रामचरितमानस · अरण्यकाण्ड · कबन्ध, शबरी और नवधा भक्ति
कबन्ध, शबरी और नवधा भक्ति
जटायु की क्रिया कर चुकने के बाद दोनों भाई आगे बढ़ते हैं। रास्ते में एक शाप कटता है, और फिर एक वन के आश्रम में वे नौ पंक्तियाँ कही जाती हैं जो मानस से निकलकर सबसे दूर तक गयीं।
पिछला पन्ना एक चिता पर बन्द हुआ था। गीधराज जटायु अखण्ड भक्ति का वर माँगकर हरि के धाम को चले गये थे, और उनकी सारी क्रिया राम ने अपने हाथों से की थी। इस पन्ने की पहली पंक्ति ठीक उसी जगह से उठती है, पर वह आगे की घटना नहीं बताती। वह पहले एक हिसाब सामने रख देती है। जिसे वह गति मिली वह कौन था, और देनेवाला किस स्वभाव का है। यह तय कर लेने के बाद ही तुलसी दोनों भाइयों को आगे चलने देते हैं।
आगे जो रास्ता है उस पर तीन दोहों के भीतर तीन काम होते हैं, और तीनों एक ही किस्म के हैं। एक शापग्रस्त गन्धर्व छूटता है, ब्राह्मण-सेवा का एक वचन कहा जाता है, और एक वन में रहनेवाली स्त्री के आश्रम में वह उपदेश दिया जाता है जिसे आज भी लाखों लोग कण्ठ से जानते हैं। बीच में कोई युद्ध नहीं है, कोई सेना नहीं, कोई नगर नहीं। सीता की खोज चल रही है, और उसी खोज के रास्ते पर यह सब घट जाता है।
इस पन्ने का बीच शबरी का आश्रम है, और उसी आश्रम में नवधा भक्ति कही जाती है। नौ अंग हैं, और तुलसी उन्हें गिनकर, नाम देकर, क्रम से रखते हैं। पर उन नौ को याद रह जाने लायक जो बात बनाती है वह गिनती नहीं है। वह यह है कि ये किससे कहे जा रहे हैं। सामने खड़ी स्त्री ने अभी अभी अपने को अधम से भी अधम कहा है और यह पूछा है कि स्तुति किस विधि से करे। उससे कुछ माँगा नहीं जाता, उसे लौटाया नहीं जाता, उसे परखा नहीं जाता। उसे नौ रास्ते गिनाकर अन्त में यह कह दिया जाता है कि वे नौ उसमें पहले से दृढ़ हैं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम दशरथनन्दन, जो सीता को खोजते हुए इस वन-मार्ग पर हैं, और इसी मार्ग पर एक शाप काटते हैं, एक वन-आश्रम का आतिथ्य लेते हैं और नवधा भक्ति कहते हैं।
- लक्ष्मण छोटे भाई, जो इस पूरे प्रसंग में साथ चलते हैं, जिनके चरण भी धोये जाते हैं, और जिनका एक भी वचन इन पंक्तियों में नहीं आता।
- कबन्ध रास्ते में पड़नेवाला राक्षस, जो मारे जाने पर अपने शाप की सारी बात कहता है और अपनी गति पाकर आकाश में लौट जाता है।
- दुर्वासा वे ऋषि, जिनके शाप से वह गन्धर्व राक्षस हुआ था। तुलसी शाप का कारण नहीं बताते, केवल नाम देते हैं।
- शबरी वन में रहनेवाली वह स्त्री, जिसके आश्रम में राम पधारते हैं, जो कन्द-मूल-फल लाकर देती हैं और जिन्हें नवधा भक्ति कही जाती है।
- मुनि वे मुनि, जिनके वचन याद आते ही शबरी का मन प्रसन्न हो जाता है। तुलसी की पंक्ति में केवल मुनि शब्द है, नाम पोद्दार की टीका देती है, मतंग।
- शिव और पार्वती वह सभा जहाँ यह सारी कथा कही जा रही है। एक बार बीच में शिव का स्वर सीधे सुनायी दे जाता है।
- सीता जिनकी खोज इस पूरे मार्ग का कारण है, और जिनकी खबर इस पन्ने के अन्त में पहली बार एक पते की शक्ल में मिलती है।
- सुग्रीव वह नाम, जो इस पन्ने की अन्तिम चौपाइयों में पहली बार आता है और आगे का सारा रास्ता खोल देता है।
- तुलसीदास कवि, जो इस प्रसंग के आख़िरी छंद की दो पंक्तियों में अपना नाम लेकर सामने आ जाते हैं।
जो गति योगी माँगते रह जाते हैं
जटायु की सारी क्रिया अपने हाथों से कर चुकने के बाद कथा तुरन्त आगे नहीं बढ़ती। तुलसी एक क्षण रुकते हैं, और रुककर वह बात कहते हैं जिसके बिना अभी अभी जो हुआ उसका माप नहीं बनता। पन्ना इसी पंक्ति से खुलता है, और यह पंक्ति किसी घटना की नहीं, एक स्वभाव की है।
कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला॥
चौपाई १
गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्ही जो जाचत जोगी॥
पंक्ति दो हिस्सों में चलती है, पहले स्वभाव और फिर उदाहरण। कोमल चित्तवाले, अत्यन्त दीनदयालु, और कृपालु भी ऐसे कि कृपा के लिये कोई कारण नहीं चाहिये। कारन बिनु, यही दो शब्द पूरी पंक्ति का भार उठाते हैं। कृपा साधारणतः तब होती है जब कोई पात्रता हो, कोई सेवा हो, कोई पुराना सम्बन्ध हो। यहाँ कहा जा रहा है कि पात्रता का हिसाब लगाया ही नहीं गया, और इसलिये उस हिसाब में कोई कहीं नीचे नहीं रह जाता।
और फिर उदाहरण, और उदाहरण जान-बूझकर सबसे नीचे से चुना गया है। गीध पक्षी है, पक्षियों में भी अधम है, और मांस खानेवाला है। तीनों बातें एक साथ रख दी जाती हैं, एक भी छिपायी नहीं जाती। उसी को वह गति दी गयी जिसे योगी जाचत रहते हैं, यानी माँगते रहते हैं और माँगते ही रह जाते हैं। एक ओर जीवन भर का साधन है, दूसरी ओर एक प्राणी है जिसने वह साधन कभी किया ही नहीं। दोनों को एक ही पंक्ति के दो सिरों पर रखकर तुलसी आगे बढ़ जाते हैं, और बीच में कोई सफ़ाई नहीं देते।
यह पंक्ति इस पन्ने की पहली है, और इसी पन्ने की अन्तिम चौपाइयों में यही तराजू फिर निकलेगा। वहाँ भी योगियों को दुर्लभ गति की बात होगी, और वहाँ भी वह किसी ऐसे को मिलती दिखायी जायेगी जिसे शास्त्र की सभा में कोई गिनता नहीं। जो वाक्य यहाँ एक पक्षी के लिये कहा गया है, वही आगे एक वन की स्त्री के लिये दोहरा दिया जाता है। पन्ना अपने दोनों सिरों पर एक ही कील से बँधा हुआ है।
इसके तुरन्त बाद स्वर बदल जाता है, और बदलना साफ़ सुनायी देता है। कथा कहनेवाले शिव हैं और सुननेवाली पार्वती हैं, और यहाँ शिव कथा रोककर सीधे उन्हीं से कहते हैं कि हे पार्वती, सुनिये, वे लोग अभागे हैं जो भगवान् को छोड़कर विषयों से अनुराग करते हैं। यह वाक्य वन में नहीं कहा जा रहा। यह उस सभा में कहा जा रहा है जहाँ से यह सारी कथा हम तक आ रही है। और शब्द पर ध्यान दीजिये, अभागे। पापी नहीं कहा गया, मूर्ख नहीं कहा गया। अभागे, यानी जिनके भाग्य में वह नहीं आया जो अभी अभी एक गीध को मिल गया।
और उतना कहकर कथा फिर चल पड़ती है। दोनों भाई सीता को खोजते हुए आगे चले, और चलते हुए वन की बहुताई देखते जाते हैं। खोज का ढंग इन्हीं दो शब्दों में आ जाता है। वे वन को देखते जा रहे हैं और वन घटता नहीं, बढ़ता जाता है। जिसे खोजना है वह एक है, और जिसमें खोजना है उसका कोई छोर नहीं।
सार: जटायु की क्रिया कर चुकने के बाद तुलसी कहते हैं कि रघुनाथ कोमल चित्तवाले और बिना कारण कृपालु हैं, जिन्होंने मांसाहारी अधम पक्षी तक को वह गति दी जिसे योगी माँगते रहते हैं। शिव पार्वती से कहते हैं कि हरि को छोड़कर विषयों में लगनेवाले अभागे हैं। फिर दोनों भाई सीता को खोजते हुए सघन वन में आगे बढ़ते हैं।
रास्ते में पड़ा हुआ राक्षस
आगे का वन तुलसी एक ही आधी पंक्ति में खड़ा कर देते हैं, और उसके ठीक बाद, बिना साँस लिये, उसी चौपाई में एक राक्षस मारा जाता है और अपनी पूरी कथा कह भी देता है।
संकुल लता बिटप घन कानन । बहु खग मृग तहँ गज पंचानन॥
चौपाई २
आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता॥
पहले वन है। लताओं और वृक्षों से भरा हुआ, इतना सघन कि आर-पार नहीं दिखता। उसमें बहुत पक्षी हैं, मृग हैं, हाथी हैं और सिंह हैं। यह वही वन है जिसमें दो आदमी एक स्त्री को खोज रहे हैं, और इसका सघन होना यहाँ कोई शोभा नहीं है। वह एक कठिनाई है, और तुलसी उसे शोभा की तरह नहीं, गिनती की तरह लिखते हैं, पक्षी, मृग, हाथी, सिंह।
और उसके तुरन्त बाद कबन्ध मारा जाता है। आते हुए रास्ते में, यानी यह कोई अभियान नहीं था, कोई खोज नहीं थी, वह रास्ते में पड़ गया। निपाता, एक ही शब्द है और उसी में पूरा युद्ध समा गया है। न ललकार, न अस्त्र का नाम, न उसके रूप का वर्णन, न उसके बल का, न किसी के घायल होने का। एक बड़ी घटना को आधी पंक्ति दी गयी है, और यह तुलसी की चुनी हुई कंजूसी है। उनकी दिलचस्पी उस लड़ाई में नहीं है।
दिलचस्पी उसमें है जो मरने के बाद होता है, और वह उसी चौपाई की आख़िरी आधी पंक्ति में आ जाता है। उसने अपने शाप की सारी बात कही। मरना यहाँ अन्त नहीं है, वह खुलना है। जो देह छूटी वह उसकी अपनी नहीं थी, वह एक शाप थी, और शाप हटते ही भीतर से कोई और सामने आ जाता है। जिसे अभी अभी मारा गया है वही अब बोल रहा है, और जो बोल रहा है वह राक्षस नहीं है।
दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा॥
चौपाई ३
सुनु गंधर्ब कहउँ मैं तोही । मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही॥
दुर्वासा ने मुझे शाप दिया था। पूरा कारण इतना ही है। तुलसी यह नहीं बताते कि अपराध क्या था, कब हुआ, कितना बड़ा था, किसने बीच-बचाव किया। एक ऋषि का नाम रख दिया जाता है और उसी में सारा पिछला जीवन बाँध दिया जाता है।
और फिर वह जो कहता है, वह इस प्रसंग का पहला सिद्धान्त-वाक्य है। प्रभु के चरणों को देखकर वह पाप मिट गया। शाप कटने का कारण उसने अपने किसी कर्म को नहीं बताया, न पश्चात्ताप को, न किसी व्रत को, न किसी तीर्थ को। केवल देख लेने को। इसी बात को इस पन्ने के दूसरे छोर पर, शबरी से, दूसरे शब्दों में फिर कहा जायेगा, जब दर्शन का फल गिनाया जायेगा।
उत्तर में राम जो कहते हैं वह आशीर्वाद नहीं है। हे गन्धर्व, सुनिये। सम्बोधन बदल चुका है। अब वह राक्षस नहीं, गन्धर्व है, और यह एक शब्द ही उसके छूट जाने की घोषणा है। और फिर वह वाक्य आता है जिस पर अगले दोहे का सारा भार टिका हुआ है। ब्राह्मणकुल से द्रोह करनेवाला मुझे नहीं सुहाता। जिसे अभी अभी उद्धार मिला है, उसे विदा करने से पहले वही बात बतायी जा रही है जिससे वह गिरा था।
सार: सघन वन में चलते हुए रास्ते में कबन्ध मारा जाता है और वह अपने शाप की सारी बात कहता है। दुर्वासा के शाप से वह राक्षस हुआ था, और प्रभु के चरणों को देखते ही वह पाप मिट गया। राम उसे गन्धर्व कहकर सम्बोधित करते हैं और कहते हैं कि ब्राह्मणकुल से द्रोह करनेवाला उन्हें नहीं सुहाता।
मन, वचन और कर्म से, कपट छोड़कर
और उसी बात को इस प्रसंग का पहला दोहा खोलकर रख देता है। यह दोहा किसी घटना का नहीं है। कथा यहाँ एक क्षण के लिये ठहर जाती है और उसकी जगह एक नियम रख दिया जाता है।
मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव।
दोहा ३३
मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव॥ ३३॥
तीन जगह गिनायी गयी हैं, मन, कर्म और वचन। तीनों में कपट न हो, यही शर्त है, और यही शर्त इस पूरे पन्ने पर फिर लौटेगी। भूसुर शब्द पर ठहरिये। भू का सुर, यानी पृथ्वी का देवता। शब्द ही अपने भीतर सेवा का कारण रखे हुए है, अलग से कोई तर्क नहीं दिया जाता।
पर दोहे की दूसरी पंक्ति वह है जो इसे असामान्य बनाती है। मोहि समेत, यानी मुझसमेत, और उसके बाद ब्रह्मा, शिव और सब देवता, ये सब उसके वश में हो जाते हैं। कहनेवाले ने अपना नाम सूची में सबसे पहले रखा है। यह वचन किसी तीसरे के मुँह से नहीं निकल रहा कि ब्राह्मण की सेवा से भगवान् प्रसन्न होते हैं। कहनेवाले स्वयं कह रहे हैं कि ऐसा करनेवाले के वश में वे हो जाते हैं। प्रसन्न होना नहीं, वश में होना, और यह शब्द चुनकर रखा गया है।
और इसके बाद जो चौपाई आती है वह मानस की सबसे कठोर चौपाइयों में गिनी जाती है। तुलसी उसे नरम करके नहीं कहते और उसके चारों ओर कोई परदा नहीं डालते।
सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता॥
चौपाई ४
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना॥
शाप देता हुआ, मारता हुआ, कठोर वचन कहता हुआ भी ब्राह्मण पूजनीय है। ये तीन दशाएँ हैं और तीनों में वह ब्राह्मण अपने ही सद्गुण से गिरा हुआ है, फिर भी पूज्य कहा गया है। इस वाक्य को तुलसी अपने ऊपर नहीं लेते, वे इसे संतों पर टिका देते हैं, ऐसा संत गाते हैं। और अगली आधी पंक्ति और आगे चली जाती है। शील और गुण से हीन ब्राह्मण भी पूजनीय है, और गुणों के समूह से युक्त तथा ज्ञान में निपुण शूद्र भी नहीं।
जो लिखा है वही लिखा है, और इससे कम कुछ नहीं लिखा है। इस पन्ने की असली बात यह है कि कुछ ही चौपाइयों के बाद वही वक्ता एक वन की स्त्री से कहेगा कि जाति, पाँति, कुल और धर्म से भरा हुआ आदमी भी भक्ति के बिना बिना जल के बादल जैसा है, और उसी स्त्री को वह गति सुलभ बता दी जायेगी जो योगियों को दुर्लभ है। दोनों वचन एक ही पन्ने पर हैं और तुलसी उन्हें आपस में मिलाने की कोई कोशिश नहीं करते। वे दोनों को अपनी अपनी जगह रख देते हैं और पढ़नेवाले को उनके बीच खड़ा छोड़ देते हैं। यही वह जगह है जिस पर इस काण्ड में सबसे अधिक बहस हुई है, और वह बहस पन्ने के बाहर से नहीं, पन्ने के भीतर से उठती है।
गन्धर्व को यह सब सुनाकर राम उसे अपना धर्म कहकर समझाते हैं। अपने चरणों में उसका प्रेम देखकर वह उनके मन को भाया, यह तुलसी साफ़ लिखते हैं, यानी बात एकतरफ़ा नहीं रही। और फिर वह रघुनाथ के चरणकमलों में सिर नवाकर, अपनी गति पाकर, आकाश में चला जाता है। पूरा उद्धार चार आधी पंक्तियों में निपट जाता है, शाप का नाम, दर्शन से मुक्ति, उपदेश, और आकाश। उसके चले जाने के बाद तुलसी एक बार भी उस ओर नहीं देखते।
सार: तैंतीसवाँ दोहा कहता है कि मन, वचन और कर्म से कपट छोड़कर जो ब्राह्मणों की सेवा करता है, उसके वश में स्वयं भगवान्, ब्रह्मा, शिव और सब देवता हो जाते हैं। आगे की चौपाई ब्राह्मण को हर दशा में पूजनीय और गुणी शूद्र को अपूजनीय कहती है। गन्धर्व अपना धर्म सुनकर, सिर नवाकर, अपनी गति पाकर आकाश में चला जाता है।
शबरी के आश्रम में
और अगली ही चौपाई में कथा वहाँ पहुँच जाती है जहाँ इस पन्ने का हृदय है। बीच में कोई यात्रा नहीं दिखायी जाती, कोई दिन नहीं गिनाये जाते। एक का उद्धार अभी हुआ है, और अगला पड़ाव यह है।
ताहि देइ गति राम उदारा । सबरी कें आश्रम पगु धारा॥
चौपाई ५
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए॥
उदार, यह विशेषण पहले आता है और गति देने की क्रिया से जुड़ा हुआ आता है। और फिर पगु धारा, यानी पैर रखे, पधारे। यह शब्द साधारण आने के लिये नहीं रखा जाता। जिस आश्रम में वे पधार रहे हैं वह किसी राजधानी का महल नहीं है, और शब्द फिर भी वही चुना गया है जो किसी बड़े के आगमन के लिये चुना जाता है।
दूसरी पंक्ति में वे देखती हैं। घर में आये हुए राम को शबरी ने देखा, और देखते ही उन्हें मुनि के वचन याद आते हैं, और मन प्रसन्न हो जाता है। तुलसी की पंक्ति में केवल मुनि शब्द है, कोई नाम नहीं। पोद्दार की टीका उन्हें मतंग बताती है। इस आधी पंक्ति का अर्थ यह है कि यह घड़ी उनके लिये अचानक नहीं आयी। किसी ने कभी कहा था कि वे आयेंगे, और वह कहा हुआ आज दरवाज़े पर खड़ा है। जो प्रसन्नता होती है वह मिल जाने की नहीं है, पूरा हो जाने की है।
और तब तुलसी वह देते हैं जो शबरी ने देखा, और वह एक सूची नहीं, एक दृष्टि है। कमल जैसे नेत्र, विशाल भुजाएँ, सिर पर जटाओं का मुकुट, हृदय पर वनमाला। और दो भाई, एक साँवला, एक गोरा। दृष्टि ऊपर से नीचे तक जाती है और फिर रुक जाती है। रुकने के बाद जो होता है वह एक ही आधी पंक्ति में है। शबरी चरणों में लिपट पड़ीं। न प्रणाम, न स्तुति, न वचन। लिपट जाना, और वही पहली क्रिया है।
प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा॥
चौपाई ६
सादर जल लै चरन पखारे । पुनि सुंदर आसन बैठारे॥
प्रेम मगन होकर मुख से वचन नहीं निकलता। यह उस स्त्री की पहली दशा है जो कुछ ही देर बाद अपने को वाणीहीन नहीं, बुद्धिहीन कहेगी। वे बार बार चरणकमलों में सिर नवाती हैं, और तब वह करती हैं जो इस घर की स्वामिनी को करना है। आदरपूर्वक जल लेकर चरण धोये, और फिर सुन्दर आसनों पर बैठाया।
यह गृहस्थ का आतिथ्य है और पूरी विधि से किया गया है। पहले चरण-प्रक्षालन, फिर आसन, फिर भोजन। जिस स्त्री को थोड़ी ही देर बाद अपनी पात्रता का डर सता रहा होगा, वह इस समय एक भी बात भूलती नहीं, और क्रम में एक भी उलटफेर नहीं होता। हाथ जानते हैं कि क्या करना है। यह मुँह है जो अटक जाता है, और तुलसी दोनों को एक ही चौपाई में आमने सामने रख देते हैं।
सार: गन्धर्व को गति देकर उदार राम शबरी के आश्रम में पधारते हैं। घर में आये हुए राम को देखकर शबरी को मुनि के वचन याद आते हैं और मन प्रसन्न हो जाता है। साँवले और गोरे दोनों भाइयों के चरणों में वे लिपट पड़ती हैं, प्रेम में मग्न होकर बोल नहीं पातीं, बार बार सिर नवाती हैं, आदर से चरण धोती हैं और सुन्दर आसनों पर बैठाती हैं।
कन्द, मूल और फल
और तब इस प्रसंग का दूसरा दोहा आता है। यह छोटा है, इसमें एक ही घटना है, और यही वह घटना है जिसके कारण शबरी का नाम मानस के बाहर भी सबसे दूर तक पहुँचा।
कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।
दोहा ३४
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि॥ ३४॥
लाकर दिये, क्रिया का यह क्रम पहले आता है। कन्द, मूल और फल, और उन पर एक विशेषण, सुरस, अत्यन्त रसीले। यह वन की सम्पत्ति है, और इसके सिवा उनके पास कुछ है भी नहीं। कोई थाल नहीं, कोई पाक नहीं, कोई विधिवत् भेंट नहीं। जो जंगल देता है, वही उठाकर सामने रख दिया गया, और उसी को अत्यन्त रसीला कहा गया है।
उत्तर दोहे की दूसरी पंक्ति में है, और उसमें दो अलग बातें हैं। प्रभु ने उन्हें प्रेम सहित खाया, और बार बार बखानि, यानी बड़ाई करके। खाना एक बात है और बखानना दूसरी। और वह एक बार नहीं, बार बार। यह स्वीकार करने से आगे की चीज़ है। स्वीकार करने में एक ऊँचाई बची रह जाती है, बड़ाई करने में वह भी नहीं बचती। जिसने दिया है वह सुन रहा है, और सुनते हुए वह छोटा नहीं पड़ रहा।
तुलसी यहाँ इतना ही लिखते हैं। उनके दोहे में तीन चीज़ें हैं, लाना, देना, और प्रेम सहित खाकर बार बार बड़ाई करना। वे यह नहीं लिखते कि फलों को पहले किसी ने चख लिया था, न यह कि कोई परीक्षा हुई, न यह कि किसी ने आपत्ति की, न यह कि किसी को समझाना पड़ा। जो प्रसिद्धि इस प्रसंग को मिली है उसका आधार यही दो पंक्तियाँ हैं, और इन दो पंक्तियों में जो नहीं है वह भी उतना ही ध्यान देने लायक है जितना जो है।
सार: शबरी अत्यन्त रसीले कन्द, मूल और फल लाकर राम को देती हैं, और प्रभु उन्हें प्रेम सहित खाते हैं तथा बार बार उनकी बड़ाई करते हैं। तुलसी के दोहे में इसके सिवा कुछ नहीं है, न कोई परीक्षा, न कोई आपत्ति, न कोई सफ़ाई।
अपने को सबसे नीचे रख देना
भोजन के बाद वे हाथ जोड़कर सामने खड़ी हो जाती हैं। प्रभु को देखकर प्रेम और बढ़ जाता है, और तब मुँह खुलता है। जो पहला वाक्य निकलता है वह प्रश्न है, कि स्तुति किस विधि से करूँ। और उसके पीछे कारण भी रख दिया जाता है, जाति से अधम हूँ और बुद्धि से भारी जड़ हूँ। जो अभी अभी चरण धो चुकी हैं और भोजन करा चुकी हैं, वे बोलते ही अपनी पात्रता पर सवाल खड़ा कर देती हैं।
और अगली चौपाई में वह वाक्य आता है जिसमें वे अपने को जितना नीचे रख सकती थीं, रख देती हैं।
अधम ते अधम अधम अति नारी । तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥
चौपाई ७
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥
यह तीन सीढ़ियाँ नीचे जाता है। अधम से भी अधम, उनमें भी स्त्रियाँ अत्यन्त अधम, और उनमें भी मैं मन्दबुद्धि। हर सीढ़ी पर घेरा छोटा होता जाता है, और आख़िरी सीढ़ी पर उस घेरे में एक ही व्यक्ति बचता है। और उसी वाक्य के भीतर सम्बोधन रखा हुआ है, अघारी, यानी पापों को हरनेवाले। जिस क्षण वे अपने को सबसे नीचे रख रही हैं, उसी क्षण सामनेवाले को उसी नाम से पुकार रही हैं जिसका काम ही यही है। आत्मनिन्दा के भीतर एक याचना छिपी हुई है, और वह याचना सम्बोधन में है, वाक्य में नहीं।
उत्तर तुरन्त आता है, और उसमें कोई सान्त्वना नहीं है। रघुपति कहते हैं कि वे केवल एक नाता मानते हैं, भक्ति का। नाता, यानी रिश्ता, और इसी एक शब्द से पूरा उत्तर बन जाता है। उन्होंने यह नहीं कहा कि जाति से मुझे कोई मतलब नहीं। उन्होंने यह भी नहीं कहा कि आपकी बात ठीक नहीं है। उन्होंने एक रिश्ते का नाम लिया और कहा कि वे उसी को मानते हैं। बाकी रिश्तों का खण्डन नहीं किया गया, उन्हें गिनती से बाहर कर दिया गया, और खण्डन से यह कहीं अधिक निर्णायक है।
और सम्बोधन भी देखिये। भामिनि। यह शब्द किसी तेजस्विनी स्त्री के लिये आता है। अभी अभी जिसने अपने को अधम से भी अधम कहा है, उसे उत्तर में यही सम्बोधन मिलता है, और यह सम्बोधन वाक्य से पहले आ जाता है। बात समझाने से पहले ही पुकारने का ढंग बदलकर आधा उत्तर दे दिया गया है।
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई । धन बल परिजन गुन चतुराई॥
चौपाई ८
भगति हीन नर सोहइ कैसा । बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥
अब वे सूची देते हैं, और सूची लम्बी है। जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुराई। दस चीज़ें हैं, और इनमें से हर एक अपने आप में बड़ी है। जन्म का पक्ष भी इसमें है और कर्म का भी, सम्पत्ति का भी और योग्यता का भी, अकेले आदमी का भी और उसके पूरे परिवार का भी। कोई वर्ग छोड़ा नहीं गया। और फिर एक ही शर्त लगायी जाती है, कि भक्ति न हो तो।
और उपमा यह है, बिना जल का बादल। उपमा का बल इसी में है कि बादल गिनती में कहीं कम नहीं होता। वह आकाश भर लेता है, वह काला भी होता है, वह गरजता भी है, वह छाया भी करता है। जो एक चीज़ उसमें नहीं है, वही चीज़ उसका सारा काम है। तुलसी यह नहीं कहते कि वे दस चीज़ें बुरी हैं। वे कहते हैं कि उनसे भरा हुआ आदमी सोहइ नहीं, यानी शोभा नहीं पाता, और शोभा शब्द ही उन्होंने चुना है, दोष शब्द नहीं।
सार: शबरी हाथ जोड़कर कहती हैं कि वे अधम से भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अधम हैं और उनमें भी वे मन्दबुद्धि हैं। रघुपति उत्तर देते हैं कि वे केवल एक नाता मानते हैं, भक्ति का, और कहते हैं कि जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुराई से भरा हुआ मनुष्य भी भक्ति के बिना बिना जल के बादल जैसा दिखता है।
नवधा भक्ति: सावधान होकर सुनिये
और अब वह जगह आती है जिसके लिये बहुत से पढ़नेवाले इस पन्ने तक आते हैं। पर उस तक पहुँचने से पहले यह देख लेना चाहिये कि इसके ठीक पहले क्या हुआ है। सामने खड़ी स्त्री ने कोई प्रश्न नहीं पूछा। उसने कोई वर नहीं माँगा, कोई शंका नहीं रखी, कोई शास्त्र की बात नहीं छेड़ी। उसने केवल अपने को छोटा कहा है। और उसके उत्तर में उसे एक पूरा उपदेश दिया जाता है जो आदि से अन्त तक उसी के लिये है, और जिसमें उससे कुछ भी नहीं माँगा जाता।
यही इस उपदेश की असली बनावट है। यह किसी सभा में नहीं दिया जा रहा। कोई शिष्य नहीं बनाया जा रहा, कोई दीक्षा नहीं दी जा रही, कोई नियम नहीं बाँधा जा रहा। एक वन के आश्रम में, भोजन कर चुकने के बाद, बैठे हुए, एक स्त्री से यह कहा जा रहा है जो अपने को गिनती से बाहर समझती है।
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥
चौपाई ९
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥
उपदेश से पहले दो आज्ञाएँ हैं और दोनों छोटी हैं। सावधान होकर सुनिये, और मन में धर लीजिये। सुनना और धरना दो अलग काम हैं। पहली आज्ञा उस एक घड़ी की है, दूसरी उसके बाद की सारी उम्र की। और गिनती शुरू होने से पहले नाम भी दे दिया जाता है, नवधा भक्ति, नौ प्रकार की भक्ति। यह गिनना और नाम देना ही इस उपदेश को याद रह जाने लायक बनाता है, क्योंकि गिनी हुई चीज़ भूलती नहीं।
पहली भक्ति, संतों का संग। नौ में सबसे पहले यही रखी गयी है, और यही एक ऐसी है जो अकेले नहीं की जा सकती। जप अकेले हो सकता है, गान अकेले हो सकता है, सन्तोष अकेले हो सकता है, सरलता अकेले निभायी जा सकती है। संग के लिये कोई दूसरा चाहिये। भक्ति का पहला अंग इस तरह घर के भीतर नहीं, दरवाज़े के बाहर रखा गया है, और जिस स्त्री से यह कहा जा रहा है वह एक आश्रम में अकेली रहती है।
दूसरी भक्ति, मेरे कथा-प्रसंग में रति। यह शब्द ध्यान खींचता है। यह नहीं कहा गया कि कथा समझिये, या कथा कण्ठ कीजिये, या कथा का अर्थ निकालिये। कहा गया प्रेम। कथा में मन का लग जाना। जो बात सौवीं बार सुनने पर भी पुरानी न लगे, वही रति है। और यह ठीक दूसरे नम्बर पर है, संग के तुरन्त बाद, क्योंकि कथा वहीं सुनायी जाती है जहाँ संग होता है। पहले दो अंग इस तरह एक दूसरे में लगे हुए हैं।
सार: राम शबरी से कहते हैं कि वे नवधा भक्ति कह रहे हैं, इसे सावधान होकर सुना जाये और मन में धारण किया जाये। पहली भक्ति संतों का सत्संग है और दूसरी भक्ति उनके कथा-प्रसंग में प्रेम है।
तीसरी और चौथी
तीसरी और चौथी भक्ति उस दोहे में आती हैं जिस पर इस प्रसंग की दोहा-गिनती पूरी होती है। मानस में दोहा प्रायः किसी बात को बाँधने के लिये आता है, और यहाँ वह बीच में आकर सूची को दो हिस्सों में काट देता है।
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
दोहा ३५
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥ ३५॥
तीसरी, गुरु के चरणकमलों की सेवा, और उसके साथ एक शब्द जुड़ा हुआ है जिसके बिना यह अधूरी रह जाती है, अमान, यानी मान से रहित। सेवा तो दिख जाती है। पर सेवा करते हुए भी भीतर एक हिसाब चलता रह सकता है कि मैंने कितना किया, कितने दिन किया, कौन देख रहा था। वह हिसाब रह गया तो सेवा गिनती में नहीं आयी। तुलसी शर्त को उसी पंक्ति में बाँध देते हैं और उसे अलग से समझाने नहीं बैठते।
चौथी, कपट छोड़कर मेरे गुणसमूहों का गान। यहाँ वही शब्द लौट आया है जो तैंतीसवें दोहे में था, कपट छोड़ना। वहाँ ब्राह्मण की सेवा में कपट छोड़ने को कहा गया था, यहाँ गान में। और गान के साथ यह शर्त सबसे अधिक ज़रूरी है, क्योंकि गान बाहर की चीज़ है। उसमें आवाज़ है, सभा है, सुननेवाले हैं, और वहाँ गाते हुए दिखना और सचमुच गाना, दोनों एक जैसे दिखायी देते हैं। तीसरी और चौथी, दोनों के साथ एक ही तरह की शर्त लगी हुई है, और दोनों शर्तें उस चीज़ पर हैं जो किसी को दिखायी नहीं देती।
सार: तीसरी भक्ति अभिमान छोड़कर गुरु के चरणकमलों की सेवा है, और चौथी भक्ति कपट छोड़कर भगवान् के गुणसमूहों का गान है। दोनों की शर्त भीतर की है, बाहर की नहीं।
पाँचवीं और छठी
अगली चौपाई में दो और अंग आते हैं, और इन दोनों की बनावट एक दूसरे से बहुत अलग है। पाँचवीं छोटी है और एक ही काम की है। छठी नौ में सबसे भरी हुई है और उसमें चार बातें एक साथ रखी गयी हैं।
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
चौपाई १०
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥
पाँचवीं, मन्त्र का जप और उनमें दृढ़ विश्वास। दो चीज़ें एक साथ बाँधी गयी हैं, और उनका जोड़ा ही अर्थ बनाता है। जप बिना विश्वास के भी चलता रह सकता है, गिनती पूरी होती रहेगी और भीतर कुछ नहीं बदलेगा। इसीलिये जप के साथ दृढ़ विश्वास रख दिया गया, और दोनों को अलग करके नहीं गिना गया। और इसी एक अंग के नीचे तुलसी एक प्रमाण भी लगा देते हैं, बेद प्रकासा, यह वेदों में प्रकाशित है। नौ में से केवल इसी के साथ यह जोड़ा गया है।
छठी में चार बातें हैं। दम, यानी इन्द्रियों का निग्रह। शील, यानी अच्छा स्वभाव और अच्छा चरित्र। बहुत कामों से वैराग्य, यानी हाथ में काम कम रखना और उनमें उलझे न रहना। और निरन्तर संत पुरुषों के धर्म में लगे रहना। इनमें कुछ भी असाधारण नहीं है। यह रोज़ के आचरण की भक्ति है, और नौ में सबसे अधिक शब्द इसी को मिले हैं।
सार: पाँचवीं भक्ति राम-मन्त्र का जप और उनमें दृढ़ विश्वास है, जिसे तुलसी वेदों में प्रकाशित बताते हैं। छठी भक्ति इन्द्रियों का निग्रह, शील, बहुत कामों से वैराग्य और निरन्तर संतों के धर्म में लगे रहना है।
सातवीं और आठवीं
अगली चौपाई में जो दो अंग आते हैं, उनमें से एक इस पूरी सूची की सबसे असामान्य पंक्ति है, और वह असामान्य इसलिये है कि उसे कहनेवाला कौन है।
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥
चौपाई ११
आठवँ जथालाभ संतोषा । सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥
सातवीं में दो हिस्से हैं। पहला यह कि सारे जगत् को समभाव से उन्हीं में ओतप्रोत देखे। ध्यान दीजिये कि जगत् को छोड़ने को नहीं कहा गया, और जगत् को झूठ कहने को भी नहीं कहा गया। कहा गया कि उसे समभाव से देखे, और उसी में उन्हें देखे।
और दूसरा हिस्सा वह है जो चौंका देता है। संतों को मुझसे भी अधिक करके माने। यह वाक्य किसी संत की प्रशंसा में किसी तीसरे ने नहीं कहा है। यह उसी ने कहा है जिसे दूसरे नम्बर पर रखा जा रहा है। कहनेवाला अपने आगे किसी और को बिठा रहा है, और इस बिठाने को भक्ति का एक अंग बता रहा है। नौ में सबसे अधिक ध्यान खींचनेवाली पंक्ति यही है, और यह उसी सूची में है जो एक स्त्री को सुनायी जा रही है जिसने अभी अभी अपने को सबसे नीचे रखा था।
आठवीं में भी दो हिस्से हैं और दोनों संयम के हैं। जथालाभ सन्तोष, यानी जो मिल जाये उसी में सन्तोष। यह उसी आश्रम में कहा जा रहा है जहाँ अभी अभी वन का कन्द-मूल-फल परोसा गया था और बार बार सराहा गया था, इसलिये यह अंग कहीं दूर से नहीं आया, वह सामने रखा हुआ है। और दूसरा हिस्सा वह है जो इसे कठिन बनाता है, सपनेहुँ पराये दोष न देखे। स्वप्न में भी नहीं। जागते हुए किसी का दोष न कहना एक बात है। यहाँ जो माँगा जा रहा है वह वचन का संयम नहीं है, वह भीतर की उस जगह का है जहाँ कोई पहरा नहीं दे सकता और जहाँ कोई देखनेवाला भी नहीं है।
सार: सातवीं भक्ति सारे जगत् को समभाव से भगवान्मय देखना और संतों को उनसे भी अधिक मानना है। आठवीं भक्ति जो मिल जाये उसी में सन्तोष करना और स्वप्न में भी पराये दोष न देखना है।
नवीं, और उसके बाद खुलनेवाला दरवाज़ा
नौवाँ अंग सबसे आख़िर में है और सबसे कम चमकीला है। और उसके तुरन्त बाद वह आधी पंक्ति आती है जो पूरी सूची का दरवाज़ा खोल देती है।
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥
चौपाई १२
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई । नारि पुरुष सचराचर कोई॥
नवीं में चार बातें हैं और चारों सीधी हैं। सरलता। सबके साथ छलरहित बर्ताव। हृदय में उन्हीं का भरोसा। और हर्ष तथा दीनता, दोनों का न होना। इस आख़िरी अंग में कोई तप नहीं है, कोई तीर्थ नहीं, कोई विद्या नहीं, कोई संख्या नहीं। नौ की गिनती वहाँ जाकर रुकती है जहाँ कुछ भी दिखायी नहीं देता। और हर्ष तथा दीनता को एक साथ रखना ध्यान देने लायक है, क्योंकि दोनों को एक ही तराजू पर रख दिया गया है। जो मिलने पर उछलता है वह न मिलने पर बैठ जायेगा, और यह सूची दोनों को एक ही साथ हटा देती है।
और इसके बाद वह आधी पंक्ति आती है जिस पर सारा भार आ जाता है। इन नौ में से जिनके एकउ हो, यानी एक भी हो। नौ गिनाये गये और फिर कह दिया गया कि एक भी काफ़ी है। गिनती जोड़ने के लिये नहीं थी, चुनने के लिये थी। और उसके बाद घेरा और चौड़ा हो जाता है, नारि पुरुष सचराचर कोई। स्त्री हो या पुरुष, जड़ हो या चेतन, कोई भी हो।
यह वाक्य कहाँ कहा जा रहा है, इसे याद रखना ज़रूरी है। यह किसी शास्त्रार्थ में नहीं कहा जा रहा। यह एक वन के आश्रम में कहा जा रहा है, और सुननेवाली एक ही है, वही जिसने कुछ ही देर पहले कहा था कि स्त्रियाँ अधम से भी अधम हैं। उसी के सामने इस सूची में नारि शब्द सबसे पहले रखा जाता है। जिसने अपने को गिनती से बाहर बताया था, उसे गिनती में सबसे आगे रख दिया गया।
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें । सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥
चौपाई १३
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई । तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥
और फिर वह पंक्ति, जो इस पूरे उपदेश को उलट देती है। उन्हें वही अत्यन्त प्रिय है, और फिर, इन में तो सब प्रकार की भक्ति दृढ़ है। नौ अंग गिनाकर अन्त में यह कह देना कि ये सब पहले से मौजूद हैं, इसका अर्थ यह है कि वह उपदेश पाठ नहीं था। वह एक दर्पण था। जो स्त्री यह पूछ रही थी कि स्तुति किस विधि से करूँ, उसे नौ विधियाँ गिनाकर बता दिया गया कि वे नौ उसी के पास हैं।
और उसके तुरन्त बाद वही तराजू लौट आता है जिससे यह पन्ना शुरू हुआ था। योगियों के समूह को जो गति दुरलभ है, वही आज इनके लिये सुलभ हो गयी। पहली चौपाई में वही गति एक मांसाहारी पक्षी को दी जा चुकी थी, और वहाँ भी तुलना योगियों से ही की गयी थी। यहाँ वही गति एक वन की स्त्री के लिये सुलभ कह दी जाती है। दोनों बार वही शब्द है, गति, और दोनों बार वही तुलना है, योगी। पन्ने के दोनों सिरों पर एक ही कील ठुकी हुई है।
सार: नवीं भक्ति सरलता, सबके साथ छलरहित बर्ताव, हृदय में भगवान् का भरोसा और हर्ष तथा दीनता का न होना है। जिसमें इन नौ में से एक भी हो, वह स्त्री हो या पुरुष, जड़ हो या चेतन, वही उन्हें अत्यन्त प्रिय है। और शबरी से वे कहते हैं कि इन में तो सब प्रकार की भक्ति दृढ़ है, इसलिये जो गति योगियों को दुर्लभ है वही आज इनके लिये सुलभ हो गयी।
पंपा सरोवर की ओर
उपदेश यहाँ समाप्त हो जाता है, और उसके बाद जो चौपाई आती है उसमें दो बिलकुल अलग तरह की बातें एक साथ रख दी गयी हैं। पहली आधी पंक्ति में सबसे बड़ी बात है और दूसरी में सबसे साधारण।
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा॥
चौपाई १४
जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी॥
पहले दर्शन का फल बताया जाता है, और वह कोई वस्तु नहीं है। जीव अपने सहज स्वरूप को पा जाता है। कुछ मिलता नहीं, कुछ नया बनता नहीं, कहीं पहुँचना नहीं होता। जो पहले से है और भूला हुआ है, वही लौट आता है। यही बात इस पन्ने के दूसरे छोर पर उस गन्धर्व ने अपने ढंग से कही थी, कि प्रभु के चरणों को देखकर पाप मिट गया, और अपनी गति पाकर वह आकाश में चला गया था। वहाँ घटना थी, यहाँ उसी घटना का नियम है।
और उसी चौपाई की दूसरी आधी पंक्ति में, बिना किसी सन्धि के, वे एक प्रश्न पूछ लेते हैं। हे भामिनि, जनकनन्दिनी की कुछ खबर जानती हों तो कहिये, हे करिबरगामिनी। यह प्रश्न इस पूरे पन्ने की सबसे साधारण और सबसे बड़ी बात है। जिसने कुछ देर पहले अपने को अधम से भी अधम कहा था, उसी से रास्ता पूछा जा रहा है। उपदेश देनेवाला उपदेश पूरा करके सूचना माँग रहा है, और वह सूचना उसी से माँग रहा है जिसे उपदेश दिया गया था। जो नाता उन्होंने माना था, वह यहाँ काम करता हुआ दिखायी देता है।
उत्तर में वे रास्ता बताती हैं। पंपा नामक सरोवर पर जाइये, वहाँ सुग्रीव से मित्रता होगी, और वे सब हाल बतायेंगे। और उत्तर के अन्त में वे एक बात और जोड़ देती हैं, जो उत्तर पर नहीं, पूछने के ढंग पर टिप्पणी है, कि सब जानते हुए भी वे पूछ रहे हैं। अरण्यकाण्ड में सुग्रीव का नाम यहीं आकर सुनायी देता है, और उसी नाम से आगे का सारा रास्ता खुलता है। वह मित्रता अगले काण्ड की कथा है, पर उसका पता यहीं, इसी आश्रम में, इसी स्त्री के मुँह से मिलता है।
और फिर एक आधी चौपाई रह जाती है जिसमें केवल एक क्रिया है। बार बार प्रभु के चरणों में सिर नवाकर, प्रेम सहित उन्होंने सब कथा सुनायी। कौन सी कथा, तुलसी नहीं बताते। सब कथा, इतना ही। जो कुछ कहने को था वह कह दिया गया, और उसके बाद कहने को कुछ नहीं बचा। इसी वाक्य के तुरन्त बाद छंद आता है, और मानस में छंद प्रायः वहीं आता है जहाँ चौपाई की चाल किसी दृश्य को सँभाल नहीं पाती।
कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे।
छंद
तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे॥
नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू।
बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू॥
पहली दो पंक्तियों में उनका अन्त है, और वह चार क्रियाओं में पूरा हो जाता है। सब कथा कहकर, हरि का मुख देखकर, हृदय में चरणकमलों को धरकर, और योग की अग्नि से देह को त्यागकर वे उस हरिपद में लीन हो गयीं, जहाँ से लौटना नहीं होता। कोई विदा नहीं है, कोई अन्तिम वचन नहीं, कोई शोक नहीं, किसी का रोकना नहीं। क्रम पर ध्यान दीजिये। पहले कहना, फिर देखना, फिर धरना, फिर जाना। हृदय में चरण रख लेने के बाद ही देह छूटता है, और उसी क्रम में इस पूरे प्रसंग का सार आ जाता है।
और फिर छंद की आख़िरी दो पंक्तियों में एक और आवाज़ आ जाती है, और वह इस कथा के भीतर से नहीं आती। हे मनुष्यो, अनेक प्रकार के कर्म, अधर्म और बहुत से मत, ये सब शोक देनेवाले हैं, इन सबका त्याग कर दीजिये। विश्वास करके राम के चरणों में प्रेम कीजिये, यह तुलसीदास कहते हैं। कवि अपना नाम लेकर सामने आ जाता है, और जो कहता है वह ठीक वही है जो अभी अभी एक स्त्री ने करके दिखा दिया है। और विश्वास शब्द यहाँ फिर लौटा है, वही जो पाँचवीं भक्ति में मन्त्र-जप के साथ बाँधा गया था। छंद सूची को दोहराता नहीं, वह उसमें से एक शब्द उठाकर पढ़नेवाले के हाथ में रख देता है।
सार: राम कहते हैं कि उनके दर्शन का परम अनुपम फल यह है कि जीव अपने सहज स्वरूप को पा जाता है, और फिर शबरी से जानकी की खबर पूछते हैं। वे पंपा सरोवर का रास्ता बताती हैं, सुग्रीव से मित्रता होने की बात कहती हैं, प्रेम सहित सब कथा सुनाती हैं, और फिर हरि का मुख देखकर, हृदय में चरण धरकर, योग की अग्नि से देह को त्यागकर हरिपद में लीन हो जाती हैं। छंद के अन्त में तुलसीदास पढ़नेवाले से कहते हैं कि शोक देनेवाले सब मत छोड़कर विश्वास के साथ राम के चरणों में प्रेम करे।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग को पढ़कर जो बात देर तक साथ रहती है वह इसकी बनावट है। तीन दोहों के भीतर दो उद्धार हैं, और दोनों के नीचे एक ही तराजू रखा हुआ है। पहला एक गन्धर्व का है जिसे शाप से राक्षस बना दिया गया था, और उसके छूटने का कारण दर्शन बताया जाता है। दूसरा एक वन में रहनेवाली स्त्री का है, और उसके लिये जो गति सुलभ कही जाती है वह वही है जो योगियों को दुर्लभ है। और पन्ने की पहली ही चौपाई में एक मांसाहारी पक्षी को वही गति दी जा चुकी है। एक ही बात तीन बार कही गयी है, और हर बार पात्र बदल दिया गया है।
दूसरी बात यह है कि इस पन्ने पर दो कठोर वचन और दो कोमल वचन पास पास रखे हुए हैं। एक ओर वह चौपाई है जिसमें शील और गुण से हीन ब्राह्मण को भी पूजनीय और गुणों से भरे शूद्र को अपूजनीय कहा गया है। दूसरी ओर वह चौपाई है जिसमें जाति, पाँति, कुल और धर्म सहित दस बातों को भक्ति के बिना बिना जल के बादल जैसा बताया गया है। तुलसी इन दोनों को एक ही पन्ने पर रखते हैं और बीच में कोई पुल नहीं बनाते। जो पढ़नेवाला यहाँ आता है उसे दोनों मिलते हैं, और उन दोनों के बीच जो जगह बचती है, वही इस पन्ने की सबसे भारी जगह है।
और तीसरी बात वह है जो इस पन्ने पर नहीं होती। यहाँ किसी को लौटाया नहीं जाता। कबन्ध को मारने के बाद उसकी बात सुनी जाती है। शबरी के हाथ का दिया हुआ खाया जाता है और बार बार सराहा जाता है। उनके अपने को नीचा कहने पर न सहमति दी जाती है और न खण्डन किया जाता है, केवल एक दूसरा नाता सामने रख दिया जाता है। नौ अंग गिनाकर अन्त में कह दिया जाता है कि वे नौ उन्हीं में दृढ़ हैं। और सबसे आख़िर में उन्हीं से रास्ता पूछ लिया जाता है। नवधा भक्ति की नौ पंक्तियाँ इसी ढाँचे के भीतर रखी हुई हैं, और यही ढाँचा उन्हें केवल एक सूची बन जाने से बचा लेता है।
इस प्रसंग के बाद अरण्यकाण्ड की चाल बदल जाती है। अब तक वन ही वन था, आश्रम थे, ऋषि थे, राक्षस थे, और खोज का कोई सिरा हाथ नहीं आ रहा था। शबरी के एक वाक्य से पहली बार एक दिशा मिल जाती है, पंपा सरोवर, और एक नाम मिल जाता है, सुग्रीव। जो कथा अब तक भटक रही थी उसे एक पता मिल गया, और वह पता उस स्त्री ने दिया जो इसी पन्ने पर हरिपद में लीन हो जाती हैं। जिसने रास्ता बताया वह आगे के रास्ते पर साथ नहीं है, और यही इस प्रसंग की सबसे शान्त बात है।
और नवधा भक्ति के बारे में एक बात रह जाती है जो कही नहीं गयी। नौ अंग गिनाये गये, पर किसी के साथ कोई विधि नहीं बतायी गयी। कितनी देर, कितनी बार, किस समय, किस दिशा में मुँह करके, किस आसन पर, किस सामग्री से, इनमें से कुछ भी नहीं। संग, कथा में प्रेम, सेवा, गान, जप, संयम, समदृष्टि, सन्तोष और सरलता। नौ के नौ वे काम हैं जो कहीं भी किये जा सकते हैं और जिनके लिये किसी से अनुमति नहीं लेनी पड़ती। यह बात एक वन के आश्रम में, उसी स्त्री के सामने कही गयी थी जो अपने को गिनती से बाहर समझती थी, और शायद इसी कारण ये नौ पंक्तियाँ मानस से निकलकर इतनी दूर तक चली गयीं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा ३३ से ३५, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।