसी आवाज़ के बाद की कथा है।

इस प्रसंग के बाद पंचवटी वैसी नहीं रह जाती जैसी पिछले पन्ने पर थी। वहाँ वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति की बातें हो रही थीं, कुटी थी, दिन बीत रहे थे। और इसी एक प्रसंग के भीतर वही जगह रणभूमि बन जाती है, बिना किसी घोषणा के, बिना किसी तैयारी के। यह बदलाव किसी बड़े आयोजन से नहीं आता। वह एक स्त्री के आ जाने से आता है, और उसका आना तुलसी एक ही पंक्ति में निपटा देते हैं।

और अन्त में एक बात रह जाती है जो कही नहीं गयी। इस पूरे पन्ने पर किसी ने यह नहीं पूछा कि इसका अन्त क्या होगा। शूर्पणखा ने नहीं पूछा जब वह तीसरी बार लौटी, खर और दूषण ने नहीं पूछा जब उन्होंने सुनते ही सेना बना ली, और उन योद्धाओं ने नहीं पूछा जो अशकुनों को गिने बिना गरजते हुए उड़ चले। तुलसी ने एक बार बता दिया था कि वे क्यों नहीं गिनते। मृत्यु के वश। इस पन्ने की सबसे ठंडी पंक्ति वही है, और वह सबसे भीड़भरे दृश्य के ठीक बीच में रखी गयी है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा १७ से १९, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

English