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अगस्त्य, पंचवटी और लक्ष्मण-गीता

रामचरितमानस · अरण्यकाण्ड · अगस्त्य, पंचवटी और लक्ष्मण-गीता

अगस्त्य, पंचवटी और लक्ष्मण-गीता

एक ऋषि के आश्रम में पूछा गया प्रश्न जिसका उत्तर नहीं मिलता, गोदावरी के किनारे छायी हुई एक पर्णकुटी, और उसी कुटी में बैठे-बैठे छोटे भाई का वह प्रश्न जिसका उत्तर पूरा मिलता है।

इस प्रसंग में बड़ी घटना एक भी नहीं है। कोई राक्षस नहीं मारा जाता, कोई धनुष नहीं टूटता, कोई सेना नहीं चढ़ती। दो भाई और वैदेही एक आश्रम से चलकर दूसरे आश्रम तक जाते हैं, फिर एक नदी के किनारे पत्तों की एक कुटी छाकर रहने लगते हैं, और वहाँ एक शाम बैठे-बैठे बातचीत होती है। पर अरण्यकाण्ड में इससे शान्त कोई पन्ना नहीं है, और शायद इससे भरा हुआ भी कोई नहीं। जो आगे आनेवाला है, वह सब इसी शान्ति के तुरन्त बाद आता है।

इस पन्ने पर पाँच दोहों की कथा है और वह दो हिस्सों में बँटती है। पहले हिस्से में अगस्त्य का आश्रम है। वहाँ राम एक प्रश्न पूछते हैं और ऋषि उस प्रश्न का उत्तर देने के बजाय पूछनेवाले की ओर उँगली उठा देते हैं। दूसरे हिस्से में गोदावरी के किनारे की कुटी है, और वहाँ लक्ष्मण एक प्रश्न पूछते हैं, और इस बार उत्तर पूरा मिलता है। इसी उत्तर को सुननेवाले लक्ष्मण-गीता कहते आये हैं, क्योंकि वह किसी सभा में नहीं, किसी युद्धभूमि में नहीं, बस एक छोटे भाई के पूछने पर कहा गया है।

और यह ध्यान में रखने की बात है कि यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। दोनों में पंचवटी है, दोनों में जटायु है, पर जो बातचीत इस कुटी में होती है वह तुलसी की अपनी है। उसमें माया के दो रूप गिनाये जाते हैं, ज्ञान और वैराग्य की परिभाषा बाँधी जाती है, ईश्वर और जीव का भेद एक ही दोहे में रख दिया जाता है, और फिर इन सबके ऊपर भक्ति को बिठा दिया जाता है। यह सब कहनेवाला अपने ही भाई से कह रहा है, और सुननेवाला वही है जिसने कुछ ही दिन पहले अपने हाथों से यह कुटी छायी थी।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • राम दशरथ के पुत्र, जो इस पन्ने पर पहले एक शिष्य की तरह प्रश्न करते हैं और फिर एक बड़े भाई की तरह उत्तर देते हैं।
  • लक्ष्मण साथ चलनेवाले भाई, जो इस काण्ड में अब तक बोले नहीं हैं और यहाँ पहली बार अपने लिये कुछ माँगते हैं।
  • सीता बैदेही, जिनका नाम सुतीक्ष्ण के परिचय में आता है और जिनके साथ इस कुटी में रहने का ठिकाना बनता है।
  • सुतीक्ष्ण वह मुनि जिनके आश्रम से यह यात्रा चलती है, और जो अपने गुरु के पास साथ चलने के लिये एक मीठी युक्ति लगाते हैं।
  • अगस्त्य कुंभज ऋषि, सुतीक्ष्ण के गुरु, जो नाम सुनते ही दौड़ पड़ते हैं और जो पूछे जाने पर उत्तर के बदले एक वर माँग लेते हैं।
  • गीधराज गृध्रों का राजा, जिनसे पंचवटी के रास्ते में भेंट होती है और जिन्हें टीका जटायु नाम से पहचानती है।

गुरु के पास, साथ-साथ

पिछला प्रसंग जहाँ छूटा था, वहाँ एक मुनि अपना सारा माँगना माँग चुके थे और उत्तर में केवल दो शब्द पाये थे, ऐसा ही हो। उन्हीं दो शब्दों से यह पन्ना खुलता है। कहनेवाले ने इतना कहा और हर्षित होकर आगे बढ़ गये। जिस ओर वे बढ़े वह दिशा तुलसी एक ही नाम से बता देते हैं, कुंभज ऋषि की ओर। यह नाम आगे कुछ ही चौपाइयों में खुल जाता है, और टीका उसे अगस्त्य कहकर पहचानती है।

पर चलने से पहले पीछे से एक आवाज़ आती है। जिन सुतीक्ष्ण को अभी-अभी सब कुछ मिल चुका था, उनके भीतर एक पुरानी कमी जाग उठी है। बहुत दिन हो गये, वे कहते हैं, गुरु का दर्शन पाये और इस आश्रम में आये। एक ही वाक्य में उन्होंने अपनी सारी साधना का हिसाब दे दिया है। जिसके पास अब स्वयं भगवान् खड़े हैं, उसे अपने गुरु की याद आ रही है, और वह याद उतनी ही तीखी है जितनी किसी बरसों बिछड़े हुए घर की।

और फिर वे जो कहते हैं, उसमें मुनि की सारी मिठास है। वे साथ चलने की अनुमति नहीं माँगते। वे बस सूचना देते हैं कि वे भी चल रहे हैं, और साथ ही यह भी जोड़ देते हैं कि इसमें किसी पर कोई एहसान नहीं है। यानी न मैं आपके साथ चल रहा हूँ, न आप मुझे ले जा रहे हैं, हम दोनों को एक ही जगह जाना है।

अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं । तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं॥
देखि कृपानिधि मुनि चतुराई । लिए संग बिहसे द्वौ भाई॥

चौपाई १

अब मैं भी प्रभु के साथ गुरुजी के पास चलता हूँ, और हे नाथ, इसमें आप पर मेरा कोई एहसान नहीं है। इस पंक्ति का मज़ा उसके अगले आधे में खुलता है। कृपानिधि ने मुनि की यह चतुराई देखी, उन्हें साथ ले लिया, और दोनों भाई हँस पड़े। वह हँसी इस पूरे काण्ड की सबसे हलकी चीज़ है। इसके बाद अरण्यकाण्ड में हँसी बहुत कम बची है, इसलिये जहाँ मिले वहाँ रुककर देख लेना चाहिये।

रास्ता चलते हुए बातचीत क्या होती है, तुलसी यह भी बता देते हैं, और जो बताते हैं वह अनोखा है। रास्ते में वे अपनी अनुपम भक्ति का वर्णन करते चलते हैं। जिनकी भक्ति की जाती है वही अपनी भक्ति का वर्णन कर रहे हैं, और सुननेवाले दो लोग हैं, एक भाई और एक मुनि। फिर आश्रम आ जाता है। सुतीक्ष्ण तुरन्त भीतर जाते हैं, गुरु के चरणों में दण्डवत् करते हैं, और जो समाचार लाये हैं वह कहते हैं।

उनका वाक्य सीधा है और उसमें एक बात जान-बूझकर रखी गयी है। हे नाथ, कोसल के राजा के कुमार, जगत् के आधार, छोटे भाई और बैदेही सहित आपसे मिलने आये हैं। और फिर वह आधी पंक्ति, जो शिष्य ही कह सकता था, जिनका हे देव, आप रात-दिन जप करते रहते हैं। सुतीक्ष्ण जानते हैं कि उनके गुरु किसका नाम लेते हैं, और वे यह भी जानते हैं कि आज वह नाम द्वार पर खड़ा है।

सार: सुतीक्ष्ण के आश्रम से राम अगस्त्य की ओर चलते हैं, और सुतीक्ष्ण यह कहकर साथ हो लेते हैं कि इसमें किसी पर कोई एहसान नहीं। मुनि की चतुराई देखकर दोनों भाई हँस देते हैं, और आश्रम पहुँचकर सुतीक्ष्ण गुरु को यह समाचार देते हैं कि जिनका आप रात-दिन जप करते हैं वे मिलने आये हैं।

अगस्त्य का आश्रम

समाचार सुनते ही जो होता है, उसमें उम्र, तप, पद, कुछ भी बीच में नहीं आता। जिस ऋषि के पास बैठने के लिये मुनियों के समूह आते हैं, वे स्वयं उठकर दौड़ पड़ते हैं। तुलसी दो ही शब्द लगाते हैं, तुरत उठि धाए, और उन दो शब्दों में वह सारा संयम गिर जाता है जो वर्षों में बनाया गया था।

सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए॥
मुनि पद कमल परे द्वौ भाई । रिषि अति प्रीति लिए उर लाई॥

चौपाई २

यह सुनते ही अगस्त्य तुरन्त उठ दौड़े, और भगवान् को देखते ही उनके नेत्रों में जल भर आया। दोनों भाई मुनि के चरणकमलों पर गिर पड़े, और ऋषि ने उन्हें उठाकर बड़े प्रेम से हृदय से लगा लिया। ध्यान दीजिये कि इस पूरे चित्र में दोनों ओर से एक ही काम हो रहा है। ऋषि भगवान् की ओर दौड़ रहे हैं और भगवान् ऋषि के चरणों में गिर रहे हैं, और बीच में कोई यह हिसाब नहीं लगाता कि किसे पहले झुकना चाहिये था।

इसके बाद आश्रम का शिष्टाचार अपनी जगह लौट आता है। ज्ञानी मुनि आदर से कुशल पूछते हैं, उन्हें लाकर श्रेष्ठ आसन पर बिठाते हैं, फिर बहुत प्रकार से पूजा करते हैं, और तब एक वाक्य कहते हैं जो उस पूजा से भी बड़ा है, मेरे समान भाग्यवान् आज दूसरा कोई नहीं है। जिसने अभी-अभी अपने अतिथि के चरणों पर हाथ रखा है, वह अपने को भाग्यवान् कह रहा है।

आश्रम में और भी मुनि थे। जितने थे, सब के सब दर्शन करके हर्षित हो गये। और यहीं तुलसी एक दोहा रखते हैं जिसमें कथा रुक जाती है और केवल एक दृश्य रह जाता है। सभा में बैठे हुए मुनियों का समूह है, और बीच में एक व्यक्ति बैठा है।

मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर।
सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर॥ १२॥

दोहा १२

मुनियों के समूह में वे सबकी ओर सम्मुख होकर बैठे हैं। टीका इस आधी पंक्ति को खोलकर वह बात कहती है जो पढ़ने में आसानी से छूट जाती है, हर मुनि को वे अपने ही सामने मुख किये हुए बैठे दिखायी दे रहे हैं। सब उसी एक मुख को देख रहे हैं, और किसी को पीठ नहीं मिली। और फिर वह उपमा, जो इस काण्ड की सबसे कोमल उपमाओं में है। मानो चकोरों का समुदाय शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा की ओर देख रहा हो।

चकोर की बात यहाँ यों ही नहीं आयी है। उस पक्षी के विषय में जो कहा जाता है वही उसे इस दृश्य के लिये ठीक बनाता है, कि वह चन्द्रमा को देखता रहता है और देखने के सिवा उससे कुछ और चाहता नहीं। मुनियों के पास इस समय माँगने को कुछ बचा भी नहीं था। बरसों का तप पूरा हो चुका था, और सामने वह बैठा था जिसके लिये वह तप था।

सार: नाम सुनते ही अगस्त्य दौड़कर आते हैं, आँखें भर आती हैं, दोनों भाई चरणों पर गिरते हैं और ऋषि उन्हें हृदय से लगा लेते हैं। फिर आसन, पूजा, और यह वाक्य कि मेरे समान भाग्यवान् कोई नहीं। मुनियों की सभा के बीच बैठे राम को तुलसी शरद के चन्द्रमा की तरह दिखाते हैं, जिसे चकोरों का समुदाय देख रहा हो।

एक प्रश्न, और उसका उलटा उत्तर

पूजा और स्वागत के बाद बात काम पर आती है। राम मुनि से कहते हैं, और पहले ही वाक्य में वह चीज़ रख देते हैं जो इस पूरी भेंट का आधार है, आपसे कुछ छिपाव नहीं है। मैं जिस कारण से आया हूँ वह आप जानते ही हैं, इसी से हे तात, मैंने समझाकर कुछ कहा नहीं। यानी सूचना देने की आवश्यकता ही नहीं मानी गयी। जो जानता है उसे बताया नहीं जाता, उससे सीधे पूछ लिया जाता है।

और पूछा यह जाता है।

अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही । जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही॥
मुनि मुसुकाने सुनि प्रभु बानी । पूछेहु नाथ मोहि का जानी॥

चौपाई ३

हे प्रभो, अब आप मुझे वही मन्त्र दीजिये जिस प्रकार मैं मुनियों के द्रोहियों को मारूँ। मन्त्र का अर्थ यहाँ कोई गुप्त अक्षर नहीं है। वह वही है जो राजाओं के बीच होता है, सलाह, परामर्श, आगे की चाल। पिछले प्रसंग में मुनियों की हड्डियों के ढेर के सामने जो प्रतिज्ञा की गयी थी, यह उसी प्रतिज्ञा का अगला कदम है। प्रतिज्ञा हो चुकी, अब रास्ता पूछा जा रहा है।

और यहीं वह मोड़ आता है जो इस भेंट को याद रखने लायक बनाता है। अगस्त्य उत्तर नहीं देते। वे पहले मुसकराते हैं, और फिर प्रश्न लौटा देते हैं, हे नाथ, आपने क्या समझकर मुझसे यह पूछा है। यह उलाहना नहीं है, यह आनन्द है। वह आदमी हँस रहा है जिसे यह अच्छी तरह मालूम है कि पूछनेवाला उससे अधिक जानता है, और जिसे यह भी मालूम है कि पूछा इसीलिये गया है।

फिर वे बताते हैं कि वे जानते क्या हैं। और इस जगह तुलसी उनसे जो कहलवाते हैं, वह पूरे रामचरितमानस की सबसे साफ़ उपमाओं में एक है। ऋषि पहले अपनी सीमा बाँधते हैं, मैं आप ही के भजन के प्रभाव से आपकी कुछ थोड़ी-सी महिमा जानता हूँ। जो जाना है वह भी उधार का है और थोड़ा है। और उसके बाद वे गूलर का पेड़ खड़ा कर देते हैं।

तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी । जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी॥
ऊमरि तरु बिसाल तव माया । फल ब्रह्मांड अनेक निकाया॥

चौपाई ४

हे पापों का नाश करनेवाले, आपकी माया गूलर के विशाल वृक्ष के समान है, और अनेकों ब्रह्माण्डों के समूह ही जिसके फल हैं। जिसने कभी गूलर का पेड़ देखा है वह जानता है कि यह उपमा आँख से उठायी गयी है, किसी शास्त्र से नहीं। उस पेड़ पर फल गिनने की चीज़ नहीं होते, वे लदे रहते हैं, डाल-डाल पर, गुच्छों में। और हर फल के भीतर एक छोटी-सी दुनिया होती है जो बाहर से दिखायी नहीं देती।

जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहिं न जानहिं आना॥
ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सोउ काला॥

चौपाई ५

चर और अचर जीव उन फलों के भीतर उन्हीं छोटे-छोटे जन्तुओं की तरह बसते हैं, और दूसरा कुछ जानते नहीं। यही इस उपमा की मार है। जन्तु को अपना फल ही सारा संसार लगता है, उसकी दीवारें ही उसका आकाश हैं, और उसे यह कभी नहीं सूझता कि वह जिसमें रह रहा है वह किसी डाल पर टँगा हुआ है और डाल किसी पेड़ की है। जिसे हम सारा जगत् कहते हैं, वह इस चित्र में एक फल है।

पर ऋषि यहीं नहीं रुकते, और आगे जो कहते हैं वह उपमा को और ऊपर ले जाता है। उन फलों को खानेवाला कठिन और कराल काल है। यानी ब्रह्माण्ड गिने नहीं जाते और बचते भी नहीं, वे खाये जाते हैं। और फिर आख़िरी आधी पंक्ति, जिसके लिये यह सारा पेड़ खड़ा किया गया था, वह काल भी सदा आपसे डरता रहता है। जिससे सब डरते हैं वह भी किसी से डरता है, और वह किसी इस समय सामने बैठा हुआ है और सलाह पूछ रहा है।

ते तुम्ह सकल लोकपति साईं । पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं॥
यह बर मागउँ कृपानिकेता । बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता॥

चौपाई ६

उन्हीं आपने, समस्त लोकपालों के स्वामी होकर, मुझसे मनुष्य की तरह प्रश्न किया। यह वाक्य कहकर ऋषि अपना काम पूरा कर देते हैं। उन्होंने जो पूछा गया था उसका उत्तर नहीं दिया, उन्होंने पूछनेवाले का परिचय दे दिया। और फिर, उत्तर के बदले, वे अपने लिये कुछ माँग लेते हैं। हे कृपा के धाम, मैं तो यह वर माँगता हूँ कि आप सीताजी और छोटे भाई सहित मेरे हृदय में निवास कीजिये।

माँगना यहीं नहीं रुकता, और जो आगे माँगा जाता है वह इस पन्ने के दूसरे हिस्से की भूमिका बन जाता है। प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, सत्संग, और चरणकमलों में अटूट प्रेम। चार चीज़ें, और चारों में से एक भी ऐसी नहीं जो किसी और से माँगी जा सकती हो। और तब ऋषि वह बात कहते हैं जिसे इस पूरे प्रसंग का पेच कहना चाहिये, यद्यपि आप अखण्ड और अनन्त ब्रह्म हैं, अनुभव से ही जानने में आते हैं, और संतजन आपका भजन करते हैं, यद्यपि मैं आपके उस रूप को जानता हूँ और उसका वर्णन भी करता हूँ, फिर भी लौट-लौटकर मैं सगुण में ही प्रेम मानता हूँ।

फिरि फिरि, यही वह शब्द है। जिसने निराकार को जान भी लिया है वह भी बार-बार उसी सामने बैठे हुए रूप की ओर लौट आता है। और फिर ऋषि अपने ही मुसकराने का कारण बता देते हैं, आप सेवकों को सदा बड़ाई दिया करते हैं, इसीलिये हे रघुनाथ, आपने मुझसे पूछा है। यानी प्रश्न सलाह लेने के लिये नहीं था, सलाह देनेवाले को बड़ा करने के लिये था। पूछनेवाले ने अपने पूछने से एक ऋषि का दिन बना दिया।

सार: राम अगस्त्य से मुनियों के द्रोहियों को मारने का मन्त्र पूछते हैं। ऋषि मुसकराकर प्रश्न लौटा देते हैं, माया को गूलर के पेड़ की उपमा देते हैं जिसके फल अनेकों ब्रह्माण्ड हैं और जिनके भीतर जीव जन्तुओं की तरह बसते हैं, कहते हैं कि उन फलों को खानेवाला काल भी आपसे डरता है, और उत्तर के बदले यह वर माँगते हैं कि आप सीता और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय में बसें।

पंचवटी का पता

स्तुति पूरी हुई, वर माँगा जा चुका, और अब ऋषि वह करते हैं जो इस भेंट का असली फल है। वे एक पता देते हैं। एक परम मनोहर और पवित्र स्थान है, वे कहते हैं, उसका नाम पंचवटी है। यह नाम इस पन्ने पर यहीं पहली बार आता है, और आगे की सारी कथा इसी नाम के आसपास घूमेगी।

और नाम के साथ दो काम सौंपे जाते हैं, जो देखने में ऋषि की प्रार्थना हैं और असल में उस जगह जाने का कारण। दण्डकवन को पवित्र कीजिये, और श्रेष्ठ मुनि के उग्र शाप को हर लीजिये। जिस मुनि के शाप की बात है उनका नाम इन चौपाइयों में नहीं आता, पोद्दार की टीका उन्हें गौतम बताती है। तुलसी यहाँ शाप की कथा नहीं सुनाते, केवल इतना कहते हैं कि एक वन है जिस पर कुछ पड़ा हुआ है, और उसे उतारना इन्हीं के हाथ है।

बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया॥
चले राम मुनि आयसु पाई । तुरतहिं पंचबटी निअराई॥

चौपाई ७

हे रघुकुल के स्वामी, सब मुनियों पर दया करके वहीं निवास कीजिये। ध्यान दीजिये कि ऋषि ने निवास माँगा है, अभियान नहीं। उन्होंने यह नहीं कहा कि जाकर उन्हें मारिये। उन्होंने कहा कि वहाँ रहिये। और यह बात इस काण्ड के सबसे गहरे नियमों में से एक है, कि किसी जगह के ठीक होने के लिये सबसे पहली शर्त यह है कि वहाँ कोई रहने लगे।

आज्ञा मिलते ही वे चल देते हैं, और शीघ्र ही पंचवटी के निकट पहुँच जाते हैं। रास्ते की कोई कथा तुलसी नहीं कहते। वे सीधे उस दोहे पर आ जाते हैं जिसमें दो काम एक साथ हो जाते हैं, एक भेंट और एक घर।

गीधराज सैं भेंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ।
गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ॥ १३॥

दोहा १३

वहाँ गृध्रराज से भेंट हुई, बहुत प्रकार से प्रीति बढ़ी, और प्रभु गोदावरी के समीप पत्तों का घर छाकर रहने लगे। इस पूरे दोहे में कुल दो पंक्तियाँ हैं और उनमें एक मित्र बन जाता है और एक घर बन जाता है। तुलसी यहाँ बिलकुल नहीं रुकते। गीधराज कौन हैं, कहाँ से आये, किस कुल के हैं, इस पर एक शब्द नहीं। टीका उनका नाम जटायु बताती है, और आगे की कथा इस नाम को जिस तरह लौटायेगी वह इस समय किसी को मालूम नहीं।

पर एक शब्द पर रुकना बनता है, बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ। बढ़ायी गयी, अपने आप हुई नहीं। यह मैत्री उस तरह नहीं बनी जैसे रास्ते में किसी से जान-पहचान हो जाती है। इसे बनाया गया, बहुत प्रकार से, और बनानेवाला वह था जिसे इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। एक बूढ़े पक्षी के साथ इतनी देर लगाना उस समय किसी काम का नहीं दिखता। बाद में वही पक्षी इस काण्ड में अकेला ऐसा होगा जो रथ के पीछे उड़ेगा।

और फिर वह आधी पंक्ति, जिसमें इस पन्ने का सबसे शान्त चित्र है, परन गृह छाइ। पत्तों का घर छाकर। न भवन, न पर्वत की गुफा, न कोई सिद्ध आश्रम। पत्ते, डण्डियाँ, और दो हाथ। जिस राजकुमार के लिये अयोध्या में महल खाली पड़ा है, वह गोदावरी के किनारे अपने छोटे भाई के साथ छप्पर छा रहा है।

सार: अगस्त्य पंचवटी का पता देते हैं, दण्डकवन को पवित्र करने और श्रेष्ठ मुनि के उग्र शाप को हरने की प्रार्थना करते हैं, और वहीं निवास करने को कहते हैं। आज्ञा पाकर राम चल देते हैं, रास्ते में गीधराज से भेंट होती है और प्रीति बढ़ती है, और गोदावरी के निकट पर्णकुटी छाकर वे रहने लगते हैं।

गोदावरी के किनारे वह कुटी

अब कथा एक जगह पर बैठ जाती है, और तुलसी उस जगह को दिखाने में समय लगाते हैं। जब से वहाँ निवास हुआ, मुनि सुखी हो गये और उनका डर जाता रहा। यह पहला बदलाव है और वह किसी हथियार से नहीं आया। कोई युद्ध नहीं हुआ, कोई राक्षस नहीं मारा गया। बस कोई आकर रहने लगा, और डर उतर गया।

दूसरा बदलाव जगह के ऊपर उतरता है। पर्वत, वन, नदी और तालाब शोभा से छा गये, और दिनोंदिन अधिक सुहावने होने लगे। यह पंक्ति अपने भीतर एक छोटा-सा नियम छिपाये हुए है। सुन्दरता यहाँ एक बार में नहीं आयी, वह हर दिन थोड़ी और बढ़ती गयी। जिस वन में विराध रहता था और जहाँ मुनियों की हड्डियों के ढेर लगे थे, वही वन अब हर सुबह पिछली सुबह से सुन्दर उठ रहा है।

तीसरा बदलाव जीवों पर उतरता है। पक्षियों और पशुओं के समूह आनन्दित रहते हैं, और भौंरे मधुर गुंजार करते हुए शोभा पा रहे हैं। और इसके तुरन्त बाद तुलसी वर्णन को स्वयं रोक देते हैं। उस वन का वर्णन सर्पराज भी नहीं कर सकते, वे कहते हैं, जहाँ प्रत्यक्ष रघुवीर विराजमान हैं। हज़ार मुखवाले से भी यह नहीं बनेगा, इसलिये एक मुखवाला यहीं हाथ जोड़ लेता है। यह चाल पूरे मानस में लौटती है, कि जहाँ वर्णन थकता है वहाँ थकान को ही वर्णन बना दिया जाता है।

और इसी शान्त, भरे हुए, हर दिन थोड़ा और सुन्दर होते जाते समय के भीतर वह क्षण आता है जिसके लिये यह पूरा पन्ना बना है। कोई संकट नहीं है, कोई जल्दी नहीं है। प्रभु सुख से बैठे हुए हैं। और तभी छोटा भाई बोलता है।

सार: राम के वहाँ बसते ही मुनियों का भय जाता रहता है, पर्वत, वन, नदी और तालाब दिनोंदिन सुन्दर होते जाते हैं, पक्षी और पशु आनन्दित रहते हैं, और तुलसी कह देते हैं कि उस वन का वर्णन शेषजी भी नहीं कर सकते।

लक्ष्मण की बात

एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना॥
सुर नर मुनि सचराचर साईं । मैं पूछउँ निज प्रभु की नाईं॥

चौपाई ८

एक बार प्रभु सुख से बैठे हुए थे, और लक्ष्मण ने छल से रहित वचन कहे। छलहीना। तुलसी इस शब्द को यों ही नहीं रखते। इस काण्ड में अभी तक जितने प्रश्न पूछे गये हैं, उनमें से कई में कुछ न कुछ और भी था। किसी में परीक्षा थी, किसी में विनय का शिष्टाचार था, किसी में पहचान की जाँच थी। यह प्रश्न उनमें से किसी जाति का नहीं है। यह वह प्रश्न है जो कोई तब पूछता है जब उसके पास खोने को कुछ नहीं और जानने को बहुत कुछ है।

और सम्बोधन देखिये। देवता, मनुष्य, मुनि और चराचर के स्वामी। जिसके साथ वे बरसों से चल रहे हैं, जिसके लिये उन्होंने अपना घर छोड़ा है, जिसकी कुटी उन्होंने अपने हाथों से छायी है, उसे वे इस नाम से पुकार रहे हैं। और फिर आधी पंक्ति में वे अपना अधिकार भी रख देते हैं, मैं अपने प्रभु की तरह जानकर पूछता हूँ। यानी मैं भाई की हैसियत से नहीं, सेवक की हैसियत से पूछ रहा हूँ। बड़े भाई से यह पूछा नहीं जा सकता था, स्वामी से पूछा जा सकता है।

मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा॥
कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया॥

चौपाई ९

मुझे समझाकर वही कहिये, हे देव, जिससे सब छोड़कर मैं आपकी चरणरज की ही सेवा करूँ। पहली ही माँग में लक्ष्मण ने अपना लक्ष्य बता दिया है, और वह लक्ष्य ज्ञान नहीं है। वे जानना इसलिये चाहते हैं कि सेवा बच जाये। बाकी सब छूट जाये और यह एक न छूटे, इसके लिये जो समझ चाहिये वह माँगी जा रही है।

और फिर वे विषय गिनाते हैं, और गिनाते समय एक भी शब्द फ़ालतू नहीं रखते। ज्ञान कहिये, वैराग्य कहिये, माया कहिये, और वह भक्ति कहिये जिसके कारण आप दया करते हैं। चार माँगें हैं और चौथी में मोड़ है। पहली तीन चीज़ों के विषय में उन्होंने पूछा है कि वे क्या हैं। भक्ति के विषय में उन्होंने यह नहीं पूछा। उसके विषय में उन्होंने पहले ही यह मान लिया है कि वही वह चीज़ है जिससे दया उतरती है, और केवल उसका पता माँगा है।

ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।
जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ॥ १४॥

दोहा १४

और अन्त में वह प्रश्न, जो दोहे में रखा गया है और जिसके लिये यह सारी बातचीत याद की जाती है। हे प्रभो, ईश्वर और जीव का भेद भी सब समझाकर कहिये। पर पूछनेवाले ने यहाँ भी अपना कारण साथ जोड़ दिया है, जिससे आपके चरणों में मेरी प्रीति हो और शोक, मोह तथा भ्रम नष्ट हो जायँ। यह छोटी-सी पूँछ पूरे प्रश्न का स्वभाव बदल देती है। यह जिज्ञासा नहीं है। यह किसी ऐसे आदमी की माँग है जिसके भीतर कुछ हिल रहा है और जो उसे बाँधना चाहता है।

सार: गोदावरी के किनारे बैठे-बैठे लक्ष्मण छल से रहित वचन कहते हैं, अपने को सेवक बताकर पूछते हैं, और चार चीज़ें माँगते हैं, ज्ञान, वैराग्य, माया और भक्ति, और दोहे में ईश्वर तथा जीव का भेद, ताकि चरणों में प्रीति हो और शोक, मोह और भ्रम मिट जायँ।

माया, और उसके दो रूप

उत्तर का पहला शब्द ही उसका मिज़ाज बता देता है। थोड़े ही में सब कहे देता हूँ। जिस प्रश्न में पाँच विषय गिनाये गये थे, उसका उत्तर लम्बा किया जा सकता था। पर सुननेवाला भाई है, जगह कुटी है, और शाम है। इसलिये उत्तर छोटा रखा जाता है, और छोटा रखने की शर्त भी साथ ही कह दी जाती है, मन, चित्त और बुद्धि लगाकर सुनना। जो थोड़े में कहा जाता है उसे पूरे ध्यान से ही पकड़ा जा सकता है।

थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई । सुनहु तात मति मन चित लाई॥
मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥

चौपाई १०

और फिर माया की वह परिभाषा आती है जिसमें एक भी भारी शब्द नहीं है। चार छोटे-छोटे शब्द रखे जाते हैं और कह दिया जाता है कि यही माया है। पहले दो अपनी ओर के हैं, मैं और मेरा। बाकी दो सामनेवाले की ओर के हैं, तैं और तोर। इन्हीं चार खूँटों से, कहा जाता है, समस्त जीवों को वश में कर रखा गया है।

इस परिभाषा की ताक़त इसी में है कि इसमें कुछ भी अलौकिक नहीं है। कोई पर्दा नहीं है, कोई जादू नहीं है, कोई अन्धकार नहीं है। जो चीज़ बाँधती है वह रोज़ की बोलचाल का सबसे साधारण हिस्सा है, वह लकीर जो अपने और दूसरे के बीच हर वाक्य में खिंची चली जाती है। और इसके तुरन्त बाद उसका फैलाव बता दिया जाता है। इन्द्रियों के विषय, और जहाँ तक मन जाता है, उस सबको माया जानना। यानी सीमा खींचने के लिये बाहर जाने की आवश्यकता नहीं, जहाँ तक सोचा जा सकता है वहाँ तक वही है।

पर यहीं उत्तर एक ऐसा काम करता है जिसकी लक्ष्मण ने माँग नहीं की थी। माया को एक चीज़ कहकर छोड़ा नहीं जाता, उसके दो भेद कर दिये जाते हैं, विद्या और अविद्या। और दोनों का परिचय आमने-सामने रखा जाता है।

एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा॥
एक रचइ जग गुन बस जाकें । प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें॥

चौपाई ११

एक दुष्ट है और अत्यन्त दुःखरूप है, जिसके वश होकर जीव संसाररूपी कुएँ में पड़ा हुआ है। यह अविद्या है। भवकूप, संसार का कुआँ। कुएँ की उपमा में वह बात अपने आप आ जाती है जो लम्बे उपदेश से भी नहीं आती, कि गिरनेवाला अपने बल पर निकल नहीं सकता, और यह भी कि कुआँ किसी ने खोदा नहीं, वह मिल गया, और यह भी कि भीतर से आकाश उतना ही दिखता है जितना मुँह खुला हो।

और दूसरी वह है जिसके वश में गुण हैं और जो जगत् की रचना करती है। यह विद्या है। पर इसके साथ ही एक शर्त लगा दी जाती है जो इस पूरे उत्तर का काँटा है, वह प्रभु से ही प्रेरित होती है, उसके अपने पास कोई बल नहीं है। यानी जो सृष्टि करती है वह भी स्वतन्त्र नहीं। रचनेवाली शक्ति तक किसी की प्रेरणा से चलती है, और किसकी, यह दोहे में आयेगा।

इसके बाद वे दो शब्द खोले जाते हैं जिनके विषय में लक्ष्मण ने अलग से पूछा था। ज्ञान वह है जहाँ मान आदि एक भी दोष नहीं है, और जो सबमें समान रूप से ब्रह्म को देखता है। ध्यान दीजिये कि परिभाषा दो टुकड़ों की है और पहला टुकड़ा नकार का है। पहले वह चीज़ हटायी जाती है जो सबसे पहले खड़ी होती है, अपना मान। जब तक वह है तब तक दूसरा टुकड़ा हो ही नहीं सकता, क्योंकि जिसे अपने होने का हिसाब रखना है वह सबमें समान कुछ नहीं देख पायेगा।

और वैराग्य। परम विरागी उसे कहना चाहिये जो सारी सिद्धियों को और तीनों गुणों को तिनके के समान त्याग चुका हो। यहाँ कठिनाई सिद्धियों के त्याग में नहीं है, वह तो सुनने में भी बड़ी लगती है। कठिनाई तीनों गुणों के त्याग में है, क्योंकि उनमें एक सत्त्व भी है। जिसे अच्छा होना भी छोड़ना पड़े, उसके लिये तिनका शब्द जान-बूझकर रखा गया है। तिनका फेंकते समय कोई तौलता नहीं।

माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।
बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव॥ १५॥

दोहा १५

और अब वह दोहा, जिसे लक्ष्मण ने माँगा था और जो पूरे उत्तर की धुरी है। जो माया को, ईश्वर को और अपने स्वरूप को नहीं जानता, उसे जीव कहना चाहिये। तीन अनजान, और तीनों में सबसे भारी तीसरा है। बाहर की दो चीज़ों का न जानना समझ में आता है। पर जीव की परिभाषा में यह भी रख दिया गया कि वह अपने को भी नहीं जानता। जो अपने विषय में सबसे अधिक बोलता है वही अपने विषय में सबसे कम जानता है, और यही उसका नाम पड़ गया है।

और दूसरी पंक्ति में ईश्वर आ जाता है, बिना नाम लिये, केवल काम से। जो बन्धन और मोक्ष देनेवाला है, जो सबसे परे है, और जो माया का प्रेरक है। पहला और तीसरा टुकड़ा मिलकर वह बात पूरी कर देते हैं जो अभी अधूरी रह गयी थी। विद्या अपने बल पर नहीं चलती, वह प्रेरित होती है। और प्रेरित करनेवाला यह है, जो इस समय एक पर्णकुटी में बैठा हुआ अपने छोटे भाई को यह सब समझा रहा है।

सार: राम कहते हैं कि मैं और मेरा तथा सामनेवाले की ओर के दो शब्द, यही माया है, और इन्द्रियों के विषय तथा जहाँ तक मन जाता है वह सब वही है। माया के दो भेद हैं, अविद्या जो दुःखरूप है और जीव को भवकूप में डालती है, और विद्या जो जगत् रचती है पर प्रभु से ही प्रेरित होती है। ज्ञान वह है जिसमें मान न हो और जो सबमें ब्रह्म देखे, परम विरागी वह जो सिद्धियों और तीनों गुणों को तिनके के समान छोड़ चुका हो। जो माया, ईश्वर और अपने स्वरूप को न जाने वह जीव है, और जो बन्धन-मोक्ष देता है, सबसे परे है और माया का प्रेरक है वह ईश्वर।

और इन सबके ऊपर, भक्ति

अब तक जो कहा गया वह पूछा गया था। आगे जो कहा जाता है वह पूछे हुए से आगे की चीज़ है, और उसी के लिये यह पूरी बातचीत हुई थी। पहले शास्त्र का सीधा क्रम रख दिया जाता है, धर्म से वैराग्य होता है, योग से ज्ञान, और ज्ञान मोक्ष देता है, ऐसा वेदों ने कहा है। यह पूरा वाक्य किसी सीढ़ी की तरह खड़ा है और उस पर कोई आपत्ति नहीं की जाती। वेद जो कहते हैं वह अपनी जगह रहने दिया जाता है।

और फिर, बिना किसी झगड़े के, उसके बगल में एक दूसरी चीज़ रख दी जाती है। हे भाई, जिससे मैं शीघ्र ही द्रवित हो जाता हूँ, वह मेरी भक्ति है, जो भक्तों को सुख देनेवाली है। द्रवउँ, पिघल जाता हूँ। सीढ़ी को तोड़ा नहीं गया, बस यह बता दिया गया कि किस चीज़ से जल्दी काम बनता है। और यह बताने का अधिकार केवल उसी को है जिस पर काम बनना है।

सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥
भगति तात अनुपम सुखमूला । मिलइ जो संत होइँ अनुकूला॥

चौपाई १२

वह भक्ति स्वतन्त्र है, उसे किसी दूसरे साधन का सहारा नहीं चाहिये। ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं। यह इस पूरे उत्तर का सबसे साहसी वाक्य है, और सबसे शान्त भी। जिस ज्ञान की परिभाषा अभी-अभी इतने आदर से बाँधी गयी थी, उसी को अब नीचे की जगह दे दी गयी, और यह किसी विवाद में नहीं कहा गया। इसे उसी तरह कहा गया जैसे घर की कोई बात कही जाती है।

और उसके बाद वह पंक्ति, जो भक्ति को हवा में नहीं छोड़ती। भक्ति अनुपम है और सुख की जड़ है, और वह तभी मिलती है जब संत अनुकूल हों। यहाँ एक दरवाज़ा बता दिया गया है। जो चीज़ स्वतन्त्र है, जिसे किसी साधन की अपेक्षा नहीं, वह भी अपने आप हाथ नहीं लगती। उसके लिये किसी जीते-जागते आदमी के पास जाना पड़ता है और उसका मन पाना पड़ता है। स्वतन्त्रता और संत, दोनों एक ही साँस में रख दिये गये हैं।

और तब भक्ति के साधन गिनाये जाते हैं, और गिनाने से पहले उनका स्वभाव बता दिया जाता है, यह सुगम मार्ग है, इससे जीव मुझे सहज ही पा जाते हैं। सुगम। जो कुछ आगे आता है उसमें एक भी बात ऐसी नहीं है जिसके लिये वन में जाना पड़े या शरीर सुखाना पड़े।

पहली सीढ़ी सबसे बाहरी है, ब्राह्मणों के चरणों में अत्यन्त प्रीति, और वेद की रीति के अनुसार अपने-अपने कर्म में लगे रहना। यानी जहाँ जो है, वहीं रहकर, जो उसका काम है वही करता रहे। इसका फल तुरन्त नहीं आता, और जो आता है वह भीतर आता है, विषयों से वैराग्य। और तब, वैराग्य होने पर, उस धर्म में प्रेम उत्पन्न होता है जिसे कहनेवाला अपना धर्म कहता है। तब श्रवण आदि नौ प्रकार की भक्तियाँ दृढ़ होती हैं, और मन में लीलाओं के प्रति अत्यन्त प्रेम होता है।

इस क्रम को ध्यान से देखिये, क्योंकि इसमें एक बात उलटी लगती है। प्रेम पहले नहीं रखा गया, बाद में रखा गया। पहले काम है, फिर उसका फल, फिर विरक्ति, और तब जाकर प्रेम। जो चीज़ सबसे ऊपर बैठती है वह सबसे आख़िर में उगती है, और उसे उगाने के लिये जो ज़मीन चाहिये वह बहुत साधारण ज़मीन है।

आगे जो कहा जाता है वह और भी घरेलू है। संतों के चरणकमलों में अत्यन्त प्रेम हो। मन, वचन और कर्म से भजन का दृढ़ नियम हो। और फिर वह पंक्ति, जिसमें सारे रिश्ते एक ही जगह इकट्ठे कर दिये जाते हैं, जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता, सब कुछ जाने और सेवा में दृढ़ हो। छह नाम गिनाये गये हैं और छहों घर के भीतर के हैं। कोई भी नाम मन्दिर से नहीं उठाया गया।

मम गुन गावत पुलक सरीरा । गदगद गिरा नयन बह नीरा॥
काम आदि मद दंभ न जाकें । तात निरंतर बस मैं ताकें॥

चौपाई १३

मेरा गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाय, वाणी गद्गद हो जाय और नेत्रों से जल बहने लगे। तीन लक्षण, और तीनों शरीर के हैं। रोम, गला, आँख। इस पूरी बातचीत में पहली बार कोई चीज़ नापी नहीं जा रही, दिखायी दे रही है। जो ज्ञान अभी परिभाषा में था, वह यहाँ किसी के गले में अटक गया है।

और उसके साथ ही एक शर्त और जुड़ी है, काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों। यह शर्त इसलिये ज़रूरी है कि ऊपर के तीनों लक्षण नकल किये जा सकते हैं। रोमांच दिखाया जा सकता है, गला भरा हुआ दिखाया जा सकता है, आँसू भी आ सकते हैं। जो नकल नहीं हो सकती वह यह है कि भीतर दम्भ न बचा हो। और तब वह आधी पंक्ति आती है जिसके आगे कहने को कुछ नहीं रह जाता, हे भाई, मैं सदा उसके वश में रहता हूँ।

बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।
तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम॥ १६॥

दोहा १६

जिनको कर्म, वचन और मन से मेरी ही गति है, और जो निष्काम भाव से मेरा भजन करते हैं, उनके हृदय-कमल में मैं सदा विश्राम किया करता हूँ। और इसी पर यह बातचीत बन्द हो जाती है। ध्यान दीजिये कि अन्तिम शब्द निवास नहीं है, विश्राम है। जिसने अभी-अभी माया, विद्या, अविद्या, जीव और ईश्वर, सब कुछ खोलकर रख दिया, वह अपने लिये जो जगह चुनता है वह सिंहासन नहीं है, वह आराम की जगह है।

और इस पूरे उत्तर का ढाँचा तभी दिखता है जब पीछे मुड़कर देखा जाय। शुरू में माया थी, जिसमें चार शब्द थे, मैं, मेरा, और सामनेवाले के दो। अन्त में एक हृदय है जिसमें कोई माँग नहीं बची, निःकाम। बीच का सारा रास्ता इन्हीं दो बिन्दुओं के बीच का है, अपने को गिनने से लेकर अपने को न गिनने तक।

सार: राम कहते हैं कि वेदों के अनुसार धर्म से वैराग्य, योग से ज्ञान और ज्ञान से मोक्ष होता है, पर जिससे वे शीघ्र द्रवित होते हैं वह भक्ति है। भक्ति स्वतन्त्र है, ज्ञान और विज्ञान उसके अधीन हैं, और वह संतों के अनुकूल होने पर मिलती है। उसके साधन सुगम हैं, ब्राह्मणों के चरणों में प्रीति, अपने कर्म, विषयों से वैराग्य, नवधा भक्ति, संतों के चरणों में प्रेम, और मुझे ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता जानना। जिसके गुण गाते समय रोमांच, गद्गद वाणी और आँसू हों और जिसमें काम, मद तथा दम्भ न हों, उसके वश में वे रहते हैं, और निष्काम भजन करनेवालों के हृदय-कमल में विश्राम करते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने पर दो प्रश्न पूछे गये और दोनों एक ही आदमी से पूछे गये। पहला अगस्त्य ने नहीं, राम ने पूछा था, और उसका उत्तर नहीं मिला। दूसरा लक्ष्मण ने पूछा और उसका उत्तर पूरा मिला। दोनों को आमने-सामने रखकर देखिये तो एक बात साफ़ हो जाती है। ऋषि से सलाह माँगी गयी थी, यानी बाहर के किसी काम की चाल। भाई ने अपने भीतर के किसी उलझाव का रास्ता माँगा था। पहला प्रश्न टाला जा सकता था क्योंकि उसका उत्तर समय ने देना था। दूसरा टाला नहीं जा सकता था।

दूसरी बात, जो इस प्रसंग को पढ़ते हुए देर तक साथ रहती है, वह यह है कि यह सारा उपदेश किस जगह दिया गया है। न सभा, न सिंहासन, न कोई पर्वत की चोटी। पत्तों का एक घर, एक नदी, और शाम। कहनेवाला वही है जो सुबह इसी कुटी के आसपास घूमा होगा, और सुननेवाला वही है जिसने इसकी छत छायी है। जो बात यहाँ कही गयी वह किसी गद्दी से नहीं उतरी, वह बैठे-बैठे कही गयी, और शायद इसीलिये इतने बरसों बाद भी उसे सुना जा सकता है।

और तीसरी बात, जो सबसे आसानी से छूट जाती है। इस पन्ने पर भक्ति के जितने साधन गिनाये गये, उनमें एक भी ऐसा नहीं है जिसके लिये कहीं जाना पड़े। अपने कर्म में लगे रहना, बड़ों के चरणों में प्रीति, संतों का साथ, दृढ़ नियम, और घर के छह रिश्तों को एक ही जगह जोड़ देना। जिस उत्तर की शुरुआत ब्रह्माण्डों से लदे हुए गूलर के पेड़ से हुई थी, वह उत्तर आकर एक आदमी के रोज़ के दिन पर रुकता है। और वहीं, उसी साधारण दिन के भीतर, वह जगह बन जाती है जिसमें कोई आकर विश्राम कर सके।

अरण्यकाण्ड के इस प्रसंग को पढ़ते हुए बार-बार यह याद आता है कि यह पूरी शान्ति कितनी छोटी है। पाँच दोहों में एक आश्रम, एक मित्रता, एक घर और एक लम्बी बातचीत, और उसके तुरन्त बाद वही वन जिसमें से कोई उठा लिया जायेगा। तुलसी इस सुख को लम्बा नहीं खींचते और उसे बचाते भी नहीं। वे बस उसे पूरा दिखा देते हैं, एक-एक पत्ते समेत, ताकि जब वह जाये तब हमें मालूम हो कि क्या गया।

और आख़िरी बात, जो इस पूरे पन्ने की सबसे शान्त बात है। जो कुछ यहाँ कहा गया, वह इसलिये नहीं कहा गया कि कोई शिष्य पूछ रहा था। वह इसलिये कहा गया कि एक भाई ने कहा कि मुझे समझाकर वही कहिये जिससे सब छोड़कर मैं आपकी चरणरज की सेवा करूँ। माँग सेवा की थी, उत्तर में सारा तत्त्व मिल गया, और अन्त में फिर वहीं लौटा दिया गया जहाँ से माँग उठी थी, एक हृदय पर, जिसमें कोई और माँग बची नहीं है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा १२ से १६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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