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रामचरितमानसअरण्यकाण्डप्रसंग 9
कबन्ध, शबरी और नवधा भक्ति
जटायु की क्रिया कर चुकने के बाद दोनों भाई आगे बढ़ते हैं। रास्ते में एक शाप कटता है, और फिर एक वन के आश्रम में नवधा भक्ति के वे नौ अंग कहे जाते हैं।
जटायु अखण्ड भक्ति का वर माँगकर भगवान् के धाम को चले गये थे, और उनकी क्रिया राम ने अपने हाथों से की थी। उसके बाद दोनों भाई आगे चलते हैं।
आगे के रास्ते पर एक शापग्रस्त गन्धर्व छूटता है। एक वन में रहनेवाली स्त्री के आश्रम में वह उपदेश दिया जाता है जिसे नवधा भक्ति कहते हैं। सीता की खोज चल रही है, और उसी खोज के रास्ते पर यह सब घटता है।
आश्रम में शबरी सामने खड़ी होकर पूछती हैं कि वे किस विधि से स्तुति करें। नवधा भक्ति के नौ अंग गिनाकर अन्त में राम कहते हैं कि शबरी में सब प्रकार की भक्ति दृढ़ है, और फिर उनसे सीता की खबर पूछते हैं।
कबन्ध, शबरी और दो भाई
- राम जो सीता को खोजते हुए इस वन-मार्ग पर हैं। इसी मार्ग पर वे कबन्ध को मारते हैं, शबरी के आश्रम का आतिथ्य लेते हैं और नवधा भक्ति कहते हैं।
- लक्ष्मण छोटे भाई, जो सीता की खोज में राम के साथ चलते हैं।
- कबन्ध जो रास्ते में आते हुए मारा जाता है, अपने शाप की सारी बात कहता है और अपनी गति पाकर आकाश में चला जाता है।
- दुर्वासा वे ऋषि, जिनके दिये शाप की बात कबन्ध कहता है।
- शबरी वन में रहनेवाली स्त्री, जिनके आश्रम में राम पधारते हैं, जो कन्द-मूल-फल लाकर देती हैं और जिन्हें नवधा भक्ति कही जाती है।
- मुनि वे मुनि, जिनके वचन याद आते ही शबरी का मन प्रसन्न हो जाता है। पोद्दार की टीका उनका नाम मतंग बताती है।
- शिव और पार्वती इस कथा के कहनेवाले और सुननेवाली। शिव पार्वती से कहते हैं कि अभागे कौन हैं।
- सीता जिन्हें दोनों भाई खोजते हुए चलते हैं, और जिनकी खबर राम शबरी से पूछते हैं।
- सुग्रीव जिनसे, शबरी कहती हैं, पंपा सरोवर पर राम की मित्रता होगी, और जो सब हाल बतायेंगे।
- तुलसीदास जो मनुष्यों से कहते हैं कि शोक देनेवाले कर्म, अधर्म और मत छोड़कर विश्वास से राम के चरणों में प्रेम करें।
जो गति योगी माँगते रहते हैं
राम कोमल चित्तवाले हैं, अत्यन्त दीनदयालु, और बिना कारण कृपालु। गीध अधम पक्षी था, और मांस खानेवाला। टीका कहती है कि वह पक्षियों में भी अधम था। उसे राम ने वह गति दी जिसे योगी माँगते रहते हैं।
शिव पार्वती से कहते हैं, हे पार्वती, सुनिये, वे लोग अभागे हैं जो भगवान् को छोड़कर विषयों से अनुराग करते हैं।
फिर दोनों भाई सीता को खोजते हुए आगे चले, और वन की सघनता देखते जाते हैं।
रास्ते में कबन्ध
वह सघन वन लताओं और वृक्षों से भरा है, और उसमें बहुत से पक्षी, मृग, हाथी और सिंह हैं। रास्ते में आते हुए कबन्ध को राम मार देते हैं। उसने अपने शाप की सारी बात कही।
कबन्ध कहता है, “दुर्वासा ने मुझे शाप दिया था। प्रभु, आपके चरण देखकर वह पाप मिट गया।”
टीका के अनुसार राम कहते हैं, “हे गन्धर्व, सुनिये, मैं आपसे कहता हूँ। ब्राह्मणकुल से द्रोह करनेवाला मुझे नहीं सुहाता।”
मन, कर्म और वचन से, कपट छोड़कर
राम कहते हैं, “मन, कर्म और वचन से कपट छोड़कर जो ब्राह्मणों की सेवा करता है, मेरे समेत ब्रह्मा, शिव और सब देवता उसके वश में हो जाते हैं। शाप देता हुआ, मारता हुआ, कठोर वचन कहता हुआ भी ब्राह्मण पूजनीय है, ऐसा संत गाते हैं। शील और गुण से हीन ब्राह्मण भी पूजनीय है, और गुणों के समूह से युक्त तथा ज्ञान में निपुण शूद्र पूजनीय नहीं।”
राम अपना धर्म कहकर उसे समझाते हैं। टीका इसे भागवत-धर्म कहती है। अपने चरणों में उसका प्रेम देखकर वह राम के मन को भाया। फिर वह राम के चरणों में सिर नवाकर अपनी गति पाकर आकाश में चला जाता है। टीका इस गति को उसका गन्धर्व-स्वरूप बताती है।
शबरी के आश्रम में
उदार राम उसे गति देकर शबरी के आश्रम में पधारे। घर में आये राम को देखकर शबरी को मुनि के वचन याद आते हैं, और मन प्रसन्न हो जाता है। पोद्दार की टीका उन्हें मतंग बताती है।
कमल-नयन, विशाल भुजाएँ, सिर पर जटाओं का मुकुट और छाती पर वनमाला, ऐसे साँवले और गोरे दोनों सुन्दर भाई थे। शबरी उनके चरणों में लिपट पड़ीं। प्रेम में मग्न होकर उनके मुख से वचन नहीं निकलता। वे बार-बार चरणों में सिर नवाती हैं। फिर उन्होंने आदर से जल लेकर चरण धोये, टीका के अनुसार दोनों भाइयों के, और फिर उन्हें सुन्दर आसनों पर बैठाया।
कन्द, मूल और फल
शबरी ने अत्यन्त रसीले कन्द, मूल और फल लाकर राम को दिये।
राम ने बार-बार प्रशंसा करके उन्हें प्रेम सहित खाया।

फलों को पहले चखे जाने की, किसी परीक्षा की, या किसी आपत्ति की कोई बात यहाँ नहीं है।
शबरी के वचन, और एक नाता
भोजन के बाद शबरी हाथ जोड़कर सामने खड़ी हो जाती हैं। राम को देखकर उनका प्रेम अत्यन्त बढ़ जाता है। “मैं किस विधि से आपकी स्तुति करूँ? मैं नीच जाति की हूँ और बुद्धि से भारी जड़ हूँ।”
“जो अधम से भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अत्यन्त अधम हैं, और उनमें भी मैं मन्दबुद्धि हूँ, हे पापनाशन।”
राम कहते हैं, “हे भामिनि, बात सुनिये। मैं एक भक्ति का नाता मानता हूँ। जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुराई, इन सबके होते हुए भी भक्ति से हीन मनुष्य कैसा लगता है? जैसे बिना जल का बादल दिखता है।”
नवधा भक्ति, पहली और दूसरी
राम कहते हैं, “मैं आपसे नवधा भक्ति कहता हूँ। सावधान होकर सुनिये, और मन में धारण कीजिये।”
पहली भक्ति, संतों का संग। दूसरी भक्ति, राम के कथा-प्रसंग में प्रेम।
तीसरी और चौथी
तीसरी, अभिमान से रहित होकर गुरु के चरणों की सेवा। चौथी, कपट छोड़कर राम के गुणसमूहों का गान।
पाँचवीं और छठी
पाँचवीं, राम के मन्त्र का जप और उनमें दृढ़ विश्वास। यह वेदों में प्रसिद्ध है। छठी, इन्द्रियों का निग्रह, शील, बहुत कामों से वैराग्य, और निरन्तर संत पुरुषों के आचरण में लगे रहना।
सातवीं और आठवीं
सातवीं, सारे जगत् को समभाव से राममय देखना, और संतों को राम से भी अधिक करके मानना।
आठवीं, जो मिल जाये उसी में सन्तोष, और स्वप्न में भी पराये दोष न देखना।
नवीं, और सुलभ हुई गति
नवीं, सरलता, सबके साथ छलरहित बर्ताव, हृदय में राम का भरोसा, और हर्ष तथा दीनता, दोनों का न होना। राम कहते हैं: इन नौ में से जिसके एक भी हो, स्त्री हो या पुरुष, जड़ हो या चेतन, कोई भी। “हे भामिनि, वही मुझे अत्यन्त प्रिय है, और आपमें तो सब प्रकार की भक्ति दृढ़ है।” योगियों के समूह को जो गति दुर्लभ है, राम कहते हैं, वही आज शबरी के लिये सुलभ हो गयी।
पंपा सरोवर की ओर
राम अपने दर्शन का परम अनुपम फल बताते हैं, कि जीव अपने सहज स्वरूप को पा जाता है।
फिर राम पूछते हैं: “हे भामिनि, सीता की कुछ खबर जानती हों तो कहिये।”
उत्तर में शबरी कहती हैं, “हे राम, आप पंपा नामक सरोवर पर जाइये। वहाँ आपकी सुग्रीव से मित्रता होगी। हे देव, वह सब हाल बतायेगा। हे धीरबुद्धि, आप सब जानते हुए भी मुझसे पूछते हैं!”
बार-बार राम के चरणों में सिर नवाकर, शबरी ने प्रेम सहित सब कथा सुनायी। सब कथा कहकर और भगवान् का मुख देखकर उन्होंने हृदय में उनके चरण धर लिये, और योग की अग्नि से देह त्यागकर वे उस हरिपद में लीन हो गयीं। वहाँ से लौटना नहीं होता।
फिर दास तुलसी मनुष्यों से कहते हैं। अनेक प्रकार के कर्म, अधर्म और बहुत से मत, ये सब शोक देनेवाले हैं, इनका त्याग कीजिये। और विश्वास करके राम के चरणों में प्रेम कीजिये।
कबन्ध, शबरी और पंपा का रास्ता
राम जटायु को वह गति देते हैं जो योगी माँगते रहते हैं। शिव पार्वती से उन लोगों को अभागा कहते हैं जो भगवान् को छोड़कर विषयों से अनुराग करते हैं। रास्ते में राम कबन्ध को मारते हैं। वह दुर्वासा के शाप की बात कहता है, उपदेश सुनता है, और अपनी गति पाकर आकाश में चला जाता है। शबरी के आश्रम में राम उनका दिया कन्द, मूल और फल प्रेम से खाते हैं, उन्हें नवधा भक्ति सुनाते हैं, और उनसे सीता की खबर पूछते हैं। शबरी उन्हें पंपा सरोवर और सुग्रीव का पता देती हैं, और योग की अग्नि से देह त्यागकर हरिपद में लीन हो जाती हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा 33 से 35 और दोहा 36 से पहले की चौपाइयाँ और छन्द, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।