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रामचरितमानसअरण्यकाण्डप्रसंग 6
स्वर्ण-मृग और मारीच
लक्ष्मण के वन जाते ही राम सीता से अग्नि में निवास करने को कहते हैं। सीता अपना प्रतिबिंब वहाँ रखकर अग्नि में समा जाती हैं। उधर समुद्र के तट पर मारीच मन ही मन राम के हाथों मरना चुनता है।
खर और दूषण मारे जा चुके हैं, और रावण के महल में रात नींद के बिना बीती है। वह पूछता है कि भगवान् के बिना उन्हें और कौन मार सकता था।
लक्ष्मण मूल, फल और कन्द लेने वन गये हैं। तब राम हँसकर सीता से कहते हैं कि जब तक वे निशाचरों का नाश करें, तब तक सीता अग्नि में निवास करें।
यह कथा रामचरितमानस की है। यहाँ रावण मारीच को कपट मृग बनने का आदेश देता है, और मारीच उसके साथ चल पड़ता है। मारीच कपट मृग आगे बनता है।
रावण, मारीच और पंचवटी की कुटी
- रावण जो खर और दूषण को अपने बराबर बली मानता है, और पूछता है कि भगवान् के बिना उन्हें कौन मार सकता था। वह मारीच से पूछता है कि संसार में उसके समान योद्धा कौन है।
- मारीच समुद्र के तट पर रहनेवाला निशाचर, जिसे राम ने बिना फल का बाण मारा था, और जो क्षण भर में सौ योजन चला आया था। उसे जहाँ-तहाँ वे दोनों भाई दिखते हैं।
- राम जो सीता को अपनी आगे की लीला बताते हैं, और जिसका भेद लक्ष्मण भी नहीं जानते।
- सीता जो राम के चरण हृदय में धरकर अग्नि में समा जाती हैं, अपना प्रतिबिंब वहाँ रखकर।
- लक्ष्मण साथ चलनेवाले भाई, जो उस समय मूल, फल और कन्द लेने वन गये हैं, और जो इस भेद को नहीं जानते।
- शिव और पार्वती इस कथा के कहनेवाले और सुननेवाली। शिव राम की युक्ति पर पार्वती की ओर मुड़ते हैं, और फिर रावण के सिर नवाने पर।
- खर, दूषण और त्रिशिरा वे तीन, जिनका वध मारीच राम के कामों में गिनाता है। रावण मानता है कि खर और दूषण उसके बराबर बली थे।
खर और दूषण के बाद, एक हिसाब
टीका के अनुसार रावण मन ही मन सोचता है कि देवता, मनुष्य, असुर, नाग और पक्षी, इनमें कोई ऐसा नहीं जो उसके सेवक के बराबर हो। खर और दूषण उसके बराबर बलवान् थे। भगवान् के बिना उन्हें और कौन मार सकता था?
वह सोचता है, “यदि देवताओं को आनन्द देनेवाले और पृथ्वी का भार हरनेवाले भगवान् ने अवतार लिया है, तो मैं जाकर उनसे हठपूर्वक वैर करूँगा। मैं प्रभु के बाण से प्राण छोड़कर भव से तर जाऊँगा।”
“इस तामस शरीर से भजन नहीं होगा।” मन, कर्म और वचन से यही उसका दृढ़ निश्चय है।
फिर वह सोचता है, “यदि वे मनुष्यरूप कोई राजकुमार हैं, तो दोनों को रण में जीतकर स्त्री को हर लूँगा।”
अकेला रथ, और राम की युक्ति
रथ पर चढ़कर रावण अकेला वहाँ गया जहाँ समुद्र के तट पर मारीच रहता था। शिव पार्वती से कहते हैं कि यहाँ राम ने जैसी युक्ति रची, वह सुन्दर कथा सुनिये।
लक्ष्मण के वन जाते ही
जब लक्ष्मण मूल, फल और कन्द लेने वन में गये, तब राम हँसकर सीता से बोले। टीका कहती है कि यह बात उन्होंने अकेले में कही।
राम कहते हैं, “हे प्रिये, हे सुन्दर व्रतवाली सुशीले, सुनिये। मैं कुछ मनोहर मनुष्यलीला करूँगा।”
फिर वे कहते हैं, “आप अग्नि में निवास कीजिये, जब तक मैं निशाचरों का नाश करूँ।”
अग्नि में प्रवेश, और वहाँ रखा प्रतिबिंब
राम ने ज्यों ही सब समझाकर कहा, त्यों ही सीता राम के चरणों को हृदय में धरकर अग्नि में समा गयीं।
फिर सीता ने अपना प्रतिबिंब वहाँ रख दिया। वह वैसे ही शील-स्वभाव का है, वैसे ही रूप का, और वैसा ही विनम्र। टीका इसे छायामूर्ति कहती है।

जो लक्ष्मण ने भी नहीं जाना
भगवान् ने जो कुछ चरित रचा, इस भेद को लक्ष्मण ने भी नहीं जाना।
रावण वहाँ गया जहाँ मारीच था, और उसने सिर नवाया। वह स्वार्थ में लगा हुआ और नीच है। शिव पार्वती से कहते हैं कि नीच का झुकना अत्यन्त दुःख देनेवाला होता है, जैसे अंकुश, धनुष, साँप और बिल्ली का झुकना। दुष्ट की प्रिय बोली भय देनेवाली होती है, जैसे बिना ऋतु के फूल।
मारीच का आदर, और उसका प्रश्न
तब मारीच रावण की पूजा करके आदर के साथ पूछता है, “किस कारण मन अत्यन्त व्यग्र है, और हे तात, आप अकेले क्यों आये हैं?”
भाग्यहीन रावण ने सारी कथा अभिमान के साथ उसके सामने कही।
फिर रावण कहता है, “आप छल करनेवाले कपट मृग बनिये, जिस उपाय से मैं राजवधू को हर लाऊँ।”
मारीच का उत्तर, और एक सौ योजन की स्मृति
तब मारीच ने कहा, “हे रावण, सुनिये। वे मनुष्यरूप में चराचर के ईश्वर हैं। हे तात, उनसे वैर न कीजिये। उनके मारने से मरना होता है, और उनके जिलाने से जीना।”
मारीच आगे कहता है, “राजकुमार मुनि के यज्ञ की रक्षा के लिये गये थे। राम ने मुझे बिना फल का बाण मारा, और मैं क्षण भर में सौ योजन चला आया। उनसे वैर करने में भलाई नहीं है।” टीका मुनि को विश्वामित्र बताती है।
वह कहता है, “मैं भृंगी के कीड़े जैसा हो गया हूँ। मैं जहाँ-तहाँ उन दोनों भाइयों को देखता हूँ।”
फिर वह कहता है, “हे तात, यदि वे मनुष्य हैं, तब भी बड़े शूरवीर हैं। उनसे विरोध करने में पूरा नहीं पड़ेगा। जिसने ताड़का और सुबाहु को मारकर शिव का धनुष तोड़ा, और खर, दूषण और त्रिशिरा का वध कर डाला, ऐसा प्रचण्ड बली क्या मनुष्य हो सकता है?”
गाली, और वे नौ
मारीच कहता है, “अपने कुल की कुशल विचारकर आप घर लौट जाइये।”
सुनते ही रावण जल उठा। उसने बहुत सी गालियाँ दीं। फिर रावण उसे मूर्ख कहकर डाँटता है कि वह गुरु की तरह उसे ज्ञान सिखा रहा है। वह पूछता है, “संसार में मेरे समान योद्धा कौन है?”
तब मारीच ने हृदय में अनुमान किया कि नौ से विरोध करने में कल्याण नहीं होता। शस्त्रधारी, भेद जाननेवाला, स्वामी, मूर्ख, धनवान्, वैद्य, भाट, कवि और रसोइया।
दोनों ओर मरण, और एक चुनाव
जब उसने दोनों प्रकार से अपना मरण देख लिया, तब उसने राम की शरण तकी। टीका के अनुसार उसने उनकी शरण जाने में ही कल्याण समझा।
टीका के अनुसार वह मन में सोचता है: “उत्तर देते ही यह अभागा मुझे मार डालेगा। फिर राम के बाण लगने से ही क्यों न मरूँ?”
हृदय में ऐसा जानकर वह रावण के साथ चल पड़ता है। राम के चरणों में उसका प्रेम अखण्ड है। उसके मन में अत्यन्त हर्ष है कि आज वह परम स्नेही को देखेगा, और यह हर्ष उसने रावण को नहीं जनाया।
जिनका क्रोध मोक्ष देता है
टीका के अनुसार आगे मारीच मन ही मन सोचता है।
वह मन ही मन कहता है, “अपने परम प्रियतम को देखकर नेत्रों को सफल करके सुख पाऊँगा। मैं श्री सहित और छोटे भाई समेत कृपा के धाम के चरणों में मन लगाऊँगा।” टीका श्री को सीता पढ़ती है।
मारीच मन में सोचता है। “जिनका क्रोध मोक्ष देनेवाला है, और जिनकी भक्ति अवश को वश में कर लेती है, वे सुख के समुद्र राम अपने हाथ से बाण साधकर मेरा वध करेंगे।” टीका अवश को उन भगवान् के लिये पढ़ती है जो किसी के वश में नहीं आते।
वह मन ही मन कहता है, “धनुष-बाण लिये प्रभु पृथ्वी पर मेरे पीछे दौड़ेंगे, और मैं बार-बार मुड़कर उन्हें देखूँगा। मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं।”
रावण का निश्चय, मारीच का चुनाव
रावण दो शर्तों पर निश्चय करता है, और अकेला रथ पर मारीच के पास जाता है। राम सीता से अग्नि में निवास करने को कहते हैं, और सीता अपना प्रतिबिंब वहाँ रखकर अग्नि में समा जाती हैं। यह भेद लक्ष्मण भी नहीं जानते। मारीच रावण को घर लौट जाने को कहता है, गालियाँ पाता है, और दोनों ओर अपना मरण देखकर राम की शरण तकता है। उसके मन में हर्ष है कि आज वह परम स्नेही को देखेगा। वाल्मीकि की कथा में रावण स्वयं सीता को हर ले जाता है, और अग्नि युद्ध के बाद आती है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा 23 से 26, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।