रामचरितमानस · अरण्यकाण्ड · स्वर्ण-मृग और मारीच
स्वर्ण-मृग और मारीच
लक्ष्मण के वन जाते ही राम एकान्त में जानकी से कुछ कहते हैं, और उसी घड़ी से वन में जो दिखती हैं वे प्रतिबिंब हैं। उधर समुद्र के तट पर एक निशाचर अपने ही वध की प्रतीक्षा करने लगता है।
यह प्रसंग किसी मैदान में नहीं खुलता। वह एक आदमी के भीतर खुलता है, और उसके भीतर इस समय जो चल रहा है वह क्रोध नहीं है। वह हिसाब है। खर और दूषण मारे जा चुके हैं, और मारे जानेवाले कोई साधारण सिपाही नहीं थे। दस सिरवाला बैठा हुआ जोड़-घटाव कर रहा है, और जोड़ का उत्तर उसे स्वयं निकालना पड़ रहा है। और यहीं इस प्रसंग की पहली विचित्र बात है: शत्रु सबसे पहले सही निष्कर्ष तक पहुँचता है, और उसके बाद भी वही करता है जो उसे करना था।
और इसी पन्ने पर वह बात आती है जिसके बिना तुलसीदास का अरण्यकाण्ड पढ़ा ही नहीं जा सकता। लक्ष्मण कन्द-मूल-फल लेने वन गये हैं, वहाँ कोई तीसरा नहीं है, और राम हँसकर जानकीजी से कहते हैं कि अब मैं कुछ मनोहर मनुष्यलीला करूँगा, इसलिये जबतक निशाचरों का नाश करूँ तबतक आप अग्नि में निवास कीजिये। सुनते ही सीताजी प्रभु के चरण हृदय में धरकर अग्नि में समा जाती हैं और अपना प्रतिबिंब वहाँ रख देती हैं, वैसे ही शील का, वैसे ही रूप का, वैसा ही विनम्र। इस घड़ी के बाद वन में जो दिखती हैं, और आगे जिनका हरण होगा, वे वही प्रतिबिंब हैं।
यह तुलसीदास का कहना है, और रामचरितमानस पढ़ते समय यही प्रमाण है। इस पुस्तकालय में वाल्मीकि की रामायण अलग पन्नों पर है और वह अलग ग्रन्थ है; किसी और रामायण की स्मृति साथ लेकर इस पन्ने पर आना इसे धुँधला कर देगा। यहाँ चार दोहों की कथा है, दोहा तेईस से छब्बीस तक: रावण का निश्चय, अकेले रथ पर समुद्र-तट की यात्रा, राम का एकान्त में कहा हुआ वचन, अग्नि-प्रवेश, मारीच की पूजा और उसका प्रश्न, कपट-मृग बनने का आदेश, मारीच का तर्क, रावण की गाली, और अन्त में एक बूढ़े निशाचर का वह छन्द जिसमें वह अपने मारे जाने की कल्पना करके प्रसन्न हो जाता है। मृग अपना रूप अगले प्रसंग में लेगा; इस पन्ने पर वह अभी माँग है और स्वीकृति है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- रावण दस सिरवाला, जिसे तुलसी इस प्रसंग में दसमुख, दसानन और दससीसा कहकर पुकारते हैं; उसके अपने बल के बराबर खर और दूषण अभी-अभी मारे गये हैं, और वह अपने को संसार का सबसे बड़ा योद्धा मानता है।
- मारीच समुद्र के तट पर रहनेवाला निशाचर, जिसे एक बार एक राजकुमार ने बिना फल के बाण से सौ योजन दूर फेंक दिया था और जो उस दिन से कहीं भी देखे तो दो भाई ही दिखते हैं।
- राम कृपा और सुख के समूह, जो यहाँ पहली बार अपनी आगे की लीला को नाम देकर पुकारते हैं और उसका भेद केवल एक व्यक्ति को बताते हैं।
- सीताजी जनकसुता, जो सब सुनकर बिना एक प्रश्न किये प्रभु के चरण हृदय में धरती हैं और अग्नि में समा जाती हैं, अपना प्रतिबिंब पीछे छोड़कर।
- लक्ष्मण साथ चलनेवाले भाई, जो ठीक उसी समय कन्द-मूल-फल लेने वन गये हैं, और जो इस भेद को नहीं जानते।
- शिव और पार्वती इस कथा के कहनेवाले और सुननेवाली, जिन्हें बीच-बीच में सम्बोधन आता है, हे उमा और हे भवानी।
- खर, दूषण और त्रिशिरा वे तीन, जिनके वध का समाचार इस पूरे प्रसंग के नीचे बहता रहता है और जिनके नाम मारीच अपने तर्क में गिनाता है।
खर और दूषण के बाद, एक हिसाब
पहली चौपाई हमें किसी दृश्य में नहीं ले जाती, वह सीधे एक मन के भीतर खोल देती है। वहाँ कोई पछतावा नहीं है और कोई शोक भी नहीं है। वहाँ एक गिनती चल रही है। देवता, मनुष्य, असुर, नाग और पक्षी, इन सब में उसे कोई ऐसा नहीं दिखता जो उसके एक सेवक तक को पा सके। और जो मारे गये हैं वे सेवक नहीं थे। खर और दूषण उसके अपने बल के बराबर थे, यह बात वह किसी सभा में नहीं, अपने भीतर स्वीकार करता है। तो गिनती का उत्तर एक ही बचता है, और वह उत्तर उसे स्वयं निकालना पड़ता है: भगवान् के बिना उन्हें और कौन मार सकता था।
तुलसी यहाँ एक बहुत बड़ी बात बहुत चुपचाप रख देते हैं। जिस निष्कर्ष तक बड़े-बड़े लोग तप करके पहुँचते हैं, उस तक यह निशाचर केवल हिसाब लगाकर पहुँच जाता है। उसे किसी ऋषि ने नहीं बताया, कोई स्वप्न नहीं आया, कोई आकाशवाणी नहीं हुई। उसने अपने ही बल को नापा, अपने भाइयों के बल को नापा, और नाप के अन्त में जो नाम बचा उसे मान लिया। ज्ञान उसके पास पूरा है। जो नहीं है वह दिशा है।
सुर रंजन भंजन महि भारा । जौं भगवंत लीन्ह अवतारा॥
चौपाई १
तौ मैं जाइ बैरु हठि करऊँ । प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ॥
और यहीं वह पलटता है, और उसका पलटना सुननेवाले को चौंकाता है। यदि देवताओं को आनन्द देनेवाले और पृथ्वी का भार हरनेवाले भगवान् ने ही अवतार लिया है, तो मैं जाकर उनसे हठपूर्वक वैर करूँगा और प्रभु के बाण से प्राण छोड़कर भवसागर से तर जाऊँगा। इस वाक्य में दो शब्द ध्यान से देखने लायक हैं। पहला है हठि, यानी अड़कर, जबरदस्ती। वह जानता है कि सामने से वैर नहीं मिलेगा, इसलिये वह उसे छीनने जा रहा है। और दूसरा है भव तरऊँ। वह जो माँग रहा है वह विजय नहीं है। वह पार उतरना माँग रहा है।
यानी वह हारने जा रहा है और जानकर जा रहा है। यह लड़ाई उसके लिये लड़ाई नहीं है, वह एक रास्ता है। और रास्ता चुनने से पहले उसने दूसरे रास्ते भी देख लिये हैं, यह अगली चौपाई बताती है।
होइहि भजनु न तामस देहा । मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा॥
चौपाई २
जौं नररूप भूपसुत कोऊ । हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ॥
इस तामस शरीर से भजन तो होगा नहीं। यह उसका अपने ऊपर दिया हुआ निर्णय है, और वह निर्णय झूठा नहीं है। वह अपने भीतर देखता है और जो पाता है उसे छिपाता नहीं। भजन की सामर्थ्य उसमें नहीं है, इसलिये वह उस दरवाजे को छोड़ देता है और दूसरा दरवाजा पकड़ता है, और उस दूसरे दरवाजे का नाम वैर है। मन, वचन और कर्म से यही उसका दृढ़ निश्चय है, और तुलसी इसके लिये जो शब्द रखते हैं वह मंत्र दृढ़ एहा है, जैसे यह कोई साधना का संकल्प हो।
और फिर, उसी साँस में, दूसरी आधी चौपाई आती है और सारा रंग बदल देती है। यदि वे मनुष्यरूप में कोई राजकुमार ही निकले, तो दोनों को रण में जीतकर उनकी स्त्री को हर लूँगा। एक ही मन में दोनों योजनाएँ साथ-साथ रखी हुई हैं। यदि वे भगवान् हैं तो मुझे मोक्ष चाहिये, और यदि वे केवल आदमी हैं तो मुझे स्त्री चाहिये। जो सच निकलेगा उसके अनुसार वह अपनी इच्छा बदल लेगा। इसी जगह उसका सारा ज्ञान बेकार हो जाता है, क्योंकि ज्ञान के साथ जो चीज नहीं आयी वह छोड़ने की आदत है।
सार: खर और दूषण के मारे जाने से रावण स्वयं इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि मारनेवाले भगवान् ही हो सकते हैं, और तय करता है कि हठपूर्वक वैर करके उन्हीं के बाण से प्राण छोड़ेगा और भवसागर तर जायेगा; पर साथ ही यह भी सोच रखता है कि यदि वे साधारण राजकुमार निकले तो दोनों को जीतकर उनकी स्त्री हर लेगा।
अकेला रथ, और एक दूसरी युक्ति
अब वह चलता है, और जिस तरह चलता है वही सबसे पहले ध्यान खींचता है। उसने न मन्त्रियों को बुलाया, न सेना सजायी, न किसी को साथ लिया। रथ पर चढ़कर अकेला वहाँ गया जहाँ समुद्र के तट पर मारीच रहता था। जो आदमी कहीं अकेला नहीं जाता वह आज अकेला निकला है, और यह बात आगे उससे कोई और नहीं, स्वयं मारीच पूछेगा। जिस काम में साथी नहीं चाहिये, उस काम की एक ही पहचान होती है, और वह यह कि वह काम बताने लायक नहीं है।
पर तुलसी रथ के पीछे नहीं जाते। वे ठीक इसी जगह कथा रोक देते हैं और सुननेवाली की ओर मुड़ जाते हैं। शिवजी पार्वती से कहते हैं कि यहाँ श्रीरामचन्द्रजी ने जैसी जुगुति रची, हे उमा, वह सुन्दर कथा सुनिये। जुगुति यानी युक्ति, उपाय, रचा हुआ प्रबन्ध। यह एक शब्द आगे की सारी कथा पर अपनी छाप छोड़ देता है। हमें पहले ही बता दिया गया कि जो होने जा रहा है वह किसी की चूक नहीं है, किसी का घात नहीं है, वह एक रची हुई युक्ति है। रावण अभी रास्ते में है, और उससे बहुत पहले यह पन्ना यह कह चुका है कि प्रबन्ध किसी और का है।
और दोनों चीजें एक ही चौपाई में हैं, यह तुलसी की अपनी चाल है। एक ओर रथ चल रहा है, उसी ओर मारीच बैठा है, और उसी पंक्ति के दूसरे आधे भाग में कथा उस वन में लौट आती है जहाँ राम हैं। षड्यन्त्र और युक्ति आमने-सामने रख दिये गये हैं, और सुननेवाले को यह भी बता दिया गया कि किसका पलड़ा भारी है।
सार: रावण बिना किसी को साथ लिये रथ पर अकेला समुद्र-तट की ओर चलता है, जहाँ मारीच रहता है; और ठीक उसी चौपाई में शिवजी कथा रोककर पार्वती से कहते हैं कि अब वह सुन्दर कथा सुनिये जो राम की रची हुई युक्ति है।
लक्ष्मण के वन जाते ही
यहाँ दिन का वही साधारण क्रम चल रहा है जो वन में रहनेवालों का होता है। लक्ष्मण कन्द, मूल और फल लेने वन में गये हैं। अब वहाँ कोई तीसरा नहीं है। और यही वह क्षण है जिसकी प्रतीक्षा थी, क्योंकि जो कहा जाना है वह तीसरे के सामने नहीं कहा जा सकता।
लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद।
दोहा २३
जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद॥ २३॥
दोहे का हर शब्द तौला हुआ है। समय बताया गया, जब, यानी ठीक उसी समय जब लक्ष्मण निकले। सुननेवाला बताया गया, जनकसुता। और कहनेवाले के लिये तुलसी जो विशेषण रखते हैं वह कृपा सुख बृंद है, कृपा और सुख का समूह। और बीच में एक क्रिया है जिस पर पाठक बार-बार ठहरता है, बिहसि, यानी हँसकर। इतनी भारी बात हँसकर कही जा रही है। यह हँसी लापरवाही की नहीं है। यह उस आदमी की हँसी है जिसे मालूम है कि आगे जो दुःख दिखेगा वह किसका है और कितने समय का है।
सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला॥
चौपाई ३
तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा । जौ लगि करौं निसाचर नासा॥
सम्बोधन पहले आता है और वह बहुत कोमल है। हे प्रिये, हे सुन्दर व्रतवाली, हे सुशीले। इसके बाद बात रखी जाती है, और वह किसी आज्ञा की तरह नहीं, किसी सूचना की तरह आती है। मैं अब कुछ मनोहर मनुष्यलीला करूँगा। जो होने जा रहा है उसे राम स्वयं नाम दे रहे हैं, और जो नाम दे रहे हैं वह है ललित नरलीला। ललित, यानी मनोहर। जिसे आगे सारा संसार त्रासदी की तरह पढ़ेगा, उसे यहाँ करनेवाला मनोहर कह रहा है।
और फिर प्रार्थना आती है, जो सबसे असाधारण वाक्य है: आप अग्नि में निवास कीजिये, जबतक मैं निशाचरों का नाश करूँ। ध्यान दीजिये कि अग्नि के लिये जो शब्द है वह निवास है। वह दण्ड नहीं है, परीक्षा नहीं है, वह रहने की जगह है। और उसकी अवधि भी उसी वाक्य में बाँध दी गयी है, जब तक निशाचरों का नाश न हो जाये। यानी जो अभी आरम्भ होगा उसका अन्त पहले से तय है, और तय करनेवाला स्वयं बता रहा है।
और एक बात, जो इस पन्ने पर सबसे अधिक ध्यान देने योग्य है। सीताजी से कुछ छिपाया नहीं जा रहा। उन्हें पहले बताया जा रहा है, पूरा बताया जा रहा है, और उनकी सहमति से यह होने जा रहा है। जो भेद बनेगा वह उनसे नहीं बनेगा, वह बाकी सबसे बनेगा। इस एक अन्तर पर तुलसी का सारा प्रसंग खड़ा है।
सार: लक्ष्मण के कन्द-मूल-फल लेने वन जाते ही राम हँसकर जानकीजी से कहते हैं कि अब वे कुछ मनोहर मनुष्यलीला करेंगे, और जबतक निशाचरों का नाश हो तबतक सीताजी अग्नि में निवास करें।
अग्नि में प्रवेश, और जो वहाँ रह गयीं
जो अब होता है उसकी सबसे बड़ी बात उसकी गति है। चौपाई में कोई अवकाश नहीं है, कोई प्रश्न नहीं है, कोई अनुनय नहीं है। जिस क्षण कहना पूरा हुआ उसी क्षण करना पूरा हो गया।
जबहिं राम सब कहा बखानी । प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी॥
चौपाई ४
निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता । तैसइ सील रूप सुबिनीता॥
श्रीरामजी ने ज्यों ही सब समझाकर कहा, त्यों ही सीताजी ने प्रभु के चरणों को हृदय में धरा और वे अग्नि में समा गयीं। अनल समानी, यही दो शब्द हैं। न जलने का वर्णन है, न ताप का, न किसी चमत्कार का। समा जाना, जैसे जल में जल मिल जाये। जिस वस्तु को हृदय में धरकर वे गयीं वह भी दर्ज है, प्रभु के चरण। जो पूरी तरह मान चुका हो उसे बीच का कोई दृश्य नहीं चाहिये।
और फिर वह पंक्ति आती है जिस पर आगे का सारा काण्ड टिका हुआ है। सीताजी ने अपना ही प्रतिबिंब वहाँ रख दिया, वैसे ही शील-स्वभाव का, वैसे ही रूप का, और वैसा ही विनम्र। तुलसी इसे एक बार कहते हैं, बिना जोर दिये, और आगे बढ़ जाते हैं। पर इस एक पंक्ति के बाद वन में जो दिखती हैं वे प्रतिबिंब हैं। जिन्हें आगे मृग दिखेगा, जिनका हरण होगा, जिनके लिये खोज चलेगी, इस कथा में वे यही प्रतिबिंब हैं। असली जानकी इस क्षण से अग्नि में हैं, और रहेंगी, जबतक निशाचरों का नाश पूरा न हो।
यह तुलसीदास का अपना कथन है और यहाँ यही प्रमाण है। रामचरितमानस को इसी शर्त पर पढ़ा जाता है कि वह जो कहे वही माना जाये, और जहाँ वह किसी दूसरी रामायण से अलग चले वहाँ उसका अपना कहा हुआ चले। इस पुस्तकालय में वाल्मीकि की रामायण अपने अलग पन्नों पर है और वह एक भिन्न ग्रन्थ है। इन दोनों को एक में मिलाकर पढ़ना इस पन्ने की सबसे बड़ी बात को धो देना है।
और तुलसी इस बात को छिपाकर नहीं रखते। उन्होंने इसे ठीक उसी जगह कहा है जहाँ यह हुआ, हरण से पहले, मृग से पहले, विलाप से पहले। सुननेवाला जानता है, कहनेवाला जानता है, और कथा के भीतर के लोग नहीं जानते। इसी असमानता से आगे का सारा शोक अपनी पूरी चोट के साथ चलता है, क्योंकि जो रोयेंगे उनके पास वह नहीं है जो हमारे पास अभी-अभी रख दिया गया।
सार: राम के समझाते ही सीताजी प्रभु के चरण हृदय में धरकर अग्नि में समा जाती हैं और अपने ही जैसे शील, रूप और विनय का अपना प्रतिबिंब वहाँ रख जाती हैं; तुलसी की कथा में आगे जो कुछ भी सीताजी के साथ होता दिखेगा, वह इसी प्रतिबिंब के साथ होगा।
जो लक्ष्मण ने भी नहीं जाना
अगली चौपाई दो काम एक साथ करती है, और दोनों जरूरी हैं। पहले वह भेद की सीमा बाँधती है, फिर वह कथा को समुद्र के तट पर ले जाती है।
लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना॥
चौपाई ५
दसमुख गयउ जहाँ मारीचा । नाइ माथ स्वारथ रत नीचा॥
भगवान् ने जो लीला रची, इस मरमु को लक्ष्मणजी ने भी नहीं जाना। यह वह भाई है जो छाया की तरह साथ रहता है और जो अभी-अभी उन्हीं दोनों के लिये कन्द-मूल-फल लेने निकला है। उसे भी नहीं बताया गया। इसे कठोरता समझने की भूल नहीं करनी चाहिये। आगे लक्ष्मण जो पीड़ा भोगेंगे वह सच्ची होगी, और वह इसीलिये सच्ची होगी कि उनका न जानना सच्चा है। जो अभिनय करना जानता हो उसे भेद बताया जा सकता है; जो अभिनय नहीं कर सकता उसे नहीं बताया जाता।
और उसी चौपाई का दूसरा आधा भाग हमें उठाकर दूसरी जगह रख देता है। दसमुख वहाँ गया जहाँ मारीच था, और उसने सिर नवाया। तुलसी उसके लिये दो शब्द रखते हैं, स्वारथ रत नीचा, स्वार्थ में लगा हुआ और नीच। जो अभी-अभी अपने को संसार का सबसे बड़ा मानकर निकला था, वह एक बूढ़े निशाचर के सामने सिर झुका रहा है। और झुकते ही तुलसी कथा रोककर वह चौपाई कहते हैं जो इस काण्ड की सबसे अधिक दोहरायी जानेवाली पंक्तियों में है।
नवनि नीच कै अति दुखदाई । जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई॥
चौपाई ६
भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी॥
नीच का झुकना अत्यन्त दुःख देनेवाला होता है, जैसे अंकुश, धनुष, साँप और बिल्ली का झुकना। चारों उदाहरण एक ही बात कहते हैं। अंकुश झुकता है तो भीतर धँसने के लिये, धनुष झुकता है तो बाण छोड़ने के लिये, साँप सिमटता है तो उछलने के लिये, और बिल्ली दबती है तो झपटने के लिये। इन चारों में झुकना चोट से पहले आता है, वह चोट के बदले नहीं आता। रावण का सिर नवाना अभी-अभी हमने देखा है, और अब हमें बता दिया गया कि उस नवाने का अर्थ क्या है।
दूसरी आधी चौपाई उसी बात को वाणी पर ले आती है। हे भवानी, दुष्ट की मीठी बोली भी उसी तरह भय देनेवाली होती है जैसे बिना ऋतु के फूल। बेमौसम खिला हुआ फूल सुन्दर तो होता है, पर उसे देखकर मन प्रसन्न नहीं होता, वह सिहर जाता है, क्योंकि जो नियम से बाहर है वह किसी और नियम की सूचना देता है। रावण अभी बहुत मीठा बोलने वाला है, और सुननेवाले को पहले ही सावधान कर दिया गया।
सार: इस लीला का भेद लक्ष्मण भी नहीं जानते; उधर दसमुख मारीच के पास पहुँचकर सिर नवाता है, और तुलसी कहते हैं कि नीच का झुकना अंकुश, धनुष, साँप और बिल्ली के झुकने जैसा है, और दुष्ट की मीठी वाणी बिना ऋतु के फूल जैसी डरावनी।
मारीच का आदर, और उसका प्रश्न
मारीच वही करता है जो उसे करना चाहिये। वह पहले पूजा करता है, फिर बात पूछता है, और पूछता भी आदर के साथ है। इस पूरे प्रसंग में उसका व्यवहार एक बार भी नहीं फिसलता, और यही उसे इतना स्मरणीय बना देता है।
करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात।
दोहा २४
कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात॥ २४॥
दोहे में प्रश्न दो हैं और दोनों तीखे हैं। पहला, ऐसा कौन-सा कारण है जिससे मन इतना व्यग्र है। और दूसरा, हे तात, आप अकेले क्यों आये हैं। तुलसी अकेलेपन के लिये जो शब्द रखते हैं वह अकसर है, यानी अकेला। मारीच उसे तात कहकर पुकार रहा है, बड़ी कोमलता से, और उसी कोमलता के भीतर वह ठीक वहाँ उँगली रख देता है जहाँ बात है। जो कभी अकेला नहीं चलता, उसका अकेले आना अपने आप में समाचार है। मारीच उत्तर सुनने से पहले ही बहुत कुछ पढ़ चुका है।
दसमुख सकल कथा तेहि आगें । कही सहित अभिमान अभागें॥
चौपाई ७
होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी । जेहि बिधि हरि आनौं नृपनारी॥
भाग्यहीन रावण ने सारी कथा अभिमान के साथ उसके सामने कही। ध्यान दीजिये कि तुलसी ने उसे किस शब्द से पुकारा, अभागा, और यह शब्द ठीक उस जगह आया है जहाँ वह अपने को सबसे अधिक बड़ा दिखा रहा है। जो अपनी हार का वृत्तान्त भी गर्व से सुनाता है, उसका भाग्य किसी और ने नहीं बिगाड़ा।
और फिर माँग आती है, सीधी, बिना किसी परदे के। आप छल करनेवाले कपट मृग बनिये, जिस उपाय से मैं उस राजवधू को हर लाऊँ। इस वाक्य में तुलसी अपने पात्र को कोई सुन्दर शब्द नहीं देते। कपट, छल, हरण। और जिसे हरना है उसे वह नाम से नहीं पुकारता, वह नृपनारी कहता है, किसी राजा की स्त्री। जो व्यक्ति को व्यक्ति की तरह देखता तो शायद वह यह काम न कर पाता।
मृग का रूप अभी नहीं बना है। यहाँ केवल आदेश है, और आदेश एक ऐसे आदमी को दिया जा रहा है जो उन्हीं दोनों भाइयों के नाम से आज भी काँपता है। रावण को यह मालूम भी है। उसने मारीच को छलकारी कहकर ही पुकारा है, यानी चुना उसी गुण के लिये है, और यह भूल गया कि जो व्यक्ति उन्हें जानता है वह उनसे लड़ने के काम नहीं आता।
सार: मारीच पूजा करके आदर से पूछता है कि मन इतना व्यग्र क्यों है और आप अकेले क्यों आये; रावण सारी कथा अभिमान के साथ सुनाकर आदेश देता है कि वह कपट-मृग बने, जिससे वह उस राजवधू का हरण कर सके।
मारीच का उत्तर, और एक सौ योजन की स्मृति
अब मारीच बोलता है, और उसका उत्तर इस पन्ने का सबसे सुगठित भाग है। वह डर से आरम्भ नहीं करता। वह सिद्धान्त से आरम्भ करता है।
तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररूप चराचर ईसा॥
चौपाई ८
तासों तात बयरु नहिं कीजै । मारें मरिअ जिआएँ जीजै॥
हे दशशीश, सुनिये, वे मनुष्यरूप में चराचर के ईश्वर हैं। इसके बाद निवेदन है, हे तात, उनसे वैर न कीजिये। और फिर एक पंक्ति में वह सारी बात रख देता है जिसे समझाने में शास्त्र पन्ने खर्च करते हैं: उन्हीं के मारने से मरना होता है और उन्हीं के जिलाने से जीना होता है। यानी जिस जीवन को बचाने के लिये यह सारी योजना बन रही है, वह जीवन भी उन्हीं के हाथ में है। यह बात एक निशाचर कह रहा है, और ठीक कह रहा है।
मुनि मख राखन गयउ कुमारा । बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा॥
चौपाई ९
सत जोजन आयउँ छन माहीं । तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं॥
और अब वह प्रमाण देता है, और प्रमाण के लिये उसे कहीं जाना नहीं पड़ता, वह अपने ही शरीर से उठा लेता है। यही राजकुमार मुनि के यज्ञ की रक्षा के लिये गये थे। उस दिन उन्होंने जो बाण मारा उसका ब्योरा तुलसी ने छोड़ा नहीं, बिनु फर सर, यानी बिना फल का बाण, वह बाण जिसमें नोक ही नहीं थी। और उस नोक रहित बाण से क्या हुआ, यह मारीच स्वयं गिनकर बताता है, सत जोजन, सौ योजन, और वह भी क्षण भर में।
इस पूरे ब्योरे में सबसे कड़ी चोट वहीं है जहाँ सबसे कम शब्द हैं। वह मारा नहीं गया। उसे मारा ही नहीं गया था। जो बाण उसे लगा वह मारने के लिये नहीं छोड़ा गया था, वह हटाने के लिये छोड़ा गया था, और उतने भर से वह सौ योजन दूर जा गिरा। जो हाथ खेल-खेल में इतना कर सकता है, उसके विषय में मारीच कोई अनुमान नहीं लगा रहा, वह स्मरण कर रहा है। और जहाँ वह गिरा था, समुद्र के उसी तट पर बैठकर आज वह यह सब कह रहा है।
भइ मम कीट भृंग की नाई । जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई॥
चौपाई १०
जौं नर तात तदपि अति सूरा । तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा॥
फिर वह अपनी भीतरी हालत बताता है, और उसके लिये जो उपमा चुनता है वह बहुत पुरानी है। कीट भृंग की नाई। जिस कीड़े को भृंग उठा ले जाता है, वह उसी के ध्यान में डूबा रहता है और अन्त में उसी का रूप हो जाता है। मारीच कहता है, मेरी दशा वही हो गयी है, अब मैं जहाँ-तहाँ उन दोनों भाइयों को ही देखता हूँ। भय ने उसके भीतर वही काम कर दिया है जो भक्ति करती है। दिशा उलटी है, पर रूप वही बन रहा है।
और अन्त में वह वह तर्क भी छोड़ देता है जो रावण को शायद पसन्द आता। मान लीजिये वे भगवान् नहीं हैं, मान लीजिये वे मनुष्य ही हैं। तब भी वे बड़े शूरवीर हैं, और उनसे विरोध करने में न आइहि पूरा, पूरा नहीं पड़ेगा। यह वह वाक्य है जिसमें मारीच रावण की अपनी भाषा में बात कर रहा है। ईश्वर की बात नहीं मानते तो बल का हिसाब ही देख लीजिये।
जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड।
दोहा २५
खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड॥ २५॥
और हिसाब वह दोहे में गिना देता है। जिसने ताड़का और सुबाहु को मारा, जिसने शिवजी का धनुष तोड़ा, जिसने खर, दूषण और त्रिशिरा का वध कर डाला। पाँच नाम और एक धनुष, और उसके बाद एक ही प्रश्न, ऐसा बरिबंड, ऐसा प्रचण्ड बली भी कहीं मनुष्य हो सकता है। मारीच का पूरा मुकदमा इसी सूची पर खड़ा है, और सूची में एक भी नाम ऐसा नहीं है जिसे रावण न जानता हो। दो तो अभी-अभी उसके अपने थे।
सार: मारीच कहता है कि वे मनुष्यरूप में चराचर के ईश्वर हैं और उनसे वैर करना ठीक नहीं; प्रमाण में वह मुनि के यज्ञ का दिन याद करता है, जब बिना फल के बाण ने उसे क्षण भर में सौ योजन दूर फेंक दिया, और दोहे में ताड़का, सुबाहु, शिव-धनुष, खर, दूषण और त्रिशिरा गिनाकर पूछता है कि ऐसा प्रचण्ड बली कहीं मनुष्य हो सकता है।
गाली, और वे नौ
अपनी बात वह जिस वाक्य पर समाप्त करता है वह सबसे नरम वाक्य है। अपने कुल की कुशल सोचकर आप घर लौट जाइये। ध्यान दीजिये कि वह जीवन की दुहाई नहीं देता, कुल की देता है। रावण के लिये अपना प्राण शायद बहुत बड़ी बात न हो, पर कुल बड़ी बात है, और मारीच वहीं हाथ रखता है जहाँ पकड़ बनती है। यह एक अनुभवी आदमी का अन्तिम दाँव है।
जाहु भवन कुल कुसल बिचारी । सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी॥
चौपाई ११
गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा । कहु जग मोहि समान को जोधा॥
सुनत जरा। सुनते ही जल उठा। उत्तर में तर्क नहीं आता, गालियाँ आती हैं, और बहुत आती हैं। फिर वह वाक्य आता है जो हर उस आदमी के मुँह से निकलता है जिसे ठीक बात ठीक समय पर कही गयी हो: अरे मूर्ख, गुरु की तरह मुझे ज्ञान सिखाता है। और उसके बाद वही प्रश्न, बताओ तो, संसार में मेरे समान योद्धा कौन है।
यह ठहरकर देखने लायक जगह है। मारीच की एक भी बात गलत नहीं थी। वह सिद्धान्त से बोला, अपने अनुभव से बोला, नामों की सूची देकर बोला, और अन्त में उसी की भाषा में बोला। उसका उत्तर पूरा था। और उसका कुछ भी असर नहीं हुआ। जो सुनना ही नहीं चाहता, उसके सामने सही होना कोई सुरक्षा नहीं देता, वह केवल क्रोध बढ़ाता है।
तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना॥
चौपाई १२
सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बंदि कबि भानस गुनी॥
और तब मारीच हृदय में एक अनुमान लगाता है, और वह अनुमान एक नीति बनकर चौपाई में बैठ जाता है। नवहि बिरोधें, नौ से विरोध करने में कल्याण नहीं होता। गिनकर देखिये। शस्त्रधारी, भेद जाननेवाला, समर्थ स्वामी, मूर्ख, धनवान्, वैद्य, भाट, कवि और रसोइया। नौ नाम, और हर एक के पास कुछ ऐसा है जिससे वह चुपचाप नुकसान कर सकता है।
यह सूची कोई कहावत भर नहीं है। वह उसी क्षण की गिनती है। मारीच के सामने जो खड़ा है वह समर्थ स्वामी है, उसके पास सामर्थ्य भी है और अधिकार भी, और उसने अभी-अभी दिखा दिया है कि समझाने का उस पर क्या असर होता है। मारीच अपने ही सूत्र की पहली लकीर में फँसा हुआ है, और वह यह जानता है। नीति उसे रास्ता नहीं दिखा रही, वह उसे केवल यह बता रही है कि रास्ता नहीं है।
सार: मारीच के समझाने पर रावण जल उठता है, गालियाँ देता है और पूछता है कि संसार में उसके समान योद्धा कौन है; तब मारीच मन में यह नीति याद करता है कि शस्त्रधारी, मर्मी, समर्थ स्वामी, मूर्ख, धनी, वैद्य, भाट, कवि और रसोइया, इन नौ से विरोध करने में कल्याण नहीं।
दोनों ओर मरण, और एक चुनाव
अब उसके सामने दो रास्ते हैं और दोनों एक ही जगह पहुँचते हैं। इनकार करे तो यह अभी मार डालेगा। मान ले तो उधर वह बाण प्रतीक्षा कर रहा है जिसे वह पहले भी सह चुका है। यह उस आदमी की स्थिति है जिसके पास चुनने के लिये जीवन बचा ही नहीं है। और ठीक इसी जगह मारीच वह करता है जो इस पूरे प्रसंग को पलट देता है।
उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना॥
चौपाई १३
उतरु देत मोहि बधब अभागें । कस न मरौं रघुपति सर लागें॥
जब उसने दोनों प्रकार से अपना मरण देख लिया, तब उसने श्रीरघुनाथजी की शरण ताकिसि। ताकना, यानी उस ओर देखना, उसी को ध्येय बना लेना। उसके पास बचने का कोई उपाय नहीं था, इसलिये उसने बचने की बात छोड़ दी और यह चुना कि मरना किसके हाथ से हो। जिस चीज पर उसका वश नहीं रहा उसे उसने छोड़ दिया, और जिस पर अब भी थोड़ा वश था उसे पकड़ लिया। इतनी कम जगह में इतनी बड़ी बुद्धि इस प्रसंग में और किसी के पास नहीं है।
और उसका अपना वाक्य और भी सीधा है। उत्तर देते ही यह अभागा मुझे मार डालेगा, फिर श्रीरघुनाथजी के बाण लगने से ही क्यों न मरूँ। इसमें कोई ऊँची भाषा नहीं है, कोई स्तुति नहीं है। यह एक व्यावहारिक प्रश्न है, और उसी व्यावहारिक प्रश्न के भीतर से उसका सारा उद्धार निकल आता है। शरण यहाँ किसी बड़े संकल्प से नहीं आती। वह सब दरवाजे बन्द हो जाने के बाद बचे हुए एक दरवाजे को पहचान लेने से आती है।
हृदय में ऐसा जानकर वह रावण के साथ चल पड़ता है। राम के चरणों में उसका प्रेम अभंगा है, कभी न टूटनेवाला, और तुलसी यह बात यहीं बताते हैं, ठीक उस समय जब वह छल करने जा रहा है। उसके मन में इस बात का अत्यन्त हर्ष है कि आज वह अपने परम स्नेही को देखेगा, और यह हर्ष उसने रावण को नहीं जनाया। एक ही रथ पर दो आदमी जा रहे हैं। एक स्त्री लाने जा रहा है, दूसरा अपनी मृत्यु लेने जा रहा है, और प्रसन्न उनमें से दूसरा है।
सार: दोनों ओर अपना मरण देखकर मारीच रघुनाथजी की शरण तकता है और सोचता है कि इनकार करने पर यह अभागा मारेगा ही, तो रघुपति के बाण से मरना अच्छा; वह रावण के साथ चल देता है, भीतर हर्ष से भरा हुआ और उस हर्ष को छिपाये हुए।
जिनका क्रोध भी मोक्ष देता है
और अब वह छन्द आता है जिसमें मारीच किसी से बात नहीं करता। वह अपने आप से बात करता है, और जो कहता है वह कोई राक्षस नहीं कह सकता।
निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं।
छन्द
श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं॥
निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी।
निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी॥
पहली दो पंक्तियाँ आँखों की हैं। अपने परम प्रियतम को देखकर नेत्रों को सफल करके सुख पाऊँगा, और जानकीजी सहित तथा छोटे भाई समेत कृपानिधान के चरणों में मन लगाऊँगा। उसे विजय नहीं चाहिये, उसे मुक्ति तक का ब्योरा नहीं चाहिये। उसे दर्शन चाहिये, और उसमें भी वह तीनों को एक साथ देखना चाहता है, जैसे कोई पुराना सेवक अपने घर लौटकर सबको एक ही नजर में समेट लेना चाहता हो।
और फिर वह दो पंक्तियाँ आती हैं जिनमें सिद्धान्त है। जिनका क्रोध भी निर्बान दायक है, यानी मोक्ष देनेवाला, और जिनकी भक्ति उस अवश को भी वश में कर लेती है जो किसी के वश में नहीं आता, अबसहि बसकरी। वही आनन्द के समुद्र श्रीहरि अपने हाथ से बाण सन्धानकर मेरा वध करेंगे। ध्यान दीजिये कि वाक्य का अन्त किस शब्द पर होता है, सुखसागर। जिस क्रिया की बात हो रही है वह वध है, और जिस नाम से वह करनेवाले को पुकार रहा है वह सुख का समुद्र है। मारीच के लिये ये दोनों बातें एक-दूसरे को काटती नहीं हैं।
और यहीं इस पन्ने की सबसे चुपचाप चोट रखी हुई है, और वह मारीच पर नहीं, हम पर पड़ती है। वह सोच रहा है कि वह जानकीजी सहित प्रभु को देखेगा। जिन्हें वह वहाँ देखेगा वे प्रतिबिंब हैं। असली जानकी अग्नि में हैं, और यह बात हमें चार चौपाई पहले बता दी गयी थी। मारीच नहीं जानता, रावण नहीं जानता, लक्ष्मण नहीं जानते। इस समय इस कथा में सबसे अधिक कोई जानता है तो पढ़नेवाला, और वह कुछ कर नहीं सकता।
मम पाछें धर धावत धरें सरासन बान।
दोहा २६
फिरि फिरि प्रभुहि बिलोकिहउँ धन्य न मो सम आन॥ २६॥
और अन्तिम दोहा उस चित्र पर रुक जाता है जिसकी उसने कल्पना की है। धनुष-बाण लिये प्रभु पृथ्वी पर मेरे पीछे-पीछे दौड़ेंगे, और मैं फिरि फिरि मुड़कर उन्हें देखूँगा। वह अपनी मृत्यु की योजना इस हिसाब से बना रहा है कि उसमें देखने का समय सबसे अधिक मिले। भागना उसे बुरा नहीं लग रहा, क्योंकि भागने में ही पीछे मुड़ने का अवसर है। और वाक्य समाप्त होता है एक ऐसे शब्द पर जो इस मुँह से सुनने की आदत हमें नहीं है, धन्य। मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है।
सार: छन्द और दोहे में मारीच अपने ही वध की कल्पना करके प्रसन्न होता है, कि जिनका क्रोध भी मोक्ष देता है वे ही अपने हाथ से बाण साधकर उसे मारेंगे, और वह भागते हुए बार-बार मुड़कर उन्हें देखेगा, और अपने को सबसे धन्य कहता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने पर दो आदमी एक ही बाण से मरने का निश्चय करते हैं, और दोनों के कारण उलटे हैं। रावण हिसाब लगाकर यह चुनता है, वैर के रास्ते से, और अपने ही मुँह से कह देता है कि इस तामस देह से भजन नहीं होगा। मारीच डर और प्रेम के मिले-जुले दबाव में यही चुनता है, और उसका प्रेम उस दिन से पड़ा हुआ है जिस दिन वह बाण से सौ योजन दूर जा गिरा था। तुलसी दोनों को एक ही पन्ने पर रख देते हैं और किसी को समतल नहीं करते। अन्त एक है, और जो उस अन्त तक ले गया वह एक नहीं है।
दूसरी बात जो साथ रह जाती है वह जानने की असमानता है। कथा अपने सुननेवाले को सब पहले बता देती है। हमें मालूम है कि सीताजी अग्नि में हैं। लक्ष्मण को नहीं मालूम, मारीच को नहीं मालूम, रावण को तो बिल्कुल नहीं मालूम। तुलसी यह भेद सुननेवाले को इसलिये नहीं देते कि आगे का दुःख हल्का हो जाये। आगे का दुःख हल्का नहीं होता, क्योंकि जो रोयेंगे उनके पास यह जानकारी नहीं है। यह भेद इसलिये दिया जाता है कि पढ़नेवाला दुःख के भीतर बैठकर भी यह याद रख सके कि प्रबन्ध किसी और का है। रोना और भरोसा, दोनों साथ चल सकते हैं, और यह पन्ना उसी का अभ्यास है।
और अन्त में मारीच। वह इस प्रसंग का सबसे कमजोर आदमी है और सबसे साफ आँख उसी की है। उसने सही सलाह दी, आदर से दी, प्रमाण के साथ दी, और बदले में गाली पायी। उसे बचाया नहीं गया। तुलसी की करुणा इस पन्ने पर बहुत छोटी और बहुत ठीक है: वह मृत्यु को नहीं रोकती, वह केवल यह तय कर देती है कि मृत्यु किसके हाथ से आयेगी। और यही उस आदमी के लिये पर्याप्त है। जिसके पास कुछ भी नहीं बचा था, उसके पास इतना बचा रहा कि वह किस ओर मुँह करके गिरे।
इस प्रसंग की सबसे अधिक दोहरायी जानेवाली पंक्ति झुकने के बारे में है, और वह संयोग नहीं है। रावण मारीच के सामने सिर नवाता है, और उसी नवाने के तुरन्त बाद अंकुश, धनुष, साँप और बिल्ली सामने रख दिये जाते हैं। चारों झुककर ही चोट करते हैं। पन्ना समाप्त होते-होते हमें दिख जाता है कि वह झुकना अपना काम कर चुका है। मारीच ने पूजा की, तर्क दिया, सूची गिनायी, और अन्त में वही करने चला जो पहले क्षण से तय था। नीच का झुकना दुःखदायी इसीलिये है कि वह विनय जैसा दिखता है और विनय होता नहीं।
और सबसे शान्त जगह इस पन्ने पर वही अग्नि है। उसे न किसी ने देखा, न किसी को बताया गया, और उसकी अवधि भी उसी वाक्य में बँध गयी जिसमें वह माँगी गयी थी, जबतक निशाचरों का नाश न हो। आगे जो कुछ भी होगा वह सब एक ऐसी घड़ी पर चल रहा है जो उस सूने क्षण में चुपचाप लगा दी गयी थी, जब लक्ष्मण कन्द-मूल-फल लेने गये हुए थे और कहनेवाले ने हँसकर बात आरम्भ की थी।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा २३ से २६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।