रामचरितमानस · अरण्यकाण्ड · राम का विलाप और जटायु का गमन
राम का विलाप और जटायु का गमन
एक आश्रम खाली मिलता है, और उसके बाद पाँच चौपाइयाँ ऐसी आती हैं जिनमें कोई देवता नहीं बोलता। आगे रास्ते में एक घायल पक्षी पड़ा है, और सारी खोज के काम का एक ही शब्द उसी के मुँह से निकलता है।
पिछला प्रसंग सीताहरण पर बन्द हुआ था। उसके बाद गीताप्रेस की पोथी में विश्राम का एक चिह्न पड़ता है, और उसके साथ एक दोहा, जिसमें कथा एक क्षण के लिये उन्हीं के पास ठहर जाती है जिन्हें हर लिया गया है। जिस ढंग से कपटमृग के पीछे श्रीराम दौड़ चले थे, वही छवि हृदय में रखकर वे हरि का नाम रटती रहती हैं। यही उनकी आखिरी झलक है। इसके बाद पूरा पन्ना वहाँ चला जाता है जहाँ वे नहीं हैं, और उनके न होने से ही बनता है।
इस पन्ने पर तीन दोहे हैं, तीस, इकतीस और बत्तीस, और उनके बीच जो होता है वह इतना है। दो भाई गोदावरी के तट पर उसी कुटी तक पहुँचते हैं जिसे वे छोड़कर गये थे और उसे सूना पाते हैं। बड़े भाई का विलाप वहीं से उठता है और पाँच चौपाइयों तक चलता है, जिनमें वे लताओं से, पेड़ों से, पक्षियों से और भौंरों की पाँतों से पूछते फिरते हैं। फिर आगे रास्ते में एक पक्षी पड़ा मिलता है जिसके पंख कटे हुए हैं। वह बताता है कि क्या हुआ और किस दिशा में हुआ। फिर वह जाता है, और जाने से पहले एक वर माँगता है। और अन्त में आधी पंक्ति में यह लिख दिया जाता है कि उसकी सारी क्रिया राम ने अपने हाथों से की।
इस पन्ने का कठिन हिस्सा वही विलाप है, और तुलसी उसे किसी और की भाषा में नहीं लिखते। वे लिखते हैं कि आश्रम को जानकी से रहित देखकर वे विकल और दीन हो गये, जस प्राकृत दीना, जैसे कोई साधारण मनुष्य होता है। वे लिखते हैं कि खोजते और विलाप करते हुए वे ऐसे जान पड़ते थे मानो कोई महाविरही और अत्यन्त कामी पुरुष हो। और इन्हीं पंक्तियों के बीच वे यह भी लिख देते हैं कि पूर्णकाम, अजन्मा और अविनाशी मनुष्य के से चरित्र कर रहे हैं। चारों बातें एक ही पन्ने पर एक साथ रखी हुई हैं, और कवि उनमें से किसी एक को हटाकर दूसरी को आसान नहीं बनाता।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम जिन्हें तुलसी इस पन्ने पर रघुपति, कृपासिंधु, रघुराई और पूरनकाम कहते हैं, और जो यहाँ पहले खोजते हैं, फिर विलाप करते हैं, फिर एक घायल पक्षी के सिर पर हाथ रखते हैं और अन्त में उसकी क्रिया अपने हाथों से करते हैं।
- लक्ष्मण छोटे भाई, जो आश्रम से अकेले लौटते हुए मिलते हैं, उलाहना सुनते हैं, चरणकमल पकड़कर इतना ही कहते हैं कि उनका कोई दोष नहीं, और फिर बहुत प्रकार से समझाते हैं, जिसका एक भी वाक्य तुलसी नहीं लिखते।
- सीता इस पूरे प्रसंग में एक बार भी सामने नहीं आतीं। वे केवल पुकारी जाती हैं और खोजी जाती हैं, और एक बार जटायु के वचन में दिखती हैं, दक्षिण दिशा की ओर ले जायी जाती हुई और कुररी की तरह विलाप करती हुई।
- जटायु गीधों का राजा, जिसे इस पन्ने की चौपाइयाँ गीध, गीधपति और खग कहती हैं और जिसका नाम पोद्दार की टीका में आता है। कटे पंखों के साथ रास्ते में पड़ा है और राम के चरणों का स्मरण कर रहा है।
- रावण इस पन्ने पर तीन बार आता है, दो बार दसानन और एक बार दससीस, और तीनों बार किसी और के वाक्य के भीतर। स्वयं वह यहाँ कहीं नहीं आता।
- पिता दोहा इकतीस में राम जिनका ज़िक्र करते हैं और जिन तक यह समाचार न पहुँचाने को कहते हैं। तुलसी यहाँ न उनका नाम लेते हैं और न यह बताते हैं कि इस पक्षी का उनसे क्या सम्बन्ध है।
बाहर की चिन्ता
वन के रास्ते पर छोटा भाई अकेला लौटता हुआ आ रहा है। उसे दूर से आते देखकर बड़ा भाई क्या करता है, यह तुलसी एक ही पंक्ति में निपटा देते हैं, और उस पंक्ति के भीतर एक शब्द ऐसा रख देते हैं जिसे पढ़ लेने के बाद आगे का सारा पन्ना उसी शब्द के साथ पढ़ना पड़ता है।
रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी॥
चौपाई १
जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली॥
बाहिज, यानी बाह्य रूप में। टीका इसे खोलकर यही लिखती है, कि चिन्ता बाह्यरूप में की गयी। शब्द रख दिया जाता है और उसपर एक भी वाक्य खर्च नहीं किया जाता। इसके बाद उलाहना आता है और वह सीधा है। जानकी अकेली छोड़ दी गयीं, और कही हुई बात को ठेलकर वे यहाँ चले आये। ध्यान देने की बात यह है कि उलाहने के बीच में भी सम्बोधन तात है, वही शब्द, कहीं तात और कहीं ताता, जो आगे उस पक्षी के लिये चार बार आने वाला है।
और फिर वह कारण आता है जिससे चिन्ता चिन्ता बनती है। यह कारण कोई शकुन नहीं है और कोई देववाणी नहीं है। यह उस आदमी का अनुमान है जो वन को जानता है।
निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं । मम मन सीता आश्रम नाहीं॥
चौपाई २
गहि पद कमल अनुज कर जोरी । कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी॥
राक्षसों के झुंड वन में फिरते रहते हैं, और मेरे मन में आता है कि सीता आश्रम में नहीं है। कहने का ढंग देखने लायक है, मम मन, मेरे मन में ऐसा आता है। उत्तर में लक्ष्मण चरणकमल पकड़ते हैं, हाथ जोड़ते हैं, और पूरी बात एक टुकड़े में कह देते हैं, कि हे नाथ, मेरा कुछ भी दोष नहीं है। वे आश्रम से क्यों निकले थे, इसका कोई कारण इस पन्ने पर नहीं गिनाया जाता। न सफ़ाई दी जाती है, न बहस होती है।
और बड़े भाई इस उत्तर पर कुछ नहीं कहते। न मानते हैं, न नहीं मानते। अगली ही पंक्ति में दोनों चल पड़ते हैं। तुलसी का ढंग यही है। जहाँ बात का कोई काम नहीं बचता वहाँ वे बात रखते ही नहीं, और पढ़नेवाले को सीधे उस जगह पर ले जाते हैं जहाँ आँखों से कुछ देखा जाना है।
सार: लक्ष्मण को अकेला आते देखकर राम बाह्यरूप से बहुत चिन्ता करते हैं और उलाहना देते हैं कि जानकी अकेली छोड़ दी गयीं और आज्ञा ठेल दी गयी। वे कहते हैं कि वन में राक्षसों के झुंड फिरते हैं और मन कहता है कि सीता आश्रम में नहीं है। लक्ष्मण चरण पकड़कर इतना ही कहते हैं कि उनका कोई दोष नहीं है।
गोदावरी के तट पर वह कुटी
दोनों भाई वहाँ पहुँचते हैं। जगह का पता तुलसी एक बार और लिख देते हैं, गोदावरी का तट, मानो पढ़नेवाले को उस कुटी की जगह ठीक-ठीक याद दिला देनी हो, क्योंकि आगे उसी जगह का खालीपन पूरा पन्ना घेरने वाला है।
अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ । गोदावरि तट आश्रम जहवाँ॥
चौपाई ३
आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना॥
यहाँ वह आधी पंक्ति आती है जिससे आगे का सब कुछ निकलता है। आश्रम को जानकी से रहित देखकर वे विकल हो गये, जस प्राकृत दीना। टीका इसे इस तरह खोलती है, साधारण मनुष्य की भाँति व्याकुल और दीन। जस, यानी जैसे। तुलसी उपमा का शब्द रखते हैं और फिर उस उपमा के पीछे छिपते नहीं। जो आगे लिखा जाना है वह पूरा लिखा जायेगा, और एक भी शब्द वापस नहीं लिया जायेगा।
और देखिये कि क्या नहीं लिखा गया। कुटी कैसी दिखी, क्या बिखरा हुआ था, कहाँ कौन सी चीज़ पड़ी थी, इसका एक शब्द नहीं है। तुलसी दृश्य नहीं बनाते। वे केवल एक अभाव लिखते हैं, जानकी हीना, और उसके तुरन्त बाद उस अभाव का असर लिखते हैं। कुटी का ब्योरा देने से जो बनता, वह इस दो शब्दों से बड़ा नहीं बनता।
सार: लक्ष्मण सहित प्रभु गोदावरी के तट पर उसी आश्रम में पहुँचते हैं, और उसे जानकी से रहित देखकर विकल और दीन हो जाते हैं, जैसे कोई साधारण मनुष्य होता है।
हा गुन खानि जानकी सीता
विलाप की पहली पुकार में नाम है और नाम के साथ चार शब्द हैं। इन चार शब्दों में एक भी शब्द रूप के बाहर का नहीं छोड़ा गया और एक भी शब्द केवल रूप का नहीं है।
हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता॥
चौपाई ४
लछिमन समुझाए बहु भाँती। पूछत चले लता तरु पाँती॥
गुणों की खान जानकी, और रूप, शील, व्रत तथा नियम में पवित्र सीता। पहले गुणों की खान कहा गया, फिर चार वस्तुएँ गिनायी गयीं, और उन चारों में रूप सबसे पहले है और अकेला नहीं है। जो खो गया है वह देखने की कोई चीज़ भर नहीं है, यह इस आधी चौपाई में गिनती से कह दिया गया है।
इसके बाद एक पंक्ति है जिसमें बहुत कुछ चुपचाप बीत जाता है। लक्ष्मण ने बहुत प्रकार से समझाया। बहुत प्रकार से, यानी देर तक, बार-बार, अलग-अलग ढंग से। उन्होंने क्या कहा, इसका एक वाक्य भी तुलसी नहीं देते। समझाना हुआ, और काम नहीं आया, इतनी ही सूचना है। जो सान्त्वना काम कर जाती है उसे कवि लिख देता। जो काम नहीं आयी उसे वह गिनकर आधी पंक्ति देता है।
और फिर वह टुकड़ा जिससे विलाप अपनी जगह से उठकर चलने लगता है, पूछत चले लता तरु पाँती। पूछना शुरू हो जाता है, और पूछनेवाला अब खड़ा नहीं है, चल रहा है। जिनसे पूछा जा रहा है वे बेलें हैं और पेड़ों की पाँतें हैं। इस एक पंक्ति के बाद पूरा वन इस कथा में एक पात्र की तरह आ जाता है।
सार: राम हा गुणों की खान जानकी कहकर पुकारते हैं और रूप, शील, व्रत तथा नियम में पवित्र सीता कहते हैं। लक्ष्मण बहुत प्रकार से समझाते हैं, पर वे लताओं और वृक्षों की पाँतों से पूछते हुए आगे चल देते हैं।
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी
अब वह चौपाई आती है जिसे सुनकर लोग रुक जाते हैं। इसमें कोई अलंकार का बोझ नहीं है और कोई ऊँची बात नहीं है। इसमें केवल एक आदमी है जो वन में जिस किसी को देखता है उसी से एक ही प्रश्न पूछता चला जा रहा है।
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी॥
चौपाई ५
खंजन सुक कपोत मृग मीना । मधुप निकर कोकिला प्रबीना॥
हे पक्षियो, हे पशुओ, हे भौंरों की पाँतो, कहीं मृगनयनी सीता को देखा है। पहले सम्बोधन आते हैं और फिर प्रश्न आता है, और प्रश्न एक ही है। इसके बाद दूसरी पंक्ति में सूची शुरू हो जाती है, खंजन, तोता, कबूतर, हिरन, मछली, भौंरों का समूह और प्रवीण कोयल।
सूची यहीं नहीं रुकती। अगली चौपाई में वह और लम्बी होती जाती है और उसमें अब जीव ही नहीं रह जाते। कुन्द की कली, अनार, बिजली, कमल, शरद का चन्द्रमा, नागिन, वरुण का पाश, कामदेव का धनुष, हंस, गज और सिंह। इन सबके बारे में एक ही बात कही जाती है, और वही बात सूची को विलाप बना देती है, कि ये सब आज अपनी प्रशंसा सुन रहे हैं।
ये सब उपमान हैं, यानी वे चीज़ें जिनसे कवि किसी का रूप मिलाकर दिखाता है। और उपमा में हार हमेशा उपमान की होती है, क्योंकि तुलना उसी को नीचा दिखाने के लिये की जाती है। टीका इस बात को सीधे कह देती है, कि इनके अंगों के सामने ये सब तुच्छ, अपमानित और लज्जित रहते थे, और आज न देखकर ये अपनी शोभा के अभिमान में फूल रहे हैं। जिस वन से सहायता माँगी जा रही है, वही वन इस समय अपनी जीत मना रहा है।
सार: राम पक्षियों, पशुओं और भौंरों की पाँतों से पूछते हैं कि क्या मृगनयनी सीता को देखा है, और फिर एक लम्बी सूची गिनाते हैं, खंजन से लेकर गज और सिंह तक, जिनके बारे में वे कहते हैं कि ये सब आज अपनी प्रशंसा सुन रहे हैं।
सुनु जानकी, तोहि बिनु आजू
सूची का अन्त तीन ऐसी चीज़ों पर होता है जो एक साथ रखी जाने पर ही समझ में आती हैं, एक फल, एक धातु और एक पौधा। तीनों उपमान हैं, और तीनों के बारे में एक ही शिकायत है।
श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं । नेकु न संक सकुच मन माहीं॥
चौपाई ६
सुनु जानकी तोहि बिनु आजू । हरषे सकल पाइ जनु राजू॥
श्रीफल यानी बेल, कनक यानी सोना, कदलि यानी केला। ये हर्षित हो रहे हैं और इनके मन में न ज़रा शङ्का है, न ज़रा संकोच। नेकु, यानी तनिक भी। और फिर वह आधी पंक्ति आती है जिसमें पूरा विलाप एक वाक्य में बँध जाता है, कि सुनो जानकी, आपके बिना आज ये सब ऐसे हर्षित हैं मानो सबने राज पा लिया हो। राज पा जाना, यह बहुत बड़ा शब्द है और वह एक फल और एक धातु के लिये खर्च किया जा रहा है।
और इसके बाद वह पंक्ति आती है जिसमें विरह की चाल पूरी तरह खुल जाती है। जो सामने नहीं है उससे झगड़ा किया जा रहा है, और झगड़े में उसी का पक्ष लिया जा रहा है।
किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं॥
चौपाई ७
एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी । मनहु महा बिरही अति कामी॥
यह अनख आपसे सही कैसे जाती है। टीका अनख को स्पर्धा कहती है, वह जलन जो अपने सामने किसी और की बड़ाई सुनकर होती है। तर्क यह है कि जो इतने दिन आपके सामने नीचे थे वे आज फूल रहे हैं, यह आपसे बर्दाश्त कैसे हो रहा है, हे प्रिये, प्रकट क्यों नहीं हो जातीं। जो नहीं है उसे बाहर बुलाने का इससे नरम बहाना कोई नहीं बना सकता था।
और उसी चौपाई की दूसरी पंक्ति में कवि स्वयं बोलता है। इस प्रकार खोजते और विलाप करते हुए स्वामी ऐसे जान पड़ते थे मनहु, यानी मानो, कोई महाविरही और अत्यन्त कामी पुरुष हो। शब्द नरम नहीं किये गये हैं। महाविरही और अति कामी, दोनों कड़े शब्द हैं और दोनों वहीं छोड़ दिये गये हैं जहाँ वे पड़े हैं।
सार: बेल, सोना और केला भी बिना संकोच हर्षित हैं, और राम कहते हैं कि आपके बिना आज ये सब ऐसे प्रसन्न हैं मानो राज पा गये हों। वे पूछते हैं कि यह स्पर्धा सही कैसे जाती है और प्रकट क्यों नहीं होतीं। तुलसी लिखते हैं कि खोजते और विलाप करते हुए स्वामी ऐसे लगते थे मानो कोई महाविरही और अत्यन्त कामी पुरुष हो।
आगे पड़ा हुआ गीधपति
अगली चौपाई की पहली पंक्ति में तुलसी वह सब गिना देते हैं जो अभी-अभी लिखी गयी पाँच चौपाइयों में कहीं नहीं दिख रहा था, और फिर उसी साँस में उसे मनुष्य के चरित्र के साथ जोड़ देते हैं। दोनों बातें एक ही पंक्ति में हैं, और उनके बीच में कोई पुल नहीं बनाया जाता।
पूरनकाम राम सुख रासी। मनुजचरित कर अज अबिनासी॥
चौपाई ८
आगें परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा॥
पूर्णकाम, आनन्द की राशि, अजन्मा और अविनाशी, और यही मनुष्यों के से चरित्र कर रहे हैं। इतना कहकर कवि दूसरी पंक्ति में आगे बढ़ जाता है, और वहाँ पहली बार कुछ ऐसा मिलता है जो पेड़ नहीं है। आगे जाने पर उन्होंने गीधपति को पड़ा हुआ देखा, और वह राम के उन्हीं चरणों का स्मरण कर रहा था जिनमें चिह्न हैं। टीका बताती है कि ये चिह्न ध्वजा और कुलिश जैसे हैं।
इस पंक्ति का क्रम देखिये। पहले वह पड़ा हुआ दिखता है, फिर पता चलता है कि वह क्या कर रहा है। खोज में निकले हुए आदमी को रास्ते में जो पहली चीज़ मिलती है वह समाचार नहीं है, एक घायल शरीर है। और वह शरीर इस समय भी उन्हीं को याद कर रहा है जो उसके सामने आकर खड़े होने वाले हैं।
और अब वह दोहा आता है जिसपर यह पूरा पन्ना टिका हुआ है।
कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रघुबीर।
दोहा ३०
निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर॥ ३०॥
कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता। कुछ पूछा जा सकता था, बहुत कुछ पूछा जाना चाहिये था, पर पहला काम हाथ का है। कृपासागर रघुवीर ने अपने करकमल से उसके सिर का स्पर्श किया। और दूसरी पंक्ति उसका फल बताती है, शोभा के धाम राम का मुख देखकर उसकी सारी पीड़ा जाती रही। कटे पंखों की पीड़ा, गिरने की पीड़ा, सब। जिस आदमी को अपनी खोज का एक भी सूत्र नहीं मिला है, वह पहले एक और के दर्द को उतारता है।
यह उस हाथ का पहला काम है। इसी पन्ने पर उसका दूसरा काम अन्तिम दोहे में आयेगा, और दोनों के बीच में जो कुछ है वह इन्हीं दो स्पर्शों के बीच में है।
सार: तुलसी लिखते हैं कि पूर्णकाम, अजन्मा और अविनाशी राम मनुष्यों के से चरित्र कर रहे हैं, और तभी आगे उन्हें गीधपति पड़ा हुआ दिखता है, जो उनके चरणों का स्मरण कर रहा है। राम अपने करकमल से उसके सिर का स्पर्श करते हैं और उनका मुख देखते ही उसकी सारी पीड़ा जाती रहती है।
धीरज धरकर गीध ने कहा
बोलने के लिये भी बल चाहिये, और वह बल इस समय उसके पास नहीं है। इसलिये तुलसी बोलने से पहले एक क्रिया और रखते हैं, धीरज धरना। पहले धीरज, फिर वचन।
तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा॥
चौपाई ९
नाथ दसानन यह गति कीन्ही । तेहिं खल जनकसुता हरि लीन्ही॥
सम्बोधन पहले आता है, हे भव के भय का नाश करनेवाले राम, सुनिये। फिर दो सूचनाएँ एक के बाद एक आती हैं, और उनका क्रम ही उनका प्रमाण है। हे नाथ, यह दशा रावण ने की है। उसी दुष्ट ने जानकी को हर लिया है। अपनी दशा वह पहले इसलिये कहता है कि वही उसकी गवाही है। जिसने यह किया वह कौन था, इसका सबूत उसके अपने शरीर पर लिखा हुआ है।
और फिर वह आधी पंक्ति आती है जिसके लिये यह सारी खोज हो रही थी।
लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाईं । बिलपति अति कुररी की नाईं॥
चौपाई १०
दरस लागि प्रभु राखेउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना॥
लै दच्छिन दिसि गयउ। वह उन्हें लेकर दक्षिण दिशा को गया है। पूरे पन्ने पर काम की बात यही एक है। लताओं से पूछने पर कुछ नहीं मिला, पेड़ों से नहीं मिला, पक्षियों और भौंरों से नहीं मिला। जो मिला वह एक मरते हुए पक्षी से मिला, और वह एक दिशा है। आगे की सारी कथा इसी एक शब्द के सहारे चलेगी।
उसके साथ वह एक बात और देता है, जो समाचार नहीं है, गवाही है। वे कुररी की तरह अत्यन्त विलाप कर रही थीं। और फिर वह अपनी ओर आता है। हे प्रभो, मैंने आपके दर्शन के लिये ही प्राण रोक रखे थे, और हे कृपानिधान, अब ये चलना ही चाहते हैं। प्राणों के बारे में यह कहने का ढंग देखिये, जैसे कोई मेहमान उठने को हो और रोका न जा सके।
सार: धीरज धरकर गीध कहता है कि यह दशा रावण ने की और उसी ने जानकी को हरा। वह बताता है कि वह उन्हें लेकर दक्षिण दिशा को गया और वे कुररी की तरह विलाप कर रही थीं, और कहता है कि उसने दर्शन के लिये ही प्राण रोक रखे थे, जो अब चलना चाहते हैं।
देह किस कमी के लिये रखूँ
इस पर जो उत्तर आता है वह आज्ञा जैसा है और अनुरोध जैसा भी। और उसके बाद जो होता है वह इस पन्ने की सबसे अनोखी चीज़ है।
राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसुकाइ कही तेहिं बाता॥
चौपाई ११
जा कर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होइ श्रुति गावा॥
हे तात, शरीर को बनाये रखिये। वही शब्द फिर आया, तात, जो पहली चौपाई में छोटे भाई के लिये आया था और अब इस पक्षी के लिये आ रहा है। और उत्तर में जो पहली चीज़ आती है वह वचन नहीं है, मुसकान है। मुँह मुसकराकर उसने यह बात कही। कटे पंखों के साथ पड़ा हुआ एक पक्षी, और उसकी मुसकान।
फिर वह जो कहता है, वह मना करने का सबसे विनम्र ढंग है, क्योंकि उसमें मना किसी और के मुँह से कराया जाता है। वेद गाते हैं कि मरते समय जिनका नाम मुख में आ जाये, उससे अधम भी मुक्त हो जाता है।
सो मम लोचन गोचर आगें । राखौं देह नाथ केहि खाँगें॥
चौपाई १२
जल भरि नयन कहहिं रघुराई । तात कर्म निज तें गति पाई॥
वही आँखों के सामने खड़ा है। तब हे नाथ, अब देह किस कमी को पूरा करने के लिये रखूँ। केहि खाँगें, यानी किस कमी के लिये। श्रुति जिस अन्तिम घड़ी की बात करती है वह घड़ी आ चुकी है और उसमें नाम भर नहीं, नाम वाला स्वयं सामने है। इसके आगे जीने के लिये कोई कारण बचता नहीं, और यह बात उसने अपने मुँह से नहीं, वेद के मुँह से कहलवा दी।
इसका उत्तर नहीं है, और राम उसे देते भी नहीं। वे रोकते नहीं। उनके पास जो बचता है वह दूसरी पंक्ति में है, नेत्रों में जल भरकर रघुनाथजी कहने लगे। और जो कहते हैं वह प्रशंसा है, हे तात, आपने अपने कर्मों से यह गति पायी है। जिसे रोका नहीं जा सकता उसे विदा दी जा रही है, और विदा में उसका किया हुआ उसे लौटाया जा रहा है।
सार: राम कहते हैं कि शरीर बनाये रखिये, और गीध मुसकराकर उत्तर देता है कि श्रुति कहती है मरते समय जिनका नाम मुख में आ जाये उससे अधम भी मुक्त हो जाता है, और वही सामने खड़े हैं, तो अब देह किस कमी के लिये रखे। नेत्रों में जल भरकर राम कहते हैं कि यह गति आपने अपने कर्मों से पायी है।
परहित बस जिन्ह के मन माहीं
और यहाँ वह पंक्ति आती है जो इस प्रसंग से निकलकर अलग चलने लगी है और जिसे लोग बिना प्रसंग के भी कहते हैं। वह इस पक्षी के लिये कही गयी थी, और इसी घड़ी में कही गयी थी।
परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥
चौपाई १३
तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा॥
जिनके मन में दूसरे का हित बसा हुआ है, उनके लिये जगत् में कुछ भी दुर्लभ नहीं है। यह उपदेश की तरह नहीं, प्रमाणपत्र की तरह कहा गया है, और जिसे दिया जा रहा है वह सामने पड़ा हुआ है। राम उसके किये को परहित कहते हैं, दूसरे का हित, और उसी से मिली गति को दुर्लभ नहीं मानते। इसके बाद विदा दी जाती है, हे तात, शरीर छोड़कर मेरे धाम जाइये, और फिर वह प्रश्न पूछा जाता है जो देनेवाला ही पूछ सकता है, मैं आपको क्या दूँ, आप तो पूर्णकाम हैं।
पूरनकाम। यह शब्द इसी पन्ने पर कुछ ही चौपाई पहले आ चुका है, और वहाँ वह राम के लिये आया था। अब वही शब्द राम के मुँह से उस पक्षी के लिये निकल रहा है जिसकी देह छूट रही है। कवि ने वह शब्द पहले खोजनेवाले के लिये लिखा और फिर उसे मरनेवाले को दे दिया, और इस देने की कहीं कोई घोषणा नहीं की।
इसके बाद दोहा आता है, और दोहे में दो काम एक साथ होते हैं।
सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ।
दोहा ३१
जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ॥ ३१॥
पहला काम यह है कि हे तात, सीताहरण की बात जाकर पिता से न कहियेगा। यह दया है और अपनी ओर से कही जा रही है, उस आदमी के द्वारा जिसका अपना घर अभी-अभी उजड़ा है। दूसरा काम दूसरी पंक्ति में है, कि यदि मैं राम हूँ तो दसमुख कुटुम्ब सहित वहाँ आकर स्वयं कह देगा।
यह प्रतिज्ञा है, और इसकी शर्त अपने ही नाम पर रख दी गयी है। जौं मैं राम, यदि मैं राम हूँ। न कोई गर्जना, न कोई हथियार उठाया जाना, न कोई तिथि। एक मरती हुई देह के पास बैठकर धीरे से कह दी गयी बात, जिसमें आगे का पूरा लङ्काकाण्ड बँधा हुआ है। और साथ ही यह भी देखिये कि जिस समाचार को पिता तक न जाने देने की बात हो रही है, उसी समाचार को स्वयं रावण ले जायेगा, यह भी उसी वाक्य में कह दिया जाता है।
सार: राम कहते हैं कि जिनके मन में परहित बसता है उनके लिये जगत् में कुछ दुर्लभ नहीं, और शरीर छोड़कर मेरे धाम जाइये, मैं आपको क्या दूँ, आप तो पूर्णकाम हैं। फिर वे कहते हैं कि सीताहरण की बात पिता से न कहियेगा, यदि मैं राम हूँ तो दसमुख कुल सहित आकर स्वयं कहेगा।
गीध की देह, और हरि का रूप
अब वह होता है जिसकी कोई तैयारी इस पन्ने पर नहीं करायी गयी थी। देह छूटती है, और छूटते ही जो सामने आता है वह पक्षी का शरीर नहीं है।
गीध देह तजि धरि हरि रूपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा॥
चौपाई १४
स्याम गात बिसाल भुज चारी । अस्तुति करत नयन भरि बारी॥
गीध की देह छोड़कर उसने हरि का रूप धारण किया, बहुत से अनुपम आभूषण और पीताम्बर। श्याम शरीर, विशाल चार भुजाएँ। और इस सारे वैभव के बीच तुलसी आँखों की बात नहीं भूलते, नेत्रों में जल भरकर वह स्तुति कर रहा है। रूप बदल गया, आँसू वही रहे। जो अभी-अभी कटे पंखों के साथ पड़ा था, वही अब चार भुजाओं के साथ खड़ा है और रो रहा है।
और यहाँ छंद आता है। मानस में छंद प्रायः वहीं आता है जहाँ चाल बदलनी हो, जहाँ चौपाई की सीधी चाल उस चीज़ को नहीं उठा पाती जो कही जा रही है।
जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही।
छंद १
दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही॥
पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं।
नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं॥
बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं । गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं॥ जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं। नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं॥ २॥
जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं। करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं॥॥ ३॥
जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा। पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा॥॥ ४॥
हे राम, आपकी जय हो, आपका रूप अनुपम है, आप निर्गुण हैं, सगुण हैं और सचमुच गुणों के प्रेरक हैं। पाथोद गात, यानी जल भरे मेघ जैसा शरीर, कमल सा मुख, कमल जैसे बड़े नेत्र। विशाल भुजाओंवाले, भव के भय से छुड़ानेवाले उन कृपालु राम को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ।
पर स्तुति का बीच वाला हिस्सा सबसे ध्यान खींचता है। दस सिरवाले की प्रचण्ड भुजाओं को खण्ड-खण्ड करनेवाले, प्रचण्ड बाण धारण करनेवाले, पृथ्वी को सुशोभित करनेवाले। जिसने उसके पंख काटे थे, उसी की भुजाओं का टूटना वह अपनी स्तुति के बीचोंबीच रख देता है। घायल गवाह अपने अन्तिम वचन में उसी बात का नाम ले रहा है जो अभी होनी बाकी है। यह स्तुति यहाँ चार छंदों तक चलती है, और इस पन्ने पर उसका पहला छंद रखा गया है।
सार: गीध की देह छोड़कर जटायु हरि का रूप धारण करता है, श्याम शरीर, पीताम्बर और चार विशाल भुजाएँ, और नेत्रों में जल भरकर स्तुति करता है, जिसमें वह उन्हें दस सिरवाले की भुजाओं को खण्ड-खण्ड करनेवाला कहकर नमस्कार करता है।
अपने हाथों से
जिससे कुछ ही देर पहले पूछा गया था कि मैं आपको क्या दूँ, उसे अब देने का अवसर मिलता है। सामने चार भुजाओंवाला रूप है, धाम का निमन्त्रण है, और माँगने की पूरी छूट है। जो माँगा जाता है वह एक ही चीज़ है।
अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम।
दोहा ३२
तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम॥ ३२॥
अबिरल भगति, यानी अखण्ड भक्ति, जिसमें कहीं कोई रन्ध्र न पड़े। वर माँगकर गृध्रराज हरि के धाम को चला गया। पहली पंक्ति में इतना ही है, और इसमें जाने की कोई धूमधाम नहीं है। जो जाना था वह हो गया।
और फिर दूसरी पंक्ति आती है, जिसमें दो शब्द ऐसे हैं कि उनके बाद इस प्रसंग में कुछ जोड़ा नहीं जा सकता। निज कर। उसकी क्रिया, जैसी उचित थी वैसी, राम ने अपने हाथों से की। दोहा तीस में वही हाथ उसके सिर पर गया था और उसकी पीड़ा ले गया था। दोहा बत्तीस में वही हाथ उसकी अन्तिम क्रिया कर रहा है।
जथोचित, यानी जैसा उचित हो वैसा, पूरा, कुछ छोड़े बिना। कोई कमी नहीं की गयी, कोई संक्षेप नहीं किया गया, और यह सब एक पक्षी के लिये है, उस आदमी के द्वारा जिसकी पत्नी अभी-अभी हरी गयी है और जिसे अभी दक्षिण की ओर निकलना है। तुलसी इसपर एक शब्द टिप्पणी नहीं करते। वे लिखते हैं कि क्रिया की गयी, और आगे बढ़ जाते हैं।
सार: अखण्ड भक्ति का वर माँगकर गृध्रराज हरि के धाम को चला जाता है, और राम उसकी सारी क्रिया यथोचित रूप से अपने हाथों से करते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने को पढ़कर जो बात देर तक साथ रहती है वह यह है कि तुलसी ने विलाप को छोटा करने का एक भी अवसर नहीं लिया, जबकि उनके पास हर अवसर था। वे शुरू में ही बाहिज लिख चुके थे। वे बीच में मनहु लिख चुके थे। वे उसी पन्ने पर पूरनकाम, अज और अबिनासी भी लिख चुके थे। इनमें से कोई भी शब्द विलाप को आधा कर सकता था, और किसी ने नहीं किया। विलाप पूरी पाँच चौपाइयों तक चलता है, लताओं से, पेड़ों से, खंजन और कोयल से, बेल और सोने और केले से, और एक बार भी उसे बीच में रोककर समझाया नहीं जाता।
दूसरी बात इस पन्ने का हाथ है। दोहा तीस में वह हाथ एक घायल सिर पर रखा जाता है और पीड़ा ले जाता है। दोहा बत्तीस में वही हाथ उसी देह की क्रिया करता है। बीच के दो दोहों में जो कुछ कहा और सुना गया, वह इन्हीं दो स्पर्शों के बीच में है। और यह भी देखने लायक है कि कवि ने इन दोनों के बीच कहीं यह नहीं कहा कि ऐसा करना कितना बड़ा था। उसने केवल क्रिया लिखी और हाथ का नाम लिखा।
और तीसरी बात वह है जो इस पन्ने पर नहीं लिखी गयी। लक्ष्मण ने क्या समझाया, नहीं लिखा गया। वे आश्रम से क्यों निकले थे, नहीं दोहराया गया। पिता का नाम नहीं लिया गया, और न यह बताया गया कि उस पक्षी का उनसे क्या नाता था। किसी ने यह नहीं कहा कि अब क्या किया जाये। पूरी खोज में जो एक काम की चीज़ मिली वह दो शब्दों की है, दक्षिण दिशा, और वह भी किसी ऐसे से मिली जो उसे देकर चला गया।
इस प्रसंग की बनावट में एक बात बार-बार लौटती है। जो घटनाएँ बड़ी हैं उन्हें तुलसी बहुत कम जगह देते हैं। सीता कहाँ ले जायी गयीं, यह आधी पंक्ति में है। आगे का पूरा युद्ध जिस प्रतिज्ञा से बँधा है वह एक दोहे की दूसरी पंक्ति में है। एक देह का हरि रूप में बदल जाना डेढ़ पंक्ति में है। और अन्तिम संस्कार आधी पंक्ति में है। जिस एक चीज़ को इस पन्ने पर सबसे ज़्यादा जगह मिली है वह समाचार नहीं है, प्रतिज्ञा नहीं है, क्रिया नहीं है। सबसे ज़्यादा जगह उस आदमी के दुख को मिली है जो वन में पेड़ों से पूछता फिर रहा है।
और जिस दिशा का नाम यहाँ एक बार लिया गया, वही अब कथा को खींचने लगती है। जिस रास्ते पर दोनों भाई अब तक बिना जाने चल रहे थे, उसका मुँह इस पन्ने के बाद तय हो चुका है। पीछे गोदावरी के तट पर एक सूनी कुटी रह गयी है, और रास्ते में एक जगह है जहाँ किसी की क्रिया अभी-अभी अपने हाथों से की गयी है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा ३० से ३२, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।