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रामचरितमानसअरण्यकाण्डप्रसंग 8
राम का विलाप और जटायु का गमन
गोदावरी के तट पर आश्रम सूना मिलता है। राम लताओं, पेड़ों, पक्षियों और पशुओं से सीता का पता पूछते चलते हैं। आगे पड़ा हुआ घायल जटायु बताता है कि रावण सीता को लेकर दक्षिण दिशा को गया है।
पिछला प्रसंग सीता-हरण पर बन्द हुआ था। उसके बाद गीताप्रेस की पोथी में विश्राम का एक चिह्न पड़ता है। जिस ढंग से राम कपटमृग के पीछे दौड़ चले थे, वही छवि हृदय में रखकर सीता हरि का नाम रटती रहती हैं। टीका इसे रामनाम बताती है।
दो भाई गोदावरी के तट पर उसी आश्रम तक पहुँचते हैं जिसे छोड़कर गये थे, और उसे सूना पाते हैं। वे लताओं से, पेड़ों से, पक्षियों से और भौंरों की पाँतों से पूछते फिरते हैं। फिर आगे एक पक्षी पड़ा मिलता है जिसके पंख कटे हैं। वह बताता है कि क्या हुआ और किस दिशा में। फिर वह जाता है, और जाने से पहले एक वर माँगता है। अन्त में उसकी क्रिया राम अपने हाथों से करते हैं।
दो भाई, एक घायल पक्षी
- राम जो सीता को खोजते और विलाप करते हैं। फिर वे एक घायल पक्षी के सिर पर हाथ रखते हैं, और अन्त में उसकी क्रिया अपने हाथों से करते हैं।
- लक्ष्मण छोटे भाई, जो आश्रम से अकेले लौटते हुए मिलते हैं, उलाहना सुनते हैं। वे चरण पकड़कर और हाथ जोड़कर कहते हैं कि उनका कुछ भी दोष नहीं। फिर वे राम को बहुत प्रकार से समझाते हैं।
- सीता जो हृदय में कपटमृग के पीछे दौड़ते राम की छवि रखकर हरि का नाम रटती रहती हैं। इसके बाद वे पुकारी और खोजी जाती हैं, और जटायु के वचन में दक्षिण दिशा की ओर ले जायी जाती हुई, कुररी की तरह विलाप करती हुई दिखती हैं।
- जटायु गीधों का राजा, जो कटे पंखों के साथ आगे पड़ा है और राम के चरणों का स्मरण कर रहा है।
- रावण जिसका नाम जटायु और राम के वचनों में आता है।
- पिता जिन तक सीता-हरण का समाचार न पहुँचाने को राम जटायु से कहते हैं।
बाहर की चिन्ता
लक्ष्मण को आते देखकर राम ने बाहर से बहुत चिन्ता की। “हे भाई, आपने सीता को अकेली छोड़ दिया, और मेरी आज्ञा ठेलकर यहाँ चले आये।”
राम कहते हैं, “राक्षसों के झुंड वन में फिरते रहते हैं, और मेरे मन में आता है कि सीता आश्रम में नहीं है।” लक्ष्मण ने चरण पकड़कर और हाथ जोड़कर कहा, “हे नाथ, मेरा कुछ भी दोष नहीं है।”
गोदावरी के तट पर वह आश्रम
लक्ष्मण के साथ राम वहाँ गये जहाँ गोदावरी के तट पर आश्रम था। आश्रम को सीता से रहित देखकर राम साधारण मनुष्य की भाँति व्याकुल और दीन हो गये।
हा गुणों की खान सीता
टीका के अनुसार राम विलाप करने लगे, “हा गुणों की खान सीता! हा रूप, शील, व्रत और नियम में पवित्र सीता!”
लक्ष्मण ने बहुत प्रकार से समझाया। राम लताओं और वृक्षों की पाँतों से पूछते हुए चल पड़ते हैं।
हे पक्षियो, हे पशुओ
राम पुकारते हैं: हे पक्षियो, हे पशुओ, हे भौंरों की पाँतो, क्या आपने मृगनयनी सीता को देखा है? खंजन, तोता, कबूतर, हिरन, मछली, भौंरों का समूह और प्रवीण कोयल।
फिर कुन्द की कली, अनार, बिजली, कमल, शरद का चन्द्रमा, नागिन, वरुण का पाश, कामदेव का धनुष, हंस, गज और सिंह। ये सब अपनी प्रशंसा सुन रहे हैं।
सीता के बिना आज
बेल, सोना और केला हर्षित हो रहे हैं, और इनके मन में तनिक भी शङ्का या संकोच नहीं। राम कहते हैं, सुनिये सीता, आपके बिना आज ये सब ऐसे हर्षित हैं मानो सबने राज पा लिया हो। टीका के अनुसार सीता के अंगों के सामने ये सब तुच्छ, अपमानित और लज्जित रहते थे। उसके अनुसार आज उन्हें न देखकर ये अपनी शोभा के अभिमान में फूल रहे हैं। राम पूछते हैं कि यह अनख आपसे सही कैसे जाती है, जिसे टीका स्पर्धा बताती है। हे प्रिये, आप शीघ्र प्रकट क्यों नहीं हो जातीं?
इस प्रकार राम खोजते और विलाप करते थे, मानो कोई महाविरही और अत्यन्त कामी हो।
आगे पड़ा हुआ गीधराज
पूर्णकाम, आनन्द की राशि, अजन्मा और अविनाशी राम मनुष्यों के से चरित्र कर रहे हैं। आगे राम ने जटायु को पड़ा देखा, जो राम के उन चरणों का स्मरण कर रहा था जिनमें रेखाएँ हैं। टीका इन रेखाओं को ध्वजा, कुलिश आदि की बताती है।
राम ने अपने हाथ से उसके सिर का स्पर्श किया। राम का मुख देखकर उसकी सारी पीड़ा जाती रही।
धीरज धरकर गीध ने कहा
तब धीरज धरकर गीध ने कहा, “हे भव के भय का नाश करनेवाले राम, सुनिये। हे नाथ, मेरी यह दशा रावण ने की है। उस दुष्ट ने सीता को हर लिया है।”
वह बताता है कि रावण उन्हें लेकर दक्षिण दिशा को गया है। वह यह भी बताता है कि सीता कुररी की तरह अत्यन्त विलाप कर रही थीं। फिर वह कहता है, “हे प्रभु, मैंने आपके दर्शन के लिये प्राण रोक रखे थे। अब ये चलना चाहते हैं।”
देह किस कमी के लिये रखूँ
राम कहते हैं, हे तात, शरीर को बनाये रखिये। उसने मुसकराकर बात कही।
“वेद गाते हैं कि मरते समय जिनका नाम मुख में आ जाये, उससे अधम भी मुक्त हो जाता है।”
“वही आप मेरी आँखों के सामने खड़े हैं। हे नाथ, अब देह किस कमी के लिये रखूँ?”
नेत्रों में जल भरकर राम कहते हैं, हे तात, आपने अपने कर्मों से यह गति पायी है।
जिनके मन में दूसरे का हित बसा है
राम कहते हैं कि जिनके मन में दूसरे का हित बसा है, उनके लिये जगत् में कुछ भी दुर्लभ नहीं। फिर वे कहते हैं, “हे तात, शरीर छोड़कर मेरे धाम जाइये। मैं आपको क्या दूँ? आप तो पूर्णकाम हैं।”
राम कहते हैं: “हे तात, सीता-हरण की बात जाकर पिता से न कहियेगा। यदि मैं राम हूँ, तो रावण कुटुम्ब सहित आकर कहेगा।”
गीध का देह, और भगवान् का रूप
गीध का देह छोड़कर जटायु ने भगवान् का रूप धारण किया: बहुत से अनुपम आभूषण और पीताम्बर, साँवला शरीर, विशाल चार भुजाएँ। नेत्रों में जल भरकर वह स्तुति कर रहा है।
जटायु राम की जय बोलता है: आपका रूप अनुपम है, आप निर्गुण भी हैं, सगुण भी, और सचमुच गुणों के प्रेरक हैं। आप दस सिरवाले रावण की प्रचण्ड भुजाओं को खण्ड-खण्ड करने के लिये प्रचण्ड बाण धारण करते हैं, और पृथ्वी को सुशोभित करते हैं। जल भरे मेघ जैसा शरीर, कमल सा मुख, कमल जैसे बड़े नेत्र, विशाल भुजाएँ, और भव के भय से छुड़ानेवाले। वह उन कृपालु राम को नित्य नमस्कार करता है।
वह उन्हें अपरिमित बलवाले, अनादि, अजन्मा, अव्यक्त, एक, अगोचर और गोविन्द कहता है। वे इन्द्रियों से परे हैं, द्वन्द्वों को हरनेवाले, विज्ञान की घनमूर्ति और पृथ्वी के आधार। राम-मन्त्र जपनेवाले संतों के मन को वे आनन्द देते हैं, और काम आदि दुष्टों के दल का नाश करते हैं। श्रुतियाँ उन्हें ब्रह्म, व्यापक और निर्विकार कहकर गाती हैं, और मुनि ध्यान, ज्ञान, वैराग्य और योग से उन्हें पाते हैं। वही करुणा के कन्द और शोभा के समूह प्रकट होकर सारे जगत् को मोहित कर रहे हैं। वे उसके हृदय-कमल के भ्रमर हैं, और उनके अंग-अंग में बहुत से कामदेवों की छवि शोभा पा रही है। जिन्हें योगी बहुत साधन करके देख पाते हैं, वे तीनों लोकों के स्वामी राम सदा अपने दासों के वश में रहते हैं। अन्त में वह विनती करता है कि वही राम उसके हृदय में निवास करें, जिनकी पवित्र कीर्ति आवागमन मिटा देती है।
अपने हाथों से
अखण्ड भक्ति का वर माँगकर जटायु भगवान् के धाम को चला गया। उसकी क्रिया, जैसी उचित थी वैसी, राम ने अपने हाथों से की। टीका इसे दाहकर्म आदि सारी क्रियाएँ बताती है।
विलाप, और जटायु का गमन
सीता हृदय में राम की वही छवि रखकर हरि का नाम रटती रहती हैं। लक्ष्मण को अकेले आते देखकर राम बाहर से बहुत चिन्ता करते हैं, और आश्रम को सूना पाकर व्याकुल हो जाते हैं। वे लताओं, पेड़ों, पक्षियों और भौंरों से सीता का पता पूछते चलते हैं। आगे पड़ा हुआ घायल जटायु बताता है कि रावण सीता को लेकर दक्षिण दिशा को गया है। वह पूछता है कि देह किस कमी के लिये रखे। फिर भगवान् का रूप धरकर वह स्तुति करता है, और अखण्ड भक्ति का वर माँगकर भगवान् के धाम जाता है। उसकी क्रिया राम अपने हाथों से करते हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा 29 (ख) से 32, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।