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अगस्त्य, पंचवटी और लक्ष्मण-गीता

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रामचरितमानसअरण्यकाण्डप्रसंग 3

अगस्त्य के आश्रम में राम का प्रश्न, जिसके उत्तर में ऋषि पंचवटी का पता देते हैं। गोदावरी के किनारे छायी हुई एक पर्णकुटी। और उसी कुटी में छोटे भाई का प्रश्न, जिसका उत्तर राम स्वयं देते हैं।

दो भाई और सीता एक आश्रम से दूसरे आश्रम तक जाते हैं। फिर राम एक नदी के किनारे पत्तों की कुटी छाकर रहने लगते हैं, और वहाँ एक दिन बैठे-बैठे बातचीत होती है।

पहले अगस्त्य का आश्रम है, जहाँ राम एक प्रश्न पूछते हैं, और ऋषि अपना वर माँगकर पंचवटी का पता देते हैं। फिर गोदावरी के किनारे की कुटी है, जहाँ लक्ष्मण एक प्रश्न पूछते हैं और राम उत्तर देते हैं। इसी उत्तर को लक्ष्मण-गीता कहा जाता है।

यह रामचरितमानस की कथा है। वाल्मीकि की रामायण में भी पंचवटी और जटायु हैं, और इस कुटी की बातचीत मानस की अपनी है। उसमें माया के दो रूप, ज्ञान और वैराग्य, ईश्वर और जीव का भेद, और भक्ति और उसके साधन आते हैं। कहनेवाले राम हैं, और सुननेवाले उनके अपने भाई।

सुतीक्ष्ण, अगस्त्य और जटायु

  • राम दशरथ के पुत्र, जो यहाँ पहले अगस्त्य से प्रश्न करते हैं, जिसे ऋषि मनुष्य की तरह पूछा गया प्रश्न कहते हैं, और फिर लक्ष्मण के प्रश्न का उत्तर देते हैं।
  • लक्ष्मण साथ चलनेवाले भाई। गोदावरी के किनारे की कुटी में वे राम से ज्ञान, वैराग्य, माया और भक्ति के विषय में पूछते हैं, और ईश्वर और जीव के भेद के विषय में भी।
  • सीता जिनका नाम सुतीक्ष्ण के समाचार में आता है और जिनके साथ इस कुटी में रहने का ठिकाना बनता है।
  • सुतीक्ष्ण वह मुनि जिनके आश्रम से यह यात्रा चलती है। वे राम के साथ अपने गुरु के पास चलते हैं, और अपनी चतुराई से कहते हैं कि इसमें राम पर कोई एहसान नहीं।
  • अगस्त्य सुतीक्ष्ण के गुरु, जो राम का आना सुनते ही दौड़ पड़ते हैं। पूछे जाने पर वे पहले अपने लिये वर माँगते हैं, और फिर पंचवटी का पता देते हैं।
  • जटायु गीधों के राजा, जिनसे पंचवटी के निकट राम की भेंट होती है। टीका उन्हें जटायु बताती है।

गुरु के पास, साथ-साथ

सुतीक्ष्ण राम से वह माँग चुके थे जो उन्हें भाता था। राम ने “एवमस्तु”, ऐसा ही हो, कहा और हर्षित होकर आगे बढ़े। वे अगस्त्य ऋषि की ओर चले।

टीका के अनुसार तब सुतीक्ष्ण बोल उठते हैं। वे कहते हैं, “गुरु का दर्शन पाये और इस आश्रम में आये मुझे बहुत दिन हो गये।”

सुतीक्ष्ण कहते हैं, “अब मैं भी आपके साथ गुरु के पास चलता हूँ, और हे नाथ, इसमें आप पर मेरा कोई एहसान नहीं है।” राम ने मुनि की यह चतुराई देखी, उन्हें साथ ले लिया, और दोनों भाई हँस पड़े।

रास्ते में राम अपनी अनुपम भक्ति का वर्णन करते चलते हैं। फिर आश्रम आ जाता है। सुतीक्ष्ण तुरन्त गुरु के पास जाते हैं, गुरु को दण्डवत् करते हैं, और समाचार देते हैं।

वे कहते हैं, “हे नाथ, कोसल के राजा के कुमार, जगत् के आधार, आपसे मिलने आये हैं। छोटे भाई और सीता के साथ राम आये हैं, जिनका आप रात-दिन जप करते रहते हैं, हे देव।”

अगस्त्य का आश्रम

यह सुनते ही अगस्त्य तुरन्त उठ दौड़े, और राम को देखते ही उनके नेत्रों में जल भर आया। दोनों भाई मुनि के चरणों पर गिर पड़े, और ऋषि ने बड़े प्रेम से उन्हें हृदय से लगा लिया।

ज्ञानी मुनि आदर से कुशल पूछकर उन्हें लाते हैं, और श्रेष्ठ आसन पर बिठाते हैं। फिर बहुत प्रकार से राम की पूजा करते हैं। वे कहते हैं, “मेरे समान भाग्यवान् दूसरा कोई नहीं है।”

आश्रम में जितने और मुनि थे, सब राम के दर्शन करके हर्षित हो गये। मुनियों के समूह में राम सबकी ओर सम्मुख होकर बैठे हैं। टीका के अनुसार हर मुनि को राम अपने ही सामने मुख किये बैठे दिखते हैं, और सब उसी एक मुख को देख रहे हैं। मानो चकोरों का समुदाय शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा की ओर देख रहा हो।

एक प्रश्न, और ऋषि की मुसकान

तब राम मुनि से कहते हैं, “हे प्रभु, आपसे कुछ छिपाव नहीं है। मैं जिस कारण से आया हूँ, वह आप जानते हैं। इसीलिये, हे तात, मैंने समझाकर नहीं कहा।”

फिर वे कहते हैं, “हे प्रभु, अब आप मुझे वह मन्त्र दीजिये जिससे मैं मुनियों के द्रोहियों को मारूँ।” टीका मन्त्र का अर्थ सलाह बताती है।

राम की वाणी सुनकर अगस्त्य मुसकराते हैं, और कहते हैं, “हे नाथ, आपने मुझे क्या समझकर पूछा है?”

वे कहते हैं, “मैं आपके ही भजन के प्रभाव से आपकी कुछ थोड़ी-सी महिमा जानता हूँ।”

अगस्त्य कहते हैं कि आपकी माया गूलर का विशाल वृक्ष है, और अनेक ब्रह्माण्डों के समूह उसके फल हैं। चर और अचर जीव उन फलों के भीतर जन्तुओं की तरह बसते हैं, और दूसरा कुछ नहीं जानते। टीका उन जन्तुओं को गूलर के फल के भीतर रहनेवाले छोटे-छोटे जन्तु पढ़ती है। ऋषि आगे कहते हैं कि उन फलों को खानेवाला कठिन और कराल काल है। और वह काल भी सदा आपसे डरता रहता है।

अगस्त्य कहते हैं, “आप समस्त लोकपालों के स्वामी हैं, और आपने मुझसे मनुष्य की तरह प्रश्न किया। हे कृपा के धाम, मैं यह वर माँगता हूँ कि आप श्री और छोटे भाई के साथ मेरे हृदय में निवास करें।” टीका श्री को सीता पढ़ती है।

और वे माँगते हैं: प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, सत्संग, और चरणों में अटूट प्रेम। फिर अगस्त्य कहते हैं, “आप अखण्ड और अनन्त ब्रह्म हैं, अनुभव से जाने जाते हैं, और संत आपको भजते हैं। यद्यपि मैं आपके ऐसे रूप का वर्णन करता हूँ और उसे जानता हूँ, फिर भी लौट-लौटकर मैं सगुण ब्रह्म में प्रेम मानता हूँ।”

फिर अगस्त्य कहते हैं: “आप सेवकों को सदा बड़ाई दिया करते हैं, इसीलिये आपने मुझसे पूछा है।”

पंचवटी का पता

ऋषि कहते हैं, “हे प्रभु, एक परम मनोहर और पवित्र स्थान है, उसका नाम पंचवटी है।”

वे कहते हैं, “हे प्रभु, दण्डकवन को पवित्र कीजिये, और श्रेष्ठ मुनि के उग्र शाप को हर लीजिये।” पोद्दार की टीका उस मुनि को गौतम बताती है। अगस्त्य आगे कहते हैं, “वहाँ निवास कीजिये, और सब मुनियों पर दया कीजिये।”

आज्ञा मिलते ही राम चल देते हैं और शीघ्र ही पंचवटी के निकट पहुँच जाते हैं। वहाँ गीधराज से भेंट हुई, बहुत प्रकार से प्रीति बढ़ी, और राम गोदावरी के समीप पत्तों का घर छाकर रहने लगे। टीका गीधराज का नाम जटायु बताती है।

गोदावरी के किनारे वह कुटी

जब से राम ने वहाँ निवास किया, मुनि सुखी हो गये और उनका डर जाता रहा।

पर्वत, वन, नदी और तालाब शोभा से छा गये, और दिनोंदिन अधिक सुहावने होने लगे। पक्षियों और पशुओं के समूह आनन्दित रहते हैं, और भौंरे मधुर गुंजार करते हैं।

लक्ष्मण की बात

एक बार राम सुख से बैठे थे, और लक्ष्मण ने छल से रहित वचन कहे।

लक्ष्मण राम को देवता, मनुष्य, मुनि और चराचर के स्वामी कहकर पुकारते हैं। वे कहते हैं, “मैं आपसे अपने प्रभु की तरह पूछता हूँ।”

लक्ष्मण कहते हैं, “हे देव, मुझे समझाकर वही कहिये जिससे सब छोड़कर मैं आपकी चरणरज की ही सेवा करूँ।”

फिर वे विषय गिनाते हैं: ज्ञान कहिये, वैराग्य कहिये, माया कहिये, और वह भक्ति कहिये जिसके कारण आप दया करते हैं।

अन्त में वे पूछते हैं, “हे प्रभु, ईश्वर और जीव का सब भेद समझाकर कहिये, जिससे आपके चरणों में मेरी प्रीति हो, और शोक, मोह और भ्रम नष्ट हो जायें।”

माया, और उसके दो रूप

राम कहते हैं, “हे तात, थोड़े ही में सब समझाकर कहे देता हूँ। बुद्धि, मन और चित्त लगाकर सुनिये।”

राम कहते हैं, “मैं और मेरा, आपका और आप, यही माया है, जिसने समस्त जीवों को वश में कर रखा है। हे भाई, इन्द्रियों के विषय, और जहाँ तक मन जाता है, उस सबको माया जानना।”

माया के दो भेद हैं, विद्या और अविद्या। एक दुष्ट है और अत्यन्त दुःखरूप है, जिसके वश होकर जीव संसार रूपी कुएँ में पड़ा है। टीका इसे अविद्या बताती है। एक वह है जिसके वश में गुण हैं और जो जगत् की रचना करती है। टीका इसे विद्या बताती है। वह प्रभु से प्रेरित होती है, उसका अपना कोई बल नहीं।

राम कहते हैं, “ज्ञान वह है जहाँ मान आदि एक भी नहीं, और जो सबमें समान रूप से ब्रह्म को देखता है। हे तात, परम विरागी उसे कहना चाहिये जो सिद्धियों को और तीनों गुणों को तिनके के समान त्याग चुका हो।”

जो माया को, ईश्वर को और अपने स्वरूप को नहीं जानता, उसे जीव कहना चाहिये। ईश्वर वह है जो बन्धन और मोक्ष देनेवाला है, सबसे परे है, और माया का प्रेरक है।

भक्ति, जो स्वतन्त्र है

राम कहते हैं कि धर्म से वैराग्य होता है, योग से ज्ञान, और ज्ञान मोक्ष देता है, ऐसा वेदों ने कहा है।

फिर वे कहते हैं, “हे भाई, जिससे मैं शीघ्र ही द्रवित हो जाता हूँ, वह मेरी भक्ति है, जो भक्तों को सुख देनेवाली है।”

वह भक्ति स्वतन्त्र है, उसे किसी दूसरे साधन का सहारा नहीं चाहिये। ज्ञान और विज्ञान उसके अधीन हैं। भक्ति अनुपम है और सुख की जड़ है, और वह तभी मिलती है जब संत अनुकूल हों।

राम कहते हैं, “मैं भक्ति के साधन कहता हूँ। यह सुगम मार्ग है, इससे जीव मुझे पा जाते हैं।” वे कहते हैं कि पहले ब्राह्मणों के चरणों में अत्यन्त प्रीति हो, और वेद की रीति से सब अपने-अपने कर्म में लगे रहें। इसका फल है विषयों से वैराग्य। तब राम के धर्म में प्रेम उपजता है, जिसे टीका भागवत धर्म कहती है। तब श्रवण आदि नौ प्रकार की भक्तियाँ दृढ़ होती हैं, और मन में राम की लीलाओं के प्रति अत्यन्त प्रेम होता है।

फिर संतों के चरणों में अत्यन्त प्रेम हो। मन, वचन और कर्म से भजन का दृढ़ नियम हो। और जो राम को ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता, सब कुछ जाने और सेवा में दृढ़ हो।

राम कहते हैं, “मेरे गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाय, वाणी गद्गद हो जाय और नेत्रों से जल बहने लगे।”

और जिसमें काम आदि, मद और दम्भ न हों। और राम कहते हैं: “हे भाई, मैं सदा उसके वश में रहता हूँ।”

जिनको वचन, कर्म और मन से राम की गति है, और जो निष्काम भाव से भजन करते हैं, उनके हृदय-कमल में वे सदा विश्राम करते हैं।

दो प्रश्न

आश्रम से कुटी तक दो प्रश्न पूछे गये। पहला राम ने अगस्त्य के आश्रम में पूछा, और ऋषि ने अपना वर माँगकर पंचवटी का पता दिया। दूसरा लक्ष्मण ने गोदावरी के किनारे की कुटी में पूछा। उसके उत्तर में राम ने माया, ज्ञान, वैराग्य, जीव, ईश्वर और भक्ति का भेद समझाया।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा 12 से 16, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।