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शरभंग, मुनियों की अस्थियाँ और प्रतिज्ञा

रामचरितमानस · अरण्यकाण्ड · शरभंग, मुनियों की अस्थियाँ और प्रतिज्ञा

शरभंग, मुनियों की अस्थियाँ और प्रतिज्ञा

एक मुनि ब्रह्मलोक का रास्ता रोककर बैठा है कि पहले दर्शन हो जायें। थोड़ी दूर आगे रास्ते में हड्डियों का ढेर पड़ा है। इन दोनों के बीच वह वचन निकलता है जिस पर पूरा अरण्यकाण्ड खड़ा है।

अरण्यकाण्ड का यह प्रसंग एक मुनि के आश्रम से निकलकर दूसरे मुनि के आश्रम तक पहुँचता है, और रास्ते में जो पड़ता है वह पढ़नेवाले से भुलाया नहीं जाता। हड्डियों का ढेर। तुलसी उसका वर्णन नहीं करते। वे न गिनती बताते हैं, न किसी का नाम लेते हैं, न यह कहते हैं कि वह ढेर कितना ऊँचा था। वे केवल इतना लिखते हैं कि रघुनाथ ने उसे देखा, उनके मन में दया उमड़ी, और उन्होंने साथ चलनेवाले मुनियों से पूछा। उत्तर एक ही पंक्ति में आता है, और उस एक पंक्ति के बाद इस काण्ड की दिशा बदल जाती है।

पर इस पन्ने की बनावट देखने लायक है, क्योंकि वह प्रतिज्ञा अकेली नहीं खड़ी है। उसके पहले एक मुनि आता है जो ब्रह्मलोक के रास्ते में ही रुक गया था, और जाते-जाते एक ही वस्तु माँगता है, कि आप मेरे हृदय में बसिये। उसके बाद एक दूसरा मुनि आता है, जो प्रेम में इतना डूबा है कि उसे अपना रास्ता भी नहीं सूझता, और वर माँगने का अवसर मिलने पर वह भी ठीक वही एक वस्तु माँगता है, कि आप मेरे हृदय में बसिये। दो मुनि, दो दोहे, और बीच में वह अस्थियों का ढेर और वह उठी हुई भुजा। जो दोनों ओर माँगा जा रहा है वह हृदय में निवास है, और जो बीच में किया जा रहा है वह पृथ्वी की सफ़ाई है। तुलसी दोनों को एक ही साँस में रख देते हैं।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, और यह उन्हीं की चाल है। इस पन्ने पर दोहा सात से दोहा ग्यारह तक की कथा है। जहाँ तुलसी किसी का नाम नहीं लेते वहाँ हम भी नाम नहीं लेंगे, और जो वे नहीं कहते उसे किसी दूसरी रामकथा से उठाकर यहाँ नहीं रखेंगे। जितना इन चौपाइयों में है, उतना ही इस पन्ने पर है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • राम जो इस प्रसंग में पहले रोते हैं, फिर भुजा उठाते हैं, और वचन सबसे अन्त में बोलते हैं।
  • लक्ष्मण आगे चलते भाई के पीछे-पीछे चलनेवाले छोटे भाई, जो इस पूरे प्रसंग में एक शब्द नहीं बोलते।
  • जानकी दोनों भाइयों के बीच चलती हुईं, जिनकी उपस्थिति को तुलसी ब्रह्म और जीव के बीच की माया कह देते हैं।
  • शरभंग वे मुनि जो ब्रह्मलोक जाते-जाते रुक गये, दिन-रात रास्ता देखते रहे, और दर्शन के बाद ही शरीर छोड़ा।
  • सुतीक्ष्ण अगस्त्य मुनि के ज्ञानी शिष्य, जिन्हें स्वप्न में भी किसी दूसरे का भरोसा नहीं, और जो प्रभु के आने की ख़बर सुनते ही दौड़ पड़ते हैं।
  • अगस्त्य वे मुनि जिनके शिष्य सुतीक्ष्ण हैं, और जिनका नाम यहाँ केवल इसी परिचय के लिये आता है।
  • विराध रास्ते में मिला असुर, जो सामने आते ही मारा गया और मरते ही सुन्दर रूप पाकर परम धाम चला गया।
  • भवानी पार्वती, जिन्हें शिवजी यह कथा सुना रहे हैं, और जिनसे कहा जाता है कि वह दशा कही नहीं जा सकती।

रास्ता स्वयं रास्ता देता है

यह प्रसंग किसी घटना से नहीं खुलता, एक प्रणाम से खुलता है। जिस मुनि के आश्रम में वे ठहरे थे, उनके चरणकमलों में सिर नवाकर तीनों आगे बढ़ते हैं। उस मुनि का नाम तुलसी इन चौपाइयों में नहीं लेते, इसलिये हम भी नहीं लेंगे। वे नाम की जगह एक परिचय रखते हैं, और परिचय इतना बड़ा है कि उसके सामने कोई भी नाम छोटा पड़ जाता है।

मुनि पद कमल नाइ करि सीसा । चले बनहि सुर नर मुनि ईसा॥
आगें राम अनुज पुनि पाछें । मुनि बर बेष बने अति काछें॥

चौपाई १

देवताओं के, मनुष्यों के और मुनियों के स्वामी वन को चल दिये। पहली ही अर्धाली में वह विरोध रख दिया गया है जो आगे पूरे काण्ड पर छाया रहेगा। जिनके सामने तीनों झुकते हैं, वे स्वयं झुककर चले हैं। और अगली अर्धाली में वह चित्र आता है जिसे मन बहुत देर तक पकड़े रहता है। आगे राम, पीछे छोटे भाई, और दोनों मुनियों का श्रेष्ठ वेष बनाये हुए बहुत सुन्दर लग रहे हैं। जटा और वल्कल पहन लेने से कुछ ढका नहीं, उलटे और खुल गया। बने अति काछें, वेष सजाकर बाँधा हुआ है, और उसी सजावट में वह चीज़ झलक रही है जिसे वेष छिपाने के लिये पहना गया था।

पर चलनेवाले तीन हैं, और तीसरे के लिये तुलसी एक ऐसी उपमा रखते हैं जो इस पूरे काण्ड में सबसे अधिक दोहरायी जाती है। ध्यान दीजिये कि वे स्थान की बात कर रहे हैं, स्वभाव की नहीं। कौन आगे है, कौन पीछे, और बीच में कौन है।

उभय बीच श्री सोहइ कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी॥
सरिता बन गिरि अवघट घाटा । पति पहिचानि देहिं बर बाटा॥

चौपाई २

दोनों के बीच में श्री कैसी सुशोभित हैं, जैसे ब्रह्म और जीव के बीच माया हो। यह उपमा दर्शन की पोथी से नहीं उठायी गयी है, वह चलते हुए तीन लोगों की पंक्ति देखकर बनी है। जो आगे है वह ब्रह्म, जो पीछे है वह जीव, और जो बीच में है वह वही है जिसके कारण दोनों एक दूसरे को सीधे नहीं देख पाते। तुलसी इससे आगे व्याख्या नहीं करते। वे उपमा रखकर तुरन्त आगे बढ़ जाते हैं, और जो आगे आता है वह और भी कोमल है। नदी, वन, पर्वत और दुर्गम घाटियाँ, ये सब अपने स्वामी को पहचानकर सुन्दर रास्ता दे देते हैं। जिस वन को सब कष्ट का नाम मानते हैं, वही वन यहाँ स्वागत में हटकर खड़ा हो जाता है।

और ऊपर भी वही हो रहा है। जहाँ-जहाँ रघुनाथ जाते हैं, वहाँ-वहाँ बादल आकाश में छाया किये चलते हैं। धूप का प्रबन्ध किसी ने नहीं किया, वह अपने आप हो रहा है। इसी चलते-चलते रास्ते में विराध नाम का असुर मिला, और सामने आते ही मारा गया। तुलसी इस वध पर आधी पंक्ति भी ख़र्च नहीं करते, क्योंकि उनकी रुचि मारने में नहीं है। उनकी रुचि उसमें है जो मरने के बाद हुआ।

तुरतहिं रुचिर रूप तेहिं पावा । देखि दुखी निज धाम पठावा॥
पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा॥

चौपाई ३

मरते ही उसने तुरन्त सुन्दर रूप पा लिया, और उसे दुखी देखकर प्रभु ने उसे अपने परम धाम भेज दिया। जिस हाथ ने मारा उसी ने भेजा, और बीच में कोई शर्त नहीं रखी गयी। ध्यान दीजिये कि तुलसी ने कारण क्या लिखा है, देखि दुखी, उसे दुखी देखकर। दण्ड पूरा हो चुका था, अब जो बचा था वह केवल एक दुखी जीव था, और उसके साथ वही किया गया जो इस पूरे प्रसंग में सबके साथ किया जाता है। इसके तुरन्त बाद अगली अर्धाली में वे सुन्दर छोटे भाई और जानकी के साथ वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ मुनि शरभंग हैं।

सार: मुनि के चरणों में सिर नवाकर तीनों वन को चलते हैं, आगे राम और पीछे लक्ष्मण, बीच में जानकी, जिन्हें तुलसी ब्रह्म और जीव के बीच की माया कहते हैं। नदी, वन और पर्वत स्वामी को पहचानकर रास्ता दे देते हैं, बादल छाया किये चलते हैं, रास्ते में मिला विराध मारे जाते ही सुन्दर रूप पाकर परम धाम भेज दिया जाता है, और तीनों शरभंग मुनि के पास पहुँचते हैं।

जिसने ब्रह्मलोक का रास्ता रोक रखा था

अब दृश्य ठहर जाता है। अभी तक सब चल रहा था, नदी हट रही थी, बादल ऊपर साथ दे रहे थे, असुर सामने आकर गिर रहा था। यहाँ आकर कुछ भी नहीं चलता। केवल दो आँखें हैं और एक मुख है, और उन दोनों के बीच जो हो रहा है उसे तुलसी एक ही दोहे में बाँध देते हैं।

देखि राम मुख पंकज मुनिबर लोचन भृंग।
सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभंग॥ ७॥

दोहा ७

मुनिश्रेष्ठ के नेत्ररूपी भौंरे राम का मुखकमल देखकर बड़े आदर के साथ उसका रस पी रहे हैं। उपमा में जो काम शब्द सादर कर रहा है वह बहुत बड़ा है। भौंरा कमल पर आदर से नहीं बैठता, वह भूख से बैठता है। यहाँ जो पी रहा है वह जानता है कि क्या पी रहा है, और जानते हुए पी रहा है। और इसके बाद तुलसी अपनी ओर से एक वाक्य जोड़ देते हैं, जो इस पूरे प्रसंग में उनका अपना निर्णय है। शरभंग का जन्म धन्य है। जिस जन्म को धन्य कहा जा रहा है वह उसी क्षण समाप्त होनेवाला है, और यही इस कथा की सबसे बड़ी बात है।

मुनि बोलते हैं, और पहले वाक्य में ही सम्बोधन ऐसा रखते हैं जो एक साथ दो लोकों को छू लेता है।

कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला॥
जात रहेउँ बिरंचि के धामा। सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा॥

चौपाई ४

सुनिये कृपालु रघुवीर, शंकर के मनरूपी मानसरोवर के राजहंस। यह सम्बोधन यों ही नहीं है। जिस कथा को शिवजी स्वयं पार्वती को सुना रहे हैं, उसी कथा के भीतर एक मुनि नायक को शिव के मन का हंस कहकर पुकारता है। और उसके बाद वह सूचना आती है जो इस पूरे चरित्र को खड़ा कर देती है। मैं ब्रह्मा के धाम को जा रहा था, और इसी बीच कानों से सुना कि राम वन में आवेंगे।

यहाँ रुककर सोचिये कि यह वाक्य कितना असाधारण है। तपस्या का सारा फल सामने खड़ा था। रास्ता खुल चुका था, यात्रा आरम्भ हो चुकी थी, और जिस लोक के लिये जीवन भर साधन किया गया था वह हाथ में था। और उसी समय कान में एक बात पड़ी, और पाँव रुक गये। उसने ब्रह्मलोक को मना नहीं किया, उसने केवल उसे प्रतीक्षा में डाल दिया।

चितवत पंथ रहेउँ दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती॥
नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना॥

चौपाई ५

तब से मैं दिन-रात रास्ता देखता रहा हूँ, और अब प्रभु को देखकर मेरी छाती ठंडी हो गयी। जुड़ानी छाती, यह शब्द किसी शास्त्र का नहीं है, घर का है। जो भीतर वर्षों से जल रहा था वह अब ठंडा हुआ। और ठीक इसके बाद वह मुनि, जिसके सामने ब्रह्मलोक का द्वार खुला खड़ा था, अपने विषय में जो कहता है वह सुनने योग्य है। हे नाथ, मैं सब साधनों से हीन हूँ। आपने मुझे दीन सेवक जानकर कृपा की है।

जिसके पास इतना संचय था कि ब्रह्मलोक मिल रहा था, वह अपने को सब साधनों से हीन कह रहा है। यह विनय का शिष्टाचार नहीं है, यह एक हिसाब है। जो मिला वह साधन से मिलता तो साधन का होता। जो सामने खड़ा है वह साधन से नहीं आया, इसलिये उसे कृपा ही कहना पड़ेगा। और इसी हिसाब की अगली कड़ी में वह वाक्य आता है जो इस पूरे प्रसंग का सबसे साहसी वाक्य है।

सार: शरभंग के नेत्र भौंरों की तरह राम के मुखकमल का रस पीते हैं और तुलसी उनके जन्म को धन्य कहते हैं। मुनि बताते हैं कि वे ब्रह्मा के धाम जा रहे थे, रास्ते में सुना कि राम वन में आवेंगे, तब से दिन-रात राह देखते रहे, और अब दर्शन पाकर छाती ठंडी हुई। वे अपने को सब साधनों से हीन कहकर सब कुछ कृपा के खाते में डाल देते हैं।

यह एहसान नहीं, आपका अपना प्रण है

अब तक जो कहा गया वह कृतज्ञता थी। अब जो कहा जाता है वह कृतज्ञता से एक क़दम आगे चला जाता है, और वहाँ पहुँचता है जहाँ भक्त अपने स्वामी को उसकी अपनी प्रतिज्ञा याद दिला देता है।

सो कछु देव न मोहि निहोरा । निज पन राखेउ जन मन चोरा॥
तब लगि रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी॥

चौपाई ६

हे देव, यह मुझ पर आपका कोई एहसान नहीं है। हे भक्तों के मन को चुरानेवाले, ऐसा करके आपने अपने ही प्रण की रक्षा की है। निज पन राखेउ, अपने प्रण की रक्षा की। यह वाक्य कहने के लिये बड़ी निकटता चाहिये, क्योंकि इसमें कहनेवाला अपने को हटाकर बीच से बाहर कर देता है और सारा श्रेय स्वामी के अपने स्वभाव पर डाल देता है। जो दीन के पास चला आता है वह इसलिये नहीं आता कि दीन ने बुलाया, वह इसलिये आता है कि वही उसका स्वभाव है, और स्वभाव से बँधा हुआ व्यक्ति एहसान नहीं करता।

और इसके तुरन्त बाद वह माँग आती है जिसमें एक साथ प्रेम भी है और समय की समझ भी। अब इस दीन के कल्याण के लिये तब तक यहीं ठहरिये, जब तक मैं शरीर छोड़कर आपसे मिलूँ। मुनि यह नहीं कह रहे कि मुझे और जीवन दीजिये। वे यह कह रहे हैं कि थोड़ी देर रुक जाइये, इतनी देर कि मैं जा सकूँ। जो प्रतीक्षा वर्षों चली, उसे अब कुछ घड़ी और चाहिये, और वे घड़ियाँ जाने की तैयारी के लिये चाहिये।

जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा । प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा॥
एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा। बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा॥

चौपाई ७

योग, यज्ञ, जप, तप और व्रत, जो कुछ भी किया था, सब प्रभु को समर्पित करके बदले में भक्ति का वर ले लिया। यह इस पन्ने का सबसे स्पष्ट सौदा है, और इसमें एक ओर जीवन भर की कमाई है और दूसरी ओर एक ही वस्तु। जिसने यह किया वह जानता था कि कमाई अपने पास रहकर लोक दिलाती है, और समर्पित होकर स्वामी दिलाती है। और फिर वह अर्धाली आती है जिसके बाद कोई और बात नहीं बचती। इस प्रकार सर रचकर, यानी चिता रचकर, मुनि शरभंग हृदय से सब आसक्ति छोड़कर उस पर जा बैठे।

ध्यान दीजिये कि यह काम किसके सामने हो रहा है। जिसकी प्रतीक्षा में वे रुके थे वह सामने खड़ा है, और उसके सामने वे अपनी चिता बना रहे हैं। इसमें कोई शोक नहीं है, कोई विदा नहीं है, कोई अन्तिम उपदेश नहीं है। चिता उसी शान्ति से बनायी जा रही है जिस शान्ति से कोई आसन बिछाता है। और उस पर बैठकर जो एक वाक्य कहा जाता है, वही इस मुनि की पूरी जीवनभर की कमाई का अन्तिम रूप है।

सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम।
मम हियँ बसहु निरंतर सगुनरूप श्रीराम॥ ८॥

दोहा ८

हे नीले बादल के समान श्याम शरीरवाले सगुणरूप राम, सीता और छोटे भाई सहित आप निरन्तर मेरे हृदय में निवास कीजिये। इस दोहे में एक-एक शब्द चुना हुआ है। जो चिता पर बैठा है वह निराकार नहीं माँग रहा, वह रंग माँग रहा है, नीले बादल का रंग। वह अकेले राम नहीं माँग रहा, वह तीनों को माँग रहा है, ठीक वैसे ही जैसे उसने उन्हें अभी-अभी सामने देखा है। और वह सगुनरूप कहकर माँग रहा है, यानी जो रूप आँख ने देखा उसी को भीतर बसा लेना चाहता है। अन्तिम घड़ी में उसने वही माँगा जो सामने था।

सार: मुनि कहते हैं कि यह आपका एहसान नहीं, अपने प्रण की रक्षा है, और प्रार्थना करते हैं कि तब तक ठहरिये जब तक मैं शरीर छोड़कर मिलूँ। वे अपने सारे योग, यज्ञ, जप, तप और व्रत प्रभु को देकर बदले में भक्ति का वर ले लेते हैं, चिता रचकर उस पर बैठते हैं, और दोहे में यही माँगते हैं कि सीता और लक्ष्मण सहित सगुणरूप राम निरन्तर उनके हृदय में बसें।

भेद भगति का वर

अब वह होता है जिसकी तैयारी अभी-अभी हुई थी, और तुलसी उसे बिना किसी विस्तार के कह देते हैं। जहाँ दूसरे कवि दस पंक्तियाँ लगाते, वहाँ यहाँ आधी पंक्ति लगी है। पर उसके तुरन्त बाद जो आधी पंक्ति आती है वह इस पूरे प्रसंग का सिद्धान्त है, और वही इसे किसी और मृत्यु से अलग कर देती है।

अस कहि जोग अगिनि तनु जारा । राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा॥
ताते मुनि हरि लीन न भयऊ । प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ॥

चौपाई ८

ऐसा कहकर उन्होंने योग की अग्नि से अपना शरीर जला डाला, और राम की कृपा से वैकुण्ठ चले गये। ध्यान दीजिये कि किसी ने चिता को आग नहीं दिखायी। आग भीतर से आयी। और अब वह पंक्ति, जिसके लिये यह सारी कथा कही गयी है। मुनि हरि में लीन नहीं हुए, क्योंकि उन्होंने पहले ही भेद भगति का वर ले लिया था।

यह वाक्य बहुत कम शब्दों में एक बहुत बड़ी बात तय कर देता है। लीन हो जाना, यानी बूँद का समुद्र में मिल जाना, अन्त नहीं है। एक दूसरा भी अन्त है, जिसमें बूँद बनी रहती है ताकि समुद्र को देख सके। जिसने भेद माँगा उसने अपने लिये कुछ नहीं माँगा, उसने केवल देखनेवाले को बचा लिया। जो प्रेम करता है उसे प्रेम करने के लिये अपना होना चाहिये, और यही कारण है कि यह मुनि मिट नहीं गया, वह पहुँच गया। तुलसी इस पर बहस नहीं करते। वे केवल कारण बताकर आगे बढ़ जाते हैं, और उनका आगे बढ़ना ही बता देता है कि उनके लिये यह बहस का विषय ही नहीं है।

और चारों ओर जो खड़े थे, उन्होंने यह देखा। ऋषियों के समूह मुनिश्रेष्ठ की यह गति देखकर अपने हृदय में विशेष रूप से सुखी हुए। यह प्रतिक्रिया ध्यान देने योग्य है। किसी ने विलाप नहीं किया, किसी ने रोका नहीं, किसी ने यह नहीं कहा कि अभी और रह जाइये। जो लोग जानते हैं कि कहाँ जाया जा रहा है, वे विदा पर सुखी होते हैं। और फिर सारे मुनिवृन्द स्तुति करने लगते हैं, और उनकी स्तुति में जो दो नाम आते हैं वे इस पूरे काण्ड की भूमिका बाँध देते हैं। शरणागत का हित करनेवाले की जय, करुणा के मूल की जय। अभी-अभी जो हुआ वह शरणागत के साथ हुआ था, और अब जो होने जा रहा है वह करुणा के कारण होगा।

सार: शरभंग योग की अग्नि से शरीर जलाकर राम की कृपा से वैकुण्ठ जाते हैं, और तुलसी कारण बताते हैं कि वे हरि में लीन इसलिये नहीं हुए क्योंकि पहले ही भेद-भक्ति का वर ले चुके थे। ऋषिसमूह यह गति देखकर हृदय में सुखी होता है और सारे मुनि शरणागत के हितकारी और करुणा के मूल की जय बोलते हैं।

अस्थियों का ढेर

यहाँ से प्रसंग का स्वर बदल जाता है, और वह बदलाव बहुत धीरे आता है। एक वाक्य में यात्रा फिर शुरू होती है, और अगले ही वाक्य में वह चीज़ सामने आ जाती है जिसके लिये यह पूरा काण्ड लिखा गया है। तुलसी इन दोनों को एक ही चौपाई में रखते हैं, बिना किसी चेतावनी के, जैसे रास्ते में सचमुच वह मिलती है।

पुनि रघुनाथ चले बन आगे । मुनिबर बृंद बिपुल सँग लागे॥
अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया॥

चौपाई ९

फिर रघुनाथ आगे वन में चले, और श्रेष्ठ मुनियों के बहुत से समूह साथ हो लिये। यह छोटी सूचना बहुत काम की है। अब वे अकेले नहीं चल रहे। जो लोग साथ चल रहे हैं वे उसी वन के रहनेवाले हैं, वे जानते हैं कि यहाँ क्या होता आया है, और थोड़ी देर में उन्हीं से यह पूछा जायेगा। और तभी वह दिखता है। हड्डियों का ढेर देखकर रघुनाथ को बड़ी दया आयी, और उन्होंने मुनियों से पूछा।

इस अर्धाली में जो क्रम है वह याद रखने योग्य है। पहले देखना, फिर दया, फिर प्रश्न। क्रोध कहीं नहीं है। तुलसी ने यह नहीं लिखा कि देखकर क्रोध आया और तब पूछा। उन्होंने लिखा लागि अति दाया, बड़ी दया आयी। जो आगे होने जा रहा है वह इसी दया से निकलेगा, क्रोध से नहीं, और यही इस प्रतिज्ञा को दूसरी प्रतिज्ञाओं से अलग करता है।

उत्तर देनेवाले मुनि पहले एक बात साफ़ कर देते हैं, और उस बात में हल्का सा उलाहना भी है और बहुत सारी श्रद्धा भी।

जानतहूँ पूछिअ कस स्वामी। सबदरसी तुम्ह अंतरजामी॥
निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए॥

चौपाई १०

हे स्वामी, आप सर्वदर्शी हैं और अन्तर्यामी हैं, जानते हुए भी हमसे कैसे पूछ रहे हैं। इस प्रश्न का उत्तर यहाँ कोई नहीं देता, क्योंकि उत्तर पूछने के भीतर ही रखा हुआ है। जो सब जानता है वह इसलिये पूछता है कि जिनके ऊपर बीती है उनके मुँह से निकले। और तब वह निकलता है। राक्षसों के दलों ने सब मुनियों को खा डाला है।

यही पूरा उत्तर है। कोई विवरण नहीं, कोई नाम नहीं, कोई तिथि नहीं। निसिचर निकर सकल मुनि खाए, और उसमें एक शब्द सब कुछ ढो रहा है, सकल, यानी सारे के सारे। जो ढेर सामने पड़ा था उसका हिसाब इस एक शब्द में है। और अगली आधी पंक्ति में तुलसी वह लिखते हैं जो प्रतिज्ञा से पहले आता है और जिसे प्रायः लोग भूल जाते हैं। यह सुनते ही रघुवीर के नेत्रों में जल छा गया।

आँसू पहले आये। वचन बाद में आया। और दोनों के बीच जो हुआ, वह शरीर ने किया।

निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥ ९॥

दोहा ९

भुजा उठाकर प्रण किया कि मैं पृथ्वी को निशाचरों से रहित कर दूँगा। इस प्रतिज्ञा को बड़ा बनाने के लिये तुलसी ने कुछ नहीं किया, और शायद इसीलिये यह इतनी बड़ी है। न कोई सेना गिनायी गयी, न कोई समय बाँधा गया, न किसी देवता को साक्षी बनाया गया, न कोई शर्त रखी गयी। एक उठी हुई भुजा, और एक वाक्य। और वह वाक्य पृथ्वी के विषय में है, अपने विषय में नहीं। इसमें कहीं यह नहीं कहा गया कि मैं बदला लूँगा। कहा यह गया कि यह भूमि निशाचरों से रहित होगी, यानी जिनका खाया जाना अभी बाक़ी है उनकी रक्षा का प्रबन्ध किया जा रहा है।

और दोहे का दूसरा चरण उस प्रतिज्ञा के तुरन्त बाद का काम बताता है, जो उतना ही कहने योग्य है। फिर सब मुनियों के आश्रमों में जा-जाकर उन्हें सुख दिया। प्रतिज्ञा करके वे युद्ध की ओर नहीं दौड़े। वे एक-एक आश्रम में गये। जिन लोगों के डर से यह वचन निकला था, पहले उन्हीं के पास जाकर बैठे।

सार: आगे चलते हुए रघुनाथ को हड्डियों का ढेर दिखता है और उन्हें बड़ी दया आती है। मुनि बताते हैं कि निशाचरों के दलों ने सब मुनियों को खा डाला है, यह सुनते ही राम की आँखों में जल भर आता है, और तब वे भुजा उठाकर प्रण करते हैं कि पृथ्वी को निशाचरों से रहित कर देंगे। इसके बाद वे एक-एक आश्रम में जाकर मुनियों को सुख देते हैं।

सुतीक्ष्ण, जिन्हें अपना रास्ता नहीं सूझता

इसी आश्रम-आश्रम फिरने में से अगला प्रसंग निकलता है, और उसका स्वर पिछले से बिलकुल उलटा है। अभी-अभी जो कहा गया वह पृथ्वी के विषय में था, अब जो आता है वह एक व्यक्ति के विषय में है। और वह व्यक्ति इस पूरे काण्ड का सबसे बेसुध आदमी है।

मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना॥
मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक॥

चौपाई ११

मुनि अगस्त्य के एक सुजान शिष्य थे, नाम सुतीक्ष्ण, और उनकी प्रीति भगवान् में थी। परिचय की दूसरी अर्धाली में जो कहा जाता है वह इस चरित्र की पूरी बनावट है। मन, वचन और कर्म से वे राम के चरणों के सेवक थे, और स्वप्न में भी उन्हें किसी दूसरे देवता का भरोसा नहीं था। जागते हुए एक निष्ठा रखना कठिन तो है, पर सम्भव है। स्वप्न में वही निष्ठा रहना, यह उस आदमी के भीतर की बात है जिस पर उसका अपना वश नहीं चलता। तुलसी वहीं तक पहुँचकर यह परिचय पूरा करते हैं।

फिर ख़बर पहुँचती है। प्रभु का आगमन कानों से सुनते ही वे तरह-तरह के मनोरथ करते हुए आतुर होकर दौड़ पड़े। और दौड़ते-दौड़ते जो सोचते जा रहे हैं वह सुनने लायक है। हे विधाता, क्या दीनबन्धु रघुनाथ मुझ जैसे मूढ़ पर भी दया करेंगे। क्या स्वामी राम छोटे भाई सहित मुझसे अपने सेवक की तरह मिलेंगे। मेरे मन में दृढ़ भरोसा नहीं होता, क्योंकि मेरे भीतर न भक्ति है, न वैराग्य, न ज्ञान। पाँव उधर दौड़ रहे हैं और मन भीतर हिसाब लगा रहा है, और हिसाब हर बार शून्य पर आकर रुक जाता है।

और तब, दौड़ते-दौड़ते ही, उन्हें एक बात याद आती है जो सारा हिसाब पलट देती है।

नहिं सतसंग जोग जप जागा । नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा॥
एक बानि करुनानिधान की । सो प्रिय जाकें गति न आन की॥

चौपाई १२

मैंने न सत्संग किया, न योग, न जप, न यज्ञ, और चरणकमलों में मेरा दृढ़ अनुराग भी नहीं है। पहली अर्धाली में सारी सूची ख़ाली है। और दूसरी अर्धाली में वह याद आता है जो सूची से बाहर की चीज़ है। करुणानिधान की एक बानि है, एक आदत, कि जिसे किसी दूसरे का सहारा नहीं, वह उन्हें प्रिय होता है।

इस एक शब्द पर रुकिये। बानि, यानी स्वभाव की वह चाल जो सोचकर नहीं चली जाती। सुतीक्ष्ण ने अपने पक्ष में कोई गुण नहीं गिनाया। उन्होंने केवल स्वामी की आदत गिनायी, और उस आदत की शर्त यह है कि दावेदार के पास कुछ न हो। जिसके पास कुछ नहीं है वह इस शर्त को पूरा करता है, और इस प्रकार जो अभी तक उनकी सबसे बड़ी कमी थी वही उनका सबसे बड़ा अधिकार बन जाती है। यह याद आते ही उनके भीतर जो होता है वह उन्हें आदमी नहीं रहने देता। आज मेरे नेत्र सफल होंगे, भवबन्धन से छुड़ानेवाले उस मुखारविन्द को देखकर। और इसी के साथ शिवजी बीच में आकर पार्वती से कहते हैं कि ज्ञानी मुनि प्रेम में पूरी तरह डूब गये, और वह दशा कही नहीं जा सकती।

पर कही नहीं जा सकती, यह कहकर भी तुलसी उसे दिखा देते हैं, और जिस तरह दिखाते हैं वह इस पन्ने का सबसे जीवित चित्र है।

दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा॥
कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई । कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई॥

चौपाई १३

उन्हें दिशा और कोना कुछ नहीं सूझ रहा, रास्ता नहीं सूझ रहा। मैं कौन हूँ और कहाँ चला जा रहा हूँ, यह भी नहीं जानते। कभी पीछे घूमकर फिर आगे चल पड़ते हैं, कभी गुण गा-गाकर नाचने लगते हैं। जिस आदमी का परिचय अभी-अभी सुजान और ज्ञानी कहकर दिया गया था, वही अब यह नहीं जानता कि वह कौन है। ज्ञान ने उसे बचाया नहीं, प्रेम ने उसे ले लिया। और तुलसी इस दशा पर कोई टिप्पणी नहीं करते। वे बस उसे चलने देते हैं, आगे, पीछे, फिर आगे, और बीच-बीच में नाचते हुए।

सार: अगस्त्य के शिष्य सुतीक्ष्ण, जिन्हें स्वप्न में भी किसी दूसरे का भरोसा नहीं, आगमन की ख़बर सुनते ही दौड़ पड़ते हैं और रास्ते भर सोचते हैं कि मुझ जैसे पर दया क्यों होगी। फिर उन्हें करुणानिधान की वह आदत याद आती है कि जिसका कोई दूसरा सहारा न हो वही उन्हें प्रिय है, और इसी के साथ वे ऐसे प्रेम में डूब जाते हैं कि दिशा, रास्ता और अपना नाम तक भूल जाते हैं।

पेड़ की आड़ में खड़ा हुआ स्वामी

इस दशा को कोई देख रहा है, और यही इस प्रसंग का सबसे कोमल रहस्य है। मुनि ने प्रगाढ़ प्रेमाभक्ति पा ली है, और प्रभु एक पेड़ की आड़ में छिपकर उन्हें देख रहे हैं। जो मिलने आया था वह छिपकर खड़ा है। जो उसे खोजने दौड़ा था वह अपने ही भीतर खो गया है। और छिपे हुए देखनेवाले से यह देखा नहीं जाता। मुनि का अत्यन्त प्रेम देखकर भवभय को हरनेवाले उनके हृदय में ही प्रकट हो गये।

अब आगे जो होता है वह कथा का सबसे विचित्र मोड़ है। हृदय में दर्शन पाते ही मुनि बीच रास्ते में अचल होकर बैठ गये, और उनका शरीर रोमांच से कटहल के फल जैसा हो गया। यह उपमा किसी दरबारी कवि की नहीं है। कटहल, यानी वह फल जिसे हर घर में देखा गया है, जिसकी पूरी खाल काँटों से भरी होती है। रोमांच का इससे सही चित्र नहीं मिल सकता था, और उसे पाने के लिये तुलसी को रसोई तक जाना पड़ा।

तब रघुनाथ पास चले आये, और अपने जन की यह दशा देखकर मन में प्रसन्न हुए। वे मुनि को बहुत तरह से जगाते हैं, पर मुनि नहीं जागते, क्योंकि उन्हें भीतर ध्यान का जो सुख मिल रहा है वह बाहर के जगाने से बड़ा है। बाहर स्वयं वही खड़ा है जिसका भीतर ध्यान हो रहा है, और भीतरवाला बाहरवाले को जगाने नहीं दे रहा। इस अड़चन को हटाने के लिये जो किया जाता है वह बहुत चतुर है। राम अपना राजरूप छिपा लेते हैं और मुनि के हृदय के भीतर अपना चतुर्भुज रूप दिखा देते हैं।

भीतर का दृश्य बदलते ही ध्यान टूट जाता है, और मुनि व्याकुल होकर उठते हैं। तुलसी उस व्याकुलता के लिये जो उपमा देते हैं वह इस पूरे काण्ड में सबसे तीखी है, जैसे मणि छिन जाने पर श्रेष्ठ सर्प व्याकुल हो जाता है। जिसके माथे का उजाला ही उससे ले लिया गया हो। और उसी व्याकुलता में आँख खुलती है, और सामने वही है, श्यामसुन्दर शरीर, सीता और छोटे भाई सहित, सुख का धाम। जो भीतर से लिया गया था वह बाहर रख दिया गया था।

परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी॥
भुज बिसाल गहि लिए उठाई । परम प्रीति राखे उर लाई॥

चौपाई १४

प्रेम में डूबे हुए वे बड़भागी मुनि लकुट इव, लाठी की तरह गिरकर चरणों में लग गये। यह उपमा देखने में साधारण है और है बहुत बड़ी। लाठी गिरती है तो सँभलती नहीं, घुटने नहीं मोड़ती, हाथ का सहारा नहीं लेती। वह पूरी की पूरी एक साथ गिरती है। और उसके बाद जो होता है वह उठाने का काम है। राम ने अपनी विशाल भुजाओं से पकड़कर उन्हें उठा लिया और बड़े प्रेम से हृदय से लगा रखा।

इस भेंट पर तुलसी एक उपमा और रखते हैं, और उसमें रंग ही रंग हैं। कृपालु राम मुनि से मिलते हुए ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो सोने के वृक्ष से तमाल का वृक्ष गले लगकर मिल रहा हो। सोना और तमाल, पीला और गहरा श्याम, दो वृक्ष जो हिलते नहीं, केवल एक दूसरे से लगे खड़े रह जाते हैं। और उसके बाद मुनि खड़े-खड़े राम का मुख देखते रह जाते हैं, मानो चित्र में लिखकर बनाये गये हों। अभी-अभी जो नाचता फिर रहा था वह अब चित्र की तरह स्थिर है।

सार: प्रभु पेड़ की आड़ से मुनि की दशा देखते हैं और उनके हृदय में प्रकट हो जाते हैं। मुनि रास्ते में ही अचल बैठ जाते हैं, जगाने पर नहीं जागते, तब राम अपना राजरूप छिपाकर हृदय में चतुर्भुज रूप दिखाते हैं, और मणि छिने सर्प की तरह व्याकुल होकर उठे मुनि सामने सीता और लक्ष्मण सहित राम को पाते हैं, लाठी की तरह गिरते हैं और भुजाओं से उठाकर हृदय से लगा लिये जाते हैं।

वह वर जो कभी माँगा नहीं गया

इसके बाद का हिस्सा आश्रम में होता है, और उसमें एक बात बार-बार लौटती है। मुनि हृदय में धीरज धरकर बार-बार चरणों को छूते हैं, फिर प्रभु को अपने आश्रम में लाकर अनेक प्रकार से पूजा करते हैं। बारहिं बार, बार-बार। जो एक बार में पूरा हो जाता उसे बार-बार करना पड़ रहा है, क्योंकि भीतर जो भरा है वह एक प्रणाम में नहीं समाता।

और फिर वे स्तुति करने बैठते हैं, और स्तुति शुरू करने से पहले अपनी असमर्थता कह देते हैं। हे प्रभु, मेरी विनती सुनिये, मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ। आपकी महिमा अपार है और मेरी बुद्धि थोड़ी है, जैसे सूर्य के सामने जुगनू का उजाला। यह उपमा अपने को छोटा दिखाने के लिये नहीं है। जुगनू का उजाला झूठा नहीं होता, वह सचमुच उजाला है, बस उसका माप दूसरा है। इतना कहकर वे रुकते नहीं, वे स्तुति करते हैं, और वहाँ तुलसी की भाषा बदलकर संस्कृत हो जाती है।

उस स्तुति में जो चित्र आते हैं वे एक के बाद एक बढ़ते जाते हैं। जो मोह के घने वन को जला देनेवाली अग्नि हैं। जो संतरूपी कमलों के वन को खिला देनेवाले सूर्य हैं। जो राक्षसरूपी हाथियों के झुंड के लिये सिंह हैं, और आवागमनरूपी पक्षी के लिये बाज़। जो संशयरूपी साँप को निगल जानेवाले गरुड़ हैं, और कठोर तर्क से पैदा हुए विषाद को शान्त कर देते हैं। जो भक्तों के लिये कल्पवृक्ष का बगीचा हैं, और क्रोध, लोभ, मद तथा काम को डरा देते हैं। जिनकी भुजाओं का प्रताप अतुलनीय है और जिनका नाम कलियुग के बड़े से बड़े मल को तोड़ देता है। ये सब उपमाएँ एक ही काम कर रही हैं, वे भीतर के शत्रुओं को बाहर के शत्रुओं की शक्ल दे रही हैं, और उन सबके सामने वही एक खड़ा कर रही हैं जो अभी-अभी अस्थियों के ढेर के सामने खड़ा हुआ था।

और संस्कृत की उस ऊँचाई से उतरकर तुलसी फिर अपनी अवधी में लौटते हैं, और लौटते ही स्तुति का रुख़ बदल जाता है। यद्यपि आप निर्मल हैं, व्यापक हैं, अविनाशी हैं और सबके हृदय में निरन्तर बसते हैं, तथापि हे खरारि, लक्ष्मण और सीता सहित वन में विचरनेवाले आप इसी रूप में मेरे मन में बसिये। सारा तत्त्व मान लेने के बाद भी माँग वही है जो शरभंग की थी, और उसी रूप में है जो आँख ने देखा है।

अगली अर्धाली में यह बात और साफ़ हो जाती है, और उसमें एक हल्की सी ज़िद भी है। जो आपको सगुण, निर्गुण और अन्तर्यामी जानते हों, वे जाना करें। मेरे हृदय को तो कोसलपति कमलनयन राम ही अपना घर बनावें। दूसरों के ज्ञान पर कोई आपत्ति नहीं है, बस अपने लिये एक ही रास्ता चुन लिया गया है। और फिर वह वाक्य आता है जिसमें अभिमान शब्द इस तरह प्रयोग होता है कि वह अभिमान रह ही नहीं जाता। ऐसा अभिमान भूलकर भी न छूटे कि मैं सेवक हूँ और रघुनाथ मेरे स्वामी हैं। जिस चीज़ को छोड़ने के लिये सारा शास्त्र कहता है, उसी को यहाँ बचाये रखने की प्रार्थना है, क्योंकि उसका विषय बदल दिया गया है।

ये वचन सुनकर राम मन में बहुत प्रसन्न हुए और हर्षित होकर मुनि को फिर हृदय से लगा लिया। और फिर वे वह प्रस्ताव रखते हैं जो इस पन्ने पर पहली बार आता है। मुझे परम प्रसन्न जानिये, जो वर माँगिये वही मैं दूँ। और यहाँ सुतीक्ष्ण वह उत्तर देते हैं जिस पर यह पूरा प्रसंग टिका है। मैंने तो वर कभी माँगा ही नहीं, मुझे यह समझ ही नहीं पड़ता कि क्या झूठ है और क्या सच। जिसने कभी माँगना सीखा ही नहीं, उसके सामने माँगने का द्वार खोल दिया गया, और वह खाली हाथ खड़ा रह गया।

फिर वे जो कहते हैं वह माँग का सबसे सुन्दर रूप है। हे रघुनाथ, हे दासों को सुख देनेवाले, आपको जो अच्छा लगे मुझे वही दीजिये। चुनाव लौटा दिया गया। और उत्तर में जो मिलता है वह कोई वस्तु नहीं है, वह एक स्वभाव है। प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, विज्ञान, और सब गुणों तथा ज्ञान के निधान हो जाइये। जिसने अभी-अभी कहा था कि मेरे भीतर न भक्ति है, न वैराग्य, न ज्ञान, उसे ठीक वही तीनों दे दिये गये, उसी क्रम में।

पर कथा यहीं समाप्त नहीं होती, और यही इसका सबसे मीठा मोड़ है। मुनि कहते हैं कि प्रभु ने जो वर दिया वह तो मैंने पा लिया, अब मुझे वह दीजिये जो मुझे अच्छा लगता है। जिसने अभी-अभी चुनाव छोड़ दिया था, उसे चुनाव लौटा दिया गया, और अब वह अपनी बात कहता है।

अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम।
मम हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम॥ ११॥

दोहा ११

हे प्रभु, हे धनुष-बाण धारण करनेवाले राम, छोटे भाई और जानकी सहित आप मेरे हृदयरूपी आकाश में चन्द्रमा की तरह सदा निष्काम होकर निवास कीजिये। भक्ति, वैराग्य और विज्ञान मिलने के बाद भी उन्हें जो चाहिये वह वही एक चित्र है, और वह चित्र वैसा ही है जैसा शरभंग ने चिता पर बैठकर माँगा था। दोनों माँगों में एक ही फ़र्क़ है। शरभंग ने कहा था हृदय में बसिये। सुतीक्ष्ण कहते हैं हृदयरूपी आकाश में चन्द्रमा की तरह बसिये, यानी ऊपर रहिये, दिखते रहिये, और जिस रात का कोई दूसरा उजाला न हो उस रात भी बने रहिये।

सार: सुतीक्ष्ण बार-बार चरण छूकर प्रभु को आश्रम ले जाते हैं और स्तुति करते हैं, अपनी बुद्धि को सूर्य के सामने जुगनू कहकर। वे निर्गुण मान लेने पर भी वन में विचरनेवाला वही रूप माँगते हैं, सेवक होने का अभिमान बनाये रखने की प्रार्थना करते हैं, वर माँगने को कहे जाने पर कहते हैं कि मैंने कभी वर माँगा ही नहीं, और अन्त में यही माँगते हैं कि सीता और लक्ष्मण सहित राम उनके हृदयरूपी आकाश में चन्द्रमा की तरह सदा बसें।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने पर तीन बार शरीर बोलता है, और तीनों बार वचन से पहले बोलता है। शरभंग की छाती दर्शन पाकर ठंडी हो जाती है, और उसके बाद वे बोलते हैं। हड्डियों का ढेर देखकर राम की आँखों में जल छा जाता है, और उसके बाद भुजा उठती है, और सबसे अन्त में वचन निकलता है। सुतीक्ष्ण का शरीर कटहल के फल जैसा हो जाता है, और उसके बाद वे लाठी की तरह गिरते हैं, और बोलना तो बहुत बाद में शुरू होता है। तुलसी यह क्रम बार-बार रखते हैं, और वह क्रम अपने आप में एक बात कह जाता है, कि जो भीतर सच में है वह पहले देह में उतरता है और वचन उसके पीछे-पीछे आता है।

दूसरी बात, जो शायद इस पन्ने की सबसे काम की है, वह खाली हाथ का प्रश्न है। इस प्रसंग में जो भी कुछ पाता है, वह अपने को ख़ाली बताकर पाता है। शरभंग अपने को सब साधनों से हीन कहते हैं, और जीवन भर की सारी कमाई देकर बदले में भक्ति ले लेते हैं। सुतीक्ष्ण गिनाते हैं कि उनके पास सत्संग नहीं, योग नहीं, जप नहीं, यज्ञ नहीं, और चरणों में दृढ़ अनुराग भी नहीं, और ठीक इसी सूची के बल पर वे उस आदत के अधिकारी बन जाते हैं जिसके अनुसार जिसका कोई सहारा न हो वही प्रिय होता है। साथ चलनेवाले मुनि स्वयं कुछ नहीं माँगते, वे केवल बताते हैं कि क्या हुआ है, और उसी बताने से वह प्रतिज्ञा निकल आती है जो उनके पूरे वन को बदल देगी।

और तीसरी बात, जिस पर ध्यान देना ज़रूरी है, वह प्रतिज्ञा की जड़ है। यह वचन क्रोध से नहीं निकला। जिस पंक्ति में ढेर दिखता है उसी पंक्ति में दया आती है, और जिस पंक्ति में उत्तर मिलता है उसी पंक्ति में आँसू आते हैं। इसके बाद उठी हुई भुजा किसी अपमान का उत्तर नहीं है, वह उन आँसुओं का अगला क़दम है। और प्रतिज्ञा करके जो पहला काम किया जाता है वह लड़ाई नहीं है, वह आश्रम-आश्रम जाकर बैठना है। जो सचमुच किसी की रक्षा करने निकलता है, वह पहले उसके पास जाकर बैठता है।

इस पूरे प्रसंग को पढ़ते हुए जो चित्र देर तक साथ रहता है वह वह मुनि है जो ब्रह्मलोक के रास्ते में रुक गया था। रास्ता खुला था, यात्रा शुरू हो चुकी थी, और जिस लोक के लिये सारा जीवन लगाया गया था वह हाथ भर दूर था। उसी समय कान में एक ख़बर पड़ी और पाँव रुक गये, और फिर वर्षों दिन-रात एक रास्ते की ओर देखते बीत गये। जिस दिन वह आया जिसकी प्रतीक्षा थी, उस दिन उसने ब्रह्मलोक नहीं माँगा, उसने हृदय में निवास माँगा। और जो मिला वह वह भी नहीं था, वह वैकुण्ठ था, और वह भी इसलिये मिला कि उसने पहले ही यह सँभाल लिया था कि मिट न जाऊँ, देखता रह जाऊँ।

और उसी पन्ने के दूसरे छोर पर एक दूसरा मुनि है, जो अपना नाम भूलकर नाचता हुआ चला आ रहा है। दोनों के बीच में हड्डियों का वह ढेर है जिसका कोई नाम नहीं है और जिसकी कोई गिनती नहीं दी गयी। तुलसी इन तीनों को एक ही पन्ने पर रख देते हैं और कोई उपदेश नहीं जोड़ते। वे बस इतना दिखा देते हैं कि जिस हृदय में बसने की प्रार्थना दोनों मुनि कर रहे हैं, वही हृदय बीच में पृथ्वी का हिसाब कर रहा है, और दोनों काम एक ही समय में, एक ही व्यक्ति के भीतर, बिना एक दूसरे को काटे चल रहे हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा ७ से ११, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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