लुल्ला परिवारLulla Family
English
← संग्रह
क्रियाएँ
रामायणवन, वचन और वापसी

रावण-कुल का पूर्वचरित्र

इस पृष्ठ पर
वाल्मीकि रामायण · उत्तरकाण्ड
रावण-कुल का पूर्वचरित्र, पुलस्त्य से वंश, कुबेर और रावण का जन्म, रावण की दिग्विजय और तपस्या, और वेदवती तथा नलकूबर के शाप जो आगे उसके अन्त के बीज बने।

पढ़ने में लगभग 85 मिनट

रावण-वध के पश्चात जब श्रीराम ने राज्य पुनः पाया, तब समस्त दिशाओं के महर्षि अयोध्या आए, राघव को बधाई देने। पूर्व दिशा से कौशिक, यवक्रीत, गार्ग्य, गालव और मेधातिथि-पुत्र कण्व; दक्षिण से स्वस्त्यात्रेय, भगवान नमुचि, प्रमुचि, अगस्त्य, अत्रि, सुमुख, विमुख; पश्चिम से नृषंगु, कवष, धौम्य और महर्षि कौशेय अपने शिष्यों सहित; और उत्तर दिशा के नित्यवासी सप्तर्षि (सात महर्षि) वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज। अग्नि-सी प्रभा वाले, वेद और वेदांग के ज्ञाता, अनेक शास्त्रों में निपुण ये महात्मा राघव के भवन पहुँचे और द्वार पर प्रतीक्षा करने लगे। धर्मात्मा अगस्त्य ने द्वारपाल से कहा कि राम को सूचित कीजिए कि हम ऋषिगण आए हैं। नीतिज्ञ, सदाचारी, चतुर और धैर्यवान द्वारपाल शीघ्र महात्मा राघव के समीप गया।

महर्षियों का अभिनन्दन और राम का प्रश्न

राम राज-सभा में हाथ जोड़े अगस्त्य आदि ऋषियों का स्वागत करते हुए; ऋषि दंड-कमंडलु लिए पधारते।

पूर्णचन्द्र-सी द्युति वाले राम को देखकर द्वारपाल ने तत्काल अगस्त्य तथा अन्य ऋषियों के आगमन की सूचना दी। बालसूर्य-सी प्रभा वाले उन मुनियों के आने की बात सुनकर राम ने उन्हें सम्मानपूर्वक भीतर लाने को कहा। उन ऋषिपुंगवों को आते देख राम हाथ जोड़कर खड़े हो गए, उन्हें प्रणाम किया, पाद्य और अर्घ्य (चरण और हाथ धोने का जल) अर्पित किया, एक गौ भेंट की, और आसन सजवाए। कुश से बने, स्वर्ण से जड़े और मृगचर्म से ढके श्रेष्ठ आसनों पर वे यथायोग्य बैठे। राम ने उनकी तथा उनके शिष्यों और गुरुजनों की कुशल पूछी। तब वे वेदज्ञ महर्षि बोले कि हे महाबाहु, हे रघुनन्दन, हम सर्वत्र कुशल हैं।

उन्होंने कहा, यह हमारा सौभाग्य है कि शत्रुओं का संहार करके आप शुभ-कुशल दिखाई दे रहे हैं। हे राजन, आपने लोकरावण (लोक को रुलाने वाले) रावण को मार डाला, यह परम भाग्य की बात है। हे राम, जो आप अपने धनुष से बिना सन्देह तीनों लोकों को जीत सकते हैं, उनके लिए पुत्र-पौत्रों सहित रावण कोई भार न था। हम आपको सीता और भ्राता लक्ष्मण सहित, माताओं और भाइयों सहित विजयी देख रहे हैं। प्रहस्त, विकट, विरूपाक्ष, महोदर, दुर्धर्ष अकम्पन (ये सब) निशाचर मारे गए। जिनके प्रमाण से बढ़कर विशाल प्रमाण कहीं नहीं था, वे कुम्भकर्ण रणभूमि में आपके हाथों गिरे। त्रिशिरा, अतिकाय, देवान्तक और नरान्तक भी मारे गए। कुम्भकर्ण के भयानक पुत्र कुम्भ और निकुम्भ भी रण में मारे गए।

अगस्त्य बैठे राम को पूर्व-कथा सुनाते हुए; ऊपर गरुड़ पर विष्णु राक्षस योद्धाओं को बाणों से बेधते।

उन्होंने आगे कहा, यमतुल्य युद्धोन्मत्त और मत्त, बलवान यज्ञकोप, और धूम्राक्ष नामक राक्षस, जो शस्त्र-अस्त्र में पारंगत थे, यम-से बाणों से भीषण संहार करते हुए आपके हाथों मारे गए। आप देवताओं के लिए भी अवध्य राक्षसराज के साथ द्वन्द्व-युद्ध में विजयी हुए। उस रावण का परास्त होना तो कोई आश्चर्य की बात नहीं, परन्तु जो उसका पुत्र (इन्द्रजित) द्वन्द्व-युद्ध को प्राप्त हुआ, उसका वध सन्तोष की बात है। हे महाबाहु, यह हमारा सौभाग्य है कि आप उस देवशत्रु इन्द्रजित के नागपाश (सर्पों के बन्धन) से मुक्त हुए और काल-से उस पर टूट पड़कर विजय पाई।

ऋषियों ने कहा, हम सब इन्द्रजित के वध को सुनकर आपका अभिनन्दन करते हैं। समस्त भूतों के लिए अवध्य, युद्ध में महामाया धारण करने वाले उस इन्द्रजित का मारा जाना सुनकर हमें परम आश्चर्य और हर्ष हुआ। हे रघुवंशवर्धन, हे काकुत्स्थ, आपने इन और अन्य अनेक कामरूपी राक्षसों का संहार किया तथा हमें अभयदान दिया, यह हमारा सौभाग्य है। भावितात्मा (आत्मतत्त्व को जानने वाले) उन मुनियों का यह वचन सुनकर राम परम आश्चर्य में पड़कर हाथ जोड़कर बोले।

राम हाथ जोड़े आसन पर बैठे अगस्त्य मुनि से रावण के कुल की कथा सुनते हुए।

राम ने पूछा, परम पराक्रमी महोदर, प्रहस्त, विरूपाक्ष, मत्त-उन्मत्त, देवान्तक-नरान्तक, अतिकाय, त्रिशिरा, धूम्राक्ष को छोड़कर आप रावण-पुत्र की ही प्रशंसा क्यों कर रहे हैं? इसका प्रभाव कैसा है, बल और पराक्रम कैसा है, किस कारण यह अपने पिता रावण से भी अधिक माना जाता है? इसने वर कैसे पाए, और इन्द्र को कैसे जीता? यदि यह कोई गुप्त रहस्य न हो और मेरे सुनने योग्य हो, तो हे मुनीन्द्र, मुझे बताइए। मैं आपको आज्ञा नहीं देता, परन्तु जानने की उत्कण्ठा रखता हूँ।

सार: राम के राज्याभिषेक के बाद महर्षि बधाई देने आते हैं। वे विशेषकर इन्द्रजित (रावण-पुत्र) के वध की सराहना करते हैं। राम पूछते हैं कि रावण और इन्द्रजित का वंश, बल और इतिहास क्या है। यहीं से अगस्त्य द्वारा सुनाई जाने वाली रावण-कुल की पूर्वकथा आरम्भ होती है।

पुलस्त्य की तपस्या और विश्रवा का जन्म

राघव का वचन सुनकर महातेजस्वी कुम्भयोनि अगस्त्य बोले। उन्होंने कहा, हे राम, उसके (इन्द्रजित के) उस महान तेज और बल को सुनिए, जिससे उसने शत्रुओं का संहार किया और जिसके कारण वह शत्रुओं के लिए अवध्य रहा। बीच-बीच में मैं आपको रावण के कुल, जन्म और उसे दिए गए वरदान की भी कथा सुनाऊँगा।

ऋषि पुलस्त्य वन की कुटिया के आगे पद्मासन में ध्यानमग्न; पास झरना और मोर।

हे राम, प्राचीन कृतयुग (पहले युग) में प्रजापति-पुत्र, साक्षात पितामह-तुल्य पुलस्त्य नामक एक प्रसिद्ध और प्रभावशाली ब्रह्मर्षि थे। उनके धर्म और शील के गुणों का वर्णन सम्भव नहीं; इतना कहना ही पर्याप्त है कि वे ब्रह्मा के पुत्र थे। प्रजापति का पुत्र होने के कारण वे देवताओं के प्रिय और अपने शुभ्र गुणों से समस्त लोक के प्रिय थे। धर्म में अनुरक्त वे मुनिपुंगव महागिरि मेरु के पार्श्व में तृणबिन्दु के आश्रम में जाकर रहने लगे।

स्वाध्याय में नियत-इन्द्रिय वह धर्मात्मा वहाँ तप करते थे। वह स्थान वृक्षों से भरा, सब ऋतुओं में रमणीय और भोग्य था; इसी से ऋषि, नाग और राजर्षि की कन्याएँ तथा अप्सराएँ प्रतिदिन वहाँ आकर गाती, खेलती, बजाती और नाचती थीं, और तपस्वी मुनि के तप में निर्दोष भाव से विघ्न डालती थीं। रुष्ट होकर महामुनि ने कहा कि जो मेरे दृष्टि-पथ में आएगी, वह गर्भ धारण करेगी। उस महात्मा का वचन सुनकर ब्रह्म-शाप के भय से वे कन्याएँ उस स्थान पर आना बन्द कर देती थीं।

तपस्वी पुलस्त्य कुटिया के पास बैठे; पीछे वन-पथ से एक राजकन्या सकुचाती हुई निकट आती।

परन्तु राजर्षि तृणबिन्दु की कन्या ने यह न सुना और निर्भय होकर आश्रम में विचरने लगी। वहाँ उसने अपनी किसी सखी को न पाया। उसी समय महातेजस्वी प्रजापति-पुत्र महर्षि तप से भावित होकर स्वाध्याय कर रहे थे। वेदध्वनि सुनकर और तप-निधि को देखकर उसका शरीर एकाएक पाण्डु (पीला) हो गया और गर्भ के लक्षण प्रकट हो गए। यह परिवर्तन देखकर वह उद्विग्न हुई और सोचने लगी कि यह क्या है। फिर वह अपने पिता के आश्रम में जाकर खड़ी हो गई।

कैकसी हाथ जोड़े वन में बैठे तपस्वी विश्रवा के सम्मुख संतान की कामना लेकर खड़ी।

उसे ऐसी अवस्था में देखकर तृणबिन्दु ने पूछा कि आपका शरीर अपने रूप से भिन्न क्यों लग रहा है। दीन होकर वह कन्या हाथ जोड़कर बोली कि हे तात, मैं इस परिवर्तन का कारण नहीं जानती। पहले मैं अकेली अपनी सखियों को ढूँढ़ने महर्षि पुलस्त्य के दिव्य आश्रम में गई थी। वहाँ मुझे कोई सखी न मिली, परन्तु अपने रूप का यह विपर्यय देखकर मैं त्रास से यहाँ आई हूँ।

एक युवा ऋषि हाथ जोड़े अपनी पत्नी सहित कुटिया के बाहर बैठे वृद्ध तपस्वी का आशीर्वाद लेते हुए।

तप से दीप्त राजर्षि तृणबिन्दु ध्यान में गए और जान गए कि यह ऋषि के कर्म से हुआ है। उस महर्षि का शाप जानकर वे अपनी कन्या को लेकर पुलस्त्य के पास गए और बोले, हे भगवन, हे महर्षि, अपने ही गुणों से विभूषित मेरी यह कन्या स्वयं आपके पास आई है; इस भिक्षा को स्वीकार कीजिए। तपश्चर्या में थके आपकी श्रमित इन्द्रियों की यह सदा शुश्रूषा करेगी, इसमें सन्देह नहीं। उस धार्मिक राजर्षि के ऐसे वचन सुनकर कन्या को ग्रहण करने की इच्छा से ब्राह्मण पुलस्त्य ने “बाढम् (बहुत अच्छा)” कहा।

कन्या देकर राजा अपने आश्रम लौट गए। वह कन्या वहीं रहकर अपने गुणों से पति को सन्तुष्ट करने लगी। उसके शील और आचरण से मुनिपुंगव तुष्ट हुए और प्रसन्न होकर बोले, हे सुश्रोणि, हे देवी, मैं आपके गुणों की सम्पदा से अत्यन्त प्रसन्न हूँ; इसलिए आज आपको अपने समान एक पुत्र दूँगा, जो दोनों वंशों का कर्ता होगा और “पौलस्त्य” नाम से प्रसिद्ध होगा। और क्योंकि मेरे वेद-पाठ करते समय आपने उसे सुना (विश्रवण किया), इसलिए वह निःसन्देह “विश्रवा” नाम से प्रसिद्ध होगा।

यह सुनकर वह देवी हृदय में प्रसन्न हुई और शीघ्र ही उसने विश्रवा नामक पुत्र को जन्म दिया, जो धर्म और यश से सम्पन्न होकर तीनों लोकों में प्रसिद्ध हुआ। श्रुतिमान, समदर्शी, व्रत-आचरण में रत वह विश्रवा मुनि अपने पिता के समान तप में लगे रहे।

सार: ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्य के शाप से तृणबिन्दु की कन्या गर्भवती हुई। तृणबिन्दु ने उसे पुलस्त्य को सौंप दिया। पुलस्त्य से उसके पुत्र विश्रवा का जन्म हुआ, जो आगे रावण-कुल का पिता बना।

वैश्रवण (कुबेर) का जन्म और लंका में निवास

पुलस्त्य-पुत्र मुनिपुंगव विश्रवा शीघ्र ही अपने पिता के समान तप में लग गए। वे सत्यवान, शीलवान, दान्त, स्वाध्याय-निरत, शुचि, समस्त भोगों में अनासक्त और नित्य धर्म-परायण थे। उनका आचरण जानकर महामुनि भरद्वाज ने अपनी देवी-सी रूपवती कन्या देववर्णिनी विश्रवा को विवाह में दी। धर्मपूर्वक भरद्वाज की कन्या को ग्रहण करके वे प्रजा और अपने श्रेय की कामना से पुत्र की चिन्ता करने लगे।

उस देववर्णिनी में विश्रवा ने वीर्य-सम्पन्न, ब्राह्मण के समस्त गुणों से युक्त एक परम अद्भुत पुत्र उत्पन्न किया। उसके जन्म पर पितामह (विश्रवा) सन्तुष्ट हुए; और यह देखकर कि वह लोक का कल्याण करेगा और धन का अध्यक्ष होगा, उन्होंने देवर्षियों के साथ मिलकर उसका नाम रखा। उन्होंने कहा कि क्योंकि यह विश्रवा का अपत्य है और रूप में पिता-सा है, इसलिए यह “वैश्रवण” नाम से प्रसिद्ध होगा।

तब वह महातेजस्वी वैश्रवण तपोवन में जाकर आहुति से सिंचित अग्नि-सा बढ़ने लगा। आश्रम में रहते उस महात्मा को विचार आया कि उसे परम धर्म का आचरण करना चाहिए, क्योंकि धर्म ही परम गति है। वह विशाल वन में सहस्रों वर्ष कठोर नियमों से इन्द्रियों को संयत करके अत्यन्त उग्र तप करता रहा। सहस्र वर्ष पूर्ण होने पर उसने उस-उस अवसर के अनुकूल विधि अपनाई; पहले जल पर, फिर वायु पर, और फिर निराहार रहकर तप किया। इस प्रकार सहस्रों वर्ष एक वर्ष-से बीत गए।

तब प्रसन्न होकर महातेजस्वी ब्रह्मा इन्द्र और देवगणों सहित उसके आश्रम पहुँचे और बोले, हे वत्स, हे सुव्रत, आपकी कुशल हो, मैं आपके इस कर्म से प्रसन्न हूँ; हे धर्मज्ञ, शीघ्र अपना अभीष्ट वर माँगिए, आपका परिश्रम व्यर्थ न जाए। तब हर्ष से गद्गद वाणी में सिर झुकाकर वैश्रवण ने कहा कि हे भगवन, मैं लोकपालत्व और लोकरक्षण चाहता हूँ। प्रसन्न-मन ब्रह्मा ने कहा, बाढम्; मैं चौथे लोकपाल की रचना करने ही जा रहा था। आप इन्द्र, वरुण और यम के समान चौथे लोकपाल बनेंगे; और यह सूर्य-सा प्रकाशमान पुष्पक नामक विमान वाहन के रूप में ग्रहण कीजिए, देवों के समान हो जाइए; आपकी कुशल हो, हम दो वर देकर ज्यों आए थे त्यों लौट जाते हैं। यह कहकर ब्रह्मा देवों सहित अपने स्थान को लौट गए।

ब्रह्मा और देवों के आकाश को लौट जाने पर, हाथ जोड़कर विनीत-आत्म धनेश ने अपने पिता से कहा कि हे भगवन, पितामह से तो मैंने इष्ट वर पा लिया, परन्तु उस प्रजापति ने मेरे निवास का स्थान नियत नहीं किया; हे प्रभु, मुझे कोई ऐसा साधु निवास बताइए जहाँ किसी प्राणी को पीड़ा न हो। इस प्रकार पुत्र के कहने पर मुनिपुंगव विश्रवा बोले, हे धर्मज्ञ, हे सत्तम, सुनो।

उन्होंने कहा, दक्षिण समुद्र के तट पर त्रिकूट नामक एक पर्वत है। उसके अग्रभाग पर महेन्द्र की पुरी-सी विशाल, विश्वकर्मा द्वारा निर्मित, रमणीय लंका नामक नगरी है, जो राक्षसों के निवास के लिए वैसी ही बनी थी जैसे इन्द्र के लिए अमरावती। उसकी प्राचीर और परिखा (खाई) स्वर्ण की है, वह यन्त्रों और शस्त्रों से युक्त है, और उसके तोरण (द्वार) स्वर्ण और वैदूर्य-मणि के बने हैं। बहुत पहले विष्णु के भय से पीड़ित राक्षसों ने उसे छोड़ दिया था; वे सब रसातल चले गए और अब लंका शून्य है, उसका कोई स्वामी नहीं। हे पुत्र, आप वहाँ लंका में निवास कीजिए, इसमें सन्देह नहीं; वहाँ आपका वास निर्दोष होगा और किसी को बाधा न होगी।

पिता के इस अत्यन्त धार्मिक वचन को सुनकर वह धर्मात्मा पर्वत के शिखर पर बसी लंका में रहने लगा। उसके शासन से शीघ्र ही वह नगरी हर्षित और प्रमुदित सहस्रों नैरृतों (राक्षसों) से भर गई। समुद्र को परिखा बनाए हुए उस लंका में विश्रवा-पुत्र, नैरृतों का धर्मात्मा वृषभ, प्रसन्न होकर रहने लगा। समय-समय पर वह विनीत-आत्म धनेश पुष्पक से अपने माता-पिता के दर्शन को जाता था। देव-गन्धर्व-गण उसकी स्तुति करते, अप्सराओं के नृत्य से उसका भवन सुशोभित था, और किरणों से सूर्य-सा प्रकाशित होकर वह विख्यात धनेश अपने पिता के समीप जाता था।

सार: विश्रवा और भरद्वाज-कन्या देववर्णिनी से वैश्रवण (कुबेर) का जन्म हुआ। तप से प्रसन्न ब्रह्मा ने उसे चौथा लोकपाल बनाया और पुष्पक विमान दिया। विश्रवा के परामर्श से वह शून्य पड़ी लंका में बस गया।

राक्षस-वंश का उद्भव: हेति, विद्युत्केश और सुकेश

अगस्त्य का वचन सुनकर राम विस्मय में पड़ गए और बोले, हे निष्पाप, यह तो बताइए कि कुबेर से भी पहले लंका में राक्षस कैसे रहते थे। तीन अग्नियों-सी प्रभा वाले अगस्त्य की ओर सिर हिलाकर बार-बार देखते हुए राम ने सुस्कार कर कहा, हे भगवन, आपके यह कहने से कि लंका पहले भी मांसाशियों की थी, मुझे परम विस्मय हुआ। हमने तो सुना है कि राक्षसों का उद्भव पुलस्त्य-वंश से हुआ, परन्तु अब आप उनका जन्म अन्यत्र से बताते हैं। क्या वे रावण, कुम्भकर्ण, प्रहस्त, विकट और रावण-पुत्रों से अधिक बलवान थे? हे ब्रह्मन, उनका पूर्वज कौन था, कौन वह बलोत्कट था, और किस अपराध के कारण विष्णु ने उन्हें कैसे भगाया? यह सब विस्तार से कहकर सूर्य के समान मेरी यह कौतूहल रूपी अन्धकार दूर कीजिए।

चतुर्मुख ब्रह्मा कमल पर विराजमान; नीचे सागर-जल से यक्ष-राक्षस जैसे प्राणी हाथ जोड़े प्रकट होते हुए।

राघव के संस्कारयुक्त शुभ वचन सुनकर विस्मित होते हुए अगस्त्य बोले। उन्होंने कहा, प्राचीनकाल में सलिल से उत्पन्न प्रजापति (ब्रह्मा) ने जल की रचना करके उनकी रक्षा के लिए जीवों को उत्पन्न किया। क्षुधा और पिपासा (भूख-प्यास) के भय से पीड़ित वे जीव विनीत होकर सत्त्व-कर्ता के पास गए और बोले, हम क्या करें। प्रजापति ने हँसते हुए-से कहा, यत्नपूर्वक इन जलों की “रक्षा कीजिए”। उनमें कुछ ने कहा “रक्षाम (हम रक्षा करेंगे)” और कुछ ने कहा “यक्षाम (हम पूजा करेंगे)”। तब ब्रह्मा ने कहा, जिन्होंने कहा “रक्षाम” वे राक्षस हों, और जिन्होंने कहा “यक्षाम” वे यक्ष हों।

एक उप-कथा: “राक्षस” और “यक्ष” नामों की यह व्युत्पत्ति शब्द-क्रीड़ा पर आधारित है: रक्षाम (रक्षा करना) से राक्षस और यक्षाम (पूजा करना) से यक्ष। वाल्मीकि यहाँ यह संकेत देते हैं कि मूलतः ये जीव एक ही सृष्टि के थे, जो जल की रखवाली के लिए नियुक्त हुए; उनकी प्रकृति में भेद उनके अपने चुनाव से आया।

उन राक्षसों में हेति और प्रहेति दो भाई थे, जो राक्षसों के अधिपति और शत्रुदमन में मधु-कैटभ-समान थे। उनमें धार्मिक प्रहेति तपोवन चला गया, और हेति ने स्वयं विवाह का प्रयत्न किया। महामति हेति ने काल (यम) की बहन भया नामक महाभया कन्या से स्वयं विवाह किया। उस राक्षसपुंगव ने उससे विद्युत्केश नामक पुत्र उत्पन्न किया, और पुत्रवानों में श्रेष्ठ कहलाया। हेति-पुत्र दीप्त सूर्य-सी प्रभा वाला महातेजस्वी विद्युत्केश जल के मध्य कमल-सा बढ़ने लगा।

जब वह निशाचर भद्र यौवन को प्राप्त हुआ, तब उसके पिता ने उसके विवाह का यत्न किया। राक्षसपुंगव हेति ने अपने पुत्र के लिए सन्ध्या की कन्या को चुना, और सन्ध्या ने यह सोचकर कि कन्या अवश्य ही पराए को देनी होगी, अपनी सन्ध्या-तुल्य प्रभाव वाली कन्या सालकटंकटा को विद्युत्केश को दे दिया। उसे पाकर विद्युत्केश उसके साथ ऐसे रमने लगा जैसे इन्द्र पौलोमी (शची) के साथ।

कुछ काल बाद, हे राम, सालकटंकटा ने विद्युत्केश से गर्भ धारण किया, जैसे मेघमाला समुद्र से जल ग्रहण करती है। उस राक्षसी ने मन्दर पर्वत पर जाकर मेघ-गर्भ-सी प्रभा वाले उस पुत्र को जन्म दिया, जैसे गंगा ने अग्नि से उत्पन्न (शिव के) गर्भ को। विद्युत्केश के साथ रमण की इच्छा से वह अपने पुत्र को छोड़कर पति के साथ रमने चली गई। माता के त्यागे हुए उस शिशु ने मेघ-सा गर्जन किया। शरद्-सूर्य-सी द्युति वाले उस शिशु ने अपनी मुट्ठी मुख में रखकर धीरे-धीरे रुदन किया।

शिव-पार्वती नंदी पर आकाश मार्ग से जाते हुए, नीचे भूमि पर रोते राक्षस-शिशु सुकेश को देखते।

तब वृषभ पर सवार पार्वती-सहित शिव वायु-मार्ग से जाते हुए रुदन-स्वर सुनकर रुके। उमा के करुणा-भाव से त्रिपुर-सूदन भव (शिव) ने उस रोते राक्षस-बालक को देखा। अक्षर-अव्यय महादेव ने उस राक्षस-पुत्र को उसकी माता-सी अवस्था का (अर्थात तुरन्त युवा) बना दिया और अमर भी कर दिया। उमा ने भी राक्षस-स्त्रियों को यह वर दिया कि गर्भ का तत्काल लाभ हो, तत्काल प्रसूति हो, और शिशु तत्काल अपनी माता की अवस्था को प्राप्त हो जाए। शिव ने उसे आकाश में चलने वाली एक नगरी भी दी। तब वरदान से गर्वित वह महामति सुकेश शिव से धन और श्री पाकर पुरन्दर (इन्द्र) के समान आकाशगामी नगरी पर चढ़कर सर्वत्र विचरने लगा।

सार: राक्षस सृष्टि के आदि-काल से ही जल-रक्षक के रूप में बने। हेति, फिर विद्युत्केश, फिर सुकेश, इस वंश-परम्परा का आरम्भ हुआ। माता द्वारा त्यागे गए सुकेश को शिव-पार्वती ने अमरत्व और आकाशगामी नगरी का वर दिया।

सुकेश-पुत्र: माल्यवान, सुमाली और माली

धार्मिक और वर-प्राप्त राक्षस सुकेश को देखकर विश्वावसु-सी प्रभा वाले ग्रामणी नामक गन्धर्व ने अपनी द्वितीय श्री-सी, तीनों लोकों में विख्यात, रूप-यौवन-शालिनी कन्या देववती सुकेश को दी। वर-प्रदान से ऐश्वर्य पाए प्रिय पति को पाकर देववती ऐसे सन्तुष्ट हुई जैसे निर्धन धन पाकर। उसके साथ युक्त वह रजनीचर अंजन से निकले महागज-सा सुशोभित हुआ।

कालक्रम से, हे राघव, सुकेश ने उससे तीन अग्नियों-से तेजस्वी तीन पुत्र उत्पन्न किए: माल्यवान, सुमाली, और बलवानों में श्रेष्ठ माली। तीन त्रिनेत्र-से वे तीन पुत्र तीन लोकों-से अव्यग्र, तीन अग्नियों-से, तीन शक्तियों (प्रभुशक्ति, उत्साहशक्ति और मन्त्रशक्ति) से अत्युग्र, और तीन दोषों (वात, पित्त, कफ से उत्पन्न रोगों) से घोर थे। उपेक्षित व्याधियों-से वे बढ़ने लगे।

तप के बल से पिता का ऐश्वर्य और वर-प्राप्ति जानकर वे तीनों भाई कृतनिश्चय होकर मेरु पर तप करने गए। घोर नियम धारण करके, हे नृपसत्तम, उन राक्षसों ने सब प्राणियों के लिए भयावह घोर तप किया। सत्य, आर्जव और शम से युक्त, भूमि पर दुर्लभ उस तप से उन्होंने देव-असुर-मनुष्यों सहित तीनों लोकों को सन्तप्त किया। तब चतुर्मुख विभु (ब्रह्मा) श्रेष्ठ विमान पर सुकेश-पुत्रों के पास आकर बोले, मैं वरदाता हूँ। ब्रह्मा को इन्द्र-सहित देवगणों से घिरा वरदाता जानकर सब वृक्षों-से काँपते हुए हाथ जोड़कर बोले, हे देव, यदि हमारे तप से आराधित होकर वर देते हैं तो हम अजेय, शत्रुहन्ता, चिरजीवी, प्रभविष्णु और परस्पर अनुरक्त हों।

“ऐसा ही होगा” कहकर ब्राह्मण-वत्सल ब्रह्मा ब्रह्मलोक चले गए। वर पाकर और उससे निर्भय होकर वे तीनों राक्षस देव-असुरों को सताने लगे। उनसे पीड़ित देव, ऋषि और चारण नरक में पड़े मनुष्यों-से कोई रक्षक न पाते थे।

विश्वकर्मा प्रसन्न राक्षसों को स्वर्ण नगरी लंका का प्रतिरूप सौंपते हुए; पीछे पर्वत पर बसी नगरी।

हर्षित होकर वे राक्षस शिल्पियों में श्रेष्ठ अव्यय विश्वकर्मा के पास आए और बोले, हे महामति, आप ही देवों के लिए ओज-तेज-बल से युक्त भवन बनाते हैं; इस बार हमारे लिए भी हिमवान, मेरु या मन्दर पर महेश्वर के भवन-सा विशाल घर बनाइए। तब महाबाहु विश्वकर्मा ने उन्हें अमरावती-सा निवास बताया। उन्होंने कहा, दक्षिण समुद्र के तट पर त्रिकूट नामक पर्वत है। उसके पास सुवेल नामक एक और पर्वत है। मेघ-सी मध्यम चोटी पर, जिसकी चारों दिशाएँ टंकी (छेनी) से छिन्न होने के कारण पक्षियों तक के लिए दुष्प्राप्य हैं, मैंने इन्द्र की आज्ञा से तीस योजन चौड़ी और सौ योजन लम्बी, स्वर्ण-प्राचीर और स्वर्ण-तोरण से युक्त “लंका” नामक नगरी बनाई है। हे राक्षसपुंगवो, उस दुर्धर्ष नगरी में आप वैसे ही निवास कीजिए जैसे इन्द्र-सहित देवगण अमरावती में। बहुत राक्षसों से घिरे, लंका-दुर्ग को पाकर आप शत्रुओं के लिए दुराधर्ष और शत्रुसूदन हो जाएँगे।

समझने की कुंजी (स्थान): लंका का यह आदि-वर्णन इसे दक्षिण समुद्र के तट पर त्रिकूट पर्वत की मध्यम चोटी पर रखता है, तीस योजन चौड़ी और सौ योजन लम्बी। यह काव्यात्मक विशालता राक्षस-नगरी की अमरावती-तुल्य भव्यता दर्शाने के लिए है, ऐतिहासिक माप के रूप में नहीं।

विश्वकर्मा का वचन सुनकर वे राक्षसश्रेष्ठ सहस्रों अनुचरों सहित उस नगरी में जाकर रहने लगे। दृढ़ प्राचीर-परिखा वाली, सैकड़ों स्वर्ण-भवनों से युक्त लंका को पाकर वे रजनीचर हर्षित होकर बसे।

उसी काल में, हे रघुनन्दन, नर्मदा नामक एक गन्धर्वी थी, जिसकी ह्री, श्री और कीर्ति-सी द्युति वाली तीन कन्याएँ थीं। उस अराक्षसी ने पूर्णचन्द्र-से मुख वाली अपनी तीनों गन्धर्व-कन्याएँ ज्येष्ठता के क्रम से तीनों राक्षसेन्द्रों को दीं। उत्तरा-फाल्गुनी (भगदैवत) नक्षत्र में माता ने वे महाभागा कन्याएँ दीं। विवाह कर वे सुकेश-पुत्र अपनी पत्नियों के साथ ऐसे क्रीड़ा करने लगे जैसे देवता अप्सराओं के साथ।

माल्यवान की पत्नी सुन्दरी नामक सुन्दरी थी। उससे माल्यवान के ये पुत्र हुए: वज्रमुष्टि, विरूपाक्ष, राक्षस दुर्मुख, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, मत्त और उन्मत्त; और एक सुन्दर कन्या अनला भी हुई। सुमाली की पत्नी पूर्णचन्द्र-से मुख वाली, प्राणों से भी प्रिय केतुमती थी। उससे सुमाली के ये पुत्र हुए: प्रहस्त, अकम्पन, विकट, कालिकामुख, धूम्राक्ष, दण्ड, महाबल सुपार्श्व, संह्रादि, प्रघस और राक्षस भासकर्ण; तथा शुचि-स्मिता कन्याएँ राका, पुष्पोत्कटा, कैकसी और कुम्भीनसी।

माली की पत्नी वसुदा नामक रूपवती गन्धर्वी थी, जिसकी आँखें कमल-दल-सी थीं और जो यक्षियों में श्रेष्ठ-सी थी। उससे माली के ये पुत्र हुए: अनल, अनिल, हर और सम्पाति। ये माली के पुत्र आगे विभीषण के अमात्य बने। पुत्रों के सैकड़ों और निशाचरों से घिरे, अपने अत्यधिक पराक्रम से गर्वित वे तीनों राक्षसपुंगव इन्द्र-सहित देवों, ऋषियों, नागों और यक्षों को सताते थे। वायु-से संसार में घूमते, रण में मृत्यु-से तेजस्वी, वर-प्रदान से अत्यन्त गर्वित वे सदा यज्ञ-क्रियाओं में विघ्न डालते थे।

सार: सुकेश के तीन पराक्रमी पुत्र माल्यवान, सुमाली और माली ने तप से ब्रह्मा का वर पाया और विश्वकर्मा-निर्मित लंका में बसे। नर्मदा-कन्याओं से विवाह कर उनके अनेक पुत्र हुए, जिनमें प्रहस्त, धूम्राक्ष, विरूपाक्ष आदि आगे की कथा के पात्र हैं। ये तीनों भाई देवों और ऋषियों को सताते थे।

देवों की प्रार्थना और विष्णु का आगमन

माली, सुमाली और माल्यवान राक्षसों तथा उनके अग्रगामियों से मारे जा रहे देव और तपोधन ऋषि, भयार्त होकर देवदेव महेश्वर की शरण गए; जो जगत के सृष्टि-कर्ता और अन्त-कर्ता, अज, अव्यक्तरूपी, समस्त लोकों के आधार, आराध्य और परम गुरु हैं। काम और त्रिपुर के अरि (शत्रु) त्रिलोचन के पास जाकर भय से गद्गद स्वर में देव हाथ जोड़कर बोले।

उन्होंने कहा, हे भगवन, हे प्रजाध्यक्ष, पितामह के वर से उद्धत सुकेश-पुत्रों के शत्रु-बाधन से समस्त प्रजा पीड़ित है। हमारे शरण्य आश्रम अशरण्य कर दिए गए हैं। देवों को स्वर्ग से निकालकर वे स्वर्ग में देव-से क्रीड़ा करते हैं। वे रण में उद्धत होकर हमें सताते हैं कि “मैं विष्णु हूँ, मैं रुद्र, मैं ब्रह्मा, मैं देवराज, मैं यम, मैं वरुण, मैं चन्द्र और सूर्य हूँ”। हे देव, हम भयार्तों को अभय दीजिए; अशिव (उग्र) रूप धारण कर इन देवकण्टकों को मारिए।

समस्त देवों के यह कहने पर कपर्दी, नीललोहित शिव, जिनकी सुकेश के प्रति कुछ अपेक्षा थी, देवगणों से बोले। उन्होंने कहा, मैं इन्हें न मारूँगा, क्योंकि वे असुर मेरे लिए अवध्य हैं; परन्तु मैं वह मन्त्र (उपाय) बताता हूँ जो इन्हें मारेगा। हे महर्षियो, इसी उद्योग को सामने रखकर विष्णु की शरण जाइए, वही प्रभु इन्हें मारेंगे। तब जय-शब्द से महेश्वर का अभिनन्दन कर, निशाचरों से भयार्त वे विष्णु के समीप गए।

शंख-चक्र-धारी देव को प्रणाम और बहुमान कर, सम्भ्रान्त स्वर में वे सुकेश-पुत्रों के विषय में बोले। उन्होंने कहा, हे देव, वर-प्रदान से तीन अग्नियों-से उन तीन सुकेश-पुत्रों ने हमारे स्थानों पर आक्रमण कर उन्हें छीन लिया है। त्रिकूट-शिखर पर स्थित दुर्गम लंका नामक नगरी है; वहाँ बैठे क्षणदाचर (राक्षस) हम सबको सताते हैं। हे मधुसूदन, आप हमारे हित के लिए उन्हें मारिए; हम आपकी शरण आए हैं, हे सुरेश्वर, हमारी गति बनिए। हे देव, चक्र से इन उद्धत राक्षसों के कमल-से मुख काटकर यम को अर्पित कीजिए और सूर्य के हिम को पिघलाने-से हमारा भय दूर कीजिए।

देवों के यह कहने पर देवदेव जनार्दन ने शत्रुओं को भय देने वाला अभय देवों को देकर कहा। उन्होंने कहा, मैं ईशान के वर से उद्धत राक्षस सुकेश को जानता हूँ, और उसके पुत्रों को भी, जिनमें ज्येष्ठ माल्यवान है। मर्यादा का अतिक्रमण करने वाले इन राक्षसाधमों को मैं क्रुद्ध होकर मारूँगा; हे देवो, निर्ज्वर (निश्चिन्त) हो जाओ। प्रभविष्णु विष्णु से यह आश्वासन पाकर देव हर्षित होकर जनार्दन की प्रशंसा करते अपने-अपने स्थान को गए।

देवों के उद्योग को सुनकर निशाचर माल्यवान अपने दोनों वीर भाइयों से बोला। उसने कहा, देव और ऋषि शंकर के पास जाकर हमारे वध की कामना से बोले कि वर-बल से उद्धत घोररूप सुकेश-पुत्र हमें पद-पद पर सताते हैं; हम राक्षसों से अभिभूत हैं, हे प्रजापते, उन दुरात्माओं के भय से अपने घरों में नहीं रह सकते; हे त्रिलोचन, हमारे हित के लिए इन्हें मारिए। शंकर ने कहा कि ये सुकेश-पुत्र मेरे लिए रण में अवध्य हैं, पर मैं वह उपाय बताता हूँ जो इन्हें मारेगा। माल्यवान ने आगे कहा, हरि ने भयभीत देवों को हमारे वध की प्रतिज्ञा की है; इसलिए सोचो कि अब क्या करना उचित है।

माल्यवान ने स्मरण कराया कि उन्हीं नारायण ने हिरण्यकशिपु और अन्य सुरद्विषों का वध किया; नमुचि, कालनेमि, वीरश्रेष्ठ संह्राद, बहुमायी राधेय, धार्मिक लोकपाल, यमल, अर्जुन, हार्दिक्य, शुम्भ और निशुम्भ, तथा अन्य महाबल असुर-दानव, जो रण में कभी पराजित न हुए थे, सब नारायण के हाथों सैकड़ों-सहस्रों में मारे गए। यह जानकर हमें अपने सबके हित का उचित कार्य करना चाहिए; नारायण को जीतना कठिन है, जो इस समय हमें मारना चाहते हैं।

माल्यवान का वचन सुनकर सुमाली और माली अपने ज्येष्ठ भ्राता से ऐसे बोले जैसे अश्विनीकुमार इन्द्र से। उन्होंने कहा, हमने वेद पढ़े, दान और इष्ट किए, ऐश्वर्य का पालन किया, निरामय दीर्घ आयु पाई, और मार्ग में सुधर्म स्थापित किया। अप्रतिम शत्रु जीते गए; हमें मृत्यु का भय नहीं। नारायण, रुद्र, इन्द्र और यम सब हमारे सम्मुख खड़े होने से सदा डरते हैं। हे राक्षसेश्वर, विष्णु के द्वेष का कोई कारण नहीं; देवों के दोष से ही विष्णु का मन विचलित हुआ है। इसलिए आज ही हम सब एक होकर, परस्पर रक्षित होकर, उन्हीं देवों को मारें जिनसे यह वैर उठा है।

इस प्रकार मन्त्रणा करके वे बलवान राक्षसपुंगव समस्त सेना से घिरे, उद्योग की घोषणा कर, जम्भ-वृत्र-से क्रुद्ध होकर युद्ध को निकले। महाकाय महाबल राक्षस रथों, हाथियों और हाथी-से अश्वों से युद्ध को निकले; खच्चर, बैल, ऊँट, शिशुमार (डॉल्फिन), सर्प, मगर, कछुए, मछली, गरुड़-से पक्षी, सिंह, व्याघ्र, वराह, सृमर और चमर नामक मृग साथ थे। लंका के विनाश को देखकर अन्य प्राणी विमनस्क हो गए। सैकड़ों-सहस्रों में राक्षस श्रेष्ठ रथों पर देवलोक की ओर निकल पड़े; देव भी उसी मार्ग से (सम्मुख) आए।

तब काल की आज्ञा से भयावह भौम और अन्तरिक्ष के उत्पात राक्षसेन्द्रों के अभाव (विनाश) के लिए उठे। मेघों ने हड्डियाँ और गरम रक्त बरसाया; समुद्र अपनी सीमा लाँघ गए और पर्वत हिलने लगे। मेघ-से गर्जन करते अट्टहास छोड़ते दारुण और घोर-दर्शन प्राणी और सियारें भयानक हुँकार करने लगीं। तत्त्व (भूत) क्रम से विलीन होते-से दिखाई दिए, और मुख से ज्वाला उगलते गिद्धों का एक बड़ा चक्र राक्षस-दल पर काल-सा मँडराने लगा। रक्तपाद कपोत और सारिकाएँ वेग से उड़ गईं। कौए कर्कश बोले, बिलाव और हाथी आदि चीत्कार करने लगे।

उन उत्पातों की अवहेलना कर बल से गर्वित राक्षस मृत्यु-पाश में बँधे-से आगे बढ़ते गए, लौटे नहीं। ज्वलित अग्नि-से माल्यवान, सुमाली और महाबल माली राक्षसों के आगे चले। माल्यवान को राक्षस ऐसे आश्रय लेते थे जैसे देव ब्रह्मा को। माली के नेतृत्व में, महामेघ-से गर्जते उस राक्षस-दल ने देवलोक को जीतने की कामना से प्रयाण किया। देवदूत से राक्षसों के उद्योग को सुनकर प्रभु नारायण ने युद्ध का मन बनाया।

चतुर्भुज विष्णु गरुड़ पर आरूढ़, हाथों में चक्र, शंख, धनुष और गदा, मेघों के बीच उड़ते हुए।

दिव्य कवच धारण कर, सहस्र सूर्यों-सी द्युति वाले, बाणों से भरे दो निर्मल तरकश बाँधकर, श्रोणि-सूत्र और निर्मल खड्ग कसकर, शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष और खड्ग जैसे श्रेष्ठ आयुधों से सज्जित कमललोचन प्रभु पर्वत-से विशाल सुपर्ण गरुड़ पर सवार होकर राक्षसों के अभाव के लिए शीघ्र चले। गरुड़-पृष्ठ पर श्याम, पीताम्बर हरि मेरु-शिखर पर बिजली-सहित मेघ-से सुशोभित हुए। सिद्ध, देव, ऋषि, महोरग, गन्धर्व और यक्ष जिनकी स्तुति गा रहे थे, ऐसे चक्र-खड्ग-शार्ङ्ग-शंख-धारी असुरसेना-शत्रु विधिवत वहाँ पहुँचे।

गरुड़ के पंखों की वायु से राक्षसराज की सेना का एक भाग उड़ गया, उनकी पताकाएँ घूमने लगीं और शस्त्र हाथों से छूट गए; वह राक्षस-सेना नीले पर्वत-शिखर-सी चली, जैसे शिलाएँ खिसक गई हों। सहस्रों राक्षसों ने माधव को घेरकर रक्त-मांस से सने, युगान्त की अग्नि-से श्रेष्ठ आयुधों से उन पर प्रहार किया।

सार: राक्षसों से पीड़ित देव पहले शिव, फिर शिव के निर्देश पर विष्णु की शरण गए। विष्णु ने वध की प्रतिज्ञा की। माल्यवान, सुमाली और माली ने युद्ध का निश्चय किया और उत्पातों की उपेक्षा कर देवलोक की ओर बढ़े। गरुड़ पर सवार विष्णु संग्राम-भूमि में आ पहुँचे।

विष्णु द्वारा राक्षसों का संहार

जैसे मेघ वर्षा से पर्वत को बेधते हैं, वैसे ही गर्जते राक्षस-मेघ अस्त्र-वर्षा से पर्वत-से खड़े नारायण को सताने लगे। पीताम्बर श्याम-गौर विष्णु उन नील राक्षसों से ऐसे घिरे जैसे अंजन-पर्वत वर्षा करते मेघों से। टिड्डियाँ धान के खेत में, पतंगे अग्नि में, मधुमक्खियाँ अमृत-घट में, मगर समुद्र में, और प्रलय में लोक विष्णु में जैसे प्रवेश करते हैं, वैसे ही वज्र-वायु-मन-से वेग वाले राक्षसों के बाण हरि में प्रवेश करने लगे।

रथों, हाथियों और अश्वों पर सवार पर्वत-से विशाल राक्षसेन्द्र, तथा आकाश में खड़े पैदल योद्धा, बाण-शक्ति-ऋष्टि-तोमर से विष्णु को ऐसे निरुच्छ्वास (श्वासरहित) करने लगे जैसे प्राणायाम-व्यायाम ब्राह्मण को क्षण-भर श्वास रोक देते हैं। मीनों से सताए महोदधि-से राक्षसों से ताड़ित होकर दुर्धर्ष विष्णु ने शार्ङ्ग खींचकर राक्षसों पर बाण छोड़े। पूर्णायत (पूरी तरह तानकर) छोड़े, वज्र-से, मन-से वेग वाले तीक्ष्ण बाणों से विष्णु ने सैकड़ों-सहस्रों राक्षसों को छिन्न कर दिया।

गरुड़ पर सवार विष्णु महान शंख पाञ्चजन्य फूँकते हैं, जिसकी गूँज से राक्षस-सेना भयभीत होकर बिखर जाती है

राक्षसों को बाण-वर्षा से तितर-बितर कर, जैसे वायु वर्षा-मेघों को, पुरुषोत्तम ने अपना महाशंख पाञ्चजन्य फूँका। पूरे प्राण से फूँके उस शंखराज ने तीनों लोकों को व्यथित-सा करते हुए भीम गर्जना की। उस शंख की भयानक ध्वनि ने राक्षसों को ऐसे त्रस्त किया जैसे वन में गर्जता सिंह मदमत्त हाथियों को। शंख-नाद से अश्व खड़े न रह सके, हाथियों का मद उतर गया, और वीर रथों से गिर पड़े।

शार्ङ्ग से छूटे वज्र-से बाणों ने राक्षसों को बेधकर उनके शरीरों को छिन्न कर धरती में प्रवेश किया। नारायण के हाथ से छूटे बाणों से बिंधकर राक्षस वज्र-हत पर्वतों-से भूमि पर गिरे। विष्णु के चक्र से बने घावों से शत्रुओं के शरीर ऐसे रक्त बहाने लगे जैसे पर्वत स्वर्ण-धातु की धाराएँ। शंखराज की ध्वनि, शार्ङ्ग की टंकार और विष्णु का रव राक्षसों के रव को निगल गया। हरि ने अपने बाणों से उनकी हिलती गर्दनें, बाण, ध्वज, धनुष, रथ, पताकाएँ और तरकश काट डाले।

जैसे सूर्य से घोर किरणें, समुद्र से तरंगें, पर्वत से नागेन्द्र और मेघ से धाराएँ निकलती हैं, वैसे ही नारायण के शार्ङ्ग से छूटे बाण सैकड़ों-सहस्रों में सब दिशाओं में वेग से दौड़े। जैसे शरभ से सिंह, सिंह से हाथी, हाथी से व्याघ्र, व्याघ्र से चीते, चीते से कुत्ते, कुत्ते से बिलाव, बिलाव से सर्प, और सर्प से चूहे भागते हैं, वैसे ही प्रभविष्णु विष्णु से सब राक्षस भागे; कुछ धरती पर पड़े रहे।

सहस्रों राक्षसों को मारकर मधुसूदन ने वारिज (शंख) को ऐसे भर दिया (फूँका) जैसे सुरराज इन्द्र मेघ को जल से। नारायण के बाणों से त्रस्त और शंख-नाद से विह्वल भग्न राक्षस-सेना लंका की ओर भागी। नारायण के बाणों से आहत राक्षस-बल के भागने पर सुमाली ने बाण-वर्षा से रण में हरि को रोका। उसने नारायण को ऐसे ढक दिया जैसे हिम सूर्य को; और सत्त्व-सम्पन्न राक्षसों ने फिर धैर्य धारण किया।

तब बल से गर्वित वह राक्षस (सुमाली) रोष से, राक्षसों में मानो नया जीवन भरते हुए, महानाद करता हुआ टूट पड़ा। हाथी-से सूँड़-समान लम्बे आभरण वाला हाथ उठाकर वह राक्षस बिजली-सहित मेघ-सा गर्जा। गर्जते सुमाली के सारथि का ज्वलित कुण्डल वाला सिर हरि ने काट डाला; और उस राक्षस के अश्व भ्रान्त होकर दौड़ने लगे। उन भ्रान्त अश्वों से सुमाली राक्षसेश्वर ऐसे इधर-उधर घूमने लगा जैसे चंचल इन्द्रिय-रूपी अश्वों से धैर्यहीन मनुष्य।

तब रणाजिर (युद्ध-भूमि) में टूट पड़ते महाबाहु विष्णु पर, जब सुमाली अश्वों से रथ में खिंच रहा था, माली बाण-सहित धनुष लेकर विष्णु के रथ की ओर दौड़ा। माली के धनुष से छूटे स्वर्ण-भूषित बाण क्रौंच पर्वत में पक्षियों-से हरि के शरीर में घुस गए। माली के सहस्रों बाणों से बिंधकर भी विष्णु रण में ऐसे विचलित न हुए जैसे मानसिक व्यथाओं से जितेन्द्रिय। तब मौर्वी (प्रत्यंचा) की ध्वनि कर भगवान भूतभावन ने माली पर बाण-समूह छोड़े। वज्र-बिजली-सी प्रभा वाले वे बाण माली के शरीर में पहुँचकर ऐसे उसका रक्त पीने लगे जैसे नाग अमृत।

रथ छिन जाने पर हाथ में गदा लिए माली उछलकर गरुड़ के माथे पर गदा मारता है, जिससे वह महान पक्षी लड़खड़ा जाता है

माली को विमुख कर शंख-चक्र-गदा-धारी हरि ने माली का मुकुट, ध्वज, धनुष और अश्व गिरा दिए। विरथ होकर माली, निशाचरश्रेष्ठ, गदा लेकर गिरि-शिखर से सिंह-सा कूदा। उसने गदा से गरुड़ के ललाट पर ऐसे प्रहार किया जैसे अन्तक ने ईशान पर, या इन्द्र अपने वज्र से पर्वत पर। माली की गदा से भृशम् (भारी) आहत गरुड़ वेदना से व्यथित होकर देव को रण से पराङ्मुख कर गया।

विष्णु गरुड़ पर से राक्षस सेना पर बाणों की वर्षा करते हुए; नीचे घायल राक्षस गिरते।

देव के माली-गरुड़ द्वारा पराङ्मुख होने पर गर्जते राक्षसों का महान शब्द उठा। राक्षसों का रव सुनकर हरि के अनुज (इन्द्र के अनुज, विष्णु) क्रुद्ध हुए और पक्षीन्द्र पर तिरछे बैठकर भी पराङ्मुख ही माली के वध की इच्छा से चक्र छोड़ा। सूर्यमण्डल-सी आभा वाले, अपनी प्रभा से आकाश को प्रकाशित करते उस कालचक्र-से चक्र ने माली का सिर गिरा दिया। राक्षसेन्द्र का वह विभीषण (भयानक) सिर चक्र से कटकर रक्त उगलता हुआ पुराने राहु-शिर-सा भूमि पर गिरा।

तब सम्प्रहृष्ट देवों ने पूरे प्राण से सिंहनाद-सा रव छोड़ा, “साधु देव” (धन्य हो देव) कहते हुए। माली को मरा देख सुमाली और माल्यवान, शोक-सन्तप्त होकर शेष सेना सहित लंका की ओर भागे। आश्वस्त होकर क्रुद्ध गरुड़ ने लौटकर पहले-सा पंख-वात से राक्षसों को भगा दिया। चक्र से जिनके मुख-कमल कटे, गदा से वक्ष चूर हुए, हल से ग्रीवाएँ छिन्न हुईं, मूसल से मस्तक टूटे, खड्ग से जो छिन्न हुए, और बाणों से ताड़ित हुए, वे राक्षस आकाश से शीघ्र समुद्र-जल में गिरने लगे।

हरि बाण-जाल से रोके जाने पर भी, अपने बाण-जाल से तीक्ष्ण बाणों से नारायण ने केश बिखेरे राक्षसों को ऐसे विदीर्ण किया जैसे बिजली-सहित महामेघ पर्वतों को। फटे छत्र, गिरते शस्त्र, बाणों से चिथड़े वस्त्र, बाहर निकली आँतें और भय से चंचल नेत्र वाली वह सेना अत्यन्त उन्मत्त-सी हो गई। सिंह से सताए हाथियों-से उस राक्षस-दल का रव और वेग पुराने नृसिंह से मर्दित हाथियों-सा हुआ। चक्र-प्रहार से छिन्न-शीर्ष, गदा-प्रहार से चूर्ण-अंग, खड्ग-प्रहार से द्विधा-भिन्न राक्षसेन्द्र वज्र-हत पर्वतों-से गिरने लगे। नील-मेघ-से, मणि-हार-कुण्डल लटकाए गिराए जाते राक्षसों से धरती ऐसी ढकी दिखी मानो नीले पर्वत गिरा दिए गए हों।

सार: विष्णु ने शार्ङ्ग के बाणों और पाञ्चजन्य शंख से राक्षस-सेना को छिन्न-भिन्न किया। सुमाली भागा, माली ने डटकर लड़ा और गरुड़ को घायल भी किया, पर अन्ततः विष्णु के चक्र से माली का सिर कट गया। माली के वध से राक्षस-सेना पराजित हुई।

माल्यवान का अन्तिम युद्ध और राक्षसों का पाताल-प्रवेश

जब पद्मनाभ विष्णु उस भागती सेना को पीछे से मार रहे थे, तब माल्यवान तट को छूकर लौटते समुद्र-सा फिर युद्ध को लौटा। रक्त-नयन, क्रोध से डोलते मुकुट वाला वह निशाचर पद्मनाभ पुरुषोत्तम से बोला। उसने कहा, हे नारायण, आप पुरातन क्षात्र-धर्म नहीं जानते; अयुद्ध-मनस्क, भयभीत हम लोगों को आप किसी अनजान-से मार रहे हैं। हे सुरेश्वर, जो पराङ्मुख-वध का पाप करता है, वह हन्ता पुण्यकर्मियों के स्वर्ग को नहीं पाता। हे शंख-चक्र-गदा-धारी, यदि आपको युद्ध की श्रद्धा है तो मैं खड़ा हूँ; अपना बल दिखाइए जिसे मैं देख सकूँ।

अन्तिम मोर्चे पर माल्यवान अपनी घण्टियों वाली शक्ति विष्णु की छाती में भोंकता है, और वह शस्त्र बिजली-सा चमकता है

माल्यवान को माल्यवान पर्वत-सा अचल खड़ा देख इन्द्र के अनुज बलवान विष्णु ने उस राक्षसेन्द्र से कहा। उन्होंने कहा, मैंने आपसे भयभीत देवों को अभय और राक्षसों के उच्छेद का जो वचन दिया है, उसी का पालन कर रहा हूँ। देवों का प्रिय कार्य मुझे प्राणों से भी करना है; इसलिए आप रसातल चले जाएँ तो भी मैं आप सबको मारूँगा। लाल-कमल-से नेत्र वाले देवदेव के यह कहते ही क्रुद्ध राक्षसेन्द्र ने शक्ति (बरछी) से उनके वक्षस्थल को बेध दिया। माल्यवान की भुजा से छूटी, घण्टा-सी ध्वनि करती वह शक्ति हरि के वक्ष पर मेघस्थ बिजली-सी चमकी।

तब उसी शक्ति को खींचकर शक्तिधर (स्कन्द) के प्रिय कमललोचन हरि ने माल्यवान को लक्ष्य कर फेंका। गोविन्द के हाथ से छूटी वह शक्ति स्कन्द द्वारा छोड़ी-सी, राक्षस को खोजती हुई महाउल्का-सी अंजन-पर्वत की ओर चली। हार-भार से सुशोभित उसके विशाल वक्ष पर वह राक्षसेन्द्र पर गिरि-कूट पर अशनि (वज्र)-सी गिरी। उससे शरीर-त्राण (कवच) फटने पर माल्यवान विपुल अन्धकार (मूर्च्छा) में डूब गया; फिर आश्वस्त होकर पर्वत-सा अचल खड़ा हो गया।

तब उसने अनेक काँटों से जड़े लोहे के शूल को लेकर देव के दोनों स्तनों के बीच दृढ़ प्रहार किया। फिर युद्ध में रक्त रंजित वह निशाचर इन्द्र के अनुज को मुष्टि से मारकर धनुष-भर पीछे हटा। तब आकाश में “साधु-साधु” का महाशब्द उठा। विष्णु को मारकर उस राक्षस ने गरुड़ को भी पीटा। तब क्रुद्ध गरुड़ ने पंख-वात से उस राक्षस को ऐसे उड़ा दिया जैसे प्रबल वायु सूखे पत्तों के ढेर को।

द्विजेन्द्र गरुड़ के पंख-वात से अपने बड़े भाई माल्यवान को उड़ता देख सुमाली अपनी सेना सहित लंका की ओर भागा। पंख-वात के बल से उड़ाया गया राक्षस माल्यवान भी लज्जा से ढका, अपनी सेना से मिलकर लंका को गया। इस प्रकार, हे कमललोचन राम, वे राक्षस हरि से संग्राम में बार-बार भग्न हुए और उनके प्रवर नायक मारे गए। विष्णु के बल से पीड़ित, उनसे प्रतियुद्ध करने में असमर्थ वे राक्षस लंका छोड़कर अपनी पत्नियों सहित पाताल में बसने चले गए।

हे रघुसत्तम, सालकटंकटा के वंश में जन्मे सुमाली के आश्रय में, अपने पराक्रम से प्रख्यात वे योद्धा वहाँ (पाताल में) रहने लगे। सुमाली, माल्यवान, माली और उनके अग्रगामी सब महाभाग रावण से भी बलवान थे; और जो राक्षस आपने मारे, वे पुलस्त्य-वंश के थे। शंख-चक्र-गदा-धारी देव नारायण के बिना अन्य कोई इन देव-शत्रु राक्षसों का हन्ता न था। आप ही सनातन, चतुर्बाहु देव नारायण हैं; आप अजेय, अव्यय प्रभु राक्षसों के संहार के लिए ही उत्पन्न हुए हैं। शरणागत-वत्सल आप, हे सृष्टिकर्ता, धर्म-व्यवस्था के नष्ट होने पर समय-समय पर दस्युओं के वध के लिए प्रकट होते हैं।

अगस्त्य ने कहा, हे नराधिप, मैंने आज आपको राक्षसों की समस्त उत्पत्ति यथावत कह दी। हे रघुसत्तम, अब रावण और उसके पुत्र के जन्म तथा उनके अतुल प्रभाव की कथा सुनिए। विष्णु के भय से पीड़ित वह बलवान राक्षस सुमाली बहुत काल तक पुत्र-पौत्रों सहित रसातल में विचरता रहा; और इस बीच वैश्रवण (कुबेर) ने लंका में निवास किया।

सार: माल्यवान ने अकेले विष्णु से डटकर युद्ध किया, पर अन्ततः गरुड़ के पंख-वात से उड़ा दिया गया। हारकर सब राक्षस लंका छोड़ पाताल में बस गए। राम के मारे राक्षस पुलस्त्य-वंशी थे, जबकि माल्यवान-सुमाली-माली का यह वंश उससे भिन्न और अधिक बलवान था। अब रावण-जन्म की कथा आरम्भ होती है।

रावण का जन्म और गोकर्ण में तप का निश्चय

राक्षसराज सुमाली अंधेरी ज्वालामयी नगरी से अपनी पुत्री कैकसी का हाथ थामे बाहर आते हुए।

कुछ काल बाद सुमाली नामक राक्षस रसातल से मर्त्यलोक में निकलकर सारी पृथ्वी पर विचरने लगा। नील-मेघ-सा, तपे स्वर्ण के कुण्डल पहने, वह अपनी कन्या को हाथ से पकड़े था, जो बिना कमल की लक्ष्मी-सी थी। पृथ्वी पर विचरते उस राक्षसेन्द्र ने एक दिन पुष्पक से, अपने पिता पुलस्त्य-पुत्र विभु विश्रवा के दर्शन को जाते धनेश (कुबेर) को देखा। अमर-से, पावक-से जाते उसे देखकर वह मर्त्यलोक से विस्मय-सहित रसातल में लौट आया और सोचने लगा, क्या करें कि श्रेय हो, हम कैसे उन्नत हों।

तब उस राक्षस ने कैकसी नामक अपनी कन्या से कहा। उसने कहा, हे पुत्री, आपका यौवन व्यतीत हो रहा है, यह आपको देने का समय है; अस्वीकार के भय से वर आपको माँगते नहीं। हे पुत्रिके, आपके लिए हम सब धर्मबुद्धि से प्रयत्नशील रहे; आप साक्षात लक्ष्मी-सी सर्वगुण-सम्पन्ना हैं। कन्या का पिता होना मान-कांक्षियों के लिए दुःख है, क्योंकि नहीं जाना जाता कि कौन कन्या को वरेगा। कन्या सदा तीन कुलों (माता-कुल, पिता-कुल और जहाँ दी जाए उस कुल) को संशय में रखती है। इसलिए, हे पुत्री, आप स्वयं प्रजापति-कुल में उत्पन्न मुनिवर श्रेष्ठ पौलस्त्य विश्रवा को पति-रूप में वरें। हे पुत्री, आपको उन धनेश (कुबेर)-से, सूर्य-से तेजस्वी पुत्र होंगे, इसमें सन्देह नहीं।

पिता का यह वचन सुनकर पिता के गौरव से वह कन्या वहाँ गई और खड़ी हो गई जहाँ विश्रवा तप कर रहे थे। उसी बीच, हे राम, पुलस्त्य-पुत्र विश्रवा द्विज चौथी अग्नि-से अग्निहोत्र (हवन) कर रहे थे। पिता के गौरव से उस दारुण (अशुभ) वेला का विचार न कर वह उनके सामने जाकर अधोमुख, चरणों पर दृष्टि गड़ाए, पैर के अँगूठे से बार-बार भूमि कुरेदती खड़ी हो गई। पूर्णचन्द्र-से मुख वाली, अपने तेज से दीप्त उस सुश्रोणि को देखकर परम उदार मुनि बोले, हे भद्रे, आप किसकी कन्या हैं, कहाँ से आई हैं, क्या प्रयोजन है, सच बताइए, हे शोभने।

ऐसा पूछे जाने पर वह कन्या हाथ जोड़कर बोली, हे मुनि, आप अपने प्रभाव से मेरा मनोभाव जान सकते हैं। हे ब्रह्मर्षि, इतना जानिए कि मैं पिता की आज्ञा से आई हूँ; मेरा नाम कैकसी है; शेष आप स्वयं जान लीजिए। तब मुनि ध्यान में गए और बोले, हे भद्रे, आपके मन का कारण मैंने जान लिया। हे मत्तमातंगगामिनी (मतवाले हाथी-सी चाल वाली), आप मुझसे सन्तान चाहती हैं; परन्तु क्योंकि आप इस दारुण वेला में मेरे पास आई हैं, इसलिए सुनिए कि कैसी सन्तान जन्म देंगी, दारुण, दारुण-आकार, दारुण कुल को प्रिय। हे सुश्रोणि, आप क्रूर-कर्मा राक्षस जन्म देंगी।

यह सुनकर वह प्रणाम कर बोली, हे भगवन, आप ब्रह्मवादी से मैं ऐसे सुदुराचारी पुत्र नहीं चाहती; प्रसन्न होइए। उसके यह कहने पर पूर्णचन्द्र-से विश्रवा रोहिणी-सी उस कैकसी से फिर बोले, हे शुभानने, आपका जो अन्तिम पुत्र होगा, वह पिऔस-मन वाला और मेरे वंश के अनुरूप धर्मात्मा होगा, इसमें सन्देह नहीं।

कैकसी की गोद में दस सिर और अनेक भुजाओं वाला नवजात रावण, दीपों से आलोकित कक्ष।

ऐसा कहे जाने पर, हे राम, कुछ काल बाद उस कन्या ने दस सिर, बड़ी दाढ़ों, नील-अंजन-राशि-सा, ताम्र-ओष्ठ, बीस भुजाओं, विशाल मुख और दीप्त केश वाले अत्यन्त दारुण, बीभत्स राक्षस-रूप को जन्म दिया। उसके जन्म पर ज्वाला उगलती सियारें और मांसाशी पशु अपसव्य (बाएँ से दाएँ) मण्डल बनाने लगे। मेघ रक्त बरसाने लगे, खर-स्वर से गरजे, सूर्य प्रकाशित न हुआ, और महाउल्काएँ भूमि पर गिरीं। पृथ्वी काँपी, सुदारुण वायु बहीं, और अक्षोभ्य समुद्र क्षुब्ध हो उठा। तब पितामह-सम पिता ने उसका नाम रखा कि क्योंकि यह दस ग्रीवाओं से उत्पन्न हुआ है, यह “दशग्रीव” होगा।

उसके पश्चात महाबल कुम्भकर्ण उत्पन्न हुआ, जिसके प्रमाण से बढ़कर विशाल प्रमाण भूमि पर किसी का नहीं। फिर विकृत-मुख वाली शूर्पणखा उत्पन्न हुई। और कैकसी का अन्तिम पुत्र धर्मात्मा विभीषण हुआ। उस महासत्त्व के जन्म पर पुष्पवृष्टि हुई, आकाश में देवों की दुन्दुभियाँ बजीं, और अन्तरिक्ष में “साधु-साधु” का वचन हुआ।

उस महावन में महौजस्वी कुम्भकर्ण और दशग्रीव, लोक को उद्वेग देने वाले, बढ़ने लगे। प्रमत्त कुम्भकर्ण तीनों लोकों में नित्य असन्तुष्ट धर्म-प्रिय महर्षियों को भक्षण करता विचरता था। पर धर्मात्मा विभीषण नित्य धर्म में स्थित, स्वाध्याय में नियताहार, जितेन्द्रिय रहकर रहता था।

अब कुछ काल बाद वैश्रवण देव धनेश (कुबेर) पुष्पक से अपने पिता के दर्शन को आए। तेज से दीप्त-से उन्हें देखकर वहाँ कैकसी राक्षसी ने आकर दशग्रीव से कहा। उसने कहा, हे पुत्र, अपने तेजोयुक्त भाई वैश्रवण को देखिए; और भ्रातृ-भाव में समान होकर भी अपने को ऐसा (दीन) देखिए। हे अमित-विक्रम दशग्रीव, यत्न कीजिए कि आप भी मेरे पुत्र वैश्रवण-समान बनें।

माता का वह वचन सुनकर प्रतापवान दशग्रीव अतुल अमर्ष (ईर्ष्या) से भर गया और प्रतिज्ञा की। उसने कहा, मैं आपसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ कि ओज में भाई-तुल्य या अधिक हो जाऊँगा; हृदय का सन्ताप त्यागिए। तब उसी क्रोध से दशग्रीव अपने अनुजों सहित दुष्कर कर्म करने की इच्छा से, तप में मन लगाकर, “तप से अपना अभीष्ट पाऊँगा”, ऐसा निश्चय कर आत्म-सिद्धि के लिए गोकर्ण के शुभ आश्रम में आया। उग्र-विक्रम वह राक्षस अनुजों सहित वहाँ अतुल तप करके विभु पितामह को सन्तुष्ट करने लगा, और तुष्ट होकर ब्रह्मा ने उन्हें विजय-दायक वर दिए।

सार: सुमाली की कन्या कैकसी विश्रवा के पास गई। अशुभ वेला में सम्बन्ध होने से उसके दशग्रीव (रावण), कुम्भकर्ण और शूर्पणखा क्रूर हुए, पर अन्तिम पुत्र विभीषण धर्मात्मा हुआ। सौतेले भाई कुबेर के वैभव से ईर्ष्या कर रावण ने अनुजों सहित गोकर्ण में तप का निश्चय किया।

तप और वरदान

राम ने मुनि से पूछा, हे ब्रह्मन, उन महाबल भाइयों ने वन में कैसा तप किया। अगस्त्य ने सुप्रीत-मन राम से कहा कि उन भाइयों ने अपने-अपने अनुकूल धर्म-विधियाँ अपनाईं।

तीन दृश्यों में कुंभकर्ण की कठोर तपस्या: ग्रीष्म की अग्नियों के बीच, वर्षा में और हिम-जल में।

नित्य धर्म-पथ में स्थित कुम्भकर्ण ग्रीष्म में चारों ओर पंचाग्नि के बीच (और ऊपर सूर्य) खड़े होकर तप करता था; वर्षा में मेघजल से सिक्त वीरासन धारण करता; और शिशिर में सदा जल के मध्य रहता। इस प्रकार धर्म में प्रयत्नशील, सत्पथ में स्थित उसके दस सहस्र वर्ष बीते। शुचि, नित्य धर्मपरायण धर्मात्मा विभीषण पाँच सहस्र वर्ष एक पैर पर खड़ा रहा; नियतात्मा विभीषण के दस सहस्र वर्ष ऐसे बीते मानो वह नन्दनवन में रहा हो। दशानन दस सहस्र वर्ष निराहार रहा, और प्रति सहस्र वर्ष पूर्ण होने पर अपना एक सिर अग्नि में हवन कर देता।

इस प्रकार नौ सहस्र वर्ष बीते और उसके नौ सिर अग्नि में चले गए। दसवें सहस्र वर्ष में जब दशग्रीव अपना दसवाँ सिर काटने को था, तब पितामह ब्रह्मा वहाँ प्रकट हुए। सुप्रीत ब्रह्मा देवों सहित खड़े होकर बोले, हे दशग्रीव, मैं आपसे प्रसन्न हूँ; हे धर्मज्ञ, शीघ्र अपना अभीष्ट वर माँगिए; आपका परिश्रम व्यर्थ न जाए। तब प्रहृष्ट-अन्तरात्मा दशग्रीव ने देव को सिर झुकाकर हर्ष-गद्गद वाणी में कहा, हे भगवन, प्राणियों को नित्य मृत्यु के अतिरिक्त कोई भय नहीं; मृत्यु-सा शत्रु नहीं; मैं अमरत्व माँगता हूँ।

चतुर्मुख ब्रह्मा कमल पर प्रकट होकर नीचे हाथ जोड़े बैठे दस सिर वाले रावण को दर्शन देते हुए।

तब ब्रह्मा बोले, आपके लिए पूर्ण अमरत्व सम्भव नहीं; कोई अन्य वर माँगिए। दशग्रीव ने हाथ जोड़कर कहा, हे प्रजाध्यक्ष, हे शाश्वत, मैं सुपर्ण (गरुड़), नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस और देवों से अवध्य होना चाहता हूँ; हे अमरपूजित, मनुष्य आदि अन्य प्राणियों की मुझे चिन्ता नहीं, वे मेरे लिए तृण-तुल्य हैं। ऐसा कहे जाने पर ब्रह्मा ने कहा, हे राक्षसपुंगव, ऐसा ही होगा; और सुनिए, प्रसन्न होकर मैं आपको एक और शुभ वर देता हूँ; पहले आपने जो सिर अग्नि में हवन किए, हे राक्षस, वे फिर पूर्ववत हो जाएँगे; और हे सौम्य, मैं आपको एक और दुर्लभ वर देता हूँ कि आप इच्छानुसार रूप धारण कर सकेंगे। ऐसा कहते ही दशग्रीव के अग्नि में हवन किए सिर फिर उठ आए।

एक उप-कथा: रावण के वरदान में एक गहरी विडम्बना छिपी है। उसने सुपर्ण, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस और देवों से अवध्यता माँगी, पर मनुष्यों को तुच्छ समझकर उन्हें छोड़ दिया। यही चूक आगे राम (मनुष्य-रूप विष्णु) के हाथों उसके वध का द्वार खोलती है। वरदान की हर शर्त में उसका अहंकार ही उसके पतन का बीज बोता गया।

दशग्रीव से ऐसा कहकर लोक-पितामह ब्रह्मा विभीषण से बोले, हे वत्स विभीषण, हे धर्म-संहित-बुद्धि वाले धर्मात्मा, मैं आपसे परम सन्तुष्ट हूँ; हे सुव्रत, वर माँगिए। चन्द्र को किरणों-से सर्वगुणों से युक्त धर्मात्मा विभीषण हाथ जोड़कर बोले, हे भगवन, मैं कृतकृत्य हूँ कि स्वयं लोकगुरु मुझ पर प्रसन्न हैं। हे सुव्रत, यदि प्रसन्न होकर वर देते हैं तो सुनिए; परम आपत्ति में भी मेरी मति धर्म में रहे; मुझे ब्रह्मास्त्र बिना सिखाए ही स्फुरित हो; और जिस-जिस आश्रम में मेरी जैसी-जैसी बुद्धि उठे, वह धर्मिष्ठ हो और मैं उस-उस धर्म का पालन करूँ; हे परम उदार, यह मैं परम-एक वर मानता हूँ।

ब्रह्मा स्वर्णिम आकाश में कमल पर विराजकर घुटनों पर बैठे दसानन रावण को वरदान देते हुए।

ब्रह्मा ने कहा, धर्म में अनुरक्तों के लिए लोक में कुछ दुर्लभ नहीं; हे वत्स, आप जैसे धर्मिष्ठ हैं, वैसा ही होगा। हे शत्रुनाशन, क्योंकि राक्षस-योनि में जन्म लेकर भी आपकी बुद्धि अधर्म में नहीं जाती, इसलिए मैं आपको अमरत्व देता हूँ।

विभीषण को ऐसा कहकर जब ब्रह्मा कुम्भकर्ण को वर देने को तत्पर हुए, तब समस्त देव हाथ जोड़कर बोले, आप कुम्भकर्ण को वर न दें; आप जानते हैं कि यह दुर्मति तीनों लोकों को त्रास देता है। हे ब्रह्मन, इसने नन्दनवन की सात अप्सराएँ, महेन्द्र के दस अनुचर, तथा ऋषि और मनुष्य भक्षण किए हैं। बिना वर के इसने इतना उत्पात किया, तो वर पाकर तीनों लोकों को खा जाएगा। हे अमित-प्रभ, वर के बहाने इस पर मोह डाल दीजिए; इससे लोकों का कल्याण होगा और इसका मान भी रहेगा।

वीणाधारिणी सरस्वती वरदान के क्षण लेटे हुए कुंभकर्ण के निकट खड़ीं; ऊपर कमल पर ब्रह्मा विराजमान।

देवों के यह कहने पर पद्मसम्भव ब्रह्मा ने अपनी पत्नी सरस्वती का स्मरण किया। स्मरण करते ही देवी सरस्वती उनके पास आ खड़ी हुईं और हाथ जोड़कर बोलीं, हे देव, मैं आ गई हूँ, क्या करूँ। ब्रह्मा ने कहा, हे वाणी, राक्षसेन्द्र के मुख में देवों की इच्छित वाक्-देवता बन जाओ। “तथास्तु” कहकर वे कुम्भकर्ण के मुख में प्रविष्ट हुईं। तब ब्रह्मा बोले, हे महाबाहु कुम्भकर्ण, अपना अभीष्ट वर माँगो। यह सुनकर सरस्वती-प्रेरित कुम्भकर्ण ने कहा, हे देवदेव, मेरी इच्छा है कि मैं अनेक वर्ष सोऊँ। “ऐसा ही हो” कहकर ब्रह्मा देवों सहित चले गए, और सरस्वती ने भी राक्षस को छोड़ दिया।

ब्रह्मा और देवों के आकाश को जाने और सरस्वती के छोड़ने पर दुष्टात्मा कुम्भकर्ण होश में आकर दुःखित होकर सोचने लगा कि मेरे मुख से ऐसा वचन कैसे निकला; मैं समझता हूँ कि तब आए देवों ने मुझे मोह में डाल दिया। इस प्रकार दीप्त-तेज वाले वे सब भाई वर पाकर श्लेष्मातक वन में जाकर सुख से रहने लगे।

सार: रावण ने तप से नौ सिर हवन किए; ब्रह्मा ने प्रकट होकर उसे देव, यक्ष, नाग आदि से अवध्यता, सिर लौटने और इच्छारूप का वर दिया (मनुष्यों को उसने तुच्छ माना)। विभीषण ने धर्म-निष्ठा और अमरत्व माँगा। कुम्भकर्ण की जीभ पर सरस्वती बैठ गईं और उसने अनेक वर्षों की निद्रा माँग ली।

कुबेर का लंका-त्याग और रावण का राज्याभिषेक

फिर इन निशाचरों को वर-प्राप्त जानकर भय त्यागकर सुमाली अपने अनुचरों सहित रसातल से उठा। मारीच, प्रहस्त, विरूपाक्ष और महोदर, उस राक्षस के सचिव भी अत्यन्त उत्साह से उठे। सचिवों और राक्षसपुंगवों से घिरा सुमाली दशग्रीव के पास आया और आलिंगन कर बोला। उसने कहा, हे वत्स, सौभाग्य है कि आपने चिन्तित मनोरथ पाया; आपने त्रिभुवनश्रेष्ठ ब्रह्मा से उत्तम वर पाया। हे महाबाहु, विष्णु से प्रेरित जो महाभय हमें था (जिसके कारण लंका छोड़कर हम रसातल गए) वह अब चला गया। उस भय से बार-बार भग्न होकर अपना घर छोड़, सबके सब अनुचरों सहित रसातल में जा घुसे।

सुमाली ने कहा, हमारी, राक्षसों की बसाई हुई वही लंका नगरी आपके बुद्धिमान भ्राता धनाध्यक्ष (कुबेर) ने बसाई है। हे निष्पाप महाबाहु, यदि साम, दान या बल से वह वापस ली जा सके, तो हमारा कार्य सिद्ध हो जाएगा। हे महाबाहु, निःसन्देह आप लंका के स्वामी बनेंगे; डूबे हुए राक्षस-वंश को आपने उद्धृत किया है; हे महाबल, आप हम सबके प्रभु बनेंगे। तब दशग्रीव ने उपस्थित मातामह से कहा, हे वित्तेश, हमारे गुरु (बड़े भाई कुबेर) के लिए ऐसा कहना उचित नहीं।

राक्षस ने उस गरीयस राक्षसेन्द्र से इस प्रकार साम से प्रत्याख्यात (अस्वीकृत) होकर कुछ न कहा, क्योंकि वह दशग्रीव का अभिप्राय जान गया। कुछ काल बाद वहीं रहते रावण के, जिसने वैसा वचन कहा था, राक्षस प्रहस्त ने सकारण विनीत वचन कहा। उसने कहा, हे महाबाहु दशग्रीव, ऐसा कहना आपको उचित नहीं; शूरों में सौभ्रात्र (भ्रातृ-भाव) नहीं होता, मेरा यह वचन सुनिए। प्रजापति कश्यप की परस्पर प्रिय पत्नियाँ बहनें अदिति और दिति थीं। अदिति ने त्रिभुवनेश्वर देवों को जन्म दिया, और दिति ने कश्यप से उत्पन्न दैत्यों को। हे राजन, हे धर्मज्ञ, वनों-समुद्रों-पर्वतों सहित यह पृथ्वी पहले दैत्यों की थी, क्योंकि वे प्रभविष्णु थे। प्रभविष्णु विष्णु ने उन्हें रण में मारकर यह अव्यय त्रैलोक्य देवों के वश में किया।

प्रहस्त ने कहा, भाई के विरुद्ध आचरण करने वाले अकेले आप ही न होंगे; यह तो पहले देव और असुर दोनों ने किया; इसलिए मेरा वचन मानिए। एक मुहूर्त सोचकर दशग्रीव ने प्रहृष्ट-अन्तरात्मा होकर कहा, बाढम्। उसी हर्ष से वीर्यवान दशग्रीव उसी दिन उन राक्षसों सहित वन को गया। त्रिकूट पर स्थित दशग्रीव ने वाक्य-कोविद प्रहस्त को दूत बनाकर भेजा और कहा, हे प्रहस्त, शीघ्र जाकर मेरे वचन से नैरृतपुंगव वित्तेश (कुबेर) से साम-पूर्वक यह कहो।

लंका जाकर कुबेर से सुरक्षित नगरी में प्रहस्त ने परम उदार वित्तपाल से कहा, हे सुव्रत, हे महाबाहु, हे समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, मुझे आपके भ्राता दशग्रीव ने आपके पास भेजा है। हे महाप्राज्ञ, हे सर्वशास्त्र-विशारद, हे वित्तेश, सुनिए जो दशानन कहते हैं। यह रमणीय नगरी पहले भीम-विक्रम सुमाली-प्रमुख राक्षसों की भुक्त (भोगी हुई) थी। हे विश्रवा-पुत्र, अब यह उनका माँगा हुआ अंश है; हे तात, साम से माँगते उन्हें यह लौटा दीजिए।

प्रहस्त से यह सुनकर वाक्यविदों में श्रेष्ठ देव वैश्रवण ने उत्तर दिया। उन्होंने कहा, यह लंका मुझे पिता ने दी थी, जो निशाचरों से शून्य थी; मैंने दान-मान आदि गुणों से इसे बसाया। जाकर दशग्रीव से कहिए कि मेरी नगरी और मेरा राज्य उसी का है; हे महाबाहु, यहाँ निष्कण्टक राज्य भोगे; मेरा राज्य और जो वसु है, वह उसके साथ अविभक्त है। यह कहकर धनाध्यक्ष अपने पिता के समीप गए।

गुरु (पिता) को प्रणाम कर उन्होंने रावण की इच्छा कही, हे तात, दशग्रीव ने मेरे पास दूत भेजा है कि पूर्व में राक्षसों की बसाई लंका नगरी मुझे लौटा दी जाए; हे सुव्रत, बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए। ऐसा कहे जाने पर मुनिपुंगव ब्रह्मर्षि विश्रवा ने हाथ जोड़े धनद से कहा, हे पुत्र, मेरा वचन सुनो।

उन्होंने कहा, दशग्रीव ने मेरे सम्मुख भी यही कहा था; मैंने उस अति-दुर्मति को फटकारा और बहुत समझाया; क्रोध से मैंने बार-बार कहा कि आप नष्ट हो जाएँगे। हे पुत्र, अब अपना हितकर, धर्म-संगत वचन सुनिए। वर-प्रदान से सम्मूढ़ वह अति-दुर्मति मान्य-अमान्य का विवेक नहीं करता; मेरे शाप से भी वह दारुण प्रकृति को प्राप्त है। इसलिए, हे महाबाहु, अनुचरों सहित लंका छोड़कर धरणीधर कैलास पर जाकर निवास के लिए बसिए। वहाँ नदियों में उत्तम रमणीय मन्दाकिनी है, जिसका जल सूर्य-से स्वर्ण-कमलों, कुमुद, उत्पल और अन्य सुगन्धित पुष्पों से ढका है। वहाँ देव, गन्धर्व, अप्सरा, नाग और किन्नर विहारशील होकर सदा रमते हैं। हे धनद, उस राक्षस से वैर आपके लिए हितकर नहीं, क्योंकि आप जानते हैं कि उसने परम-एक वर पाया है।

दस सिर वाला रावण स्वर्णमयी लंका में खड़ा; ऊपर कुबेर पुष्पक विमान में नगरी छोड़कर जाते।

ऐसा कहे जाने पर पिता के गौरव से वह वचन मानकर कुबेर अपनी पत्नी-पुत्रों, अमात्यों, वाहनों और धन सहित लंका छोड़कर चले गए। तब वह देवारि (दशग्रीव) सुविभक्त राजमार्गों वाली, धनद द्वारा छोड़ी लंका में देवाधिप इन्द्र-से स्वर्ग में चढ़ा। निशाचरों द्वारा अभिषिक्त दशानन ने उस नगरी को बसाया; और वह नगरी नील-मेघ-से निशाचरों से इच्छानुसार भर गई।

तब पिता-वाक्य के गौरव से धनेश ने चन्द्र-सी निर्मल कैलास पर्वत पर सुअलंकृत श्रेष्ठ भवनों से विभूषित नगरी बसाई, जैसे पुरन्दर ने स्वर्ग में अमरावती।

सार: वर-प्राप्त रावण को सुमाली और प्रहस्त ने लंका वापस लेने को उकसाया। रावण के दूत प्रहस्त के सन्देश पर उदार कुबेर ने लंका और राज्य देने का प्रस्ताव दिया; पर विश्रवा के परामर्श से कुबेर ने स्वयं लंका छोड़ कैलास पर नई नगरी बसाई। रावण लंका का राजा बना।

विवाह और मेघनाद का जन्म

राक्षसेन्द्र रावण ने भाइयों सहित अभिषिक्त होकर अपनी बहन के विवाह का विचार किया। उसने अपनी बहन राक्षसी शूर्पणखा को दानवेन्द्र, कालका-पुत्र विद्युज्जिह्व को विवाह में दे दिया। फिर देकर वह राक्षस मृगया (शिकार) में विचरने लगा; वहाँ, हे राम, उसने दिति-पुत्र मय को देखा, जो अपनी कन्या के साथ था।

कन्या-सहित उसे देखकर निशाचर दशग्रीव ने पूछा, आप कौन हैं और मनुष्य-मृग-रहित इस वन में इस मृग-नयनी कन्या के साथ क्यों खड़े हैं। तब मय ने कहा, सुनिए, मैं सब यथावृत्त बताता हूँ। हे तात, हेमा नामक अप्सरा थी, यदि आपने सुना हो। जैसे पौलोमी इन्द्र को दी गई, वैसे ही हेमा देवताओं ने मुझे दी; मैं उसमें आसक्त-मन सहस्रों वर्ष रहा। वह देवताओं के कार्य से चौदह वर्ष को गई। उसी हेमा के लिए मैंने अपनी माया से सर्वथा स्वर्ण-मय नगर बनाया, वज्र-वैदूर्य से जड़ा; उससे रहित होकर मैं वहाँ दीन और अत्यन्त दुःखी रहा।

मय ने कहा, उस नगर से कन्या को लेकर मैं वन में आया हूँ। हे राजन, यह मेरी आत्मजा उसी (हेमा) के गर्भ में पली है; मैं इसके लिए पति ढूँढने आया हूँ, क्योंकि कन्या का पिता होना मान-कांक्षियों के लिए दुःख है। कन्या सदा दो कुलों को संशय में रखती है। उस भार्या में मेरे दो पुत्र भी हुए: पहला मायावी और उसके बाद दुन्दुभि। हे तात, पूछने पर मैंने सब यथातथ्य कह दिया; अब मैं कैसे जानूँ कि आप कौन हैं।

दस सिर वाला रावण हाथ जोड़े सिंहासन पर बैठे कुबेर के सम्मुख; पास लंका का स्वर्ण प्रतिरूप।

ऐसा कहे जाने पर राक्षस ने विनीत होकर कहा, मैं पुलस्त्य का पौत्र और मुनि विश्रवा का पुत्र हूँ, जो ब्रह्मा से तीसरे थे; मेरा नाम दशग्रीव है। यह सुनकर मय दानव महर्षि-पुत्र जानकर हर्षित हुआ और उसे अपनी कन्या देने को वहीं रुचि की। हाथ से उसका हाथ ग्रहण कराकर मय दैत्येन्द्र हँसते हुए राक्षसेन्द्र से बोला, हे राजन, हेमा अप्सरा की पाली यह मेरी आत्मजा कन्या मन्दोदरी पत्नी-रूप में स्वीकार कीजिए। हे राम, दशग्रीव ने “बाढम्” कहा।

तब वहीं अग्नि प्रज्वलित कर उसने पाणिग्रहण किया। हे राम, यद्यपि मय तपोधन विश्रवा के शाप को जानता था, फिर भी ब्रह्मा से उसके वंश को जानकर उसने अपनी कन्या दे दी। मय ने उसे परम तप से पाई अमोघ, परम अद्भुत शक्ति भी दी, जिससे आगे रावण ने लक्ष्मण को मारा। इस प्रकार लंका का ईश्वर प्रभु पत्नी कर अपनी नगरी जाकर दोनों भाइयों के लिए भी भार्या ले आया। विरोचन-पुत्र बलि की दौहित्री (पुत्री की पुत्री) वज्रज्वाला को रावण ने कुम्भकर्ण की पत्नी बनाया। महात्मा गन्धर्वराज शैलूष की कन्या धर्मज्ञा सरमा विभीषण को भार्या-रूप में मिली, जो मानस-सरोवर के तट पर उत्पन्न हुई थी।

एक उप-कथा: सरमा का नामकरण मानस-सरोवर से जुड़ा है। वर्षा-काल में मानस-सरोवर बढ़ रहा था, तब उस कन्या की माता ने स्नेह से चिल्लाकर कहा, “सरः मा वर्धय” (हे सरोवर, मत बढ़ो)। इसी “सरः-मा” से कन्या का नाम “सरमा” पड़ा।

तब वर्षा-काल में मानस-सरोवर बढ़ रहा था; उस कन्या की माता ने स्नेह से आक्रन्द किया कि हे सरोवर, मत बढ़ो; इसी से वह सरमा कहलाई। इस प्रकार विवाह कर वे राक्षस वहाँ अपनी-अपनी भार्या के साथ नन्दनवन में गन्धर्वों-से रमने लगे। फिर मन्दोदरी ने मेघनाद नामक पुत्र को जन्म दिया।

वही मेघनाद है जिसे आप सब इन्द्रजित कहते हैं। जन्मते ही रावण-पुत्र ने रोते हुए मेघ-सा महानाद छोड़ा, जिससे, हे राघव, लंका जड़ (स्तब्ध) हो गई। इसी से पिता ने स्वयं उसका नाम मेघनाद रखा। हे राम, वह रावण के शुभ अन्तःपुर में, श्रेष्ठ स्त्रियों से रक्षित, माता-पिता को महान हर्ष देता, काष्ठ में छिपी अग्नि-सा बढ़ने लगा।

सार: रावण ने शूर्पणखा का विवाह विद्युज्जिह्व से किया। मय दानव की कन्या मन्दोदरी रावण की पत्नी बनी (मय ने अमोघ शक्ति भी दी)। कुम्भकर्ण को वज्रज्वाला और विभीषण को सरमा मिली। मन्दोदरी से मेघनाद (इन्द्रजित) का जन्म हुआ, जिसकी गर्जना से लंका स्तब्ध हो गई।

कुम्भकर्ण की निद्रा, रावण के अत्याचार और कुबेर का दूत

निद्रा से घिरा कुंभकर्ण आसन पर जम्हाई लेते हुए; पास दस सिर वाला रावण चिंतित खड़ा।

अब कुछ काल बाद लोकेश्वर ब्रह्मा द्वारा भेजी तीव्र निद्रा जँभाई आदि के रूप में कुम्भकर्ण को लंका में घेरने लगी। तब कुम्भकर्ण ने पास बैठे भाई से कहा, हे राजन, निद्रा मुझे सता रही है; मेरा आलय (भवन) बनवाइए। तब विश्वकर्मा-से शिल्पी राजा द्वारा नियुक्त किए गए। उन्होंने कुम्भकर्ण के लिए एक योजन चौड़ा और दूना (दो योजन) लम्बा, स्निग्ध, दर्शनीय, निराबाध भवन बनाया, जो स्फटिक और स्वर्ण के विचित्र स्तम्भों से सर्वत्र शोभित था। उसकी सीढ़ियाँ वैदूर्य की, झरोखे घण्टियों के जाल से जड़े, द्वार हाथीदाँत के, और वेदियाँ वज्र-स्फटिक की थीं। राक्षस (रावण) ने उसे मनोहर, सब सुखों से युक्त, सब ऋतुओं में सुखद, मेरु की पुण्य गुहा-सा बनवाया। वहाँ निद्रा में निमग्न महाबल कुम्भकर्ण अनेक सहस्र वर्ष सोता रहा और जागा नहीं।

जब कुम्भकर्ण निद्रा से अभिभूत था, तब दशानन ने बिना किसी अंकुश के देव, ऋषि, यक्ष और गन्धर्वों का संहार किया। अत्यन्त क्रुद्ध दशानन ने नन्दन आदि विचित्र उद्यानों में जाकर उन्हें भग्न कर दिया। हाथी-से नदियों में क्रीड़ा करता, वायु-से वृक्ष उखाड़ता, और इन्द्र के वज्र-से पर्वतों को विध्वस्त करता वह राक्षस घूमने लगा।

दशग्रीव के ऐसे आचरण को जानकर धर्मज्ञ वैश्रवण (कुबेर) ने अपने कुल के अनुरूप आचरण स्मरण कर, सौभ्रात्र दिखाने और दशग्रीव के हित के लिए लंका में दूत भेजा। वह दूत लंका जाकर विभीषण के पास पहुँचा, जिसने उसका धर्मपूर्वक सम्मान किया और आगमन का कारण पूछा। राजा और ज्ञातिजनों की कुशल पूछकर विभीषण ने उसे सभा में बैठे दशानन को दिखाया। अपने तेज से दीप्त राजा को देखकर उसने “जय” कहकर सम्मान किया और मौन खड़ा हो गया। फिर श्रेष्ठ पलंग पर उत्तम आस्तरण-शोभित बैठे दशग्रीव से दूत ने कहा।

दूत ने कहा, हे राजन, आपके भ्राता ने जो कहा, वह सब आपको बताता हूँ; हे वीर, यह आचरण और कुल दोनों के अनुरूप है। उन्होंने कहा, अब तक आपने जो किया वह बहुत हुआ; यदि सम्भव हो तो भली प्रकार धर्म-व्यवस्था में स्थित हो जाइए। मैंने नन्दनवन को आपसे भग्न देखा, ऋषियों को मारा सुना, और हे राजन, आपके विरुद्ध देवों के उद्योग की भी मैंने सुनी। हे राक्षसाधिप, आपने बार-बार मेरा निरादर किया; फिर भी अपराधी और बालक की भी रक्षा अपने बान्धवों को करनी चाहिए।

दूत ने कुबेर के शब्दों में आगे कहा, मैं धर्म-उपासना के लिए हिमवान के पृष्ठ पर गया, रौद्र व्रत धारण कर, संयत और नियतेन्द्रिय होकर। वहाँ मैंने उमा-सहित प्रभु देव (शिव) को देखा; दैवात मेरी बाईं आँख वहाँ देवी पर पड़ी। हे महाराज, अनुपम रूप धारण कर रुद्राणी वहाँ खड़ी थीं; मैं तो केवल यह जानने को कि वे कौन हैं, और किसी कारण से नहीं। देवी के दिव्य प्रभाव से मेरी बाईं आँख जल गई और दूसरी रेणु-धूसरित ज्योति-सी पिंगल (भूरी) हो गई।

दूत ने कहा, फिर मैं उसी पर्वत के दूसरे विस्तीर्ण तट पर गया और मौन रहकर आठ सौ वर्ष का महाव्रत धारण किया। उस नियम के पूर्ण होने पर वहाँ महेश्वर देव प्रकट हुए और प्रसन्न-मन बोले, हे धर्मज्ञ, हे सुव्रत, मैं आपके इस तप से प्रसन्न हूँ; हे धनाधिप, यह व्रत पहले मैंने और अब आपने आचरित किया; तीसरा कोई पुरुष ऐसा व्रत नहीं कर सकता, क्योंकि यह सुदुष्कर व्रत मैंने ही पूर्व में उत्पन्न किया था। हे सौम्य धनेश, इसलिए मुझसे सख्य (मित्रता) कीजिए; हे निष्पाप, तप से जीते जाकर मैं आपका मित्र बना।

पर्वत पर विराजमान शिव घुटने टेके उस दूत को आशीर्वाद देते हैं जिसकी बाईं आँख जली है और दाईं पिंगल हो गई है, और उसे एकाक्षिपिंगल नाम देते हैं

शिव ने कहा, क्योंकि देवी के प्रभाव से आपकी बाईं आँख जली और देवी के रूप-निरीक्षण से दूसरी पिंगल हुई, इसलिए आप सदा के लिए “एकाक्षिपिंगल” नाम से प्रसिद्ध रहेंगे। दूत ने कहा, इस प्रकार शंकर से सख्य और अनुज्ञा पाकर लौटते हुए मैंने आपके पाप-निश्चय की बात सुनी। इसलिए कुल को कलंकित करने वाले इस अधर्म से निवृत्त हो जाइए। ऋषि-संघों सहित देव आपके वध का उपाय सोच रहे हैं।

ऐसा कहे जाने पर दशग्रीव क्रोध से रक्त-नयन होकर हाथ मलते, दाँत पीसते हुए बोला। उसने कहा, हे दूत, आप जो वचन कहते हैं वह मैंने समझ लिया; न आप जीवित रहेंगे, न वह भाई जिसने आपको भेजा है। यह धनरक्षक जो कहता है वह मेरे हित में नहीं। वह मूढ़ अपनी महेश्वर-मित्रता सुनाता है; आपने जो कहा वह मुझे क्षम्य नहीं। हे दूत, मैंने अब तक उसका समय इसलिए सहा कि वह सोचता है कि बड़ा भाई होने से मैं उसे न मारूँगा। पर अब उसका यह वचन सुनकर मैंने यह मति बना ली कि बाहु-बल के आश्रय से तीनों लोकों को भी जीतूँगा। इसी मुहूर्त में उसी एक के कारण मैं चारों लोकपालों को यमक्षय (यम के निवास) को भेजूँगा।

तलवार लिए रावण यज्ञशाला में पहुँचा; ब्राह्मण हवन करते और एक अलंकृत पुरुष भूमि पर मूर्छित।

यह कहकर लंकेश ने दूत को खड्ग से मार डाला और उसका शव दुरात्मा राक्षसों को भक्षण के लिए दे दिया। तब त्रैलोक्य-विजय की कामना से रावण ने ब्राह्मणों से स्वस्त्ययन (मंगल-पाठ) कराकर रथ पर चढ़कर वहाँ प्रयाण किया जहाँ धनेश थे।

सार: कुम्भकर्ण के लिए विशाल भवन बना, जिसमें वह सहस्रों वर्ष सोता रहा। रावण देव-ऋषियों पर अत्याचार करने लगा। कुबेर के हितैषी दूत ने उसे चेताया और शिव से अपनी मित्रता तथा “एकाक्षिपिंगल” नाम की कथा सुनाई। क्रुद्ध रावण ने दूत को मारकर कुबेर पर चढ़ाई का निश्चय किया।

यक्षों पर आक्रमण और रावण की विजय

तब नित्य बल से उद्धत रावण अपने छह सचिवों (महोदर, प्रहस्त, मारीच, शुक, सारण और सदा युद्ध-गृद्ध वीर धूम्राक्ष) से घिरा, क्रोध से लोकों को मानो दग्ध करता हुआ निकला। श्रीमान रावण नगरों, नदियों, पर्वतों, वनों और उपवनों को लाँघकर एक मुहूर्त में कैलास पर्वत पर पहुँचा।

उस पर्वत पर बैठे, सचिवों सहित युद्धोत्सुक उस दुरात्मा राक्षसेन्द्र को सुनकर यक्ष उसके सम्मुख खड़े न रह सके, और राजा का भ्राता जानकर वहाँ गए जहाँ धनेश थे। उन्होंने भाई के अभिप्राय की सब बात कही; धनद की अनुज्ञा पाकर वे हर्षित होकर युद्ध को निकले। तब राजा नैरृत (रावण) की सेनाओं का संक्षोभ समुद्र-सा बढ़ा, मानो पर्वत को हिला रहा हो। उस राक्षस के सम्मुख यक्ष खड़े न रह सके; तब यक्ष-राक्षसों का घोर युद्ध हुआ, और राक्षस के सचिव व्यथित हुए।

अपनी सेना को ऐसी दशा में देख निशाचर दशग्रीव बहुत हर्षनाद करता क्रोध से दौड़ा। राक्षसेन्द्र के घोर-विक्रम सचिवों में से एक-एक ने सहस्र-सहस्र यक्षों से युद्ध किया। गदा, मूसल, असि, शक्ति और तोमर से ताड़ित होकर दशग्रीव शत्रु-सेना में घुस गया। यक्षों के बाणों से, मेघों की धाराओं-से बिंधते हुए वह श्वास तक न ले सका; फिर भी सैकड़ों धाराओं से सिक्त पर्वत-से वह आहत होकर भी व्यथित न हुआ। तब काल-दण्ड-सी गदा उठाकर महात्मा दशग्रीव यक्षों को यमक्षय भेजता सेना में घुसा।

विस्तीर्ण कक्ष (वन-झाड़) और सूखे ईंधन-से बिखरी यक्ष-सेना को वायु-प्रेरित दीप्त अग्नि-से उसने दग्ध कर दिया। उन महामात्यों (महोदर, शुक आदि) से यक्ष वायु-से तितर-बितर मेघों-से अल्प-शेष रह गए। कुछ आहत होकर भग्न हुए और रण में गिरे; कुछ क्रोध से तीक्ष्ण दाँतों से अपने ओठ काटने लगे। थके हुए, शस्त्र छोड़े, परस्पर आलिंगन कर वे यक्ष जल से कटे तट-से बैठ गए। मरकर स्वर्ग जाते, युद्ध करते, भागते और देखते ऋषि-संघों से आकाश में स्थान न रहा।

उन महाबल यक्षेन्द्रों को भग्न देख महाबाहु धनाध्यक्ष ने और यक्ष भेजे। उसी बीच, हे राम, विस्तीर्ण बल-वाहन वाला संयोधकण्टक नामक यक्ष धनेश द्वारा भेजा गया। उसने रण में विष्णु-से चक्र से मारीच को मारा; मारीच पुण्य-क्षीण ग्रह-सा पर्वत से भूतल पर गिरा। फिर एक मुहूर्त में सचेत होकर विश्राम कर उस यक्ष से युद्ध किया; वह यक्ष भी भग्न होकर भाग गया।

तब स्वर्ण-विचित्र, वैदूर्य-रजत से जड़ा द्वारपालों की अन्तिम मर्यादा वाला तोरण-द्वार रावण ने पार किया। वहाँ सूर्यभानु नामक द्वारपाल ने प्रवेश करते निशाचर दशग्रीव को रोका। यक्ष से रोके जाने पर भी राक्षस घुसने लगा; हे राम, जब रोके जाने पर राक्षस रुका नहीं, तब यक्ष ने द्वार से उखाड़े स्तम्भ से उसे मारा। रक्त बहाता दशग्रीव धातु-धाराएँ बहाते पर्वत-सा शोभित हुआ। पर स्वयम्भू के वरदान से वीर को क्षति न हुई। तब उसी तोरण से ताड़ित होकर वह यक्ष भस्म होकर दिखाई न दिया।

राक्षस का पराक्रम देखकर सब भागने लगे; भय से पीड़ित, थके, विवर्ण-मुख, शस्त्र त्यागकर वे नदियों और गुहाओं में जा घुसे।

सार: रावण ने छह सचिवों सहित कैलास पर कुबेर के यक्षों पर आक्रमण किया। यक्षों ने डटकर लड़ा, मारीच और स्वयं रावण घायल भी हुए, पर ब्रह्मा के वरदान से रावण को क्षति न हुई। अन्ततः यक्ष भागकर नदियों-गुहाओं में छिप गए।

मणिभद्र और कुबेर की पराजय, पुष्पक का हरण

सहस्रों यक्षेन्द्रों को त्रस्त देख धनाध्यक्ष ने महायक्ष मणिभद्र से कहा, हे यक्षेन्द्र, इस दुर्वृत्त, पापचित्त रावण को मारो; युद्धशील वीर यक्षों के शरण बनो। ऐसा कहे जाने पर सुदुर्जय महाबाहु मणिभद्र चार सहस्र यक्षों से घिरा युद्ध करने लगा। तब यक्ष गदा, मूसल, प्रास, शक्ति, तोमर और मुद्गर से प्रहार करते राक्षसों पर टूट पड़े; श्येन-से वेग से तुमुल युद्ध करते, “दृढ़ता से दो”, “नहीं चाहिए, दे दो” कहते। ब्रह्मवादी देव, गन्धर्व और ऋषि उस तुमुल युद्ध को देख परम विस्मय में पड़े।

प्रहस्त ने रण में सहस्र यक्ष मारे, महोदर ने एक सहस्र अनिन्द्य वीर मारे; और हे राजन, युद्ध-इच्छुक क्रुद्ध मारीच ने निमेष-मात्र में दो सहस्र और मारे। हे पुरुषव्याघ्र, यक्षों का सीधा (आर्जव) युद्ध कहाँ और राक्षसों का माया-बल-आश्रित युद्ध कहाँ; इसी से युद्ध में राक्षस अधिक रहे।

महारण में धूम्राक्ष से भिड़कर मणिभद्र क्रोध से वक्ष में मूसल से ताड़ित होकर भी न काँपा। तब मणिभद्र ने गदा घुमाकर राक्षस धूम्राक्ष को मस्तक पर मारा, और वह विह्वल होकर गिरा। धूम्राक्ष को ताड़ित, रक्त-सिक्त गिरा देख दशानन संग्राम में मणिभद्र की ओर दौड़ा। क्रुद्ध दौड़ते दशानन को यक्षपुंगव मणिभद्र ने तीन शक्तियों से मारा। ताड़ित दशानन ने रण में मणिभद्र के मुकुट पर प्रहार किया; उस प्रहार से उसका मुकुट एक ओर हट गया। तभी से वह यक्ष “पार्श्वमौलि” (जिसका मुकुट एक ओर हट गया हो) कहलाया। महात्मा मणिभद्र के विमुख होने पर, हे राजन, उस पर्वत पर राक्षसों का महाशब्द बढ़ा।

तब दूर से गदाधर धनाध्यक्ष दिखाई दिए, जो अपने दो सचिवों शुक्र और प्रौष्ठपद, तथा अपने दो निधियों (पद्म और शंख) के अधिष्ठाता देवताओं से घिरे थे। शाप से गौरव-भ्रष्ट भाई (रावण) को रण में देख वह बुद्धिमान ब्रह्म-कुल के योग्य वचन बोले।

कुबेर ने कहा, हे मूढ़, मेरे रोकने पर भी आप नहीं समझते; पर अपने कुकर्मों के फल से नरक जाकर पीछे समझेंगे। जो दुर्मति मोह से विष पीकर उसे नहीं पहचानता, वह परिणाम में ही उस कर्म का फल जानता है। आपकी ऐसी मति है कि कोई धर्मयुक्त कर्म भी देवताओं को प्रसन्न नहीं करता, और उस अप्रसन्नता से प्रेरित होकर आप इस हिंसा में लगे हैं, यह आप नहीं समझते। जो माता, पिता, विप्र और आचार्य का अपमान करता है, वह यमराज के वश में जाकर उसका फल देखता है।

कुबेर ने आगे कहा, अध्रुव (नश्वर) शरीर में जो तप का अर्जन नहीं करता, वह मूढ़ मरकर अपनी गति को जाकर पीछे पछताता है। धर्म से राज्य, धन और सुख; अधर्म से दुःख ही मिलता है; इसलिए सुख के लिए धर्म कीजिए और पाप छोड़िए। पाप का फल दुःख है, जो स्वयं ही भोगना पड़ता है; इसलिए मूढ़ अपने ही नाश के लिए पाप करता है। दुर्बुद्धि को बुद्धि स्वतः नहीं उपजती; जैसा कर्म करता है वैसा ही फल पाता है। मनुष्य लोक में ऋद्धि, रूप, बल, पुत्र, धन और शूरता पुण्य-कर्मों से ही पाते हैं। इस प्रकार आप नरकगामी हैं, क्योंकि आपकी मति ऐसी है; मैं आपसे और न बोलूँगा, दुराचारियों के विषय में यही निर्णय है।

ऐसा कहकर कुबेर ने प्रहार किया; तब मारीच-प्रमुख उसके अमात्य विमुख होकर भाग गए। तब उस महात्मा यक्षेन्द्र ने दशग्रीव को गदा से मस्तक पर मारा, पर वह अपने स्थान से न डिगा। तब, हे राम, उस महारण में यक्ष और राक्षस परस्पर प्रहार करने लगे, पर दोनों न विह्वल हुए, न थके।

तब धनद ने रावण पर आग्नेय अस्त्र छोड़ा; राक्षसेन्द्र ने उसे वारुण अस्त्र से रोका। तब राक्षसेश्वर ने राक्षसी माया में प्रवेश कर यक्षों के विनाश के लिए लाखों रूप धारण किए। दशानन व्याघ्र, वराह, मेघ, पर्वत, समुद्र, वृक्ष, यक्ष और दैत्य-रूप में दिखाई दिया। ऐसे अनेक रूप बनाकर वह फिर दिखाई न दिया।

तब, हे राम, दशानन ने एक महान अस्त्र (विशाल गदा) ग्रहण कर घुमाकर धनद के मस्तक पर मारा। उससे आहत होकर विह्वल, रक्त-सिक्त धनद कटे-मूल अशोक-से भूमि पर गिरे। तब पद्म आदि निधि-देवताओं से घिरे, उच्छ्वसित किए जाते (होश में लाए जाते) कुबेर को नन्दनवन ले जाया गया। उस धनद को जीतकर हर्षित-मन राक्षसेन्द्र ने विजय-चिह्न-रूप उसका विमान पुष्पक ले लिया।

एक उप-कथा: पुष्पक विमान विश्वकर्मा-निर्मित था: स्वर्ण-स्तम्भों से युक्त, वैदूर्य-मणि के द्वारों, मोती-जाल और सब-ऋतु-फलदायी वृक्षों वाला; मन-से वेग, इच्छानुसार गति और इच्छानुसार रूप वाला; मणि-स्वर्ण की सीढ़ियों और तप्त-स्वर्ण की वेदियों वाला; अक्षय्य, नेत्र-मन को सदा सुखद, न अधिक शीतल न उष्ण, सब ऋतुओं में सुखद। यही विमान आगे राम के अयोध्या-गमन तक की कथा में बार-बार आता है।

पुष्पक स्वर्ण-स्तम्भों, वैदूर्य-द्वारों, मोती-जाल और सब-ऋतु-फल वृक्षों वाला, मन-से वेग, कामगम (इच्छानुसार गति), कामरूप, मणि-स्वर्ण-सीढ़ियों और तप्त-स्वर्ण-वेदियों वाला, अक्षय्य, नेत्र-मन को सुखद, अनेक आश्चर्यों और विचित्र भक्ति-रचना से युक्त, विश्वकर्मा-निर्मित, सर्वकाम-सम्पन्न, मनोहर, अनुत्तम, न शीतल न उष्ण, सब ऋतुओं में सुखद शुभ विमान था। उस कामग, वीर्य-निर्जित विमान पर चढ़कर वह दुर्मति राजा दर्प-उत्सेक से समझने लगा कि उसने तीनों लोक जीत लिए। वैश्रवण देव को जीतकर वह कैलास से उतर आया।

अपने पराक्रम से उस विपुल विजय को पाकर, श्रेष्ठ विमान पर बैठा, निर्मल किरीट और हार धारण किए वह प्रतापवान निशाचर यज्ञ-सभा में स्थित अग्नि-सा शोभित हुआ।

सार: मणिभद्र को पराजित कर रावण ने कुबेर का सामना किया। कुबेर ने धर्मोपदेश दिया, पर रावण ने माया रचकर और महागदा से कुबेर को मूर्च्छित कर उसका पुष्पक विमान छीन लिया। विजय-गर्व से वह कैलास से उतरा।

नन्दीश्वर का शाप और शिव से खड्ग की प्राप्ति

हे राम, भाई कुबेर को जीतकर राक्षसाधिप उस महान शरवण (नरकट के वन) में पहुँचा जहाँ महासेन (कार्तिकेय) उत्पन्न हुए थे। तब दशग्रीव ने किरणों से घिरे, द्वितीय सूर्य-से स्वर्णिम शरवण को देखा। किसी रमणीय वनान्तर वाले पर्वत पर चढ़कर उसने पुष्पक को वहीं रुका पाया। मन्त्रियों से घिरा राक्षसेन्द्र सोचने लगा, यह कामग विमान क्यों रुक गया, क्यों नहीं चलता; अवश्य यह इस पर्वत पर रहने वाले किसी का कर्म है।

तब बुद्धि-कोविद मारीच बोला, हे राजन, बिना कारण पुष्पक नहीं रुकता; अथवा यह पुष्पक धनद के अतिरिक्त किसी अन्य को नहीं ढोता, इसलिए उससे वियुक्त होकर निस्पन्द हो गया है। उसके यह कहते-कहते भव (शिव) का अनुचर नन्दीश्वर (कराल, कृष्ण-पिंगल, वामन, विकट, मुण्डित-शिर, ह्रस्व-भुज, बलवान और सदा हर्षयुक्त) पास आकर निडर राक्षसेन्द्र से बोला।

नन्दी ने कहा, हे दशग्रीव, लौट जाइए; शंकर इस पर्वत पर क्रीड़ा कर रहे हैं; इसी से यह सुपर्ण, नाग, यक्ष, देव, गन्धर्व, राक्षस और सब प्राणियों के लिए अगम्य कर दिया गया है। नन्दी का वचन सुनकर क्रोध से जिसके कुण्डल काँप रहे थे और रोष से नेत्र ताम्र हो गए थे, ऐसा रावण पुष्पक से उतरकर “यह शंकर कौन है” कहता पर्वत के मूल में आया। वहाँ देव के समीप, दीप्त शूल टेके द्वितीय शंकर-से खड़े नन्दी को उसने देखा।

वानर-मुख देखकर उसका तिरस्कार कर वह राक्षस वहाँ जल-भरे मेघ-सा अट्टहास छोड़ने लगा। तब क्रुद्ध भगवान नन्दी, जो शंकर का ही दूसरा रूप थे, पास खड़े दशानन से बोले। उन्होंने कहा, हे निशाचर, मैं चाहूँ तो अभी आपको मार सकता हूँ; पर आपको नहीं मारता, क्योंकि आप अपने ही कर्मों से पहले ही मारे जा चुके हैं।

नन्दी ने आगे कहा, हे दशानन, क्योंकि वानर-रूप मुझे तुच्छ समझकर आपने अशनि-पात-सा अपहास छोड़ा, इसलिए आपके कुल के वध के लिए वानर उत्पन्न होंगे; मेरे वीर्य से युक्त, मेरे रूप-से तेजस्वी। उनके नख और दाढ़ें आयुध होंगी, मन-से वेग होगा; क्रूर, युद्धोन्मत्त, बल से उद्रिक्त वे चलते पर्वतों-से दिखेंगे। एक साथ मिलकर वे आपका प्रबल दर्प और बल-घमण्ड, आपके अमात्यों और पुत्रों सहित, हर लेंगे। हे निशाचर, मैं अभी आपको मार सकता हूँ, पर मारता नहीं, क्योंकि आप अपने ही कर्मों से पूर्व ही मारे जा चुके हैं। उस महात्मा देव के यह कहते ही देव-दुन्दुभियाँ बजीं और आकाश से पुष्पवृष्टि हुई।

नन्दी के वचन की अवहेलना कर वह महाबल पर्वत के पास जाकर बोला, मैं इस पर्वत को, जिसके कारण जाते समय मेरे पुष्पक की गति रुकी, हे वृषभ-स्वामी (शिव), उखाड़ देता हूँ। किस प्रभाव से भव सदा राजा-सा क्रीड़ा करते हैं; वे यह जानने योग्य नहीं जानते कि उपस्थित भय उन पर आ पड़ा है। यह कहकर भुजाएँ पर्वत के नीचे डालकर उसने उसे शीघ्र उठाया, जिससे वह पर्वत प्रबल काँप उठा।

पर्वत के चलने से देव के गण काँपे, और तब महेश्वर से आलिंगित पार्वती भी विचलित हो गईं। तब, हे राम, देवों में प्रवर महादेव हर ने पाद-अँगूठे से उस पर्वत को लीला से दबा दिया। उससे उसकी पर्वत-स्तम्भ-सी भुजाएँ दब गईं, और वहाँ खड़े राक्षस के सचिव विस्मित हुए। भुजाओं के दबने से रोष में राक्षस ने सहसा ऐसा रव छोड़ा जिससे तीनों लोक काँप उठे। उसके अमात्यों ने उसे युगान्त के वज्र-निष्पेष-सा माना; तब इन्द्र आदि देव भी मार्ग में लड़खड़ा गए। समुद्र क्षुब्ध हुए, पर्वत हिले; यक्ष, विद्याधर और सिद्ध “यह क्या है” कहने लगे।

उसके अमात्यों ने उससे कहा, हे दशानन, नीलकण्ठ उमापति महादेव को प्रसन्न कीजिए; उनके अतिरिक्त यहाँ हम कोई शरण नहीं देखते। स्तुतियों से प्रणत होकर उन्हीं की शरण जाइए; कृपालु शंकर तुष्ट होकर आप पर प्रसाद करेंगे। अमात्यों के ऐसा कहने पर दशानन ने वृषभध्वज की सामवेद के विविध स्तोत्रों से स्तुति की और प्रणाम किया। इस प्रकार रोते राक्षस के एक सहस्र वर्ष बीत गए।

तब पर्वत-शिखर पर बैठे प्रभु महादेव प्रसन्न हुए और, हे राम, उसकी भुजाओं को दबाव से मुक्त कर दशानन से बोले। उन्होंने कहा, हे वीर दशानन, मैं आपकी मनुष्यता और शौर्य तथा स्तवन से प्रसन्न हूँ। पर्वत के नीचे दबने पर आपने जो सुदारुण रव छोड़ा, जिससे तीनों लोक भयभीत होकर रो उठे, इसी कारण, हे राजन, आप “रावण” नाम से प्रसिद्ध होंगे। देव, मनुष्य, यक्ष और भूतल के अन्य प्राणी आपको “लोकरावण” (लोक को रुलाने वाला) रावण कहेंगे। हे पौलस्त्य, अब विश्रब्ध (निडर) होकर जिस मार्ग चाहें जाइए; हे राक्षसाधिप, मेरी अनुज्ञा है, जाइए।

शम्भु के यह कहने पर लंकेश ने स्वयं कहा, हे महादेव, यदि प्रसन्न हैं तो मुझ याचक को वर दीजिए। मैंने देव, गन्धर्व, दानव, राक्षस, गुह्यक, नाग और अन्य बलवानों से अवध्यता पहले ही पा ली है; हे देव, मैं मनुष्यों को नहीं गिनता, वे मुझे अत्यल्प हैं। हे त्रिपुरान्तक, मैंने ब्रह्मा से दीर्घ आयु पाई है; आयु का जो शेष चाहा है वह दीजिए, और मुझे एक शस्त्र भी दीजिए। ऐसा कहे जाने पर शंकर ने उसे चन्द्रहास नामक महादीप्त खड्ग दिया, और भूतपति ने उस अवसर पर आयु का शेष भी दिया।

देते समय शम्भु ने कहा, यह खड्ग आपको अवज्ञेय न समझना चाहिए; यदि आपने इसका अनादर किया तो यह निःसन्देह मेरे पास लौट आएगा। इस प्रकार स्वयं महेश्वर द्वारा नामित वह रावण महादेव को प्रणाम कर पुष्पक पर पुनः चढ़ा। तब, हे राम, रावण भूतल पर विचरता इधर-उधर महावीर्य क्षत्रियों को सताने लगा। उसकी आज्ञा न मानने वाले कुछ तेजस्वी, युद्ध-दुर्मद शूर क्षत्रिय अपने परिवारों सहित नष्ट हो गए। अन्य प्राज्ञ-सम्मत, जो राक्षस को दुर्जय जानते थे, बल से गर्वित राक्षस से बोले कि हम पराजित हैं।

सार: कैलास पर पुष्पक रुकने पर नन्दी ने रावण को रोका; तिरस्कार करने पर नन्दी ने शाप दिया कि वानर ही रावण-कुल का नाश करेंगे। पर्वत उठाने पर शिव ने अँगूठे से उसे दबा दिया; रावण के रव से ही उसका नाम “रावण” पड़ा। स्तुति से प्रसन्न शिव ने चन्द्रहास खड्ग दिया।

वेदवती का शाप

हे राजन, पृथ्वी पर विचरते महाबाहु रावण हिमालय के वन में पहुँचकर वहाँ घूमने लगा। वहाँ उसने कृष्णाजिन (काले मृग का चर्म) और जटाधारिणी, ऋषि-विधि से दीप्त, देवी-सी एक कन्या को देखा। रूप-सम्पन्न उस महाव्रती कन्या को देखकर काम-मोह से ग्रस्त रावण ने हँसते हुए-से पूछा।

उसने पूछा, हे भद्रे, यह क्या कर रही हैं, यह आपके यौवन के विरुद्ध है; ऐसी प्रतिक्रिया आपके रूप के योग्य नहीं। हे भीरु, आपका अनुपम रूप मनुष्यों में काम-उन्माद उपजाता है; तप में स्थित रहना आपको उचित नहीं, यह मेरे मन का निर्णय है। हे भद्रे, आप किसकी हैं, यह क्या है, हे वरानने, आपका पति कौन है; जो आपको भोगे वह पुरुष भूमि पर पुण्यभाग है। पूछने पर मुझे सब बताइए, किसलिए यह परिश्रम है।

रावण के ऐसा कहने पर वह यशस्विनी कन्या तपोधना उसका विधिवत आतिथ्य कर बोली, मेरे पिता का नाम कुशध्वज था, अमित-प्रभ ब्रह्मर्षि। वे श्रीमान बृहस्पति-पुत्र, बुद्धि में बृहस्पति-तुल्य थे। नित्य वेदाभ्यास करते उस महात्मा से मैं वाङ्मयी कन्या उत्पन्न हुई, इसलिए “वेदवती” कहलाई। तब गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और पन्नग (नाग) सहित देव मेरे पिता के पास आकर मुझे वरना चाहते थे, पर, हे राक्षसेश्वर, मेरे पिता ने मुझे उनमें से किसी को न दिया।

वेदवती ने कहा, हे महाबाहु, उसका कारण कहती हूँ, सुनिए। मेरे पिता को त्रिलोकेश सुरेश्वर विष्णु ही जामाता (दामाद)-रूप में अभिप्रेत थे; इसलिए वे मुझे किसी और को देना न चाहते थे। यह सुनकर बल से गर्वित दैत्यों का राजा शम्भु नामक क्रुद्ध हुआ; और रात्रि में सोते मेरे पिता उस पापी से मारे गए। तब मेरी दीन, महाभागा माता पिता के उस शरीर का आलिंगन कर अग्नि में प्रविष्ट हुईं।

वेदवती ने आगे कहा, तब मैंने पिता के नारायण-सम्बन्धी मनोरथ को सत्य करने के लिए हृदय में उन्हीं को धारण किया कि “मैं उन्हें ही पाऊँगी”। इसी प्रतिज्ञा को धारण कर मैं विपुल तप करती हूँ। हे राक्षसपुंगव, यह सब मैंने आपको कह दिया। नारायण ही मेरे पति हैं, उन पुरुषोत्तम के अतिरिक्त कोई नहीं; नारायण को पाने की इच्छा से मैं यह घोर नियम धारण करती हूँ। हे राजन, तप से मैं तीनों लोकों में जो कुछ है, सब जानती हूँ; मैंने आपको भी जान लिया है; हे पौलस्त्यनन्दन, जाइए।

तब काम-शर से पीड़ित रावण विमानाग्र से उतरकर उस महाव्रती कन्या से फिर बोला, हे सुश्रोणि, जिसकी ऐसी मति है, आप अवलिप्त (अभिमानी) हैं; हे मृगशावाक्षि, तप से पुण्य-संचय वृद्धाओं को शोभता है। हे सर्वगुण-सम्पन्ने, आपको ऐसा कहना उचित नहीं; हे भीरु, आप तीनों लोकों में सुन्दरी हैं और आपका यौवन व्यतीत हो रहा है। हे भद्रे, मैं लंकापति दशग्रीव हूँ; आप मेरी भार्या बनें और यथासुख भोग भोगिए। जिस विष्णु को आप कहती हैं वह है कौन; जिसे आप चाहती हैं, हे अंगने, वह वीर्य, तप, भोग और बल में मुझसे समान नहीं।

उसके ऐसा कहने पर वेदवती ने कहा, ऐसा मत कहिए, ऐसा मत कहिए; आपके अतिरिक्त कौन बुद्धिमान त्रिलोकाधिपति, सर्वलोक-नमस्कृत विष्णु का ऐसा अपमान करेगा। ऐसा कहने पर राक्षस ने उसे केशों से पकड़ा। क्रुद्ध वेदवती ने अपने हाथ को खड्ग बनाकर अपने केश काट दिए। मानो रोष से जलती-सी और राक्षस को दहती-सी वह अग्नि प्रज्वलित कर मरण को त्वरित बोली, हे अनार्य, आपसे धर्षित (अपमानित) होकर मैं जीना नहीं चाहती।

वेदवती ने कहा, हे राक्षस, इसलिए आपके देखते मैं अग्नि में प्रवेश करूँगी। क्योंकि वन में आप पापात्मा ने मुझे धर्षित किया, इसलिए आपके वध के लिए मैं फिर उत्पन्न होऊँगी; क्योंकि पाप-निश्चय वाले पुरुष को स्त्री नहीं मार सकती। यदि मैं आप पर शाप दूँ तो मेरे तप का क्षय होगा; इसलिए यदि मैंने कुछ कृत, दत्त या हुत किया हो, तो मैं अयोनिजा (बिना गर्भ से जन्मी) किसी धार्मिक की साध्वी कन्या बनूँ। यह कहकर वह प्रज्वलित अग्नि में प्रविष्ट हो गई। तब आकाश से चारों ओर दिव्य पुष्पवृष्टि हुई।

समझने की कुंजी (अवधारणा): “अयोनिजा” का अर्थ है माता के गर्भ से न जन्मना। वेदवती का यह संकल्प आगे सीता के रूप में फलित होता है, जो हल की रेखा (सीता) से उत्पन्न हुईं, माता के गर्भ से नहीं। यहीं वाल्मीकि सीता-जन्म और रावण-वध के बीच का गूढ़ सूत्र जोड़ते हैं।

वह एक कमल से, कमल जैसी प्रभा वाली कन्या के रूप में पुनः उत्पन्न हुई। उसे भी पहले-सा उस राक्षस ने पाया; कमल-गर्भ-आभा वाली उस कन्या को लेकर वह अपने घर गया। वेदवती को हाथ से पकड़कर रावण ने अपने मन्त्री को दिखाया। लक्षणज्ञ (लक्षण-पारखी) मन्त्री ने उसके लक्षण देखकर रावण से कहा, यदि यह सुश्रोणि गृह में रहेगी तो आपके वध का कारण बनेगी। हे राम, यह सुनकर रावण ने उसे समुद्र में फेंक दिया।

समुद्र से धरती पर पहुँचकर वह यज्ञ-स्थल के मध्य में आई; राजा जनक के हल-मुख (हल की नोक) से उत्कृष्ट (खींची) जाकर वह सती फिर उत्पन्न हुई। हे प्रभु, वही वेदवती राजा जनक की पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई और आपकी भार्या है; हे महाबाहु, आप ही सनातन विष्णु हैं। पूर्व में जिस शत्रु को उसने क्रोध से दग्ध किया था, उसी को इस जन्म में आपके अमानुष पराक्रम का आश्रय लेकर उसने मरवाया।

इस प्रकार यह महाभागा मर्त्यलोक में बार-बार उत्पन्न होती रहेगी, हल-मुख से जुती भूमि में अग्नि-शिखा-सी प्रकट होती हुई। यह जो पूर्व में कृतयुग में वेदवती नाम से थी, त्रेतायुग को पाकर उस राक्षस के वध के लिए मिथिला के राजाओं के कुल में महात्मा जनक की कन्या-रूप में उत्पन्न हुई। क्योंकि वह सीता (हल-रेखा) से उत्पन्न हुई, इसलिए मनुष्य उसे “सीता” कहते हैं।

सार: हिमालय में तपस्विनी वेदवती को रावण ने सताया। उसने अग्नि-प्रवेश करते हुए शाप दिया कि वह रावण के वध के लिए पुनर्जन्म लेगी। वही वेदवती आगे जनक की पुत्री सीता-रूप में जन्मी; यही रावण के अन्त का बीज था।

मरुत्त का यज्ञ और पक्षियों को वरदान

वेदवती के अग्नि में प्रविष्ट होने पर रावण पुष्पक पर चढ़कर फिर पृथ्वी पर विचरने लगा। उशीरबीज पहुँचकर रावण ने देवों सहित यज्ञ करते राजा मरुत्त को देखा। बृहस्पति के सहोदर भाई, धर्मज्ञ संवर्त नामक ब्रह्मर्षि समस्त देवगणों से घिरे वह यज्ञ करा रहे थे।

वर-प्रदान से दुर्जय उस राक्षस को देखकर उसके आक्रमण से भयभीत देव तिर्यक्-योनि (पशु-पक्षी की योनि) में समा गए। इन्द्र मयूर बने, धर्मराज (यम) कौआ, धनाध्यक्ष (कुबेर) गिरगिट, और वरुण हंस बने। इस प्रकार अन्य देवों के भी रूप बदल लेने पर, हे शत्रुसूदन, रावण अशुचि कुत्ते-सा यज्ञ में घुसा। राक्षसाधिप रावण ने राजा मरुत्त के पास जाकर कहा, मुझे युद्ध दीजिए, या कहिए कि “मैं पराजित हूँ”।

तब राजा मरुत्त ने पूछा, आप कौन हैं। अवहास (तिरस्कारपूर्ण हँसी) छोड़कर रावण बोला, हे पार्थिव, मैं आपके अकुतूहल-भाव (निर्भयता) से प्रसन्न हूँ, जो आप मुझे, धनद के अनुज रावण को, नहीं जानते। तीनों लोकों में और कौन है जो मेरे बल को न जानता हो, जिसने भाई को जीतकर यह विमान छीन लिया।

तब राजा मरुत्त ने रावण से कहा, आप धन्य हैं कि अपने ज्येष्ठ भाई को रण में जीता। तीनों लोकों में आप-सा श्लाघ्य कोई नहीं; पहले कौन-सा अनुपम धर्म आचरण कर आपने वर पाए? आप स्वयं जैसा कहते हैं, वैसा मैंने पहले नहीं सुना; हे दुर्मति, अब रुकिए, जीवित न लौटेंगे। आज तीक्ष्ण बाणों से आपको यमक्षय भेजता हूँ। यह कहकर राजा क्रुद्ध होकर धनुष-बाण लेकर युद्ध को उठा, पर संवर्त ने मार्ग रोक लिया।

उस महर्षि ने स्नेहयुक्त मरुत्त से कहा, यदि मेरा वचन सुनने योग्य हो तो आपको संग्राम उचित नहीं; यह माहेश्वर सत्र (यज्ञ) यदि अधूरा रहा तो आपका कुल भस्म कर देगा। दीक्षित को युद्ध कहाँ, दीक्षित को क्रोध कहाँ; जय में सदा संशय है और यह राक्षस सुदुर्जय है। गुरु के वचन से निवृत्त होकर राजा मरुत्त ने बाण-सहित धनुष त्याग दिया और स्वस्थ होकर यज्ञ-मुख हो गए।

उसे पराजित मानकर शुक ने हर्ष से ऊँचे स्वर में घोषणा की, “रावण जीतता है”। तब वहाँ खड़े यज्ञ में आए महर्षियों को रावण ने भक्षण किया और उनके रक्त से तृप्त होकर फिर पृथ्वी पर विचरने लगा।

रावण के जाने पर इन्द्र सहित देव अपनी-अपनी योनि (रूप) को पाकर उन प्राणियों (पशु-पक्षियों) से बोले। हर्ष से इन्द्र ने नील-पंख वाले मयूर से कहा, हे धर्मज्ञ, मैं आपसे प्रसन्न हूँ; सर्पों से आपको भय न होगा। ये जो सहस्र नेत्र-से चिह्न हैं, वे आपके पंखों में होंगे; और मेरे वर्षा करने पर आप प्रीति-लक्षण रूप हर्ष पाएँगे। इस प्रकार सुरेश्वर इन्द्र ने मयूर को वर दिया। हे नराधिप, पहले मयूरों के पंख केवल नीले थे; देवराज से वर पाकर सब मयूरों के सारे शरीर पर वे चिह्न आ गए।

हे राम, धर्मराज यम ने अपने सामने प्राग्वंश (यज्ञशाला के पूर्व बने भवन) पर बैठे कौए से कहा, हे पक्षी, मैं आपसे प्रसन्न हूँ; प्रसन्न का वचन सुनिए; जैसे अन्य प्राणी मुझसे विविध रोगों से पीड़ित होते हैं, वे रोग आप पर प्रभावी न होंगे, इसमें सन्देह नहीं। हे विहंगम, मेरे वर से मृत्यु से आपको भय नहीं; जब तक मनुष्य आपको न मारें, तब तक आप जीवित रहेंगे। और जो मनुष्य मेरे विषय (यमलोक) में भूख से पीड़ित हैं, वे आपके भोजन करने पर अपने बान्धवों सहित तृप्त होंगे।

वरुण ने गंगा-जल में विचरते हंस से कहा, हे पत्ररथेश्वर (पक्षिराज), प्रीतियुक्त वचन सुनिए; आपका वर्ण मन को रमणीय, सौम्य, शुद्ध चन्द्रमण्डल-सा और श्वेत फेन-सी प्रभा वाला होगा। मेरे शरीर (जल) के सम्पर्क में आकर आप सदा कान्त रहेंगे और अतुल प्रीति पाएँगे; यह मेरी प्रीति का लक्षण होगा। हे राम, पहले हंसों का वर्ण सर्वथा श्वेत न था; उनके पंख सिरे पर नीले और छाती शष्प-अग्र-सी श्यामल थी।

तब वैश्रवण (कुबेर) ने पर्वत पर बैठे गिरगिट से कहा, हे गिरगिट, मैं भी आपसे प्रसन्न होकर आपको स्वर्णिम वर्ण देता हूँ। आपका सिर सदा सद्द्रव्य (स्वर्ण)-सा अक्षय रहेगा; मेरी प्रीति से आपका वर्ण स्वर्ण-सा हो जाएगा। इस प्रकार उन प्राणियों को वर देकर देव उस यज्ञोत्सव की समाप्ति पर अपने राजा इन्द्र सहित अपने-अपने भवन को लौट गए।

सार: उशीरबीज में मरुत्त के यज्ञ में रावण आया; भयभीत देव मयूर, कौआ, गिरगिट, हंस बन गए। गुरु संवर्त के परामर्श से मरुत्त ने युद्ध टाला। रावण ऋषियों को खाकर चला गया। तब देवों ने उन पशु-पक्षियों को (जिनके रूप उन्होंने लिए थे) वरदान दिए, जिनसे मयूर के पंखों के चिह्न, कौए की निर्भयता, हंस का श्वेत वर्ण और गिरगिट का स्वर्णिम सिर आया।

मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, उत्तरकाण्ड, सर्ग 1-36; पाठान्तर में गीता प्रेस का क्रम रखा गया है।

आधार: वाल्मीकि रामायण (गीता प्रेस, गोरखपुर)