अध्याय 30 · रावण-कुल का पूर्वचरित्र

वाल्मीकि रामायण · उत्तरकाण्ड
रावण-कुल का पूर्वचरित्र, पुलस्त्य से वंश, कुबेर और रावण का जन्म, रावण की दिग्विजय और तपस्या, और वेदवती तथा नलकूबर के शाप जो आगे उसके अन्त के बीज बने।

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रावण-वध के पश्चात जब श्रीराम ने राज्य पुनः पाया, तब समस्त दिशाओं के महर्षि अयोध्या आए, राघव को बधाई देने। पूर्व दिशा से कौशिक, यवक्रीत, गार्ग्य, गालव और मेधातिथि-पुत्र कण्व; दक्षिण से स्वस्त्यात्रेय, भगवान नमुचि, प्रमुचि, अगस्त्य, अत्रि, सुमुख, विमुख; पश्चिम से नृषंगु, कवष, धौम्य और महर्षि कौशेय अपने शिष्यों सहित; और उत्तर दिशा के नित्यवासी सप्तर्षि (सात महर्षि) वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज। अग्नि-सी प्रभा वाले, वेद और वेदांग के ज्ञाता, अनेक शास्त्रों में निपुण ये महात्मा राघव के भवन पहुँचे और द्वार पर प्रतीक्षा करने लगे। धर्मात्मा अगस्त्य ने द्वारपाल से कहा कि राम को सूचित कीजिए कि हम ऋषिगण आए हैं। नीतिज्ञ, सदाचारी, चतुर और धैर्यवान द्वारपाल शीघ्र महात्मा राघव के समीप गया।

महर्षियों का अभिनन्दन और राम का प्रश्न

राम राज-सभा में हाथ जोड़े अगस्त्य आदि ऋषियों का स्वागत करते हुए; ऋषि दंड-कमंडलु लिए पधारते।

पूर्णचन्द्र-सी द्युति वाले राम को देखकर द्वारपाल ने तत्काल अगस्त्य तथा अन्य ऋषियों के आगमन की सूचना दी। बालसूर्य-सी प्रभा वाले उन मुनियों के आने की बात सुनकर राम ने उन्हें सम्मानपूर्वक भीतर लाने को कहा। उन ऋषिपुंगवों को आते देख राम हाथ जोड़कर खड़े हो गए, उन्हें प्रणाम किया, पाद्य और अर्घ्य (चरण और हाथ धोने का जल) अर्पित किया, एक गौ भेंट की, और आसन सजवाए। कुश से बने, स्वर्ण से जड़े और मृगचर्म से ढके श्रेष्ठ आसनों पर वे यथायोग्य बैठे। राम ने उनकी तथा उनके शिष्यों और गुरुजनों की कुशल पूछी। तब वे वेदज्ञ महर्षि बोले कि हे महाबाहु, हे रघुनन्दन, हम सर्वत्र कुशल हैं।

उन्होंने कहा, यह हमारा सौभाग्य है कि शत्रुओं का संहार करके आप शुभ-कुशल दिखाई दे रहे हैं। हे राजन, आपने लोकरावण (लोक को रुलाने वाले) रावण को मार डाला, यह परम भाग्य की बात है। हे राम, जो आप अपने धनुष से बिना सन्देह तीनों लोकों को जीत सकते हैं, उनके लिए पुत्र-पौत्रों सहित रावण कोई भार न था। हम आपको सीता और भ्राता लक्ष्मण सहित, माताओं और भाइयों सहित विजयी देख रहे हैं। प्रहस्त, विकट, विरूपाक्ष, महोदर, दुर्धर्ष अकम्पन (ये सब) निशाचर मारे गए। जिनके प्रमाण से बढ़कर विशाल प्रमाण कहीं नहीं था, वे कुम्भकर्ण रणभूमि में आपके हाथों गिरे। त्रिशिरा, अतिकाय, देवान्तक और नरान्तक भी मारे गए। कुम्भकर्ण के भयानक पुत्र कुम्भ और निकुम्भ भी रण में मारे गए।

अगस्त्य बैठे राम को पूर्व-कथा सुनाते हुए; ऊपर गरुड़ पर विष्णु राक्षस योद्धाओं को बाणों से बेधते।

उन्होंने आगे कहा, यमतुल्य युद्धोन्मत्त और मत्त, बलवान यज्ञकोप, और धूम्राक्ष नामक राक्षस, जो शस्त्रअस्त्र में पारंगत थे, यम-से बाणों से भीषण संहार करते हुए आपके हाथों मारे गए। आप देवताओं के लिए भी अवध्य राक्षसराज के साथ द्वन्द्व-युद्ध में विजयी हुए। उस रावण का परास्त होना तो कोई आश्चर्य की बात नहीं, परन्तु जो उसका पुत्र (इन्द्रजित) द्वन्द्व-युद्ध को प्राप्त हुआ, उसका वध सन्तोष की बात है। हे महाबाहु, यह हमारा सौभाग्य है कि आप उस देवशत्रु इन्द्रजित के नागपाश (सर्पों के बन्धन) से मुक्त हुए और काल-से उस पर टूट पड़कर विजय पाई।

ऋषियों ने कहा, हम सब इन्द्रजित के वध को सुनकर आपका अभिनन्दन करते हैं। समस्त भूतों के लिए अवध्य, युद्ध में महामाया धारण करने वाले उस इन्द्रजित का मारा जाना सुनकर हमें परम आश्चर्य और हर्ष हुआ। हे रघुवंशवर्धन, हे काकुत्स्थ, आपने इन और अन्य अनेक कामरूपी राक्षसों का संहार किया तथा हमें अभयदान दिया, यह हमारा सौभाग्य है। भावितात्मा (आत्मतत्त्व को जानने वाले) उन मुनियों का यह वचन सुनकर राम परम आश्चर्य में पड़कर हाथ जोड़कर बोले।

राम हाथ जोड़े आसन पर बैठे अगस्त्य मुनि से रावण के कुल की कथा सुनते हुए।

राम ने पूछा, परम पराक्रमी महोदर, प्रहस्त, विरूपाक्ष, मत्त-उन्मत्त, देवान्तक-नरान्तक, अतिकाय, त्रिशिरा, धूम्राक्ष को छोड़कर आप रावण-पुत्र की ही प्रशंसा क्यों कर रहे हैं? इसका प्रभाव कैसा है, बल और पराक्रम कैसा है, किस कारण यह अपने पिता रावण से भी अधिक माना जाता है? इसने वर कैसे पाए, और इन्द्र को कैसे जीता? यदि यह कोई गुप्त रहस्य न हो और मेरे सुनने योग्य हो, तो हे मुनीन्द्र, मुझे बताइए। मैं आपको आज्ञा नहीं देता, परन्तु जानने की उत्कण्ठा रखता हूँ।

सार: राम के राज्याभिषेक के बाद महर्षि बधाई देने आते हैं। वे विशेषकर इन्द्रजित (रावण-पुत्र) के वध की सराहना करते हैं। राम पूछते हैं कि रावण और इन्द्रजित का वंश, बल और इतिहास क्या है। यहीं से अगस्त्य द्वारा सुनाई जाने वाली रावण-कुल की पूर्वकथा आरम्भ होती है।

पुलस्त्य की तपस्या और विश्रवा का जन्म

राघव का वचन सुनकर महातेजस्वी कुम्भयोनि अगस्त्य बोले। उन्होंने कहा, हे राम, उसके (इन्द्रजित के) उस महान तेज और बल को सुनिए, जिससे उसने शत्रुओं का संहार किया और जिसके कारण वह शत्रुओं के लिए अवध्य रहा। बीच-बीच में मैं आपको रावण के कुल, जन्म और उसे दिए गए वरदान की भी कथा सुनाऊँगा।

ऋषि पुलस्त्य वन की कुटिया के आगे पद्मासन में ध्यानमग्न; पास झरना और मोर।

हे राम, प्राचीन कृतयुग (पहले युग) में प्रजापति-पुत्र, साक्षात पितामह-तुल्य पुलस्त्य नामक एक प्रसिद्ध और प्रभावशाली ब्रह्मर्षि थे। उनके धर्म और शील के गुणों का वर्णन सम्भव नहीं; इतना कहना ही पर्याप्त है कि वे ब्रह्मा के पुत्र थे। प्रजापति का पुत्र होने के कारण वे देवताओं के प्रिय और अपने शुभ्र गुणों से समस्त लोक के प्रिय थे। धर्म में अनुरक्त वे मुनिपुंगव महागिरि मेरु के पार्श्व में तृणबिन्दु के आश्रम में जाकर रहने लगे।

स्वाध्याय में नियत-इन्द्रिय वह धर्मात्मा वहाँ तप करते थे। वह स्थान वृक्षों से भरा, सब ऋतुओं में रमणीय और भोग्य था; इसी से ऋषि, नाग और राजर्षि की कन्याएँ तथा अप्सराएँ प्रतिदिन वहाँ आकर गाती, खेलती, बजाती और नाचती थीं, और तपस्वी मुनि के तप में निर्दोष भाव से विघ्न डालती थीं। रुष्ट होकर महामुनि ने कहा कि जो मेरे दृष्टि-पथ में आएगी, वह गर्भ धारण करेगी। उस महात्मा का वचन सुनकर ब्रह्म-शाप के भय से वे कन्याएँ उस स्थान पर आना बन्द कर देती थीं।

तपस्वी पुलस्त्य कुटिया के पास बैठे; पीछे वन-पथ से एक राजकन्या सकुचाती हुई निकट आती।

परन्तु राजर्षि तृणबिन्दु की कन्या ने यह न सुना और निर्भय होकर आश्रम में विचरने लगी। वहाँ उसने अपनी किसी सखी को न पाया। उसी समय महातेजस्वी प्रजापति-पुत्र महर्षि तप से भावित होकर स्वाध्याय कर रहे थे। वेदध्वनि सुनकर और तप-निधि को देखकर उसका शरीर एकाएक पाण्डु (पीला) हो गया और गर्भ के लक्षण प्रकट हो गए। यह परिवर्तन देखकर वह उद्विग्न हुई और सोचने लगी कि यह क्या है। फिर वह अपने पिता के आश्रम में जाकर खड़ी हो गई।

कैकसी हाथ जोड़े वन में बैठे तपस्वी विश्रवा के सम्मुख संतान की कामना लेकर खड़ी।

उसे ऐसी अवस्था में देखकर तृणबिन्दु ने पूछा कि आपका शरीर अपने रूप से भिन्न क्यों लग रहा है। दीन होकर वह कन्या हाथ जोड़कर बोली कि हे तात, मैं इस परिवर्तन का कारण नहीं जानती। पहले मैं अकेली अपनी सखियों को ढूँढ़ने महर्षि पुलस्त्य के दिव्य आश्रम में गई थी। वहाँ मुझे कोई सखी न मिली, परन्तु अपने रूप का यह विपर्यय देखकर मैं त्रास से यहाँ आई हूँ।

एक युवा ऋषि हाथ जोड़े अपनी पत्नी सहित कुटिया के बाहर बैठे वृद्ध तपस्वी का आशीर्वाद लेते हुए।

तप से दीप्त राजर्षि तृणबिन्दु ध्यान में गए और जान गए कि यह ऋषि के कर्म से हुआ है। उस महर्षि का शाप जानकर वे अपनी कन्या को लेकर पुलस्त्य के पास गए और बोले, हे भगवन, हे महर्षि, अपने ही गुणों से विभूषित मेरी यह कन्या स्वयं आपके पास आई है; इस भिक्षा को स्वीकार कीजिए। तपश्चर्या में थके आपकी श्रमित इन्द्रियों की यह सदा शुश्रूषा करेगी, इसमें सन्देह नहीं। उस धार्मिक राजर्षि के ऐसे वचन सुनकर कन्या को ग्रहण करने की इच्छा से ब्राह्मण पुलस्त्य ने “बाढम् (बहुत अच्छा)” कहा।

कन्या देकर राजा अपने आश्रम लौट गए। वह कन्या वहीं रहकर अपने गुणों से पति को सन्तुष्ट करने लगी। उसके शील और आचरण से मुनिपुंगव तुष्ट हुए और प्रसन्न होकर बोले, हे सुश्रोणि, हे देवी, मैं आपके गुणों की सम्पदा से अत्यन्त प्रसन्न हूँ; इसलिए आज आपको अपने समान एक पुत्र दूँगा, जो दोनों वंशों का कर्ता होगा और “पौलस्त्य” नाम से प्रसिद्ध होगा। और क्योंकि मेरे वेद-पाठ करते समय आपने उसे सुना (विश्रवण किया), इसलिए वह निःसन्देह “विश्रवा” नाम से प्रसिद्ध होगा।

यह सुनकर वह देवी हृदय में प्रसन्न हुई और शीघ्र ही उसने विश्रवा नामक पुत्र को जन्म दिया, जो धर्म और यश से सम्पन्न होकर तीनों लोकों में प्रसिद्ध हुआ। श्रुतिमान, समदर्शी, व्रत-आचरण में रत वह विश्रवा मुनि अपने पिता के समान तप में लगे रहे।

सार: ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्य के शाप से तृणबिन्दु की कन्या गर्भवती हुई। तृणबिन्दु ने उसे पुलस्त्य को सौंप दिया। पुलस्त्य से उसके पुत्र विश्रवा का जन्म हुआ, जो आगे रावण-कुल का पिता बना।

वैश्रवण (कुबेर) का जन्म और लंका में निवास

पुलस्त्य-पुत्र मुनिपुंगव विश्रवा शीघ्र ही अपने पिता के समान तप में लग गए। वे सत्यवान, शीलवान, दान्त, स्वाध्याय-निरत, शुचि, समस्त भोगों में अनासक्त और नित्य धर्म-परायण थे। उनका आचरण जानकर महामुनि भरद्वाज ने अपनी देवी-सी रूपवती कन्या देववर्णिनी विश्रवा को विवाह में दी। धर्मपूर्वक भरद्वाज की कन्या को ग्रहण करके वे प्रजा और अपने श्रेय की कामना से पुत्र की चिन्ता करने लगे।

उस देववर्णिनी में विश्रवा ने वीर्य-सम्पन्न, ब्राह्मण के समस्त गुणों से युक्त एक परम अद्भुत पुत्र उत्पन्न किया। उसके जन्म पर पितामह (विश्रवा) सन्तुष्ट हुए; और यह देखकर कि वह लोक का कल्याण करेगा और धन का अध्यक्ष होगा, उन्होंने देवर्षियों के साथ मिलकर उसका नाम रखा। उन्होंने कहा कि क्योंकि यह विश्रवा का अपत्य है और रूप में पिता-सा है, इसलिए यह “वैश्रवण” नाम से प्रसिद्ध होगा।

तब वह महातेजस्वी वैश्रवण तपोवन में जाकर आहुति से सिंचित अग्नि-सा बढ़ने लगा। आश्रम में रहते उस महात्मा को विचार आया कि उसे परम धर्म का आचरण करना चाहिए, क्योंकि धर्म ही परम गति है। वह विशाल वन में सहस्रों वर्ष कठोर नियमों से इन्द्रियों को संयत करके अत्यन्त उग्र तप करता रहा। सहस्र वर्ष पूर्ण होने पर उसने उस-उस अवसर के अनुकूल विधि अपनाई; पहले जल पर, फिर वायु पर, और फिर निराहार रहकर तप किया। इस प्रकार सहस्रों वर्ष एक वर्ष-से बीत गए।

तब प्रसन्न होकर महातेजस्वी ब्रह्मा इन्द्र और देवगणों सहित उसके आश्रम पहुँचे और बोले, हे वत्स, हे सुव्रत, आपकी कुशल हो, मैं आपके इस कर्म से प्रसन्न हूँ; हे धर्मज्ञ, शीघ्र अपना अभीष्ट वर माँगिए, आपका परिश्रम व्यर्थ न जाए। तब हर्ष से गद्गद वाणी में सिर झुकाकर वैश्रवण ने कहा कि हे भगवन, मैं लोकपालत्व और लोकरक्षण चाहता हूँ। प्रसन्न-मन ब्रह्मा ने कहा, बाढम्; मैं चौथे लोकपाल की रचना करने ही जा रहा था। आप इन्द्र, वरुण और यम के समान चौथे लोकपाल बनेंगे; और यह सूर्य-सा प्रकाशमान पुष्पक नामक विमान वाहन के रूप में ग्रहण कीजिए, देवों के समान हो जाइए; आपकी कुशल हो, हम दो वर देकर ज्यों आए थे त्यों लौट जाते हैं। यह कहकर ब्रह्मा देवों सहित अपने स्थान को लौट गए।

ब्रह्मा और देवों के आकाश को लौट जाने पर, हाथ जोड़कर विनीत-आत्म धनेश ने अपने पिता से कहा कि हे भगवन, पितामह से तो मैंने इष्ट वर पा लिया, परन्तु उस प्रजापति ने मेरे निवास का स्थान नियत नहीं किया; हे प्रभु, मुझे कोई ऐसा साधु निवास बताइए जहाँ किसी प्राणी को पीड़ा न हो। इस प्रकार पुत्र के कहने पर मुनिपुंगव विश्रवा बोले, हे धर्मज्ञ, हे सत्तम, सुनो।

उन्होंने कहा, दक्षिण समुद्र के तट पर त्रिकूट नामक एक पर्वत है। उसके अग्रभाग पर महेन्द्र की पुरी-सी विशाल, विश्वकर्मा द्वारा निर्मित, रमणीय लंका नामक नगरी है, जो राक्षसों के निवास के लिए वैसी ही बनी थी जैसे इन्द्र के लिए अमरावती। उसकी प्राचीर और परिखा (खाई) स्वर्ण की है, वह यन्त्रों और शस्त्रों से युक्त है, और उसके तोरण (द्वार) स्वर्ण और वैदूर्य-मणि के बने हैं। बहुत पहले विष्णु के भय से पीड़ित राक्षसों ने उसे छोड़ दिया था; वे सब रसातल चले गए और अब लंका शून्य है, उसका कोई स्वामी नहीं। हे पुत्र, आप वहाँ लंका में निवास कीजिए, इसमें सन्देह नहीं; वहाँ आपका वास निर्दोष होगा और किसी को बाधा न होगी।

पिता के इस अत्यन्त धार्मिक वचन को सुनकर वह धर्मात्मा पर्वत के शिखर पर बसी लंका में रहने लगा। उसके शासन से शीघ्र ही वह नगरी हर्षित और प्रमुदित सहस्रों नैरृतों (राक्षसों) से भर गई। समुद्र को परिखा बनाए हुए उस लंका में विश्रवा-पुत्र, नैरृतों का धर्मात्मा वृषभ, प्रसन्न होकर रहने लगा। समय-समय पर वह विनीत-आत्म धनेश पुष्पक से अपने माता-पिता के दर्शन को जाता था। देव-गन्धर्व-गण उसकी स्तुति करते, अप्सराओं के नृत्य से उसका भवन सुशोभित था, और किरणों से सूर्य-सा प्रकाशित होकर वह विख्यात धनेश अपने पिता के समीप जाता था।

सार: विश्रवा और भरद्वाज-कन्या देववर्णिनी से वैश्रवण (कुबेर) का जन्म हुआ। तप से प्रसन्न ब्रह्मा ने उसे चौथा लोकपाल बनाया और पुष्पक विमान दिया। विश्रवा के परामर्श से वह शून्य पड़ी लंका में बस गया।

राक्षस-वंश का उद्भव: हेति, विद्युत्केश और सुकेश

अगस्त्य का वचन सुनकर राम विस्मय में पड़ गए और बोले, हे निष्पाप, यह तो बताइए कि कुबेर से भी पहले लंका में राक्षस कैसे रहते थे। तीन अग्नियों-सी प्रभा वाले अगस्त्य की ओर सिर हिलाकर बार-बार देखते हुए राम ने सुस्कार कर कहा, हे भगवन, आपके यह कहने से कि लंका पहले भी मांसाशियों की थी, मुझे परम विस्मय हुआ। हमने तो सुना है कि राक्षसों का उद्भव पुलस्त्य-वंश से हुआ, परन्तु अब आप उनका जन्म अन्यत्र से बताते हैं। क्या वे रावण, कुम्भकर्ण, प्रहस्त, विकट और रावण-पुत्रों से अधिक बलवान थे? हे ब्रह्मन, उनका पूर्वज कौन था, कौन वह बलोत्कट था, और किस अपराध के कारण विष्णु ने उन्हें कैसे भगाया? यह सब विस्तार से कहकर सूर्य के समान मेरी यह कौतूहल रूपी अन्धकार दूर कीजिए।

चतुर्मुख ब्रह्मा कमल पर विराजमान; नीचे सागर-जल से यक्ष-राक्षस जैसे प्राणी हाथ जोड़े प्रकट होते हुए।

राघव के संस्कारयुक्त शुभ वचन सुनकर विस्मित होते हुए अगस्त्य बोले। उन्होंने कहा, प्राचीनकाल में सलिल से उत्पन्न प्रजापति (ब्रह्मा) ने जल की रचना करके उनकी रक्षा के लिए जीवों को उत्पन्न किया। क्षुधा और पिपासा (भूख-प्यास) के भय से पीड़ित वे जीव विनीत होकर सत्त्व-कर्ता के पास गए और बोले, हम क्या करें। प्रजापति ने हँसते हुए-से कहा, यत्नपूर्वक इन जलों की “रक्षा कीजिए”। उनमें कुछ ने कहा “रक्षाम (हम रक्षा करेंगे)” और कुछ ने कहा “यक्षाम (हम पूजा करेंगे)”। तब ब्रह्मा ने कहा, जिन्होंने कहा “रक्षाम” वे राक्षस हों, और जिन्होंने कहा “यक्षाम” वे यक्ष हों।

एक उप-कथा: “राक्षस” और “यक्ष” नामों की यह व्युत्पत्ति शब्द-क्रीड़ा पर आधारित है: रक्षाम (रक्षा करना) से राक्षस और यक्षाम (पूजा करना) से यक्ष। वाल्मीकि यहाँ यह संकेत देते हैं कि मूलतः ये जीव एक ही सृष्टि के थे, जो जल की रखवाली के लिए नियुक्त हुए; उनकी प्रकृति में भेद उनके अपने चुनाव से आया।

उन राक्षसों में हेति और प्रहेति दो भाई थे, जो राक्षसों के अधिपति और शत्रुदमन में मधु-कैटभ-समान थे। उनमें धार्मिक प्रहेति तपोवन चला गया, और हेति ने स्वयं विवाह का प्रयत्न किया। महामति हेति ने काल (यम) की बहन भया नामक महाभया कन्या से स्वयं विवाह किया। उस राक्षसपुंगव ने उससे विद्युत्केश नामक पुत्र उत्पन्न किया, और पुत्रवानों में श्रेष्ठ कहलाया। हेति-पुत्र दीप्त सूर्य-सी प्रभा वाला महातेजस्वी विद्युत्केश जल के मध्य कमल-सा बढ़ने लगा।

जब वह निशाचर भद्र यौवन को प्राप्त हुआ, तब उसके पिता ने उसके विवाह का यत्न किया। राक्षसपुंगव हेति ने विश्वावसु-सी प्रभा वाले ग्रामणी नामक गन्धर्व की कन्या से विद्युत्केश का विवाह कराया, क्योंकि सन्ध्या ने यह सोचकर कि कन्या अवश्य ही पराए को देनी होगी, अपनी सन्ध्या-तुल्य प्रभाव वाली कन्या सालकटंकटा को विद्युत्केश को दे दिया। उसे पाकर विद्युत्केश उसके साथ ऐसे रमने लगा जैसे इन्द्र पौलोमी (शची) के साथ।

कुछ काल बाद, हे राम, सालकटंकटा ने विद्युत्केश से गर्भ धारण किया, जैसे मेघमाला समुद्र से जल ग्रहण करती है। उस राक्षसी ने मन्दर पर्वत पर जाकर मेघ-गर्भ-सी प्रभा वाले उस पुत्र को जन्म दिया, जैसे गंगा ने अग्नि से उत्पन्न (शिव के) गर्भ को। विद्युत्केश के साथ रमण की इच्छा से वह अपने पुत्र को छोड़कर पति के साथ रमने चली गई। माता के त्यागे हुए उस शिशु ने मेघ-सा गर्जन किया। शरद्-सूर्य-सी द्युति वाले उस शिशु ने अपनी मुट्ठी मुख में रखकर धीरे-धीरे रुदन किया।

शिव-पार्वती नंदी पर आकाश मार्ग से जाते हुए, नीचे भूमि पर रोते राक्षस-शिशु सुकेश को देखते।

तब वृषभ पर सवार पार्वती-सहित शिव वायु-मार्ग से जाते हुए रुदन-स्वर सुनकर रुके। उमा के करुणा-भाव से त्रिपुर-सूदन भव (शिव) ने उस रोते राक्षस-बालक को देखा। अक्षर-अव्यय महादेव ने उस राक्षस-पुत्र को उसकी माता-सी अवस्था का (अर्थात तुरन्त युवा) बना दिया और अमर भी कर दिया। उमा ने भी राक्षस-स्त्रियों को यह वर दिया कि गर्भ का तत्काल लाभ हो, तत्काल प्रसूति हो, और शिशु तत्काल अपनी माता की अवस्था को प्राप्त हो जाए। शिव ने उसे आकाश में चलने वाली एक नगरी भी दी। तब वरदान से गर्वित वह महामति सुकेश शिव से धन और श्री पाकर पुरन्दर (इन्द्र) के समान आकाशगामी नगरी पर चढ़कर सर्वत्र विचरने लगा।

सार: राक्षस सृष्टि के आदि-काल से ही जल-रक्षक के रूप में बने। हेति, फिर विद्युत्केश, फिर सुकेश, इस वंश-परम्परा का आरम्भ हुआ। माता द्वारा त्यागे गए सुकेश को शिव-पार्वती ने अमरत्व और आकाशगामी नगरी का वर दिया।

सुकेश-पुत्र: माल्यवान, सुमाली और माली

धार्मिक और वर-प्राप्त राक्षस सुकेश को देखकर विश्वावसु-सी प्रभा वाले ग्रामणी नामक गन्धर्व ने अपनी द्वितीय श्री-सी, तीनों लोकों में विख्यात, रूप-यौवन-शालिनी कन्या देववती सुकेश को दी। वर-प्रदान से ऐश्वर्य पाए प्रिय पति को पाकर देववती ऐसे सन्तुष्ट हुई जैसे निर्धन धन पाकर। उसके साथ युक्त वह रजनीचर अंजन से निकले महागज-सा सुशोभित हुआ।

कालक्रम से, हे राघव, सुकेश ने उससे तीन अग्नियों-से तेजस्वी तीन पुत्र उत्पन्न किए: माल्यवान, सुमाली, और बलवानों में श्रेष्ठ माली। तीन त्रिनेत्र-से वे तीन पुत्र तीन लोकों-से अव्यग्र, तीन अग्नियों-से, तीन शक्तियों (प्रभुशक्ति, उत्साहशक्ति और मन्त्रशक्ति) से अत्युग्र, और तीन दोषों (वात, पित्त, कफ से उत्पन्न रोगों) से घोर थे। उपेक्षित व्याधियों-से वे बढ़ने लगे।

तप के बल से पिता का ऐश्वर्य और वर-प्राप्ति जानकर वे तीनों भाई कृतनिश्चय होकर मेरु पर तप करने गए। घोर नियम धारण करके, हे नृपसत्तम, उन राक्षसों ने सब प्राणियों के लिए भयावह घोर तप किया। सत्य, आर्जव और शम से युक्त, भूमि पर दुर्लभ उस तप से उन्होंने देव-असुर-मनुष्यों सहित तीनों लोकों को सन्तप्त किया। तब चतुर्मुख विभु (ब्रह्मा) श्रेष्ठ विमान पर सुकेश-पुत्रों के पास आकर बोले, मैं वरदाता हूँ। ब्रह्मा को इन्द्र-सहित देवगणों से घिरा वरदाता जानकर सब वृक्षों-से काँपते हुए हाथ जोड़कर बोले, हे देव, यदि हमारे तप से आराधित होकर वर देते हैं तो हम अजेय, शत्रुहन्ता, चिरजीवी, प्रभविष्णु और परस्पर अनुरक्त हों।

“ऐसा ही होगा” कहकर ब्राह्मण-वत्सल ब्रह्मा ब्रह्मलोक चले गए। वर पाकर और उससे निर्भय होकर वे तीनों राक्षस देव-असुरों को सताने लगे। उनसे पीड़ित देव, ऋषि और चारण नरक में पड़े मनुष्यों-से कोई रक्षक न पाते थे।

विश्वकर्मा प्रसन्न राक्षसों को स्वर्ण नगरी लंका का प्रतिरूप सौंपते हुए; पीछे पर्वत पर बसी नगरी।

हर्षित होकर वे राक्षस शिल्पियों में श्रेष्ठ अव्यय विश्वकर्मा के पास आए और बोले, हे महामति, आप ही देवों के लिए ओज-तेज-बल से युक्त भवन बनाते हैं; इस बार हमारे लिए भी हिमवान, मेरु या मन्दर पर महेश्वर के भवन-सा विशाल घर बनाइए। तब महाबाहु विश्वकर्मा ने उन्हें अमरावती-सा निवास बताया। उन्होंने कहा, दक्षिण समुद्र के तट पर त्रिकूट नामक पर्वत है। उसके पास सुवेल नामक एक और पर्वत है। मेघ-सी मध्यम चोटी पर, जिसकी चारों दिशाएँ टंकी (छेनी) से छिन्न होने के कारण पक्षियों तक के लिए दुष्प्राप्य हैं, मैंने इन्द्र की आज्ञा से तीस योजन चौड़ी और सौ योजन लम्बी, स्वर्ण-प्राचीर और स्वर्ण-तोरण से युक्त “लंका” नामक नगरी बनाई है। हे राक्षसपुंगवो, उस दुर्धर्ष नगरी में आप वैसे ही निवास कीजिए जैसे इन्द्र-सहित देवगण अमरावती में। बहुत राक्षसों से घिरे, लंका-दुर्ग को पाकर आप शत्रुओं के लिए दुराधर्ष और शत्रुसूदन हो जाएँगे।

समझने की कुंजी (स्थान): लंका का यह आदि-वर्णन इसे दक्षिण समुद्र के तट पर त्रिकूट पर्वत की मध्यम चोटी पर रखता है, तीस योजन (लगभग 380 से 400 किलोमीटर) चौड़ी और सौ योजन (लगभग 1280 से 1300 किलोमीटर) लम्बी। यह काव्यात्मक विशालता राक्षस-नगरी की अमरावती-तुल्य भव्यता दर्शाने के लिए है, ऐतिहासिक माप के रूप में नहीं।

विश्वकर्मा का वचन सुनकर वे राक्षसश्रेष्ठ सहस्रों अनुचरों सहित उस नगरी में जाकर रहने लगे। दृढ़ प्राचीर-परिखा वाली, सैकड़ों स्वर्ण-भवनों से युक्त लंका को पाकर वे रजनीचर हर्षित होकर बसे।

उसी काल में, हे रघुनन्दन, नर्मदा नामक एक गन्धर्वी थी, जिसकी ह्री, श्री और कीर्ति-सी द्युति वाली तीन कन्याएँ थीं। उस अराक्षसी ने पूर्णचन्द्र-से मुख वाली अपनी तीनों गन्धर्व-कन्याएँ ज्येष्ठता के क्रम से तीनों राक्षसेन्द्रों को दीं। उत्तरा-फाल्गुनी (भगदैवत) नक्षत्र में माता ने वे महाभागा कन्याएँ दीं। विवाह कर वे सुकेश-पुत्र अपनी पत्नियों के साथ ऐसे क्रीड़ा करने लगे जैसे देवता अप्सराओं के साथ।

माल्यवान की पत्नी सुन्दरी नामक सुन्दरी थी। उससे माल्यवान के ये पुत्र हुए: वज्रमुष्टि, विरूपाक्ष, राक्षस दुर्मुख, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, मत्त और उन्मत्त; और एक सुन्दर कन्या अनला भी हुई। सुमाली की पत्नी पूर्णचन्द्र-से मुख वाली, प्राणों से भी प्रिय केतुमती थी। उससे सुमाली के ये पुत्र हुए: प्रहस्त, अकम्पन, विकट, कालिकामुख, धूम्राक्ष, दण्ड, महाबल सुपार्श्व, संह्रादि, प्रघस और राक्षस भासकर्ण; तथा शुचि-स्मिता कन्याएँ राका, पुष्पोत्कटा, कैकसी और कुम्भीनसी।

माली की पत्नी वसुदा नामक रूपवती गन्धर्वी थी, जिसकी आँखें कमल-दल-सी थीं और जो यक्षियों में श्रेष्ठ-सी थी। उससे माली के ये पुत्र हुए: अनल, अनिल, हर और सम्पाति। ये माली के पुत्र आगे विभीषण के अमात्य बने। पुत्रों के सैकड़ों और निशाचरों से घिरे, अपने अत्यधिक पराक्रम से गर्वित वे तीनों राक्षसपुंगव इन्द्र-सहित देवों, ऋषियों, नागों और यक्षों को सताते थे। वायु-से संसार में घूमते, रण में मृत्यु-से तेजस्वी, वर-प्रदान से अत्यन्त गर्वित वे सदा यज्ञ-क्रियाओं में विघ्न डालते थे।

सार: सुकेश के तीन पराक्रमी पुत्र माल्यवान, सुमाली और माली ने तप से ब्रह्मा का वर पाया और विश्वकर्मा-निर्मित लंका में बसे। नर्मदा-कन्याओं से विवाह कर उनके अनेक पुत्र हुए, जिनमें प्रहस्त, धूम्राक्ष, विरूपाक्ष आदि आगे की कथा के पात्र हैं। ये तीनों भाई देवों और ऋषियों को सताते थे।

देवों की प्रार्थना और विष्णु का आगमन

माली, सुमाली और माल्यवान राक्षसों तथा उनके अग्रगामियों से मारे जा रहे देव और तपोधन ऋषि, भयार्त होकर देवदेव महेश्वर की शरण गए; जो जगत के सृष्टि-कर्ता और अन्त-कर्ता, अज, अव्यक्तरूपी, समस्त लोकों के आधार, आराध्य और परम गुरु हैं। काम और त्रिपुर के अरि (शत्रु) त्रिलोचन के पास जाकर भय से गद्गद स्वर में देव हाथ जोड़कर बोले।

उन्होंने कहा, हे भगवन, हे प्रजाध्यक्ष, पितामह के वर से उद्धत सुकेश-पुत्रों के शत्रु-बाधन से समस्त प्रजा पीड़ित है। हमारे शरण्य आश्रम अशरण्य कर दिए गए हैं। देवों को स्वर्ग से निकालकर वे स्वर्ग में देव-से क्रीड़ा करते हैं। वे रण में उद्धत होकर हमें सताते हैं कि “मैं विष्णु हूँ, मैं रुद्र, मैं ब्रह्मा, मैं देवराज, मैं यम, मैं वरुण, मैं चन्द्र और सूर्य हूँ”। हे देव, हम भयार्तों को अभय दीजिए; अशिव (उग्र) रूप धारण कर इन देवकण्टकों को मारिए।

समस्त देवों के यह कहने पर कपर्दी, नीललोहित शिव, जिनकी सुकेश के प्रति कुछ अपेक्षा थी, देवगणों से बोले। उन्होंने कहा, मैं इन्हें न मारूँगा, क्योंकि वे असुर मेरे लिए अवध्य हैं; परन्तु मैं वह मन्त्र (उपाय) बताता हूँ जो इन्हें मारेगा। हे महर्षियो, इसी उद्योग को सामने रखकर विष्णु की शरण जाइए, वही प्रभु इन्हें मारेंगे। तब जय-शब्द से महेश्वर का अभिनन्दन कर, निशाचरों से भयार्त वे विष्णु के समीप गए।

शंख-चक्र-धारी देव को प्रणाम और बहुमान कर, सम्भ्रान्त स्वर में वे सुकेश-पुत्रों के विषय में बोले। उन्होंने कहा, हे देव, वर-प्रदान से तीन अग्नियों-से उन तीन सुकेश-पुत्रों ने हमारे स्थानों पर आक्रमण कर उन्हें छीन लिया है। त्रिकूट-शिखर पर स्थित दुर्गम लंका नामक नगरी है; वहाँ बैठे क्षणदाचर (राक्षस) हम सबको सताते हैं। हे मधुसूदन, आप हमारे हित के लिए उन्हें मारिए; हम आपकी शरण आए हैं, हे सुरेश्वर, हमारी गति बनिए। हे देव, चक्र से इन उद्धत राक्षसों के कमल-से मुख काटकर यम को अर्पित कीजिए और सूर्य के हिम को पिघलाने-से हमारा भय दूर कीजिए।

देवों के यह कहने पर देवदेव जनार्दन ने शत्रुओं को भय देने वाला अभय देवों को देकर कहा। उन्होंने कहा, मैं ईशान के वर से उद्धत राक्षस सुकेश को जानता हूँ, और उसके पुत्रों को भी, जिनमें ज्येष्ठ माल्यवान है। मर्यादा का अतिक्रमण करने वाले इन राक्षसाधमों को मैं क्रुद्ध होकर मारूँगा; हे देवो, निर्ज्वर (निश्चिन्त) हो जाओ। प्रभविष्णु विष्णु से यह आश्वासन पाकर देव हर्षित होकर जनार्दन की प्रशंसा करते अपने-अपने स्थान को गए।

देवों के उद्योग को सुनकर निशाचर माल्यवान अपने दोनों वीर भाइयों से बोला। उसने कहा, देव और ऋषि शंकर के पास जाकर हमारे वध की कामना से बोले कि वर-बल से उद्धत घोररूप सुकेश-पुत्र हमें पद-पद पर सताते हैं; हम राक्षसों से अभिभूत हैं, हे प्रजापते, उन दुरात्माओं के भय से अपने घरों में नहीं रह सकते; हे त्रिलोचन, हमारे हित के लिए इन्हें मारिए। शंकर ने कहा कि ये सुकेश-पुत्र मेरे लिए रण में अवध्य हैं, पर मैं वह उपाय बताता हूँ जो इन्हें मारेगा। माल्यवान ने आगे कहा, हरि ने भयभीत देवों को हमारे वध की प्रतिज्ञा की है; इसलिए सोचो कि अब क्या करना उचित है।

माल्यवान ने स्मरण कराया कि उन्हीं नारायण ने हिरण्यकशिपु और अन्य सुरद्विषों का वध किया; नमुचि, कालनेमि, वीरश्रेष्ठ संह्राद, बहुमायी राधेय, धार्मिक लोकपाल, यमल, अर्जुन, हार्दिक्य, शुम्भ और निशुम्भ, तथा अन्य महाबल असुर-दानव, जो रण में कभी पराजित न हुए थे, सब नारायण के हाथों सैकड़ों-सहस्रों में मारे गए। यह जानकर हमें अपने सबके हित का उचित कार्य करना चाहिए; नारायण को जीतना कठिन है, जो इस समय हमें मारना चाहते हैं।

माल्यवान का वचन सुनकर सुमाली और माली अपने ज्येष्ठ भ्राता से ऐसे बोले जैसे अश्विनीकुमार इन्द्र से। उन्होंने कहा, हमने वेद पढ़े, दान और इष्ट किए, ऐश्वर्य का पालन किया, निरामय दीर्घ आयु पाई, और मार्ग में सुधर्म स्थापित किया। अप्रतिम शत्रु जीते गए; हमें मृत्यु का भय नहीं। नारायण, रुद्र, इन्द्र और यम सब हमारे सम्मुख खड़े होने से सदा डरते हैं। हे राक्षसेश्वर, विष्णु के द्वेष का कोई कारण नहीं; देवों के दोष से ही विष्णु का मन विचलित हुआ है। इसलिए आज ही हम सब एक होकर, परस्पर रक्षित होकर, उन्हीं देवों को मारें जिनसे यह वैर उठा है।

इस प्रकार मन्त्रणा करके वे बलवान राक्षसपुंगव समस्त सेना से घिरे, उद्योग की घोषणा कर, जम्भ-वृत्र-से क्रुद्ध होकर युद्ध को निकले। महाकाय महाबल राक्षस रथों, हाथियों और हाथी-से अश्वों से युद्ध को निकले; खच्चर, बैल, ऊँट, शिशुमार (डॉल्फिन), सर्प, मगर, कछुए, मछली, गरुड़-से पक्षी, सिंह, व्याघ्र, वराह, सृमर और चमर नामक मृग साथ थे। लंका के विनाश को देखकर अन्य प्राणी विमनस्क हो गए। सैकड़ों-सहस्रों में राक्षस श्रेष्ठ रथों पर देवलोक की ओर निकल पड़े; देव भी उसी मार्ग से (सम्मुख) आए।

तब काल की आज्ञा से भयावह भौम और अन्तरिक्ष के उत्पात राक्षसेन्द्रों के अभाव (विनाश) के लिए उठे। मेघों ने हड्डियाँ और गरम रक्त बरसाया; समुद्र अपनी सीमा लाँघ गए और पर्वत हिलने लगे। मेघ-से गर्जन करते अट्टहास छोड़ते दारुण और घोर-दर्शन प्राणी और सियारें भयानक हुँकार करने लगीं। तत्त्व (भूत) क्रम से विलीन होते-से दिखाई दिए, और मुख से ज्वाला उगलते गिद्धों का एक बड़ा चक्र राक्षस-दल पर काल-सा मँडराने लगा। रक्तपाद कपोत और सारिकाएँ वेग से उड़ गईं। कौए कर्कश बोले, बिलाव और हाथी आदि चीत्कार करने लगे।

उन उत्पातों की अवहेलना कर बल से गर्वित राक्षस मृत्यु-पाश में बँधे-से आगे बढ़ते गए, लौटे नहीं। ज्वलित अग्नि-से माल्यवान, सुमाली और महाबल माली राक्षसों के आगे चले। माल्यवान को राक्षस ऐसे आश्रय लेते थे जैसे देव ब्रह्मा को। माली के नेतृत्व में, महामेघ-से गर्जते उस राक्षस-दल ने देवलोक को जीतने की कामना से प्रयाण किया। देवदूत से राक्षसों के उद्योग को सुनकर प्रभु नारायण ने युद्ध का मन बनाया।

चतुर्भुज विष्णु गरुड़ पर आरूढ़, हाथों में चक्र, शंख, धनुष और गदा, मेघों के बीच उड़ते हुए।

दिव्य कवच धारण कर, सहस्र सूर्यों-सी द्युति वाले, बाणों से भरे दो निर्मल तरकश बाँधकर, श्रोणि-सूत्र और निर्मल खड्ग कसकर, शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष और खड्ग जैसे श्रेष्ठ आयुधों से सज्जित कमललोचन प्रभु पर्वत-से विशाल सुपर्ण गरुड़ पर सवार होकर राक्षसों के अभाव के लिए शीघ्र चले। गरुड़-पृष्ठ पर श्याम, पीताम्बर हरि मेरु-शिखर पर बिजली-सहित मेघ-से सुशोभित हुए। सिद्ध, देव, ऋषि, महोरग, गन्धर्व और यक्ष जिनकी स्तुति गा रहे थे, ऐसे चक्र-खड्ग-शार्ङ्ग-शंख-धारी असुरसेना-शत्रु विधिवत वहाँ पहुँचे।

गरुड़ के पंखों की वायु से राक्षसराज की सेना का एक भाग उड़ गया, उनकी पताकाएँ घूमने लगीं और शस्त्र हाथों से छूट गए; वह राक्षस-सेना नीले पर्वत-शिखर-सी चली, जैसे शिलाएँ खिसक गई हों। सहस्रों राक्षसों ने माधव को घेरकर रक्त-मांस से सने, युगान्त की अग्नि-से श्रेष्ठ आयुधों से उन पर प्रहार किया।

सार: राक्षसों से पीड़ित देव पहले शिव, फिर शिव के निर्देश पर विष्णु की शरण गए। विष्णु ने वध की प्रतिज्ञा की। माल्यवान, सुमाली और माली ने युद्ध का निश्चय किया और उत्पातों की उपेक्षा कर देवलोक की ओर बढ़े। गरुड़ पर सवार विष्णु संग्राम-भूमि में आ पहुँचे।

विष्णु द्वारा राक्षसों का संहार

जैसे मेघ वर्षा से पर्वत को बेधते हैं, वैसे ही गर्जते राक्षस-मेघ अस्त्र-वर्षा से पर्वत-से खड़े नारायण को सताने लगे। पीताम्बर श्याम-गौर विष्णु उन नील राक्षसों से ऐसे घिरे जैसे अंजन-पर्वत वर्षा करते मेघों से। टिड्डियाँ धान के खेत में, पतंगे अग्नि में, मधुमक्खियाँ अमृत-घट में, मगर समुद्र में, और प्रलय में लोक विष्णु में जैसे प्रवेश करते हैं, वैसे ही वज्र-वायु-मन-से वेग वाले राक्षसों के बाण हरि में प्रवेश करने लगे।

रथों, हाथियों और अश्वों पर सवार पर्वत-से विशाल राक्षसेन्द्र, तथा आकाश में खड़े पैदल योद्धा, बाण-शक्ति-ऋष्टि-तोमर से विष्णु को ऐसे निरुच्छ्वास (श्वासरहित) करने लगे जैसे प्राणायाम-व्यायाम ब्राह्मण को क्षण-भर श्वास रोक देते हैं। मीनों से सताए महोदधि-से राक्षसों से ताड़ित होकर दुर्धर्ष विष्णु ने शार्ङ्ग खींचकर राक्षसों पर बाण छोड़े। पूर्णायत (पूरी तरह तानकर) छोड़े, वज्र-से, मन-से वेग वाले तीक्ष्ण बाणों से विष्णु ने सैकड़ों-सहस्रों राक्षसों को छिन्न कर दिया।

Vishnu on Garuda blows the great conch Panchajanya, its blast scattering and terrifying the raksasa host.

राक्षसों को बाण-वर्षा से तितर-बितर कर, जैसे वायु वर्षा-मेघों को, पुरुषोत्तम ने अपना महाशंख पाञ्चजन्य फूँका। पूरे प्राण से फूँके उस शंखराज ने तीनों लोकों को व्यथित-सा करते हुए भीम गर्जना की। उस शंख की भयानक ध्वनि ने राक्षसों को ऐसे त्रस्त किया जैसे वन में गर्जता सिंह मदमत्त हाथियों को। शंख-नाद से अश्व खड़े न रह सके, हाथियों का मद उतर गया, और वीर रथों से गिर पड़े।

शार्ङ्ग से छूटे वज्र-से बाणों ने राक्षसों को बेधकर उनके शरीरों को छिन्न कर धरती में प्रवेश किया। नारायण के हाथ से छूटे बाणों से बिंधकर राक्षस वज्र-हत पर्वतों-से भूमि पर गिरे। विष्णु के चक्र से बने घावों से शत्रुओं के शरीर ऐसे रक्त बहाने लगे जैसे पर्वत स्वर्ण-धातु की धाराएँ। शंखराज की ध्वनि, शार्ङ्ग की टंकार और विष्णु का रव राक्षसों के रव को निगल गया। हरि ने अपने बाणों से उनकी हिलती गर्दनें, बाण, ध्वज, धनुष, रथ, पताकाएँ और तरकश काट डाले।

जैसे सूर्य से घोर किरणें, समुद्र से तरंगें, पर्वत से नागेन्द्र और मेघ से धाराएँ निकलती हैं, वैसे ही नारायण के शार्ङ्ग से छूटे बाण सैकड़ों-सहस्रों में सब दिशाओं में वेग से दौड़े। जैसे शरभ से सिंह, सिंह से हाथी, हाथी से व्याघ्र, व्याघ्र से चीते, चीते से कुत्ते, कुत्ते से बिलाव, बिलाव से सर्प, और सर्प से चूहे भागते हैं, वैसे ही प्रभविष्णु विष्णु से सब राक्षस भागे; कुछ धरती पर पड़े रहे।

सहस्रों राक्षसों को मारकर मधुसूदन ने वारिज (शंख) को ऐसे भर दिया (फूँका) जैसे सुरराज इन्द्र मेघ को जल से। नारायण के बाणों से त्रस्त और शंख-नाद से विह्वल भग्न राक्षस-सेना लंका की ओर भागी। नारायण के बाणों से आहत राक्षस-बल के भागने पर सुमाली ने बाण-वर्षा से रण में हरि को रोका। उसने नारायण को ऐसे ढक दिया जैसे हिम सूर्य को; और सत्त्व-सम्पन्न राक्षसों ने फिर धैर्य धारण किया।

तब बल से गर्वित वह राक्षस (सुमाली) रोष से, राक्षसों में मानो नया जीवन भरते हुए, महानाद करता हुआ टूट पड़ा। हाथी-से सूँड़-समान लम्बे आभरण वाला हाथ उठाकर वह राक्षस बिजली-सहित मेघ-सा गर्जा। गर्जते सुमाली के सारथि का ज्वलित कुण्डल वाला सिर हरि ने काट डाला; और उस राक्षस के अश्व भ्रान्त होकर दौड़ने लगे। उन भ्रान्त अश्वों से सुमाली राक्षसेश्वर ऐसे इधर-उधर घूमने लगा जैसे चंचल इन्द्रिय-रूपी अश्वों से धैर्यहीन मनुष्य।

तब रणाजिर (युद्ध-भूमि) में टूट पड़ते महाबाहु विष्णु पर, जब सुमाली अश्वों से रथ में खिंच रहा था, माली बाण-सहित धनुष लेकर विष्णु के रथ की ओर दौड़ा। माली के धनुष से छूटे स्वर्ण-भूषित बाण क्रौंच पर्वत में पक्षियों-से हरि के शरीर में घुस गए। माली के सहस्रों बाणों से बिंधकर भी विष्णु रण में ऐसे विचलित न हुए जैसे मानसिक व्यथाओं से जितेन्द्रिय। तब मौर्वी (प्रत्यंचा) की ध्वनि कर भगवान भूतभावन ने माली पर बाण-समूह छोड़े। वज्र-बिजली-सी प्रभा वाले वे बाण माली के शरीर में पहुँचकर ऐसे उसका रक्त पीने लगे जैसे नाग अमृत।

Disrobed of chariot, Mali leaps mace in hand and smashes it onto Garuda's forehead, staggering the great bird.

माली को विमुख कर शंख-चक्र-गदा-धारी हरि ने माली का मुकुट, ध्वज, धनुष और अश्व गिरा दिए। विरथ होकर माली, निशाचरश्रेष्ठ, गदा लेकर गिरि-शिखर से सिंह-सा कूदा। उसने गदा से गरुड़ के ललाट पर ऐसे प्रहार किया जैसे अन्तक ने ईशान पर, या इन्द्र अपने वज्र से पर्वत पर। माली की गदा से भृशम् (भारी) आहत गरुड़ वेदना से व्यथित होकर देव को रण से पराङ्मुख कर गया।

विष्णु गरुड़ पर से राक्षस सेना पर बाणों की वर्षा करते हुए; नीचे घायल राक्षस गिरते।

देव के माली-गरुड़ द्वारा पराङ्मुख होने पर गर्जते राक्षसों का महान शब्द उठा। राक्षसों का रव सुनकर हरि के अनुज (इन्द्र के अनुज, विष्णु) क्रुद्ध हुए और पक्षीन्द्र पर तिरछे बैठकर भी पराङ्मुख ही माली के वध की इच्छा से चक्र छोड़ा। सूर्यमण्डल-सी आभा वाले, अपनी प्रभा से आकाश को प्रकाशित करते उस कालचक्र-से चक्र ने माली का सिर गिरा दिया। राक्षसेन्द्र का वह विभीषण (भयानक) सिर चक्र से कटकर रक्त उगलता हुआ पुराने राहु-शिर-सा भूमि पर गिरा।

तब सम्प्रहृष्ट देवों ने पूरे प्राण से सिंहनाद-सा रव छोड़ा, “साधु देव” (धन्य हो देव) कहते हुए। माली को मरा देख सुमाली और माल्यवान, शोक-सन्तप्त होकर शेष सेना सहित लंका की ओर भागे। आश्वस्त होकर क्रुद्ध गरुड़ ने लौटकर पहले-सा पंख-वात से राक्षसों को भगा दिया। चक्र से जिनके मुख-कमल कटे, गदा से वक्ष चूर हुए, हल से ग्रीवाएँ छिन्न हुईं, मूसल से मस्तक टूटे, खड्ग से जो छिन्न हुए, और बाणों से ताड़ित हुए, वे राक्षस आकाश से शीघ्र समुद्र-जल में गिरने लगे।

हरि बाण-जाल से रोके जाने पर भी, अपने बाण-जाल से तीक्ष्ण बाणों से नारायण ने केश बिखेरे राक्षसों को ऐसे विदीर्ण किया जैसे बिजली-सहित महामेघ पर्वतों को। फटे छत्र, गिरते शस्त्र, बाणों से चिथड़े वस्त्र, बाहर निकली आँतें और भय से चंचल नेत्र वाली वह सेना अत्यन्त उन्मत्त-सी हो गई। सिंह से सताए हाथियों-से उस राक्षस-दल का रव और वेग पुराने नृसिंह से मर्दित हाथियों-सा हुआ। चक्र-प्रहार से छिन्न-शीर्ष, गदा-प्रहार से चूर्ण-अंग, खड्ग-प्रहार से द्विधा-भिन्न राक्षसेन्द्र वज्र-हत पर्वतों-से गिरने लगे। नील-मेघ-से, मणि-हार-कुण्डल लटकाए गिराए जाते राक्षसों से धरती ऐसी ढकी दिखी मानो नीले पर्वत गिरा दिए गए हों।

सार: विष्णु ने शार्ङ्ग के बाणों और पाञ्चजन्य शंख से राक्षस-सेना को छिन्न-भिन्न किया। सुमाली भागा, माली ने डटकर लड़ा और गरुड़ को घायल भी किया, पर अन्ततः विष्णु के चक्र से माली का सिर कट गया। माली के वध से राक्षस-सेना पराजित हुई।

माल्यवान का अन्तिम युद्ध और राक्षसों का पाताल-प्रवेश

जब पद्मनाभ विष्णु उस भागती सेना को पीछे से मार रहे थे, तब माल्यवान तट को छूकर लौटते समुद्र-सा फिर युद्ध को लौटा। रक्त-नयन, क्रोध से डोलते मुकुट वाला वह निशाचर पद्मनाभ पुरुषोत्तम से बोला। उसने कहा, हे नारायण, आप पुरातन क्षात्र-धर्म नहीं जानते; अयुद्ध-मनस्क, भयभीत हम लोगों को आप किसी अनजान-से मार रहे हैं। हे सुरेश्वर, जो पराङ्मुख-वध का पाप करता है, वह हन्ता पुण्यकर्मियों के स्वर्ग को नहीं पाता। हे शंख-चक्र-गदा-धारी, यदि आपको युद्ध की श्रद्धा है तो मैं खड़ा हूँ; अपना बल दिखाइए जिसे मैं देख सकूँ।

Malyavan in his last stand drives his bell-ringing shakti spear into Vishnu's chest, the weapon flashing like lightning.

माल्यवान को माल्यवान पर्वत-सा अचल खड़ा देख इन्द्र के अनुज बलवान विष्णु ने उस राक्षसेन्द्र से कहा। उन्होंने कहा, मैंने आपसे भयभीत देवों को अभय और राक्षसों के उच्छेद का जो वचन दिया है, उसी का पालन कर रहा हूँ। देवों का प्रिय कार्य मुझे प्राणों से भी करना है; इसलिए आप रसातल चले जाएँ तो भी मैं आप सबको मारूँगा। लाल-कमल-से नेत्र वाले देवदेव के यह कहते ही क्रुद्ध राक्षसेन्द्र ने शक्ति (बरछी) से उनके वक्षस्थल को बेध दिया। माल्यवान की भुजा से छूटी, घण्टा-सी ध्वनि करती वह शक्ति हरि के वक्ष पर मेघस्थ बिजली-सी चमकी।

तब उसी शक्ति को खींचकर शक्तिधर (स्कन्द) के प्रिय कमललोचन हरि ने माल्यवान को लक्ष्य कर फेंका। गोविन्द के हाथ से छूटी वह शक्ति स्कन्द द्वारा छोड़ी-सी, राक्षस को खोजती हुई महाउल्का-सी अंजन-पर्वत की ओर चली। हार-भार से सुशोभित उसके विशाल वक्ष पर वह राक्षसेन्द्र पर गिरि-कूट पर अशनि (वज्र)-सी गिरी। उससे शरीर-त्राण (कवच) फटने पर माल्यवान विपुल अन्धकार (मूर्च्छा) में डूब गया; फिर आश्वस्त होकर पर्वत-सा अचल खड़ा हो गया।

तब उसने अनेक काँटों से जड़े लोहे के शूल को लेकर देव के दोनों स्तनों के बीच दृढ़ प्रहार किया। फिर युद्ध में रक्त रंजित वह निशाचर इन्द्र के अनुज को मुष्टि से मारकर धनुष-भर पीछे हटा। तब आकाश में “साधु-साधु” का महाशब्द उठा। विष्णु को मारकर उस राक्षस ने गरुड़ को भी पीटा। तब क्रुद्ध गरुड़ ने पंख-वात से उस राक्षस को ऐसे उड़ा दिया जैसे प्रबल वायु सूखे पत्तों के ढेर को।

द्विजेन्द्र गरुड़ के पंख-वात से अपने पूर्वज (माल्यवान) को उड़ता देख सुमाली अपनी सेना सहित लंका की ओर भागा। पंख-वात के बल से उड़ाया गया राक्षस माल्यवान भी लज्जा से ढका, अपनी सेना से मिलकर लंका को गया। इस प्रकार, हे कमललोचन राम, वे राक्षस हरि से संग्राम में बार-बार भग्न हुए और उनके प्रवर नायक मारे गए। विष्णु के बल से पीड़ित, उनसे प्रतियुद्ध करने में असमर्थ वे राक्षस लंका छोड़कर अपनी पत्नियों सहित पाताल में बसने चले गए।

हे रघुसत्तम, सालकटंकटा के वंश में जन्मे सुमाली के आश्रय में, अपने पराक्रम से प्रख्यात वे योद्धा वहाँ (पाताल में) रहने लगे। सुमाली, माल्यवान, माली और उनके अग्रगामी सब महाभाग रावण से भी बलवान थे; और जो राक्षस आपने मारे, वे पुलस्त्य-वंश के थे। शंख-चक्र-गदा-धारी देव नारायण के बिना अन्य कोई इन देव-शत्रु राक्षसों का हन्ता न था। आप ही सनातन, चतुर्बाहु देव नारायण हैं; आप अजेय, अव्यय प्रभु राक्षसों के संहार के लिए ही उत्पन्न हुए हैं। शरणागत-वत्सल आप, हे सृष्टिकर्ता, धर्म-व्यवस्था के नष्ट होने पर समय-समय पर दस्युओं के वध के लिए प्रकट होते हैं।

अगस्त्य ने कहा, हे नराधिप, मैंने आज आपको राक्षसों की समस्त उत्पत्ति यथावत कह दी। हे रघुसत्तम, अब रावण और उसके पुत्र के जन्म तथा उनके अतुल प्रभाव की कथा सुनिए। विष्णु के भय से पीड़ित वह बलवान राक्षस सुमाली बहुत काल तक पुत्र-पौत्रों सहित रसातल में विचरता रहा; और इस बीच वैश्रवण (कुबेर) ने लंका में निवास किया।

सार: माल्यवान ने अकेले विष्णु से डटकर युद्ध किया, पर अन्ततः गरुड़ के पंख-वात से उड़ा दिया गया। हारकर सब राक्षस लंका छोड़ पाताल में बस गए। राम के मारे राक्षस पुलस्त्य-वंशी थे, जबकि माल्यवान-सुमाली-माली का यह वंश उससे भिन्न और अधिक बलवान था। अब रावण-जन्म की कथा आरम्भ होती है।

रावण का जन्म और गोकर्ण में तप का निश्चय

राक्षसराज सुमाली अंधेरी ज्वालामयी नगरी से अपनी पुत्री कैकसी का हाथ थामे बाहर आते हुए।

कुछ काल बाद सुमाली नामक राक्षस रसातल से मर्त्यलोक में निकलकर सारी पृथ्वी पर विचरने लगा। नील-मेघ-सा, तपे स्वर्ण के कुण्डल पहने, वह अपनी कन्या को हाथ से पकड़े था, जो बिना कमल की लक्ष्मी-सी थी। पृथ्वी पर विचरते उस राक्षसेन्द्र ने एक दिन पुष्पक से, अपने पिता पुलस्त्य-पुत्र विभु विश्रवा के दर्शन को जाते धनेश (कुबेर) को देखा। अमर-से, पावक-से जाते उसे देखकर वह मर्त्यलोक से विस्मय-सहित रसातल में लौट आया और सोचने लगा, क्या करें कि श्रेय हो, हम कैसे उन्नत हों।

तब उस राक्षस ने कैकसी नामक अपनी कन्या से कहा। उसने कहा, हे पुत्री, आपका यौवन व्यतीत हो रहा है, यह आपको देने का समय है; अस्वीकार के भय से वर आपको माँगते नहीं। हे पुत्रिके, आपके लिए हम सब धर्मबुद्धि से प्रयत्नशील रहे; आप साक्षात लक्ष्मी-सी सर्वगुण-सम्पन्ना हैं। कन्या का पिता होना मान-कांक्षियों के लिए दुःख है, क्योंकि नहीं जाना जाता कि कौन कन्या को वरेगा। कन्या सदा तीन कुलों (माता-कुल, पिता-कुल और जहाँ दी जाए उस कुल) को संशय में रखती है। इसलिए, हे पुत्री, आप स्वयं प्रजापति-कुल में उत्पन्न मुनिवर श्रेष्ठ पौलस्त्य विश्रवा को पति-रूप में वरें। हे पुत्री, आपको उन धनेश (कुबेर)-से, सूर्य-से तेजस्वी पुत्र होंगे, इसमें सन्देह नहीं।

पिता का यह वचन सुनकर पिता के गौरव से वह कन्या वहाँ गई और खड़ी हो गई जहाँ विश्रवा तप कर रहे थे। उसी बीच, हे राम, पुलस्त्य-पुत्र विश्रवा द्विज चौथी अग्नि-से अग्निहोत्र (हवन) कर रहे थे। पिता के गौरव से उस दारुण (अशुभ) वेला का विचार न कर वह उनके सामने जाकर अधोमुख, चरणों पर दृष्टि गड़ाए, पैर के अँगूठे से बार-बार भूमि कुरेदती खड़ी हो गई। पूर्णचन्द्र-से मुख वाली, अपने तेज से दीप्त उस सुश्रोणि को देखकर परम उदार मुनि बोले, हे भद्रे, आप किसकी कन्या हैं, कहाँ से आई हैं, क्या प्रयोजन है, सच बताइए, हे शोभने।

ऐसा पूछे जाने पर वह कन्या हाथ जोड़कर बोली, हे मुनि, आप अपने प्रभाव से मेरा मनोभाव जान सकते हैं। हे ब्रह्मर्षि, इतना जानिए कि मैं पिता की आज्ञा से आई हूँ; मेरा नाम कैकसी है; शेष आप स्वयं जान लीजिए। तब मुनि ध्यान में गए और बोले, हे भद्रे, आपके मन का कारण मैंने जान लिया। हे मत्तमातंगगामिनी (मतवाले हाथी-सी चाल वाली), आप मुझसे सन्तान चाहती हैं; परन्तु क्योंकि आप इस दारुण वेला में मेरे पास आई हैं, इसलिए सुनिए कि कैसी सन्तान जन्म देंगी, दारुण, दारुण-आकार, दारुण कुल को प्रिय। हे सुश्रोणि, आप क्रूर-कर्मा राक्षस जन्म देंगी।

यह सुनकर वह प्रणाम कर बोली, हे भगवन, आप ब्रह्मवादी से मैं ऐसे सुदुराचारी पुत्र नहीं चाहती; प्रसन्न होइए। उसके यह कहने पर पूर्णचन्द्र-से विश्रवा रोहिणी-सी उस कैकसी से फिर बोले, हे शुभानने, आपका जो अन्तिम पुत्र होगा, वह पिऔस-मन वाला और मेरे वंश के अनुरूप धर्मात्मा होगा, इसमें सन्देह नहीं।

कैकसी की गोद में दस सिर और अनेक भुजाओं वाला नवजात रावण, दीपों से आलोकित कक्ष।

ऐसा कहे जाने पर, हे राम, कुछ काल बाद उस कन्या ने दस सिर, बड़ी दाढ़ों, नील-अंजन-राशि-सा, ताम्र-ओष्ठ, बीस भुजाओं, विशाल मुख और दीप्त केश वाले अत्यन्त दारुण, बीभत्स राक्षस-रूप को जन्म दिया। उसके जन्म पर ज्वाला उगलती सियारें और मांसाशी पशु अपसव्य (बाएँ से दाएँ) मण्डल बनाने लगे। मेघ रक्त बरसाने लगे, खर-स्वर से गरजे, सूर्य प्रकाशित न हुआ, और महाउल्काएँ भूमि पर गिरीं। पृथ्वी काँपी, सुदारुण वायु बहीं, और अक्षोभ्य समुद्र क्षुब्ध हो उठा। तब पितामह-सम पिता ने उसका नाम रखा कि क्योंकि यह दस ग्रीवाओं से उत्पन्न हुआ है, यह “दशग्रीव” होगा।

उसके पश्चात महाबल कुम्भकर्ण उत्पन्न हुआ, जिसके प्रमाण से बढ़कर विशाल प्रमाण भूमि पर किसी का नहीं। फिर विकृत-मुख वाली शूर्पणखा उत्पन्न हुई। और कैकसी का अन्तिम पुत्र धर्मात्मा विभीषण हुआ। उस महासत्त्व के जन्म पर पुष्पवृष्टि हुई, आकाश में देवों की दुन्दुभियाँ बजीं, और अन्तरिक्ष में “साधु-साधु” का वचन हुआ।

उस महावन में महौजस्वी कुम्भकर्ण और दशग्रीव, लोक को उद्वेग देने वाले, बढ़ने लगे। प्रमत्त कुम्भकर्ण तीनों लोकों में नित्य असन्तुष्ट धर्म-प्रिय महर्षियों को भक्षण करता विचरता था। पर धर्मात्मा विभीषण नित्य धर्म में स्थित, स्वाध्याय में नियताहार, जितेन्द्रिय रहकर रहता था।

अब कुछ काल बाद वैश्रवण देव धनेश (कुबेर) पुष्पक से अपने पिता के दर्शन को आए। तेज से दीप्त-से उन्हें देखकर वहाँ कैकसी राक्षसी ने आकर दशग्रीव से कहा। उसने कहा, हे पुत्र, अपने तेजोयुक्त भाई वैश्रवण को देखिए; और भ्रातृ-भाव में समान होकर भी अपने को ऐसा (दीन) देखिए। हे अमित-विक्रम दशग्रीव, यत्न कीजिए कि आप भी मेरे पुत्र वैश्रवण-समान बनें।

माता का वह वचन सुनकर प्रतापवान दशग्रीव अतुल अमर्ष (ईर्ष्या) से भर गया और प्रतिज्ञा की। उसने कहा, मैं आपसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ कि ओज में भाई-तुल्य या अधिक हो जाऊँगा; हृदय का सन्ताप त्यागिए। तब उसी क्रोध से दशग्रीव अपने अनुजों सहित दुष्कर कर्म करने की इच्छा से, तप में मन लगाकर, “तप से अपना अभीष्ट पाऊँगा”, ऐसा निश्चय कर आत्म-सिद्धि के लिए गोकर्ण के शुभ आश्रम में आया। उग्र-विक्रम वह राक्षस अनुजों सहित वहाँ अतुल तप करके विभु पितामह को सन्तुष्ट करने लगा, और तुष्ट होकर ब्रह्मा ने उन्हें विजय-दायक वर दिए।

सार: सुमाली की कन्या कैकसी विश्रवा के पास गई। अशुभ वेला में सम्बन्ध होने से उसके दशग्रीव (रावण), कुम्भकर्ण और शूर्पणखा क्रूर हुए, पर अन्तिम पुत्र विभीषण धर्मात्मा हुआ। सौतेले भाई कुबेर के वैभव से ईर्ष्या कर रावण ने अनुजों सहित गोकर्ण में तप का निश्चय किया।

तप और वरदान

राम ने मुनि से पूछा, हे ब्रह्मन, उन महाबल भाइयों ने वन में कैसा तप किया। अगस्त्य ने सुप्रीत-मन राम से कहा कि उन भाइयों ने अपने-अपने अनुकूल धर्म-विधियाँ अपनाईं।

तीन दृश्यों में कुंभकर्ण की कठोर तपस्या: ग्रीष्म की अग्नियों के बीच, वर्षा में और हिम-जल में।

नित्य धर्म-पथ में स्थित कुम्भकर्ण ग्रीष्म में चारों ओर पंचाग्नि के बीच (और ऊपर सूर्य) खड़े होकर तप करता था; वर्षा में मेघजल से सिक्त वीरासन धारण करता; और शिशिर में सदा जल के मध्य रहता। इस प्रकार धर्म में प्रयत्नशील, सत्पथ में स्थित उसके दस सहस्र वर्ष बीते। शुचि, नित्य धर्मपरायण धर्मात्मा विभीषण पाँच सहस्र वर्ष एक पैर पर खड़ा रहा; नियतात्मा विभीषण के दस सहस्र वर्ष ऐसे बीते मानो वह नन्दनवन में रहा हो। दशानन दस सहस्र वर्ष निराहार रहा, और प्रति सहस्र वर्ष पूर्ण होने पर अपना एक सिर अग्नि में हवन कर देता।

इस प्रकार नौ सहस्र वर्ष बीते और उसके नौ सिर अग्नि में चले गए। दसवें सहस्र वर्ष में जब दशग्रीव अपना दसवाँ सिर काटने को था, तब पितामह ब्रह्मा वहाँ प्रकट हुए। सुप्रीत ब्रह्मा देवों सहित खड़े होकर बोले, हे दशग्रीव, मैं आपसे प्रसन्न हूँ; हे धर्मज्ञ, शीघ्र अपना अभीष्ट वर माँगिए; आपका परिश्रम व्यर्थ न जाए। तब प्रहृष्ट-अन्तरात्मा दशग्रीव ने देव को सिर झुकाकर हर्ष-गद्गद वाणी में कहा, हे भगवन, प्राणियों को नित्य मृत्यु के अतिरिक्त कोई भय नहीं; मृत्यु-सा शत्रु नहीं; मैं अमरत्व माँगता हूँ।

चतुर्मुख ब्रह्मा कमल पर प्रकट होकर नीचे हाथ जोड़े बैठे दस सिर वाले रावण को दर्शन देते हुए।

तब ब्रह्मा बोले, आपके लिए पूर्ण अमरत्व सम्भव नहीं; कोई अन्य वर माँगिए। दशग्रीव ने हाथ जोड़कर कहा, हे प्रजाध्यक्ष, हे शाश्वत, मैं सुपर्ण (गरुड़), नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस और देवों से अवध्य होना चाहता हूँ; हे अमरपूजित, मनुष्य आदि अन्य प्राणियों की मुझे चिन्ता नहीं, वे मेरे लिए तृण-तुल्य हैं। ऐसा कहे जाने पर ब्रह्मा ने कहा, हे राक्षसपुंगव, ऐसा ही होगा; और सुनिए, प्रसन्न होकर मैं आपको एक और शुभ वर देता हूँ; पहले आपने जो सिर अग्नि में हवन किए, हे राक्षस, वे फिर पूर्ववत हो जाएँगे; और हे सौम्य, मैं आपको एक और दुर्लभ वर देता हूँ कि आप इच्छानुसार रूप धारण कर सकेंगे। ऐसा कहते ही दशग्रीव के अग्नि में हवन किए सिर फिर उठ आए।

एक उप-कथा: रावण के वरदान में एक गहरी विडम्बना छिपी है। उसने देव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस आदि से अवध्यता माँगी, पर मनुष्यों को तुच्छ समझकर उन्हें छोड़ दिया। यही चूक आगे राम (मनुष्य-रूप विष्णु) के हाथों उसके वध का द्वार खोलती है। वरदान की हर शर्त में उसका अहंकार ही उसके पतन का बीज बोता गया।

दशग्रीव से ऐसा कहकर लोक-पितामह ब्रह्मा विभीषण से बोले, हे वत्स विभीषण, हे धर्म-संहित-बुद्धि वाले धर्मात्मा, मैं आपसे परम सन्तुष्ट हूँ; हे सुव्रत, वर माँगिए। चन्द्र को किरणों-से सर्वगुणों से युक्त धर्मात्मा विभीषण हाथ जोड़कर बोले, हे भगवन, मैं कृतकृत्य हूँ कि स्वयं लोकगुरु मुझ पर प्रसन्न हैं। हे सुव्रत, यदि प्रसन्न होकर वर देते हैं तो सुनिए; परम आपत्ति में भी मेरी मति धर्म में रहे; मुझे ब्रह्मास्त्र बिना सिखाए ही स्फुरित हो; और जिस-जिस आश्रम में मेरी जैसी-जैसी बुद्धि उठे, वह धर्मिष्ठ हो और मैं उस-उस धर्म का पालन करूँ; हे परम उदार, यह मैं परम-एक वर मानता हूँ।

ब्रह्मा स्वर्णिम आकाश में कमल पर विराजकर घुटनों पर बैठे दसानन रावण को वरदान देते हुए।

ब्रह्मा ने कहा, धर्म में अनुरक्तों के लिए लोक में कुछ दुर्लभ नहीं; हे वत्स, आप जैसे धर्मिष्ठ हैं, वैसा ही होगा। हे शत्रुनाशन, क्योंकि राक्षस-योनि में जन्म लेकर भी आपकी बुद्धि अधर्म में नहीं जाती, इसलिए मैं आपको अमरत्व देता हूँ।

विभीषण को ऐसा कहकर जब ब्रह्मा कुम्भकर्ण को वर देने को तत्पर हुए, तब समस्त देव हाथ जोड़कर बोले, आप कुम्भकर्ण को वर न दें; आप जानते हैं कि यह दुर्मति तीनों लोकों को त्रास देता है। हे ब्रह्मन, इसने नन्दनवन की सात अप्सराएँ, महेन्द्र के दस अनुचर, तथा ऋषि और मनुष्य भक्षण किए हैं। बिना वर के इसने इतना उत्पात किया, तो वर पाकर तीनों लोकों को खा जाएगा। हे अमित-प्रभ, वर के बहाने इस पर मोह डाल दीजिए; इससे लोकों का कल्याण होगा और इसका मान भी रहेगा।

वीणाधारिणी सरस्वती वरदान के क्षण लेटे हुए कुंभकर्ण के निकट खड़ीं; ऊपर कमल पर ब्रह्मा विराजमान।

देवों के यह कहने पर पद्मसम्भव ब्रह्मा ने अपनी पत्नी सरस्वती का स्मरण किया। स्मरण करते ही देवी सरस्वती उनके पास आ खड़ी हुईं और हाथ जोड़कर बोलीं, हे देव, मैं आ गई हूँ, क्या करूँ। ब्रह्मा ने कहा, हे वाणी, राक्षसेन्द्र के मुख में देवों की इच्छित वाक्-देवता बन जाओ। “तथास्तु” कहकर वे कुम्भकर्ण के मुख में प्रविष्ट हुईं। तब ब्रह्मा बोले, हे महाबाहु कुम्भकर्ण, अपना अभीष्ट वर माँगो। यह सुनकर सरस्वती-प्रेरित कुम्भकर्ण ने कहा, हे देवदेव, मेरी इच्छा है कि मैं अनेक वर्ष सोऊँ। “ऐसा ही हो” कहकर ब्रह्मा देवों सहित चले गए, और सरस्वती ने भी राक्षस को छोड़ दिया।

ब्रह्मा और देवों के आकाश को जाने और सरस्वती के छोड़ने पर दुष्टात्मा कुम्भकर्ण होश में आकर दुःखित होकर सोचने लगा कि मेरे मुख से ऐसा वचन कैसे निकला; मैं समझता हूँ कि तब आए देवों ने मुझे मोह में डाल दिया। इस प्रकार दीप्त-तेज वाले वे सब भाई वर पाकर श्लेष्मातक वन में जाकर सुख से रहने लगे।

सार: रावण ने तप से नौ सिर हवन किए; ब्रह्मा ने प्रकट होकर उसे देव-गन्धर्व-यक्ष आदि से अवध्यता, सिर लौटने और इच्छारूप का वर दिया (मनुष्यों को उसने तुच्छ माना)। विभीषण ने धर्म-निष्ठा और अमरत्व माँगा। कुम्भकर्ण की जीभ पर सरस्वती बैठ गईं और उसने अनेक वर्षों की निद्रा माँग ली।

कुबेर का लंका-त्याग और रावण का राज्याभिषेक

फिर इन निशाचरों को वर-प्राप्त जानकर भय त्यागकर सुमाली अपने अनुचरों सहित रसातल से उठा। मारीच, प्रहस्त, विरूपाक्ष और महोदर, उस राक्षस के सचिव भी अत्यन्त उत्साह से उठे। सचिवों और राक्षसपुंगवों से घिरा सुमाली दशग्रीव के पास आया और आलिंगन कर बोला। उसने कहा, हे वत्स, सौभाग्य है कि आपने चिन्तित मनोरथ पाया; आपने त्रिभुवनश्रेष्ठ ब्रह्मा से उत्तम वर पाया। हे महाबाहु, विष्णु से प्रेरित जो महाभय हमें था (जिसके कारण लंका छोड़कर हम रसातल गए) वह अब चला गया। उस भय से बार-बार भग्न होकर अपना घर छोड़, सबके सब अनुचरों सहित रसातल में जा घुसे।

सुमाली ने कहा, हमारी, राक्षसों की बसाई हुई वही लंका नगरी आपके बुद्धिमान भ्राता धनाध्यक्ष (कुबेर) ने बसाई है। हे निष्पाप महाबाहु, यदि साम, दान या बल से वह वापस ली जा सके, तो हमारा कार्य सिद्ध हो जाएगा। हे महाबाहु, निःसन्देह आप लंका के स्वामी बनेंगे; डूबे हुए राक्षस-वंश को आपने उद्धृत किया है; हे महाबल, आप हम सबके प्रभु बनेंगे। तब दशग्रीव ने उपस्थित मातामह से कहा, हे वित्तेश, हमारे गुरु (बड़े भाई कुबेर) के लिए ऐसा कहना उचित नहीं।

राक्षस ने उस गरीयस राक्षसेन्द्र से इस प्रकार साम से प्रत्याख्यात (अस्वीकृत) होकर कुछ न कहा, क्योंकि वह दशग्रीव का अभिप्राय जान गया। कुछ काल बाद वहीं रहते रावण के, जिसने वैसा वचन कहा था, राक्षस प्रहस्त ने सकारण विनीत वचन कहा। उसने कहा, हे महाबाहु दशग्रीव, ऐसा कहना आपको उचित नहीं; शूरों में सौभ्रात्र (भ्रातृ-भाव) नहीं होता, मेरा यह वचन सुनिए। प्रजापति कश्यप की परस्पर प्रिय पत्नियाँ बहनें अदिति और दिति थीं। अदिति ने त्रिभुवनेश्वर देवों को जन्म दिया, और दिति ने कश्यप से उत्पन्न दैत्यों को। हे राजन, हे धर्मज्ञ, वनों-समुद्रों-पर्वतों सहित यह पृथ्वी पहले दैत्यों की थी, क्योंकि वे प्रभविष्णु थे। प्रभविष्णु विष्णु ने उन्हें रण में मारकर यह अव्यय त्रैलोक्य देवों के वश में किया।

प्रहस्त ने कहा, भाई के विरुद्ध आचरण करने वाले अकेले आप ही न होंगे; यह तो पहले देव और असुर दोनों ने किया; इसलिए मेरा वचन मानिए। एक मुहूर्त सोचकर दशग्रीव ने प्रहृष्ट-अन्तरात्मा होकर कहा, बाढम्। उसी हर्ष से वीर्यवान दशग्रीव उसी दिन उन राक्षसों सहित वन को गया। त्रिकूट पर स्थित दशग्रीव ने वाक्य-कोविद प्रहस्त को दूत बनाकर भेजा और कहा, हे प्रहस्त, शीघ्र जाकर मेरे वचन से नैरृतपुंगव वित्तेश (कुबेर) से साम-पूर्वक यह कहो।

लंका जाकर कुबेर से सुरक्षित नगरी में प्रहस्त ने परम उदार वित्तपाल से कहा, हे सुव्रत, हे महाबाहु, हे समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, मुझे आपके भ्राता दशग्रीव ने आपके पास भेजा है। हे महाप्राज्ञ, हे सर्वशास्त्र-विशारद, हे वित्तेश, सुनिए जो दशानन कहते हैं। यह रमणीय नगरी पहले भीम-विक्रम सुमाली-प्रमुख राक्षसों की भुक्त (भोगी हुई) थी। हे विश्रवा-पुत्र, अब यह उनका माँगा हुआ अंश है; हे तात, साम से माँगते उन्हें यह लौटा दीजिए।

प्रहस्त से यह सुनकर वाक्यविदों में श्रेष्ठ देव वैश्रवण ने उत्तर दिया। उन्होंने कहा, यह लंका मुझे पिता ने दी थी, जो निशाचरों से शून्य थी; मैंने दान-मान आदि गुणों से इसे बसाया। जाकर दशग्रीव से कहिए कि मेरी नगरी और मेरा राज्य उसी का है; हे महाबाहु, यहाँ निष्कण्टक राज्य भोगे; मेरा राज्य और जो वसु है, वह उसके साथ अविभक्त है। यह कहकर धनाध्यक्ष अपने पिता के समीप गए।

गुरु (पिता) को प्रणाम कर उन्होंने रावण की इच्छा कही, हे तात, दशग्रीव ने मेरे पास दूत भेजा है कि पूर्व में राक्षसों की बसाई लंका नगरी मुझे लौटा दी जाए; हे सुव्रत, बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए। ऐसा कहे जाने पर मुनिपुंगव ब्रह्मर्षि विश्रवा ने हाथ जोड़े धनद से कहा, हे पुत्र, मेरा वचन सुनो।

उन्होंने कहा, दशग्रीव ने मेरे सम्मुख भी यही कहा था; मैंने उस अति-दुर्मति को फटकारा और बहुत समझाया; क्रोध से मैंने बार-बार कहा कि आप नष्ट हो जाएँगे। हे पुत्र, अब अपना हितकर, धर्म-संगत वचन सुनिए। वर-प्रदान से सम्मूढ़ वह अति-दुर्मति मान्य-अमान्य का विवेक नहीं करता; मेरे शाप से भी वह दारुण प्रकृति को प्राप्त है। इसलिए, हे महाबाहु, अनुचरों सहित लंका छोड़कर धरणीधर कैलास पर जाकर निवास के लिए बसिए। वहाँ नदियों में उत्तम रमणीय मन्दाकिनी है, जिसका जल सूर्य-से स्वर्ण-कमलों, कुमुद, उत्पल और अन्य सुगन्धित पुष्पों से ढका है। वहाँ देव, गन्धर्व, अप्सरा, नाग और किन्नर विहारशील होकर सदा रमते हैं। हे धनद, उस राक्षस से वैर आपके लिए हितकर नहीं, क्योंकि आप जानते हैं कि उसने परम-एक वर पाया है।

दस सिर वाला रावण स्वर्णमयी लंका में खड़ा; ऊपर कुबेर पुष्पक विमान में नगरी छोड़कर जाते।

ऐसा कहे जाने पर पिता के गौरव से वह वचन मानकर कुबेर अपनी पत्नी-पुत्रों, अमात्यों, वाहनों और धन सहित लंका छोड़कर चले गए। तब वह देवारि (दशग्रीव) सुविभक्त राजमार्गों वाली, धनद द्वारा छोड़ी लंका में देवाधिप इन्द्र-से स्वर्ग में चढ़ा। निशाचरों द्वारा अभिषिक्त दशानन ने उस नगरी को बसाया; और वह नगरी नील-मेघ-से निशाचरों से इच्छानुसार भर गई।

तब पिता-वाक्य के गौरव से धनेश ने चन्द्र-सी निर्मल कैलास पर्वत पर सुअलंकृत श्रेष्ठ भवनों से विभूषित नगरी बसाई, जैसे पुरन्दर ने स्वर्ग में अमरावती।

सार: वर-प्राप्त रावण को सुमाली और प्रहस्त ने लंका वापस लेने को उकसाया। रावण के दूत प्रहस्त के सन्देश पर उदार कुबेर ने लंका और राज्य देने का प्रस्ताव दिया; पर विश्रवा के परामर्श से कुबेर ने स्वयं लंका छोड़ कैलास पर नई नगरी बसाई। रावण लंका का राजा बना।

विवाह और मेघनाद का जन्म

राक्षसेन्द्र रावण ने भाइयों सहित अभिषिक्त होकर अपनी बहन के विवाह का विचार किया। उसने अपनी बहन राक्षसी शूर्पणखा को दानवेन्द्र, कालका-पुत्र विद्युज्जिह्व को विवाह में दे दिया। फिर देकर वह राक्षस मृगया (शिकार) में विचरने लगा; वहाँ, हे राम, उसने दिति-पुत्र मय को देखा, जो अपनी कन्या के साथ था।

कन्या-सहित उसे देखकर निशाचर दशग्रीव ने पूछा, आप कौन हैं और मनुष्य-मृग-रहित इस वन में इस मृग-नयनी कन्या के साथ क्यों खड़े हैं। तब मय ने कहा, सुनिए, मैं सब यथावृत्त बताता हूँ। हे तात, हेमा नामक अप्सरा थी, यदि आपने सुना हो। जैसे पौलोमी इन्द्र को दी गई, वैसे ही हेमा देवताओं ने मुझे दी; मैं उसमें आसक्त-मन सहस्रों वर्ष रहा। वह देवताओं के कार्य से चौदह वर्ष को गई। उसी हेमा के लिए मैंने अपनी माया से सर्वथा स्वर्ण-मय नगर बनाया, वज्र-वैदूर्य से जड़ा; उससे रहित होकर मैं वहाँ दीन और अत्यन्त दुःखी रहा।

मय ने कहा, उस नगर से कन्या को लेकर मैं वन में आया हूँ। हे राजन, यह मेरी आत्मजा उसी (हेमा) के गर्भ में पली है; मैं इसके लिए पति ढूँढने आया हूँ, क्योंकि कन्या का पिता होना मान-कांक्षियों के लिए दुःख है। कन्या सदा दो कुलों को संशय में रखती है। उस भार्या में मेरे दो पुत्र भी हुए: पहला मायावी और उसके बाद दुन्दुभि। हे तात, पूछने पर मैंने सब यथातथ्य कह दिया; अब मैं कैसे जानूँ कि आप कौन हैं।

दस सिर वाला रावण हाथ जोड़े सिंहासन पर बैठे कुबेर के सम्मुख; पास लंका का स्वर्ण प्रतिरूप।

ऐसा कहे जाने पर राक्षस ने विनीत होकर कहा, मैं पुलस्त्य का पौत्र और मुनि विश्रवा का पुत्र हूँ, जो ब्रह्मा से तीसरे थे; मेरा नाम दशग्रीव है। यह सुनकर मय दानव महर्षि-पुत्र जानकर हर्षित हुआ और उसे अपनी कन्या देने को वहीं रुचि की। हाथ से उसका हाथ ग्रहण कराकर मय दैत्येन्द्र हँसते हुए राक्षसेन्द्र से बोला, हे राजन, हेमा अप्सरा की पाली यह मेरी आत्मजा कन्या मन्दोदरी पत्नी-रूप में स्वीकार कीजिए। हे राम, दशग्रीव ने “बाढम्” कहा।

तब वहीं अग्नि प्रज्वलित कर उसने पाणिग्रहण किया। हे राम, यद्यपि मय तपोधन विश्रवा के शाप को जानता था, फिर भी ब्रह्मा से उसके वंश को जानकर उसने अपनी कन्या दे दी। मय ने उसे परम तप से पाई अमोघ, परम अद्भुत शक्ति भी दी, जिससे आगे रावण ने लक्ष्मण को मारा। इस प्रकार लंका का ईश्वर प्रभु पत्नी कर अपनी नगरी जाकर दोनों भाइयों के लिए भी भार्या ले आया। विरोचन-पुत्र बलि की दौहित्री (पुत्री की पुत्री) वज्रज्वाला को रावण ने कुम्भकर्ण की पत्नी बनाया। महात्मा गन्धर्वराज शैलूष की कन्या धर्मज्ञा सरमा विभीषण को भार्या-रूप में मिली, जो मानस-सरोवर के तट पर उत्पन्न हुई थी।

एक उप-कथा: सरमा का नामकरण मानस-सरोवर से जुड़ा है। वर्षा-काल में मानस-सरोवर बढ़ रहा था, तब उस कन्या की माता ने स्नेह से चिल्लाकर कहा, “सरः मा वर्धय” (हे सरोवर, मत बढ़ो)। इसी “सरः-मा” से कन्या का नाम “सरमा” पड़ा।

तब वर्षा-काल में मानस-सरोवर बढ़ रहा था; उस कन्या की माता ने स्नेह से आक्रन्द किया कि हे सरोवर, मत बढ़ो; इसी से वह सरमा कहलाई। इस प्रकार विवाह कर वे राक्षस वहाँ अपनी-अपनी भार्या के साथ नन्दनवन में गन्धर्वों-से रमने लगे। फिर मन्दोदरी ने मेघनाद नामक पुत्र को जन्म दिया।

वही मेघनाद है जिसे आप सब इन्द्रजित कहते हैं। जन्मते ही रावण-पुत्र ने रोते हुए मेघ-सा महानाद छोड़ा, जिससे, हे राघव, लंका जड़ (स्तब्ध) हो गई। इसी से पिता ने स्वयं उसका नाम मेघनाद रखा। हे राम, वह रावण के शुभ अन्तःपुर में, श्रेष्ठ स्त्रियों से रक्षित, माता-पिता को महान हर्ष देता, काष्ठ में छिपी अग्नि-सा बढ़ने लगा।

सार: रावण ने शूर्पणखा का विवाह विद्युज्जिह्व से किया। मय दानव की कन्या मन्दोदरी रावण की पत्नी बनी (मय ने अमोघ शक्ति भी दी)। कुम्भकर्ण को वज्रज्वाला और विभीषण को सरमा मिली। मन्दोदरी से मेघनाद (इन्द्रजित) का जन्म हुआ, जिसकी गर्जना से लंका स्तब्ध हो गई।

कुम्भकर्ण की निद्रा, रावण के अत्याचार और कुबेर का दूत

निद्रा से घिरा कुंभकर्ण आसन पर जम्हाई लेते हुए; पास दस सिर वाला रावण चिंतित खड़ा।

अब कुछ काल बाद लोकेश्वर ब्रह्मा द्वारा भेजी तीव्र निद्रा जँभाई आदि के रूप में कुम्भकर्ण को लंका में घेरने लगी। तब कुम्भकर्ण ने पास बैठे भाई से कहा, हे राजन, निद्रा मुझे सता रही है; मेरा आलय (भवन) बनवाइए। तब विश्वकर्मा-से शिल्पी राजा द्वारा नियुक्त किए गए। उन्होंने कुम्भकर्ण के लिए एक योजन चौड़ा और दूना (दो योजन) लम्बा, स्निग्ध, दर्शनीय, निराबाध भवन बनाया, जो स्फटिक और स्वर्ण के विचित्र स्तम्भों से सर्वत्र शोभित था। उसकी सीढ़ियाँ वैदूर्य की, झरोखे घण्टियों के जाल से जड़े, द्वार हाथीदाँत के, और वेदियाँ वज्र-स्फटिक की थीं। राक्षस (रावण) ने उसे मनोहर, सब सुखों से युक्त, सब ऋतुओं में सुखद, मेरु की पुण्य गुहा-सा बनवाया। वहाँ निद्रा में निमग्न महाबल कुम्भकर्ण अनेक सहस्र वर्ष सोता रहा और जागा नहीं।

जब कुम्भकर्ण निद्रा से अभिभूत था, तब दशानन ने बिना किसी अंकुश के देव, ऋषि, यक्ष और गन्धर्वों का संहार किया। अत्यन्त क्रुद्ध दशानन ने नन्दन आदि विचित्र उद्यानों में जाकर उन्हें भग्न कर दिया। हाथी-से नदियों में क्रीड़ा करता, वायु-से वृक्ष उखाड़ता, और इन्द्र के वज्र-से पर्वतों को विध्वस्त करता वह राक्षस घूमने लगा।

दशग्रीव के ऐसे आचरण को जानकर धर्मज्ञ वैश्रवण (कुबेर) ने अपने कुल के अनुरूप आचरण स्मरण कर, सौभ्रात्र दिखाने और दशग्रीव के हित के लिए लंका में दूत भेजा। वह दूत लंका जाकर विभीषण के पास पहुँचा, जिसने उसका धर्मपूर्वक सम्मान किया और आगमन का कारण पूछा। राजा और ज्ञातिजनों की कुशल पूछकर विभीषण ने उसे सभा में बैठे दशानन को दिखाया। अपने तेज से दीप्त राजा को देखकर उसने “जय” कहकर सम्मान किया और मौन खड़ा हो गया। फिर श्रेष्ठ पलंग पर उत्तम आस्तरण-शोभित बैठे दशग्रीव से दूत ने कहा।

दूत ने कहा, हे राजन, आपके भ्राता ने जो कहा, वह सब आपको बताता हूँ; हे वीर, यह आचरण और कुल दोनों के अनुरूप है। उन्होंने कहा, अब तक आपने जो किया वह बहुत हुआ; यदि सम्भव हो तो भली प्रकार धर्म-व्यवस्था में स्थित हो जाइए। मैंने नन्दनवन को आपसे भग्न देखा, ऋषियों को मारा सुना, और हे राजन, आपके विरुद्ध देवों के उद्योग की भी मैंने सुनी। हे राक्षसाधिप, आपने बार-बार मेरा निरादर किया; फिर भी अपराधी और बालक की भी रक्षा अपने बान्धवों को करनी चाहिए।

दूत ने कुबेर के शब्दों में आगे कहा, मैं धर्म-उपासना के लिए हिमवान के पृष्ठ पर गया, रौद्र व्रत धारण कर, संयत और नियतेन्द्रिय होकर। वहाँ मैंने उमा-सहित प्रभु देव (शिव) को देखा; दैवात मेरी बाईं आँख वहाँ देवी पर पड़ी। हे महाराज, अनुपम रूप धारण कर रुद्राणी वहाँ खड़ी थीं; मैं तो केवल यह जानने को कि वे कौन हैं, और किसी कारण से नहीं। देवी के दिव्य प्रभाव से मेरी बाईं आँख जल गई और दूसरी रेणु-धूसरित ज्योति-सी पिंगल (भूरी) हो गई।

दूत ने कहा, फिर मैं उसी पर्वत के दूसरे विस्तीर्ण तट पर गया और मौन रहकर आठ सौ वर्ष का महाव्रत धारण किया। उस नियम के पूर्ण होने पर वहाँ महेश्वर देव प्रकट हुए और प्रसन्न-मन बोले, हे धर्मज्ञ, हे सुव्रत, मैं आपके इस तप से प्रसन्न हूँ; हे धनाधिप, यह व्रत पहले मैंने और अब आपने आचरित किया; तीसरा कोई पुरुष ऐसा व्रत नहीं कर सकता, क्योंकि यह सुदुष्कर व्रत मैंने ही पूर्व में उत्पन्न किया था। हे सौम्य धनेश, इसलिए मुझसे सख्य (मित्रता) कीजिए; हे निष्पाप, तप से जीते जाकर मैं आपका मित्र बना।

Shiva on the mountain blesses the kneeling envoy whose left eye is burnt and right eye turned tawny, naming him Ekakshipingala.

शिव ने कहा, क्योंकि देवी के प्रभाव से आपकी बाईं आँख जली और देवी के रूप-निरीक्षण से दूसरी पिंगल हुई, इसलिए आप सदा के लिए “एकाक्षिपिंगल” नाम से प्रसिद्ध रहेंगे। दूत ने कहा, इस प्रकार शंकर से सख्य और अनुज्ञा पाकर लौटते हुए मैंने आपके पाप-निश्चय की बात सुनी। इसलिए कुल को कलंकित करने वाले इस अधर्म से निवृत्त हो जाइए। ऋषि-संघों सहित देव आपके वध का उपाय सोच रहे हैं।

ऐसा कहे जाने पर दशग्रीव क्रोध से रक्त-नयन होकर हाथ मलते, दाँत पीसते हुए बोला। उसने कहा, हे दूत, आप जो वचन कहते हैं वह मैंने समझ लिया; न आप जीवित रहेंगे, न वह भाई जिसने आपको भेजा है। यह धनरक्षक जो कहता है वह मेरे हित में नहीं। वह मूढ़ अपनी महेश्वर-मित्रता सुनाता है; आपने जो कहा वह मुझे क्षम्य नहीं। हे दूत, मैंने अब तक उसका समय इसलिए सहा कि वह सोचता है कि बड़ा भाई होने से मैं उसे न मारूँगा। पर अब उसका यह वचन सुनकर मैंने यह मति बना ली कि बाहु-बल के आश्रय से तीनों लोकों को भी जीतूँगा। इसी मुहूर्त में उसी एक के कारण मैं चारों लोकपालों को यमक्षय (यम के निवास) को भेजूँगा।

तलवार लिए रावण यज्ञशाला में पहुँचा; ब्राह्मण हवन करते और एक अलंकृत पुरुष भूमि पर मूर्छित।

यह कहकर लंकेश ने दूत को खड्ग से मार डाला और उसका शव दुरात्मा राक्षसों को भक्षण के लिए दे दिया। तब त्रैलोक्य-विजय की कामना से रावण ने ब्राह्मणों से स्वस्त्ययन (मंगल-पाठ) कराकर रथ पर चढ़कर वहाँ प्रयाण किया जहाँ धनेश थे।

सार: कुम्भकर्ण के लिए विशाल भवन बना, जिसमें वह सहस्रों वर्ष सोता रहा। रावण देव-ऋषियों पर अत्याचार करने लगा। कुबेर के हितैषी दूत ने उसे चेताया और शिव से अपनी मित्रता तथा “एकाक्षिपिंगल” नाम की कथा सुनाई। क्रुद्ध रावण ने दूत को मारकर कुबेर पर चढ़ाई का निश्चय किया।

यक्षों पर आक्रमण और रावण की विजय

तब नित्य बल से उद्धत रावण अपने छह सचिवों (महोदर, प्रहस्त, मारीच, शुक, सारण और सदा युद्ध-गृद्ध वीर धूम्राक्ष) से घिरा, क्रोध से लोकों को मानो दग्ध करता हुआ निकला। श्रीमान रावण नगरों, नदियों, पर्वतों, वनों और उपवनों को लाँघकर एक मुहूर्त में कैलास पर्वत पर पहुँचा।

उस पर्वत पर बैठे, सचिवों सहित युद्धोत्सुक उस दुरात्मा राक्षसेन्द्र को सुनकर यक्ष उसके सम्मुख खड़े न रह सके, और राजा का भ्राता जानकर वहाँ गए जहाँ धनेश थे। उन्होंने भाई के अभिप्राय की सब बात कही; धनद की अनुज्ञा पाकर वे हर्षित होकर युद्ध को निकले। तब राजा नैरृत (रावण) की सेनाओं का संक्षोभ समुद्र-सा बढ़ा, मानो पर्वत को हिला रहा हो। उस राक्षस के सम्मुख यक्ष खड़े न रह सके; तब यक्ष-राक्षसों का घोर युद्ध हुआ, और राक्षस के सचिव व्यथित हुए।

अपनी सेना को ऐसी दशा में देख निशाचर दशग्रीव बहुत हर्षनाद करता क्रोध से दौड़ा। राक्षसेन्द्र के घोर-विक्रम सचिवों में से एक-एक ने सहस्र-सहस्र यक्षों से युद्ध किया। गदा, मूसल, असि, शक्ति और तोमर से ताड़ित होकर दशग्रीव शत्रु-सेना में घुस गया। यक्षों के बाणों से, मेघों की धाराओं-से बिंधते हुए वह श्वास तक न ले सका; फिर भी सैकड़ों धाराओं से सिक्त पर्वत-से वह आहत होकर भी व्यथित न हुआ। तब काल-दण्ड-सी गदा उठाकर महात्मा दशग्रीव यक्षों को यमक्षय भेजता सेना में घुसा।

विस्तीर्ण कक्ष (वन-झाड़) और सूखे ईंधन-से बिखरी यक्ष-सेना को वायु-प्रेरित दीप्त अग्नि-से उसने दग्ध कर दिया। उन महामात्यों (महोदर, शुक आदि) से यक्ष वायु-से तितर-बितर मेघों-से अल्प-शेष रह गए। कुछ आहत होकर भग्न हुए और रण में गिरे; कुछ क्रोध से तीक्ष्ण दाँतों से अपने ओठ काटने लगे। थके हुए, शस्त्र छोड़े, परस्पर आलिंगन कर वे यक्ष जल से कटे तट-से बैठ गए। मरकर स्वर्ग जाते, युद्ध करते, भागते और देखते ऋषि-संघों से आकाश में स्थान न रहा।

उन महाबल यक्षेन्द्रों को भग्न देख महाबाहु धनाध्यक्ष ने और यक्ष भेजे। उसी बीच, हे राम, विस्तीर्ण बल-वाहन वाला संयोधकण्टक नामक यक्ष धनेश द्वारा भेजा गया। उसने रण में विष्णु-से चक्र से मारीच को मारा; मारीच पुण्य-क्षीण ग्रह-सा पर्वत से भूतल पर गिरा। पर्वत-शिखर-से तोरण (द्वार-स्तम्भ) से आहत वह भग्न होकर भागा। फिर एक मुहूर्त में सचेत होकर विश्राम कर उस यक्ष से युद्ध किया; वह यक्ष भी भग्न होकर भाग गया।

तब स्वर्ण-विचित्र, वैदूर्य-रजत से जड़ा द्वारपालों की अन्तिम मर्यादा वाला तोरण-द्वार रावण ने पार किया। वहाँ सूर्यभानु नामक द्वारपाल ने प्रवेश करते निशाचर दशग्रीव को रोका। यक्ष से रोके जाने पर भी राक्षस घुसने लगा; हे राम, जब रोके जाने पर राक्षस रुका नहीं, तब यक्ष ने द्वार से उखाड़े स्तम्भ से उसे मारा। रक्त बहाता दशग्रीव धातु-धाराएँ बहाते पर्वत-सा शोभित हुआ। पर स्वयम्भू के वरदान से वीर को क्षति न हुई। तब उसी तोरण से ताड़ित होकर वह यक्ष भस्म होकर दिखाई न दिया।

राक्षस का पराक्रम देखकर सब भागने लगे; भय से पीड़ित, थके, विवर्ण-मुख, शस्त्र त्यागकर वे नदियों और गुहाओं में जा घुसे।

सार: रावण ने छह सचिवों सहित कैलास पर कुबेर के यक्षों पर आक्रमण किया। यक्षों ने डटकर लड़ा, मारीच और स्वयं रावण घायल भी हुए, पर ब्रह्मा के वरदान से रावण को क्षति न हुई। अन्ततः यक्ष भागकर नदियों-गुहाओं में छिप गए।

मणिभद्र और कुबेर की पराजय, पुष्पक का हरण

सहस्रों यक्षेन्द्रों को त्रस्त देख धनाध्यक्ष ने महायक्ष मणिभद्र से कहा, हे यक्षेन्द्र, इस दुर्वृत्त, पापचित्त रावण को मारो; युद्धशील वीर यक्षों के शरण बनो। ऐसा कहे जाने पर सुदुर्जय महाबाहु मणिभद्र चार सहस्र यक्षों से घिरा युद्ध करने लगा। तब यक्ष गदा, मूसल, प्रास, शक्ति, तोमर और मुद्गर से प्रहार करते राक्षसों पर टूट पड़े; श्येन-से वेग से तुमुल युद्ध करते, “दृढ़ता से दो”, “नहीं चाहिए, दे दो” कहते। ब्रह्मवादी देव, गन्धर्व और ऋषि उस तुमुल युद्ध को देख परम विस्मय में पड़े।

प्रहस्त ने रण में सहस्र यक्ष मारे, महोदर ने एक सहस्र अनिन्द्य वीर मारे; और हे राजन, युद्ध-इच्छुक क्रुद्ध मारीच ने निमेष-मात्र में दो सहस्र और मारे। हे पुरुषव्याघ्र, यक्षों का सीधा (आर्जव) युद्ध कहाँ और राक्षसों का माया-बल-आश्रित युद्ध कहाँ; इसी से युद्ध में राक्षस अधिक रहे।

महारण में धूम्राक्ष से भिड़कर मणिभद्र क्रोध से वक्ष में मूसल से ताड़ित होकर भी न काँपा। तब मणिभद्र ने गदा घुमाकर राक्षस धूम्राक्ष को मस्तक पर मारा, और वह विह्वल होकर गिरा। धूम्राक्ष को ताड़ित, रक्त-सिक्त गिरा देख दशानन संग्राम में मणिभद्र की ओर दौड़ा। क्रुद्ध दौड़ते दशानन को यक्षपुंगव मणिभद्र ने तीन शक्तियों से मारा। ताड़ित दशानन ने रण में मणिभद्र के मुकुट पर प्रहार किया; उस प्रहार से उसका मुकुट एक ओर हट गया। तभी से वह यक्ष “पार्श्वमौलि” (जिसका मुकुट एक ओर हट गया हो) कहलाया। महात्मा मणिभद्र के विमुख होने पर, हे राजन, उस पर्वत पर राक्षसों का महाशब्द बढ़ा।

तब दूर से गदाधर धनाध्यक्ष दिखाई दिए, जो अपने दो सचिवों शुक्र और प्रौष्ठपद, तथा अपने दो निधियों (पद्म और शंख) के अधिष्ठाता देवताओं से घिरे थे। शाप से गौरव-भ्रष्ट भाई (रावण) को रण में देख वह बुद्धिमान ब्रह्म-कुल के योग्य वचन बोले।

कुबेर ने कहा, हे मूढ़, मेरे रोकने पर भी आप नहीं समझते; पर अपने कुकर्मों के फल से नरक जाकर पीछे समझेंगे। जो दुर्मति मोह से विष पीकर उसे नहीं पहचानता, वह परिणाम में ही उस कर्म का फल जानता है। आपकी ऐसी मति है कि कोई धर्मयुक्त कर्म भी देवताओं को प्रसन्न नहीं करता, और उस अप्रसन्नता से प्रेरित होकर आप इस हिंसा में लगे हैं, यह आप नहीं समझते। जो माता, पिता, विप्र और आचार्य का अपमान करता है, वह यमराज के वश में जाकर उसका फल देखता है।

कुबेर ने आगे कहा, अध्रुव (नश्वर) शरीर में जो तप का अर्जन नहीं करता, वह मूढ़ मरकर अपनी गति को जाकर पीछे पछताता है। धर्म से राज्य, धन और सुख; अधर्म से दुःख ही मिलता है; इसलिए सुख के लिए धर्म कीजिए और पाप छोड़िए। पाप का फल दुःख है, जो स्वयं ही भोगना पड़ता है; इसलिए मूढ़ अपने ही नाश के लिए पाप करता है। दुर्बुद्धि को बुद्धि स्वतः नहीं उपजती; जैसा कर्म करता है वैसा ही फल पाता है। मनुष्य लोक में ऋद्धि, रूप, बल, पुत्र, धन और शूरता पुण्य-कर्मों से ही पाते हैं। इस प्रकार आप नरकगामी हैं, क्योंकि आपकी मति ऐसी है; मैं आपसे और न बोलूँगा, दुराचारियों के विषय में यही निर्णय है।

ऐसा कहकर कुबेर ने प्रहार किया; तब मारीच-प्रमुख उसके अमात्य विमुख होकर भाग गए। तब उस महात्मा यक्षेन्द्र ने दशग्रीव को गदा से मस्तक पर मारा, पर वह अपने स्थान से न डिगा। तब, हे राम, उस महारण में यक्ष और राक्षस परस्पर प्रहार करने लगे, पर दोनों न विह्वल हुए, न थके।

तब धनद ने रावण पर आग्नेय अस्त्र छोड़ा; राक्षसेन्द्र ने उसे वारुण अस्त्र से रोका। तब राक्षसेश्वर ने राक्षसी माया में प्रवेश कर यक्षों के विनाश के लिए लाखों रूप धारण किए। दशानन व्याघ्र, वराह, मेघ, पर्वत, समुद्र, वृक्ष, यक्ष और दैत्य-रूप में दिखाई दिया। ऐसे अनेक रूप बनाकर वह फिर दिखाई न दिया।

तब, हे राम, दशानन ने एक महान अस्त्र (विशाल गदा) ग्रहण कर घुमाकर धनद के मस्तक पर मारा। उससे आहत होकर विह्वल, रक्त-सिक्त धनद कटे-मूल अशोक-से भूमि पर गिरे। तब पद्म आदि निधि-देवताओं से घिरे, उच्छ्वसित किए जाते (होश में लाए जाते) कुबेर को नन्दनवन ले जाया गया। उस धनद को जीतकर हर्षित-मन राक्षसेन्द्र ने विजय-चिह्न-रूप उसका विमान पुष्पक ले लिया।

एक उप-कथा: पुष्पक विमान विश्वकर्मा-निर्मित था: स्वर्ण-स्तम्भों से युक्त, वैदूर्य-मणि के द्वारों, मोती-जाल और सब-ऋतु-फलदायी वृक्षों वाला; मन-से वेग, इच्छानुसार गति और इच्छानुसार रूप वाला; मणि-स्वर्ण की सीढ़ियों और तप्त-स्वर्ण की वेदियों वाला; अक्षय्य, नेत्र-मन को सदा सुखद, न अधिक शीतल न उष्ण, सब ऋतुओं में सुखद। यही विमान आगे राम के अयोध्या-गमन तक की कथा में बार-बार आता है।

पुष्पक स्वर्ण-स्तम्भों, वैदूर्य-द्वारों, मोती-जाल और सब-ऋतु-फल वृक्षों वाला, मन-से वेग, कामगम (इच्छानुसार गति), कामरूप, मणि-स्वर्ण-सीढ़ियों और तप्त-स्वर्ण-वेदियों वाला, अक्षय्य, नेत्र-मन को सुखद, अनेक आश्चर्यों और विचित्र भक्ति-रचना से युक्त, विश्वकर्मा-निर्मित, सर्वकाम-सम्पन्न, मनोहर, अनुत्तम, न शीतल न उष्ण, सब ऋतुओं में सुखद शुभ विमान था। उस कामग, वीर्य-निर्जित विमान पर चढ़कर वह दुर्मति राजा दर्प-उत्सेक से समझने लगा कि उसने तीनों लोक जीत लिए। वैश्रवण देव को जीतकर वह कैलास से उतर आया।

अपने पराक्रम से उस विपुल विजय को पाकर, श्रेष्ठ विमान पर बैठा, निर्मल किरीट और हार धारण किए वह प्रतापवान निशाचर यज्ञ-सभा में स्थित अग्नि-सा शोभित हुआ।

सार: मणिभद्र को पराजित कर रावण ने कुबेर का सामना किया। कुबेर ने धर्मोपदेश दिया, पर रावण ने माया रचकर और महागदा से कुबेर को मूर्च्छित कर उसका पुष्पक विमान छीन लिया। विजय-गर्व से वह कैलास से उतरा।

नन्दीश्वर का शाप और शिव से खड्ग की प्राप्ति

हे राम, भाई कुबेर को जीतकर राक्षसाधिप उस महान शरवण (नरकट के वन) में पहुँचा जहाँ महासेन (कार्तिकेय) उत्पन्न हुए थे। तब दशग्रीव ने किरणों से घिरे, द्वितीय सूर्य-से स्वर्णिम शरवण को देखा। किसी रमणीय वनान्तर वाले पर्वत पर चढ़कर उसने पुष्पक को वहीं रुका पाया। मन्त्रियों से घिरा राक्षसेन्द्र सोचने लगा, यह कामग विमान क्यों रुक गया, क्यों नहीं चलता; अवश्य यह इस पर्वत पर रहने वाले किसी का कर्म है।

तब बुद्धि-कोविद मारीच बोला, हे राजन, बिना कारण पुष्पक नहीं रुकता; अथवा यह पुष्पक धनद के अतिरिक्त किसी अन्य को नहीं ढोता, इसलिए उससे वियुक्त होकर निस्पन्द हो गया है। उसके यह कहते-कहते भव (शिव) का अनुचर नन्दीश्वर (कराल, कृष्ण-पिंगल, वामन, विकट, मुण्डित-शिर, ह्रस्व-भुज, बलवान और सदा हर्षयुक्त) पास आकर निडर राक्षसेन्द्र से बोला।

नन्दी ने कहा, हे दशग्रीव, लौट जाइए; शंकर इस पर्वत पर क्रीड़ा कर रहे हैं; इसी से यह सुपर्ण, नाग, यक्ष, देव, गन्धर्व, राक्षस और सब प्राणियों के लिए अगम्य कर दिया गया है। नन्दी का वचन सुनकर क्रोध से जिसके कुण्डल काँप रहे थे और रोष से नेत्र ताम्र हो गए थे, ऐसा रावण पुष्पक से उतरकर “यह शंकर कौन है” कहता पर्वत के मूल में आया। वहाँ देव के समीप, दीप्त शूल टेके द्वितीय शंकर-से खड़े नन्दी को उसने देखा।

वानर-मुख देखकर उसका तिरस्कार कर वह राक्षस वहाँ जल-भरे मेघ-सा अट्टहास छोड़ने लगा। तब क्रुद्ध भगवान नन्दी, जो शंकर का ही दूसरा रूप थे, पास खड़े दशानन से बोले। उन्होंने कहा, हे निशाचर, मैं चाहूँ तो अभी आपको मार सकता हूँ; पर आपको नहीं मारता, क्योंकि आप अपने ही कर्मों से पहले ही मारे जा चुके हैं।

नन्दी ने आगे कहा, हे दशानन, क्योंकि वानर-रूप मुझे तुच्छ समझकर आपने अशनि-पात-सा अपहास छोड़ा, इसलिए आपके कुल के वध के लिए वानर उत्पन्न होंगे; मेरे वीर्य से युक्त, मेरे रूप-से तेजस्वी। उनके नख और दाढ़ें आयुध होंगी, मन-से वेग होगा; क्रूर, युद्धोन्मत्त, बल से उद्रिक्त वे चलते पर्वतों-से दिखेंगे। एक साथ मिलकर वे आपका प्रबल दर्प और बल-घमण्ड, आपके अमात्यों और पुत्रों सहित, हर लेंगे। हे निशाचर, मैं अभी आपको मार सकता हूँ, पर मारता नहीं, क्योंकि आप अपने ही कर्मों से पूर्व ही मारे जा चुके हैं। उस महात्मा देव के यह कहते ही देव-दुन्दुभियाँ बजीं और आकाश से पुष्पवृष्टि हुई।

नन्दी के वचन की अवहेलना कर वह महाबल पर्वत के पास जाकर बोला, मैं इस पर्वत को, जिसके कारण जाते समय मेरे पुष्पक की गति रुकी, हे वृषभ-स्वामी (शिव), उखाड़ देता हूँ। किस प्रभाव से भव सदा राजा-सा क्रीड़ा करते हैं; वे यह जानने योग्य नहीं जानते कि उपस्थित भय उन पर आ पड़ा है। यह कहकर भुजाएँ पर्वत के नीचे डालकर उसने उसे शीघ्र उठाया, जिससे वह पर्वत प्रबल काँप उठा।

पर्वत के चलने से देव के गण काँपे, और तब महेश्वर से आलिंगित पार्वती भी विचलित हो गईं। तब, हे राम, देवों में प्रवर महादेव हर ने पाद-अँगूठे से उस पर्वत को लीला से दबा दिया। उससे उसकी पर्वत-स्तम्भ-सी भुजाएँ दब गईं, और वहाँ खड़े राक्षस के सचिव विस्मित हुए। भुजाओं के दबने से रोष में राक्षस ने सहसा ऐसा रव छोड़ा जिससे तीनों लोक काँप उठे। उसके अमात्यों ने उसे युगान्त के वज्र-निष्पेष-सा माना; तब इन्द्र आदि देव भी मार्ग में लड़खड़ा गए। समुद्र क्षुब्ध हुए, पर्वत हिले; यक्ष, विद्याधर और सिद्ध “यह क्या है” कहने लगे।

उसके अमात्यों ने उससे कहा, हे दशानन, नीलकण्ठ उमापति महादेव को प्रसन्न कीजिए; उनके अतिरिक्त यहाँ हम कोई शरण नहीं देखते। स्तुतियों से प्रणत होकर उन्हीं की शरण जाइए; कृपालु शंकर तुष्ट होकर आप पर प्रसाद करेंगे। अमात्यों के ऐसा कहने पर दशानन ने वृषभध्वज की सामवेद के विविध स्तोत्रों से स्तुति की और प्रणाम किया। इस प्रकार रोते राक्षस के एक सहस्र वर्ष बीत गए।

तब पर्वत-शिखर पर बैठे प्रभु महादेव प्रसन्न हुए और, हे राम, उसकी भुजाओं को दबाव से मुक्त कर दशानन से बोले। उन्होंने कहा, हे वीर दशानन, मैं आपकी मनुष्यता और शौर्य तथा स्तवन से प्रसन्न हूँ। पर्वत के नीचे दबने पर आपने जो सुदारुण रव छोड़ा, जिससे तीनों लोक भयभीत होकर रो उठे, इसी कारण, हे राजन, आप “रावण” नाम से प्रसिद्ध होंगे। देव, मनुष्य, यक्ष और भूतल के अन्य प्राणी आपको “लोकरावण” (लोक को रुलाने वाला) रावण कहेंगे। हे पौलस्त्य, अब विश्रब्ध (निडर) होकर जिस मार्ग चाहें जाइए; हे राक्षसाधिप, मेरी अनुज्ञा है, जाइए।

शम्भु के यह कहने पर लंकेश ने स्वयं कहा, हे महादेव, यदि प्रसन्न हैं तो मुझ याचक को वर दीजिए। मैंने देव, गन्धर्व, दानव, राक्षस, गुह्यक, नाग और अन्य बलवानों से अवध्यता पहले ही पा ली है; हे देव, मैं मनुष्यों को नहीं गिनता, वे मुझे अत्यल्प हैं। हे त्रिपुरान्तक, मैंने ब्रह्मा से दीर्घ आयु पाई है; आयु का जो शेष चाहा है वह दीजिए, और मुझे एक शस्त्र भी दीजिए। ऐसा कहे जाने पर शंकर ने उसे चन्द्रहास नामक महादीप्त खड्ग दिया, और भूतपति ने उस अवसर पर आयु का शेष भी दिया।

देते समय शम्भु ने कहा, यह खड्ग आपको अवज्ञेय न समझना चाहिए; यदि आपने इसका अनादर किया तो यह निःसन्देह मेरे पास लौट आएगा। इस प्रकार स्वयं महेश्वर द्वारा नामित वह रावण महादेव को प्रणाम कर पुष्पक पर पुनः चढ़ा। तब, हे राम, रावण भूतल पर विचरता इधर-उधर महावीर्य क्षत्रियों को सताने लगा। उसकी आज्ञा न मानने वाले कुछ तेजस्वी, युद्ध-दुर्मद शूर क्षत्रिय अपने परिवारों सहित नष्ट हो गए। अन्य प्राज्ञ-सम्मत, जो राक्षस को दुर्जय जानते थे, बल से गर्वित राक्षस से बोले कि हम पराजित हैं।

सार: कैलास पर पुष्पक रुकने पर नन्दी ने रावण को रोका; तिरस्कार करने पर नन्दी ने शाप दिया कि वानर ही रावण-कुल का नाश करेंगे। पर्वत उठाने पर शिव ने अँगूठे से उसे दबा दिया; रावण के रव से ही उसका नाम “रावण” पड़ा। स्तुति से प्रसन्न शिव ने चन्द्रहास खड्ग दिया।

वेदवती का शाप

हे राजन, पृथ्वी पर विचरते महाबाहु रावण हिमालय के वन में पहुँचकर वहाँ घूमने लगा। वहाँ उसने कृष्णाजिन (काले मृग का चर्म) और जटाधारिणी, ऋषि-विधि से दीप्त, देवी-सी एक कन्या को देखा। रूप-सम्पन्न उस महाव्रती कन्या को देखकर काम-मोह से ग्रस्त रावण ने हँसते हुए-से पूछा।

उसने पूछा, हे भद्रे, यह क्या कर रही हैं, यह आपके यौवन के विरुद्ध है; ऐसी प्रतिक्रिया आपके रूप के योग्य नहीं। हे भीरु, आपका अनुपम रूप मनुष्यों में काम-उन्माद उपजाता है; तप में स्थित रहना आपको उचित नहीं, यह मेरे मन का निर्णय है। हे भद्रे, आप किसकी हैं, यह क्या है, हे वरानने, आपका पति कौन है; जो आपको भोगे वह पुरुष भूमि पर पुण्यभाग है। पूछने पर मुझे सब बताइए, किसलिए यह परिश्रम है।

रावण के ऐसा कहने पर वह यशस्विनी कन्या तपोधना उसका विधिवत आतिथ्य कर बोली, मेरे पिता का नाम कुशध्वज था, अमित-प्रभ ब्रह्मर्षि। वे श्रीमान बृहस्पति-पुत्र, बुद्धि में बृहस्पति-तुल्य थे। नित्य वेदाभ्यास करते उस महात्मा से मैं वाङ्मयी कन्या उत्पन्न हुई, इसलिए “वेदवती” कहलाई। तब गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और पन्नग (नाग) सहित देव मेरे पिता के पास आकर मुझे वरना चाहते थे, पर, हे राक्षसेश्वर, मेरे पिता ने मुझे उनमें से किसी को न दिया।

वेदवती ने कहा, हे महाबाहु, उसका कारण कहती हूँ, सुनिए। मेरे पिता को त्रिलोकेश सुरेश्वर विष्णु ही जामाता (दामाद)-रूप में अभिप्रेत थे; इसलिए वे मुझे किसी और को देना न चाहते थे। यह सुनकर बल से गर्वित दैत्यों का राजा शम्भु नामक क्रुद्ध हुआ; और रात्रि में सोते मेरे पिता उस पापी से मारे गए। तब मेरी दीन, महाभागा माता पिता के उस शरीर का आलिंगन कर अग्नि में प्रविष्ट हुईं।

वेदवती ने आगे कहा, तब मैंने पिता के नारायण-सम्बन्धी मनोरथ को सत्य करने के लिए हृदय में उन्हीं को धारण किया कि “मैं उन्हें ही पाऊँगी”। इसी प्रतिज्ञा को धारण कर मैं विपुल तप करती हूँ। हे राक्षसपुंगव, यह सब मैंने आपको कह दिया। नारायण ही मेरे पति हैं, उन पुरुषोत्तम के अतिरिक्त कोई नहीं; नारायण को पाने की इच्छा से मैं यह घोर नियम धारण करती हूँ। हे राजन, तप से मैं तीनों लोकों में जो कुछ है, सब जानती हूँ; मैंने आपको भी जान लिया है; हे पौलस्त्यनन्दन, जाइए।

तब काम-शर से पीड़ित रावण विमानाग्र से उतरकर उस महाव्रती कन्या से फिर बोला, हे सुश्रोणि, जिसकी ऐसी मति है, आप अवलिप्त (अभिमानी) हैं; हे मृगशावाक्षि, तप से पुण्य-संचय वृद्धाओं को शोभता है। हे सर्वगुण-सम्पन्ने, आपको ऐसा कहना उचित नहीं; हे भीरु, आप तीनों लोकों में सुन्दरी हैं और आपका यौवन व्यतीत हो रहा है। हे भद्रे, मैं लंकापति दशग्रीव हूँ; आप मेरी भार्या बनें और यथासुख भोग भोगिए। जिस विष्णु को आप कहती हैं वह है कौन; जिसे आप चाहती हैं, हे अंगने, वह वीर्य, तप, भोग और बल में मुझसे समान नहीं।

उसके ऐसा कहने पर वेदवती ने कहा, ऐसा मत कहिए, ऐसा मत कहिए; आपके अतिरिक्त कौन बुद्धिमान त्रिलोकाधिपति, सर्वलोक-नमस्कृत विष्णु का ऐसा अपमान करेगा। ऐसा कहने पर राक्षस ने उसे केशों से पकड़ा। क्रुद्ध वेदवती ने अपने हाथ को खड्ग बनाकर अपने केश काट दिए। मानो रोष से जलती-सी और राक्षस को दहती-सी वह अग्नि प्रज्वलित कर मरण को त्वरित बोली, हे अनार्य, आपसे धर्षित (अपमानित) होकर मैं जीना नहीं चाहती।

वेदवती ने कहा, हे राक्षस, इसलिए आपके देखते मैं अग्नि में प्रवेश करूँगी। क्योंकि वन में आप पापात्मा ने मुझे धर्षित किया, इसलिए आपके वध के लिए मैं फिर उत्पन्न होऊँगी; क्योंकि पाप-निश्चय वाले पुरुष को स्त्री नहीं मार सकती। यदि मैं आप पर शाप दूँ तो मेरे तप का क्षय होगा; इसलिए यदि मैंने कुछ कृत, दत्त या हुत किया हो, तो मैं अयोनिजा (बिना गर्भ से जन्मी) किसी धार्मिक की साध्वी कन्या बनूँ। यह कहकर वह प्रज्वलित अग्नि में प्रविष्ट हो गई। तब आकाश से चारों ओर दिव्य पुष्पवृष्टि हुई।

समझने की कुंजी (अवधारणा): “अयोनिजा” का अर्थ है माता के गर्भ से न जन्मना। वेदवती का यह संकल्प आगे सीता के रूप में फलित होता है, जो हल की रेखा (सीता) से उत्पन्न हुईं, माता के गर्भ से नहीं। यहीं वाल्मीकि सीता-जन्म और रावण-वध के बीच का गूढ़ सूत्र जोड़ते हैं।

वह कमल-गर्भ-सी प्रभा वाली कन्या के रूप में पुनः उत्पन्न हुई। उसे भी पहले-सा उस राक्षस ने पाया; कमल-गर्भ-आभा वाली उस कन्या को लेकर वह अपने घर गया। वेदवती को हाथ से पकड़कर रावण ने अपने मन्त्री को दिखाया। लक्षणज्ञ (लक्षण-पारखी) मन्त्री ने उसके लक्षण देखकर रावण से कहा, यदि यह सुश्रोणि गृह में रहेगी तो आपके वध का कारण बनेगी। हे राम, यह सुनकर रावण ने उसे समुद्र में फेंक दिया।

समुद्र से धरती पर पहुँचकर वह यज्ञ-स्थल के मध्य में आई; राजा जनक के हल-मुख (हल की नोक) से उत्कृष्ट (खींची) जाकर वह सती फिर उत्पन्न हुई। हे प्रभु, वही वेदवती राजा जनक की पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई और आपकी भार्या है; हे महाबाहु, आप ही सनातन विष्णु हैं। पूर्व में जिस शत्रु को उसने क्रोध से दग्ध किया था, उसी को इस जन्म में आपके अमानुष पराक्रम का आश्रय लेकर उसने मरवाया।

इस प्रकार यह महाभागा मर्त्यलोक में बार-बार उत्पन्न होती रहेगी, हल-मुख से जुती भूमि में अग्नि-शिखा-सी प्रकट होती हुई। यह जो पूर्व में कृतयुग में वेदवती नाम से थी, त्रेतायुग को पाकर उस राक्षस के वध के लिए मिथिला के राजाओं के कुल में महात्मा जनक की कन्या-रूप में उत्पन्न हुई। क्योंकि वह सीता (हल-रेखा) से उत्पन्न हुई, इसलिए मनुष्य उसे “सीता” कहते हैं।

सार: हिमालय में तपस्विनी वेदवती को रावण ने सताया। उसने अग्नि-प्रवेश करते हुए शाप दिया कि वह रावण के वध के लिए पुनर्जन्म लेगी। वही वेदवती आगे जनक की पुत्री सीता-रूप में जन्मी; यही रावण के अन्त का बीज था।

मरुत्त का यज्ञ और पक्षियों को वरदान

वेदवती के अग्नि में प्रविष्ट होने पर रावण पुष्पक पर चढ़कर फिर पृथ्वी पर विचरने लगा। उशीरबीज पहुँचकर रावण ने देवों सहित यज्ञ करते राजा मरुत्त को देखा। बृहस्पति के सहोदर भाई, धर्मज्ञ संवर्त नामक ब्रह्मर्षि समस्त देवगणों से घिरे वह यज्ञ करा रहे थे।

वर-प्रदान से दुर्जय उस राक्षस को देखकर उसके आक्रमण से भयभीत देव तिर्यक्-योनि (पशु-पक्षी की योनि) में समा गए। इन्द्र मयूर बने, धर्मराज (यम) कौआ, धनाध्यक्ष (कुबेर) गिरगिट, और वरुण हंस बने। इस प्रकार अन्य देवों के भी रूप बदल लेने पर, हे शत्रुसूदन, रावण अशुचि कुत्ते-सा यज्ञ में घुसा। राक्षसाधिप रावण ने राजा मरुत्त के पास जाकर कहा, मुझे युद्ध दीजिए, या कहिए कि “मैं पराजित हूँ”।

तब राजा मरुत्त ने पूछा, आप कौन हैं। अवहास (तिरस्कारपूर्ण हँसी) छोड़कर रावण बोला, हे पार्थिव, मैं आपके अकुतूहल-भाव (निर्भयता) से प्रसन्न हूँ, जो आप मुझे, धनद के अनुज रावण को, नहीं जानते। तीनों लोकों में और कौन है जो मेरे बल को न जानता हो, जिसने भाई को जीतकर यह विमान छीन लिया।

तब राजा मरुत्त ने रावण से कहा, आप धन्य हैं कि अपने ज्येष्ठ भाई को रण में जीता। तीनों लोकों में आप-सा श्लाघ्य कोई नहीं; पहले कौन-सा अनुपम धर्म आचरण कर आपने वर पाए? आप स्वयं जैसा कहते हैं, वैसा मैंने पहले नहीं सुना; हे दुर्मति, अब रुकिए, जीवित न लौटेंगे। आज तीक्ष्ण बाणों से आपको यमक्षय भेजता हूँ। यह कहकर राजा क्रुद्ध होकर धनुष-बाण लेकर युद्ध को उठा, पर संवर्त ने मार्ग रोक लिया।

उस महर्षि ने स्नेहयुक्त मरुत्त से कहा, यदि मेरा वचन सुनने योग्य हो तो आपको संग्राम उचित नहीं; यह माहेश्वर सत्र (यज्ञ) यदि अधूरा रहा तो आपका कुल भस्म कर देगा। दीक्षित को युद्ध कहाँ, दीक्षित को क्रोध कहाँ; जय में सदा संशय है और यह राक्षस सुदुर्जय है। गुरु के वचन से निवृत्त होकर राजा मरुत्त ने बाण-सहित धनुष त्याग दिया और स्वस्थ होकर यज्ञ-मुख हो गए।

उसे पराजित मानकर शुक ने हर्ष से ऊँचे स्वर में घोषणा की, “रावण जीतता है”। तब वहाँ खड़े यज्ञ में आए महर्षियों को रावण ने भक्षण किया और उनके रक्त से तृप्त होकर फिर पृथ्वी पर विचरने लगा।

रावण के जाने पर इन्द्र सहित देव अपनी-अपनी योनि (रूप) को पाकर उन प्राणियों (पशु-पक्षियों) से बोले। हर्ष से इन्द्र ने नील-पंख वाले मयूर से कहा, हे धर्मज्ञ, मैं आपसे प्रसन्न हूँ; सर्पों से आपको भय न होगा। ये जो सहस्र नेत्र-से चिह्न हैं, वे आपके पंखों में होंगे; और मेरे वर्षा करने पर आप प्रीति-लक्षण रूप हर्ष पाएँगे। इस प्रकार सुरेश्वर इन्द्र ने मयूर को वर दिया। हे नराधिप, पहले मयूरों के पंख केवल नीले थे; देवराज से वर पाकर सब मयूरों के सारे शरीर पर वे चिह्न आ गए।

हे राम, धर्मराज यम ने अपने सामने प्राग्वंश (यज्ञशाला के पूर्व बने भवन) पर बैठे कौए से कहा, हे पक्षी, मैं आपसे प्रसन्न हूँ; प्रसन्न का वचन सुनिए; जैसे अन्य प्राणी मुझसे विविध रोगों से पीड़ित होते हैं, वे रोग आप पर प्रभावी न होंगे, इसमें सन्देह नहीं। हे विहंगम, मेरे वर से मृत्यु से आपको भय नहीं; जब तक मनुष्य आपको न मारें, तब तक आप जीवित रहेंगे। और जो मनुष्य मेरे विषय (यमलोक) में भूख से पीड़ित हैं, वे आपके भोजन करने पर अपने बान्धवों सहित तृप्त होंगे।

वरुण ने गंगा-जल में विचरते हंस से कहा, हे पत्ररथेश्वर (पक्षिराज), प्रीतियुक्त वचन सुनिए; आपका वर्ण मन को रमणीय, सौम्य, शुद्ध चन्द्रमण्डल-सा और श्वेत फेन-सी प्रभा वाला होगा। मेरे शरीर (जल) के सम्पर्क में आकर आप सदा कान्त रहेंगे और अतुल प्रीति पाएँगे; यह मेरी प्रीति का लक्षण होगा। हे राम, पहले हंसों का वर्ण सर्वथा श्वेत न था; उनके पंख सिरे पर नीले और छाती शष्प-अग्र-सी श्यामल थी।

तब वैश्रवण (कुबेर) ने पर्वत पर बैठे गिरगिट से कहा, हे गिरगिट, मैं भी आपसे प्रसन्न होकर आपको स्वर्णिम वर्ण देता हूँ। आपका सिर सदा सद्द्रव्य (स्वर्ण)-सा अक्षय रहेगा; मेरी प्रीति से आपका वर्ण स्वर्ण-सा हो जाएगा। इस प्रकार उन प्राणियों को वर देकर देव उस यज्ञोत्सव की समाप्ति पर अपने राजा इन्द्र सहित अपने-अपने भवन को लौट गए।

सार: उशीरबीज में मरुत्त के यज्ञ में रावण आया; भयभीत देव मयूर, कौआ, गिरगिट, हंस बन गए। गुरु संवर्त के परामर्श से मरुत्त ने युद्ध टाला। रावण ऋषियों को खाकर चला गया। तब देवों ने उन पशु-पक्षियों को (जिनके रूप उन्होंने लिए थे) वरदान दिए, जिनसे मयूर के पंखों के चिह्न, कौए की निर्भयता, हंस का श्वेत वर्ण और गिरगिट का स्वर्णिम सिर आया।

अनरण्य का शाप: इक्ष्वाकु-कुल का बीज बोलता है

मरुत्त को जीतकर युद्ध का प्यासा दशानन (दस मुखोंवाला रावण), राक्षसों का अधिपति, अब राजाओं की नगरियों की ओर बढ़ा। महेन्द्र और वरुण के समान बलवान राजाओं के पास पहुँचकर वह यही कहता, “हमें युद्ध दीजिए, अथवा कह दीजिए कि आप पराजित हैं। यही हमारा निश्चय है। जो ऐसा न करेगा, उसके लिए कोई बचाव नहीं।”

आपस में मन्त्रणा करके वे राजा, यद्यपि निर्भय, बुद्धिमान, अत्यन्त बलशाली और धर्म में दृढ़ थे, शत्रु का वरदान-जनित बल पहचानकर पराजय स्वीकार कर गए। दुष्यन्त, सुरथ, गाधि, गय और राजा पुरूरवा, हे राम, इन सबने कहा, “हम हार गए।” फिर अयोध्या पहुँचकर, जिसकी रक्षा अनरण्य वैसे ही कर रहे थे जैसे इन्द्र अमरावती की, रावण ने उस नरश्रेष्ठ के पास जाकर कहा, “युद्ध दीजिए, अथवा कहिए, ‘मैं पराजित हूँ।’”

उस पापात्मा के वचन सुनकर अयोध्यापति अनरण्य क्रोध से भर उठे और बोले, “हे राक्षसराज, हम आपको द्वन्द्वयुद्ध (दो योद्धाओं का आमने-सामने का युद्ध) की अनुमति देते हैं। थोड़ा रुकिए, तैयार हो लीजिए; हम भी तैयार हो रहे हैं।” अनरण्य के पास पहले से समाचार था, अतः उन्होंने विशाल सेना जुटा रखी थी। दस हजार हाथी, एक लाख घोड़े, हजारों रथ और पैदल सैनिक भूमि को ढककर निकल पड़े। फिर अनरण्य और रावण के बीच घोर युद्ध छिड़ा। रावण की सेना से टकराकर, बहुत देर तक लड़कर, राजा की सारी सेना ऐसे भस्म हो गई जैसे अग्नि में डाली हुई आहुति, और जैसे आग में पतंगे।

अपनी महाबली सेना को नष्ट होते देखकर, मानो सौ नदियाँ समुद्र में पहुँचकर लुप्त हो गई हों, राजा अनरण्य स्वयं क्रोध में मूर्छित-से होकर, इन्द्रधनुष-सा अपना धनुष टंकारते हुए रावण के पास आ पहुँचे। मारीच, शुक, सारण और प्रहस्त उनसे पिटकर मृगों की भाँति भागे। तब अनरण्य ने उस राक्षसराज के मस्तक पर आठ सौ बाण बरसाए, पर वे बाण पर्वत-शिखर पर गिरती जल-धाराओं की तरह कोई चोट न कर सके। तब क्रुद्ध रावण ने हथेली से उनके सिर पर ऐसा प्रहार किया कि वे रथ से गिर पड़े, मानो वज्र से दग्ध साल-वृक्ष वन में गिरा हो।

रावण ने हँसते हुए कहा, “इक्ष्वाकु-वंश के राजन, मुझसे भिड़कर आपने क्या पाया? तीनों लोकों में कोई नहीं जो मुझसे युद्ध कर सके। भोगों में लिप्त रहकर आपने मेरे बल की चर्चा नहीं सुनी होगी।” मरते हुए राजा ने उत्तर दिया, “मैं आपसे पराजित नहीं हुआ हूँ, हे आत्म-प्रशंसा करनेवाले राक्षस; मैं तो काल से ही नष्ट हुआ हूँ, और आप उसके निमित्तमात्र हैं। प्राण जाते समय मैं क्या कर सकता हूँ? मैं युद्ध से विमुख नहीं हुआ, लड़ते हुए ही मारा गया हूँ।”

“आपने इक्ष्वाकु-कुल का अपमान किया है, अतः हम शाप देते हैं,” अनरण्य बोले। “यदि हमने दान दिया हो, हवन किया हो, तप किया हो और प्रजा की भली-भाँति रक्षा की हो, तो हमारा वचन सत्य हो। इसी इक्ष्वाकु-कुल में दशरथ के पुत्र राम नाम से एक महात्मा उत्पन्न होंगे; वही आपके प्राण हरेंगे।” यह शाप उच्चारित होते ही देवों की दुन्दुभि गरजी और आकाश से पुष्प-वृष्टि हुई। राजा अनरण्य स्वर्ग को सिधार गए, और राक्षस वहाँ से चल पड़ा।

समझने की कुंजी (नाम): अनरण्य राम के पूर्वज, इक्ष्वाकु-कुल के राजा हैं। यह शाप उत्तरकाण्ड का वह बीज है जो स्वयं राम के हाथों रावण-वध की भविष्यवाणी करता है। वाल्मीकि यहाँ बार-बार दिखाते हैं कि रावण का अन्त मनुष्य के हाथों होना ही उसके वरदान की सीमा थी।

सार: मरुत्त के बाद रावण पृथ्वी के राजाओं को ललकारता फिरा। अयोध्या के राजा अनरण्य ने अकेले लड़कर वीरगति पाई, और मरते-मरते यह शाप दे गए कि दशरथ-पुत्र राम उसके प्राण हरेंगे, जो आगे रावण के अन्त का बीज बना।

नारद की चेतावनी और यम की ओर प्रस्थान

मर्त्यलोक के मनुष्यों को त्रास देता हुआ रावण एक दिन मेघों के बीच आकाश में देवर्षि नारद से मिला। दशग्रीव ने उन्हें प्रणाम किया, कुशल पूछी, और आगमन का कारण जानना चाहा। पुष्पक में बैठे रावण से, मेघ की पीठ पर सवार अपरिमित तेजवाले नारद बोले, “हे विश्रवा के पुत्र, हे सौम्य, रुकिए। हम आपके पराक्रमों से प्रसन्न हैं। जैसे विष्णु ने दैत्यों का संहार किया, वैसे ही आपने गन्धर्वों और नागों को परास्त किया, और इससे हम अत्यन्त सन्तुष्ट हैं।

“पर हे तात, एक बात कहते हैं, सुनिए। आप, जिन्हें देव भी नहीं मार सकते, यह मर्त्यलोक क्यों नष्ट कर रहे हैं? यह लोक तो वैसे ही मृत्यु के वश में पड़ा हुआ, मानो मरा ही हुआ है। देव-दानव-दैत्य, यक्ष-गन्धर्व-राक्षस तक जिसे न मार सकें, वह मानव-लोक आपके योग्य ही नहीं। जो प्राणी सैकड़ों रोगों और बुढ़ापे से ग्रस्त, सुख-दुख से मोहित हैं, उन्हें मारकर क्या मिलेगा? यह लोक तो आपने जीत ही लिया, इसमें सन्देह नहीं।

“सब प्राणियों को अन्ततः यमसदन जाना ही है। तो हे पुलस्त्य के वंशज, हे परपुरंजय (शत्रुओं की नगरियाँ जीतनेवाले), यम को ही जीत लीजिए। उसे जीत लिया तो सब जीत लिया, इसमें सन्देह नहीं।” यह सुनकर लंकेश हँसते हुए, नारद को प्रणाम करके बोले, “हे महर्षि, जो देव-गन्धर्व के विहार और समर के प्रेमी हैं, हम तो विजय हेतु रसातल जाने को उद्यत थे, फिर तीनों लोक जीतकर, नागों और देवों को वश में करके, अमृत के लिए समुद्र मथने को।”

नारद ने पूछा, “तो आप दूसरे मार्ग से कहाँ जा रहे हैं? यह दुर्गम मार्ग तो यम की नगरी को जाता है।” शरद-मेघ-सी गर्जना के साथ हँसकर रावण बोले, “यह तो हुआ ही समझिए। हे ब्राह्मण, यम का काम तमाम करने को ठान चुके हैं, इसी से दक्षिण दिशा को, जहाँ सूर्यपुत्र यम का निवास है, चले हैं। क्रोध में प्रतिज्ञा की है कि चारों लोकपालों को जीतेंगे। पितृराज की नगरी की ओर प्रस्थान कर चुके हैं; प्राणियों के क्लेश के कर्ता को मृत्यु से जोड़ देंगे।” यह कहकर, मुनि को प्रणाम करके, मन्त्रियों सहित रावण दक्षिण को चल पड़े।

नारद कुछ देर ध्यानमग्न होकर, धूमरहित अग्नि-से तेजस्वी, सोचने लगे: काल को रावण कैसे जीतेगा, जिससे चराचर तीनों लोक और इन्द्र तक धर्मानुसार आयु क्षीण होने पर डरते हैं? जो द्वितीय अग्नि-सा है, जो सबके दान और कर्म जानता है, जिसके तेज से समस्त प्राणी चेतना और गति पाते हैं, उसे रावण स्वयं कैसे आ पकड़ेगा? और यदि यम को वश में कर भी ले, तो आगे कौन-सी नई व्यवस्था बनाएगा? कौतूहल से भरकर नारद ने स्वयं यमसदन जाने का निश्चय किया, ताकि इन दोनों, यम और राक्षस, का युद्ध देख सकें।

समझने की कुंजी (अवधारणा): नारद यहाँ केवल चुगलखोर नहीं, अपितु घटनाओं को गति देनेवाली प्रेरक-शक्ति हैं। वे रावण को यम की ओर भेजकर एक असम्भव-सा प्रश्न उठाते हैं: क्या कोई जीव काल को ही जीत सकता है? यही प्रश्न आगे के सर्गों की धुरी है।

सार: नारद ने रावण को समझाया कि मर्त्यलोक तो काल के वश में पहले ही है, अतः यम को ही जीते। रावण क्रोध में दक्षिण दिशा को, यमसदन की ओर चल पड़ा, और कौतूहलवश नारद भी यम के युद्ध को देखने वहाँ पहुँच गए।

यमलोक में नरक-दर्शन और यम की सेना का संहार

नारद शीघ्रगति से यम के सदन को पहुँचे, ताकि घटना ज्यों-की-त्यों कह सकें। वहाँ उन्होंने देखा कि यम सर्वसाक्षी अग्नि को सम्मुख रखे, प्रत्येक प्राणी को उसके कर्मानुसार न्याय दे रहे हैं। नारद को आया देख यम ने धर्म-विधि से अर्घ्य देकर, उन्हें सुख से बैठाकर कुशल पूछी। नारद बोले, “हे देवर्षि-पूजित यम, सब कुशल तो है? धर्म तो नष्ट नहीं हो रहा? आपके आने का प्रयोजन क्या?… सुनिए, अपना प्रयोजन कहते हैं, और आप उपाय कीजिए। दशग्रीव नाम का निशाचर पराक्रम से आपको वश में करने आ रहा है। इसी कारण हम शीघ्र आए हैं; अब आप, जो दण्ड को शस्त्र बनाए हैं, क्या करेंगे?”

इसी बीच उन्होंने दूर से रावण का पुष्पक उगते सूर्य-सा चमकता हुआ आता देखा। पुष्पक की प्रभा से उस दिशा का अन्धकार मिटाकर महाबली रावण निकट आ पहुँचे। तब दशग्रीव ने इधर-उधर देखा: प्राणी अपने पुण्य-पाप भोग रहे थे। यम के अनुचर भयंकर, घोर रूपवाले पुरुष प्राणियों को मार-कूट रहे थे, और वे तीव्र चीत्कार कर रहे थे।

मार्ग में रावण ने सैकड़ों-हजारों प्राणी देखे: कुछ कीड़ों और भयानक कुत्तों से खाए जाते, कुछ रक्त बहानेवाली वैतरणी नदी बार-बार पार कराए जाते, कुछ तपी हुई बालू पर चलते, कुछ असिपत्र-वन में तलवार-से पत्तों से चीरे जाते, कुछ खारे जल और छुरे की धार पर चलाए जाते, कुछ प्यास-भूख से जल माँगते, और कुछ शव-से दुर्बल, मलिन, बाल बिखेरे इधर-उधर भागते। साथ ही उसने पुण्यात्माओं को भी देखा जो अपने सत्कर्मों के फल से उत्तम भवनों में गीत-वाद्य के बीच आनन्द मना रहे थे: गो-दानियों को दूध पीते, अन्न-दानियों को अन्न खाते, गृह-दानियों को घरों में रहते, और स्वर्ण-मणि-मुक्ता से सजे धर्मात्मा युवतियों के संग शोभायमान।

तब बलशाली रावण ने अपने पराक्रम से उन सब प्राणियों को बलपूर्वक मुक्त कर दिया जो अपने पापकर्मों से पीड़ित थे। मुक्त किए हुए प्रेत कुछ क्षण अप्रत्याशित सुख पा गए। यह देख यम के प्रेतगोप क्रुद्ध होकर राक्षसराज पर टूट पड़े; चारों दिशाओं से हलहला शब्द उठा। प्रास, परिघ, शूल, मूसल, शक्ति और तोमर लिए सैकड़ों-हजारों वीरों ने पुष्पक के आसन, प्रासाद, वेदिकाएँ और तोरण भौंरों-से तोड़ डाले, पर ब्रह्मा की शक्ति से वह देवनिर्मित विमान अक्षय बना रहा।

रावण के मन्त्री, सर्वांग रक्त से लथपथ, घोर युद्ध करने लगे। यम के योद्धा मन्त्रियों को छोड़कर शूल-वर्षा से स्वयं रावण पर टूट पड़े; प्रहारों से जर्जर, रक्त-रंजित रावण पुष्पक में खिले अशोक-सा दिखने लगा। तब उसने मुसल, शिला, वृक्ष, शक्ति, तोमर और बाण अस्त्र-बल से बरसाए जो यम की धरती पर खड़ी सेना पर गिरे; पर उन्होंने सब शस्त्र छिन्न कर अस्त्र भी हर लिया और उस अकेले राक्षस पर लाखों होकर प्रहार किया, भिन्दिपाल और शूलों से उसका दम घोंटने लगे। कवच कटने और रक्त-धाराओं में नहाने पर रावण पुष्पक छोड़कर भूमि पर खड़ा हो गया। थोड़ी देर में चेत पाकर, धनुष-बाण लिए, काल-सा क्रुद्ध होकर उसने पाशुपत-अस्त्र चढ़ाया और “ठहरो, ठहरो” कहकर, जैसे शंकर ने त्रिपुर पर, वैसे ही उसे छोड़ा। धूम और ज्वालाओं से घिरा वह बाण ग्रीष्म के दावानल-सा रणभूमि में दौड़ा; यम की सेना भस्म होकर महेन्द्र की ध्वजाओं-सी गिर पड़ी। तब भीमपराक्रमी रावण ने मन्त्रियों सहित ऐसी गर्जना की मानो धरती काँप उठी हो।

समझने की कुंजी (स्थान): वैतरणी रक्तमयी नरक-नदी है, और असिपत्र-वन वह कल्पना-स्थल है जहाँ पत्ते तलवार-से चीरते हैं। वाल्मीकि का यह नरक-वर्णन परवर्ती पुराण-नरकों का आदि-रूप है; ध्यान दीजिए कि वही यमलोक पुण्यात्माओं के लिए सुख-भवनों से भी भरा है, अर्थात कर्म ही गति निश्चित करता है।

सार: यमलोक में रावण ने नरक की यातनाएँ और स्वर्ग-सुख दोनों देखे, और पापियों को बलपूर्वक मुक्त कर दिया। यम के प्रेतगोपों से घोर युद्ध हुआ; रक्त-रंजित होकर भी रावण ने पाशुपत-अस्त्र से यम की सेना भस्म कर डाली।

यम और रावण का द्वन्द्व: ब्रह्मा कालदण्ड रोकते हैं

रावण की महागर्जना सुनकर सूर्यपुत्र यम ने समझ लिया कि शत्रु जीत गया और अपनी सेना नष्ट हो गई। क्रोध से रक्तनयन होकर उन्होंने सारथि से कहा, “मेरा रथ लाया जाए।” सारथि दिव्य महारथ ले आया; महातेजस्वी यम उस पर चढ़े। हाथ में प्रास और मुद्गर लिए मृत्यु उनके आगे खड़ी हुई, जिससे ये अव्यय तीनों लोक संक्षिप्त होते हैं। यम के पार्श्व में मूर्तिमान कालदण्ड अग्नि-सा जाज्वल्यमान खड़ा था, जिसके चारों ओर बिना छिद्र के कालपाश और अग्नि-स्पर्श-सा मुद्गर मूर्त रूप में स्थित थे।

सर्वलोक-भयकारी काल को क्रुद्ध देखकर तीनों लोक क्षुब्ध हुए और देवता काँप उठे। सारथि ने इन्द्र-अश्वों-से तेज घोड़े हाँके और भयानक नाद से रथ वहाँ पहुँचा जहाँ युद्ध हो रहा था। उस विकट, मृत्यु-सहित रथ को देख रावण के मन्त्री सहसा भाग खड़े हुए; भय से संज्ञा खोकर “हम यहाँ लड़ने में समर्थ नहीं” कहते हुए दिशाओं में बिखर गए। पर ऐसा रथ देखकर भी दशग्रीव न तो क्षुब्ध हुआ, न उसके मन में भय आया।

यम ने रावण के निकट आकर शक्ति और तोमर फेंके और उसके मर्म छेद डाले; पर स्वस्थ रावण ने यम के रथ पर बाण-वर्षा की, मानो मेघ जल बरसाता हो। सैकड़ों महाशक्तियाँ छाती पर गिरने से शल्य-पीड़ित होकर वह कुछ समय हाथ न चला सका। इस प्रकार नाना शस्त्रों से सात रात तक निरन्तर युद्ध चला, और अन्ततः यम ने शत्रु को विसंज्ञ और विमुख कर दिया। दोनों योद्धा, जय के अभिलाषी और रण से न हटनेवाले, घोर युद्ध करते रहे। तब प्रजापति को आगे रखकर देव, गन्धर्व, सिद्ध और परम ऋषि उस रणक्षेत्र में आ जुटे।

क्रुद्ध यम के मुख से ज्वालाओं और धूम-सहित क्रोधाग्नि निकलने लगी। देव-दानवों के समक्ष यह अद्भुत दृश्य देखकर मृत्यु और काल हर्षित होकर युद्ध को उत्सुक हुए। तब अति-क्रुद्ध मृत्यु ने यम से कहा, “मुझे छोड़ दीजिए, जब तक मैं इस पापी राक्षस का अन्त कर दूँ। आज यह राक्षस जीवित न बचेगा; यही प्रकृति का नियम है। हिरण्यकशिपु, नमुचि, शम्बर, निसन्दि, धूमकेतु, बलि, शम्भु, वृत्र, बाण, राजर्षि, गन्धर्व, नाग, ऋषि, दैत्य, यक्ष, अप्सराएँ, यहाँ तक कि समुद्र-पर्वत-नदी-वृक्ष-सहित यह पृथ्वी, हे महाराज, युगान्त में मैंने ही नष्ट की। ये और अनेक दुर्जय वीर मेरे देखते ही नष्ट हुए, फिर यह निशाचर क्या? मुझे छोड़िए, हे धर्मज्ञ, जिसे मैं देख लूँ वह क्षणभर भी न जिए।”

यम बोले, “आप ठहरिए, इसे हम ही मारेंगे।” क्रोध से रक्तनयन यम ने वह अमोघ कालदण्ड हाथ में उठाया, जिसके दर्शनमात्र से प्राणियों के प्राण निकल जाते, फिर स्पर्श या प्रहार की तो बात ही क्या। ज्वालाओं से घिरा वह महाअस्त्र राक्षस को भस्म करने-सा स्फुरित हुआ; भयभीत राक्षस भागे, और दण्ड उठाए यम को देख देव भी क्षुब्ध हुए।

जब यम दण्ड से रावण पर प्रहार करने को हुए, तब स्वयं पितामह ब्रह्मा प्रकट होकर बोले, “हे महाबाहु वैवस्वत, हे अमित-पराक्रम सूर्यपुत्र, इस निशाचर को इस दण्ड से न मारिए। हमने इसे वर दिया है, अतः हमारा वचन मिथ्या न हो। देव हो या मनुष्य, जो हमें मिथ्यावादी सिद्ध करे, उससे तीनों लोक मिथ्या हो जाएँ। क्रोध में छोड़ा गया यह घोर अस्त्र प्रिय-अप्रिय में भेद किए बिना समस्त प्रजा का संहार कर देगा। यह कालदण्ड सब प्राणियों के लिए अमोघ है, इसे हमने पूर्वकाल में मृत्यु-सहित रचा था। यदि यह रावण के मस्तक पर पड़ा और वह न मरा, अथवा मर गया, तो दोनों ही दशाओं में हमारा वर मिथ्या होगा। अतः इसे लंकेश के मस्तक से लौटा लीजिए, और यदि लोकों का हित चाहते हैं तो हमें सत्य कीजिए।”

यह सुनकर धर्मात्मा यम बोले, “दण्ड लौटा लिया, क्योंकि आप ही हमारे स्वामी हैं। जब इसे आपके वर ने सुरक्षित कर रखा है तो हम रणभूमि में रहकर क्या करें? इस राक्षस के सामने से हम अन्तर्धान होते हैं।” यह कहकर रथ-अश्व-सहित यम वहीं अन्तर्धान हो गए। दशग्रीव ने यम को जीतकर, अपना नाम उद्घोषित कर, पुनः पुष्पक पर चढ़कर यमसदन से प्रस्थान किया। ब्रह्मा को आगे रखे देवों और महामुनि नारद के साथ यम हर्षित होकर स्वर्ग को लौट गए।

एक उप-कथा: ध्यान दीजिए, रावण यम को नहीं जीतता; जीतता वह ब्रह्मा के वरदान के बल पर है। यम का दण्ड लौटाना रावण की वीरता नहीं, अपितु ब्रह्मा की प्रतिष्ठा की रक्षा है। वाल्मीकि सूक्ष्मता से दिखाते हैं कि रावण की हर “विजय” किसी न किसी वरदान या व्यवस्था की छाया में ही है, स्वयं उसके बल से नहीं।

सार: यम स्वयं कालदण्ड लिए मृत्यु-सहित रण में उतरे, और सात दिन के युद्ध में रावण को विसंज्ञ कर दिया। जब यम वध को उद्यत हुए तो ब्रह्मा ने अपना वरदान बचाने हेतु दण्ड रुकवाया, और यम अन्तर्धान हो गए; रावण इसे अपनी विजय मानकर लौट चला।

रसातल में निवातकवचों से मैत्री और वरुण-पुत्रों पर विजय

यम को जीतकर रणश्लाघी रावण ने अपने सहयोगियों को देखा। रक्त से लथपथ, प्रहारों से जर्जर रावण को देख राक्षस विस्मित हुए। मारीच आदि मन्त्रियों ने उसकी विजय पर बधाई दी और सान्त्वना पाकर सब पुष्पक पर चढ़े। फिर रसातल पहुँचने को राक्षस ने वह समुद्र-निधि में प्रवेश किया जो दैत्यों-नागों से भरा और वरुण से सुरक्षित था। भोगवती नगरी में, जो वासुकि से पालित थी, नागों को वश में करके वह हर्षित होकर मणिमयी नगरी को गया।

वहाँ निवातकवच नाम के दैत्य रहते थे, जिन्होंने ब्रह्मा से वर पाए थे। रावण ने उन्हें युद्ध को ललकारा। वे महाबली, युद्ध में उन्मत्त दैत्य हर्षित होकर भिड़े। शूल, त्रिशूल, कुलिश, पट्टिश, असि और परशु से राक्षस और दानव एक-दूसरे को बेधने लगे। एक वर्ष से अधिक युद्ध चला, पर किसी की न जय हुई, न क्षय। तब त्रैलोक्य-गति, अव्यय देव ब्रह्मा श्रेष्ठ विमान पर शीघ्र वहाँ आए। निवातकवचों का युद्ध रोककर वृद्ध पितामह ने स्पष्ट कहा, “इस रावण को देव-असुर मिलकर भी युद्ध में नहीं जीत सकते, और न देव-दानव सहित आपको कोई समाप्त कर सकता है। अतः इस राक्षस से आपकी मैत्री हमें रुचती है; मित्रों में सब अर्थ अविभक्त रहते हैं।”

तब रावण ने अग्नि को साक्षी बनाकर निवातकवचों से मैत्री की और प्रसन्न हुआ। यथान्याय आदर पाकर वह वहाँ एक वर्ष रहा और अपने नगर-सा सुख भोगा। वहाँ उसने सौ माया-विद्याएँ सीखीं, फिर वरुण की नगरी खोजता हुआ रसातल में घूमा। फिर अश्मनगर पहुँचकर, जहाँ बलमत्त कालकेय रहते थे, उन्हें मारकर रावण ने अपने बहनोई विद्युज्जिह्व का, शूर्पणखा के पति का, तलवार से वध कर डाला, जो उसे समर में जीभ से चाटने को बढ़ा था; उसे जीतकर एक मुहूर्त में चार सौ दैत्य संहार दिए।

तब उसने श्वेत-मेघ-सा, कैलास-सा चमकता वरुण का दिव्य आलय देखा। वहाँ उसने दूध बहानेवाली सुरभि गौ को देखा, जो श्रेष्ठ गोवृषेन्द्र की माता है, जिसके दूध के प्रवाह से क्षीरोद-सागर बनता है, जिससे शीतकिरण चन्द्र उत्पन्न होते हैं, और जिस पर फेन-पान करनेवाले परम ऋषि निर्भर हैं, जहाँ देवों का अमृत और पितरों की स्वधा उत्पन्न होती है, जिसे लोक में सुरभि नाम से जानते हैं। उसकी प्रदक्षिणा करके रावण नाना सेनाओं से रक्षित वरुण के घोर क्षेत्र में प्रविष्ट हुआ।

वरुण के सेनापतियों को मारकर रावण ने योद्धाओं से कहा, “अपने स्वामी को शीघ्र सूचित कीजिए: युद्धार्थी रावण द्वार पर आया है; उसे युद्ध दीजिए, अथवा हाथ जोड़कर कहिए, ‘मैं पराजित हूँ।’” इसी बीच महात्मा वरुण के पुत्र-पौत्र और उनके दो सेनापति गौ और पुष्कर क्रुद्ध होकर निकले। कामगामी, उगते सूर्य-से रथों पर सवार, गुणवान वे सेनाओं सहित रणक्षेत्र में आए। फिर वरुण-पुत्रों और बुद्धिमान रावण के बीच रोमहर्षक युद्ध हुआ। दशग्रीव के महावीर्य मन्त्रियों ने वरुण की सारी सेना क्षणभर में गिरा दी। शर-जाल से पीड़ित वरुण-पुत्र रण से लौटे, पर पुष्पक में बैठे रावण को देख पुनः शीघ्र रथों पर आकाश में चढ़ आए; तब देव-दानव-सा तुमुल आकाश-युद्ध हुआ।

उन्होंने अग्नि-से बाणों से रावण को विमुख कर हर्ष-नाद किए। तब क्रुद्ध महोदर ने राजा को धर्षित देख, मृत्यु-भय त्यागकर युद्ध खोजा; गदा से वरुण-पुत्रों के पवन-से घोड़ों को धरती पर गिरा दिया, योद्धा मारे, और रथहीन देख महानाद किया। वरुण-पुत्र वीरतावश आकाश में टिक गए, पुनः धनुष चढ़ाकर, महोदर को बेधकर, सब मिलकर रावण को घेरने लगे; क्रोध में मेघों-से उस पर अधमर्षक बाण बरसाए। तब कालाग्नि-से मूर्छित रावण ने उनके मर्मों पर घोर शर-वर्षा की; सब विमुख होकर भूमि पर गिरे, और अपने पुरुषों द्वारा शीघ्र घरों में पहुँचा दिए गए।

रावण ने कहा, “हमारी उपस्थिति वरुण को बताई जाए।” तब वरुण का मन्त्री प्रहास बोला, “महाराज वरुण तो गन्धर्वों का गान सुनने ब्रह्मलोक गए हैं। हे वीर, जब राजा बाहर हैं तो व्यर्थ क्यों श्रम करते हैं? जो वीर पुत्र उपस्थित थे, वे आपसे पराजित हो ही चुके।” यह सुनकर राक्षसराज ने अपना नाम उद्घोषित कर, हर्ष-नाद छोड़ते हुए वरुणालय से निकास किया। जिस मार्ग से आया था उसी से लौटकर लंका की ओर आकाशमार्ग से चल दिया।

समझने की कुंजी (नाम): सुरभि “कामधेनु” का यहाँ का रूप है; उसके दूध से क्षीरसागर और फिर चन्द्र की उत्पत्ति बताकर वाल्मीकि एक प्राचीन सृष्टि-परम्परा झलकाते हैं। विद्युज्जिह्व शूर्पणखा का पति है, जिसका वध रावण के हाथों होता है, यही अगले सर्ग के शोक का कारण बनता है।

सार: रसातल में रावण ने निवातकवचों से ब्रह्मा की प्रेरणा पर अग्नि-साक्षी मैत्री की और सौ मायाएँ सीखीं। कालकेयों और अपने बहनोई विद्युज्जिह्व का वध किया, फिर वरुण-पुत्रों को परास्त कर, स्वयं वरुण के अनुपस्थित होने पर लंका लौट चला।

अपहृत स्त्रियों का शाप और शूर्पणखा को सान्त्वना

हर्षित लौटते हुए दुरात्मा रावण ने मार्ग में राजाओं, ऋषियों, देवों और दानवों की कुमारियों का हरण किया। जो भी सुन्दरी कन्या या स्त्री दिखती, उसके बन्धुजनों को मारकर वह उसे विमान में बन्द कर लेता। इस प्रकार नाग, राक्षस, असुर, मानव, यक्ष और दानव-कन्याएँ उसने विमान में चढ़ाईं। शोक और भय से वे सब एक साथ आँसू बहाने लगीं, जो अग्नि-कणों-से जलते थे।

लम्बी अलकों, पूर्णचन्द्र-से मुखों, सुन्दर अंगों, स्वर्ण-सी कान्तिवाली वे सुन्दरियाँ शोक-भय से व्याकुल थीं; उनके निःश्वासों से पुष्पक मानो आहुति-अग्नि-सा प्रज्वलित दिखता था। रावण के वश में पड़ीं वे सिंह के पंजे में फँसी मृगियों-सी थीं। कोई सोचती, “क्या यह मुझे खा जाएगा?”, कोई “क्या यह मुझे मार डालेगा?”। माता, पिता, पति और भाइयों को स्मरण करके वे साथ-साथ विलाप करतीं, “मेरे बिना मेरा पुत्र कैसे रहेगा? मेरी माता, मेरा भाई शोक-सागर में डूबे; उस पति के बिना मैं क्या करूँगी? हे मृत्यु, हम आपको प्रसन्न करती हैं, हमें ले चलिए। पूर्वजन्म में हमने ऐसा कौन-सा दुष्कर्म किया था कि सब शोक-सागर में डूबीं? अब अपने दुख का अन्त नहीं दीखता।

“धिक्कार है इस मानव-लोक को; इससे विला कोई नहीं। हमारे दुर्बल पतियों को इस बलवान रावण ने वैसे ही नष्ट किया जैसे उदय होता सूर्य नक्षत्रों को। अहो, यह अति-बलवान राक्षस वध के उपायों में आनन्द लेता है। दुर्वृत्ति में रहकर भी अपने से घृणा नहीं करता; इस दुरात्मा का पराक्रम सर्वथा इसके अनुरूप ही है। पर-स्त्रियों को छूना तो इसके योग्य नहीं। चूँकि यह राक्षसाधम पर-स्त्रियों में रमता है, अतः यह दुर्मति स्त्री-निमित्त से ही वध को प्राप्त होगा।” जब सती, श्रेष्ठ नारियों ने ऐसा शाप दिया, तब आकाश में दुन्दुभि बजी, पुष्प बरसे; पतिव्रता साध्वियों के शाप से रावण मानो तेजहीन और विमन-सा हो गया। उनका विलाप सुनता हुआ, निशाचरों से पूजित रावण लंका में गहरे प्रविष्ट हुआ।

इसी बीच कामरूपिणी घोर राक्षसी, रावण की बहन, सहसा आकर भूमि पर गिर पड़ी। उसे उठाकर रावण ने सान्त्वना देते हुए कहा, “हे भद्रे, यह क्या? जो कहना है शीघ्र कहिए।” अश्रु और क्रोध से रक्तनेत्र होकर वह बोली, “हे राजन, आप बलवान होकर बलपूर्वक मुझे विधवा कर गए। चौदह हजार कालकेय दैत्य आपने पराक्रम से रण में मारे; उनमें मेरा महाबली पति, जो मुझे प्राणों से प्रिय था, भी आपने मारा, हे तात, उसी शत्रु ने जो भाई के नाते का था। आप जैसे बन्धु से ही मैं नष्ट हो गई।

“हे राजन, आपका दिया वैधव्य-शब्द मैं भोगूँगी। क्या समर में भी जामाता आपके रक्षा-योग्य नहीं था? उसे आपने स्वयं मारा, और लज्जित भी नहीं होते।” रोती-कूकती बहन को सान्त्वना देते हुए रावण ने साम-पूर्वक कहा, “बस कीजिए, वत्से, मत रोइए; आपको किसी से भयभीत नहीं होना। दान, मान और प्रसाद से मैं आपको यत्नपूर्वक सन्तुष्ट करूँगा। युद्ध में उन्मत्त, जय का अभिलाषी मैं अपने-पराए का भेद न कर सका; युद्धदुर्मद होकर जामाता को न पहचान सका, इसी से आपका पति मारा गया। पर इस समय जो हित होगा, वह करूँगा।

“भाई के ऐश्वर्य से युक्त खर के पास रहिए। आपका यह भाई चौदह हजार राक्षसों को भेजने और भरण करने में समर्थ होगा; आपकी मौसी का पुत्र खर सदा आपकी आज्ञा मानेगा। यह वीर शीघ्र दण्डकवन की रक्षा को जाए। महाबली दूषण उसका सेनापति होगा; वहाँ रहकर खर सदा आपकी बात मानेगा। वह कामरूपी राक्षसों का स्वामी होगा।” यह कहकर दशग्रीव ने चौदह हजार वीर राक्षस खर की सेना बनने का आदेश दिया। उन घोरदर्शन राक्षसों से घिरा निर्भय खर शीघ्र दण्डकवन पहुँचा और वहाँ निष्कण्टक राज्य किया। शूर्पणखा भी उसी दण्डकवन में रहने लगी।

समझने की कुंजी (अवधारणा): अपहृत सती स्त्रियों का शाप “स्त्री-निमित्त से वध” स्वयं सीता-हरण और रावण-वध की पूर्वसूचना है। साथ ही खर-दूषण का दण्डकवन में स्थापित होना अरण्यकाण्ड की भूमिका रचता है, अर्थात उत्तरकाण्ड की ये कथाएँ रामकथा की जड़ें खोलती हैं।

सार: लौटते रावण ने अनेक कन्याएँ हर लीं; अपहृत सती स्त्रियों ने शाप दिया कि वह स्त्री-निमित्त से ही मारा जाएगा। अपने हाथों विधवा हुई बहन शूर्पणखा को सान्त्वना देकर रावण ने खर को चौदह हजार राक्षसों सहित दण्डकवन भेजा।

मेघनाद की सिद्धि, विभीषण की चेतावनी, और मधु से सन्धि

खर को सेना सौंपकर और बहन को सान्त्वना देकर रावण स्वस्थ और हर्षित हुआ। फिर लंका के उत्तम उपवन निकुम्भिला में अनुचरों सहित प्रविष्ट हुआ। वहाँ सैकड़ों यूपों से युक्त, सौम्य चैत्य से शोभित, श्री से प्रज्वलित-सा यज्ञ-स्थल देखा; और कृष्णमृगचर्म धारण किए, शिखा-ध्वज और कमण्डलु लिए, भयानक रूपवाले अपने पुत्र मेघनाद को देखा। आलिंगन कर रावण ने पूछा, “वत्स, यह क्या कर रहे हैं? सच कहिए।”

तब यज्ञ की सिद्धि बनाए रखने को (कहीं मौन-व्रत भंग न हो) द्विजश्रेष्ठ महातपस्वी उशना (शुक्राचार्य) बोले, “हे राजन, सब बताते हैं। आपके पुत्र ने सात विस्तृत यज्ञ किए हैं: अग्निष्टोम, अश्वमेध, बहुसुवर्णक, राजसूय, गोमेध और वैष्णव। मनुष्यों के लिए दुर्लभ माहेश्वर-यज्ञ आरम्भ होने पर आपके पुत्र ने यहीं साक्षात पशुपति शिव से वर पाए: कामग दिव्य रथ जो आकाश में चलता है, और तामसी नाम की माया जिससे शत्रु-दल में अन्धकार छा जाता और जिसका मार्ग देव-असुर भी नहीं जान पाते। साथ ही अक्षय बाणों के दो तरकश, दुर्जय धनुष, और शत्रुओं का विध्वंस करनेवाला बलवान अस्त्र। ये सब वर पाकर आपका पुत्र यज्ञ-समाप्ति पर आपके दर्शन को उत्सुक है, और मैं भी।”

तब दशग्रीव बोला, “यह अच्छा नहीं हुआ; इन्द्र-प्रमुख मेरे शत्रु ही द्रव्यों से पूजे गए। पर जो हुआ, वह भला ही हुआ; अब आइए, सौम्य, अपने भवन को लौटें।” फिर पुत्र और विभीषण सहित रावण ने अश्रुगद्गद उन सब स्त्रियों को पुष्पक से उतारा जो देव-दानव-राक्षस-स्त्रियों में रत्न-सी थीं। रावण का उन पर अभिप्राय जानकर धर्मात्मा विभीषण बोला, “ऐसे आचरणों से, जो यश और कुल का नाश करते हैं, आप जानबूझकर प्राणियों के प्रति अपराध करते हैं। पर हे राजन, मधु राक्षस आपको लाँघकर हमारी बहन कुम्भीनसी को हर ले गया।”

रावण ने पूछा, “यह कैसे? यह मधु कौन है?” विभीषण ने कहा, “हमारे मातामह सुमाली के ज्येष्ठ भ्राता माल्यवान, हमारी माता कैकसी के बड़े मामा, वृद्ध-प्रज्ञ निशाचर हैं। उनकी पुत्री की पुत्री कुम्भीनसी, हमारी मौसी अनला की कन्या, धर्मतः हम भाइयों की बहन है। जब आपका पुत्र यज्ञ में लगा था, मैं जल में तप करता था, और कुम्भकर्ण निद्रा भोग रहा था, तब बलवान मधु राक्षस हमारे सम्मानित मन्त्रियों को मारकर उसे हर ले गया। आपके अन्तःपुर में सुरक्षित होने पर भी उसे धर्षित करके हर लिया गया। सुनकर भी हमने सहन कर लिया, उसे मारा नहीं, क्योंकि कन्या तो भाइयों द्वारा पति को दी ही जानी थी। यही आपके पाप-कर्म और दुर्मति का फल इसी जन्म में प्राप्त हुआ है।”

विभीषण का वचन सुनकर रावण क्रोध से रक्तनेत्र, तप्त-जल-से क्षुब्ध समुद्र-सा होकर बोला, “मेरा रथ शीघ्र सजाया जाए; हमारे शूर तैयार हों; मेरा भाई कुम्भकर्ण और मुख्य निशाचर वाहनों पर चढ़ें। आज समर में मधु को, जो रावण से भी निर्भय है, मारकर मित्रों सहित युद्ध की इच्छा से सुरलोक जाऊँगा।” चार हजार अग्रगण्य अक्षौहिणी राक्षस निकल पड़े; इन्द्रजित सेना के आगे, रावण मध्य में, कुम्भकर्ण पीछे चला; धर्मात्मा विभीषण लंका में रहकर धर्माचरण करता रहा। शेष महाभाग खर, ऊँट, घोड़े, शिशुमार और महानागों पर सवार होकर मधुपुर की ओर चले, और देव-वैरी दैत्य सैकड़ों होकर पीछे लगे।

मधुपुर पहुँचकर रावण ने बहन को तो देखा, पर मधु को नहीं पाया। भयभीत कुम्भीनसी हाथ जोड़े, सिर से चरण छूकर गिर पड़ी। “मत डरिए” कहकर रावण ने उसे उठाया, “आपके लिए क्या करूँ?” वह बोली, “हे महाभुज, यदि प्रसन्न हैं तो आज मेरे पति को न मारिए, हे मानद। कुलस्त्रियों के लिए पति की मृत्यु-सा भय कुछ नहीं। सब भयों में वैधव्य महान दुख है। सत्यवादी होइए, राजेन्द्र; मुझ याचना करती पर दृष्टि कीजिए।”

हर्षित रावण बोला, “आपने स्वयं ‘मत डरिए’ सुना है। प्रिय और सेवा करनेवाले के अर्थ की योजना उचित ही है। बताइए, आपका पति कहाँ है? उसके साथ विजय हेतु सुरलोक जाऊँगा।” तब सोते निशाचर को जगाकर हर्षित कुम्भीनसी ने कहा, “यह मेरा महाबली भाई दशग्रीव आया है; सुरलोक जीतने को आपका साथ चाहता है। अतः बन्धुओं सहित सहायता को चलिए।” मधु ने “तथास्तु” कहा, उठकर यथान्याय रावण की पूजा की। आदर पाकर एक रात ठहरकर रावण प्रस्थान को तैयार हुआ। फिर विश्रवा-पुत्र कुबेर के आलय कैलास पहुँचकर महेन्द्र-सा रावण ने वहाँ सेना का पड़ाव डाला।

एक उप-कथा: मेघनाद को जो “इन्द्रजित” नाम आगे मिलेगा, उसका मूल इसी निकुम्भिला-यज्ञ में है; और निकुम्भिला-यज्ञ ही वह स्थान है जहाँ युद्धकाण्ड में लक्ष्मण उसका वध करते हैं। माहेश्वर-यज्ञ से पाया कामग रथ ही उसका वह कवच है जिसके भीतर वह अवध्य रहता है। यहाँ वाल्मीकि उसकी अमरता की शर्त की नींव रखते हैं।

सार: मेघनाद ने सात यज्ञों और माहेश्वर-यज्ञ से शिव के दिव्य रथ, तामसी माया और अस्त्र पाए। विभीषण ने पर-स्त्री-हरण के दुष्परिणाम बताए और बहन कुम्भीनसी के मधु द्वारा हरण की बात कही; रावण ने कुम्भीनसी की प्रार्थना पर मधु को बख्शा, उसे मित्र बनाकर कैलास पहुँचा।

रम्भा पर बलात्कार और नलकूबर का घातक शाप

सूर्यास्त होने पर महाबली दशग्रीव ने सेना सहित वहीं निवास चुना। निर्मल विशाल चन्द्र उगने पर नाना अस्त्रोंवाली सेना सो गई। शैल-शिखर पर बैठे महावीर्य रावण ने चन्द्र और वृक्षों से उद्भासित पर्वत के सौन्दर्य को निहारा। कर्णिकार, कदम्ब, वकुल, चम्पक, अशोक, पुन्नाग, मन्दार, आम, पाटल, लोध्र, प्रियंगु, अर्जुन, केतक, तगर, नारिकेल, प्रियाल, पनस आदि वृक्षों से वन-प्रदेश दीप्त था; कामार्त, मधुर-कण्ठ किन्नर मन-तुष्टि बढ़ानेवाले गीत गा रहे थे। मदोन्मत्त विद्याधर अपनी संगिनियों सहित क्रीड़ा कर रहे थे; कुबेर के भवन में अप्सरा-समूहों का गान घण्टा-नाद-सा सुनाई देता था। मधु-माधव की गन्धवाले वृक्ष पुष्प बरसाकर पर्वत को सुगन्धित कर रहे थे, और रावण के काम को बढ़ानेवाली सुखद वायु बही।

संगीत, पुष्प-समृद्धि, वायु की शीतलता, पर्वत के सौन्दर्य और चन्द्रोदय से रात आरम्भ होते ही महावीर्य रावण काम के वश में आ गया; बार-बार निःश्वास भरता चन्द्र को देखता रहा। इसी बीच वहाँ दिव्याभरण-भूषिता रम्भा प्रकट हुई, सब अप्सराओं में श्रेष्ठ, पूर्णचन्द्र-से मुखवाली, दिव्य चन्दन-लिप्त, मन्दार-पुष्पों से सजी अलकोंवाली, दिव्य उत्सव की ओर जाती हुई, मन-मोहक नेत्रों और पीन जघन पर मेखला धारण किए, छह ऋतुओं के पुष्पों के आर्द्र आभूषणों और कान्ति से दूसरी श्री-सी शोभायमान, नील-मेघ-से वस्त्र में लिपटी। उसे सेना के बीच से जाती देख रावण ने उठकर, हाथ पकड़कर, लज्जित होती उस पर मुस्कराते हुए कहा, “हे वरारोहे, कहाँ जा रही हैं? किसका काम सिद्ध करने स्वयं चली हैं? किसका सौभाग्य-काल है जो आपको भोगेगा? आपके अधर-रस का, सुधा-अमृत-से, आज कौन तृप्ति पाएगा? स्वर्ण-कलश-से आपके स्तन किसके वक्ष को स्पर्श देंगे, हे भीरु? आपके स्वर्ण-चक्र-से जघन को कौन भोगेगा? मुझसे श्रेष्ठ पुरुष आज कौन है, चाहे इन्द्र हो, विष्णु हो या अश्विनीकुमार? आपका मुझे लाँघकर जाना उचित नहीं।”

“विश्राम कीजिए इस सुन्दर शिला पर, हे पृथुश्रोणि; तीनों लोकों का स्वामी मुझसे अन्य कोई नहीं। तीनों लोकों के स्वामियों का स्वामी और धाता, यह दशानन हाथ जोड़े नम्र होकर आपसे याचना करता है; अतः मुझे स्वीकार कीजिए।” काँपती हुई रम्भा ने हाथ जोड़कर कहा, “प्रसन्न होइए; आप ऐसा कहने के योग्य नहीं, क्योंकि आप मेरे गुरु हैं। धर्मतः मैं आपकी पुत्रवधू हूँ; यह सत्य कहती हूँ। अतः मैं आपके द्वारा अन्यों से भी रक्षणीय हूँ, यदि मुझ पर कोई बलात्कार करे।” रावण ने पूछा, “यदि आप मेरे पुत्र की भार्या हैं तभी तो पुत्रवधू हैं।” रम्भा ने उत्तर दिया, “हाँ, हे राक्षसपुंगव, धर्मतः मैं आपके पुत्र की भार्या हूँ; वह आपके भाई वैश्रवण का पुत्र, प्राणों से प्रिय, तीनों लोकों में नलकूबर नाम से विख्यात है, जो धर्मतः ब्राह्मण और पराक्रम से क्षत्रिय, क्रोध में अग्नि और क्षमा में पृथ्वी-समान है। उसी लोकपाल-पुत्र से मेरा संकेत हुआ है। यह सब शृंगार उसी के लिए किया है; जैसे उसका मन मुझ पर अन्य किसी पर नहीं, वैसे ही मेरा भी मन उसी पर है। उस सत्य के आधार पर, हे राजन, मुझे छोड़ दीजिए। वह धर्मात्मा मेरी प्रतीक्षा में उत्सुक खड़ा है। उसके इस प्रयोजन में विघ्न मत डालिए; मुझे छोड़िए। सत्पुरुषों के मार्ग पर चलिए, हे राक्षसपुंगव। आप मेरे माननीय हैं, और मैं आपकी पालनीय।”

यह सुनकर दशग्रीव विनयी-सा होकर बोला, “आपने जो कहा कि ‘मैं पुत्रवधू हूँ’, वह क्रम तो उन पर लागू है जिनके एक ही पति हो। अप्सराओं का कोई पति नहीं, न देव एक स्त्री से बँधे हैं; देवलोक की यही शाश्वत स्थिति मानी गई है।” यह कहकर, शिला पर लिटाकर, काम-भोग में आसक्त राक्षस ने उसके साथ बलात्कार किया। आलिंगन में उसके पुष्प-आभूषण गिर गए; रम्भा गजेन्द्र की क्रीड़ा से क्षुब्ध नदी-सी व्याकुल हो गई, फिर छोड़ दी गई। बिखरी अलकों, काँपते कर-पल्लवोंवाली वह वायु से झकोरी पुष्प-लता-सी थी। काँपती, लज्जित, भयभीत, हाथ जोड़े वह नलकूबर के चरणों में गिर पड़ी।

उस दशा में देख महात्मा नलकूबर ने पूछा, “हे भद्रे, यह क्या? मेरे चरणों में क्यों गिरीं?” निःश्वास भरती, काँपती, हाथ जोड़े उसने ज्यों-का-त्यों सब कहा, “हे देव, दशग्रीव त्रिविष्टप जाते हुए सेना सहित यहाँ रात बिताकर रुका था। आपके पास आते मुझे उसने देखा, पकड़कर पूछा कि मैं किसकी हूँ; मैंने सब सत्य बता दिया। पर काम-मोह से अभिभूत उसने मेरी बात न सुनी; ‘मैं आपकी पुत्रवधू हूँ’ कहती मुझ पर उसने बलात्कार किया। हे सुव्रत, इस अपराध को क्षमा कीजिए; स्त्री और पुरुष का बल समान नहीं होता।”

यह सुनकर वैश्रवण-पुत्र क्रुद्ध हुए, ध्यानमग्न होकर सत्य की जाँच की, और रावण का कर्म जानकर क्रोध से ताम्रनेत्र होकर बाएँ हाथ में जल लिया; यथाविधि आचमन कर रावण को घोर शाप दिया: “हे भद्रे, चूँकि उसने आपको अनिच्छा से बलपूर्वक धर्षित किया, अतः वह किसी अनिच्छुक युवती के पास बलात मैथुन के लिए न जा सकेगा। यदि कामार्त होकर किसी अनिच्छुक स्त्री पर बल करेगा, तो उसी क्षण उसका मस्तक सात टुकड़ों में फट जाएगा।” यह शाप उच्चारित होते ही देवों की दुन्दुभि बजी, आकाश से पुष्प बरसे, और ब्रह्मा-प्रमुख सब देव हर्षित हुए। लोक की गति और राक्षस की मृत्यु जानकर ऋषि और पितर परम प्रसन्न हुए। यह रोमहर्षक शाप सुनकर रावण ने अनिच्छुक नारियों के प्रति मैथुन-भाव त्याग दिया, और उसकी हरी हुई सब पतिव्रता स्त्रियाँ मन-भावन शाप सुनकर प्रसन्न हुईं।

समझने की कुंजी (अवधारणा): नलकूबर का यह शाप रामकथा का एक मूक रक्षक है: इसी कारण रावण अशोकवाटिका में सीता पर बल नहीं कर पाता। वाल्मीकि के लिए यह घटना केवल अपराध की कथा नहीं, अपितु वह कारण है जिससे सीता की पवित्रता अक्षत रहती है। यहाँ कथा कल्पित अन्तरंगता में नहीं, अपितु शाप के परिणाम में है।

सार: कैलास पर रावण ने अप्सरा रम्भा पर, जो उसके पुत्र नलकूबर की वाग्दत्ता थी, बलात्कार किया। नलकूबर ने शाप दिया कि किसी अनिच्छुक स्त्री पर बल करते ही रावण का मस्तक सात टुकड़ों में फट जाएगा, जो आगे सीता की रक्षा का अदृश्य कवच बना।

इन्द्रलोक पर आक्रमण और सुमाली का वध

कैलास लाँघकर सेना-बल-वाहन सहित महातेजस्वी दशानन इन्द्रलोक पहुँचा। चारों ओर से बढ़ती राक्षस-सेना का शब्द देवलोक में मथे जाते समुद्र-सा गूँजा। रावण को आया सुन इन्द्र आसन से चलित हो उठे और एकत्र देवों, आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, साध्यों और मरुद्गणों से बोले, “दुरात्मा रावण से युद्ध के लिए तैयार हो जाइए।” इन्द्र-समान देव कवच धारण कर युद्ध-श्रद्धा से भर उठे। पर भयभीत, दीन इन्द्र विष्णु के पास जाकर बोले, “हे विष्णु, इस राक्षस से कैसे निपटूँ? यह अति-बलवान राक्षस युद्ध हेतु द्वार पर है। वरदान से ही यह बलवान हुआ है, अन्य किसी कारण से नहीं; ब्रह्मा का वचन तो सत्य करना ही है। हे देवदेव मधुसूदन, चराचर तीनों लोकों में आपके सिवा अन्य कोई गति-परायण नहीं। आप ही सनातन श्रीमान नारायण, पद्मनाभ हैं; आपने ही ये लोक और मुझ इन्द्र को स्थापित किया। युगान्त में सब आप में ही प्रवेश करते हैं। अतः स्वयं बताइए कि विजय कैसे हो, अथवा क्या आप असि-चक्र लेकर रावण से युद्ध करेंगे?”

नारायण बोले, “भयभीत न होइए; मेरी बात सुनिए। यह दुष्टात्मा देव-असुरों से अजेय है, और वरदान से दुर्जय होने के कारण इसे सम्मुख पाकर मारना भी नहीं हो सकता। पुत्र सहित यह बलोन्मत्त राक्षस सर्वथा महान कर्म करेगा, यह मैंने स्वभावतः देख लिया है। आपने जो ‘युद्ध कीजिए’ कहा, सो मैं इस रावण से अभी युद्ध न करूँगा; पर विष्णु शत्रु को मारे बिना नहीं लौटते, और वरदान-रक्षित रावण पर आज विजय दुर्लभ है। हे देवेन्द्र, आपके समक्ष प्रतिज्ञा करता हूँ कि समय आने पर मैं ही इस राक्षस की मृत्यु का कारण बनूँगा; पुरःसरों सहित रावण को मैं ही मारूँगा, और काल आया जान देवताओं को प्रसन्न करूँगा। हे शचीपते देवराज, यही तत्त्व बताया; निर्भय होकर देवों सहित युद्ध कीजिए।”

तब रुद्र, आदित्य, वसु, मरुत और अश्विनीकुमार कवच धारण कर राक्षसों की ओर नगर से निकल पड़े। रात के अन्त में रावण की राक्षस-सेना का नाद चारों ओर सुनाई दिया, जिसकी युद्ध-शैली देवों से श्रेष्ठ थी। जाग्रत होकर महावीर्य राक्षस हर्ष से संग्राम की ओर बढ़े। देव-सेना में संक्षोभ हुआ; उस अक्षय महासेना को रणाग्र में देख देवों में महान भय फैला। फिर देव और दानव-राक्षसों के बीच घोर, तुमुल, नाना अस्त्रोंवाला युद्ध छिड़ा।

इसी बीच रावण के घोरदर्शन शूर मन्त्री युद्ध को आ जुटे: मारीच, प्रहस्त, महापार्श्व, महोदर, अकम्पन, निकुम्भ, शुक, सारण, संह्राद, धूमकेतु, महादंष्ट्र, घटोदर, जम्बुमाली, महाह्राद, विरूपाक्ष, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, दुर्मुख, दूषण, खर, त्रिशिरा, करवीराक्ष, सूर्यशत्रु, महाकाय, अतिकाय, देवान्तक और नरान्तक। इन महावीर्य राक्षसों से घिरा महाबली सुमाली, रावण का मातामह, रण में प्रविष्ट हुआ। क्रुद्ध होकर उसने पैने अस्त्रों से देवगणों को वैसे बिखेर दिया जैसे वायु मेघों को। निशाचरों से पिटती देव-सेना सिंह से भगाए मृगों-सी सब दिशाओं में भागी।

इसी बीच वसुओं में आठवाँ, सावित्र नाम से विख्यात शूर वसु, हर्षित सेना से घिरा, शत्रु-दल में त्रास भरता रणाग्र में आया। दो महावीर्य आदित्य, त्वष्टा और पूषा भी सेना सहित निर्भय रण में उतरे। फिर समर से न हटनेवाले क्रुद्ध राक्षसों और देवों का युद्ध हुआ। राक्षस लाखों होकर देवों को घोर अस्त्रों से मारने लगे, और देव निर्मल शस्त्रों से घोर राक्षसों को यमसदन भेजने लगे। क्रुद्ध सुमाली ने नाना अस्त्रों से देव-सेना पर धावा बोला और आँधी-सा सबको बिखेर डाला। महाबाण-वर्षा, शूल और प्रास से पीड़ित देव संगठित न रह सके।

देवों को भगाते सुमाली के सम्मुख आठवाँ वसु सावित्र दृढ़ खड़ा रहा। अपनी सेना से घिरे, महातेज वसु ने पराक्रम से उस प्रहार करते निशाचर को रोका। फिर सुमाली और वसु में रोमहर्षक महायुद्ध हुआ। वसु के महाबाणों से सुमाली का सर्प-रथ क्षणभर में नष्ट होकर गिरा। सौ बाणों से जड़ा रथ नष्ट कर वसु ने राक्षस-वध हेतु हाथ में गदा ली। काल-दण्ड-सी दीप्ताग्र गदा से सावित्र ने सुमाली के मस्तक पर प्रहार किया। उल्का-सी गिरती वह गदा, इन्द्र के पर्वत पर पटके महावज्र-सी गरजी; भस्म हुए सुमाली की न हड्डी, न सिर, न मांस रणभूमि में दीखा। उसे मारा गया देख सब राक्षस एक-दूसरे को पुकारते सब दिशाओं में भागे, और वसु से भगाए वे टिक न सके।

समझने की कुंजी (नाम): इस युद्ध-सूची में मारीच, प्रहस्त, खर, दूषण, त्रिशिरा, देवान्तक, नरान्तक, अतिकाय जैसे नाम आगे युद्धकाण्ड के प्रमुख योद्धा बनेंगे। सुमाली रावण का मातामह है; उसका वध दिखाता है कि देव-पक्ष में भी ऐसे योद्धा हैं जो वरदान-रहित राक्षसों को क्षणभर में भस्म कर सकते हैं।

सार: रावण ने इन्द्रलोक पर चढ़ाई की; भयभीत इन्द्र को विष्णु ने आश्वासन और रावण-वध की प्रतिज्ञा दी। घोर युद्ध में रावण के मातामह सुमाली को आठवें वसु सावित्र ने गदा से भस्म कर डाला, जिससे राक्षस-सेना भाग खड़ी हुई।

मेघनाद और जयन्त का द्वन्द्व; इन्द्र-रावण का युद्ध

सुमाली को वसु द्वारा भस्म हुआ और अपनी सेना को देवों से पिटकर भागती देख, क्रुद्ध रावण-पुत्र मेघनाद ने सब राक्षसों को लौटाकर रणभूमि में दृढ़ स्थिति ली। अग्नि-वर्ण कामग रथ पर सवार वह महारथ देव-सेना पर वैसे टूटा जैसे प्रज्वलित अग्नि वनों पर। उसके दर्शनमात्र से देव सब दिशाओं में भागे; उसके सम्मुख कोई न ठहर सका। तब इन्द्र ने भयभीत देवों को धिक्कारकर कहा, “मत डरिए, मत भागिए; लौटिए, हे देवो। यह मेरा अपराजित पुत्र युद्ध को जा रहा है।” तभी जयन्त नाम से विख्यात शचीपुत्र अद्भुत रथ पर संग्राम में आया।

देवों ने शचीपुत्र को घेरकर रावण-पुत्र पर प्रहार किया। देव-राक्षसों, और इन्द्र-पुत्र तथा रावण-पुत्र का समान युद्ध हुआ। रावणि ने इन्द्र-सारथि मातलि के पुत्र गोमुख पर स्वर्ण-भूषित बाण बरसाए; जयन्त ने मेघनाद के सारथि को बेधा, और क्रुद्ध रावणि ने जयन्त को चारों ओर से बेध डाला। क्रोध से भरा, विस्फारित-नेत्र वह बली रावणि शचीपुत्र को शर-वर्षा से ढक गया, और हजारों पैने अस्त्र देव-सेनाओं पर बरसाए; शतघ्नी, मुसल, प्रास, गदा, खड्ग, परशु और महान गिरि-शिखर भी फेंके। शत्रु-सेना का संहार करते रावण-पुत्र की माया से चारों ओर अन्धकार छा गया, और लोक संत्रस्त हुए।

शर-पीड़ित देव-सेना अनेक प्रकार से असुखी हुई। मेघनाद और देवों का घोर अन्धकार-युद्ध छिड़ा; न कोई किसी को पहचाने, राक्षस-देव सब भ्रान्त होकर इधर-उधर दौड़ने लगे, देव देवों को और राक्षस राक्षसों को मारते रहे। इसी बीच पुलोमा नाम का वीर्यवान दैत्येन्द्र, जो जयन्त की माता शची का पिता और जयन्त का मातामह था, अपने दौहित्र को पकड़कर समुद्र में चला गया। जयन्त का अन्तर्धान जान देव विमन होकर भागे। तब क्रुद्ध रावणि ने महानाद करते हुए उन पर धावा बोला।

पुत्र का अन्तर्धान और देवों का भागना देख देवेश इन्द्र ने मातलि से कहा, “मेरा रथ निकट लाया जाए।” मातलि से चालित दिव्य, महाभीम, महाजव रथ निकट आ खड़ा हुआ; उसके आगे वायु-चपल मेघ बिजली से गरजे। गन्धर्वों ने नाना वाद्य बजाए, अप्सराएँ नाचीं। रुद्रों, वसुओं, आदित्यों, मरुद्गणों और अश्विनीकुमारों से घिरा देवेन्द्र निकल पड़ा। निकलते ही परुष वायु बही, सूर्य निष्प्रभ हुआ और महान उल्काएँ गिरीं।

इसी बीच विश्वकर्मा-निर्मित दिव्य रथ पर, जिसे महानागों ने वेष्टित कर रखा था और जिसके निःश्वास-वायु से वह रण में प्रज्वलित-सा दिखता था, शूर प्रतापी दशग्रीव चढ़ा। दैत्यों-निशाचरों से घिरा वह दिव्य रथ रणाभिमुख होकर महेन्द्र के सम्मुख आ खड़ा हुआ। रावण ने पुत्र को रोककर स्वयं युद्ध में दृढ़ स्थिति ली, और रावणि रण से निकलकर रथ में शान्त बैठ गया। फिर मरुद्गणों के साथ देवों और राक्षस-सेना का युद्ध मेघों-सी अस्त्र-वर्षा के बीच फिर छिड़ा। दुष्टात्मा कुम्भकर्ण नाना अस्त्र उठाए, यह न जानता हुआ कि किससे लड़ रहा है, जिस-तिस को दाँत, पैर, भुजा, हाथ, शक्ति, तोमर और मुद्गर से मारने लगा। शस्त्रों से छिदा, रक्त बहाता कुम्भकर्ण विद्युत-गर्जन-सहित जल बरसाते मेघ-सा शोभित हुआ।

रुद्रों के समीप आकर निशाचर शस्त्रों से सर्वांग बेधा गया। मरुद्गण-सहित देवों ने राक्षस-सेना को रण में बिखेर दिया; कुछ मारे गए, कुछ कटकर लोटे, कुछ अपने वाहनों से चिपके रहे। रावण ने अपनी सारी सेना देवों से नष्ट देखी; तब क्रुद्ध होकर इन्द्र पर धावा बोला, सेना-सागर में घुसकर देवों को मारते हुए इन्द्र तक पहुँचा। इन्द्र ने महाधनुष टंकारा जिसकी प्रत्यंचा-निर्घोष से दसों दिशाएँ गूँजीं, और रावण के मस्तक पर अग्नि-सूर्य-से तेज बाण बरसाए; महाबाहु दशग्रीव ने भी इन्द्र को धनुष-बाणों से ढक दिया। दोनों के घोर युद्ध में चारों ओर बाण-वर्षा से अन्धकार छा गया और कुछ न दीखा।

एक उप-कथा: मेघनाद की “तामसी माया” का यहाँ पहला प्रयोग दिखता है, वही अन्धकार-अस्त्र जो आगे युद्धकाण्ड में लक्ष्मण को मूर्छित करेगा। ध्यान दीजिए कि जयन्त को उसका मातामह पुलोमा बचा ले जाता है; वाल्मीकि बार-बार दिखाते हैं कि देव-पक्ष में भी अपनों की रक्षा पारिवारिक बल से होती है।

सार: मेघनाद ने तामसी माया से अन्धकार रचकर देव-सेना को त्रस्त किया; जयन्त को उसका मातामह पुलोमा समुद्र में ले गया। इन्द्र स्वयं रथ पर रण में उतरे, और रावण-इन्द्र का घोर बाण-युद्ध छिड़ा, जिसमें चारों ओर अन्धकार छा गया।

मेघनाद द्वारा इन्द्र का बन्दीकरण और लंका-विजय

अन्धकार छाने पर सब देव-राक्षस बलोन्मत्त होकर एक-दूसरे को मारते लड़ते रहे। राक्षसों की विशाल सेना का केवल दसवाँ भाग ही रण में बचा रहा, शेष देवों ने यमसदन भेज दिया। उस तामस-युद्ध में कोई किसी को न पहचाने; केवल इन्द्र, रावण और महाबली मेघनाद, ये तीन ही मोह में न पड़े। अपनी सारी सेना क्षणभर में नष्ट देख रावण तीव्र क्रोध से भरकर महानाद कर उठा और दुर्धर्ष रावण ने रथ पर खड़े सारथि से कहा, “क्रोध में मुझे शत्रु-सेना के बीच से उस छोर तक ले चलिए जहाँ दूसरा सिरा है। आज मैं स्वयं इन सब देवों को नाना अस्त्रों की महावर्षा से यमसदन भेजूँगा। इन्द्र, कुबेर, वरुण और यम को मारकर, देवों का संहार कर, स्वयं ऊपर अधिष्ठित हो जाऊँगा। विषाद मत कीजिए; शीघ्र रथ हाँकिए। दो बार कहता हूँ, मुझे सेना के उस छोर तक ले चलिए। जहाँ हम खड़े हैं वह इन्द्र का नन्दनवन का प्रदेश है; मुझे आज वहाँ ले चलिए जहाँ उदयपर्वत है।”

रावण का आदेश सुन सारथि ने मनोवेगवान घोड़े शत्रु-सेना के मध्य से दौड़ाए। रावण का यह निश्चय जान देवेश इन्द्र ने रण में स्थित देवों से कहा, “हे देवो, मेरी बात सुनिए; मुझे यही रुचता है कि इस दशग्रीव को जीवित ही बन्दी कर लिया जाए। यह अति-बलवान वायु-वेग रथ से पूर्णिमा के समुद्र-सी उमड़ती सेना को चीर देगा। वरदान से यह आज अत्यन्त निर्भय है, अतः इसे मारा नहीं जा सकता; इसी से हम राक्षस को बन्दी करेंगे, इसके लिए सावधान रहिए। जैसे बलि को बाँधने से तीनों लोक मैं भोगता हूँ, वैसे ही इस पापी का बन्धन मुझे रुचता है।”

दशग्रीव ने उत्तर दिशा से और इन्द्र ने दक्षिण दिशा से राक्षस-सेना में प्रवेश किया। सौ योजन भीतर घुसकर राक्षसराज ने देव-सेना को शर-वर्षा से ढक दिया। अपनी सेना नष्ट देख अविचलित इन्द्र ने रावण को घेरकर लौटने पर विवश कर दिया। इन्द्र से ग्रस्त रावण को देख दानव-राक्षसों ने “हाय, हम मारे गए” का नाद किया। तब क्रोध-मूर्छित मेघनाद रथ पर चढ़कर घोर देव-सेना में गहरे घुस गया; पूर्वकाल में पशुपति शिव से पाई महामाया ओढ़कर, क्रुद्ध होकर देव-सेना को बिखेर डाला।

सब देवों को छोड़कर वह इन्द्र पर ही टूटा, पर महातेज इन्द्र शत्रु-पुत्र को देख न सके। कवच गिर जाने और महावीर्य देवों से पिटने पर भी रावणि ने तनिक भय न किया। आते मातलि को श्रेष्ठ बाणों से ताड़कर उसने महेन्द्र पर बाण-वर्षा की। माया-बल से अदृश्य, अन्तरिक्षगामी मेघनाद ने इन्द्र को माया से घेरकर बाण बरसाए। इन्द्र रथ और सारथि छोड़कर ऐरावत पर चढ़े और रावणि को खोजने लगे। फिर जब रावणि ने इन्द्र को थका हुआ जाना, तब माया से बाँधकर अपनी सेना के पास ले गया। महायुद्ध से बलपूर्वक ले जाते देख सब देव “अब क्या होगा?” सोचते रहे; कहने लगे, “जिस मायावी समितिंजय इन्द्रजित ने विद्यावान इन्द्र को भी माया से बलात हर लिया, वह दिखता ही नहीं।”

इसी बीच क्रुद्ध देवगणों ने रावण को विमुख कर शर-वर्षा से ढक दिया; आदित्यों और वसुओं से घिरा रावण, शत्रुओं से पीड़ित, युद्ध न कर सका। पिता को प्रहारों से जर्जर देख अदृश्य खड़ा रावणि बोला, “आइए तात, चलें; युद्ध समाप्त हो। हमारी विजय आप जान लें; स्वस्थ और निश्चिन्त हो जाइए। प्रभो, आप मेरे कुलवंश के वर्धक हैं, क्योंकि आज तुल्य पराक्रम से आपने अतुलबल इन्द्र और देवों को जीत लिया। इन्द्र को रथ में बैठाकर सेना से घिरे आप लंका चलिए; मैं भी मन्त्रियों सहित हर्षित होकर पीछे आता हूँ।” पुत्र के प्रिय वचन से रावण रण से निवृत्त हुआ। महाबली रावणि इन्द्र को लेकर, सेना-वाहन सहित अपने भवन पहुँचकर, युद्ध करनेवाले राक्षसों को विदा कर गया।

समझने की कुंजी (अवधारणा): इन्द्र को बन्दी करने से ही मेघनाद को “इन्द्रजित” नाम मिलेगा (अगला सर्ग)। ध्यान दीजिए कि इन्द्र स्वयं चाहते हैं कि रावण को मारा न जाए, अपितु बन्दी किया जाए, क्योंकि वरदान से वह अवध्य है; पर माया से बँधते स्वयं इन्द्र ही हैं। वाल्मीकि यहाँ अहंकार और छल के पलटाव को दिखाते हैं।

सार: रावण ने इन्द्रलोक चीरकर देव-सेना नष्ट कर दी, पर इन्द्र ने उसे लौटने पर विवश किया। तब मेघनाद ने शिव-दत्त माया से अदृश्य होकर थके इन्द्र को बाँध लिया और पिता-सहित विजयी होकर लंका लौट आया।

ब्रह्मा का इन्द्रजित को वरदान और इन्द्र की मुक्ति: अहल्या-प्रसंग

अति-बलवान महेन्द्र को रावण-पुत्र द्वारा जीता गया देख देव प्रजापति ब्रह्मा को आगे रखकर लंका पहुँचे। पुत्रों-भाइयों से घिरे रावण के पास, आकाश में स्थित होकर प्रजापति साम-पूर्वक बोले, “वत्स रावण, हम आपके पुत्र के रण-आचरण से प्रसन्न हैं; अहो, इसके पराक्रम की महानता! यह आपके तुल्य या अधिक भी है। आपके ही तेज से तीनों लोक जीते गए और आपकी प्रतिज्ञा सफल हुई; मैं आपसे और आपके पुत्र से प्रसन्न हूँ। हे रावण, यह अति-बलवान पुत्र अब जगत में ‘इन्द्रजित’ नाम से विख्यात होगा। जिस राक्षस के आश्रय से, हे राजन, आपने देवों को वश में किया, वह निश्चय ही बलवान और दुर्जय होगा। अतः महेन्द्र, पाकशासन, को मुक्त किया जाए। उसकी मुक्ति के बदले देव आपको क्या दें?”

तब महातेज समितिंजय इन्द्रजित बोला, “हे देव, यदि यह मुक्त किया जाए तो मैं अमरत्व चाहता हूँ।” ब्रह्मा ने कहा, “भूतल पर किसी भी प्राणी को, चाहे पक्षी हो या चतुष्पद या अन्य महाबली, सर्वथा अमरत्व नहीं मिलता।” तब इन्द्रजित ने वहीं स्थित ब्रह्मा से कहा, “तो शतक्रतु इन्द्र की मुक्ति के बदले जो सिद्धि मुझे रुचे, वह सुनिए। जब भी शत्रुओं की पराजय चाहकर, मन्त्रों से हव्य द्वारा अग्नि की पूजा कर युद्ध को उद्यत होऊँ, तब अग्नि से अश्व-युक्त रथ मेरे सामने प्रकट हो; उस पर बैठे रहने तक मुझे मृत्यु न हो, यही मेरा निश्चित वर है। यदि उस अग्नि में जप-होम पूरा होने से पहले युद्ध करूँ, तो उसी समय मेरा विनाश हो। हर पुरुष तप से अमरत्व चाहता है, पर मैंने यह अमरत्व पराक्रम से चलाया है।” ब्रह्मा ने “ऐसा ही हो” कहा; इन्द्र इन्द्रजित से मुक्त हुए और देव स्वर्ग लौटे।

इसी बीच, हे राम, दीन, अमर-कान्ति से रहित इन्द्र चिन्ता में डूबकर ध्यानमग्न हो गए। उस दशा में देख ब्रह्मा बोले, “हे शतक्रतु, आपने पूर्व में कौन-सा महान दुष्कर्म किया था? हे अमरेन्द्र, हे प्रभो, मैंने बुद्धिपूर्वक प्रजा रची थी, जो सर्वथा एक वर्ण, एक भाषा और एक रूप की थी; दर्शन या लक्षण में उनमें कोई भेद न था। तब एकाग्र मन से मैंने सोचा कि इनमें भेद कैसे लाया जाए। उन प्रजाओं में जो-जो अंग विशिष्ट था, उसे लेकर मैंने एक स्त्री रची। रूप-गुणों से वह स्त्री अहल्या बनी: ‘हल’ यहाँ कुरूपता है, और उससे उत्पन्न निन्दा ‘हल्य’; जिसमें हल्य नहीं, वही ‘अहल्या’ विख्यात हुई, और यही नाम मैंने रखा।

“उस नारी के रचे जाने पर, हे देवेन्द्र, मुझे चिन्ता हुई कि यह किसकी हो। हे पुरंदर, आपने मन में सोचा, ‘स्थान की अधिकता से यह मेरी पत्नी हो।’ पर मैंने उसे न्यासरूप में महात्मा गौतम के पास रखा; अनेक वर्षों बाद उन्होंने लौटा दी। गौतम की अत्यन्त स्थैर्य और तप की सिद्धि जानकर मैंने पत्नी-रूप में उन्हें दे दी। वे धर्मात्मा महामुनि उसके साथ सुख से रहने लगे; गौतम को दे दिए जाने पर देव निराश हुए। तब हे देवेन्द्र, कामात्मा होकर आप उस मुनि के आश्रम में गए, और अग्नि-शिखा-सी दीप्त उस स्त्री को देखकर, कामार्त और क्रुद्ध होकर आपने उसे धर्षित किया। परम तेजस्वी ऋषि ने आपको आश्रम में देख लिया, और क्रोध में शाप दिया कि आपको दशा का विपर्यय भोगना पड़ा।

“उन्होंने कहा, ‘हे वासव, चूँकि आपने निर्भय होकर मेरी पत्नी धर्षित की, अतः हे इन्द्र, आप युद्ध में शत्रु के हाथ पड़ेंगे। हे दुर्बुद्धि, जो आचरण आपने यहाँ चलाया, वह मनुष्य-लोकों में भी फैलेगा, इसमें सन्देह नहीं। ऐसा करनेवाले के पाप का आधा भाग आप पर पड़ेगा; आपका स्थान स्थिर न रहेगा। जो-जो इन्द्र होगा, वह ध्रुव न रहेगा। यही मेरा शाप है।’ यही उन्होंने तब आपसे कहा था। फिर अपनी पत्नी को भर्त्सना कर महातपस्वी ने कहा, ‘हे दुर्विनीते, मेरे आश्रम के समीप अदृश्य रहकर रहिए। चूँकि आप रूप-यौवन-सम्पन्न होकर भी अस्थिर निकलीं, अतः अब आप लोक में एकमात्र रूपवती न रहेंगी; आपका रूप सब प्रजा में बँट जाएगा।’

“तब अहल्या ने गौतम को प्रसन्न करते हुए कहा, ‘हे विप्र, अज्ञानवश आपके रूप में आए देव से मैं धर्षित हुई, अपनी इच्छा से नहीं; हे विप्रर्षि, प्रसन्न होइए।’ गौतम बोले, ‘इक्ष्वाकु-वंश में राम नाम से एक महातेज महारथ उत्पन्न होंगे; वे ब्राह्मण (विश्वामित्र) के निमित्त वन जाएँगे; वे ही मानुष-रूप में विष्णु हैं। जब आप उन्हें देखेंगी, हे भद्रे, तब पवित्र हो जाएँगी; वही आपके दुष्कृत को मिटा सकते हैं। उनका आतिथ्य करके आप मेरे पास लौटेंगी; तभी, हे वरवर्णिनी, आप मेरे साथ रहेंगी।’ यह कहकर विप्रर्षि अपने आश्रम लौट गए, और वह ब्रह्मवादी की पत्नी महान तप करने लगी।

“यह सब उस मुनि के शाप के कारण हुआ। हे महाबाहु, अपना किया दुष्कृत स्मरण कीजिए; उसी शाप से आप शत्रु के हाथ पड़े, अन्य किसी कारण से नहीं। अतः शीघ्र सुसमाहित होकर वैष्णव यज्ञ कीजिए; उस यज्ञ से पवित्र होकर वहीं से स्वर्ग जाएँगे। और हे देवेन्द्र, आपका पुत्र महायुद्ध में नष्ट नहीं हुआ; उसके मातामह पुलोमा उसे महासमुद्र में ले गए हैं और अपने पास रखे हैं।” यह सुनकर महेन्द्र ने वैष्णव यज्ञ करके पुनः स्वर्ग जाकर देवराज-शासन किया।

“हे राम, यही इन्द्रजित का बल है जो मैंने वर्णित किया,” अगस्त्य बोले। “इस प्रकार लोक-कण्टक रावण उत्पन्न हुआ, जिसने पुत्र-सहित संग्राम में सुरेश्वर इन्द्र को जीता। जिसने देवेन्द्र तक को जीता, उसके लिए अन्य प्राणी क्या? यह सुनकर राम-लक्ष्मण और उपस्थित वानर-राक्षस “आश्चर्य!” कह उठे। राम के पास बैठे विभीषण बोले, “हे प्रभो, आज मुझे वह पुरातन आश्चर्य स्मरण हो आया जो मैंने देखा था।” राम ने अगस्त्य से कहा, “यह सत्य है; यह मैंने पहले भी सुना था।”

समझने की कुंजी (अवधारणा): यह सर्ग दो धागे एक साथ बुनता है: इन्द्रजित का वही वरदान, जिसकी शर्त (अग्नि-यज्ञ की समाप्ति से पहले युद्ध करने पर मृत्यु) आगे युद्धकाण्ड में लक्ष्मण के हाथों उसके वध का सूत्र बनती है; और अहल्या-प्रसंग, जो बाहर से असम्बद्ध लगता है पर इन्द्र के बन्दी होने का कर्म-मूल बताता है। यह अहल्या-कथा का वाल्मीकीय रूप है (बालकाण्ड के रूप से कुछ भिन्न)।

सार: ब्रह्मा ने मेघनाद को “इन्द्रजित” नाम और अग्नि-यज्ञ-आधारित सशर्त अवध्यता का वर देकर इन्द्र को मुक्त कराया। इन्द्र की पराजय का मूल अहल्या-धर्षण का शाप बताकर ब्रह्मा ने उन्हें वैष्णव यज्ञ का आदेश दिया, जिससे इन्द्र पुनः स्वर्ग-शासन को लौटे।

माहिष्मती में अर्जुन की खोज: रावण का नर्मदा-पूजन

विस्मय से भरकर महातेज राम ने पुनः नतमस्तक होकर ऋषिश्रेष्ठ अगस्त्य से कहा, “हे भगवन, जब से वह क्रूर राक्षस पृथ्वी पर विचरने लगा, क्या तब लोक पुरुषार्थ-हीन थे, हे द्विजोत्तम? क्या उस समय कोई राजा या राजसमान शासक न था, जिससे राक्षसेश्वर रावण को कहीं पराभव न मिला? अथवा वे पृथ्वी-शासक वीर्यहीन थे, या श्रेष्ठ अस्त्रों से रहित, जिससे अनेक राजा उससे पराजित हुए?” यह सुनकर भगवान ऋषि अगस्त्य हँसते हुए राम से वैसे बोले जैसे ब्रह्मा शिव से।

“रावण कुछ काल यों ही राजाओं को त्रास देता पृथ्वी पर विचरा, हे पृथ्वीपते। फिर वह अमरावती-सी प्रभावाली माहिष्मती नगरी पहुँचा, जहाँ वसु (अग्नि) की सदा उपस्थिति थी। वहाँ अग्नि के तेज से अग्नि-समान राजा अर्जुन राज्य करते थे, जिनके यहाँ अग्नि सदा कुश-आच्छादित कुण्ड में प्रतिष्ठित रहती। उसी दिन हैहयाधिपति बलवान अर्जुन अपनी स्त्रियों सहित नर्मदा में क्रीड़ा करने गए थे। उसी दिन रावण भी वहाँ आया और राक्षसेन्द्र ने अर्जुन के मन्त्रियों से कहा, ‘राजा अर्जुन कहाँ है? शीघ्र ठीक-ठीक बताइए। मैं रावण नरश्रेष्ठ अर्जुन से युद्ध की इच्छा से आया हूँ। मेरा आगमन उसे पहले सूचित कर दीजिए।’ वे बुद्धिमान मन्त्री बोले कि राजा नगर से अनुपस्थित हैं।

“नागरिकों से अर्जुन के नगर से बाहर जाने की बात सुन रावण विन्ध्य पर्वत की ओर गया, जो हिमालय-सा ऊँचा था, सहस्र शिखरोंवाला, जिसकी कन्दराओं में सिंह बसते थे, जो प्रपातों से गिरते शीतल जल से मानो अट्टहास करता था, देव-दानव-गन्धर्व-अप्सरा-किन्नरों से और अपनी स्त्रियों सहित क्रीड़ा करनेवालों से स्वर्ग-सा बना था, और स्फटिक-से जल की नदियों से शेषनाग-सा प्रतीत होता था। उसे निहारता रावण नर्मदा को गया, जो चलते पत्थरों और जल से युक्त, पुण्यसलिला, पश्चिम-समुद्र की ओर बहती थी।

“महिष, सृमर, सिंह, व्याघ्र, भालू और श्रेष्ठ गजों से, जो ताप-तृषा से क्षुब्ध थे, उसके जलाशय आन्दोलित थे; चक्रवाक, कारण्डव, हंस, जल-कुक्कुट और सारस उसमें कूज रहे थे। खिले वृक्षों का मुकुट, चक्रवाक-युगल-से स्तन, विस्तृत पुलिन-से नितम्ब, हंस-पंक्ति-सी मेखला, पुष्प-पराग से लिप्त अंग, जल-फेन-से निर्मल वस्त्र, और खिले कमलों-से शुभ नेत्रोंवाली वह नदी एक श्रेष्ठ नारी-सी थी, जिसमें दशानन ने डुबकी लगाई और सचिवों सहित नाना मुनियों से सेवित रम्य पुलिन पर बैठा।

“नर्मदा को ‘गंगा’ कहकर सराहते रावण को उसके दर्शन से हर्ष हुआ। उसने सचिवों और शुक-सारण से सलीला कहा, ‘देखिए, सहस्र किरणों से जगत को स्वर्णिम कर देनेवाला, मध्य-आकाश में तीव्र ताप देनेवाला यह सूर्य मुझे यहाँ बैठा जानकर ही चन्द्र-सा शीतल हो गया है। नर्मदा-जल से शीतल, सुगन्धित, श्रम-नाशक यह पवन मेरे भय से सुसमाहित होकर मन्द बह रहा है। मर्म-वर्धिनी यह श्रेष्ठ नर्मदा, जो लहरों पर नक्र-मीन-पक्षी धारे है, सभय अंगनावत खड़ी है। इन्द्र-समान राजाओं ने युद्ध में जिन्हें शस्त्रों से बेधा, वे रक्त से ऐसे रंजित हो, मानो लाल चन्दन के रस से सिंचे हों।’

“‘अतः आप इस शर्मदा, शुभ नर्मदा में वैसे ही डुबकी लगाइए जैसे सार्वभौम आदि मत्त गजेन्द्र गंगा में। इस महानदी में स्नान कर पाप से मुक्त हो जाएँगे। मैं भी आज शरद-चन्द्र-सी प्रभावाले इस पुलिन पर शिव को धीरे-धीरे पुष्पांजलि अर्पित करूँगा।’ यह आदेश पाकर प्रहस्त, शुक, सारण, महोदर और धूम्राक्ष ने नर्मदा में डुबकी लगाई। उन गजेन्द्र-से राक्षसों से नर्मदा वैसे आन्दोलित हुई जैसे वामन, अंजन, पद्म आदि महागजों से गंगा। स्नान कर वे रावण की शिव-पूजा हेतु पुष्प लाए, और श्वेत-मेघ-से रम्य पुलिन पर मुहूर्तभर में पुष्पों का पर्वत खड़ा कर दिया।

“जब इस प्रकार पुष्प एकत्र हुए, तब राक्षसराज रावण नदी में वैसे उतरा जैसे महागज गंगा में। यथाविधि स्नान कर श्रेष्ठ गायत्री-जप करके वह नर्मदा-जल से बाहर निकला; आर्द्र वस्त्र त्यागकर श्वेत वस्त्र धारण किया। हाथ जोड़े पुष्पांजलि को जाते रावण के पीछे सब राक्षस उसकी गति से झूमते मूर्तिमान पर्वतों-से चले। जहाँ-जहाँ रावण जाता, वहाँ जाम्बूनद-स्वर्ण का शिवलिंग ले जाया जाता। बालू-वेदी के मध्य उस लिंग को स्थापित कर रावण ने अमृत-गन्धवाले गन्ध और पुष्पों से उसकी अर्चना की। सतों की पीड़ा हरनेवाले, वरप्रद, चन्द्र-मयूख-भूषित परम शिव की पूजा कर निशाचर ने गाया, और हाथ फैलाकर उनके सामने आनन्द से नृत्य किया।

समझने की कुंजी (नाम): यह अर्जुन वही कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रबाहु) हैं, जिनका वध परशुराम के हाथों होता है; हैहय उनका वंश है, और माहिष्मती राजधानी। रावण का शिव-भक्त-रूप यहाँ स्पष्ट है: वही रावण, जो देवों को त्रास देता है, स्वर्ण-लिंग साथ रखता और शिव के सामने नाचता है। वाल्मीकि उसके चरित्र की यह जटिलता बिना टीका के दिखाते हैं।

सार: राम के प्रश्न पर अगस्त्य ने माहिष्मती के राजा कार्तवीर्य अर्जुन की कथा आरम्भ की। अर्जुन को नगर में न पाकर रावण नर्मदा-तट पर पहुँचा, स्नान-गायत्री-जप कर पुलिन पर स्वर्ण-शिवलिंग की पुष्प-पूजा करने और शिव के सम्मुख नृत्य करने लगा।

सहस्रबाहु अर्जुन रावण को बन्दी बनाते हैं

“जहाँ नर्मदा-पुलिन पर वह दारुण राक्षसराज पुष्पांजलि कर रहा था, उससे थोड़ी ही दूर माहिष्मती-पति, जयश्रेष्ठ, प्रभु अर्जुन नर्मदा-जल में अपनी स्त्रियों सहित क्रीड़ा कर रहे थे। उनके बीच राजा अर्जुन सहस्र हथिनियों के मध्य गजराज-से शोभित थे। अपने सहस्र भुजाओं का परम बल जानने को उत्सुक अर्जुन ने अनेक भुजाओं से नर्मदा का प्रवाह रोक दिया। मीन-नक्र-मकर और पुष्प-कुश-संस्तर सहित रुका नर्मदा-वेग वर्षा-काल-सा प्रतीत हुआ। कार्तवीर्य की भुजाओं से रुका वह निर्मल जल, तट को डुबाता हुआ, प्रतिस्रोत में दौड़ पड़ा, और रावण की समस्त पुष्पांजलि बहा ले गया।

“आधी पूजा अधूरी छोड़कर रावण ने नर्मदा को वैसे देखा जैसे कोई रुष्ट प्रिया को। पश्चिम से समुद्र-उद्गार-से बढ़ते जल-वेग को, जो पूर्व में घुसकर ज्वार-सा उमड़ा, और पक्षियों के अनुद्भ्रान्त होने से नदी को उसके स्वाभाविक रूप में देख, रावण ने इसका कारण जानने को बिना मुख से शब्द किए, दाहिने हाथ की अँगुली से शुक-सारण को आदेश दिया। दोनों भाई पश्चिम-मुख होकर आकाश-मार्ग से चले। आधा योजन जाकर उन्होंने जल में स्त्रियों सहित क्रीड़ा करते एक बृहत्-साल-से पुरुष को देखा, जिसके बाल जल में बिखरे, मद से नेत्र-कोण लाल, चित्त मत्त, जो सहस्र भुजाओं से नदी को वैसे रोके था जैसे कोई पर्वत सहस्र पादों से धरती को, और सहस्र श्रेष्ठ नारियों से घिरा सहस्र हथिनियों के बीच गजराज-सा था।

“उस अद्भुत पुरुष को देख शुक-सारण लौटकर रावण से बोले, ‘हे राक्षसेश्वर, कोई बृहत्-साल-सा अज्ञात पुरुष नर्मदा को बाँध-सा रोककर स्त्रियों को क्रीड़ा करा रहा है। सहस्र भुजाओं से रुका जल बार-बार समुद्र-उद्गार-से उद्गार छोड़ रहा है।’ यह सुन रावण ‘अर्जुन ही है’ कहकर युद्ध-लालसा से चल पड़ा। रावण के अर्जुन-अभिमुख होते ही प्रचण्ड पवन शब्द और धूल सहित बहा, मेघों ने रक्त-बूँदों के साथ एक बार गर्जना की। महोदर, महापार्श्व, धूम्राक्ष, शुक-सारण से घिरा राक्षसेन्द्र वहाँ पहुँचा जहाँ अर्जुन था। अंजन-से रावण ने वासिता-गजों के बीच मत्त गज-से, स्त्रियों से घिरे अर्जुन को देखा।

“रोष से रक्तनेत्र, बलोद्धत रावण ने गम्भीर वाणी से अर्जुन के मन्त्रियों से कहा, ‘शीघ्र हैहय-राजा को बताइए कि रावण नाम का योद्धा युद्ध को आया है।’ सुनकर मन्त्री सशस्त्र उठ खड़े हुए और बोले, ‘धन्य हैं, रावण! युद्ध का उत्तम समय जानते हैं, जो स्त्रियों के बीच मद्यपायी राजा से लड़ने को उत्सुक हैं, मानो व्याघ्र हथिनियों के बीच मत्त गज से। आज क्षमा कीजिए, हे दशग्रीव; रात यहीं बिताइए; युद्ध-श्रद्धा हो तो कल अर्जुन से लड़िएगा। और यदि युद्ध-तृष्णा से शीघ्रता हो, तो पहले हमें रण में गिराकर ही अर्जुन तक पहुँचेंगे।’ तब रावण के मन्त्रियों ने अर्जुन के मन्त्रियों को मारकर भूखे होकर खा डाला।

“नर्मदा-तट पर अर्जुन के अनुचरों और रावण के मन्त्रियों में हलहला-शब्द उठा। अर्जुन के मन्त्री बाण, तोमर, प्रास, त्रिशूल और वज्र-से चर्म-छेदक अस्त्रों से चारों ओर से रावण-दल पर टूटे; उनका वेग नक्र-मीन-मकर-भरे समुद्र-नाद-सा दारुण था। रावण के मन्त्री प्रहस्त, शुक, सारण क्रुद्ध होकर अपने तेज से अर्जुन की सेना का संहार करने लगे। भयभीत पुरुषों ने यह क्रीड़ारत अर्जुन को बताया। ‘मत डरिए’ कहकर अर्जुन गंगा से अंजन-गज-से नर्मदा-जल से निकले। क्रोध से नेत्र लाल किए वे युगान्त-अग्नि-से प्रज्वलित हुए। श्रेष्ठ स्वर्ण-अंगदधारी अर्जुन गदा लेकर सूर्य के तम-नाश-से राक्षसों पर टूटे, गरुड-वेग से दौड़े।

“उनका मार्ग रोककर प्रहस्त मूसल लिए विन्ध्य-से अकम्प्य खड़ा हुआ, जैसे विन्ध्य ने सूर्य का मार्ग रोका हो। मदोद्धत प्रहस्त ने लोहबद्ध घोर मूसल अर्जुन पर फेंका और काल-सा गरजा; प्रहस्त के हाथ से छूटे उस मूसल का अग्र अशोक-पुष्प-सा अग्नि-शिखा छोड़ने लगा, मानो लक्ष्य को भस्म कर देगा। अविचल अर्जुन ने वेग से आते मूसल को गदा से कुशलता-पूर्वक रोक दिया। फिर गदा सहित हैहयाधिपति, पाँच सौ भुजाओं से उठाई भारी गदा घुमाते, प्रहस्त पर टूटे; अति-वेग से मारे प्रहस्त वज्र से बिंधे पर्वत-से धराशायी हुए। प्रहस्त को गिरा देख मारीच, शुक, सारण, महोदर, धूम्राक्ष रण से खिसक गए।

“मन्त्रियों के भाग जाने और प्रहस्त के गिरने पर रावण शीघ्र नरश्रेष्ठ अर्जुन पर टूटा। सहस्रबाहु और बीस-भुजावाले के बीच रोमहर्षक दारुण युद्ध छिड़ा। दोनों, मानो क्षुब्ध समुद्र, चलमूल पर्वत, तेजोयुक्त दो सूर्य, दो प्रज्वलित अग्नि, मदोद्धत दो गज, वासिता-हेतु लड़ते दो वृषभ, गरजते दो मेघ, बलोत्कट दो सिंह, क्रुद्ध रुद्र और काल-से, गदा लेकर परस्पर घोर प्रहार करने लगे। जैसे पर्वत वज्र-प्रहार सहते हैं, वैसे ही नर-राक्षस ने एक-दूसरे की गदा सही। उनकी गदाओं के टकराव से, वज्र-प्रतिध्वनि-सी, सब दिशाएँ गूँजीं। अर्जुन की गदा शत्रु-वक्ष पर पड़ते आकाश को विद्युत-सी स्वर्णिम करती; वैसे ही रावण की गदा अर्जुन-वक्ष पर महागिरि पर गिरती उल्का-सी चमकती। न अर्जुन थके, न राक्षसगणेश्वर; पूर्व के बलि-इन्द्र-सा उनका समान युद्ध हुआ। वे वृषभों-से सींगों और गजों-से दाँतों-सा परस्पर प्रहार करते रहे।

“तब क्रुद्ध अर्जुन ने सर्वबल से वह गदा रावण के विशाल वक्ष के स्तनों के बीच फेंकी। पर वरदान-रक्षित रावण-वक्ष पर वह गदा, दुर्बल-सी, वेग के अनुसार दो टुकड़े होकर धरती पर गिर पड़ी। अर्जुन-प्रयुक्त उस गदा-घात से रावण धनुष-भर पीछे हटकर कराहता बैठ गया। दशग्रीव को व्याकुल देख अर्जुन सहसा उछलकर उसे ऐसे पकड़ बैठे जैसे गरुड सर्प को। सहस्र भुजाओं से बलपूर्वक दशानन को पकड़कर बलवान राजा ने उसे वैसे बाँध लिया जैसे नारायण (वामन-रूप में) ने बलि को। रावण के बँधते सिद्ध, चारण और देव ‘साधु’ कहते अर्जुन के मस्तक पर पुष्प बरसाने लगे। जैसे व्याघ्र मृग या सिंह गज को पकड़े, वैसे रावण को पकड़कर हैहय-राजा बार-बार मेघ-सा गरजे।

“रावण को बँधा देख चेत पाकर क्रुद्ध प्रहस्त सहसा अर्जुन पर टूटा; ग्रीष्म-अन्त के मेघों-से राक्षसों का वेग बढ़ा। ‘फेंको, फेंको’, ‘ठहरो, ठहरो’ कहते वे टूटे, और प्रहस्त ने मूसल-शूल बरसाए। अभ्रान्त अर्जुन ने उन शस्त्रों को पहुँचने से पहले ही पकड़ लिया, और उन्हीं दुर्धर श्रेष्ठ अस्त्रों से राक्षसों को बेधकर वायु-से मेघों-सा बिखेर दिया। व्याघ्र-से मृग और मृगराज-से गज को लेकर, रावण को पकड़े, मित्रों से घिरे अर्जुन नगर में प्रविष्ट हुए। द्विजों-नागरिकों द्वारा पुष्प-अक्षत से अभिषिक्त, इन्द्र-से अर्जुन, बलि को पकड़े सहस्रनेत्र इन्द्र-से, अपनी नगरी में प्रविष्ट हुए।

एक उप-कथा: ध्यान दीजिए, अर्जुन की गदा रावण के वक्ष पर दो टुकड़े हो जाती है, क्योंकि वही वक्ष ब्रह्मा के वरदान से रक्षित है। तब भी सहस्रबाहु अर्जुन उसे केवल बाहुबल से पकड़कर बलि-से बाँध लेते हैं। वाल्मीकि का यह दृष्टान्त उत्तरकाण्ड की धुरी है: रावण अवध्य भले हो, अपराजेय नहीं; मनुष्य-वीर तक उसे बन्दी कर सकता है।

सार: कार्तवीर्य अर्जुन ने सहस्र भुजाओं से नर्मदा रोककर रावण की पूजा बहा दी। घोर गदा-युद्ध में प्रहस्त गिरे, और अर्जुन ने वरदान-रक्षित रावण को बाहुबल से पकड़कर, बलि-से बाँधकर, बन्दी रूप में अपनी नगरी ले गए।

पुलस्त्य रावण को छुड़ाते हैं

“वायु को पकड़ लेने-सी रावण की उस बन्दी-कथा को पुलस्त्य ने स्वर्ग में देवों द्वारा कही जाती सुना। पुत्र-स्नेह से काँपते हुए, यद्यपि महाधृति, वह महर्षि माहिष्मती-पति को देखने चले। वायु-मार्ग से, वायु-तुल्य गति से, मनःसम्पात-वेग से वे माहिष्मती पहुँचे। ब्रह्मा के अमरावती-प्रवेश-से वे हर्ष-पुष्ट जनों से भरी उस नगरी में प्रविष्ट हुए। उगते सूर्य-से, अति-दुर्दर्श आते ऋषि को पहचानकर अर्जुन के मन्त्रियों ने आगमन सूचित किया; ‘पुलस्त्य हैं’ जानकर हैहयाधिपति सिर पर अंजलि रखे तपस्वी की अगवानी को आगे बढ़े।

“पुरोहित अर्घ्य और मधुपर्क लिए राजा के आगे वैसे चले जैसे इन्द्र के आगे बृहस्पति। उगते सूर्य-से आते ऋषि को देख अर्जुन सम्भ्रान्त होकर, इन्द्र के परम-ब्रह्म-वन्दन-से, झुक गए। मधुपर्क, गौ, पाद्य और अर्घ्य निवेदित कर राजेन्द्र हर्ष-गद्गद वाणी से पुलस्त्य से बोले, ‘आज मेरा कुशल है, हे देव; आज मेरा व्रत सफल; आज मेरा जन्म सफल; आज मेरा तप सफल, कि देव-वन्द्य आपके चरण वन्दता हूँ। यह राज्य, ये पुत्र, ये दार, यहाँ तक कि हम स्वयं आपके हैं। हम क्या करें? आज्ञा दीजिए।’

“धर्म-अग्नि-पुत्रों का कुशल पूछकर पुलस्त्य हैहय-राजा अर्जुन से बोले, ‘हे कमल-दल-नेत्र, पूर्णचन्द्र-मुख नरेन्द्र, अतुल है आपका बल, जिससे आपने दशग्रीव को जीता। मेरा वही पौत्र, रण में दुर्जय, जिसके भय से समुद्र और वायु निश्चल खड़े रहते थे, आपने रण में बाँध लिया। मेरे पुत्र का यश आपने पी लिया और अपना नाम विख्यात किया। मेरे वचन से अब, हे वत्स, दशानन को छोड़ दीजिए।’ पुलस्त्य की आज्ञा शिरोधार्य कर अर्जुन ने बिना कुछ कहे हर्ष से राक्षसेन्द्र को मुक्त कर दिया।

“त्रिदशारि को छोड़कर, दिव्य आभूषण-माला-वस्त्र से सत्कार कर, अग्नि-साक्षी अहिंसक मैत्री करके, ब्रह्म-पुत्र पुलस्त्य को प्रणाम कर अर्जुन अपने भवन को गए। निःशर्त मुक्त, आतिथ्य-सत्कृत, मातामह से सस्नेह आलिंगित होकर भी विजित रावण लज्जित था। दशग्रीव को मुक्त कराकर मुनिपुंगव पुलस्त्य भी ब्रह्मलोक लौट गए। इस प्रकार, हे रघुनन्दन, बलवानों से भी बलवान योद्धा होते हैं; अतः जो अपना कल्याण चाहे, वह शत्रु की अवज्ञा न करे। पुलस्त्य के वचन से पुनः मुक्त वह महाबली रावण, अर्जुन की मैत्री पाकर, फिर राजाओं का संहार और दर्प से सारी पृथ्वी का विचरण करने लगा।

समझने की कुंजी (नाम): पुलस्त्य रावण के पितामह हैं (विश्रवा के पिता), अतः रावण उनका पौत्र है, अर्थात पुत्र का पुत्र। इस सर्ग का सार-वाक्य, “बलवानों से भी बलवान होते हैं, शत्रु की अवज्ञा न करें”, पूरे उत्तरकाण्ड का नैतिक केन्द्र है।

सार: पुलस्त्य ने आकर अर्जुन से रावण को छुड़ाया; अर्जुन ने सत्कार और अग्नि-साक्षी मैत्री कर उसे मुक्त किया। विजित होने की लज्जा लिए रावण फिर दर्प से पृथ्वी पर राजाओं का संहार करने निकल पड़ा, यही पाठ देता हुआ कि बलवान को भी शत्रु की अवज्ञा नहीं करनी चाहिए।

वाली के हाथों रावण का पराभव और मैत्री

“अर्जुन से मुक्त राक्षसाधिपति रावण, अब निर्विघ्न होकर, सारी पृथ्वी पर विचरने लगा। जिस किसी राक्षस या मनुष्य को बलाधिक सुनता, उसी के पास जाकर दर्प से युद्ध को ललकारता। एक दिन वाली से शासित किष्किन्धा नगरी जाकर उसने स्वर्ण-मालाधारी वाली को द्वन्द्व के लिए ललकारा। तब वानर-मन्त्री तार, सुषेण, अंगद और सुग्रीव युद्ध-इच्छु आए रावण से बोले, ‘हे राक्षसेन्द्र, जो आपका प्रतिबल हो, वह वाली तो बाहर गए हैं। आपके सामने और कौन वानर खड़ा हो सकता है? चारों समुद्रों पर सन्ध्या-वन्दन कर वाली इसी मुहूर्त में लौट आएँगे; क्षणभर ठहरिए। ये देखिए शंख-से श्वेत अस्थि-राशियाँ, उन योद्धाओं की जो वाली से युद्ध माँगकर वानराधिपति के तेज से चूर हुए। अथवा, हे रावण, यदि अमृत-रस भी पी रखा हो, तब भी वाली से भिड़ते ही आपका जीवन अन्त पाएगा।

“‘अभी जगत का यह चित्र देखिए, हे विश्रवा-पुत्र; इस मुहूर्त ठहरिए, आपका जीवन दुर्लभ हो जाएगा। अथवा शीघ्र मरने को उत्सुक हैं, तो दक्षिण-समुद्र जाइए; वहाँ भूमि पर अग्नि-से वाली को देखेंगे।’ तार को धिक्कारकर लोक-रावण रावण पुष्पक पर चढ़कर दक्षिण-समुद्र को उड़ चला। वहाँ हेमगिरि-से, तरुण-सूर्य-से मुखवाले, सन्ध्योपासन में लीन वाली को देखकर अंजन-से रावण पुष्पक से उतरा और उन्हें पकड़ने को नीरव पगों से चला।

“संयोगवश वाली ने भी पाप-अभिप्राय रावण को देख लिया, पर सम्भ्रम न किया, मानो सिंह खरगोश को या गरुड सर्प को देखे। (वाली ने मन में सोचा:) ‘पकड़ने आते इस पापी रावण को बगल में दबाकर, लटकाए हुए, मैं शेष तीनों समुद्र भी देख आऊँगा। गरुड के पंजे के सर्प-से, जाँघ-हाथ-वस्त्र लटकाए, मेरी बगल में लटके दशग्रीव को लोग देखेंगे।’ ऐसा निश्चय कर वाली मौन रहकर वैदिक मन्त्र जपते पर्वतराज-से खड़े रहे।

“परस्पर पकड़ने को उत्सुक हरि और राक्षस, बल के दर्प से, उस कार्य के लिए यत्न करने लगे। पगों के शब्द से रावण को पकड़ने को उद्यत जान, पीठ फेरे हुए भी वाली ने उसे वैसे पकड़ लिया जैसे अण्डज (गरुड) सर्प को। बगल में दबाकर वेग से वाली आकाश में उछले और रावण को पवन-से मेघ-सा हर ले गए, यद्यपि रावण नखों से बार-बार वाली को कोंचता रहा। रावण के हरे जाते राक्षस-मन्त्री उसे छुड़ाने को चीखते हुए दौड़े, पर वाली की भुजाओं-जाँघों के वेग से थककर रुक गए। मेघ-समूह से अनुगत आकाश-स्थ सूर्य-से वाली शोभित हुए। पर्वतराज तक वाली के मार्ग से हट गए, फिर मांस-रक्त के शरीरवाला जीने का इच्छुक क्या? पक्षियों के झुण्ड भी न पहुँच सकें ऐसे चारों समुद्रों पर क्रमशः सन्ध्या-वन्दन करते वाली, रावण को बगल में दबाए, पश्चिम, उत्तर और पूर्व समुद्र होते किष्किन्धा लौट आए।

“रावण को ढोकर थके वाली किष्किन्धा के उपवन में उतरे और रावण को बगल से छोड़ते हुए हँसते हुए बार-बार पूछा, ‘कहाँ से आए हैं?’ महाविस्मय और श्रम से नेत्र घुमाते राक्षसेन्द्र बोले, ‘हे महेन्द्र-से वानरेन्द्र, मैं राक्षसेन्द्र रावण हूँ, युद्ध-इच्छा से आया था, और आज आपने मुझे पकड़ लिया। अहो, आपका बल, वीर्य और गाम्भीर्य, कि पशु-सा पकड़कर चारों समुद्र घुमा लाए! इतना अश्रान्त, इतना शीघ्र मुझे ढोनेवाला कौन अन्य वीर होगा? ऐसी गति केवल तीन में है, हे प्लवंगम: मन, वायु और गरुड में, और आप में भी, इसमें सन्देह नहीं। आपका बल देखकर, हे हरिपुंगव, अग्नि के सामने आपसे चिर, स्निग्ध मैत्री चाहता हूँ। हे हरीश्वर, हमारे दार, पुत्र, नगर, राष्ट्र, भोग, वस्त्र और भोजन, सब अविभक्त रहेंगे।’

“तब अग्नि प्रज्वलित कर, परस्पर आलिंगन कर, हरि और राक्षस भ्रातृत्व को प्राप्त हुए। हाथ जोड़े वे दोनों, हरि और राक्षस, हर्षित होकर किष्किन्धा में वैसे प्रविष्ट हुए जैसे दो सिंह गिरि-गुहा में। रावण वहाँ एक मास सुग्रीव-सा रहा, फिर त्रैलोक्य-संहार के अभिलाषी अपने मन्त्रियों द्वारा ले जाया गया। हे प्रभो (राम), यही पूर्व में हुआ था, कि वाली ने रावण को परास्त किया और अग्नि-साक्षी भाई बनाया। हे राम, वाली का बल अतुल और उत्तम था; वही वाली आपके हाथों पतंगे-सा भस्म हो गया।”

समझने की कुंजी (अवधारणा): अगस्त्य इस कथा से दो बातें जोड़ते हैं: रावण इतना बलवान कि अर्जुन और वाली तक उसे पकड़ लेते हैं, और फिर भी वाली को राम ने एक बाण से मार डाला। यह तुलना राम की महिमा का अप्रत्यक्ष उद्घोष है, जिसे आगे हनुमान-प्रसंग और बढ़ाएगा।

सार: किष्किन्धा पहुँचे रावण को सन्ध्या-रत वाली ने बगल में दबाकर चारों समुद्र घुमा डाला। चमत्कृत रावण ने अग्नि-साक्षी मैत्री माँगी, और वाली से भाईचारा कर एक मास किष्किन्धा रहा; अगस्त्य ने जोड़ा कि वही अतुलबल वाली राम के एक बाण से भस्म हुआ।

हनुमान का बालचरित: सूर्य की ओर छलांग और वायु का कोप

समुद्र देखकर सीदती वानर-सेना को निहारकर राम ने दक्षिण-दिशावासी मुनि से हाथ जोड़े विनयपूर्वक पूछा, “वाली और रावण का यह अतुल बल था; पर मेरी समझ में इन दोनों का बल हनुमान के समान नहीं। शौर्य, दाक्ष्य, बल, धैर्य, प्राज्ञता, नय, विक्रम और प्रभाव, सब हनुमान में बसे हैं। समुद्र-दर्शन से सीदती सेना को आश्वस्त कर महाबाहु हनुमान सौ योजन कूद गए। लंका को धर्षित कर, रावण के अन्तःपुर में सीता को देखकर, बात कर, आश्वासन देकर लौटे। सेना-अग्रगों, मन्त्री-पुत्रों, किंकरों और रावण-पुत्र अक्ष को हनुमान ने अकेले गिरा दिया। फिर बन्धन से छूटकर रावण से बात कर, लंका को प्रलयाग्नि-सी भस्म कर दिया।

“जो कर्म युद्ध में हनुमान ने किए, वैसे न काल ने, न इन्द्र ने, न विष्णु ने, न कुबेर ने किए। इनके बाहुबल से ही मैंने लंका, सीता, लक्ष्मण, विजय, राज्य, मित्र और बान्धव पाए। यदि सुग्रीव-सखा हनुमान मेरे साथ न होते, तो जानकी का समाचार कौन ला सकता था? आश्चर्य है कि सुग्रीव-वाली के वैर के समय हनुमान ने सुग्रीव-प्रिय हेतु वाली को क्यों न भस्म कर दिया। मुझे लगता है, हनुमान अपना बल नहीं जानते थे, इसी से क्लेश पाते वानराधिपति को केवल देखते रहे। हे भगवन, हे महामुनि, हे अमर-पूजित, हनुमान का यह सब विस्तार से ठीक-ठीक बताइए।”

राम का हेतुयुक्त वचन सुन ऋषि अगस्त्य ने हनुमान के समक्ष ही कहा, “हे रघुश्रेष्ठ, सत्य है; बल, गति या मति में इनके तुल्य अन्य कोई नहीं। पर पूर्व में अमोघ-शाप मुनियों ने इन्हें शाप दिया कि बलवान होकर भी ये अपना सारा बल न जानेंगे। बाल्यकाल में इन्होंने जो कर्म किया, वह वर्णन के अयोग्य है; बालस्वभाव से ये अपना बल भूल गए। यदि सुनने की इच्छा हो, हे राघव, तो एकाग्र होकर सुनिए, मैं कहता हूँ।

“सूर्य के वरदान से स्वर्ण-वर्ण सुमेरु नाम पर्वत है, जहाँ हनुमान के पिता केसरी राज्य करते थे। उनकी इष्ट भार्या अंजना से वायु ने उत्तम पुत्र उत्पन्न किया। शालि-शूक-से आभावाले उस पुत्र को जनकर अंजना फल लाने वन गई। माता के वियोग और भूख से पीड़ित शिशु शरवन में कार्तिकेय-से जोर से रोया। उसी क्षण जपा-पुष्प-राशि-से उगते सूर्य को फल समझकर वह पकड़ने को आकाश में उछल पड़ा। बालार्क-अभिमुख, बालार्क-से मूर्तिमान वह बालक सूर्य को पकड़ने आकाश में कूदता गया। शिशु-रूप हनुमान को यों कूदते देख देव-दानव-यक्ष परम विस्मित हुए: ‘न वायु, न गरुड, न मन इतना वेगवान, जितना यह वायु-पुत्र उत्तम आकाश में जाता है। शिशु में जब ऐसी गति-शक्ति है, तो यौवन और बल पाने पर वेग कैसा होगा?’

“सूर्य-दाह के भय से तुषार-सा शीतल वायु अपने कूदते पुत्र के पीछे चला, उसकी रक्षा करता। पिता के बल और बालस्वभाव से अनेक सहस्र योजन उड़कर वह सूर्य के निकट पहुँचा। यह अबोध शिशु है, और इससे महान कार्य (राम का) सधना है, यह जानकर सूर्य ने उसे भस्म न किया। जिस दिन यह सूर्य को पकड़ने उछला, उसी दिन राहु भी सूर्य को ग्रसने आया था। सूर्य-रथ पर हनुमान को देख चन्द्र-सूर्य-मर्दन राहु डरकर खिसक गया। इन्द्र के भवन जाकर क्रुद्ध सिंहिका-पुत्र राहु भृकुटि तानकर बोला, ‘हे वासव, हे बल-वृत्र-हन, चन्द्र-सूर्य मुझे भूख-शान्ति को दिए थे; मेरा भाग आपने अन्य को क्यों दे दिया? आज पर्वकाल में सूर्य को पकड़ने आया, तो दूसरे राहु ने सहसा सूर्य को पकड़ लिया।’

“राहु का वचन सुन सम्भ्रान्त इन्द्र आसन छोड़, स्वर्ण-माला उठाए उठ खड़े हुए। कैलास-शिखर-से, चतुर्दन्त, मद-स्रावी, स्वर्ण-घण्टा के अट्टहास-से ऐरावत पर चढ़कर, राहु को आगे कर इन्द्र वहाँ चले जहाँ सूर्य हनुमान-सहित थे। तभी इन्द्र को छोड़कर राहु आगे बढ़ा और शैल-शिखर-से दौड़ता हनुमान को दीखा। तब सूर्य को छोड़, राहु को फल समझकर हनुमान सिंहिका-पुत्र को पकड़ने पुनः आकाश में उछले। उस छोड़े सूर्य और दौड़ते प्लवंगम को देख विशालकाय राहु, जिसका केवल मुख-शेष है, मुँह फेरकर उल्टा भागा। ‘इन्द्र, इन्द्र’ पुकारता राहु त्रास से बार-बार चीखा। उसका परिचित स्वर सुन इन्द्र बोले, ‘मत डरिए, इसका अभी अन्त करता हूँ।’

“फिर ऐरावत को देखकर, उसे भी ‘बड़ा फल’ समझकर मारुति उस गजराज पर टूटे। ऐरावत को पकड़ने दौड़ते हनुमान का रूप क्षणभर इन्द्र-अग्नि-से घोर और दीप्त हो उठा। यों दौड़ते हनुमान को अति-क्रुद्ध न होकर भी शचीपति इन्द्र ने हाथ से छूटे वज्र से प्रहार किया। इन्द्र-वज्र से ताड़ित हनुमान पर्वत पर गिरे, और गिरते समय उनकी बाईं हनु (ठुड्डी) टूट गई। वज्र-घात से व्याकुल, गिरे पुत्र को देख वायु प्रजा के अहित हेतु इन्द्र पर क्रुद्ध हुए। प्राणियों में अन्तर्गत प्रचार (श्वास) रोककर वायु अपने शिशु-पुत्र को लेकर गुहा में प्रविष्ट हो गए। मल-मूत्राशय रोककर प्रजा को परम पीड़ा देते वायु ने सब प्राणियों को वैसे रोक दिया जैसे इन्द्र वर्षा को। वायु-कोप से प्राणी निरुच्छ्वास होकर, सन्धियाँ टूटने से काठ-से हो गए। स्वाध्याय-वषट्कार-निष्क्रिय-धर्म-हीन तीनों लोक नरक-से हो गए।

“तब गन्धर्व, देव, असुर, मानव सहित दुखी प्रजा सुख की इच्छा से प्रजापति के पास दौड़ी। महोदर (जलोदर) रोगियों-से फूले पेटवाले देव हाथ जोड़े बोले, ‘हे भगवन, हे नाथ, आपने ही चार प्रकार की प्रजा रची; आपने ही वायु को हमारी आयु का स्वामी दिया। तो हे सत्तम, प्राणेश्वर होकर भी इसने आज हमें अन्तःपुर की स्त्रियों-सा क्यों रोक रखा है? वायु से उपहत हम आपकी शरण आए हैं; हे दुःख-हन, वायु-संरोध-जनित यह दुख दूर कीजिए।’

“यह सुनकर प्रजानाथ प्रजापति बोले, ‘यह किसी कारण से हुआ; सुनिए। राहु के कहने पर वायु-पुत्र को आज इन्द्र ने गिराया, इसी से वायु क्रुद्ध हुआ। अशरीर होकर भी वायु सब शरीरों में संचरण कर उनका पालन करता है। शरीर में वायु बिना वह काठ-सा हो जाता है। वायु ही प्राण, वायु ही सुख, वायु ही यह सारा जगत है। वायु से त्यक्त जगत सुख नहीं पाता; आज ही आयुरूप वायु ने जगत को छोड़ दिया। ये सब निरुच्छ्वास, काठ-दीवार-से खड़े हैं। अतः जहाँ वायु है वहीं चलें, हे आदित्य-पुत्रो; इन्हें प्रसन्न किए बिना हम नष्ट न हों।’ यह सुन गन्धर्व, सर्प, गुह्यकों और देवों सहित प्रजापति वहाँ गए जहाँ वायु, इन्द्र से गिराए अपने पुत्र को लिए बैठे थे। सूर्य-अग्नि-स्वर्ण-से दीप्त उस पुत्र को गोद में देख देव-गन्धर्व-ऋषि-यक्ष-राक्षसों सहित चतुर्मुख ब्रह्मा ने शिशु पर कृपा की।

समझने की कुंजी (नाम): “हनु” अर्थात ठुड्डी; इन्द्र के वज्र से बाईं हनु टूटने पर ही “हनुमान” नाम पड़ा (अगला सर्ग)। राहु-ग्रसन के पीछे की कथा भागवत की है (सूर्य-चन्द्र द्वारा राहु को पकड़वाना), अर्थात यह परवर्ती परम्परा का संकेत है, वाल्मीकि का मूल विवरण नहीं।

सार: राम के पूछने पर अगस्त्य ने हनुमान का बालचरित आरम्भ किया: सूर्य को फल समझकर शिशु हनुमान आकाश में उछले, राहु और ऐरावत पर टूटे, और इन्द्र के वज्र से उनकी हनु टूटी; क्रुद्ध वायु ने श्वास रोककर सृष्टि घोंट दी, तब ब्रह्मा-प्रमुख देव उसे मनाने पहुँचे।

हनुमान का पुनर्जीवन, वरदान, और ऋषि-शाप

“पितामह को देख पुत्र-वध से पीड़ित वायु शिशु को लिए धाता के सामने खड़े हुए। चलते कुण्डल, मुकुट-माला और स्वर्ण-आभूषणों से सुशोभित वायु तीन बार नतमस्तक होकर ब्रह्मा के चरणों में गिरे। वेदविद् ब्रह्मा ने वायु को उठाकर अपने दीर्घ, अलंकृत हाथ से उस शिशु को सहलाया। ब्रह्मा के स्पर्शमात्र से हनुमान सिंचित फसल-से पुनर्जीवित हो उठे। हनुमान को सजीव देख प्राणवाहक वायु प्रसन्न होकर पूर्ववत सब प्राणियों में संचरण करने लगा। वायु-संरोध से मुक्त प्रजा वैसे प्रसन्न हुई जैसे शीत-पवन से मुक्त कमल-सरोवर।

“तब तीन-युग्म दिव्य गुणोंवाले, तीन रूपोंवाले, तीनों लोकों में आश्रित, देव-पूजित ब्रह्मा वायु को प्रसन्न करने हेतु देवों से बोले, ‘हे महेन्द्र, अग्नि, वरुण, महेश्वर और धनेश्वर, यद्यपि आप सब जानते हैं, फिर भी हित कहता हूँ, सुनिए। इस शिशु से आपका कार्य सधेगा। अतः वायु को सन्तुष्ट करने हेतु सब इसे वर दीजिए।’ तब प्रीतियुक्त, शुभ-मुख सहस्रनेत्र इन्द्र ने कमल-माला हनुमान के गले में डालकर कहा, ‘मेरे हाथ से छूटे वज्र से इसकी हनु टूटी, अतः यह कपिश्रेष्ठ “हनुमान” नाम से विख्यात होगा। मैं इसे परम अद्भुत वर देता हूँ: आज से यह मेरे वज्र से अवध्य होगा।’

“तिमिर-नाशक भगवान सूर्य ने कहा, ‘अपने तेज का सौवाँ भाग इसे देता हूँ। और जब इसमें शास्त्र पढ़ने की शक्ति आएगी, तब मैं इसे शास्त्र दूँगा, जिससे यह वाग्मी होगा; शास्त्र-ज्ञान में इसके तुल्य कोई न होगा।’ वरुण ने वर दिया कि सौ-सौ हजार वर्षों में भी मेरे पाश या जल से इसकी मृत्यु न होगी। यम ने अपने दण्ड से अवध्यता और आरोग्य दिया। पीले एक नेत्रवाले कुबेर ने कहा, ‘सन्तुष्ट होकर वर देता हूँ कि युद्धों में मेरी गदा इसकी मृत्यु न करेगी, और युद्ध में इसे अविषाद हो।’ शंकर ने परम वर दिया कि ‘यह मुझसे और मेरे आयुधों से अवध्य होगा।’ बालसूर्य-से शिशु को देख महामति शिल्पिश्रेष्ठ विश्वकर्मा ने वर दिया, ‘मेरे रचे और मन में स्थित जो दिव्य अस्त्र हैं, उनसे यह अवध्य होकर चिरजीवी होगा।’

“ब्रह्मा ने वर दिया कि ‘यह दीर्घायु, महात्मा, और ब्रह्म-सम्बन्धी सब दण्डों तथा ब्राह्मणों के शापों से अवध्य होगा। हे वायु, आपका यह पुत्र शत्रुओं को भयकर, मित्रों को अभयकर, और अजेय होगा। यह कामरूपी, कामचारी, कामग, श्रेष्ठ प्लवंग होगा; इसकी गति अव्याहत रहेगी और यह कीर्तिमान होगा। युद्ध में यह रावण-उच्छेदन के, राम को प्रिय, रोमहर्षक कर्म करेगा।’ यह कहकर वायु से विदा लेकर ब्रह्मा-प्रमुख सब देव यथागत लौट गए। वायु भी पुत्र को लेकर घर ले आए और अंजना को वरदानों की बात बताकर चले गए।

“देवों के वरदानों से बल पाकर, हे राम, अपनी सहज गति में पूर्ण समुद्र-से हनुमान शोभित हुए। वेग से भरते वह वानरपुंगव निर्भय होकर महर्षियों के आश्रमों में अपराध करने लगे: स्रुक्-भाण्ड, अग्निहोत्र और वल्कल-राशियाँ तोड़ते-छिन्न करते-नष्ट करते। ब्राह्मणों के सब शापों से ब्रह्मा द्वारा अवध्य जान, ऋषि वरदानों की शक्ति से सहते रहे। केसरी और वायु के मना करने पर भी अंजना-पुत्र मर्यादा लाँघते रहे। तब भृगु और अंगिरा-वंशज महर्षि, यद्यपि अति-क्रुद्ध या अति-कुपित नहीं, शाप दे बैठे, हे रघुश्रेष्ठ: ‘जिस बल के आश्रय से, हे वानर, आप हमें त्रास देते हैं, हमारे शाप से उसे आप चिरकाल तक न जानेंगे। जब कोई आपकी कीर्ति स्मरण कराएगा, तब आपका बल बढ़ेगा।’ महर्षियों के शाप-तेज से अपने तेज-वीर्य का ज्ञान खोकर हनुमान उन्हीं आश्रमों में मृदु-भाव से विचरने लगे।

“उन्हीं दिनों वाली-सुग्रीव के पिता ऋक्षरजा, सूर्य-से तेजस्वी, सब वानरों के राजा थे। चिरकाल राज्य कर ऋक्षरजा काल-धर्म को प्राप्त हुए, तब मन्त्रियों ने वाली को पिता-पद पर और सुग्रीव को वाली के पद (युवराज) पर बैठाया। बाल्य से ही वाली-सुग्रीव में वायु-अग्नि-सी अद्वैध, अछिद्र मैत्री रही। उसी शाप के कारण हनुमान अपना बल न जानते थे। हे राम, जब वाली-सुग्रीव में वैर उठा, तब वाली से भगाए जाते सुग्रीव, न ही हनुमान, अपना बल जानते थे। ऋषि-शाप से बल भूले हनुमान वाली के युद्ध में सुग्रीव के पास गज से रुके सिंह-से खड़े रहे।

“पराक्रम, उत्साह, प्रताप, सौशील्य, माधुर्य, नय-अनय, गाम्भीर्य, चातुर्य, वीर्य और धैर्य में हनुमान से अधिक लोक में कौन है? व्याकरण ग्रहण करने को, सूर्य से प्रश्न पूछने को उत्सुक यह अमेय कपीन्द्र महान ग्रन्थ धारण करता उदयाचल से अस्ताचल तक गया। सूत्र-वृत्ति-अर्थपद-संग्रह सहित कपीन्द्र को सिद्धि है; शास्त्र में, छन्द-गति में इनके तुल्य कोई नहीं। सब विद्याओं और तप-विधान में यह सुराचार्य बृहस्पति से स्पर्धा करता है। नव-व्याकरणार्थ का ज्ञाता यह हनुमान आपकी कृपा से ब्रह्मा-सा होगा। समुद्र-से लोक-नाशक, अग्नि-से लोक-दाहक, अन्तक-से लोक-संहारक हनुमान के सम्मुख कौन ठहरेगा?

“इनके समान अन्य महाकपीन्द्र: सुग्रीव, मैन्द, द्विविद, नील, तार, अंगद, नल, रम्भ, और भालू गज, गवाक्ष, गवय, सुदंष्ट्र, मैन्द, प्रभ, ज्योतिर्मुख, नल, हे राम, ये सब आपके निमित्त देवों ने रचे। यही सब, जो आपने पूछा, मैंने कहा; हनुमान के बाल-कर्म भी मैंने वर्णित किए।” अगस्त्य की कथा सुनकर राम-लक्ष्मण और वानर-राक्षस परम विस्मित हुए।

अगस्त्य ने राम से कहा, “यह सब आपने सुना; हमें देख और बात कर लिया, हे राम; अब हम जाते हैं।” उग्रतेज अगस्त्य का वचन सुन राघव हाथ जोड़े, नतमस्तक होकर बोले, “आज मेरे देवता, पितर, प्रपितामह प्रसन्न हैं; आपके दर्शन से हम बान्धवों सहित सदा सन्तुष्ट हैं। एक बात निवेदन योग्य है, जो स्पृहा से कहता हूँ; अनुकम्पा से वह मेरे लिए कीजिए। पौर-जानपदों को उनके कार्यों में स्थापित कर, वन से लौटकर, मैं आप सन्तों के प्रभाव से यज्ञ करूँगा। आप महावीर्य सदा मेरे यज्ञों में सदस्य बनिए, मेरे अनुग्रह के अभिलाषी; आप तप से निष्पाप हैं, आप पर निर्भर होकर मैं पितरों से अनुगृहीत और सुख पाऊँगा। अतः यज्ञ-आरम्भ पर आप सब मिलकर अवश्य यहाँ आइए।” यह सुन संशितव्रत अगस्त्य आदि ऋषि “ऐसा ही हो” कहकर जाने लगे, और यथागत लौट गए। राघव भी उसी यज्ञ-विषय का विस्मय से चिन्तन करने लगे। सूर्यास्त होने पर राजाओं-वानरों को विदा कर, यथाविधि सन्ध्या-उपासना कर, रात आरम्भ होने पर नरश्रेष्ठ राम अन्तःपुर में प्रविष्ट हुए।

एक उप-कथा: हनुमान के “अपना बल भूल जाने” का यह ऋषि-शाप ही वह कथा-यन्त्र है जिससे किष्किन्धाकाण्ड में जाम्बवान उन्हें उनकी शक्ति का स्मरण कराते हैं, और तब वे समुद्र लाँघते हैं। ध्यान दीजिए, देवों के वरदानों में राम का प्रयोजन (रावण-उच्छेदन, राम को प्रियकर कर्म) पहले से अंकित है, अर्थात हनुमान का जन्म ही रामकथा के निमित्त है।

सार: ब्रह्मा के स्पर्श से हनुमान पुनर्जीवित हुए, और सब देवों ने उन्हें “हनुमान” नाम तथा अनेक अवध्यता-वर दिए, जिनमें राम-कार्य पहले से अंकित था। उद्दण्डता पर ऋषियों ने शाप दिया कि वे स्मरण कराए जाने तक अपना बल भूले रहेंगे; कथा सुनाकर अगस्त्य ने राम से अपने यज्ञों में आने का वचन लेकर विदा ली।

मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, उत्तरकाण्ड (गीता प्रेस गोरखपुर)।