
सीता जी के सम्मानपूर्ण वचनों से विदा पाकर हनुमान जी ने उस स्थान से हटते हुए मन-ही-मन विचार किया कि यद्यपि देवी के दर्शन का मुख्य प्रयोजन सिद्ध हो चुका, फिर भी एक छोटा-सा कार्य शेष रह गया है। शत्रु का बल जाने बिना कार्य अधूरा है, और राक्षसों के साथ चार उपायों में से तीन (साम, दान, भेद) यहाँ काम नहीं आएँगे। साम (मधुर वचन) से राक्षस वश में नहीं होते, दान धन से भरे-पूरे लोगों पर व्यर्थ है, और बल के मद में चूर जनों में भेद डालना असम्भव है। ऐसे में हनुमान जी को केवल चौथा उपाय, अर्थात् दण्ड (पराक्रम का प्रदर्शन), उचित जान पड़ा। उन्होंने सोचा कि यदि वे यहीं रावण की सेना का बल, उसके मन्त्रियों और रथ-गज-अश्व का संगठन देख लें, और यह जान लें कि संग्राम में कौन-सा पक्ष भारी रहेगा, तभी अपने स्वामी सुग्रीव की आज्ञा का सच्चा पालन होगा। यही निश्चय कर वायुपुत्र ने रावण के उस मनोहर प्रमदावन (रनिवास से लगा क्रीड़ा-उद्यान) को उजाड़ने का संकल्प किया।
अशोक-वन का विध्वंस और किंकरों का संहार

वायु के समान वेगवान् और भयंकर पराक्रमी मारुति ने अपनी जाँघों के महान् वेग से वृक्षों को तोड़ना आरम्भ किया। उन्होंने नन्दनवन (इन्द्र का स्वर्गीय उपवन) के समान, नाना वृक्ष-लताओं से भरे उस प्रमदावन को रौंद डाला। वृक्ष उखड़ गए, जलाशय मथ गए और कीचड़ से भर उठे, पर्वत-शिखर चूर हो गए। कोमल ताम्र-वर्ण किसलय (लाल रंग के नये कोंपल) मुरझा गए, और लताएँ ऐसी अस्त-व्यस्त दिखीं जैसे वस्त्र अव्यवस्थित किए स्त्रियाँ। लता-गृह, चित्र-गृह और शिला-गृह टूट गए, पालतू हिंसक पशु, हरिण और पक्षी आर्तनाद करने लगे। उस महान् उपवन का रूप ही नष्ट हो गया। इस प्रकार रावण के मन को अत्यन्त अप्रिय कर्म करके, और अनेक महाबली योद्धाओं से अकेले भिड़ने की उत्कंठा लिए, हनुमान जी मार्तिक शोभा से प्रदीप्त होकर उद्यान के तोरण (मुख्य द्वार की मेहराब) पर जा खड़े हुए।
पक्षियों के चीत्कार और वृक्षों के टूटने के शब्द से सारे लंकावासी त्रस्त हो उठे; राक्षसों के सामने क्रूर अपशकुन प्रकट होने लगे। नींद उचट जाने पर विकराल मुख वाली राक्षसियों ने उजड़ा हुआ वन और उस विशाल वानर को देखा। हनुमान जी ने उन्हें भयभीत करने के लिए विशाल रूप धारण कर लिया। राक्षसियों ने जनकनन्दिनी सीता से पूछा कि यह कौन है, किसका दूत है, कहाँ से और किस प्रयोजन से आया है, और इससे उनकी क्या बात हुई। साध्वी सीता ने कहा कि कामरूपी (इच्छानुसार रूप बदलने में समर्थ) राक्षसों के विषय में उन्हें कुछ ज्ञात नहीं; साँप ही साँप के पैरों को पहचानता है। वे स्वयं भयभीत हैं और इतना ही समझती हैं कि यह कोई कामरूपी राक्षस होगा। यह सुनकर कुछ राक्षसियाँ वहीं रुक गईं और कुछ रावण को समाचार देने दौड़ीं।
राक्षसियों ने रावण से कहा कि अशोकवाटिका के बीच एक भयंकर रूप वाला, अमित विक्रमी वानर सीता से वार्ता करके खड़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि सीता ने उसका परिचय छिपा लिया। हो सकता है वह इन्द्र का दूत हो, या कुबेर का, अथवा सीता की खोज में राम का भेजा हुआ। उसने सम्पूर्ण मनोहर उद्यान उजाड़ डाला, केवल वह शिंशपा-वृक्ष (एक प्रकार का वृक्ष, सीसम) बचा रखा जिसके नीचे सीता बैठी थीं। उन्होंने रावण से प्रार्थना की कि इस उग्र रूप वाले को कठोर दण्ड दें। यह सुनकर राक्षसराज रावण चिता की अग्नि-सा धधक उठा; क्रोध से उसकी आँखों से जलते दीपकों की तेल-बूँदों जैसे आँसू टपकने लगे। उसने अपने ही समान पराक्रमी, “किंकर” नामक वीर राक्षसों को हनुमान जी को पकड़ने का आदेश दिया।

उस भवन से लोहे के मुद्गर (हथौड़ा) और गदाएँ लिए अस्सी हज़ार वेगवान् किंकर निकल पड़े; ये सब बड़े पेट वाले, बड़े दाँतों वाले, घोर रूप और महाबली थे, हनुमान जी को पकड़ने को उद्यत। तोरण पर खड़े वानर पर वे पतंगे जैसे अग्नि पर टूटते हैं, वैसे ही टूट पड़े। हनुमान जी ने पूँछ धरती पर पटककर महाध्वनि की और लंका को शब्द से भरते हुए विशाल काय धारण किया, जिससे आकाश के पक्षी गिर पड़े। उन्होंने उच्च स्वर से घोषणा की कि अतिबली राम, महाबली लक्ष्मण और राघव के आश्रय में रहने वाले राजा सुग्रीव की जय हो; वे स्वयं वायुपुत्र हनुमान, कोसलेन्द्र राम के दास और शत्रु-सेनाओं के संहारक हैं। उन्होंने कहा कि युद्ध में सहस्र रावण भी उनका सामना नहीं कर सकते, और वे लंका को मथकर, सीता को प्रणाम करके, समस्त राक्षसों के देखते-देखते कृतार्थ लौट जाएँगे। तोरण पर पड़ी एक भयंकर लोहे की परिघ (अर्गला) उठाकर उन्होंने उन निशाचरों का वध आरम्भ किया, जैसे सहस्र-नेत्र इन्द्र वज्र से दैत्यों का संहार करते हैं। सब अस्सी हज़ार किंकर मारे गए। थोड़े से बचे राक्षसों ने रावण को सब किंकरों के मारे जाने का समाचार दिया; इस पर रावण ने प्रहस्त के पुत्र, समर में दुर्जय जम्बुमाली को भेजा।
समझने की कुंजी (चार उपाय): राजनीति के चार उपाय हैं, साम (समझाना), दान (भेंट देना), भेद (फूट डालना) और दण्ड (बल-प्रयोग)। हनुमान जी ने स्थिति देखकर निश्चय किया कि मदोन्मत्त राक्षसों पर पहले तीन व्यर्थ हैं, इसलिए केवल दण्ड ही उपयुक्त है। उद्यान-विध्वंस उनकी मनमानी नहीं, शत्रु का बल नापने और राजसभा तक पहुँचने की सोची-समझी युक्ति थी।
सार: सीता-दर्शन के बाद शत्रु-बल जानने के लिए हनुमान जी ने अशोक-वन उजाड़ा, राक्षसियों को भयभीत किया, और रावण के भेजे अस्सी हज़ार किंकरों को परिघ से मार गिराया। अब रावण ने प्रहस्तपुत्र जम्बुमाली को भेजा।
जम्बुमाली का वध और चैत्य-प्रासाद का दहन
किंकरों का वध करके हनुमान जी ने ध्यानपूर्वक सोचा कि वन तो उजाड़ दिया, पर राक्षसों के अधिष्ठातृ-देवता का चैत्य-प्रासाद (मन्दिर-भवन) अभी विध्वस्त नहीं हुआ। यह सोचकर वे मेरु-शिखर-से ऊँचे उस चैत्य-प्रासाद पर चढ़ गए और उदित सूर्य-से शोभायमान हुए। वहाँ चढ़कर उन्होंने पुनः गर्जना की और लंका को शब्द से भर दिया। उनके आस्फालन (पूँछ पटकने) के घोर शब्द से पक्षी और चैत्य के रक्षक मूर्च्छित होकर गिर पड़े। उन्होंने फिर वही जयघोष किया: राम और लक्ष्मण की जय, राघव-रक्षित राजा सुग्रीव की जय; मैं कोसलेन्द्र राम का दास हनुमान हूँ। सौ चैत्य-रक्षक नाना अस्त्र, प्रास (भाला), खड्ग और परशु लेकर निकले और उन्होंने हनुमान जी को घेर लिया, मानो गंगाजल का विशाल भँवर हो। तब क्रुद्ध वायुपुत्र ने उस प्रासाद का सोने से मढ़ा, सौ धार वाला एक स्तम्भ उखाड़कर घुमाया; घर्षण से अग्नि उत्पन्न हुई और प्रासाद जल उठा। उन्होंने वज्रधारी इन्द्र की भाँति उन सौ रक्षकों को उसी स्तम्भ से मार डाला।
आकाश में स्थित होकर हनुमान जी ने घोषणा की कि सुग्रीव के वश में मुझ-जैसे सहस्रों महाबली वानर-यूथपति हैं, जो सारी पृथ्वी पर विचरते हैं। कुछ दस गजों के बल वाले, कुछ उससे दस गुना, और कुछ सहस्र गजों के समान पराक्रमी हैं। शीघ्र ही सुग्रीव सैकड़ों, सहस्रों, लाखों और करोड़ों ऐसे वानरों से घिरकर आएँगे; तब न यह लंका रहेगी, न आप राक्षस, न रावण, जिसने इक्ष्वाकु-वीर राम से वैर बाँध लिया है।

रावण की आज्ञा से प्रहस्त का बली पुत्र जम्बुमाली, बड़े दाँतों वाला धनुर्धर, इन्द्रधनुष-सा महान् धनुष लेकर निकला। वह लाल माला और लाल वस्त्र पहने, सुन्दर कुण्डल धारण किए, घूमती आँखों वाला और संग्राम में दुर्जय था; उसके धनुष की टंकार वज्र और बिजली के समान गूँजी। गधों के जुते रथ पर आते जम्बुमाली को देख हनुमान जी हर्षित होकर गरज उठे। जम्बुमाली ने तीखे बाणों से तोरण पर खड़े हनुमान जी को बेधा: अर्धचन्द्र बाण से मुख पर, एक कर्णि-बाण से सिर पर, और दस नाराचों (लोहे के बाण) से भुजाओं पर। बाण से बिंधा उनका ताम्र-वर्ण मुख शरत्काल के सूर्य-किरण से प्रकाशित खिले लाल कमल-सा शोभा पाने लगा।
क्रुद्ध होकर हनुमान जी ने पास पड़ी एक बड़ी शिला उखाड़कर फेंकी, पर जम्बुमाली ने दस बाणों से उसे चूर कर दिया। तब हनुमान जी ने एक विशाल साल-वृक्ष उखाड़कर घुमाया, पर जम्बुमाली ने चार बाणों से वृक्ष काट डाला, पाँच से भुजाएँ, एक से वक्ष, और दस से वक्षःस्थल बेध दिया। शरीर बाणों से भर जाने पर महाक्रोधी हनुमान जी ने वही पहली वाली परिघ उठाकर अत्यन्त वेग से घुमाई और जम्बुमाली के विशाल वक्ष पर दे मारी। उस प्रहार से न उसका सिर दिखा, न भुजाएँ, न जानु, न धनुष, न रथ, न अश्व, न बाण; वह महारथी चूर्ण-शरीर वृक्ष की भाँति निष्प्राण भूमि पर गिर पड़ा। जम्बुमाली और किंकरों के वध का समाचार सुन रावण क्रोध से रक्त-नेत्र हो उठा और उसने अपने मन्त्री (प्रहस्त) के अतिवीर पुत्रों को आदेश दिया।
समझने की कुंजी (चैत्य-प्रासाद): चैत्य-प्रासाद राक्षसों के कुल-देवता का मन्दिर-भवन था, लंका की धार्मिक प्रतिष्ठा का केन्द्र। उद्यान उजाड़ने के बाद इसका दहन शत्रु के मनोबल पर सीधी चोट थी।
सार: हनुमान जी ने चैत्य-प्रासाद पर चढ़कर सौ रक्षकों का वध किया, स्तम्भ के घर्षण से उत्पन्न अग्नि से भवन जलाया, और घोषणा की कि वानर-सेना लंका को मिटा देगी। फिर प्रहस्तपुत्र जम्बुमाली को परिघ से मार गिराया।
मन्त्रिपुत्रों और पाँच सेनापतियों का संहार
रावण की आज्ञा से उसके मन्त्री (प्रहस्त) के सात पुत्र, अग्नि-से तेजस्वी, महाबली, अमित-पराक्रमी और अस्त्र-विद्या में निपुण, बड़ी सेना सहित निकले। उनके रथ सोने के कवच से ढके, ध्वजा-पताकाओं से सजे और मेघ-गर्जन-से शब्द करने वाले थे; वे विद्युत-युक्त मेघों-से सुशोभित होकर धनुष टंकारने लगे। किंकरों के मारे जाने का समाचार पाकर उनकी माताएँ बन्धु-बान्धवों सहित शोक और भय से व्याकुल हो उठीं। एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में वे तोरण पर अचल खड़े हनुमान जी पर टूट पड़े और बाण-वर्षा करने लगे, मानो वर्षा-काल के मेघ बरस रहे हों। बाण-वर्षा से ढककर हनुमान जी पर्वतराज-से ओझल हो गए, पर निर्मल आकाश में विचरते हुए वेगवान् वानर ने उनके बाण और रथ-वेग चकमा देकर टाल दिए, मानो वायु-देव मेघों के संग क्रीड़ा करते हों।

घोर निनाद करके हनुमान जी उन राक्षसों पर झपटे। किसी को थप्पड़ से, किसी को पाँव से, किसी को मुक्के से, और किसी को नखों से चीर डाला; किसी को छाती से कुचला, किसी को जाँघों से, और कुछ तो उनकी गर्जना मात्र से वहीं गिर पड़े। सातों मन्त्रिपुत्रों के मारे जाने पर शेष सेना दसों दिशाओं में भाग खड़ी हुई; गज विषम स्वर से चिंघाड़े, अश्व गिर पड़े, और भूमि टूटे रथों से भर गई। रक्त की नदियाँ बहने लगीं, और नाना चीत्कारों से लंका मानो विकृत स्वर में चीख उठी। उन उद्धत राक्षसों का संहार करके वीर हनुमान जी पुनः उसी तोरण पर जा खड़े हुए।
मन्त्रिपुत्रों के मारे जाने का समाचार पाकर रावण ने अपने मुख के भाव छिपाकर एक गूढ़ निश्चय किया। उसने पाँच श्रेष्ठ सेनापतियों (विरूपाक्ष, यूपाक्ष, दुर्धर, प्रघस और भासकर्ण) को, जो वायु-वेग के समान और नीति में निपुण थे, हनुमान जी को बन्दी बनाने भेजा। उसने कहा कि कर्म देखकर वह इसे साधारण वानर नहीं मानता; अवश्य यह कोई महान् बल वाला प्राणी है, सम्भवतः इन्द्र ने तपोबल से उनके नाश के लिए रचा हो। उसने वालि, सुग्रीव, जाम्बवान्, नील और द्विविद जैसे वानर पहले देखे थे, पर इस वानर-रूप में स्थित प्राणी की गति, तेज, बुद्धि और बल अद्भुत हैं। रावण ने सेनापतियों को सावधानी बरतने, देश-काल के अनुकूल कर्म करने और आत्मरक्षा का ध्यान रखने को कहा, क्योंकि युद्ध में विजय अनिश्चित होती है।
स्वामी की आज्ञा शिरोधार्य कर अग्नि-से तेजस्वी सेनापति मतवाले गजों, अति-वेगवान् अश्वों और रथों पर निकले। उन्होंने उदित सूर्य-से प्रकाशमान, तोरण पर स्थित हनुमान जी को देखा। दुर्धर ने पाँच तीखे बाण उनके सिर में गड़ा दिए; बाणों से बिंधे हनुमान जी आकाश में उछले और दसों दिशाओं को गुँजा दिया। दुर्धर सैकड़ों बाण बरसाने लगा, पर हनुमान जी ने अपनी गर्जना से ही उसे रोक लिया और फिर अकस्मात् उसके रथ पर वज्र-से कूद पड़े; आठों अश्व कुचले गए, धुरी-जूआ टूट गया, और दुर्धर मृत होकर भूमि पर गिरा।
दुर्धर को गिरा देख विरूपाक्ष और यूपाक्ष क्रोध से आकाश में उछले और मुद्गरों से हनुमान जी का वक्ष ताड़ा। उनका वेग रोककर हनुमान जी सुपर्ण (गरुड़)-से भूमि पर उतरे, एक साल-वृक्ष उखाड़कर दोनों वीरों को मार गिराया। तीन को मरा देख वेगवान् प्रघस शूल लिए और क्रुद्ध भासकर्ण उनके पार्श्व में आ डटे; प्रघस ने तीखे पट्टिश से और भासकर्ण ने शूल से हनुमान जी पर प्रहार किया। बालसूर्य-से कान्तिमान् क्रुद्ध हनुमान जी ने एक पर्वत-शिखर उखाड़कर, जिस पर पशु, सर्प और वृक्ष भी थे, दोनों राक्षसों को कुचलकर तिल-तिल कर डाला। पाँचों सेनापतियों के मारे जाने पर हनुमान जी ने शेष सेना का संहार किया, अश्व से अश्व, गज से गज, योद्धा से योद्धा, और रथ से रथ टकराकर, मानो सहस्र-नेत्र इन्द्र असुरों का नाश कर रहे हों। तब अवसर की प्रतीक्षा करते प्रलयकाल-से वीर हनुमान जी फिर तोरण पर जा खड़े हुए।
सार: हनुमान जी ने प्रहस्त के सातों पुत्रों, फिर रावण के पाँच सेनापतियों (दुर्धर, विरूपाक्ष, यूपाक्ष, प्रघस और भासकर्ण) को उनकी सेना सहित नष्ट कर डाला, और हर बार लौटकर तोरण पर डट गए।
कुमार अक्ष का वध

पाँच सेनापतियों को मरा सुनकर रावण ने अपने युद्ध-उत्सुक पुत्र कुमार अक्ष की ओर ध्यानपूर्वक देखा। पिता की दृष्टि-मात्र से प्रेरित होकर वह तेजस्वी राजकुमार, सोने के चित्रित धनुष से सज्जित, राजसभा में ऐसे उछल पड़ा जैसे विप्रवरों के घृत–आहुति से अग्नि भभक उठे। बालसूर्य-से प्रकाशमान, तपते सोने के जाल से मढ़े रथ पर, जिसमें मन-से वेगवान् आठ श्रेष्ठ अश्व जुते थे, जो देव-असुरों के लिए भी अजेय और आकाश में बिना आधार चलने वाला था, जिसमें तरकश, आठ खड्ग, शक्ति और तोमर सुसज्जित थे, चढ़कर अक्ष महावानर हनुमान जी की ओर बढ़ा। आकाश-धरती को अश्व-गज-रथ की ध्वनि से भरते हुए वह सेना सहित आया।
प्रलयकाल की अग्नि-से राक्षस-संहार को उद्यत हनुमान जी को आश्चर्य हुआ कि इतना-सा बालक युद्ध को आया है। सिंह-सी आँखों वाले अक्ष ने गर्व-भरी दृष्टि से उन्हें देखा। अपने पराक्रम पर क्रुद्ध होकर अक्ष ने तीन तीखे बाणों से हनुमान जी को बेधकर ललकारा। उन तीन सुवर्ण-पंख वाले बाणों से बिंधे, रक्त बहाते हुए, उदित सूर्य-से कान्तिमान् हनुमान जी किरण-मण्डल-से शोभित हुए। अक्ष को आहुति-उन्मुख देखकर हनुमान जी हर्ष से बढ़े और गर्जे। दोनों के बीच ऐसा अद्भुत संग्राम हुआ कि देव-असुर भी विस्मित हुए; धरती चीख उठी, सूर्य मन्द पड़ा, वायु थम गई, त्रिकूट-पर्वत काँपा और समुद्र क्षुब्ध हो उठा।

हनुमान जी के पराक्रम को बढ़ते देख अक्ष का तेज, बल और बाण-वेग भी प्रलयकाल के सूर्य-सा बढ़ने लगा। उसने बाण-वर्षा से आकाश भर दिया। हनुमान जी ने मन में विचार किया: “यह बालक नहीं, बालक-से बड़े कर्म करता है; इसे मारने को मन नहीं करता। यह महात्मा, वीर, धैर्यवान् और देव-यक्ष-मुनियों तक से पूजित है। पर उपेक्षा करने पर यह बढ़ता ही जाएगा; बढ़ती हुई अग्नि की उपेक्षा उचित नहीं। अतः अब इसका वध ही उचित है।” यह निश्चय कर वायुपुत्र ने अपना वेग बढ़ाया। उन्होंने पहले अक्ष के आठों श्रेष्ठ अश्वों को थप्पड़ों से मार डाला; धुरी टूटने और अश्व मरने से वह महान् रथ आकाश से भूमि पर गिर पड़ा। तब अक्ष धनुष और खड्ग लिए आकाश में उछला, मानो योग-साधना से देह त्यागकर ऋषि देव-लोक को जा रहा हो। हनुमान जी ने आकाश में उसका पीछा कर उसके दोनों पाँव दृढ़ता से पकड़ लिए और गरुड़ की भाँति महानाग को पकड़कर सहस्रों बार घुमाकर उसे वेग से भूमि पर पटक दिया। राक्षस की भुजाएँ, जाँघें, कटि और वक्ष टूट गए, अस्थियाँ और नेत्र चूर हो गए, सन्धियाँ खुल गईं। अक्ष के मारे जाने पर देव, इन्द्र, ऋषि, यक्ष और नाग विस्मित हुए, और हनुमान जी ने रावण के हृदय में महान् भय भर दिया। फिर वे अवसर की ताक में पुनः तोरण पर जा खड़े हुए।
सार: रावण-पुत्र कुमार अक्ष ने अद्भुत वीरता दिखाई; हनुमान जी ने पहले उसकी प्रशंसा-भरी अनिच्छा अनुभव की, फिर उसके अश्व और रथ नष्ट कर, आकाश में पाँव पकड़कर उसे भूमि पर पटककर मार डाला।
इन्द्रजित् का आगमन और ब्रह्मास्त्र-बन्धन
अक्ष के मारे जाने पर भी मन को सम्भालकर महामना रावण ने अपने ज्येष्ठ पुत्र, देव-तुल्य इन्द्रजित् को बुलाया। उसने कहा: “तीनों लोकों में आप-सा अश्रान्त योद्धा कोई नहीं; आप भुज-बल और तप से सुरक्षित, देश-काल के ज्ञाता और बुद्धि में सर्वश्रेष्ठ हैं। आप अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ हैं, ब्रह्मा की आराधना से आपने दिव्य अस्त्र अर्जित किए हैं। आपके अस्त्र-बल के सामने इन्द्र सहित देव और मरुद्गण भी टिक नहीं पाते। सब किंकर, जम्बुमाली, सातों मन्त्रिपुत्र, पाँचों सेनापति और प्रिय भाई अक्ष भी मारे गए; अब मेरा भरोसा केवल आप पर है। दिव्य धनुष का स्मरण कर, अपने और शत्रु के बल को तौलकर, शत्रु को अक्षत (बिना मारे) वश में करने के कार्य में जुटिए।” उसने यह भी कहा कि सेना न ले जाएँ, और वज्र-सा कोई अस्त्र भी न ले जाएँ, क्योंकि हनुमान अग्नि-सा है और किसी अस्त्र से नहीं मरता। फिर भी यह जान लें कि यह राजधर्म और क्षत्रिय-नीति के अनुकूल है।
पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर इन्द्रजित् ने स्वामी की प्रदक्षिणा की और चार तीखे दाँतों वाले बाघों से जुते रथ पर चढ़कर निकला। उसके निकलते ही दिशाएँ धुँधली हो गईं, गीदड़ आदि क्रूर पशु चिंघाड़ उठे, और आकाश को ढककर नाग, यक्ष, ऋषि और सिद्ध युद्ध देखने जुट गए। रथ की घर्घराहट और धनुष की टंकार सुन हनुमान जी अत्यन्त हर्षित हुए और विशाल रूप धारण कर गर्जे। दोनों वीर, इन्द्र और बलि-से वैरी, वेगवान् और निःशंक, परस्पर भिड़ गए। इन्द्रजित् ने सुवर्ण-पंख वाले, वज्र-वेगी, लम्बे तीखे बाण छोड़े, पर हनुमान जी बाणों के बीच-बीच में से वायु-से निकलते हुए आकाश में विचरने लगे। न इन्द्रजित् को हनुमान जी पर वार करने का अवसर मिला, न हनुमान जी को उसे पकड़ने का; देव-तुल्य पराक्रमी दोनों एक-दूसरे के लिए असह्य हो उठे।

अपने अमोघ बाणों से भी हनुमान जी को अक्षत देखकर इन्द्रजित् बड़ी चिन्ता में पड़ा। तब उसने समझ लिया कि यह वानर वध्य नहीं है, और इसे बन्दी बनाने का विचार किया। उसने स्वायम्भुव मन्त्रों से अभिमन्त्रित ब्रह्मास्त्र हनुमान जी पर छोड़ा। उस अस्त्र से बँधकर हनुमान जी निश्चेष्ट होकर भूमि पर गिर पड़े। पर वे जानते थे कि यह ब्रह्मा का अस्त्र है, और स्वयं उन्होंने पितामह से वर पाया था; अतः ब्रह्मा के प्रति आदर से और रावण से भेंट की इच्छा से उन्होंने अस्त्र-बन्धन स्वीकार कर लिया, यद्यपि वे उसे तोड़ने में समर्थ थे। उन्होंने सोचा कि ब्रह्मा, इन्द्र और पिता वायु से रक्षित होने के कारण उन्हें भय नहीं, और राक्षसों के हाथों पकड़े जाने से रावण से वार्ता का सुअवसर मिलेगा।
तब समीप आए राक्षसों ने उन्हें झिड़ककर सन (पटसन) और वृक्ष-छाल की रस्सियों से बाँध दिया। ज्यों ही उन्हें छाल की रस्सी से बाँधा गया, ब्रह्मास्त्र का बन्धन छूट गया, क्योंकि एक बन्धन के साथ दूसरा बन्धन नहीं रहता। पर इन्द्रजित् ने यह जानकर चिन्ता की कि अस्त्र-मन्त्र की गति न समझने वाले राक्षसों ने रस्सी से बाँधकर उसका महान् कर्म व्यर्थ कर दिया, और अब वह अस्त्र पुनः काम न करेगा। अस्त्र से मुक्त होने पर भी हनुमान जी ने यह प्रकट न किया; क्रूर राक्षस उन्हें मुक्कों से पीटते हुए रावण के समीप घसीट ले चले।

इन्द्रजित् ने उस वानर-श्रेष्ठ को, जो अब केवल छाल-रस्सी से बँधा था, राजसभा में रावण के समक्ष प्रस्तुत किया। राक्षसों ने मतवाले हाथी-से बँधे उस कपिवर का परिचय रावण को दिया। हनुमान जी ने वहाँ बैठे कुलीन, शीलवान् वृद्ध परिचारकों और रत्न-जटित सभा को देखा; राक्षस उन्हें इधर-उधर घसीट रहे थे। तेज और बल से युक्त, तपते सूर्य-से रावण को भी उन्होंने देखा। “यह कौन है, किसका है, कहाँ से आया, क्या कार्य है, किसका आश्रय है”, राक्षस-वीर ऐसी चर्चा करने लगे; कुछ क्रुद्ध होकर बोले “इसे मार डालो, भून डालो, खा जाओ।” रोष से ताम्र-नेत्र रावण ने अपने कुलीन प्रधान मन्त्रियों को इससे पूछने का आदेश दिया। क्रमशः पूछे जाने पर हनुमान जी ने आरम्भ में कहा: “मैं वानरराज सुग्रीव का दूत होकर आया हूँ।”
समझने की कुंजी (ब्रह्मास्त्र-बन्धन): इन्द्रजित् वही रावण-पुत्र है जिसने इन्द्र को जीतकर “इन्द्रजित्” नाम पाया (मूल नाम मेघनाद)। उसका ब्रह्मास्त्र अमोघ था, पर हनुमान जी पर ब्रह्मा का ही वर होने से वह घातक नहीं हुआ। हनुमान जी ने जान-बूझकर बन्धन स्वीकारा ताकि रावण से आमने-सामने बात हो सके, यह पराजय नहीं, सोची-समझी रणनीति थी।
सार: रावण के ज्येष्ठ पुत्र इन्द्रजित् ने युद्ध में हनुमान जी को न जीत पाने पर ब्रह्मास्त्र से बाँध लिया। समर्थ होते हुए भी हनुमान जी ने रावण से भेंट की इच्छा से बन्धन स्वीकार किया और रावण-सभा में लाए गए।
रावण के वैभव पर हनुमान जी का विस्मय
इन्द्रजित् के कर्म से विस्मित और सीता-हरण के पाप पर क्रोध से ताम्र-नेत्र हुए भीम-पराक्रमी हनुमान जी ने रावण को देखा। वह मोतियों की लड़ियों से घिरे, हीरे और बहुमूल्य मणियों से जड़े स्वर्ण-मुकुट से सुशोभित था; बहुमूल्य रेशमी वस्त्र पहने, लाल चन्दन से चर्चित और विचित्र चित्रकारी से सजा था। उसके बीस भयंकर पर किंचित् लाल नेत्र, चमकीले तीखे विशाल दाँत और लटकते अधर थे; अपने दस सिरों से वह नाना सर्पों से भरे शिखरों वाले मन्दराचल-सा दीप्त था। वक्ष पर मुक्ता-हार धारण किए, नील-अंजन-राशि-सा वह पूर्ण-चन्द्र-मुख से बालसूर्य से प्रकाशित मेघ-सा दिखता था। उसकी बीस भुजाएँ केयूर और अंगद से सजी, उत्तम चन्दन से चर्चित, मानो पाँच-फण वाले सर्प हों। वह रत्न-जटित विचित्र स्फटिक के श्रेष्ठ सिंहासन पर, उत्तम बिछौने पर, सुसज्जित युवतियों से चँवर डुलाई जाती हुई बैठा था। उसके पास मन्त्र-तत्त्व जानने वाले चार मन्त्री (दुर्धर, प्रहस्त, महापार्श्व और निकुम्भ) बैठे थे; वह चारों समुद्रों से घिरे भूमण्डल-सा और देवों से घिरे इन्द्र-सा सुशोभित था।

उन भयंकर राक्षसों से पीड़ित होते हुए भी परम विस्मय में पड़कर हनुमान जी रावण को निहारते रहे और मन में सोचने लगे: “अहो रूप, अहो धैर्य, अहो सत्त्व, अहो द्युति! राक्षसराज में सब शुभ लक्षण विद्यमान हैं। यदि यह अधर्म की ओर झुका न होता, तो इन्द्र सहित देवलोक का भी रक्षक बन सकता था। पर अपने क्रूर और निर्दय कर्मों के कारण, जो लोक-निन्दित हैं, देव-दानव सहित सब प्राणी इससे डरते हैं। क्रुद्ध होने पर यह सारे जगत् को एक समुद्र बना सकता है।” अमित-तेजस्वी राक्षसराज का प्रभाव देखकर बुद्धिमान् हनुमान जी ऐसे अनेक विचारों में पड़ गए।
सार: रावण के देदीप्यमान वैभव और दस-सिर-बीस-भुजा वाले रूप को देखकर हनुमान जी विस्मित हुए, और मन में अनुभव किया कि अधर्म के सिवा रावण में सब श्रेष्ठ गुण थे; उसी अधर्म ने उसे पतन की ओर खींचा।
रावण-सभा में प्रहस्त का प्रश्न और हनुमान जी का उत्तर
अपने सामने खड़े पिंगाक्ष (भूरी आँखों वाले) हनुमान जी को देखकर महाबाहु, लोक को रुलाने वाला रावण महाक्रोध से भर उठा। शंका से व्याकुल होकर उसने सोचा: “कहीं यह साक्षात् भगवान् नन्दी तो नहीं, जिसने कैलास पर मेरे उपहास करने पर मुझे शाप दिया था? अथवा वानर-रूप में बलि-पुत्र बाणासुर तो नहीं?” रोष से ताम्र-नेत्र रावण ने अपने श्रेष्ठ मन्त्री प्रहस्त से उपयुक्त, सार्थक वचन कहा कि इस दुरात्मा से पूछा जाए: यह कहाँ से आया, इसका क्या प्रयोजन है, इसने वन क्यों उजाड़ा और राक्षसों को क्यों मारा, मेरी अजेय नगरी में किसलिए घुसा।
रावण की आज्ञा सुन प्रहस्त ने हनुमान जी से कहा: “आप भयभीत न हों, आपका कल्याण हो। यदि आपको इन्द्र ने रावण के यहाँ भेजा है, तो सच बताइए, छूट जाएँगे। यदि आप कुबेर, यम या वरुण के दूत हैं, अथवा विजय-कामी विष्णु के भेजे हुए, तो सत्य कहिए। आपका तेज वानर-सा नहीं, केवल रूप ही वानर का है। सच कहने पर मुक्त हो जाएँगे, झूठ बोलने पर जीवन कठिन है।” यह सुनकर हनुमान जी ने राक्षसराज से कहा: “मैं न इन्द्र का दूत हूँ, न यम का, न वरुण का; न कुबेर से मेरी मित्रता है, न विष्णु ने मुझे भेजा है। मैं जाति से ही वानर हूँ और राक्षसराज के दर्शन के लिए ही यहाँ आया हूँ। दर्शन दुर्लभ था, इसलिए दर्शन-हेतु ही वन उजाड़ा। तब युद्ध-कामी बली राक्षस आ पड़े, और देह-रक्षा के लिए मुझे रण में उनसे भिड़ना पड़ा। देव-असुर भी मुझे अस्त्र-पाश से नहीं बाँध सकते; पितामह ब्रह्मा का यह वर मुझे प्राप्त है। राजा को देखने की इच्छा से ही मैंने अस्त्र का आदर किया। अस्त्र से मुक्त होने पर भी राक्षसों ने मुझे बँधा हुआ बताकर आपके पास पहुँचाया। मैं किसी राम-कार्य से आपके पास आया हूँ; मुझे राघव का दूत जानकर मेरा हितकर वचन सुनिए, प्रभो।”
सार: रावण ने प्रहस्त के मुख से हनुमान जी से उनका परिचय और प्रयोजन पुछवाया। हनुमान जी ने स्पष्ट कहा कि वे वानर-जाति के हैं, राम के दूत हैं, और रावण-दर्शन के लिए ही उन्होंने वन उजाड़ा तथा आत्मरक्षा में युद्ध किया।
राम-कथा और रावण को हनुमान जी का हितोपदेश
रावण को देखकर सत्त्ववान् हनुमान जी ने निर्भय होकर अर्थपूर्ण वचन कहा: “मैं सुग्रीव के सन्देश से आपके पास आया हूँ; राक्षसेश! आपके भाई-तुल्य वानरराज सुग्रीव ने आपका कुशल पूछा है और धर्म-अर्थ से युक्त, इहलोक-परलोक में हितकर सलाह भेजी है। सुनिए: दशरथ नामक एक राजा थे, जो रथ-गज-अश्व के स्वामी, प्रजा के पिता-तुल्य बन्धु और इन्द्र-से तेजस्वी थे। उनके प्रिय ज्येष्ठ पुत्र राम पिता की आज्ञा से पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण सहित दण्डक-वन में आए। जनस्थान में उनकी पत्नी सीता, विदेहराज महात्मा जनक की पुत्री, खो गई। सीता को खोजते राजकुमार राम लक्ष्मण सहित ऋष्यमूक पर्वत पहुँचे और सुग्रीव से मिले। राम ने सुग्रीव का खोया वानर-राज्य लौटाने का, और सुग्रीव ने सीता को खोजने का वचन दिया। राम ने रण में वालि को एक ही बाण से मारकर सुग्रीव को वानर-भालुओं का अधिपति बना दिया, वालि को तो आप पहले से जानते ही हैं।
“सीता को खोजने में व्यग्र सत्यप्रतिज्ञ सुग्रीव ने सब दिशाओं में लाखों-सहस्रों वानर भेजे, जो गरुड़ और वायु-से वेगवान् हैं। मैं वायुपुत्र हनुमान हूँ; सीता के लिए सौ योजन चौड़ा समुद्र लाँघकर आपको देखने की इच्छा से आया, और खोजते हुए मैंने आपके उद्यान में जनकनन्दिनी को देखा। अतः धर्म-अर्थ का तत्त्व जानने वाले, तप से ऐश्वर्य अर्जित करने वाले हे महाप्राज्ञ! आपको परायी स्त्री को रोककर नहीं रखना चाहिए। बुद्धिमान् लोग धर्म-विरुद्ध, मूल का नाश करने वाले कर्मों में नहीं फँसते। राम के क्रोध से प्रेरित लक्ष्मण के बाणों के सामने देव-असुर भी नहीं टिक सकते। तीनों लोकों में ऐसा कोई नहीं जो राघव का अपराध करके सुखी रह सके।
“अतः तीनों कालों में हितकर, धर्म और अर्थ के अनुकूल मेरी बात मानिए: जानकी को राम को लौटा दीजिए। जिस सीता को आप पहचान नहीं रहे, वह पाँच-फण वाली नागिन-सी है, जो सम्पूर्ण लंका का विनाश कर देगी। विष-मिश्रित अन्न-सी यह देवी देव-असुरों से भी नहीं पचाई जा सकती। तप से अर्जित यह धर्म-सम्पत्ति और दीर्घ जीवन नष्ट करना उचित नहीं। राम न देव हैं, न यक्ष, न राक्षस, वे मनुष्य हैं; सुग्रीव वानरराज हैं। हे राजन्, इनसे आप प्राण-रक्षा कैसे करेंगे? जो अधर्म की पराकाष्ठा को पहुँच गया हो, उसे धर्म का फल नहीं मिलता; आपके पूर्व-पुण्य का फल भोग चुका, अब इस सीता-हरण के अधर्म का फल शीघ्र मिलेगा। जनस्थान-वध, वालि-वध और राम-सुग्रीव की मैत्री को स्मरण कर अपना हित सोचिए।

“मैं अकेला ही अश्व-रथ-गज सहित लंका का नाश कर सकता हूँ, पर यह राम का निश्चय नहीं है। राम ने वानर-भालुओं के बीच प्रतिज्ञा की है कि सीता का अपहरण करने वाले शत्रुओं का नाश करेंगे। राम का अपराध करने पर साक्षात् इन्द्र भी सुखी नहीं रह सकता, फिर आप-जैसा साधारण जन क्या? देव, असुर, गन्धर्व, विद्याधर, नाग, यक्ष, सब लोकों के नायक राम के सामने युद्ध में टिक नहीं सकते। ब्रह्मा, त्रिपुरारि रुद्र और इन्द्र भी राघव के सामने रण में नहीं ठहर सकते।” यह स्पष्ट पर अप्रिय उत्तर सुनकर रोष से घूमती आँखों वाले रावण ने उस महान् वानर के वध की आज्ञा दे दी।
समझने की कुंजी (सौ योजन और कालरात्रि): “सौ योजन” लगभग आठ सौ मील का विस्तार है, जिसे हनुमान जी ने एक छलाँग में लाँघा। हनुमान जी सीता को “कालरात्रि” (प्रलय की अधिष्ठात्री देवी) और “पाँच-फण वाली नागिन” कहकर रावण को चेताते हैं कि वही लंका के विनाश का निमित्त बनेगी।
सार: हनुमान जी ने राम के वन-गमन से सीता-हरण और सुग्रीव-मैत्री तक की कथा सुनाई, राम की अजेयता बताई, और रावण को सीता लौटाने का धर्मयुक्त उपदेश दिया। रावण ने क्रुद्ध होकर उनके वध का आदेश दे दिया।
विभीषण का हस्तक्षेप: दूत-वध का निषेध

हनुमान जी के वचन सुनकर क्रोध से मूर्च्छित रावण ने उनके वध की आज्ञा दे दी, पर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ विभीषण ने इस दूत-वध का अनुमोदन नहीं किया। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा: “राक्षसराज, क्षमा कीजिए, क्रोध त्यागिए और मेरी बात सुनिए। नीति के ज्ञाता सज्जन राजा दूत का वध नहीं करते। हे वीर, इस वानर को मार डालना धर्म-विरुद्ध, लोक-निन्दित और आपके योग्य नहीं। आप धर्मज्ञ हैं, कृतज्ञ हैं, राजधर्म में निपुण हैं, और प्राणियों के परमार्थ को जानते हैं। यदि आप-जैसे विचक्षण भी क्रोध के वश हों, तो शास्त्र-ज्ञान केवल श्रम-मात्र रह जाएगा। उचित-अनुचित का निश्चय करके ही दूत को दण्ड दिया जाए।”
विभीषण के वचन सुनकर रावण ने उत्तर दिया: “पापियों के वध में पाप नहीं; अतः इस पापी वानर को मार डालूँगा।” तब अधर्म-मूलक, बहुदोषयुक्त उस वचन को सुनकर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ विभीषण ने परमार्थ-तत्त्व से युक्त वचन कहा: “लंकेश्वर, प्रसन्न हों, धर्म-अर्थ का सार सुनिए। सन्त कहते हैं कि दूत किसी काल और किसी स्थान पर वध-योग्य नहीं। यह शत्रु प्रबल है और इसने अपार अनिष्ट किया है, फिर भी ज्ञानी दूत-वध की अनुमति नहीं देते; दूत के लिए शास्त्र में अनेक अन्य दण्ड बताए गए हैं: अंग-विकृति, कोड़े मारना, सिर मुँड़वाना, या शरीर पर चिह्न लगाना; पर दूत-वध तो हमने कहीं नहीं सुना।
“आप-जैसा धर्म-अर्थ में निपुण, उचित-अनुचित का निश्चय करने वाला क्रोध के वश कैसे रहे? सत्त्ववान् लोग क्रोध को प्राप्त नहीं होते। धर्म-चर्चा, लोक-व्यवहार और शास्त्र-ग्रहण में आपके समान कोई नहीं; आप सब देव-असुरों में श्रेष्ठ हैं। अतः हे परपुरंजय! इसके वध का प्रयत्न न कीजिए। यह वानर भला हो या बुरा, शत्रुओं का भेजा हुआ है; पराधीन होकर दूसरों का प्रयोजन कहने वाला दूत वध-योग्य नहीं। इसके मारे जाने पर महासमुद्र के उस पार से कौन दूसरा खेचर आएगा? इसके बजाय आप इन्द्र सहित देवों पर अपना प्रयत्न लगाइए। इसके मरने पर उन दोनों उद्धत राजकुमारों को युद्ध के लिए उकसाने वाला अन्य कोई न रहेगा। अतः शत्रुओं को अपना प्रभाव दिखाने के लिए, सेना के एक भाग सहित कुछ वीर भेजिए जो सीता-वियोग से व्याकुल उन दोनों राजकुमारों को पकड़ लाएँ।” अनुज विभीषण के इस उत्तम, इष्ट वचन को महाबली रावण ने बुद्धि से ग्रहण कर लिया।
सार: रावण द्वारा दूत-वध की आज्ञा का विभीषण ने विरोध किया, शास्त्र के अनुसार दूत के अन्य दण्ड (अंग-विकृति आदि) बताए, और समझाया कि दूत-वध अनुचित है। रावण ने यह बात स्वीकार कर ली।
पूँछ में अग्नि और सीता की प्रार्थना

भाई के देश-काल-हितकर वचन सुनकर रावण ने कहा: “आपने ठीक कहा कि दूत-वध निन्दित है। तो भी इसे अवश्य कोई दण्ड मिलना चाहिए। वानरों को अपनी पूँछ अत्यन्त प्रिय भूषण-सी होती है; अतः इसकी पूँछ शीघ्र जला दी जाए और यह पूँछ जली हुई लौटे, ताकि इसके मित्र, बन्धु और स्वजन इसे विकृत और दीन देखें।” राक्षसराज ने आज्ञा दी कि जलती पूँछ सहित इसे चौराहों वाली सारी नगरी में घुमाया जाए। क्रोध से कठोर राक्षस पुरानी सूती चिथड़ों से हनुमान जी की पूँछ लपेटने लगे; पूँछ लपेटे जाने पर महाकपि सूखे ईंधन पाकर वन की अग्नि-सा बढ़ने लगे। राक्षसों ने तेल छिड़ककर पूँछ में आग लगा दी, और बालसूर्य-से मुख वाले हनुमान जी रोष-अमर्ष से भरकर उसी जलती पूँछ से राक्षसों को मारने लगे। तब क्रूर राक्षसों ने उन्हें और कसकर बाँध दिया।
स्त्री, बालक और वृद्ध सहित सब निशाचर प्रसन्न हो उठे। बँधे हुए वीर हनुमान जी ने उस अवसर के अनुकूल विचार किया: “यद्यपि मैं बँधा हूँ, पर राक्षस मुझ पर भारी नहीं पड़ सकते; पाश तोड़कर उछलूँ तो इन्हें फिर मार डालूँ। पर स्वामी के हित के लिए विचरते हुए दुरात्माओं ने मुझे बाँधा है, और मैंने उनसे कोई बदला नहीं लिया। मैं युद्ध में अकेला सब राक्षसों के लिए पर्याप्त हूँ, फिर भी राम की प्रीति के लिए यह सब सह लूँगा। इससे लंका का फिर से निरीक्षण भी हो जाएगा, क्योंकि रात में दुर्ग-रचना भली-भाँति न देख सका था। रात बीतने से पहले लंका को अवश्य देख लूँगा; भले ही ये मुझे फिर बाँधें और पूँछ जलाकर पीड़ा दें, मेरे मन को कोई थकान नहीं।” तब हर्षित राक्षस शंख-भेरी के घोष से उन्हें “यह गुप्तचर है” घोषित करते हुए नगरी में घुमाने लगे। हनुमान जी ने नगरी के अद्भुत सात-मंजिले भवन, सुविभक्त चौक, घरों से भरी गलियाँ, चौराहे और राजमार्ग देख लिए। पूँछ जलते देखने को स्त्री-बालक-वृद्ध कौतूहल से उमड़ पड़े।

जब हनुमान जी की पूँछ का अग्रभाग जल रहा था, तब विकराल नेत्रों वाली राक्षसियों ने सीता जी को यह अप्रिय समाचार सुनाया: “हे सीते, जिस ताम्र-मुख वाले वानर से आपकी बात हुई थी, वह जलती पूँछ सहित गलियों में घुमाया जा रहा है।” अपने ही हरण-सी इस क्रूर बात को सुनकर शोक-संतप्त वैदेही ने मन-ही-मन अग्निदेव की उपासना की और उस महाकपि के कल्याण की कामना की। विशाल-नयना देवी ने पवित्र होकर हव्यवाहन से प्रार्थना की: “यदि मैंने पति की सेवा की हो, यदि तप किया हो, यदि मेरा एकपतिव्रत सच्चा हो, तो हे अग्निदेव, हनुमान के लिए शीतल हो जाइए। यदि उस बुद्धिमान् राम के मन में मेरे प्रति कुछ करुणा हो, यदि मेरा कुछ भाग्य-शेष हो, तो हनुमान के लिए शीतल हो जाइए। यदि धर्मात्मा राम मुझे शीलवती और मिलन की लालसा से युक्त जानते हों, तो हनुमान के लिए शीतल हो जाइए। यदि सत्यप्रतिज्ञ आर्य सुग्रीव मुझे इस दुःख-सागर से पार करा सकें, तो हनुमान के लिए शीतल हो जाइए।”
तब तीखी लपटों वाली अग्नि की शिखाएँ दक्षिण की ओर (शुभ-सूचक रूप में) उठने लगीं, मानो मृगशावक-नयना सीता को महाकपि का कल्याण सुना रही हों। पूँछ में अग्नि-संयोग होने पर भी हनुमान जी के पिता वायु हिम-से शीतल बहने लगे, जिससे देवी को सन्तोष हुआ। पूँछ जलते देख हनुमान जी ने सोचा: “यह प्रदीप्त अग्नि मुझे चारों ओर से क्यों नहीं जलाती? महाज्वाला दिखती है, पर पूँछ के अग्रभाग पर रखे हिम-राशि-सी पीड़ा नहीं देती। अवश्य यह राम के उसी प्रभाव से है, जिससे लाँघते समय समुद्र में मैनाक-पर्वत-सा आश्चर्य देखा था। सीता की दया, राघव के तेज और मेरे पिता की अग्नि से मित्रता के कारण अग्नि मुझे नहीं जलाती।”
फिर महाकपि ने क्षण-भर सोचा: “मुझ-जैसे का इन नीच राक्षसों के हाथों बँधना कैसा? जब तक मुझमें पराक्रम है, इसका प्रतिकार उचित है।” यह सोचकर वेगवान् हनुमान जी पाश तोड़कर गर्जते हुए आकाश में उछले और पर्वत-शिखर-से ऊँचे, राक्षस-रहित नगर-द्वार पर जा पहुँचे। क्षण-भर में अति-छोटा रूप धारण कर उन्होंने बन्धन झटक दिए, और फिर पर्वत-से विशाल रूप पा लिया। चारों ओर देखते हुए उन्होंने द्वार पर पड़ी एक लोहे की परिघ देखी; उसे उठाकर महाबाहु वायुपुत्र ने द्वार के सब रक्षकों को फिर से मार डाला। उन्हें मारकर, जलती पूँछ की ज्वाला-माला से घिरे हनुमान जी किरण-मण्डल वाले सूर्य-से प्रकाशित होकर पुनः लंका को निहारने लगे।
एक उप-कथा: हनुमान जी का अग्नि से न जलना कोई संयोग नहीं था। एक ओर सीता का सतीत्व-बल और राम का तेज था, दूसरी ओर हनुमान जी के पिता वायु की अग्नि से प्राचीन मित्रता, और साथ ही वही “राम-प्रभाव” जिससे समुद्र-यात्रा में मैनाक-पर्वत स्वयं उठ आया था। तीनों कारण मिलकर अग्नि को शीतल कर गए।
सार: रावण ने वध के बदले हनुमान जी की जलती पूँछ सहित नगर-भ्रमण का दण्ड दिया, जिसे हनुमान जी ने लंका देखने के अवसर के रूप में स्वीकारा। सीता की प्रार्थना, राम के तेज और वायु से अग्नि की मित्रता से आग शीतल हो गई; तब हनुमान जी ने पाश तोड़कर द्वार-रक्षकों को मार डाला।
लंका-दहन
लंका को निहारते हुए, मनोरथ-सिद्ध और उत्साह से भरे हनुमान जी ने शेष कार्य पर विचार किया: “अब इन राक्षसों को और संताप देने वाला कौन-सा कार्य बचा है? वन तो उजाड़ दिया, श्रेष्ठ राक्षस मारे गए, सेना का एक भाग नष्ट हुआ; अब केवल दुर्ग-विनाश शेष है। दुर्ग के नष्ट होने पर मेरा समुद्र-लंघन और वन-विध्वंस का परिश्रम सुखद फल देगा, और थोड़े प्रयत्न से सीता-खोज का श्रम सफल होगा। जो यह अग्नि मेरी पूँछ पर जल रही है, उसे इन उत्तम भवनों से तृप्त करना न्यायसंगत है।”

तब जलती पूँछ वाले हनुमान जी विद्युत-युक्त मेघ-से लंका के भवन-शिखरों पर विचरने लगे। निर्भय होकर वे एक भवन से दूसरे भवन, उद्यानों और प्रासादों को देखते हुए घूमे। महावेग से प्रहस्त के भवन पर कूदकर उन्होंने वहाँ आग लगाई, फिर महापार्श्व, वज्रदंष्ट्र, शुक, सारण, इन्द्रजित्, जम्बुमाली, सुमाली, रश्मिकेतु, सूर्यशत्रु, ह्रस्वकर्ण, दंष्ट्र, रोमश, युद्धोन्मत्त, मत्त, ध्वजग्रीव, विद्युज्जिह्व, घोर, हस्तिमुख, कराल, विशाल, शोणिताक्ष, कुम्भकर्ण, मकराक्ष, नरान्तक, कुम्भ, दुरात्मा निकुम्भ, यज्ञशत्रु और ब्रह्मशत्रु, इन सबके भवनों में क्रमशः आग लगाते गए, केवल विभीषण के भवन को छोड़ दिया। बहुमूल्य भवनों में घुसकर महायशस्वी हनुमान जी ने धनवानों की सम्पदा जला डाली, और अन्त में सबके भवन लाँघकर रावण के प्रासाद तक जा पहुँचे।

नाना रत्नों से सजे, मेरु-मन्दर-से ऊँचे, अनेक मंगल-द्रव्यों से शोभित रावण के मुख्य भवन में जलती पूँछ की अग्नि छोड़कर वीर हनुमान जी प्रलयकाल के मेघ-से गरजे। वायु के संयोग से अति-वेगवान् महाबली अग्नि कालाग्नि-सी भभक उठी और बढ़ने लगी। पवन ने उन भवनों में जलती अग्नि फैला दी; सोने के जाल और मोती-मणियों से जड़े विशाल भवन चटककर, मंजिलें टूट-टूटकर, पुण्य-क्षय पर स्वर्ग से गिरते सिद्धों के विमानों-से धरती पर गिरने लगे। राक्षस अपने-अपने घर बचाने को दौड़ते हुए चीत्कार करने लगे: “हाय! यह तो वानर-रूप में स्वयं अग्निदेव आ गया है!” आग में घिरीं स्त्रियाँ बच्चों सहित गिर पड़ीं; जलती लपटों में लिपटी, बिखरे केशों वाली कुछ स्त्रियाँ आकाश से गिरती बिजली-सी दिखीं। भवनों से हीरा, मूँगा, वैदूर्य, मोती और चाँदी मिले विचित्र पिघले धातु बहने लगे। जैसे अग्नि काठ और तृण से तृप्त नहीं होती, वैसे ही हनुमान जी राक्षसेन्द्रों के वध से तृप्त न हुए, और न ही पृथ्वी मारे गए राक्षसों को ग्रहण करते-करते थकी।
वेगवान् महात्मा हनुमान जी द्वारा लंकापुरी ऐसे जला दी गई जैसे रुद्र ने त्रिपुर को जलाया था। त्रिकूट-शिखर पर उठी वह भीम-पराक्रमी अग्नि ज्वाला-मण्डल फैलाती हुई आकाश छू गई; राक्षसों की देह रूपी घृत से सींची गई वह धूम-रहित अग्नि कोटि सूर्यों-सी प्रकाशित हुई, मानो प्रलय की अग्नि ब्रह्माण्ड को फोड़ रही हो। एकत्र हुए राक्षस-गण कहने लगे: “क्या यह वज्रधारी इन्द्र है, या यम, वरुण, वायु, रुद्र की तृतीय-नेत्र-अग्नि, सूर्य, कुबेर या चन्द्र? यह वानर नहीं, स्वयं काल है। अथवा वानर-रूप में आया लोक-स्रष्टा चतुर्मुख ब्रह्मा का प्रकोप, या राक्षस-संहार के लिए माया से वानर-रूप धरे अचिन्त्य-अव्यक्त विष्णु का परम तेज?” प्राणियों, घरों और वृक्षों सहित अकस्मात् जलती नगरी को देखकर लंका की अधिष्ठात्री देवी दीन होकर तुमुल स्वर में रो उठी; राक्षस “हाय पिता, हाय पुत्र, हाय प्रियतम, हाय मित्र, हाय जीवन-स्वामी, हमारा पुण्य चुक गया” कहकर घोर विलाप करने लगे।
ज्वालाओं से घिरी, प्रमुख वीरों के मारे जाने और योद्धाओं के तितर-बितर होने से शापग्रस्त-सी लंका को महामना हनुमान जी ने स्वयम्भू रुद्र के रोष से नष्ट हुई धरती-सी देखा। अशोक-वन उजाड़कर, रण में बड़े-बड़े राक्षसों को मारकर, और गृह-रत्नों से सजी नगरी जलाकर वायुपुत्र हनुमान जी विश्राम-मुद्रा में खड़े हो गए। फिर अनेक राक्षसों का संहार कर, वन तोड़कर और राक्षस-भवनों में अग्नि लगाकर महात्मा हनुमान जी ने मन से राम का स्मरण किया। तब सब देवगण, मुनिगण, गन्धर्व, विद्याधर और नाग, सब महान् प्राणी, महाबली, वायु-तुल्य वेगवान् हनुमान जी की भूरि-भूरि प्रशंसा कर परम और अतुलनीय प्रसन्नता को प्राप्त हुए। भवन-शिखर के विचित्र अग्रभाग पर बैठे, जलती पूँछ की ज्वाला-माला से घिरे वानरराज-सिंह हनुमान जी किरण-मण्डल वाले सूर्य-से शोभित हुए। सम्पूर्ण लंका को महान् पीड़ा देकर अन्त में हनुमान जी ने पूँछ की अग्नि समुद्र में बुझा ली। जली हुई लंका देखकर गन्धर्व, सिद्ध और परम ऋषियों सहित देव परम विस्मय को प्राप्त हुए; और उस महाकपि हनुमान जी को कालाग्नि समझकर सब प्राणी भयभीत हुए।
समझने की कुंजी (विभीषण-भवन की रक्षा): लंका के समस्त राक्षस-नायकों के भवन जलाते हुए हनुमान जी ने एकमात्र विभीषण का भवन छोड़ दिया, उसी विभीषण का, जिसने सभा में उनके प्राण बचाए थे। यह कृतज्ञता का सूक्ष्म संकेत है, जो आगे विभीषण के राम-शरण आने की भूमि भी तैयार करता है।
सार: शेष कार्य के रूप में हनुमान जी ने प्रहस्त से लेकर रावण तक सब राक्षस-नायकों के भवन जलाए, केवल विभीषण का भवन बचाया, और पूरी लंका को त्रिपुर-दहन-सा भस्म कर दिया। फिर पूँछ की आग समुद्र में बुझाकर वे राम का स्मरण करने लगे, और देवगण उनकी स्तुति कर हर्षित हुए।
जलती लंका देखकर हनुमान का आत्म-धिक्कार
सारी लंका को धू-धू जलते देखकर, और राक्षसों की भीड़ को राक्षसियों, बच्चों और बूढ़ों समेत त्रस्त (भयभीत) होकर भागते देखकर, वानर हनुमान सहसा सोच में पड़ गए। उनके मन में एक गहरी आशंका उठी और अपने ही प्रति घृणा (आत्म-निंदा) जाग उठी। हम आपको बताएँ कि वे मन-ही-मन क्या कहने लगे। उन्होंने सोचा: हाय, लंका को इस प्रकार पूरी तरह जला डालकर हमने यह कैसा निन्दनीय कर्म कर डाला!
हनुमान स्वयं को कोसने लगे: क्रोधी मनुष्य कौन-सा पाप नहीं कर बैठता? जो क्रोध में होता है वह अपने गुरुजनों तक की हत्या कर डालता है, और कठोर वाणी से साधु-पुरुषों का भी अपमान कर देता है। क्रोध में भरा हुआ मनुष्य कहने योग्य और न कहने योग्य का विवेक खो बैठता है; क्रोधी के लिए न कोई अकार्य है, न कोई अवाच्य (न बोलने योग्य) वचन। धन्य हैं वे महात्मा जो उठते हुए क्रोध को बुद्धि से वैसे ही रोक लेते हैं जैसे जल से धधकती आग को बुझा देते हैं। वही पुरुष सच्चा पुरुष कहलाता है जो क्षमा के बल पर हृदय में उठे क्रोध को वैसे ही त्याग देता है जैसे साँप अपनी जीर्ण केंचुली को।
उन्होंने आगे कहा: धिक्कार है हमें, दुर्बुद्धि, निर्लज्ज और परम पापी को, जिसने उन सीता का बिना विचार किए ही आग लगा दी और इस प्रकार अपने स्वामी श्रीराम का अनिष्ट कर बैठे। यदि सारी नगरी जल गई है, तो निश्चय ही आर्या जानकी भी जल गई होंगी; इस प्रकार हमने अनजाने में अपने स्वामी का कार्य ही चौपट कर दिया। जिस सीता-उद्धार के लिए यह समुद्र-लंघन और लंका-दहन का उद्यम किया गया था, वही मूल कार्य रोष के दोष से नष्ट हो गया, क्योंकि लंका जलाते समय हमने सीता की रक्षा नहीं की। लंका जलाने का यह कर्म तो तुच्छ था, इसमें संदेह नहीं; पर क्रोध से अभिभूत होकर हमने उसी की जड़ काट डाली।
हनुमान का शोक और गहरा गया: यदि बुद्धि के विपर्यय (उलटी सोच) से हमारे द्वारा यह सीता-प्राप्ति का कार्य बिगड़ गया है, तो आज यहीं प्राण त्याग देना ही हमें भला लगता है। क्या हम आज आग में कूद पड़ें, या वडवामुख (समुद्र की अग्नि) में, या अपना शरीर सागरवासी जीवों को दे दें? जानकी यदि नष्ट हो गईं, तो वे दोनों पुरुषश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण भी नष्ट हो जाएँगे; उनके न रहने पर सुग्रीव भी अपने बन्धु-बान्धवों समेत प्राण त्याग देंगे। भ्रातृवत्सल और धर्मात्मा भरत भी अनुज शत्रुघ्न के साथ कैसे जीवित रहेंगे? धर्मनिष्ठ इक्ष्वाकु-वंश के नाश हो जाने पर समस्त प्रजा शोक-संताप से पीड़ित होगी।
समझने की कुंजी (अवधारणा): वाल्मीकि यहाँ हनुमान को क्रोध (राजस-भाव) पर एक पूरा आत्म-चिन्तन देते हैं। पराक्रम के क्षण के तुरन्त बाद का यह पश्चात्ताप नायक को यांत्रिक वीर नहीं, विवेकशील दूत बनाता है। यह बाद की भक्ति-परम्परा का सर्वज्ञ हनुमान नहीं; यह आशंका और संशय से जूझता हुआ चरित्र है।
तभी, इस प्रकार चिन्ता करते हनुमान को शुभ शकुन दिखाई पड़े, जिनके सुफल वे पहले प्रत्यक्ष अनुभव कर चुके थे; और वे फिर से सोचने लगे। उन्होंने तर्क किया: अथवा सुन्दर अंगों वाली वह कल्याणी अपने ही तेज से रक्षित होंगी; वे नष्ट न होंगी, क्योंकि आग आग को नहीं जलाती। उन अमित-तेजस्वी धर्मात्मा श्रीराम की भार्या को, जो अपने ही निर्मल चरित्र से सब ओर सुरक्षित हैं, अग्नि छूने का साहस ही न करेगी। निश्चय ही श्रीराम के प्रभाव और वैदेही के पुण्य से इस सर्व-दाहक अग्नि ने हमें भी नहीं जलाया।
हनुमान ने विस्मित होकर फिर स्मरण किया: जिस अग्नि का स्वभाव ही जलाना है, जो सर्वत्र समर्थ और अव्यय है, वही यदि हमारी पूँछ तक न जला सकी, तो उन आर्या को कैसे जलाएगी? और उन्होंने समुद्र के बीच हिरण्यनाभ (मैनाक) पर्वत के प्रकट होने का विस्मय भी याद किया। उन्होंने कहा: देवी अपने तप, सत्यवचन और पति में अनन्य भक्ति के बल से स्वयं अग्नि को भस्म कर सकती हैं; अग्नि उन्हें नहीं जला सकती।

इस प्रकार देवी के धर्म-परिग्रह (पातिव्रत्य) का चिन्तन करते हुए हनुमान ने वहाँ महात्मा चारणों (आकाशचारी गायकों) की यह वाणी सुनी: अहो, हनुमान ने राक्षसों के घरों में यह तीक्ष्ण और भयानक अग्नि लगाकर एक अद्भुत और दुर्गम कर्म कर डाला! राक्षस, उनकी स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े भागकर व्याकुल हो उठे; जन-कोलाहल से भरी, अट्टालिकाओं, प्राकारों और तोरणों समेत यह लंका मानो आर्तनाद कर उठी, और जल गई; फिर भी जनककुमारी जानकी को आग ने छुआ तक नहीं। यह तो हमारे लिए परम अद्भुत आश्चर्य है।
अमृत-समान यह वाणी सुनकर हनुमान के हृदय में उस क्षण उत्पन्न हर्ष उनके मन को भर गया। तब उस राजकुमारी को अक्षत (सुरक्षित) जानकर, और मन की गति-सी तीव्रता पाकर, उन्होंने प्रत्यक्ष देखने के लिए उन्हें फिर से देखकर श्रीराम के पास लौट जाने का निश्चय किया।
सार: लंका को राख कर देने के बाद हनुमान को यह भय सताता है कि कहीं सीता भी जलकर भस्म न हो गई हों, और तब सारा अभियान व्यर्थ हो जाएगा। शुभ शकुन, अपने तर्क, और चारणों के मुख से सीता के क्षेमकुशल का समाचार सुनकर उनका मन शान्त होता है, और वे लौटने से पहले सीता को फिर एक बार देखने चल पड़ते हैं।
सीता से विदा और समुद्र-लंघन

शिंशपा-वृक्ष के मूल में बैठी जानकी के पास पहुँचकर हनुमान ने उन्हें प्रणाम किया और कहा: सौभाग्य की बात है कि इस समय हम आपको सकुशल देख रहे हैं। तब अपने स्वामी के प्रति स्नेह से भरी सीता ने जाने को तैयार हनुमान को बार-बार देखते हुए यह वचन कहा: हे तात, हे निष्पाप! यदि आप उचित समझें तो एक दिन यहीं ठहर जाइए; किसी भलीभाँति छिपे स्थान में विश्राम करके कल चले जाइएगा। हे वानर, आपकी समीपता से मुझ अल्पभाग्या के इस अपार शोक का कुछ क्षण के लिए ही सही, क्षय तो होगा।
सीता ने अपना संशय खोला: हे हरिश्रेष्ठ, आपके लौट जाने पर फिर से आपके आने में संदेह है, और हे वानरपुंगव, मेरे प्राणों के बने रहने का भी कोई भरोसा नहीं। हे वीर, आपका दिखाई न देना मुझे और सताएगा, जो दुःख से दुःखतर दशा को पहुँची और शोक से कृश हो चुकी हूँ। और हे वीर, यह बड़ा संदेह मेरे सामने खड़ा-सा है कि आपके अति-बलवान सहायक वानर-भालू, या वे दोनों नरश्रेष्ठ-पुत्र, इस दुस्तर सागर को पार कैसे करेंगे। सागर को लाँघने की शक्ति तो केवल तीन प्राणियों में है: वैनतेय गरुड़, पवनदेव, और आप।
सीता ने हनुमान की सामर्थ्य की प्रशंसा की: हे परवीरघ्न, यद्यपि आप अकेले ही मुझे छुड़ाने में समर्थ हैं, तथापि उस सफलता का यश आपका ही होगा, श्रीराम का नहीं। यदि अपनी सेना से लंका को घेरकर, परबल का नाश करने वाले काकुत्स्थ श्रीराम मुझे ले चलें, तो वही उनके योग्य होगा। इसलिए आप ऐसी व्यवस्था कीजिए कि वे आहव-शूर (युद्ध में शूर) महात्मा अपने अनुरूप पराक्रम प्रकट कर सकें।
अर्थ से भरे, विनम्र और हेतुयुक्त इस वचन को सुनकर वीर हनुमान ने यह उत्तर दिया: हे देवी, वानर-भालू सेनाओं के स्वामी, प्लवगों में श्रेष्ठ, सत्त्वसम्पन्न सुग्रीव आपके लिए दृढ़निश्चयी हैं। वे करोड़ों वानरों से घिरे हुए शीघ्र ही, हे वैदेही, यहाँ आ पहुँचेंगे। और वे दोनों नरश्रेष्ठ वीर श्रीराम-लक्ष्मण साथ आकर अपने बाणों से राक्षसों का विध्वंस करेंगे और लंका नगरी का नाश करेंगे। हे वरारोहे, सगण रावण का वध करके रघुनन्दन श्रीराम शीघ्र ही आपको लेकर अपनी नगरी अयोध्या लौटेंगे।
हनुमान ने उन्हें आश्वस्त किया: आप पूरी तरह स्वस्थ-चित्त होइए, आपका कल्याण हो; आप समय की प्रतीक्षा कीजिए। शीघ्र ही आप श्रीराम के हाथों रावण को रण में मारा हुआ देखेंगी। पुत्रों, मन्त्रियों और बान्धवों समेत राक्षसराज के मारे जाने पर आप श्रीराम से वैसे ही मिलेंगी जैसे रोहिणी चन्द्रमा से। श्रेष्ठ वानर-भालू-नायकों से युक्त काकुत्स्थ श्रीराम, जो रण में शत्रुओं को जीतकर आपका शोक हर लेंगे, शीघ्र ही प्रकट होंगे।

इस प्रकार वैदेही को आश्वासन देकर, और जाने का निश्चय करके, मारुतात्मज हनुमान ने उन्हें प्रणाम किया। श्रेष्ठ राक्षसों को मारकर, अपना नाम प्रसिद्ध करके, नगरी को व्याकुल करके, रावण को छलकर, अपना घोर बल दिखाकर, और वैदेही को अभिवादन करके उन्होंने फिर समुद्र के बीच से लौटने का मन बनाया। तब स्वामी-दर्शन के उत्सुक उन कपिश्रेष्ठ ने पर्वतश्रेष्ठ अरिष्ट पर्वत पर आरोहण किया, जो श्याम वनों से ढका, ऊँचे पद्मक वृक्षों से सुशोभित, और शिखरों के बीच लटकते मेघों से मानो उत्तरीय (ऊपरी वस्त्र) ओढ़े हुए था।
वह पर्वत मानो सूर्य की उज्ज्वल किरणों रूपी हाथों से प्रेमपूर्वक जगाया जा रहा था; इधर-उधर बिखरी धातुओं रूपी अनेक नेत्रों से मानो उन्मीलित हो रहा था; बहती जलधाराओं की गम्भीर ध्वनि से मानो वेद-पाठ कर रहा था; भाँति-भाँति के झरनों के स्वर से मानो उच्च स्वर में गा रहा था; ऊँचे देवदारुओं के रूप में मानो भुजाएँ ऊपर उठाए खड़ा था। प्रपातों के घोष से मानो सब ओर चीख रहा था, हिलते श्याम सरकंडों से मानो काँप रहा था, पवन से हिलती पोली बाँसों से मानो बाँसुरी बजा रहा था, और अपने भयानक महाविषधर सर्पों के रूप में मानो रोष से फुफकार रहा था। कुहासे से ढकी गुफाओं में वह मानो ध्यानमग्न था, और उठते मेघ-जैसी अपनी शाखाओं से मानो सब ओर चलने को उद्यत था।
वह दस योजन (लगभग अस्सी मील) चौड़ा और तीस योजन ऊँचा पर्वत ऋषियों, यक्षों, गन्धर्वों, किन्नरों और नागों से सेवित, लता-वृक्षों से दुर्गम, और सिंहों, व्याघ्रों आदि से भरा हुआ था। अत्यन्त हर्ष और श्रीराम-दर्शन की उत्कण्ठा से प्रेरित होकर पवनसुत हनुमान उस पर्वत पर चढ़े। उनके पैरों के दबाव से सुन्दर शिखरों की शिलाएँ शब्द करती हुई चूर-चूर हो गईं। दक्षिण तट से उत्तर तट की ओर लंघने की कामना से वे महाकपि बढ़ने लगे।
हनुमान के दबाव से पीड़ित होकर वह अरिष्ट पर्वत विविध प्राणियों समेत चीख उठा, और हिलते शिखरों तथा गिरते वृक्षों के साथ पृथ्वी में धँसने लगा। उनके ऊरुओं के वेग से फूलों से लदे वृक्ष इन्द्र के वज्र से आहत-से होकर भूमि पर गिर पड़े। गुफाओं के भीतर रहने वाले महाबली सिंहों की भयानक गर्जना आकाश को भेदती-सी सुनाई पड़ी। भय से वस्त्र अस्त-व्यस्त और आभूषण गिरे हुए, विद्याधर-स्त्रियाँ सहसा पर्वत से उड़ चलीं। दीप्त जिह्वा वाले महाविषधर बड़े-बड़े साँप, सिर और गर्दन दबे हुए, कुण्डली मारकर पड़ रहे। किन्नर, नाग, गन्धर्व, यक्ष और विद्याधर उस अत्यन्त-पीड़ित नगश्रेष्ठ को छोड़कर आकाश में जा खड़े हुए, और वृक्षों समेत शिखरों से उग्र वह पर्वत रसातल में धँस गया; इस प्रकार दस योजन विस्तार वाला वह धराधर पृथ्वी के समतल हो गया।
तब उस भयानक खारे समुद्र को, जिसके तट लहरों से टकरा रहे थे, क्रीड़ापूर्वक लाँघने के इच्छुक वानर हनुमान आकाश में उछले।
समझने की कुंजी (स्थान/संख्या): अरिष्ट पर्वत को वाल्मीकि दस योजन (लगभग अस्सी मील) चौड़ा और तीस योजन (लगभग दो सौ चालीस मील) ऊँचा कहते हैं। एक योजन यहाँ लगभग आठ मील के बराबर माना गया है। पर्वत-वर्णन का यह दीर्घ अलंकरण (मानो वह वेद पढ़ रहा हो, गा रहा हो, फुफकार रहा हो) वाल्मीकि की अद्भुत-रस-शैली है: निर्जीव पर्वत मानो सजीव हो उठता है।
सार: सीता हनुमान को रोकने और अपने संशय खोलने का प्रयास करती हैं, पर हनुमान उन्हें सुग्रीव-राम के शीघ्र आने का भरोसा देकर विदा लेते हैं। फिर वे विशाल अरिष्ट पर्वत पर चढ़ते हैं, जिसके दबाव से वह पर्वत ही धरती में धँस जाता है, और वहाँ से वे लौटती छलाँग के लिए समुद्र के ऊपर उछल पड़ते हैं।
आकाश-समुद्र पार करते हनुमान और महेन्द्र पर गर्जना
महान वेग से उछलकर, पंखों वाले पर्वत-से दीखते और कभी न थकने वाले हनुमान उस आकाश-रूपी समुद्र को पार करने लगे, जो एक रमणीय सागर-सा प्रतीत हो रहा था। स्वाति-नक्षत्र मानो उसका हंस था; नाग, यक्ष और गन्धर्व उसके खिले कमल और कुमुद; चन्द्रमा श्वेत कुमुद; सूर्य जलमुर्गी; पुष्य और श्रवण नक्षत्र हंस; मेघ उसकी शैवाल और तट-घास; पुनर्वसु बड़ी मछलियाँ; लोहितांग (मंगल) बड़ा घड़ियाल; ऐरावत बड़ा द्वीप; हवाएँ उसकी लहरें; और चन्द्र-किरणें उसका शीतल जल थीं।
आकाश को मानो निगलते, चन्द्रमा को मानो छीलते, नक्षत्रों और सूर्यमण्डल समेत आकाश को मानो हरते, और मेघों के समूह को मानो खींचते हुए हनुमान बिना थके उस अपार सागर को लाँघते गए। आकाश में श्वेत, अरुण, नील, मंजिष्ठा-रंग, हरित और श्याम वर्ण के विशाल मेघ प्रकट हो रहे थे। मेघ-समूहों में बार-बार घुसते और निकलते हनुमान कभी छिपते कभी दिखते चन्द्रमा-से जान पड़ते थे। श्वेत वस्त्रधारी वे वीर आकाश में मेघ-वृन्दों को चीरते हुए मानो गरुड़-से शोभित हुए।
मेघ-समान गर्जना करते महातेजस्वी हनुमान फिर समुद्र के मध्य पहुँचे, और सुनाभ (मैनाक) पर्वतेन्द्र को छूकर प्रत्यंचा से छूटे बाण-से वेग से बढ़ चले। थोड़ा निकट आकर, मेघ-समान महेन्द्र महागिरि को देखकर वह महाकपि बादल-सा गरजे, और अपनी गर्जना से दसों दिशाएँ भर दीं। मित्रों को देखने के लिए आतुर हनुमान ने महान घोष किया और अपनी पूँछ हिलाई। गरुड़ के मार्ग पर बार-बार गरजते उनके स्वर से सूर्यमण्डल समेत आकाश मानो फटने लगा। समुद्र के उत्तर तट पर पहले से ही खड़े, वायुपुत्र को देखने के उत्सुक वे महाबली शूर वानर हनुमान के ऊरुओं के वेग से उत्पन्न, वायु से प्रेरित विशाल मेघ-जैसे घोष को सुनने लगे।
चिन्ता से दीनमन वे सब वनवासी हनुमान की पर्जन्य-समान गर्जना सुनकर सब ओर से उत्सुक हो उठे और अपने साथी को देखने को आतुर हुए। तब प्रीति से रोमांचित मन वाले हरिश्रेष्ठ जाम्बवान ने सब वानरों को सम्बोधित कर यह वचन कहा: यह हनुमान सब प्रकार से कृतकार्य हुए हैं, इसमें संदेह नहीं; क्योंकि असफल होते तो उनकी ऐसी गर्जना न होती। उस महात्मा की भुजाओं और ऊरुओं के वेग का घोष तथा गर्जना सुनकर हर्षित वानर इधर-उधर उछल पड़े। प्रहर्षित होकर वे हनुमान को देखने को आतुर एक वृक्ष-शिखर से दूसरे, एक चोटी से दूसरी चोटी पर कूदने लगे। वृक्षों की शाखाएँ थामे खड़े होकर उन वानरों ने अपने उज्ज्वल वस्त्र हर्ष से लहराए।
गुफा में बन्द पवन-सी गरजते बलवान मारुतात्मज हनुमान को मेघ-समूह-से आते देखकर वे सब वानर हाथ जोड़कर खड़े हो गए। तब गिरि-समान वेगवान वीर कपि वृक्षों से भरे महेन्द्र-शिखर पर उतरे। हर्ष से भरे वे एक रमणीय पर्वत-झरने के तट पर वैसे उतरे जैसे पंख कटा कोई पर्वत आकाश से गिरे। तब प्रीतिमन वे वानरपुंगव महात्मा हनुमान को घेरकर खड़े हो गए, परम प्रीति से प्रफुल्लित मुख लिए उनके पास आए, और कन्द-मूल-फल की भेंट लेकर उन्होंने हरिश्रेष्ठ का सत्कार किया। कोई हर्ष से गरजे, कोई किलकारी मारी, कोई बैठने को वृक्ष-शाखाएँ ले आए।
उस महाकपि हनुमान ने तब जाम्बवान आदि अपने गुरुजनों-वृद्धों को, और कुमार अंगद को प्रणाम किया। जाम्बवान और अंगद से पूजित तथा अन्य कपियों से सम्मानित होकर पूज्य हनुमान ने संक्षेप में निवेदन किया कि देवी देख ली गईं। फिर वालिपुत्र अंगद का हाथ पकड़कर वे महेन्द्र पर्वत के वन के एक रमणीय भाग में बैठ गए।
पूछे जाने पर हनुमान ने उन वानरश्रेष्ठों को बताया कि जनकात्मजा सीता अशोकवाटिका में हैं; वह निन्दा-रहित युवती अत्यन्त घोर राक्षसियों से पहरा जा रही हैं, वियोग के चिह्न-रूप एक ही वेणी धारण किए हैं, श्रीराम-दर्शन की लालसा में हैं, उपवास से क्षीण, मलिन, जटाधारी और कृश हो गई हैं। सीता के दर्शन की यह अमृत-समान बात सुनकर सब वानर हर्षित हुए: कोई सिंह-से गरजे, कोई बैल-से रँभाए, कोई किलकारी मारी, कोई उत्तर में गरजे; कुछ हाथी-से कपि अपनी मोटी लम्बी पूँछ हर्ष से लहराने लगे; कुछ शिखरों से उछलकर श्रीमान हनुमान का आलिंगन करने लगे।
तब सब हरिवीरों के बीच अंगद ने हनुमान की यह उत्तम स्तुति की: हे हनुमान, सत्त्व और वीर्य में आपके समान कोई वानर नहीं, क्योंकि इस विस्तीर्ण सागर को लाँघकर आप लौट आए। हे वानरोत्तम, आप ही अकेले हमारे जीवन के दाता हैं। आपकी कृपा से ही हम राघव से जा मिलेंगे, और हमारा कार्य सिद्ध हुआ। अहो, अपने स्वामी में आपकी भक्ति! अहो आपका वीर्य! अहो आपकी धृति! सौभाग्य से आपने श्रीराम की यशस्विनी देवी-पत्नी को देखा, और सौभाग्य से काकुत्स्थ श्रीराम सीता-वियोग का शोक त्यागेंगे।
तब हर्षित वानर अंगद, हनुमान और जाम्बवान को घेरकर विशाल शिलाओं पर जा बैठे। समुद्र-लंघन, लंका-दर्शन, सीता और रावण का वृत्तान्त सुनने को उत्सुक वे वानरोत्तम हाथ जोड़े, हनुमान के मुख की ओर मुँह किए बैठ रहे। बहुत-से वानरों से घिरे श्रीमान अंगद वहाँ वैसे शोभित हुए जैसे स्वर्ग में देवताओं से सेवित देवपति इन्द्र। उस ऊँचे महान पर्वत-शिखर पर बैठे यशस्वी हनुमान और बाहुओं पर अंगद धारण किए श्रीमान अंगद हर्ष से दीप्त शोभा से जगमगा उठे।
समझने की कुंजी (अवधारणा): वाल्मीकि का यह आकाश-को-समुद्र बनाने वाला रूपक (आकाश ही सागर, नक्षत्र ही जलचर, मेघ ही शैवाल) एक विस्तृत रूपकमाला है। बाद की परम्परा में हनुमान का समुद्र-लंघन प्रायः केवल भक्ति-चमत्कार-रूप में सुनाया जाता है; पर मूल वाल्मीकि इसे काव्य-वर्णन की शोभा से सजाते हैं, चमत्कार से नहीं।
सार: हनुमान आकाश-समुद्र को पार कर महेन्द्र पर्वत पहुँचते हैं। उनकी गर्जना से जाम्बवान समझ जाते हैं कि कार्य सिद्ध हुआ। प्रतीक्षारत वानर हर्ष से उन्हें घेर लेते हैं, और हनुमान संक्षेप में बताते हैं कि सीता अशोकवाटिका में जीवित हैं। अंगद उनकी प्रशंसा करते हैं।
हनुमान की विस्तृत आत्मकथा: मैनाक, सुरसा और सिंहिका
महेन्द्र-शिखर पर एकत्र हनुमान-प्रमुख महाबली वानर परम प्रीति को प्राप्त हुए। प्रीतिपूर्वक भलीभाँति बैठे हुए महात्मा वानरों के बीच हर्षित जाम्बवान ने प्रीतियुक्त उस महाकपि हनुमान से कार्य का वृत्तान्त पूछा: देवी आपके द्वारा कैसे देखी गईं और वहाँ उनकी क्या दशा है? क्रूरकर्मा दशानन रावण उनके प्रति कैसा व्यवहार करता है? हे महाकपि, यह सब हमें ठीक-ठीक विस्तार से बताइए। देवी कैसे खोजी गईं और उन्होंने क्या उत्तर दिया? सत्य जानकर हम आगे के कार्य का निश्चय करेंगे। हे आत्मवान, वहाँ श्रीराम के पास जाकर हमें क्या कहना चाहिए और क्या छिपाना चाहिए, यह आप हमें समझा दीजिए।
जाम्बवान से प्रेरित होकर, देवी सीता को सिर झुकाकर नमस्कार करते हुए, रोमांचित हनुमान ने उत्तर दिया: आप सबके सामने ही महेन्द्र-शिखर से एकाग्र चित्त होकर समुद्र के दक्षिण तट को पाने की कामना से मैंने आकाश में छलाँग लगाई। मार्ग में जाते हुए मुझे एक घोर विघ्न-सा दीखा: एक दिव्य, अत्यन्त मनोहर सोने का शिखर मेरे मार्ग को रोके खड़ा था। मैंने मन में निश्चय किया कि इसे तोड़ देना होगा। मेरी पूँछ के प्रहार से उस महागिरि का सूर्य-समान शिखर हजार टुकड़ों में बिखर गया। मेरा यह कर्म जानकर उस महागिरि ने मधुर वाणी में, मन को मानो आह्लादित करते हुए कहा: हे पुत्र, मुझे पवनदेव का मित्र और इस प्रकार अपना चाचा जानो; मैं समुद्र में रहने वाला, मैनाक नाम से प्रसिद्ध हूँ।
एक उप-कथा: मैनाक ने अपनी कथा सुनाई: हे पुत्र, प्राचीन काल में पर्वतश्रेष्ठ पंखों वाले हुआ करते थे; वे इच्छानुसार पृथ्वी पर उड़ते और सब ओर बाधा पहुँचाते थे। पर्वतों के इस आचरण को सुनकर पाकशासन भगवान इन्द्र ने अपने वज्र से हजारों पर्वतों के पंख काट डाले। पर मुझे आपके महात्मा पिता पवनदेव ने उस संकट से बचा लिया; उन्होंने मुझे वरुण के निवास उस समुद्र में डाल दिया। अब मुझे रघुनन्दन श्रीराम की सहायता करनी है, हे अरिंदम! श्रीराम धर्मधारियों में श्रेष्ठ और महेन्द्र-समान पराक्रमी हैं।
महात्मा मैनाक की यह बात सुनकर मैंने उन्हें अपना प्रयोजन बताया, और मेरा मन आगे बढ़ने को फिर उत्सुक हुआ। महात्मा मैनाक की अनुज्ञा पाकर मैं चला; और वह महाशैल अपने मनोहर मानव-रूप में अन्तर्धान होकर, अपने पर्वत-शरीर से समुद्र में लीन हो गया। उत्तम वेग पकड़कर मैं शेष मार्ग पर चला, और बहुत समय तक तीव्र गति से बढ़ता रहा।
तभी मैंने समुद्र के बीच नागमाता देवी सुरसा को देखा। उस देवी ने कहा: हे हरिसत्तम, अमरों ने आपको मेरा भक्ष्य नियत किया है; इसलिए मैं आपको खाऊँगी, क्योंकि देवताओं ने आपको मेरे लिए विहित किया है। ऐसा कहे जाने पर मैं हाथ जोड़े, विनम्र मुख से, फीका पड़कर खड़ा हुआ और बोला: दशरथ-पुत्र श्रीमान श्रीराम अपनी भार्या सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ दण्डक-वन में आए; वहाँ दुरात्मा रावण उनकी भार्या सीता को हर ले गया; उन्हीं श्रीराम के आदेश से मैं दूत बनकर सीता के पास जा रहा हूँ। आप श्रीराम के राज्य में रहती हैं, अतः उनकी सहायता करना उचित है। अथवा मैथिली को देखकर और अक्लिष्टकर्मा श्रीराम को सूचित करके मैं आपके मुख में आ जाऊँगा; यह मैं सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ।
तब इच्छानुसार रूप धरने वाली सुरसा ने कहा: मुझे कोई लाँघ नहीं सकता, यही मेरा वर है। यों कहे जाने पर मैं, जो दस योजन विस्तार वाला था, एक क्षण में आधा और बढ़ गया; उसने भी अपना मुख मुझसे बड़ा खोल दिया। उसका मुख खुला देखकर मैं तुरन्त छोटा होकर अँगूठे के बराबर हो गया, झट उसके मुख में घुसा और तत्क्षण निकल आया। तब सुरसा देवी अपने रूप में आकर बोलीं: हे सौम्य हरिश्रेष्ठ, अब अपने कार्य की सिद्धि के लिए सुख से जाइए, और महात्मा राघव से वैदेही का मिलन कराइए। हे महाबाहो, सुखी रहिए; मैं आपसे प्रसन्न हूँ। तब सब प्राणियों ने मुझे “साधु! साधु!” कहकर सराहा।
फिर मैं गरुड़-सा विशाल अन्तरिक्ष में उछला। तभी मेरी छाया पकड़ ली गई, पर मुझे कुछ दिखाई न पड़ा। मेरा वेग रुक गया; मैंने दसों दिशाएँ देखीं, पर वह वस्तु न दिखी जिसने मेरी गति रोकी थी। तब मेरे मन में विचार आया: मेरी यात्रा में यह कैसा विघ्न आ खड़ा हुआ, जिसका कोई रूप यहाँ नहीं दीखता? शोक करते हुए मेरी दृष्टि नीचे पड़ी, और वहाँ मैंने जल में पड़ी एक भयानक राक्षसी देखी।
मुझे निश्चल देखकर अट्टहास करती उस भयानक स्त्री ने मुझसे अशुभ वचन कहा: हे महाकाय, कहाँ जाएँगे? भूखी मुझे आप मनचाहा भोजन मिले हैं; चिरकाल से आहार-रहित मेरे शरीर को तृप्त कीजिए। “बहुत अच्छा” कहकर मैंने उसकी बात मान ली, और अपना शरीर उसके मुख से भी बड़ा बना लिया। मुझे खाने के लिए उसका विशाल भयानक मुख भी बढ़ने लगा; पर न उसने मुझे पहचाना, न मेरे आगे किए सूक्ष्म-रूप को जाना। तब मैंने पलक झपकते अपना विशाल रूप समेटा, उसका हृदय निकाल लिया, और आकाश में उछल गया। हृदय कट जाने से वह पर्वत-समान भयानक राक्षसी, भुजाएँ ढीली पड़कर, खारे जल में गिर पड़ी। उसी क्षण मैंने आकाशचारी महात्माओं की सौम्य वाणी सुनी: भयानक राक्षसी सिंहिका हनुमान के हाथों शीघ्र ही मारी गई।
समझने की कुंजी (संख्या/स्थान): हनुमान का मूल आकार वाल्मीकि दस योजन (लगभग अस्सी मील) कहते हैं। सुरसा और सिंहिका के प्रसंग में रूप का छोटा-बड़ा होना मात्र चमत्कार नहीं; सुरसा देवताओं द्वारा भेजी गई परीक्षा है (बुद्धि की परीक्षा), जबकि सिंहिका छाया-ग्राहिणी राक्षसी है (बल और युक्ति की परीक्षा)। दोनों को हनुमान भिन्न रीति से जीतते हैं: एक को युक्ति से, दूसरी को संहार से।
सार: जाम्बवान के पूछने पर हनुमान अपनी पूरी यात्रा क्रम से सुनाते हैं: मार्ग में मैनाक का विश्राम-निमन्त्रण ठुकराना, सुरसा को युक्ति से तृप्त करके निकल भागना, और छाया पकड़ने वाली सिंहिका का हृदय फाड़कर वध करना।
हनुमान की आत्मकथा: लंका-प्रवेश और सीता-दर्शन
उसे मारकर, अपने अत्यावश्यक कार्य का स्मरण करते हुए मैं फिर चला, और लम्बा मार्ग तय करके पर्वतों से सुशोभित समुद्र का दक्षिण तट देखा, जहाँ लंका नगरी थी। सूर्य अस्त हो जाने पर मैं भयानक पराक्रमी राक्षसों से अनजाने, राक्षसों के निवास उस नगरी में गहरे घुस गया। नगर में प्रवेश करते ही प्रलयकालीन मेघ-सी कान्ति वाली एक स्त्री अट्टहास करती मेरे सामने आ खड़ी हुई, जिसके केश जलती आग-से थे; वह मुझे मारना चाहती थी। बायीं मुट्ठी के प्रहार से उस अत्यन्त भयानक स्त्री को परास्त करके मैंने सन्ध्या-समय अपना प्रवेश किया। डरी हुई उसने कहा: हे वीर, मैं लंकापुरी हूँ; आपके पराक्रम से जीती गई हूँ। जिस कारण से आपने मुझे जीता, उसी से आप समस्त राक्षसों को निःशेष जीतेंगे।
वहाँ मैं सारी रात जनकात्मजा को खोजता घूमा; रावण के अन्तःपुर में जाकर भी सुमध्यमा को न पाया। रावण के भवन में सीता को न पाकर शोक-सागर में डूबकर मैं उसका पार न देख सका। शोक करते हुए मैंने एक ऊँचे प्राकार से घिरा, खींचे हुए सोने से बना उत्तम गृह-उपवन देखा। उस प्राकार को लाँघकर मैंने बहुत वृक्षों वाला उपवन देखा; उस अशोक-वन के बीच एक विशाल शिंशपा-वृक्ष था।
उस पर चढ़कर मैंने एक सोने का कदलीवन देखा; शिंशपा-वृक्ष से थोड़ी ही दूर पर मैंने वरवर्णिनी को देखा। श्यामवर्णा, कमल-दल-सी आँखों वाली, उपवास से क्षीणमुख, एक ही वस्त्र ओढ़े, धूल से धूसरित केशों वाली, शोक-संताप से दीन-अंग सीता पति के हित में स्थित थीं। विरूप और क्रूर राक्षसियाँ, जो माँस-रक्त खाती थीं, उन्हें ऐसे घेरे थीं जैसे बाघिनें हिरणी को। मृगशावक-सी आँखों वाली वह देवी राक्षसियों के बीच बार-बार धमकाई जाती, एक ही वेणी धारण किए, दीन, पति-चिन्ता में लीन, भूमि पर शयन करती, हिमागम में मुरझाई पद्मिनी-सी विवर्ण, रावण के कारण इष्ट-वियुक्त, और मरने का निश्चय किए बैठी थीं। मैंने उन्हें किसी प्रकार शीघ्र खोज निकाला।
दशग्रीव की कही उस दशा वाली, श्रीराम की यशस्विनी पत्नी को देखकर मैं उसी शिंशपा-वृक्ष पर बैठा उन्हें देखता रहा। तभी रावण के भवन में मैंने मेखला और नूपुरों की झंकार से मिला अत्यन्त गम्भीर “हलहला” शब्द सुना। परम उद्विग्न होकर मैंने अपना रूप समेट लिया, और घने पत्तों वाली शिंशपा पर पक्षी-सा छिपकर बैठा रहा।
तब रावण की रानियाँ और महाबली रावण उस स्थान पर आए जहाँ सीता बैठी थीं। उस राक्षसगण-ईश्वर को देखकर वरारोहा सीता अपने ऊरु सिकोड़कर, अपने स्तनों को भुजाओं से ढककर बैठ गईं। त्राण के लिए इधर-उधर देखती, पर कोई रक्षक न पाती, काँपती हुई परम-दुःखिता तपस्विनी को देखकर अवाक्-शिर (सिर झुकाए) रावण उनके चरणों में गिरकर बोला: हे सीते, मेरा आदर कीजिए। यदि गर्व से आप मुझ पर अनुग्रह न करेंगी, तो दो मास बाद मैं आपका रुधिर पीऊँगा।
उस दुरात्मा रावण के इस वचन को सुनकर परम-क्रुद्ध सीता ने यह उत्तम वचन कहा: रे राक्षसाधम! अमित-तेजस्वी श्रीराम की भार्या और इक्ष्वाकु-वंशनाथ दशरथ की पुत्रवधू से ऐसा अवाच्य कहते हुए आपकी जीभ कैसे नहीं गिर पड़ी! रे अनार्य, आपका पराक्रम कैसा, जो मेरे पति की अनुपस्थिति में, उन महात्मा से बच निकलकर, मुझे चुराकर भाग आए! रे पापी, आप श्रीराम के समान किसी अंश में नहीं; आप उनका दास होने योग्य भी नहीं। राघव अजेय, सत्यवादी, शूर और रण-श्लाघी हैं।
जानकी के इस कठोर वचन से दशानन सहसा क्रोध से चिता की आग-सा जल उठा। क्रूर नेत्रों को घुमाकर, दाहिनी मुट्ठी उठाकर वह मैथिली को मारने को उद्यत हुआ। तभी स्त्रियों में हाहाकार मच गया। उस दुरात्मा की श्रेष्ठ भार्या मन्दोदरी स्त्रियों के बीच से उठकर दौड़ी और उसे रोका। कामार्त रावण से उसने मधुर वाणी में कहा: हे प्रभो, महेन्द्र-समान पराक्रमी आपको सीता से क्या प्रयोजन? आज मेरे साथ रमण कीजिए; जानकी मुझसे श्रेष्ठ नहीं। हे प्रभो, देव-गन्धर्व-यक्ष कन्याओं के साथ रमण कीजिए; सीता से आपको क्या काम?
उन सब स्त्रियों ने उस महाबली निशाचर को उठाकर सहसा उसके भवन में पहुँचा दिया। दशग्रीव के चले जाने पर विकृत-मुख राक्षसियाँ क्रूर और अति-कठोर वचनों से सीता को धमकाने लगीं। पर जानकी ने उनके कथन को तृण-समान गिना; उनकी गर्जना सीता को पाकर निरर्थक हो गई। व्यर्थ गर्जना से निष्चेष्ट हुई वे पिशाच-भक्षिणी राक्षसियाँ सीता का मरने तक का महान निश्चय रावण से जा कहने को उद्यत हुईं। फिर हताश, निरुद्यम, खिन्न वे सब साथ-साथ निद्रावश हो गईं।
उनके सो जाने पर पति-हित में रत सीता करुण विलाप कर परम-दुःखिता होकर शोक करने लगीं। तब उनके बीच से त्रिजटा उठकर बोली: रे राक्षसियो! दशरथ की पुत्रवधू, जनक की साध्वी कन्या असितनयना सीता को खाने के बजाय शीघ्र अपने को ही खा लो। आज मैंने एक दारुण, रोमांचकारी स्वप्न देखा है, जो राक्षसों का विनाश और इनके पति की विजय सूचित करता है। यही हमें, समस्त राक्षसीगण को, राघव के क्रोध से बचाने में समर्थ हैं। इसलिए हम वैदेही की कृपा माँगें; मुझे यही रुचता है। ऐसी दुःखिता को यदि ऐसा स्वप्न प्रत्यक्ष दिखे, तो वह विविध दुःखों से मुक्त होकर परम सुख पाती है। प्रणाम मात्र से जनकात्मजा मैथिली प्रसन्न हो जाएँगी।
त्रिजटा से कहे स्वप्न को सुनकर पति-विजय के हर्ष से प्रफुल्ल, लज्जाशीला बाला सीता ने कहा: यदि यह सत्य हो, तो मैं आप सबको शरण दूँगी। सीता की वैसी दारुण दशा देखकर, कुछ विश्राम कर चुके होने पर भी, मेरा मन शान्त न हुआ; और जानकी से बात करने का उपाय मैंने सोचा। मैंने इक्ष्वाकु-कुल-वंश की, राजर्षि दशरथ की प्रशंसा से युक्त वाणी से उनका बखान आरम्भ किया। मेरी यह वाणी सुनकर अश्रुपूर्ण नेत्रों वाली देवी ने मुझसे पूछा: हे वानरपुंगव, आप कौन हैं? किसके भेजे और कैसे यहाँ आए? श्रीराम से आपकी क्या प्रीति है, यह मुझे बताइए।
उनकी यह बात सुनकर मैंने भी कहा: हे देवी, आपके भर्ता श्रीराम के भीमविक्रम सहायक हैं, विक्रान्त महाबली वानरेन्द्र, सुग्रीव नाम से। मुझे उनका भृत्य हनुमान जानिए, जो यहाँ आया है; अक्लिष्टकर्मा श्रीराम ने मुझे आपके पास भेजा है। और यह देखिए, पुरुषव्याघ्र श्रीमान दशरथि ने स्वयं पहचान-चिह्न के रूप में यह अँगूठी आपके लिए दी है। अब, हे देवी, मैं आपकी आज्ञा चाहता हूँ कि क्या करूँ; यदि आप कहें तो मैं आपको राम-लक्ष्मण के पास ले चलूँ; आपका क्या उत्तर है?

यह सुनकर और सत्य जानकर जनकनन्दिनी सीता ने कहा: रावण को उखाड़कर राघव ही मुझे ले चलें। तब मैंने अनिन्दिता आर्या देवी को सिर झुकाकर प्रणाम किया, और राघव के मन को आह्लादित करने वाला कोई पहचान-चिह्न माँगा। सीता ने कहा: यह उत्तम मणि लीजिए, जिससे महाबाहु श्रीराम आपका बहुत आदर करेंगे। यों कहकर परम उद्विग्न वरारोहा ने मुझे शिर-मणि (मस्तक की मणि) दी, और वाणी से वे एक-दो प्रसंग कहे जो केवल श्रीराम जानते हैं।
तब उस राजपुत्री को प्रणाम कर, लौटने के मन से, मैंने प्रदक्षिणा की। उन्होंने मन से निश्चय करके फिर कहा: हे हनुमान, आप राघव से मेरा वृत्तान्त कहिए; और ऐसा कीजिए कि सुनते ही दोनों वीर राम-लक्ष्मण सुग्रीव-सहित शीघ्र आ पहुँचें। यदि ऐसा न हुआ, तो मेरा जीवन दो मास का ही है; इस अवधि में काकुत्स्थ न आए, तो मैं अनाथ-सी मर जाऊँगी, और श्रीराम मुझे फिर न देख सकेंगे।
उस करुण वचन को सुनकर मुझ पर क्रोध आ गया, और आगे करने का शेष कार्य मैंने तत्क्षण देख लिया। तब मेरा शरीर पर्वत-सा बढ़ा, और युद्ध की कामना से मैं रावण के उस उपवन को उजाड़ने लगा।
समझने की कुंजी (अवधारणा): रावण की “दो मास” वाली धमकी पर गीताप्रेस के एक टीकाकार का मत है कि श्रुति-वचन “पक्षौ वै मासाः” के अनुसार यहाँ “मास” का अर्थ दो पक्ष (एक मास) भी हो सकता है। इसी से सीता की अवधि कहीं दो मास, कहीं एक मास कही गई है। यह वाल्मीकि-पाठ की एक प्रसिद्ध व्याख्या-भिन्नता है।
सार: हनुमान सुनाते हैं कि कैसे उन्होंने लंकापुरी (नगर-देवी) को परास्त कर रात भर सीता को खोजा, अशोकवाटिका में शिंशपा-वृक्ष पर बैठकर उन्हें देखा, रावण की धमकी और सीता का तेजस्वी उत्तर देखा, मन्दोदरी और त्रिजटा के प्रसंग सुने, सीता से बातचीत कर अँगूठी दी और शिर-मणि तथा गुप्त-चिह्न (काक-प्रसंग) पाया। फिर क्रोधित होकर वे वाटिका उजाड़ने लगते हैं।
हनुमान की आत्मकथा: राक्षस-संहार, बन्धन और रावण-सभा

निद्रा से जागकर विकृत-मुख राक्षसियों ने वह उजड़ा वनखण्ड और उसके भ्रान्त-त्रस्त पशु-पक्षी देखे। मुझे उस वन में देखकर वे सब ओर से एकत्र हुईं और शीघ्र ही रावण से जा कहा: हे राजन, हे महाबल! आपके बल को न जानने वाले किसी दुरात्मा वानर ने आपका यह दुर्गम वन तोड़ डाला। निश्चय ही यह उसकी दुर्बुद्धि है; आप उसका तुरन्त वध आज्ञापित कीजिए, कहीं वह बच न निकले।
यह सुनकर राक्षसराज ने रावण के मन के अनुगामी, अति-दुर्जय किंकर नामक राक्षस भेजे। उनमें से अस्सी हजार राक्षसों को, जो शूल और मुद्गर लिए थे, मैंने उस वनप्रदेश में लोहे के परिघ (छड़) से मार डाला। बचे हुए कुछ राक्षस भागकर रावण से सेना-नाश की सूचना दे आए। तब मुझे चैत्यप्रासाद (राक्षसों के कुलदेवता का मन्दिर) तोड़ने की सूझी; वहाँ खड़े सौ राक्षसों को मारकर, लंका के आभूषण-स्वरूप उस मन्दिर को मैंने रोष से उसी के एक स्तम्भ से ध्वस्त कर दिया।

तब रावण ने प्रहस्त के पुत्र जम्बुमाली को बहुत-से घोर राक्षसों समेत भेजा। रण-कुशल उस महाबली राक्षस को मैंने अनुचरों समेत अति-घोर परिघ से मार डाला। यह सुनकर रावण ने पदाति-बल से युक्त महाबली मन्त्री-पुत्रों को भेजा; उन सबको भी मैंने परिघ से ही यमलोक पहुँचा दिया। समर में शीघ्र पराक्रम दिखाने वाले मन्त्री-पुत्रों के मारे जाने की बात सुनकर रावण ने पाँच शूर सेनापति भेजे; उन्हें भी मैंने सेना समेत मार गिराया।
तब दशग्रीव ने अपने महाबली पुत्र अक्ष को बहुत-से राक्षसों के साथ युद्ध में भेजा। रण-पण्डित मन्दोदरी-पुत्र उस कुमार को मैंने सहसा आकाश में उछलते देख दोनों पैरों से पकड़ लिया, और सौ बार घुमाकर पटक दिया, जिससे वह चूर-चूर हो गया। अक्ष के मारे जाने की बात सुनकर अत्यन्त क्रुद्ध रावण ने अपने दूसरे महाबली पुत्र इन्द्रजित को बड़ी सेना समेत भेजा। उस राक्षसपुंगव की समस्त सेना का तेज रण में हरकर मैंने परम हर्ष पाया। मद से उद्धत वीरों समेत भेजे उस महाबली ने मुझे अजेय जानकर ब्रह्मास्त्र से बाँध लिया, और मुझे राक्षसों को सौंप दिया। अति-वेगवान राक्षसों ने मुझे वहाँ रस्सियों से भी बाँधा।
मुझे पकड़कर वे रावण के पास ले गए। दुरात्मा रावण ने मुझे देखकर, मुझसे बातचीत की, और लंका-गमन तथा राक्षस-वध का कारण पूछा। मैंने कहा: रण में यह सब सीता के लिए ही किया गया। हे प्रभो, उन्हीं के दर्शन की कामना से मैं आपके भवन तक आया; मुझे पवनदेव का औरस-पुत्र वानर हनुमान जानिए। मुझे श्रीराम का दूत और सुग्रीव का सचिव कपि जानिए; मैं श्रीराम के दौत्य से आपके पास आया हूँ। हे राक्षसेश, अब मेरा सन्देश सुनिए, जो मैं आपसे कहता हूँ; हरीश सुग्रीव ने आपसे सावधान वचन कहा है।
हनुमान ने सभा में सुग्रीव का सन्देश सुनाया: महाभाग सुग्रीव ने आपकी कुशल पूछी है, और धर्म-अर्थ-काम से युक्त यह हितकर, पथ्य वचन कहा है। ऋष्यमूक पर्वत पर रहते मुझ सुग्रीव से रण-विक्रान्त राघव की मित्रता हुई। हे राजन, उन्होंने मुझसे कहा कि उनकी भार्या राक्षस द्वारा हरी गई है, और उन्होंने मुझसे सहायता का संकल्प कराया। वाली से राज्य-छीने मुझ सुग्रीव के साथ प्रभु राघव ने लक्ष्मण समेत अग्नि-साक्षी मित्रता की। उन्होंने एक ही बाण से वाली को मारकर मुझे वानरों का महाराज बनाया।
सुग्रीव का सन्देश आगे चला: इसलिए हम सबको सर्वात्मना श्रीराम की सहायता करनी है; इसी हेतु मैंने धर्मपूर्वक यह दूत आपके पास भेजा है। वीर वानर आपकी सेना का विध्वंस करें, इससे पहले शीघ्र सीता को लाकर राघव को सौंप दीजिए। पहले किसी ने भी वानरों का यह प्रभाव न जाना, जो निमन्त्रित होने पर ही देवताओं के पास सहायता को जाते हैं। हे राजन, वानरराज सुग्रीव ने आपसे यह कहा है।
तब रुष्ट होकर रावण मुझे आँखों से मानो भस्म करता-सा देखने लगा। उस रौद्रकर्मा राक्षस ने मेरा प्रभाव न जानकर मेरे वध की आज्ञा दे दी। तभी उसका महामति भ्राता विभीषण, जो वहीं था, मेरे लिए राक्षसराज से प्रार्थना करने लगा: हे राक्षसशार्दूल, ऐसा निश्चय मत कीजिए; यह राजशास्त्र-विरुद्ध मार्ग आप अपना रहे हैं। राजशास्त्रों में दूत-वध स्वीकृत नहीं; दूत को तो जो उससे कहलाया गया है, वही कहना होता है। हे अतुल-पराक्रमी भ्राता, दूत के बड़े अपराध पर भी शास्त्र में अंग-विकृति का विधान है, वध का नहीं।
विभीषण के यों कहने पर रावण ने उन राक्षसों को आज्ञा दी: इसकी पूँछ ही अभी जला दो। उसका वचन सुनकर मेरी पूँछ को सब ओर सन की छाल, रेशमी और सूती चीथड़ों में लपेट दिया गया। तब उग्र पराक्रमी राक्षसों ने काठ और मुक्कों से मुझ पर प्रहार करते हुए मेरी पूँछ जला दी। बहुत-सी रस्सियों और चीथड़ों से बँधे होने पर भी मुझे कोई पीड़ा न हुई, क्योंकि मैं दिन में नगरी देखने को उत्सुक था।
तब वे शूर राक्षस मुझे बँधा और अग्नि से घिरा हुआ, नगर-द्वार पर ले जाकर राजमार्गों में सबको दिखाने लगे।
समझने की कुंजी (संख्या): वाटिका-संग्राम में हनुमान का संहार-क्रम वाल्मीकि बड़ी सटीकता से देते हैं: पहले अस्सी हजार किंकर, फिर चैत्य-रक्षक सौ राक्षस, फिर जम्बुमाली, फिर मन्त्री-पुत्र, फिर पाँच सेनापति, फिर अक्षकुमार, और अन्त में इन्द्रजित, जो ब्रह्मास्त्र से ही उन्हें बाँध पाता है। इन्द्रजित का ब्रह्मास्त्र-प्रयोग ही एकमात्र कारण है कि हनुमान बँधते हैं; वे जान-बूझकर बँधे रहते हैं ताकि रावण की सभा देख सकें।
सार: हनुमान वाटिका में किंकरों से लेकर अक्षकुमार तक के संहार का क्रम सुनाते हैं; अन्त में इन्द्रजित ब्रह्मास्त्र से उन्हें बाँधता है। रावण की सभा में वे स्वयं को राम का दूत बताते हैं, सुग्रीव का सीता-वापसी का सन्देश सुनाते हैं; रावण वध की आज्ञा देता है, पर विभीषण दूत-वध को राजशास्त्र-विरुद्ध बताकर रोकते हैं, और पूँछ जलाने का दण्ड तय होता है।
हनुमान की आत्मकथा: लंका-दहन और वापसी
तब मैंने अपना विशाल रूप समेटा, अपने बन्धन तोड़े, और फिर अपने स्वाभाविक रूप में खड़ा हो गया। लोहे का परिघ लेकर मैंने उन राक्षसों को मार डाला, और वेग से उस नगर-द्वार पर उछल पड़ा। फिर जलती पूँछ से मैंने अट्टालिकाओं और गोपुरों समेत उस नगरी को, बिना घबराए, वैसे ही जला डाला जैसे युगान्त की अग्नि प्रजा को जलाती है।
तभी मुझे फिर शोक हुआ: निश्चय ही जानकी नष्ट हो गईं, क्योंकि लंका का कोई भाग अनजला नहीं दीखता; सारी नगरी भस्म हो गई। लंका जलाते समय सीता भी जल गईं, इसमें संदेह नहीं; इस प्रकार मैंने श्रीराम का महान कार्य ही व्यर्थ कर डाला। इस प्रकार शोक से भरा मैं चिन्ता को प्राप्त हुआ। तभी मैंने चारणों की शुभ-अक्षरा वाणी सुनी, जो अद्भुत वृत्तान्त सुना रहे थे कि जानकी जली नहीं। उस अद्भुत वाणी को सुनकर मेरे मन में विचार आया: जानकी अवश्य जलने से बच गईं; और इसे शुभ शकुन भी सूचित करते हैं। पहली बात तो यह कि मेरी पूँछ जलने पर भी अग्नि मुझे नहीं जलाती; मेरा हृदय भी अत्यन्त प्रसन्न है, और हवाएँ सुगन्ध से भरी हैं।
उन शुभ शकुनों से, श्रीराम के प्रभाव और सीता के पातिव्रत्य जैसे प्रबल कारणों से, और सब कुछ देखने वाले चारणों की वाणी से मेरा मन हर्षित हुआ। फिर मैंने वैदेही को एक बार और देखा, और उनसे विदा ली। तब वहाँ लंका में अरिष्ट पर्वत पर पहुँचकर, आप सबके दर्शन की लालसा से मैंने लौटती छलाँग आरम्भ की। वायु, चन्द्र, सूर्य, सिद्ध और गन्धर्वों से सेवित उस मार्ग को लाँघकर मैंने आप सबको यहाँ पाया। श्रीराम की कृपा से, आप सबके तेज से, और सुग्रीव के कार्य के लिए मैंने सब कुछ सम्पन्न किया। यह सब मैंने वहाँ यथावत किया; जो वहाँ शेष रह गया, वह सब अब आप सब पूरा कीजिए।
सार: बन्धन तोड़कर हनुमान राक्षसों को मारते हैं और जलती पूँछ से लंका को भस्म कर देते हैं। फिर वही पुराना भय: कहीं सीता भी न जल गई हों। चारणों की वाणी और शकुनों से आश्वस्त होकर वे सीता को फिर देख, विदा लेकर लौट आते हैं, और महेन्द्र-शिखर पर अपनी पूरी आत्मकथा यहीं समाप्त करते हैं।
सीता की दशा का वर्णन और युद्ध की प्रेरणा
यह सब कह सुनाकर मारुतात्मज हनुमान ने फिर आगे यह वचन कहा: राघव का उद्योग और सुग्रीव का परिश्रम सफल हुआ; सीता का शील देखकर मेरा मन भी तृप्त हुआ। हे प्लवगर्षभो, सीता का आचरण उस आर्या के योग्य है; वे अपने तप से समस्त लोकों को धारण कर सकती हैं, और क्रुद्ध हों तो भस्म भी कर सकती हैं। वह राक्षसेश्वर रावण भी सब प्रकार से तप में अति-समृद्ध है, क्योंकि सीता का शरीर छूने पर भी उसका शरीर उनके तप से नष्ट नहीं हुआ। हाथ से छूई हुई अग्नि की लौ भी वह हानि नहीं कर सकती, जो क्रोध से कलुषित होने पर जनककुमारी कर सकती हैं।
हनुमान ने सीता की दशा का स्मरण कराया: मैंने ही लंका को ध्वस्त किया, नगरी को जलाकर भस्म किया, और सब राजमार्गों में नाम घोषित किया कि महाबली श्रीराम और लक्ष्मण विजयी हों, राघव-रक्षित राजा सुग्रीव विजयी हों। मैं कोसलराज का दास, पवन-पुत्र हनुमान हूँ; इस प्रकार मैंने सर्वत्र अपना नाम घोषित किया। दुरात्मा रावण की अशोकवाटिका के बीच, शिंशपा-मूल में साध्वी सीता करुण दशा में स्थित हैं; राक्षसियों से घिरी, शोक-संताप से कृश, मेघ-रेखा से ढकी चन्द्र-रेखा-सी निष्प्रभ हैं।
हनुमान ने कहा: बल-दर्पी रावण की चिन्ता न करती हुई पतिव्रता सुश्रोणी जानकी संयम में स्थित हैं। शुभा वैदेही सर्वात्मना श्रीराम में अनुरक्त हैं; इन्द्र में शची-सी उन्होंने अपना चित्त अनन्यभाव से श्रीराम में लगाया है। एक ही वस्त्र ओढ़े, धूल-धूसरित, राक्षसियों के बीच बार-बार धमकाई जाती, विरूप राक्षसियों से प्रमदावन में दीखती, एक वेणी धारण किए, दीन, पति-चिन्ता में लीन, भूमि पर शयन करती, हिमागम में पद्मिनी-सी विवर्ण, रावण से इष्ट-वियुक्त, और मरने का निश्चय किए हुए हैं। मृगशावक-सी आँखों वाली उन्हें किसी प्रकार विश्वास दिलाकर, फिर सम्भाषण करके मैंने सारी बात बताई। राम-सुग्रीव की मैत्री सुनकर वे प्रीति को प्राप्त हुईं; उनका समुदाचार नियत है, और पति में भक्ति उत्तम।
हनुमान ने एक गूढ़ बात कही: सीता दशग्रीव को इसलिए नहीं मारतीं कि उसके वध में श्रीराम निमित्त-मात्र हों (अर्थात वे वध का यश श्रीराम के लिए छोड़ देती हैं); महात्मा दशानन भी इसी से (अपने तप के बल से) बचा हुआ है। स्वभाव से ही तन्वंगी सीता पति-वियोग से और कृश हो गई हैं, मानो प्रतिपदा के दिन पढ़ने वाले विद्यार्थी की विद्या क्षीण हो गई हो। इस प्रकार महाभागा सीता शोक में डूबी हैं; अब जो यहाँ करना उचित हो, वह सब विचार लीजिए।
यह सब सुनकर वालिपुत्र अंगद बोले, और जाम्बवान आदि महाकपियों से युद्ध की प्रेरणा देने लगे। पर पहले उन्होंने अपने और दूसरे वीरों के बल का बखान किया: मैन्द और द्विविद, अश्विनीकुमारों के पुत्र, ब्रह्मा के वरदान से सर्व-अवध्य हैं; उन्होंने देवताओं की सेना को मथकर अमृत तक पी लिया था। क्रुद्ध होने पर ये दोनों ही अश्व-रथ-गज समेत लंका का नाश करने में समर्थ हैं, और वानरों की तो बात ही क्या। मैं अकेला ही सराक्षसगण लंका को और महाबली रावण को बल से मारने में समर्थ हूँ; फिर आप वीरों के साथ की तो बात ही क्या। हमने अभी सुना है कि लंका तो हनुमान के बल से ही जल गई।
तब अंगद ने अपना मत रखा: देवी देख तो ली गईं, पर लाई न गईं, यह किष्किन्धा में कहना मुझे आप यशस्वियों के योग्य नहीं जान पड़ता। हे हरिसत्तमो, सब लोकों में देव-दैत्यों समेत कोई आपके लंघन या पराक्रम में समान नहीं। राक्षसगण समेत लंका को जीतकर, रावण को रण में मारकर, सीता को लेकर हम सिद्धार्थ और हर्षित होकर लौटें। हनुमान के हाथों राक्षस-वीरों के मारे जाने पर अब और क्या करना शेष है? हम जानकी को लेकर ही चलें। हम जनकात्मजा को राम-लक्ष्मण के बीच ले रखें। हम स्वयं वहाँ जाकर राक्षसपुंगवों को मारकर श्रीराम, सुग्रीव और लक्ष्मण को देखें।
इस प्रकार संकल्प किए अंगद से हरिसत्तम जाम्बवान, जो अर्थवेत्ता थे, परम प्रसन्न होकर बोले: हे महाबुद्धि, हे महाकपि, आप जो कहते हैं वह बुद्धिमानी नहीं। हमें तो केवल दक्षिण दिशा खोजने की आज्ञा थी, सीता को लाने की नहीं; न कपिराज सुग्रीव ने, न धीमान श्रीराम ने ऐसा कहा। नृपशार्दूल राघव अपने कुल का नाम लेकर यह न चाहेंगे कि सीता किसी प्रकार हमारे द्वारा जीती जाएँ; राजा ने सब कपिमुख्यों के सामने स्वयं प्रतिज्ञा की है कि वे सीता-विजय अपने आगे रखेंगे। उनकी उस प्रतिज्ञा को कैसे मिथ्या करें? ऐसा करने से हनुमान का किया कर्म भी निष्फल हो जाएगा, उनका सन्तोष भी न रहेगा, और सीता-विजय में दिखाया पराक्रम भी व्यर्थ होगा। इसलिए हम सब वहाँ चलें जहाँ राम लक्ष्मण-सहित और महातेजस्वी सुग्रीव हैं, और इस कार्य को निवेदित करें। आपका यह सुझाव हमारे लिए अकरणीय नहीं; पर श्रीराम के निश्चय के अनुसार ही आप कार्य-सिद्धि का उपाय सोचिए।
समझने की कुंजी (अवधारणा): अंगद का उत्साह और जाम्बवान का विवेक यहाँ आमने-सामने हैं। अंगद चाहते हैं कि वानर स्वयं सीता को छुड़ा लाएँ; जाम्बवान समझाते हैं कि सीता-उद्धार का यश और प्रतिज्ञा श्रीराम की है, अतः निर्णय उन्हीं पर छोड़ना चाहिए। यह वाल्मीकि का राजनीति-विवेक है: दूत-मण्डल अपनी सीमा पहचानता है।
सार: हनुमान सीता की करुण पर तेजस्वी दशा का वर्णन कर युद्ध की प्रेरणा देते हैं। अंगद उत्साह में स्वयं लंका जीतकर सीता को ले आने का प्रस्ताव रखते हैं, पर अनुभवी जाम्बवान उन्हें रोकते हैं: निर्णय और प्रतिज्ञा श्रीराम की है, अतः समाचार लेकर उन्हीं के पास लौटना उचित है।
मधुवन-विध्वंस और दधिमुख का सुग्रीव से निवेदन
जाम्बवान का वचन मानकर अंगद-प्रमुख वीर वानर और महाकपि हनुमान प्रीतिमन होकर वायुपुत्र को आगे करके महेन्द्र-शिखर से उछल पड़े। मेरु-मन्दर-से विशाल, मतवाले महागजों-से वे महाकाय महाबली आकाश को मानो ढकते हुए, हनुमान को आँखों से मानो थामे हुए, किष्किन्धा की दिशा में हर्ष से कूद चले। राघव का कार्य सिद्ध करने और उन्हें परम यश दिलाने का निश्चय किए, कर्म-सिद्धि से उन्नत वे सब प्रिय-समाचार सुनाने को उत्सुक, युद्ध का अभिनन्दन करते, श्रीराम की सहायता का निश्चय किए मनस्वी थे।
आकाश में उछलते वे वनवासी नन्दन-वन-से सैकड़ों वृक्षों से भरे एक वन में जा उतरे। वह मधुवन नामक वन सुग्रीव का था, सब ओर सुरक्षित और सब प्राणियों के लिए अधृष्य; महावीर कपि दधिमुख, जो महात्मा सुग्रीव के मामा थे, उसकी सदा रक्षा करते थे। उस विशाल मधुवन को देखकर मधु-से लाल-भूरे वे हर्षित वानर कुमार अंगद से मधु पीने की अनुमति माँगने लगे। तब अंगद ने जाम्बवान आदि वृद्ध कपियों की सम्मति लेकर उन्हें मधु पीने की अनुमति दे दी।
धीमान वालिपुत्र अंगद से अनुमति पाकर वानर मधुमक्खियों से भरे वृक्षों के पास पहुँचे। सुगन्धित मूल-फल खाते हुए वे सब महान हर्ष को प्राप्त हुए और मद से उन्मत्त हो उठे। फिर अनुमति पाए सब वनवासी हर्षित होकर इधर-उधर नाचने लगे: कोई गाते, कोई हँसते, कोई नाचते, कोई प्रणाम करते; कोई गिरते, कोई दौड़ते, कोई उछलते, कोई बकते। कोई एक-दूसरे के सहारे टिकते, कोई एक-दूसरे से वाद-विवाद करते, कोई वृक्ष-से-वृक्ष भागते, कोई शिखरों से भूमि पर कूद पड़ते। एक गाता तो दूसरा हँसता हुआ पास आता; एक हँसता तो दूसरा रोता हुआ चला आता। उस सेना में न कोई अमत्त था, न कोई अदृप्त।
उस वन को नष्ट होते और वृक्षों को पत्र-पुष्प-रहित होते देखकर वनरक्षक कपि दधिमुख ने क्रोध से उन वानरों को रोका। उन उद्धत वानरों से भर्त्सना पाकर, उग्रतेजस्वी वह वृद्ध वीर वन की रक्षा का उपाय सोचने लगा। उसने किसी को कठोर वचन कहे, किसी को थप्पड़ मारे, किसी से उलझा, किसी को सान्त्वना दी। मद से अप्रतिवार्य वेग वाले उन वानरों ने, राजसेवक पर हाथ उठाने का दोष न सोचते हुए, निर्भय होकर दधिमुख को घसीटा, नाखूनों से नोचा, दाँतों से काटा, थप्पड़-लातों से मानो प्राण ही निकाल दिए, और सब ओर से उस विशाल वन को सब फल-मधु-मूल से रहित कर डाला।
हनुमान ने उन वानरों से कहा था: हे वानरो, निश्चिन्त मन से मधु का सेवन कीजिए; जो आपको रोकें उन्हें मैं हटा दूँगा। यह सुनकर हरियों में श्रेष्ठ अंगद ने प्रसन्न होकर कहा: वानर मधु पिएँ; कृतकार्य हनुमान का वचन तो मुझे अकरणीय हो तब भी करना चाहिए, फिर ऐसा करणीय वचन तो अवश्य ही। यह सुनकर वानरश्रेष्ठ “साधु! साधु!” कहकर प्रसन्न हुए, और अंगद को सराहकर नदी-वेग-से मधुवन की ओर दौड़े। शक्ति से रक्षकों को परास्त कर वे मधुवन में घुसे; अंगद की अनुमति और हनुमान के सीता-दर्शन से अति-बलवान अनुभव करते हुए सबने मधु पिया और रसीले फल खाए।
फिर रक्षकों को मारते वे सैकड़ों की संख्या में मधुवन में फल बटोरने लगे। द्रोण-भर (लगभग तीस किलो) मधुपूर्ण छत्ते भुजाओं में थामकर कुछ कपि समूहों में हर्ष से मधु पीने लगे; कुछ छत्ते तोड़ते, कुछ खाते, कुछ पीकर फेंक देते। कुछ मोम के गोलों से एक-दूसरे को मारते, कुछ शाखाएँ थामे वृक्ष-मूल में खड़े रहते। मद से अत्यन्त शिथिल वे प्लवग पत्ते बिछाकर लेट जाते। एक-दूसरे को धकेलते, लड़खड़ाते; कुछ सिंह-से गरजते, कुछ पक्षी-से कूजते।
दधिमुख के सेवक रक्षक, उन भयानक वानरों से रोके जाने पर, घुटनों से घसीटे और पैरों से पकड़कर आकाश में उछाले गए; वे चारों दिशाओं में भागकर परम उद्विग्न होकर दधिमुख से जा बोले: मधुवन को हनुमान-वरदत्त वानरों ने बल से उजाड़ डाला, और हमें भी घुटनों से घसीटा और आकाश में उछाला। मधुवन-विध्वंस सुनकर क्रुद्ध वनरक्षक दधिमुख ने उन्हें सान्त्वना दी: आइए, चलें; हम उन अति-दर्पी वानरों के पास जाएँ; मैं उन्हें बल से रोकूँगा।
यह सुनकर वीर रक्षक दधिमुख के साथ फिर मधुवन गए। एक बड़ा वृक्ष उखाड़कर, उसे दृढ़ पकड़े दधिमुख उनके बीच जा खड़ा हुआ। वानर शिला, वृक्ष और पत्थर लेकर क्रोध से वहाँ पहुँचे जहाँ वे कपिकुंजर थे। बल से रोकते, ओठ चबाते, बार-बार धमकाते वे रक्षक उनके पास आए। तब क्रुद्ध दधिमुख को देखकर हनुमान-प्रमुख वानरपुंगव वेग से उन पर टूट पड़े। वृक्ष लिए वेगपूर्वक आते महाबाहु महाबली दधिमुख को कुपित अंगद ने दोनों भुजाओं से पकड़ लिया। मद से अंधे अंगद ने “यह मेरे आर्यक हैं” यह सोचे बिना ही दया न दिखाई, और उसे सहसा गिराकर वेग से भूमि पर रगड़ा। रक्त से सना, भुजा-ऊरु-मुख टूटा, वह महावीर कपिकुंजर क्षण भर के लिए मूर्च्छित हो गया।
वानरों के किसी प्रकार छोड़ देने पर वह वानरश्रेष्ठ एकान्त में जाकर अपने पास आए सेवकों से बोला: आइए, चलें; जहाँ हमारे स्वामी सुग्रीव श्रीराम के साथ हैं वहाँ चलें। अंगद का सब अपराध हम राजा को सुनाएँगे; अमर्षी सुग्रीव हमारी शिकायत सुनकर वानरों का वध करा देंगे। यह मधुवन महात्मा सुग्रीव को इष्ट है; पितृ-पैतामह यह दिव्य वन देवताओं के लिए भी दुर्गम है। ये मधु-लोभी, आयु-क्षीण वानर सुग्रीव के दण्ड से सुहृदों समेत मारे जाएँगे; जो राजाज्ञा का उल्लंघन करें वे दुरात्मा वध-योग्य हैं।
यह कहकर महाबली दधिमुख वनरक्षकों समेत सहसा उछलकर चल पड़ा। पलक झपकते ही वह वनवासी वहाँ पहुँचा जहाँ धीमान सहस्रांशु-पुत्र वानर सुग्रीव थे। श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीव को देखकर वह आकाश से समतल भूमि पर उतरा। सब रक्षकों से घिरा, दीन-मुख, सिर पर हाथ जोड़े उस महावीर रक्षक-परमेश्वर दधिमुख ने सुग्रीव के चरणों को शीघ्र अपने सिर से दबाया।
समझने की कुंजी (अवधारणा): मधुवन का यह उल्लास वानर-स्वभाव की सजीव झाँकी है: कार्य-सिद्धि का हर्ष, मधु-मद, और रक्षक दधिमुख के साथ हाथापाई। द्रोण एक प्राचीन माप है (लगभग तीस किलो)। यह प्रसंग व्यंग्य-रस से भरा है, पर कथा-दृष्टि से इसका प्रयोजन गम्भीर है: मधुवन सुग्रीव का प्रिय पैतृक वन है, और उसका उजड़ना ही सुग्रीव को सीता-प्राप्ति का संकेत दे देता है।
सार: लौटते वानर सुग्रीव के प्रिय मधुवन में रुककर, अंगद की अनुमति से मधु पीकर मतवाले हो जाते हैं और रक्षक दधिमुख को मारते-पीटते हैं। दधिमुख रक्षकों समेत किष्किन्धा जाकर सुग्रीव के चरणों में गिरकर शिकायत करता है।
सुग्रीव का अनुमान और अंगद-दल का लौटना
सिर के बल गिरे उस वानर को देखकर उद्विग्न-हृदय वानरश्रेष्ठ सुग्रीव बोले: उठिए, उठिए! आप मेरे चरणों में क्यों गिरे हैं? मैं आपको अभय देता हूँ; सच-सच कहिए। किसके भय से आए हैं? जो हमारे हित का हो वह सब बताइए; आप जो चाहें कह सकते हैं। आशा है मधुवन में कुशल है; हे वानर, मैं आपसे सब कुछ सुनना चाहता हूँ।
महात्मा सुग्रीव से आश्वस्त होकर उठकर महाप्राज्ञ दधिमुख बोला: हे राजन, जो वन न ऋक्षरज (आपके पिता) से, न आपसे, न वाली से कभी क्षति न पाया था, उस मधुवन को वानरों ने उजाड़ डाला। इन वनरक्षकों समेत मैंने सबको रोका, पर मेरी उपेक्षा कर वे हर्ष से खाते-पीते रहे; रोकने पर हम पर भौंहें तानते रहे। और रोकने पर इन वानरपुंगवों ने हम रक्षकों को पीटा, हाथों-घुटनों से मारकर मनमाने आकाश में फेंका। हे भर्ता, आपके राज्य में ही वे शूर हमें पीटते रहे, और सारा मधुवन मनमाने खा-पी गए।
यह सुनते हुए सुग्रीव से महाप्राज्ञ परवीरघ्न लक्ष्मण ने पूछा: हे राजन, यह वनरक्षक वानर आपके पास क्यों आया है? किस प्रयोजन से दुःखी होकर यह आपसे निवेदन कर रहा है? वाक्य-विशारद सुग्रीव ने लक्ष्मण को उत्तर दिया: हे आर्य लक्ष्मण, वीर कपि दधिमुख कह रहा है कि अंगद-प्रमुख वीर वानरों ने मधुवन का मधु पी डाला। इन कृतकार्यों का ऐसा उल्लंघन तभी सम्भव था जब इन्होंने मेरा कार्य सिद्ध कर लिया हो; क्योंकि वे वन को उजाड़ने लगे, अतः निश्चय ही कार्य सिद्ध हुआ।
सुग्रीव ने आगे कहा: देवी सीता देख ली गईं, इसमें संदेह नहीं, और हनुमान के अतिरिक्त किसी और ने नहीं देखा। इस कर्म को सिद्ध करने का हनुमान के सिवा कोई दूसरा हेतु नहीं; हनुमान में ही कार्य-सिद्धि, मति, व्यवसाय, वीर्य और श्रुत प्रतिष्ठित हैं। जहाँ जाम्बवान और महाबली अंगद नायक हों और हनुमान अधिष्ठाता, वहाँ गति कभी विपरीत नहीं होती। दक्षिण दिशा खोजकर लौटे अंगद-प्रमुख वीरों ने ही, सबके लिए अधृष्य मधुवन को लंका से लौटते ही उजाड़ डाला।
दधिमुख का यह सुखद वचन सुनकर श्रीराम और महायशस्वी लक्ष्मण परम हर्षित हुए। प्रसन्न सुग्रीव ने वनरक्षक से फिर कहा: मैं प्रसन्न हूँ कि कृतकार्य वानरों ने वन का उपभोग किया। कृतकार्यों का यह उल्लंघन और चेष्टा सहनीय है। आप शीघ्र मधुवन लौटिए और स्वयं उसकी रक्षा कीजिए; और हनुमान-प्रमुख सब कपियों को शीघ्र भेज दीजिए। मैं चाहता हूँ कि सिंह-दर्पी वे हनुमान-प्रधान शाखामृग, जिन्होंने वैदेही को देखे बिना दिव्य वन न उजाड़ा होता, श्रीराम-लक्ष्मण समेत मुझसे शीघ्र मिलें, ताकि सीता-अन्वेषण के उनके यत्न को मैं सुन सकूँ।
तब कानों को सुख देती सुग्रीव-वाणी सुनकर धर्मात्मा लक्ष्मण और श्रीराम परम प्रहर्षित हुए। श्रीराम और लक्ष्मण को आनन्द से प्रफुल्ल देखकर, और अपने हर्षित अंगों से कार्य-सिद्धि को मानो भुजाओं के निकट जानकर, वानरराज सुग्रीव परम सुख को प्राप्त हुए।
सुग्रीव से यों कहे जाने पर हर्षित दधिमुख ने श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीव को अभिवादन किया, और शूर वानरों समेत फिर आकाश में उछलकर मधुवन की ओर चला। जैसे आया था वैसे ही शीघ्र लौटकर वह आकाश से उतरकर वन में गहरे पहुँचा। वहाँ उसने मधु-जल पचाकर अब विमद (नशा-रहित) और शान्त हुए हरियूथपों को देखा। हाथ जोड़कर वह वीर हर्षित-सा अंगद के पास आकर सुन्दर वचन बोला: हे सौम्य, रक्षकों ने अज्ञानवश क्रोध से आपको रोका, इस पर रोष न कीजिए। दूर से आकर थके आप अपना ही मधु खाइए; आप युवराज और इस वन के स्वामी हैं, हे महाबल!
दधिमुख ने आगे कहा: मूर्खतावश पहले जो रोष किया, उसे आप क्षमा कीजिए। जैसे आपके पिता वाली पहले हरिगण-ईश्वर थे, वैसे ही अब आप और सुग्रीव हैं, हे हरिसत्तम। हे निष्पाप, मैंने जाकर आपके चाचा को आप सबके आगमन की सूचना दी; वे आपके आने से अति-हर्षित हुए, वन-विध्वंस सुनकर भी क्रुद्ध न हुए, अपितु प्रसन्न होकर बोले कि उन सबको शीघ्र भेज दीजिए।
दधिमुख का यह सुन्दर वचन सुनकर वाक्य-विशारद हरिश्रेष्ठ अंगद उन वानरों से बोले: मेरा अनुमान है कि हमारे आगमन का यह समाचार श्रीराम ने सुन लिया है, क्योंकि यह दधिमुख हर्ष से इसे सुना रहा है। अतः कार्य-सिद्धि के बाद अब यहाँ और ठहरना हमें शोभा नहीं देता। हे वनवासियो, आपने मनचाहा मधु पी लिया; अब वहाँ जाना ही शेष है जहाँ वानरराज सुग्रीव हैं। आप सब मिलकर जैसा कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगा; मैं युवराज होते हुए भी आपको आज्ञा देने का अधिकारी नहीं, और कृतकर्मा आप पर बल से प्रभुत्व जताना अनुचित है।
अंगद का यह उत्तम वचन सुनकर हर्षित वानर बोले: हे राजन, हे वानरर्षभ, स्वामी होकर ऐसा कौन कहता है? ऐश्वर्य-मद से सब अपने को बड़ा मानते हैं। यह वचन आपके ही योग्य है, किसी और के नहीं; यह विनम्रता आपकी भावी शुभ-योग्यता सूचित करती है। हम सब भी वहाँ चलने को उत्सुक हैं जहाँ हरिवीरों के अव्यय स्वामी सुग्रीव हैं। हे हरिश्रेष्ठ, आपकी आज्ञा बिना हम वानर एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकते; यह हम सच कहते हैं।
उनके यों कहने पर अंगद ने “ठीक है, चलें” कहा, और सब महाबली आकाश में उछल पड़े। उछलते अंगद के पीछे सब हरियूथप यन्त्र से छूटे पत्थरों-से उछल पड़े और आकाश को निराकाश (भरा हुआ) कर दिया। अंगद और वानर हनुमान को आगे करके वेगवान प्लवंगम सहसा आकाश में उछले, और वायु से प्रेरित मेघों-से महानाद करते चले।
अंगद के समीप आने पर वानरश्रेष्ठ सुग्रीव ने शोक-संतप्त कमललोचन श्रीराम से कहा: आप आश्वस्त हों, आपका कल्याण हो; देवी देख ली गईं, इसमें संदेह नहीं। मेरी नियत अवधि बहुत पहले बीत जाने के कारण असफल होते तो वे यहाँ लौट ही न सकते थे, और अंगद के हर्ष से भी मैं यही जानता हूँ, हे शुभदर्शन। यदि कार्य भंग होता तो महाबाहु युवराज अंगद मेरे पास आते ही नहीं। असफलों का ऐसा आचरण सम्भव भी हो, तो वे दीन-मुख, भ्रान्त और विह्वल-मन होते, जो ये नहीं हैं। जनकात्मजा को देखे बिना कोई मेरे पितृ-पैतामह मधुवन को नष्ट न करता।
सुग्रीव ने श्रीराम को आश्वस्त किया: हे सुव्रत राम, आप में कौसल्या सुपुत्रवती हुईं; आप आश्वस्त हों। देवी देख ली गईं, इसमें संदेह नहीं, और हनुमान के अतिरिक्त किसी और ने नहीं देखा। इस कर्म-सिद्धि का हनुमान के सिवा कोई हेतु नहीं; हे मतिसत्तम, हनुमान में ही सिद्धि, मति, व्यवसाय, शौर्य और श्रुत प्रतिष्ठित हैं। जहाँ जाम्बवान और हरीश्वर अंगद नायक हों और हनुमान अधिष्ठाता, वहाँ गति विपरीत नहीं होती। हे अमित-विक्रम, अब चिन्ता न कीजिए; दर्पित होकर वानर आए हैं, और असफलों का ऐसा आचरण सम्भव नहीं। वन-भंग और मधु-भक्षण से ही मैं उनकी सिद्धि जानता हूँ।
तभी सुग्रीव ने आकाश में निकट ही, हनुमान के कर्म से दर्पित, किष्किन्धा की ओर आते वानरों का सिद्धि-घोषक-सा किलकिला शब्द सुना। उन कपियों की गर्जना सुनकर कपिश्रेष्ठ सुग्रीव हर्षित होकर अपनी पूँछ हर्ष से तानने-समेटने लगे। श्रीराम-दर्शन के उत्सुक वे वानर भी अंगद और वानर हनुमान को आगे करके आ पहुँचे, और अंगद-प्रमुख हर्षित वीर हरिराज सुग्रीव तथा राघव के समीप उतर पड़े।
तब महाबाहु हनुमान ने सिर झुकाकर प्रणाम कर राघव को निवेदन किया कि देवी श्रीराम में नियत-भक्ति वाली और शरीर से सकुशल हैं। “देवी देख ली गईं” यह अमृत-समान वचन हनुमान के मुख से सुनकर श्रीराम लक्ष्मण-सहित हर्ष को प्राप्त हुए। प्रीतिमान लक्ष्मण ने उस हर्षित सुग्रीव को बहुमान से देखा, जो हनुमान की सीता-दर्शन-सिद्धि के प्रति निश्चित था। परम प्रीति से युक्त परवीरघ्न राघव ने भी महान बहुमान से हनुमान को देखा।
सार: दधिमुख की शिकायत से ही सुग्रीव अनुमान लगा लेते हैं कि सीता मिल गईं, क्योंकि असफल वानर मधुवन उजाड़ने का दुस्साहस न करते। वे श्रीराम को आश्वस्त करते हैं, दधिमुख को सान्त्वना देकर अंगद-दल को बुला भेजते हैं। दधिमुख लौटकर अंगद से क्षमा माँगता है, और अंगद-हनुमान सब वानरों समेत श्रीराम-सुग्रीव के पास पहुँचकर सीता के सकुशल होने का समाचार देते हैं।
श्रीराम को हनुमान का विस्तृत वृत्तान्त और चूड़ामणि
तब वे वानर चित्र-वनों वाले प्रस्रवण पर्वत पर जाकर, श्रीराम और महाबली लक्ष्मण को सिर झुकाकर प्रणाम कर, सुग्रीव का अभिवादन कर, युवराज अंगद को आगे रखकर सीता का समाचार सुनाने लगे। वैदेही को जीवित जानकर श्रीराम ने पूछा: देवी सीता कहाँ हैं और मेरे प्रति कैसी भाव रखती हैं? हे वानरो, सीता के विषय में यह सब मुझे बताइए।
श्रीराम का आदेश सुनकर वानर श्रीराम के समीप ही सीता-वृत्तान्त के ज्ञाता हनुमान को उत्तर देने के लिए प्रेरित करने लगे। उनका वचन सुनकर वाक्यज्ञ हनुमान ने दक्षिण दिशा की ओर और इस प्रकार देवी सीता को सिर झुकाकर प्रणाम किया, और सीता-दर्शन का वृत्तान्त इस प्रकार कहना आरम्भ किया। अपने ही तेज से दीप्त वह दिव्य सोने की मणि श्रीराम को देकर हाथ जोड़कर हनुमान बोले: सौ योजन (लगभग आठ सौ मील) विस्तृत समुद्र को लाँघकर मैं सीता को देखने की इच्छा से उन्हें खोजते हुए आगे बढ़ा। वहाँ दक्षिण समुद्र के दक्षिण तट पर दुरात्मा रावण की लंका नगरी बसी है; वहीं रावण के अन्तःपुर में मैंने साध्वी सीता को देखा।
हनुमान ने सीता की दशा कही: हे राम, आप में मन लगाए जीवित सीता मुझे राक्षसियों के बीच, बार-बार धमकाई जाती, विरूप राक्षसियों से प्रमदावन में पहरा जाती दीखीं। हे वीर, सुख-योग्य वह देवी रावण के अन्तःपुर में रुद्ध, राक्षसियों से सुरक्षित, दुःख को प्राप्त हुई हैं; एक वेणी धारण किए, दीन, आप में चिन्तापरायण, भूमि पर शयन करती, हिमागम में पद्मिनी-सी विवर्ण, रावण से इष्ट-वियुक्त, मरने का निश्चय किए हुए हैं। हे काकुत्स्थ, आप में मन लगाए उन देवी को मैंने किसी प्रकार खोज निकाला।
हनुमान ने आगे कहा: हे नरशार्दूल, इक्ष्वाकु-वंश की कीर्ति धीरे-धीरे गाते हुए मैंने उन्हें विश्वास दिलाया, फिर सम्भाषण कर सब बात बताई; राम-सुग्रीव की मैत्री सुनकर वे हर्षित हुईं। उनका समुदाचार नियत और आप में भक्ति सदा अटल है। हे महाभाग, इस प्रकार उग्र तप और आप में भक्ति से युक्त जनकनन्दिनी मुझे मिलीं। हे पुरुषर्षभ, मुझे उन्होंने एक पहचान-चिह्न दिया, जो चित्रकूट में काक (कौवे) के सम्बन्ध में आपके पास घटी घटना है। और जानकी ने मुझसे कहा: हे वायुसुत, यहाँ जो कुछ आपने देखा है, वह सब विस्तार से श्रीराम को कहिए।
सीता के वचन हनुमान ने आगे कहे: यह यत्न से सुरक्षित मणि श्रीराम को, सुग्रीव के सुनते, इन वचनों के साथ देना: यह श्रीमान चूड़ामणि (मस्तक की मणि) मैंने यत्न से रक्षित किया है; आप मनःशिला से बनाया वह तिलक स्मरण करें। यह जल से उत्पन्न श्रीमान मणि मैं आपको भेज रही हूँ; विपत्ति में इसे देखकर मैं आपको ही देखने-सा हर्षित होती थी। हे दशरथात्मज, मैं एक मास ही जीवित रहूँगी; उसके बाद राक्षसों के वश में पड़ी मैं न जिऊँगी।
हनुमान ने श्रीराम से कहा: रावण के अन्तःपुर में रुद्ध, मृगी-सी विस्फारित नेत्रों वाली, कृशांगी धर्मचारिणी सीता ने मुझसे यही कहा। हे राघव, यही सब मैंने आपको यथावत बताया; अब सब प्रकार से समुद्र-जल पार करने का उपाय किया जाए। यह जानकर कि दोनों राजकुमार श्रीराम-लक्ष्मण आश्वस्त हुए, और वह चिह्न श्रीराम को देकर, वायुपुत्र हनुमान ने देवी द्वारा कहा हुआ सब वचन क्रम से पूरा सुना दिया।
समझने की कुंजी (स्थान/संख्या): हनुमान समुद्र को “सौ योजन” (लगभग आठ सौ मील) चौड़ा कहते हैं। सीता का “चूड़ामणि” वह मस्तक-मणि है जो उन्हें विवाह में जनक ने दी थी; यह जल से उत्पन्न और इन्द्र द्वारा यज्ञ में दी गई बताई जाती है। यह केवल आभूषण नहीं, श्रीराम के लिए सीता के जीवित होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
सार: प्रस्रवण पर्वत पर हनुमान श्रीराम को सीता के दर्शन का पूरा वृत्तान्त सुनाते हैं: उनकी करुण दशा, उनमें अटल भक्ति, चित्रकूट के काक-प्रसंग का गुप्त पहचान-चिह्न, और चूड़ामणि सौंपते हैं, जिसके साथ सीता का एक मास की अवधि वाला सन्देश भी देते हैं।
श्रीराम का विलाप और सीता का सन्देश माँगना
हनुमान के यों कहने पर दशरथात्मज श्रीराम उस मणि को हृदय से लगाकर लक्ष्मण-सहित रो पड़े। उस मणिश्रेष्ठ को देखकर शोक से कृश राघव अश्रुपूर्ण नेत्रों से सुग्रीव से बोले: जैसे वत्सल गाय अपने बछड़े को देखते ही स्नेह से दूध चुआने लगती है, वैसे ही इस मणिश्रेष्ठ के दर्शन से मेरा हृदय द्रवित हो रहा है। यह मणि-रत्न वैदेही को मेरे श्वशुर जनक ने दिया था, जो वधू-काल में उनके मस्तक पर बँधकर अत्यन्त शोभित होता था। जल से उत्पन्न यह मणि श्रेष्ठ देवताओं से पूजित था, जिसे परम सन्तुष्ट धीमान इन्द्र ने यज्ञ में जनक को दिया था।
श्रीराम बोले: हे सौम्य, इस मणिश्रेष्ठ को देखकर आज मैंने मानो अपने पिता का और विदेहराज जनक का दर्शन पा लिया, और सीता का भी। यह मणि मेरी प्रिया के मस्तक पर अत्यन्त शोभित होता था; इसके दर्शन से आज मैं उन्हें ही प्राप्त-सा अनुभव करता हूँ। हे सौम्य, सीता ने आपसे क्या कहा, बार-बार सुनाइए; मानो मूर्च्छित मुझे आप अपने वचन-रूपी जल से सींच रहे हैं। हे सौमित्र, इससे बढ़कर दुःख क्या होगा कि मैं जल से उत्पन्न यह मणि तो देख रहा हूँ, पर वैदेही को नहीं?
हनुमान की ओर मुड़कर श्रीराम बोले: वैदेही यदि एक मास भी जीवित रहीं तो चिर-जीवी हुईं; पर हे वीर, उस असितनयना के बिना मैं क्षण भर भी न जीऊँगा। मुझे भी उस देश ले चलिए जहाँ आपने मेरी प्रिया को देखा; समाचार पाकर मैं क्षण भर भी नहीं ठहर सकता। हे हनुमान, सीता ने क्या कहा, मुझे ठीक-ठीक बताइए; अत्यन्त भीरु, चारु-अंगी मेरी सुश्रोणी सती सीता भयानक राक्षसों के बीच कैसे रहती हैं? मेघों से ढके शरद के निष्कलंक चन्द्र-सा उनका मुख अब वैसा नहीं चमकता। हे हनुमान, मधुर-भाषिणी, वरारोहा, मुझसे विरहित मेरी भामिनी ने आपसे क्या कहा? दुःख से दुःखतर पाकर जानकी कैसे जीती हैं?
सार: चूड़ामणि को हृदय से लगाकर श्रीराम विलाप करते हैं: यह मणि जनक की दी हुई थी, इससे उन्हें पिता, श्वशुर और सीता तीनों का स्मरण होता है। वे बार-बार हनुमान से सीता का सन्देश सुनाने को कहते हैं, मानो वही वचन उन्हें जीवित रखेगा।
चित्रकूट का काक-प्रसंग और सीता की पहचान
महात्मा राघव के यों कहने पर हनुमान ने सीता का कहा हुआ सब श्रीराम को सुनाया। उन्होंने कहा: हे पुरुषर्षभ, देवी जानकी ने चित्रकूट में घटी एक पूर्व-घटना यथावत पहचान-चिह्न के रूप में कही। एक बार आपके साथ सुख से सोई जानकी पहले उठीं, तब एक कौवा सहसा झपटकर उनके स्तन को चोंच से नोच गया। हे भरताग्रज, आप तब देवी की गोद में सो रहे थे; फिर उस पक्षी ने देवी को व्यथा पहुँचाई। फिर पास आकर उसने उन्हें कठोरता से नोचा; उनके रक्त से सने आप जागे।
हनुमान ने आगे कहा: हे परंतप, सुख से सोते आपको उस कौवे से सताई जाती देवी ने जगाया। हे महाबाहु, स्तन में नुची उन्हें देखकर आपने आशीविष सर्प-से क्रुद्ध होकर पूछा: हे भीरु, किसने नखों से आपका स्तन नोचा? क्रुद्ध पंचमुख साँप से कौन क्रीड़ा कर रहा है? चारों ओर देखते आपने सहसा रक्तरंजित तीक्ष्ण नखों वाले उस कौवे को सीता के सामने बैठे देखा।
हनुमान ने कथा सुनाई: वह कौवा इन्द्र-पुत्र जयन्त था, पक्षियों में श्रेष्ठ; पवन-सी गति वाला वह पाताल में रहता था। हे महाबाहु, हे मतिमतां वर, तब क्रोध से नेत्र घुमाकर आपने उस कौवे के लिए क्रूर मति बनाई। आपने कुश-शय्या से एक तृण लेकर उसमें ब्रह्मास्त्र का सन्धान किया; वह कालाग्नि-सा दीप्त तृण उस पक्षी की ओर अभिमुख होकर धधक उठा। आपने वह जलता तृण उस कौवे पर फेंका, और वह दीप्त तृण कौवे का पीछा करने लगा। आपके भय से डरे सब देवताओं ने उस कौवे को त्याग दिया; तीनों लोकों में घूमकर भी उसे कोई रक्षक न मिला।
हनुमान ने कहा: हे अरिंदम, अन्ततः वह फिर चित्रकूट में आपके पास आ गिरा। हे काकुत्स्थ, शरणागत-रक्षक आप ने भूमि पर गिरे, शरण आए, वध-योग्य उस कौवे की भी दया से रक्षा की; पर अस्त्र को व्यर्थ न किया जा सकता था, अतः आपने उस कौवे की केवल दाहिनी आँख फोड़ी। हे राम, वह कौवा आपको और राजा दशरथ को नमस्कार कर, आपके द्वारा छोड़ा जाकर, अपने स्थान लौट गया।
हनुमान ने सीता का करुण विलाप सुनाया कि सीता ने मुझसे कहा था: इस प्रकार आप अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ, सत्त्ववान और शीलवान हैं; फिर राक्षसों पर अस्त्र क्यों नहीं चलाते? हे राघव, न दानव, न गन्धर्व, न असुर, न मरुद्गण रण में आपके सामने टिक सकते हैं। हे राम, यदि वीर्यवान आप में मेरे लिए कुछ भी आदर हो, तो रावण को शीघ्र तीक्ष्ण बाणों से रण में मार डालें। अथवा भाई का आदेश जानने वाले परंतप लक्ष्मण मुझे क्यों नहीं छुड़ाते? वायु-अग्नि-समान तेजस्वी वे दोनों पुरुषव्याघ्र, देवों के लिए भी दुर्धर्ष, मेरी उपेक्षा क्यों करते हैं? निश्चय ही मेरा कोई बड़ा दुष्कर्म है जिससे समर्थ और साथ रहते हुए भी वे दोनों परंतप मेरी रक्षा नहीं करते।
हनुमान ने कहा: सीता की यह करुण, साधु-भाषित वाणी सुनकर मैंने उन आर्या से यह वचन कहा: हे देवी, मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ कि श्रीराम आपके वियोग-शोक से सब ओर से विमुख हो गए हैं; श्रीराम के दुःख से अभिभूत होने पर लक्ष्मण भी संतप्त हैं। आप किसी प्रकार खोज ली गईं, अतः अब शोक करने का समय नहीं। हे भामिनी, इसी मुहूर्त में आप दुःखों का अन्त देखेंगी।
हनुमान ने सीता को दिया आश्वासन सुनाया: वे दोनों नरशार्दूल राजकुमार आपके दर्शन के लिए उत्साहित होकर लंका को भस्म कर देंगे; रण में रौद्र रावण को बान्धवों समेत मारकर, हे वरारोहे, राघव आपको अपनी नगरी अवश्य ले चलेंगे। हे अनिन्दिते, आप ऐसा पहचान-चिह्न दीजिए जिसे श्रीराम सहज पहचानें और जो उन्हें हर्ष दे। तब चारों दिशाएँ देखकर, अपने वस्त्र के छोर से उन्होंने यह उत्तम चूड़ामणि खोलकर मुझे दिया, हे महाबल! उस मणि को आपको देने के लिए हाथ में लेकर, हे रघुप्रिय, उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम कर मैं लौटने को उद्यत हुआ।
हनुमान ने आगे कहा: मुझे जाने को उद्यत और शरीर बढ़ाते देख जनकात्मजा सीता ने अश्रुपूर्ण मुख से, बाष्प-गद्गद वाणी में, मेरी उछाल के विचार से व्याकुल और शोक-वेग से आहत होकर कहा: हे महाकपि, आप सौभाग्यशाली हैं, जो महाबाहु कमललोचन श्रीराम और मेरे यशस्वी देवर महाबाहु लक्ष्मण को देखेंगे। सीता के यों कहने पर मैंने मैथिली से कहा: हे देवी, हे जनकनन्दिनी, शीघ्र मेरी पीठ पर चढ़ जाइए; आज ही मैं आपको सुग्रीव-लक्ष्मण समेत आपके भर्ता राघव को दिखा दूँगा, हे असितनयना महाभागे!
तब देवी ने मुझसे कहा: हे महाकपि, अपने वश में रहते हुए भी मैं आपकी पीठ पर चढूँ, यह धर्म नहीं, हे हरिपुंगव। हे वीर, पहले जनस्थान से ले जाते समय राक्षस ने मेरे अंगों का स्पर्श किया था; उस समय काल से पीड़ित मैं विवश थी, क्या करती? हे कपिशार्दूल, आप वहाँ जाइए जहाँ वे दोनों राजपुत्र हैं। यों कहकर सीता फिर सन्देश देने लगीं: हे हनुमान, सिंह-समान उन दोनों राम-लक्ष्मण की, और सामन्तों समेत सुग्रीव तथा सबकी कुशल मेरी ओर से पूछिए। और ऐसा कीजिए कि महाबाहु राघव मुझे इस दुःख-जल के बन्धन से तार लें।
हनुमान ने अन्त में कहा: हे नृप, संयतमना उन आर्या सीता ने आपके लिए विषादपूर्वक यह वचन कहा, और इन राक्षसों द्वारा अपनी भर्त्सना भी कही। हे हरिप्रवीर, इसे ठीक-ठीक जानकर, श्रीराम के पास जाकर आप उनसे यह कहना; और आपकी यात्रा मंगलमय हो। यह मेरा वचन समझकर सीता को, समस्त साध्वियों में श्रेष्ठ, सकुशल मानिए।
समझने की कुंजी (अवधारणा): चित्रकूट का काक-प्रसंग केवल एक स्मृति नहीं, अभिज्ञान (पहचान-चिह्न) है: ऐसी निजी घटना जो केवल राम और सीता जानते हैं। इसी से श्रीराम निश्चित होते हैं कि सन्देश सचमुच सीता का है। साथ ही यह श्रीराम के ब्रह्मास्त्र-कौशल और शरणागत-वत्सलता दोनों को सूचित करता है: एक तृण ही ब्रह्मास्त्र बन सकता है, फिर भी शरण आए पर वे केवल एक आँख लेकर प्राण छोड़ देते हैं।
सार: हनुमान चित्रकूट के काक-प्रसंग को विस्तार से सुनाते हैं, जिससे श्रीराम को सीता के सन्देश की सत्यता पर विश्वास हो जाता है। सीता ने पातिव्रत्य के कारण हनुमान की पीठ पर चढ़ने से मना किया और चाहा कि श्रीराम स्वयं आकर उन्हें छुड़ाएँ। हनुमान ने उन्हें राम-लक्ष्मण के शीघ्र आने का आश्वासन दिया।
सीता का संशय, समुद्र-लंघन और हनुमान का अन्तिम आश्वासन
हनुमान ने श्रीराम से कहा: तब देवी ने सम्भ्रम (व्याकुलता) से मुझसे फिर एक बात कही; हे नरव्याघ्र, आपके स्नेह और सौहार्द के कारण मेरा आदर करते हुए उन्होंने यह आगे का वचन कहा: आप श्रीराम से बहुत प्रकार से ऐसा निवेदन कीजिए कि वे रावण को रण में शीघ्र मारकर मुझे पा लें। हे वीर, हे अरिंदम, अथवा यदि आप उचित समझें तो किसी ढके स्थान में एक दिन ठहरकर, विश्राम करके कल चले जाइएगा। हे वानर, मुझ अल्पभाग्या के पास आपकी समीपता से इस शोक-विपाक से कुछ क्षण मुक्ति तो मिलेगी।
सीता का संशय हनुमान ने फिर सुनाया: हे विक्रान्त, आपके लौटने के लिए चले जाने पर मेरे प्राणों में भी संदेह है, इसमें संशय नहीं। आपके न दीखने का शोक मुझे, जो एक दुःख से दूसरे दुःख में पड़ी, दुर्गत और दुःख-भागिनी हूँ, और सताएगा। और हे वीर, हे हरीश्वर, यह बड़ा संदेह मेरे सामने खड़ा-सा है कि आपके सहायक वानर-भालू, या वे दोनों नरश्रेष्ठ-पुत्र, इस दुस्तर महासागर को कैसे पार करेंगे। इस सागर को लाँघने की शक्ति तो तीन प्राणियों में ही है: वैनतेय गरुड़, पवन, या हे निष्पाप, आप।
सीता ने आगे कहा: हे वीर, इस कार्य की सिद्धि इतनी दुरतिक्रम है, तो आप क्या समाधान देखते हैं, बताइए, हे कार्यविदों में श्रेष्ठ। यद्यपि आप अकेले ही इस कार्य को सिद्ध करने में समर्थ हैं, हे परवीरघ्न, पर आपका यह बल-प्रदर्शन आपके ही यश को बढ़ाएगा। यदि समस्त सेना से रावण को रण में मारकर विजयी श्रीराम मुझे अपनी नगरी ले चलें, तो वही यशस्कर होगा। जैसे उस वीर राक्षस ने मुझे जनस्थान से छल से, श्रीराम के भय से ही उनकी अनुपस्थिति में हरा, वैसे राघव मुझे न लें। यदि बल से लंका को व्याकुल कर, परबल का नाश करने वाले काकुत्स्थ मुझे अयोध्या ले चलें, तो वही उनके योग्य होगा। इसलिए आप ऐसी व्यवस्था कीजिए कि उन आहव-शूर महात्मा का अनुरूप पराक्रम प्रकट हो।
हनुमान ने श्रीराम से कहा: अर्थयुक्त, विनम्र और हेतुसंगत सीता की यह बात सुनकर मैंने यह अन्तिम वचन कहा: हे देवी, वानर-भालू सेनाओं के स्वामी, प्लवगों में श्रेष्ठ, सत्त्वसम्पन्न सुग्रीव आपके लिए दृढ़निश्चयी हैं। उनके आदेश में विक्रमसम्पन्न, सत्त्ववान, महाबली, मन के संकल्प-से तीव्र, अमित-तेजस्वी वानर खड़े हैं, जिनकी गति ऊपर, नीचे या तिरछे कहीं नहीं रुकती, और जो बड़े-से-बड़े कठिन कार्यों में भी नहीं हारते। उन बल-युक्त महाभाग वानरों ने वायु के मार्ग का अनुसरण करते हुए पृथ्वी की कई बार प्रदक्षिणा की है।
हनुमान ने सीता को कहा अपना वचन सुनाया: किष्किन्धा में मुझसे श्रेष्ठ और समान बल वाले वानर हैं; सुग्रीव के पास मुझसे हीन कोई नहीं। मैं तो यहाँ आ ही पहुँचा, फिर वे महाबली तो कितने सहज पहुँचेंगे; प्रकृष्ट (बड़े) कभी दूत बनकर नहीं भेजे जाते, छोटे ही भेजे जाते हैं। इसलिए हे देवी, अब परिताप बस करें; आपका मन्यु (दुःख) दूर हो। एक ही छलाँग में वे हरियूथप लंका पहुँच जाएँगे। मेरी पीठ पर चढ़े आकाश में उदित चन्द्र-सूर्य-से वे दोनों नरसिंह आपके पास आएँगे, हे महाभागे।
हनुमान ने आगे का आश्वासन सुनाया: आप अरिघ्न सिंह-समान राघव और धनुर्धर लक्ष्मण को शीघ्र ही लंका-द्वार पर आया देखेंगी। नख-दाँत-शस्त्र वाले, सिंह-व्याघ्र-पराक्रमी, गजेन्द्र-से वानरों को भी एकत्र देखेंगी। शैल-मेघ-से उन कपिमुख्यों की गर्जना आप शीघ्र ही त्रिकूट के शिखरों पर सुनेंगी। और वनवास पूरा होने पर अयोध्या में आपके साथ अभिषिक्त राघव को आप शीघ्र देखेंगी। तब मैंने शुभ और इष्ट वचनों से अदीन-भाषिणी सीता को प्रसन्न किया; आपके अति-शोक से अति-पीड़ित होने पर भी मैथिली ने मेरे पास शान्ति पाई।
समझने की कुंजी (अवधारणा): सीता की एक ही चिन्ता बार-बार लौटती है: इतना विशाल समुद्र वानर-सेना और राम-लक्ष्मण कैसे पार करेंगे? वे यह भी दृढ़ता से कहती हैं कि उद्धार राम के पराक्रम से ही हो, हनुमान की पीठ पर भागकर नहीं; क्योंकि उससे राम का यश घटेगा और छल से ले जाना रावण-कर्म-सा होगा। हनुमान का अन्तिम आश्वासन वानर-सेना की असाधारण क्षमता गिनाकर इसी संशय का समाधान करता है।
सार: सीता अपना गहरा संशय खोलती हैं कि वानर और राम-लक्ष्मण इतना बड़ा समुद्र कैसे लाँघेंगे, और चाहती हैं कि उद्धार राम के अपने पराक्रम से ही हो। हनुमान वानर-सेना के अद्भुत बल का वर्णन कर उन्हें आश्वस्त करते हैं कि वे एक ही छलाँग में लंका पहुँचेंगे और शीघ्र ही राम-लक्ष्मण लंका-द्वार पर दिखेंगे; इससे सीता को शान्ति मिलती है।
मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, सुन्दरकाण्ड (गीता प्रेस गोरखपुर)।