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शरभंग, मुनियों की अस्थियाँ और प्रतिज्ञा

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रामचरितमानसअरण्यकाण्डप्रसंग 2

ब्रह्मलोक जाते हुए एक मुनि सुनते हैं कि राम वन में आयेंगे। वे दिन-रात राम की राह देखते हैं। आगे वन में राम हड्डियों का ढेर देखते हैं। मुनियों का उत्तर सुनकर राम की आँखों में जल छा जाता है, और वे भुजा उठाकर प्रण करते हैं।

अत्रि के आश्रम से राम सीता और लक्ष्मण के साथ वन में आगे चलते हैं, और शरभंग मुनि के पास पहुँचते हैं। शरभंग ब्रह्मलोक जा रहे थे जब उन्होंने सुना कि राम वन में आयेंगे। वे विनती करते हैं कि राम उनके हृदय में बसें।

आगे वन में हड्डियों का ढेर देखकर राम को बड़ी दया आती है, और वे साथ चलते मुनियों से पूछते हैं। फिर सुतीक्ष्ण मुनि आते हैं, जो प्रेम में ऐसे डूबे हैं कि उन्हें रास्ता नहीं सूझता।

यह कथा रामचरितमानस की है।

शरभंग, सुतीक्ष्ण और तीन यात्री

  • राम जो हड्डियों का ढेर देखकर मुनियों से पूछते हैं। मुनियों का उत्तर सुनकर उनकी आँखों में जल छा जाता है, और वे भुजा उठाकर प्रण करते हैं।
  • लक्ष्मण आगे चलते भाई के पीछे-पीछे मुनियों का वेष बनाये चलनेवाले छोटे भाई, जो राम और सीता के साथ शरभंग के पास पहुँचते हैं।
  • सीता दोनों भाइयों के बीच चलती हुईं, जो ऐसी शोभित हैं जैसे ब्रह्म और जीव के बीच माया।
  • शरभंग वे मुनि जो ब्रह्मलोक जा रहे थे जब उन्होंने सुना कि राम वन में आयेंगे। वे दिन-रात रास्ता देखते रहे, और राम के दर्शन के बाद उन्होंने योग की अग्नि से शरीर छोड़ा।
  • सुतीक्ष्ण अगस्त्य मुनि के ज्ञानी शिष्य, जिन्हें स्वप्न में भी किसी दूसरे का भरोसा नहीं। वे राम के आने की ख़बर सुनते ही दौड़ पड़ते हैं।
  • अगस्त्य वे मुनि जिनके शिष्य सुतीक्ष्ण हैं।
  • विराध रास्ते में मिला असुर, जो सामने आते ही राम के हाथों मारा गया। उसने तुरन्त सुन्दर रूप पाया, और उसे दुखी देखकर राम ने उसे अपने धाम भेज दिया।
  • पार्वती जिन्हें शिव यह कथा सुना रहे हैं, और जिनसे कहा जाता है कि सुतीक्ष्ण की वह दशा कही नहीं जा सकती।

रास्ता स्वयं रास्ता देता है

मुनि के चरणों में सिर नवाकर देवताओं, मनुष्यों और मुनियों के स्वामी वन को चल दिये। आगे राम, पीछे लक्ष्मण, और दोनों मुनियों का वेष बनाये बहुत सुन्दर लग रहे हैं।

दोनों के बीच सीता ऐसी शोभित हैं जैसे ब्रह्म और जीव के बीच माया हो। फिर नदी, वन, पर्वत और दुर्गम घाटियाँ अपने स्वामी को पहचानकर सुन्दर रास्ता दे देते हैं।

जहाँ-जहाँ राम जाते हैं, वहाँ-वहाँ बादल आकाश में छाया किये चलते हैं। रास्ते में विराध नाम का असुर मिला, और सामने आते ही राम ने उसे मार डाला।

उसने तुरन्त सुन्दर रूप पा लिया, और उसे दुखी देखकर राम ने उसे अपने धाम भेज दिया। इसके बाद वे लक्ष्मण और सीता के साथ वहाँ पहुँचते हैं जहाँ मुनि शरभंग हैं।

ब्रह्मलोक जाते हुए सुना कि राम आयेंगे

मुनिश्रेष्ठ के नेत्र भौंरों की तरह राम के मुखकमल का रस बड़े आदर से पी रहे हैं। शरभंग का जन्म धन्य है।

मुनि राम को कृपालु कहकर, और शिव के मन रूपी मानसरोवर का राजहंस कहकर पुकारते हैं। शरभंग कहते हैं, “मैं ब्रह्मा के धाम को जा रहा था। कानों से सुना कि राम वन में आयेंगे।”

वे कहते हैं, “मैं दिन-रात आपकी राह देखता रहा, और अब आपको देखकर मेरी छाती ठंडी हुई।” फिर वे कहते हैं, “हे नाथ, मैं सब साधनों से हीन हूँ। आपने मुझे दीन सेवक जानकर कृपा की है।”

आपने अपना प्रण रखा

शरभंग कहते हैं, “हे देव, यह मुझ पर आपका कोई एहसान नहीं। हे भक्तों के मन को चुरानेवाले, ऐसा करके आपने अपने ही प्रण की रक्षा की है।”

फिर वे कहते हैं, “इस दीन के कल्याण के लिये तब तक ठहरिये, जब तक मैं शरीर छोड़कर आपसे मिलूँ।”

योग, यज्ञ, जप, तप और व्रत, जो कुछ भी किया था, सब राम को समर्पित करके उन्होंने भक्ति का वर ले लिया। इस प्रकार, टीका के अनुसार चिता रचकर, मुनि शरभंग हृदय से सब आसक्ति छोड़कर उस पर जा बैठे।

शरभंग कहते हैं, “हे नीले मेघ जैसे साँवले, सगुण रूप राम, सीता और लक्ष्मण के साथ आप निरन्तर मेरे हृदय में निवास कीजिये।”

भेद-भक्ति का वर

ऐसा कहकर उन्होंने योग की अग्नि से अपना शरीर जला डाला, और राम की कृपा से वैकुण्ठ चले गये। मुनि भगवान् में लीन नहीं हुए, क्योंकि उन्होंने पहले ही भेद-भक्ति का वर ले लिया था।

ऋषियों के समूह मुनिश्रेष्ठ की यह गति देखकर हृदय में विशेष रूप से सुखी हुए। फिर सारे मुनि राम की स्तुति करने लगते हैं: शरणागत का हित करनेवाले की जय, करुणा के मूल की जय।

अस्थियों का ढेर

फिर राम आगे वन में चले, और श्रेष्ठ मुनियों के बहुत से समूह साथ हो लिये। हड्डियों का ढेर देखकर राम को बड़ी दया आयी, और उन्होंने मुनियों से पूछा।

मुनि कहते हैं, “जानते हुए भी आप कैसे पूछ रहे हैं, स्वामी? आप सर्वदर्शी हैं और अन्तर्यामी हैं। राक्षसों के दलों ने सब मुनियों को खा डाला है।” टीका जोड़ती है कि ये उन्हीं की हड्डियों के ढेर हैं।

यह सुनते ही राम के नेत्रों में जल छा गया।

राम ने भुजा उठाकर प्रण किया, “मैं पृथ्वी को निशाचरों से रहित कर दूँगा।”

फिर सब मुनियों के आश्रमों में जा-जाकर राम ने उन्हें सुख दिया।

सुतीक्ष्ण, जिन्हें अपना रास्ता नहीं सूझता

मुनि अगस्त्य के एक ज्ञानी शिष्य थे, नाम सुतीक्ष्ण, और उनकी प्रीति भगवान् में थी। मन, वचन और कर्म से वे राम के चरणों के सेवक थे, और स्वप्न में भी उन्हें किसी दूसरे देवता का भरोसा नहीं था।

राम का आगमन सुनते ही वे तरह-तरह के मनोरथ करते हुए आतुर होकर दौड़ पड़े। दौड़ते-दौड़ते वे सोचते जा रहे हैं: “हे विधाता, क्या दीनों के बन्धु राम मुझ जैसे दुष्ट पर भी दया करेंगे? क्या स्वामी राम लक्ष्मण के साथ मुझसे अपने सेवक की तरह मिलेंगे? मेरे मन में दृढ़ भरोसा नहीं होता। मेरे भीतर न भक्ति है, न वैराग्य, न ज्ञान।”

सुतीक्ष्ण सोचते हैं, “मैंने न सत्संग किया, न योग, न जप, न यज्ञ, और चरणों में मेरा दृढ़ अनुराग भी नहीं है। करुणानिधान की एक बान है कि जिसे किसी दूसरे का सहारा नहीं, वह उन्हें प्रिय होता है।”

फिर, टीका के अनुसार, वे मन ही मन कहते हैं, “आज मेरे नेत्र सफल होंगे, भवबन्धन से छुड़ानेवाले उस मुख को देखकर।” और शिव बीच में पार्वती से कहते हैं कि ज्ञानी मुनि प्रेम में पूरी तरह डूब गये, और वह दशा कही नहीं जा सकती।

उन्हें दिशा और कोना कुछ नहीं सूझ रहा, रास्ता नहीं सूझ रहा। वे कौन हैं और कहाँ जा रहे हैं, यह भी उन्हें नहीं सूझता। कभी पीछे घूमकर फिर आगे चल पड़ते हैं, कभी गुण गा-गाकर नाचने लगते हैं।

पेड़ की आड़ में खड़ा हुआ स्वामी

मुनि ने प्रगाढ़ प्रेमाभक्ति पा ली है, और राम एक पेड़ की आड़ में छिपकर उन्हें देख रहे हैं। मुनि का अत्यन्त प्रेम देखकर, भवभय हरनेवाले राम उनके हृदय में प्रकट हो गये।

मुनि बीच रास्ते में अचल होकर बैठ गये, और उनका शरीर रोमांच से कटहल के फल जैसा हो गया।

तब राम पास चले आये, और अपने भक्त की यह दशा देखकर मन में प्रसन्न हुए। उन्होंने मुनि को बहुत तरह से जगाया, पर मुनि नहीं जागे। उन्हें ध्यान का सुख मिल रहा था। तब राम ने अपना राजरूप छिपा लिया और मुनि के हृदय में अपना चतुर्भुज रूप दिखाया।

तब मुनि व्याकुल होकर उठे, जैसे मणि के बिना श्रेष्ठ सर्प व्याकुल हो जाता है। उन्होंने अपने सामने सीता और लक्ष्मण के साथ साँवले राम को देखा, जो सुख के धाम हैं।

प्रेम में डूबे वे बड़भागी मुनि लाठी की तरह गिरकर राम के चरणों में लग गये। राम ने अपनी विशाल भुजाओं से पकड़कर उन्हें उठा लिया और बड़े प्रेम से हृदय से लगा रखा।

मुनि से मिलते हुए राम ऐसे शोभित हैं मानो सोने के वृक्ष से तमाल का वृक्ष गले लगकर मिल रहा हो। फिर मुनि खड़े-खड़े राम का मुख देखते रह जाते हैं, मानो चित्र में लिखकर बनाये गये हों।

स्तुति, और मुनि की माँग

तब मुनि हृदय में धीरज धरकर बार-बार चरणों को छूते हैं, फिर राम को अपने आश्रम में लाकर अनेक प्रकार से पूजा करते हैं।

मुनि कहते हैं, “हे प्रभु, मेरी विनती सुनिये, मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? आपकी महिमा अपार है और मेरी बुद्धि थोड़ी, जैसे सूर्य के सामने जुगनू का उजाला।” फिर वे स्तुति करते हैं।

स्तुति में सुतीक्ष्ण राम को नमस्कार करते हैं, जटा और मुनियों का वस्त्र पहने, धनुष-बाण और तरकस लिये। वे उन्हें मोह के घने वन को जलानेवाली अग्नि, संशय के साँप को निगलनेवाला गरुड़, राक्षस रूपी हाथियों के लिये सिंह, और भक्तों के लिये कल्पवृक्ष का बगीचा कहते हैं। राम क्रोध, लोभ, मद और काम को डराते हैं, और उनका नाम कलियुग के बड़े मल को नष्ट करता है। वे बार-बार प्रार्थना करते हैं कि राम सदा रक्षा करें, और कहते हैं, “राम निरन्तर मेरे कल्याण का विस्तार करें।”

सुतीक्ष्ण कहते हैं, “आप निर्मल, व्यापक, अविनाशी हैं और सबके हृदय में निरन्तर बसते हैं। तथापि लक्ष्मण और सीता के साथ वन में विचरनेवाले आप मेरे मन में बसिये।”

फिर वे कहते हैं: “जो आपको सगुण, निर्गुण और अन्तर्यामी जानते हों, वे जाना करें। मेरे हृदय को तो कोसल के राजा राम ही अपना घर बनायें।” और फिर वे कहते हैं, “ऐसा अभिमान भूलकर भी न छूटे कि मैं सेवक हूँ और राम मेरे स्वामी हैं।”

ये वचन सुनकर राम मन में बहुत प्रसन्न हुए और हर्षित होकर मुनि को फिर हृदय से लगा लिया। फिर राम ने कहा, “मुझे परम प्रसन्न जानिये। जो वर माँगिये, वही मैं दूँ।” सुतीक्ष्ण का उत्तर है, “मैंने तो वर कभी माँगा ही नहीं। मुझे समझ ही नहीं पड़ता कि क्या झूठ है और क्या सच।”

फिर वे कहते हैं, “हे दासों को सुख देनेवाले, आपको जो अच्छा लगे मुझे वही दीजिये।” राम वर देते हैं कि मुनि प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, विज्ञान, और सब गुणों और ज्ञान के निधान हो जायें।

मुनि कहते हैं, “आपने जो वर दिया वह तो मैंने पा लिया, अब मुझे वह दीजिये जो मुझे अच्छा लगता है।”

सुतीक्ष्ण कहते हैं, “हे प्रभु, धनुष-बाण लिये राम, लक्ष्मण और सीता के साथ आप मेरे हृदय रूपी आकाश में चन्द्रमा की तरह सदा निष्काम होकर बसिये।” टीका निष्काम को यहाँ स्थिर पढ़ती है।

आँसू, उठी हुई भुजा, और वचन

शरभंग ब्रह्मलोक जाते हुए सुनते हैं कि राम वन में आयेंगे, और दिन-रात राम की राह देखते हैं। वे भक्ति का वर लेकर योग की अग्नि से शरीर छोड़ते हैं और राम की कृपा से वैकुण्ठ जाते हैं। भेद-भक्ति के वर के कारण वे भगवान् में लीन नहीं होते। हड्डियों का ढेर देखकर राम मुनियों से पूछते हैं। उनका उत्तर सुनकर राम की आँखों में जल छा जाता है, और वे भुजा उठाकर पृथ्वी को निशाचरों से रहित करने का प्रण करते हैं। सुतीक्ष्ण प्रेम में अपनी सुध खो बैठते हैं। वर का अवसर मिलने पर वे राम से अपने हृदय के आकाश में चन्द्रमा की तरह बसने की विनती करते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा 7 से 11, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।