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भीष्म का अन्तिम उपदेश

कथा 11 · भागवतम् की कथाएँ

भीष्म का अन्तिम उपदेश

From the Bed of Arrows
स्कन्ध 1, अध्याय 9

अगर एक पंक्ति याद रखनी हो, तो वह यह है।

बाणों की शय्या पर, मगर मन में सब साफ़।

भीष्म का अन्तिम-समय का उपदेश।

भागवतम् 1.9

परीक्षित् ने मुनिवर शुकदेव की ओर देखा। उनके मन में एक प्रश्न देर से ठहरा हुआ था।

”भगवन्,” परीक्षित् ने धीरे से कहा, ”मेरे पास अब थोड़े ही दिन बचे हैं, और मैं एक राजा हूँ। राजा होकर मरना मुझे आता नहीं। आप बताइए, मेरे ही कुल में एक थे जो बाणों पर पड़े-पड़े अपनी मृत्यु की घड़ी का इंतज़ार करते रहे, और अन्त में श्रीकृष्ण को सामने पाकर देह छोड़ी। उस घड़ी उनके मन में क्या था?”

शुकदेव कुछ देर चुप रहे। फिर उनकी आवाज़ में एक गरमाहट आई। ”राजन्, आप अपने ही पितामह के पितामह की बात कर रहे हैं। सुनिए, उस दिन कुरुक्षेत्र में क्या हुआ था।”


महाभारत का युद्ध बीत चुका था।

धर्म की जीत हुई थी। कौरव नहीं रहे थे। पाण्डव राज-सिंहासन पर थे। पर एक मनुष्य अब भी साँस ले रहा था, और साँस लेते हुए उत्तरायण की घड़ी का इंतज़ार कर रहा था।

भीष्म।

Aged grandsire Bhishma lying upon a dense bed of arrows on the deserted Kurukshetra battlefield at dawn, his whole body pierced and resting on the arrow-shafts, eyes calm and open, gazing toward the rising winter sun as he awaits the uttarayana hour to leave his body; rich classical-Indian color painting, muted battlefield earth tones with golden sky.

अर्जुन के बाणों से वो धरती पर गिरे थे। शरीर पूरी तरह बाणों से ढका हुआ। बाणों की उसी शय्या पर पड़े-पड़े वो उत्तरायण का इंतज़ार कर रहे थे, क्योंकि देह छोड़ने के लिए वही घड़ी उन्होंने चुनी थी।

एक दिन, सूरज ने रास्ता बदला। दक्षिणायन बीता, उत्तरायण आ पहुँचा।

अब समय था।

King Yudhishthira with his four brothers Bhima, Arjuna, Nakula and Sahadeva arriving on gold-ornamented chariots drawn by fine horses to the arrow-bed, with dark-complexioned Krishna in princely yellow garment also riding among them; Yudhishthira radiant like Kubera surrounded by yakshas; ornate classical-Indian color illustration, regal procession.

राजा युधिष्ठिर, अपने भाइयों के साथ, उनके पास आए। सब सोने से जड़े रथों पर सवार थे, अच्छे-अच्छे घोड़े जुते हुए। भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव।

साथ में कृष्ण भी रथ पर चढ़कर चले। उन सबके बीच युधिष्ठिर की ऐसी शोभा थी, मानो यक्षों से घिरे स्वयं कुबेर जा रहे हों।

बहुत से ऋषि भी वहाँ आए। व्यास, नारद, धौम्य, बादरायण, बृहदश्व, भरद्वाज, अपने शिष्यों के साथ परशुराम, वसिष्ठ, इन्द्रप्रमद, त्रित, गृत्समद, असित, विश्वामित्र, गौतम, कश्यप, बृहस्पति। एक पूरा काफ़िला।

Bhishma on the arrow-bed opening his eyes, tears of love brimming, lifting his hands to honor the gathered sages (Vyasa, Narada, Parashurama, Vishvamitra and others) and worshipping four-armed Krishna seated near him; reverent classical-Indian color painting, soft light, a circle of ascetics in saffron around the dying warrior.

भीष्म ने आँखें खोलीं। उन्हें देखकर उनकी आँखें प्रेम के आँसुओं से भर गईं। उन्होंने सबका यथायोग्य सत्कार किया, फिर हृदय में बैठे श्रीकृष्ण को भी भीतर और बाहर दोनों जगह पूजा।

युधिष्ठिर के मन पर बहुत बोझ था। युद्ध तो जीता था, मगर अपने ही रिश्तेदारों को मारकर। रात उन्हें नींद नहीं आती थी।

भीष्म ने प्रेम से उन्हें देखा और पहले उन्हीं का बोझ हल्का किया।

”बेटा, बड़े कष्ट और अन्याय की बात रही कि धर्म और भगवान् के आश्रित रहकर भी आप लोगों को इतने कष्ट के साथ जीना पड़ा। पर ध्यान से सुनिए। ये सब घटनाएँ काल के अधीन हैं, श्रीहरि की ही इच्छा है। जैसे बादल वायु के वश में रहते हैं, वैसे ही लोकपालों समेत सारा संसार उन्हीं काल-रूप श्रीकृष्ण के अधीन है।”

”नहीं तो जहाँ साक्षात् धर्मपुत्र युधिष्ठिर हों, गदाधारी भीम और धनुर्धारी अर्जुन रक्षा करते हों, गाण्डीव धनुष हो और स्वयं श्रीकृष्ण आपके सुहृद् हों, वहाँ विपत्ति की कोई सम्भावना ही कहाँ? ये कालरूप श्रीकृष्ण कब क्या करना चाहते हैं, यह कोई नहीं जानता। बड़े-बड़े ज्ञानी भी इसे जानने की इच्छा करके मोहित हो जाते हैं।”

”इसलिए, बेटा, इसे ईश्वर का ही विधान समझकर आप इस अनाथ प्रजा का पालन कीजिए। अब इसके स्वामी आप हैं।”

इतना कहकर भीष्म रुके नहीं। उनके पास अब चन्द घड़ियाँ बची थीं, पर वो उन्हें युधिष्ठिर के संशय मिटाने और धर्म कह जाने में लगाना चाहते थे।

और भीष्म ने वर्ण और आश्रम के अनुसार मनुष्य के स्वाभाविक धर्म, वैराग्य और राग के अनुसार निवृत्ति और प्रवृत्ति-रूप दोनों धर्म, दान-धर्म, राज-धर्म, मोक्ष-धर्म, स्त्री-धर्म और भगवद्-धर्म, हर एक का अलग-अलग वर्णन किया। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चारों पुरुषार्थों के और उनकी प्राप्ति के साधनों के अनेक उपाख्यान और इतिहास सुनाए।

पाण्डव बैठे सुनते रहे।

पर भागवत में जो ख़ास है, वो उपदेश के बाद का हिस्सा है।

भीष्म इस प्रकार धर्म का प्रवचन कर ही रहे थे कि वही उत्तरायण की घड़ी आ पहुँची, जिसे मृत्यु को अपने वश में रखने वाले योगी-जन चाहते रहते हैं।

भीष्म एक पल रुके। उनका ध्यान भीतर मुड़ा।

Bhishma on the arrow-bed in deep meditative stillness, falling silent, withdrawing his senses inward and fixing his whole mind upon the primeval Lord Krishna standing before him with a dark tamala-blue body and flowing yellow pitambara; serene devotional classical-Indian color illustration, inner glow of focused contemplation, arrow-wounds present but pain dissolving.

उन्होंने अपनी वाणी का संयम किया। मन को हर ओर से समेटकर अपने सामने खड़े आदिपुरुष श्रीकृष्ण में लगा दिया। फिर अपनी सारी इन्द्रियों की वृत्तियों को रोक लिया।

शरीर पर बाणों की जो चोटें थीं, उनकी पीड़ा भगवान् के दर्शन-मात्र से, उस विशुद्ध धारणा से, दूर हो गई। जो कुछ अशुभ शेष था, वह नष्ट हो गया।

उन्होंने आँखें खोलीं। पर अब वो किसी और को नहीं, सिर्फ़ एक को देख रहे थे।

कृष्ण।

श्रीकृष्ण के सुन्दर चतुर्भुज विग्रह पर उस समय पीताम्बर लहरा रहा था। भीष्म की आँखें उसी पर एकटक लग गईं।

भीष्म ने बड़े प्रेम से, हाथ जोड़कर, भगवान् की स्तुति की।

”हे प्रभु,” उनकी आवाज़ धीमी मगर साफ़।

”अब मृत्यु के समय मैं अपनी यह बुद्धि, जो अनेक प्रकार के साधनों के अनुष्ठान से अत्यन्त शुद्ध और कामना-रहित हो गई है, यदुवंश-शिरोमणि अनन्त भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित करता हूँ। आप ही सदा-सर्वदा अपने आनन्दमय स्वरूप में स्थित रहते हुए लीला की इच्छा से प्रकृति को स्वीकार कर लेते हैं, जिससे यह सृष्टि-परम्परा चलती है।”

”जिनका शरीर त्रिभुवन-सुन्दर और श्याम तमाल के समान साँवला है, जिस पर सूर्य-किरणों-सा श्रेष्ठ पीताम्बर लहराता रहता है और कमल-से मुख पर घुँघराली अलकें लटकती रहती हैं, उन अर्जुन-सखा श्रीकृष्ण में मेरी निष्कपट प्रीति हो।”

और तब, बाणों की उसी शय्या से, युद्ध का वह दृश्य भीष्म के आगे फिर खुल गया, जिसमें वो श्रीकृष्ण को अपना ध्येय बना सके थे।

Bhishma's remembered battlefield vision: Krishna as charioteer in beautiful armor, his curly hair and face dusted by the dust raised by horses' hooves, his skin grazed by Bhishma's sharp arrows, standing fearless amid the war; the dying Bhishma offering his body, mind and soul to this armored Krishna; dynamic classical-Indian color battle scene framed as devotional remembrance.

”युद्ध-भूमि में घोड़ों के खुरों से उड़ी धूल जिनके घुँघराले बालों पर, मुख पर बिखर गई थी, मेरे तीखे बाणों से जिनकी त्वचा बिंध रही थी, उन सुन्दर कवच पहने श्रीकृष्ण के प्रति मेरा यह शरीर, अन्तःकरण और आत्मा समर्पित हो।”

”अर्जुन की बात सुनकर जो तुरन्त दोनों सेनाओं के बीच में अपना रथ ले आए, और वहाँ खड़े होकर अपनी दृष्टि से ही शत्रुपक्ष के सैनिकों की आयु छीन ली, उन पार्थ-सखा श्रीकृष्ण में मेरी परम प्रीति हो।”

”अर्जुन जब कौरव-सेना के मुखियाओं को देखकर पाप समझकर स्वजनों के वध से विमुख हो गया, तब जिन्होंने गीता के रूप में आत्मविद्या का उपदेश देकर उसका मोह नष्ट कर दिया, उन परमपुरुष श्रीकृष्ण के चरणों में मेरी प्रीति बनी रहे।”

”मैंने प्रतिज्ञा की थी कि श्रीकृष्ण को शस्त्र ग्रहण कराकर ही छोड़ूँगा। उसे सच करने को वे अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर, रथ से कूद पड़े और रथ का पहिया लेकर मुझ पर झपटे, मानो सिंह हाथी को मारने दौड़े। मुझ आततायी को मारने को अर्जुन के रोकने पर भी जो बलपूर्वक मेरी ओर दौड़ आए, वे ही श्रीकृष्ण मेरी एकमात्र गति हों।”

”जिनकी लटकीली सुन्दर चाल, हाव-भाव भरी चेष्टाएँ, मधुर मुसकान और प्रेम-भरी चितवन से सम्मानित गोपियाँ रासलीला में उनके अन्तर्धान हो जाने पर प्रेमोन्माद में उनकी लीलाओं का अनुकरण करके तन्मय हो गई थीं, उन्हीं श्रीकृष्ण में मेरा परम प्रेम हो।”

”जिस समय युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ हो रहा था, मुनियों और बड़े-बड़े राजाओं की भरी सभा में सब से पहले इन्हीं की मेरी आँखों के सामने पूजा हुई थी, वे ही सबकी आत्मा प्रभु आज इस मृत्यु के समय मेरे सामने खड़े हैं।”

”जैसे एक ही सूर्य अनेक आँखों से अनेक रूपों में दिखता है, वैसे ही ये अजन्मा श्रीकृष्ण अपने ही रचे अनेक शरीरधारियों के हृदय में अनेक रूपों से जान पड़ते हैं; वास्तव में तो ये एक ही हैं, और सबके हृदय में विराजमान हैं। उन्हीं श्रीकृष्ण को मैं भेद-भ्रम से रहित होकर प्राप्त हो गया हूँ।”

इस प्रकार भीष्म ने मन, वाणी और दृष्टि की वृत्तियों से आत्मस्वरूप श्रीकृष्ण में अपने-आपको लीन कर दिया।

उनके प्राण वहीं विलीन हो गए, और वो शान्त हो गए।

वहीं था अंत। बाणों की शय्या पर। भरतवंश के गौरव, हाथी-योद्धा, भीष्म पितामह, अंत में बस एक भक्त बनकर अनन्त ब्रह्म में लीन हो गए।

उन्हें अनन्त ब्रह्म में लीन जानकर सब लोग वैसे ही चुप हो गए, जैसे दिन के बीत जाने पर पक्षियों का कलरव शान्त हो जाता है।

उस समय देवता और मनुष्य नगारे बजाने लगे। साधु-स्वभाव वाले राजा उनकी प्रशंसा करने लगे और आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी।

युधिष्ठिर ने उनके मृत शरीर की अन्त्येष्टि-क्रिया करवाई और कुछ समय के लिए शोक में डूब गए। मुनियों ने बड़े आनन्द से भगवान् के रहस्यमय नामों से उनकी स्तुति की और अपने-अपने आश्रमों को लौट गए।

फिर युधिष्ठिर श्रीकृष्ण के साथ हस्तिनापुर लौटे और अपने चाचा धृतराष्ट्र तथा तपस्विनी गान्धारी को ढाढस बँधाया। पिता की अनुमति और श्रीकृष्ण की सम्मति से, समर्थ राजा युधिष्ठिर अपने वंश-परम्परागत साम्राज्य का धर्मपूर्वक शासन करने लगे।


शुकदेव एक पल को रुके।

परीक्षित् बहुत देर तक कुछ न बोले। फिर बोले, ”भगवन्, मैं डर रहा था कि मरते समय क्या कहूँ, क्या जपूँ। पितामह ने तो कुछ माँगा ही नहीं। उन्होंने बस देखा, और कह दिया कि मन उन्हीं में है।”

”वही तो, राजन्,” शुकदेव मुस्कुराए। ”आख़िरी घड़ी कोई परीक्षा नहीं है जिसमें ठीक मन्त्र याद रखना हो। सारी उम्र की प्रीति उस एक घड़ी में अपने आप उठ आती है। भीष्म ने जीवन भर जिसे धर्म के पर्दे में सँभाला, वह पर्दा गिरते ही सामने आ खड़ा हुआ। श्रीहरि।”

परीक्षित् ने सिर झुकाया। एक दिन और कम हो गया था, और आज पहली बार वो डर के बिना उसे बीतते देख रहे थे।

मन्थन

भागवत में भीष्म का अन्त एक शान्त घड़ी है। और कथाओं में चमत्कार है, ज़ोर है। यहाँ बस एक बूढ़ा योद्धा है, जो धीरे से देह छोड़ रहा है।

सारी उम्र भीष्म ने धर्म को थामे रखा। हस्तिनापुर की रक्षा की, राज-धर्म जिया, वचन निभाया। और अन्त-समय युधिष्ठिर को भी उन्होंने यही धर्म, एक-एक करके, कह दिया।

मगर आख़िरी घड़ियों में, धर्म-शास्त्र कह चुकने के बाद, वाणी का संयम किया, मन को समेटा, और जो रह गया, वह कृष्ण थे।

उन्होंने कृष्ण से यह नहीं पूछा कि अब क्या करूँ। उन्होंने केवल देखा, और मन को उन्हीं में लीन कर दिया। माँगने को कुछ बचा ही न था; उम्र के अन्तिम छोर पर एक प्रीति बस खुलकर सामने आ खड़ी हुई।

साहित्यिक-संदर्भ

भीष्म का यह अन्तिम प्रसंग श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध, अध्याय नौ में आता है। महाभारत के शान्ति-पर्व और अनुशासन-पर्व में भीष्म युधिष्ठिर को धर्म के सूत्र विस्तार से देते हैं; भागवत उसी को संक्षेप में रखकर असली भार उस अन्तिम स्तवन पर डालता है, जब वे कृष्ण को सम्बोधित करते हैं।

यहाँ जो स्तुति-श्लोक (1.9.32 से 1.9.42) हैं, उन्हें परम्परा में ‘भीष्म-स्तव-राज’ कहा गया है। भागवत में यही पहला कृष्ण-स्तोत्र है, और इसका स्वर शान्त तथा ध्यान-मय है।