भीष्म का अन्तिम उपदेश

कथा 11 · भागवतम् की कथाएँ

भीष्म का अन्तिम उपदेश

From the Bed of Arrows
स्कन्ध 1, अध्याय 9

महाभारत का युद्ध ख़त्म था।

धर्म जीता था। कौरव ख़त्म थे। पाण्डव राज्य में थे। पर एक मनुष्य अभी भी ज़िन्दा था, और वो ज़िन्दा होकर मरने के लिए तैयार था।

भीष्म।

अर्जुन के बाणों से वो धरती पर गिरा था। शरीर पूरी तरह बाणों से ढका हुआ। मगर उन्होंने सिर के लिए तकिया नहीं माँगा।

”नहीं। मुझे योद्धा का तकिया दो।”

अर्जुन ने अपने तीन बाण भीष्म के सिर के नीचे रखे। योद्धा का असली तकिया।

और भीष्म ने एक अनोखा वर पाया हुआ था। अपने पिता शान्तनु से। वो जब चाहे, तब मर सकते थे। ”इच्छा-मृत्यु।”

वो उत्तरायण का इंतज़ार कर रहे थे। उत्तरायण आरंभ होने पर ही मरना उनका choice था।

तो वो पड़े रहे। बाणों की शय्या पर। हफ़्ते। महीने। सूरज दक्षिणायन से उत्तरायण की तरफ़ धीरे-धीरे जा रहा था।

एक दिन, सूरज ने रास्ता बदला।

अब समय था।

पाण्डव वहाँ आए। युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव। द्रौपदी। कुन्ती।

साथ में कृष्ण।

बहुत से ऋषि भी आए। व्यास, नारद, धौम्य, वसिष्ठ। पूरा एक काफ़िला।

भीष्म ने आँखें खोलीं। पहले कृष्ण को देखा। आँखें झुकीं। फिर युधिष्ठिर की तरफ़ देखा।

”आ, बेटा। बैठ।”

युधिष्ठिर के मन में बहुत बोझ था। युद्ध जीता था, मगर रिश्तेदारों को मारकर। उनका मन शान्त नहीं था।

उन्होंने भीष्म से पूछा, ”दादा, हमने जो किया, क्या वो सही था? इतना खून बहाकर हमारा राज्य मायने रखता है?”

भीष्म ने उन्हें देखा। उनके पास सिर्फ़ कुछ घंटे थे। पर वो pointless बातें नहीं करना चाहते थे।

”युधिष्ठिर, ध्यान से सुन। मैं तुझे एक-एक करके धर्म के सारे प्रश्नों के उत्तर दूँगा।”

और भीष्म ने वो किया जो आज भी ”शान्ति-पर्व” और ”अनुशासन-पर्व” में लिखा है। महाभारत के सबसे लंबे हिस्से। हज़ारों श्लोक।

उन्होंने राज-धर्म बताया। दान-धर्म। आपद-धर्म। मोक्ष-धर्म। योग। साँख्य। हर एक विषय पर।

पाण्डव बैठे सुनते रहे।

पर भागवतम् में जो विशेष है, वो वो हिस्सा है जो उपदेश के बाद आता है।

जब उपदेश पूरा हो गया, तो भीष्म एक पल रुके।

उन्होंने युधिष्ठिर से कहा, ”अब तू जा।”

”दादा, मुझे एक और बात पूछनी है।”

”नहीं। अब बाक़ी का समय मेरा है।”

उन्होंने आँखें मूँदीं।

और वो जो उपदेश दे रहे थे, वो रुक गया। उनका ध्यान अंदर मुड़ा।

वो धीरे-धीरे अपने प्राण को ऊपर खींचने लगे। अपान को नीचे से, समान को बीच से, उदान को सिर की तरफ़।

उनके इर्द-गिर्द एक चमक थी।

उन्होंने आँखें फिर खोलीं। पर अब वो किसी को देख नहीं रहे थे। सिर्फ़ एक को।

कृष्ण।

कृष्ण मुस्कुराते हुए खड़े थे। पीतांबर। मुकुट। चार हाथ। शंख-चक्र-गदा-पद्म। दिव्य रूप।

भीष्म ने हाथ जोड़े।

”हे प्रभु,” उनकी आवाज़ धीमी मगर साफ़।

”इस तीर-वाली शय्या पर पड़ा एक बूढ़ा योद्धा। जिसने हज़ारों लड़ाइयाँ देखीं। जिसने राजाओं का सम्मान पाया। जिसने सब कुछ देखा।”

”पर सब कुछ देखकर भी, अंत में, बस आप ही याद आ रहे हैं। बाक़ी सब फीका।”

त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं
रविकरगौरवराम्बरं दधाने ।
वपुरलककुलावृताननाब्जं
विजयसखे रतिरस्तु मेऽनवद्या ॥
(श्रीमद्भागवत 1.9.33)

जो तीनों लोकों को लुभाने वाले हैं, जिनका रंग तमाल के पेड़ जैसा गहरा है, जो सूर्य की किरण-समान सुनहरा वस्त्र पहने हैं, जिनके मुख-कमल पर बाल लटक रहे हैं, हे विजय के मित्र, मेरी निष्कलंक प्रीति आप में हो।

उन्होंने आख़िरी प्रार्थना की।

”हे कृष्ण, मेरा मन अब आपकी ओर है। और इसी moment में, मेरा प्राण आपके चरणों में लौट जाए। यह बस मुझे चाहिए।”

”मैंने पूरी ज़िन्दगी धर्म-धर्म कहा। पर अंत में देखो, धर्म भी एक तरीक़ा था। असल में मैं आपको चाहता था। पूरे जीवन। मगर सीधे नहीं कह पाया।”

”आज कह रहा हूँ। साफ़।”

कृष्ण ने उनके सिर पर हाथ रखा।

भीष्म ने अपनी आँखें मूँदीं। एक हलकी मुस्कान। और उनकी साँस रुक गई।

उनके शरीर से एक रोशनी निकली, ऊपर की तरफ़। और कृष्ण के चरणों में मिल गई।

वहीं था अंत। बाणों की शय्या पर। हस्तिनापुर के राजा-पुत्र, हाथी-योद्धा, भीष्म पितामह, अंत में बस एक भक्त बनकर गए।

पाण्डव चुप-चाप खड़े देखते रहे। उनकी आँखें भर आईं। पर एक शान्ति भी थी।

अर्जुन ने ज़मीन पर सिर रखा।

”दादा, क्षमा करना।”

कृष्ण ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

”अर्जुन, क्षमा माँगने वाला कोई नहीं रहा। जो था, वो जा चुका। और जो जा चुका, वो मुझे मिल चुका।”

वहाँ कुछ देर सब चुप-चाप खड़े रहे।

फिर सब चले गए।

बाणों की शय्या वहीं रह गई। शरीर वहीं। पर भीष्म, असली भीष्म, अब कहीं और थे।

मन्थन

भीष्म की मृत्यु भागवतम् में एक quiet moment है। बाक़ी कई कथाओं में drama है, miracle है। यहाँ बस एक बूढ़ा आदमी है जो शरीर छोड़ रहा है।

पर इसमें एक बहुत बड़ा शिक्षण है।

भीष्म ने पूरी ज़िन्दगी ”धर्म” को follow किया। प्रतिज्ञा रखी ब्रह्मचर्य की, अपने सौतेले भाइयों के लिए। राज्य की रक्षा की। यहाँ तक कि कौरवों की तरफ़ से लड़े, क्योंकि उनका वचन था।

मगर अंत में, जब उनके पास सिर्फ़ कुछ घंटे थे, उन्होंने धर्म-शास्त्र पढ़ाया, फिर उसे एक तरफ़ रखा। उनका असली focus कृष्ण थे।

यह भागवतम् का एक central insight है। धर्म ज़रूरी है। पर धर्म एक रास्ता है, मंजिल नहीं। मंजिल भगवान हैं। अगर रास्ते को मंजिल समझ लो, तो आप बीच में ही रुक जाते हो।

और एक बात। भीष्म ने कृष्ण से पूछा नहीं ”मुझे क्या करना है?” उन्होंने सिर्फ़ देखा, और कहा, ”आप ही पर मेरा ध्यान हो।” यह माँगना नहीं था, यह declaring था। एक last act।

उद्धव के लिए, अर्जुन के लिए, गोपियों के लिए, हम सब के लिए, अंत में सिर्फ़ इतना ही है। एक last glance। एक last declaration।