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तीर्थों की महिमा, अंगिरा का उपदेश
युधिष्ठिर ने कहा कि कहा गया है कि तीर्थयात्रा पुण्यप्रद है, पवित्र जल में स्नान पुण्यप्रद है, और ऐसे जलों की महिमा सुनना भी पुण्यप्रद है, अतः इस पृथ्वी के पवित्र तीर्थ बताइए। भीष्म ने कहा कि पृथ्वी के तीर्थों की यह गणना अंगिरा ने की थी। एक बार कठोर व्रती गौतम ने, वन में निवास करते शान्त-आत्मा महर्षि अंगिरा के पास जाकर पूछा कि पृथ्वी के पवित्र जलों में स्नान करने से परलोक में कौन-से पुण्य मिलते हैं। तब अंगिरा ने उन्हें यह सुनाया।
अंगिरा ने कहा कि चन्द्रभागा या वितस्ता में, जिनकी लहरें सदा नाचती रहती हैं, उपवास सहित सात दिन स्नान करनेवाला सब पापों से मुक्त होकर तपस्वी का पुण्य पाता है। काश्मीर से बहकर सिन्धु में मिलनेवाली अनेक नदियों में स्नान करनेवाला सद्आचरण पाकर स्वर्ग जाता है। पुष्कर, प्रभास, नैमिष, सागर, देविका, इन्द्रमार्ग और स्वर्णविन्दु में स्नान करनेवाला अप्सराओं की वन्दना पाते हुए दिव्य रथ पर बैठकर स्वर्ग जाता है। हिरण्यविन्दु में एकाग्र मन से डुबकी लगाकर, फिर कुशेशय और देवेन्द्र में स्नान कर मनुष्य सब पापों से मुक्त होता है। गन्धमादन पर्वत के पास इन्द्रतोय और कुरंग देश की करतोया में तीन दिन उपवास कर शुद्ध शरीर से स्नान करनेवाला अश्वमेध का पुण्य पाता है। गंगाद्वार, कुशावर्त, नीत पर्वतों के विल्वक और कनखल में स्नान करनेवाला सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग जाता है।
अंगिरा ने आगे कहा कि जो ब्रह्मचारी बनकर, क्रोध जीतकर, सत्य और सब प्राणियों पर करुणा साधते हुए जल-परदा (जल का सरोवर) में स्नान करे, वह अश्वमेध का पुण्य पाता है। जहाँ भागीरथी-गंगा उत्तर की ओर बहती हैं, वह स्थान स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल का संगम कहा जाता है, वहाँ माहेश्वर को प्रिय उस तीर्थ में एक मास उपवास कर स्नान करनेवाला देवताओं के दर्शन का अधिकारी हो जाता है। सप्तगंगा, त्रिगंगा और इन्द्रमार्ग में पितरों को जलांजलि देनेवाले को, यदि पुनर्जन्म लेना हो, तो अमृत भोजन के रूप में मिलता है। शुद्ध शरीर-मन से नित्य अग्निहोत्र करते हुए एक मास उपवास कर महाश्रम में स्नान करनेवाला एक मास में सिद्धि पाता है। तीन दिन उपवास और चित्त-शुद्धि के साथ भृगु-कुण्ड के बड़े सरोवर में स्नान करनेवाला ब्रह्महत्या के पाप से भी मुक्त होता है। कन्याकूप में स्नान और वालका में आचमन करनेवाला देवताओं में भी यश पाता है। देविका, सुन्दरिका सरोवर और अश्विनी तीर्थ में स्नान करनेवाला अगले जन्म में सुन्दर रूप पाता है। पन्द्रह दिन उपवास कर महागंगा और कृत्तिकांगारक में स्नान करनेवाला सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग जाता है। वैमानिक और किंकिणिका में स्नान करनेवाला इच्छानुसार सर्वत्र जाने की शक्ति पाकर अप्सराओं के लोक में आदर पाता है।
अंगिरा ने और तीर्थ गिनाए कि कालिका आश्रम में विपाशा में तीन दिन ब्रह्मचर्य से स्नान करनेवाला पुनर्जन्म के बन्धन को पार कर जाता है। कृत्तिकाओं के आश्रम में स्नान कर, पितरों को जल देकर और महादेव को तृप्त कर मनुष्य शुद्ध होकर स्वर्ग जाता है। तीन दिन उपवास कर महापुर में स्नान करनेवाला सब चर-अचर और दो पैरवाले प्राणियों के भय से मुक्त होता है। देवदारु वन में स्नान कर, पितरों को जल देकर सात रात शुद्ध रहकर ठहरनेवाला देवलोक जाता है। सरस्तम्ब, कुशस्तम्भ और द्रोणशर्मपद के जलप्रपातों में स्नान करनेवाला अप्सराओं के लोक में सेवा पाता है। उपवास कर चित्रकूट, जनस्थान और मन्दाकिनी के जल में स्नान करनेवाला राजसी ऐश्वर्य पाता है। शम्या आश्रम में पन्द्रह दिन रहकर स्नान करनेवाला इच्छानुसार अन्तर्धान की शक्ति पाता है। कौशिकी तीर्थ में शुद्ध हृदय से तीन दिन निराहार रहनेवाला अगले जन्म में गन्धर्वों के सुखद लोक का अधिकारी होता है। गन्धतारक तीर्थ में एक मास निराहार रहनेवाला इच्छानुसार अन्तर्धान की शक्ति और इक्कीस दिन बाद स्वर्गारोहण पाता है। मातंग सरोवर में स्नान करनेवाला एक रात में सिद्धि पाता है।
अंगिरा ने प्रयाग की महिमा विशेष रूप से कही कि अनलम्ब, सनातन अन्धक, नैमिष, या स्वर्ग तीर्थ में स्नान कर इन्द्रियाँ जीतते हुए पितरों को जल देनेवाला नर-यज्ञ का पुण्य पाता है। गंगाह्रद और उत्पलवन तीर्थ में एक मास नित्य पितरों को जल देनेवाला अश्वमेध का पुण्य पाता है। गंगा-यमुना के संगम और कालंजर पर्वत के तीर्थ में एक मास नित्य पितरों को जल देनेवाला दस अश्वमेधों का पुण्य पाता है। दस सहस्र तीर्थ और तीन कोटि अन्य तीर्थ माघ मास में प्रयाग में आ मिलते हैं। जो संयमी होकर कठोर व्रत के साथ माघ में प्रयाग में स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग जाता है। अस्मपृष्ठ, निरविन्द पर्वत और क्रौंचपदी, ये तीनों गया में हैं, इनमें स्नान से क्रमशः एक, दो और तीन ब्रह्महत्याओं का पाप धुलता है।
अंगिरा ने अन्त में हिमवान की महिमा कही कि वह पर्वतराज पवित्र है, शंकर का श्वसुर है, सब रत्नों की खान और सिद्ध-चारणों का आश्रय है। जो वेदज्ञ इस जीवन को क्षणभंगुर जानकर, शास्त्र-विधि से अन्न-जल त्यागकर, देवताओं और तपस्वियों को नमन कर उन पर्वतों पर शरीर त्यागता है, वह सिद्धि पाकर ब्रह्म के सनातन लोकों को जाता है। जो तीर्थ बहुत दुर्गम हों, उन्हें मन से ही स्मरण कर लेना चाहिए। यह उपदेश ब्राह्मणों और सत्पुरुषों को सुनाना चाहिए। अंगिरा ने यह गौतम को सुनाया था, और स्वयं अंगिरा ने इसे कश्यप से पाया था। जो इसे नित्य पढ़ता है वह सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग जाता है, और जो सुनता है वह अगले जन्म में अच्छे कुल में जन्म लेकर पूर्वजन्म की स्मृति से युक्त होता है।
समझने की कुंजी (स्थान): चन्द्रभागा, वितस्ता, विपाशा = आज की चिनाब, झेलम और ब्यास नदियाँ। प्रयाग = गंगा-यमुना का संगम, आज प्रयागराज। गया = बिहार का तीर्थ, पितृ-श्राद्ध के लिए प्रसिद्ध। भागीरथी = गंगा, जिसे भगीरथ पृथ्वी पर लाए। हिमवान = हिमालय, पार्वती के पिता, इसलिए शंकर के श्वसुर। अश्वमेध / नर-यज्ञ / पुण्डरीक = प्राचीन महायज्ञों के नाम, जिनके पुण्य की तुलना तीर्थ-स्नान से की गई।
सार: अंगिरा से गौतम को मिला यह तीर्थ-कोश पूरे भारतवर्ष की पवित्र नदियों और सरोवरों को एक माला में पिरो देता है, जहाँ हर स्नान का अलग फल है। शिखर पर प्रयाग और हिमवान हैं, और परम बड़ी सीख यह कि दुर्गम तीर्थों को मन से ही स्मरण कर लेना भी पुण्य देता है।
ऋषियों का आगमन, और भागीरथी गंगा की महिमा
वैशम्पायन ने कहा कि बुद्धि में बृहस्पति, क्षमा में स्वयं ब्रह्मा, पराक्रम में इन्द्र और तेज में सूर्य के समान, गंगा-पुत्र भीष्म, जिन्हें अर्जुन ने युद्ध में गिराया था, बाणों की उस शय्या पर लेटे थे जिसकी वीर अभिलाषा करते हैं, और उस मांगलिक समय की प्रतीक्षा कर रहे थे जब वे शरीर त्याग सकें। उन्हें देखने अनेक महर्षि वहाँ आए। उनमें अत्रि, वसिष्ठ, भृगु, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु थे। अंगिरा, गौतम, अगस्त्य, सुमति, विश्वामित्र, स्थूलशिरा, संवर्त, प्रमति और दम थे। बृहस्पति, उशना, व्यास, च्यवन, कश्यप, ध्रुव, दुर्वासा, जमदग्नि, मार्कण्डेय और गालव थे। भरद्वाज, रैभ्य, यवक्रीत और त्रित थे। स्थूलाक्ष, सवलाक्ष, कण्व, मेधातिथि, कृश, नारद, पर्वत, सुधन्वा, एकत और द्वित थे। नितम्भु, भुवन, धौम्य, सतानन्द, अकृतव्रण, जमदग्नि-पुत्र राम और कच, ये सब महात्मा महर्षि भीष्म को बाण-शय्या पर लेटे देखने आए।
युधिष्ठिर ने अपने भाइयों सहित उन महर्षियों की क्रम से विधिवत पूजा की। वे ऋषि बैठकर आपस में बातें करने लगे, और उनकी वह बातचीत भीष्म के विषय में थी, सब इन्द्रियों को मधुर लगनेवाली। अपने ही विषय में वह चर्चा सुनकर भीष्म आनन्द से भर गए और स्वयं को मानो स्वर्ग में ही अनुभव करने लगे। फिर वे ऋषि भीष्म और पाण्डवों से अनुमति लेकर सबके देखते-देखते अन्तर्धान हो गए। पाण्डवों ने अदृश्य हो जाने पर भी उन्हें बार-बार प्रणाम किया। उन ऋषियों के तप के तेज से दिशाएँ देदीप्यमान हो उठीं, और पाण्डव विस्मित हो उनकी महिमा पर भीष्म से चर्चा करने लगे। चर्चा समाप्त होने पर युधिष्ठिर ने भीष्म के चरणों में सिर रखकर पुनः धर्म-सम्बन्धी प्रश्न आरम्भ किए।
युधिष्ठिर ने पूछा कि कौन-से देश, प्रान्त, आश्रम, पर्वत और नदियाँ पवित्रता में सर्वोपरि हैं। भीष्म ने कहा कि इस सम्बन्ध में शिल और उंछ व्रत का पालन करनेवाले एक ब्राह्मण तथा एक सिद्ध ऋषि के संवाद की पुरानी कथा कही जाती है। एक बार पर्वतों से सजी इस समूची पृथ्वी पर घूमता हुआ वह सिद्ध ऋषि शिल-व्रती गृहस्थ ब्राह्मण के घर पहुँचा। ब्राह्मण ने विधिवत स्वागत किया, और अतिथि ने सुखपूर्वक रात बिताई। अगली सुबह नित्य-कर्म कर शुद्ध होकर ब्राह्मण ने प्रसन्नता से अतिथि के पास जाकर वेदों और उपनिषदों पर चर्चा की, और अन्त में वही प्रश्न पूछा जो युधिष्ठिर ने भीष्म से पूछा था।
सिद्ध ऋषि ने उत्तर दिया कि वे देश, प्रान्त, आश्रम और पर्वत पवित्रता में सर्वोपरि हैं जिनके बीच से या जिनके पास से वह नदियों में श्रेष्ठ भागीरथी बहती है। जो फल तप, ब्रह्मचर्य, यज्ञ या त्याग से मिलता है, वही केवल भागीरथी के तट पर रहकर और उसके पवित्र जल में स्नान कर मिल जाता है। जिनके शरीर पर भागीरथी का पवित्र जल छिड़का गया हो या जिनकी अस्थियाँ उस धारा में रखी गई हों, वे कभी स्वर्ग से नहीं गिरते। सौ यज्ञ भी वह पुण्य नहीं दे सकते जो संयमी जन गंगा में स्नान से पाते हैं। जैसे रात का अन्धकार सूर्योदय से मिट जाता है, वैसे गंगा-स्नान करनेवाला सब पापों से धुलकर तेज से चमक उठता है। जो देश और दिशाएँ गंगा-जल से रहित हैं, वे चन्द्रहीन रात या पुष्पहीन वृक्ष के समान हैं।
सिद्ध ऋषि ने गंगा की स्तुति जारी रखी कि जैसे देवताओं को अमृत, पितरों को स्वधा और नागों को सुधा प्रिय है, वैसे ही मनुष्यों को गंगा-जल। जैसे भूखे बालक माँ से अन्न माँगते हैं, वैसे ही परम कल्याण चाहनेवाले गंगा की सेवा करते हैं। जैसे ब्रह्मा का लोक सब लोकों में श्रेष्ठ है, वैसे ही गंगा सब नदियों में श्रेष्ठ है। गंगा के तट की रेत से लिपटा मनुष्य स्वयं को दिव्य अंगराग से सजा स्वर्गवासी अनुभव करता है। जब गंगा-जल के कणों से भीगी वायु किसी के शरीर को छूती है, तो वह तुरन्त सब पापों से शुद्ध हो जाता है। गंगा को धारण कर, छूकर और उसमें स्नान कर मनुष्य अपने सात पीढ़ी ऊपर के पूर्वजों और सात पीढ़ी नीचे के वंशजों का उद्धार कर देता है। गंगा की चर्चा सुनकर, वहाँ जाने की इच्छा से, उसका जल पीकर, छूकर और उसमें स्नान कर मनुष्य अपने पितृ-कुल और मातृ-कुल दोनों का उद्धार करता है।
सिद्ध ऋषि ने कहा कि जो शारीरिक सामर्थ्य रखते हुए भी पवित्र गंगा का दर्शन नहीं चाहते, वे जन्मान्ध, मृत, या पक्षाघात से अपंग के समान हैं। जब वह परम पवित्र धारा आकाश से गिरी, तब महेश्वर ने उसे अपने सिर पर धारण किया, वही धारा स्वर्ग में पूजी जाती है। तीनों लोक उसकी तीन धाराओं से सुशोभित हैं। जैसे स्वर्ग में देवताओं के लिए सूर्य-किरण, पितरों के लिए चन्द्रमा और मनुष्यों के लिए राजा है, वैसे ही सब नदियों के लिए गंगा है। माता, पिता, पुत्र, पत्नी या धन के वियोग में भी वह शोक नहीं होता जो गंगा के वियोग में होता है। गंगा को आदर देनेवाला उसे प्रिय हो जाता है, यदि वह मन को पूर्णतः उसी में लगाकर, इस भाव से कि संसार में और कुछ ऐसी वन्दना के योग्य नहीं, अटल श्रद्धा से उसकी आराधना करे।
सिद्ध ऋषि ने और कहा कि गंगा की कीर्ति समूचे विश्व में फैली है, क्योंकि उसने सगर के सब पुत्रों को, जो भस्म हो गए थे, यहाँ से स्वर्ग पहुँचाया। गंगा को प्रिश्नि अर्थात् विष्णु की माता के समान माना गया है, वही वाणी से एक है, ऐश्वर्य आदि छह गुणों को देनेवाली है, और सब प्राणियों का परम आश्रय है। गंगा ने देवसेनापति गुह (कार्तिकेय) को अपनी कोख में धारण किया, और स्वर्ण को भी उसी कोख में धारण करती है। गंगा हिमवान की पुत्री, हर की पत्नी, और स्वर्ग-पृथ्वी दोनों का आभूषण है। आकाश से गिरकर उसे शिव ने सिर पर धारण किया। वह विष्णु के चरणों से निकली, अत्यन्त पुरातन और पवित्र है। जिन्होंने तप से सब देवताओं और परमेश्वर विष्णु को तृप्त कर भगीरथ गंगा को पृथ्वी पर लाए, उनकी शरण में जाकर मनुष्य यहाँ और परलोक में हर भय से मुक्त होता है।
सिद्ध ऋषि ने विनम्रता से अन्त किया कि उसने बुद्धि-भर गंगा के गुणों का एक छोटा अंश ही कहा है, उसकी पूरी महिमा कहने में वह असमर्थ है। मेरु के पत्थर या सागर के जल कोई गिन ले, पर गंगा-जल के गुण नहीं गिने जा सकते। यह सुनकर आप भी, श्रद्धा और भक्ति से, मन-वचन-कर्म से इनका आदर कीजिए, तो तीनों लोकों में यश पाएँगे। मेरी प्रार्थना है कि परम-धन्या गंगा आपके और मेरे हृदय को सदा धर्ममय गुणों से भरें।
भीष्म ने आगे कहा कि उस सिद्ध ऋषि ने शिल-व्रती ब्राह्मण को गंगा की अनन्त महिमा सुनाकर आकाश में आरोहण किया। वह ब्राह्मण उन वचनों से जागकर गंगा की विधिवत आराधना कर उच्च सिद्धि को प्राप्त हुआ। हे कुन्ती-पुत्र, आप भी बड़ी भक्ति से गंगा की शरण में जाइए, तो उसके फल-स्वरूप उत्तम सिद्धि पाएँगे। वैशम्पायन ने कहा कि गंगा की यह स्तुति सुनकर युधिष्ठिर और उनके भाई बड़े आनन्द से भर गए, और जो इस पवित्र प्रसंग को पढ़ता या सुनता है वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।
एक उप-कथा: ऋषि ने जिस सगर-पुत्रों के उद्धार का उल्लेख किया, वह गंगावतरण की मूल कथा है। राजा सगर के साठ हजार पुत्र कपिल मुनि के कोप से भस्म हो गए थे। उनके वंशज भगीरथ ने घोर तप कर गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा, जिसके वेग को शिव ने अपनी जटा में धारण कर सँभाला, और गंगा-जल के स्पर्श से वे पूर्वज तर गए। इसी से गंगा का एक नाम भागीरथी पड़ा।
सार: भीष्म ने एक सिद्ध ऋषि के मुख से गंगा का सम्पूर्ण माहात्म्य कहा, कि गंगा-तट पर रहना ही तप, यज्ञ और त्याग का फल दे देता है, और एक स्नान सात पीढ़ियों को तार देता है। ऋषि ने विनम्रता से माना कि वह उस अनन्त महिमा का अंश-मात्र ही कह पाया।
मातंग और गधी का संवाद, ब्राह्मणत्व की दुर्लभता

युधिष्ठिर ने पूछा कि क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र किस प्रकार ब्राह्मण का पद पा सकता है, क्या कठोर तप से, धर्म-कर्म से, या शास्त्र-ज्ञान से। भीष्म ने कहा कि ब्राह्मण का पद इन तीनों वर्गों के लिए अप्राप्य है। वह सब प्राणियों में सर्वोच्च है। अनगिनत योनियों में बार-बार जन्म लेते हुए मनुष्य अन्ततः किसी जन्म में ब्राह्मण रूप में जन्म लेता है। इस सम्बन्ध में मातंग और एक गधी के संवाद की पुरानी कथा है।
भीष्म ने सुनाया कि किसी समय एक ब्राह्मण को एक पुत्र मिला, जो यद्यपि भिन्न वर्ग के व्यक्ति से उत्पन्न हुआ था, पर जिसके बाल्य और यौवन के संस्कार ब्राह्मणों के विधान से हुए। वह बालक मातंग कहलाया और सब गुणों से सम्पन्न था। उसके पिता ने यज्ञ करने की इच्छा से उसे आवश्यक सामग्री इकट्ठी करने का आदेश दिया। पिता की आज्ञा पाकर वह गधे से जुते एक तीव्र रथ पर सवार होकर निकला। उस रथ में जुता गधा अल्पायु था, इसलिए लगाम न मानकर वह रथ को अपनी माता गधी के पास ले गया। इससे असन्तुष्ट होकर मातंग ने उसकी नाक पर बार-बार अंकुश मारा। अपने बच्चे की नाक पर वे प्रहार के निशान देखकर, उसके लिए स्नेह से भरी गधी बोली।
गधी ने कहा कि हे बच्चे, इस व्यवहार का शोक मत कीजिए। आपको हाँकनेवाला चाण्डाल है। ब्राह्मण में ऐसी कठोरता नहीं होती। ब्राह्मण सब प्राणियों का मित्र, गुरु और रक्षक कहा गया है, वह किसी प्राणी को इतनी निर्दयता से कैसे दण्ड दे सकता है। यह तो दुष्कर्मी है, इसे आप जैसे कोमल आयुवाले पर भी दया नहीं। यह अपने जन्म-वर्ग को ही सिद्ध कर रहा है। अपने पिता से पाई इसकी प्रकृति उन दया और कोमलता के भावों को उठने ही नहीं देती जो ब्राह्मण में स्वाभाविक हैं।
गधी के ये कठोर वचन सुनकर मातंग तुरन्त रथ से उतरकर बोला कि हे भद्रे, बताइए, मेरी माता किस दोष से दूषित है, और आप कैसे जानती हैं कि मैं चाण्डाल हूँ। बिना देर किए उत्तर दीजिए कि मेरा ब्राह्मणत्व कैसे नष्ट हुआ, यह आद्योपान्त बताइए। गधी ने कहा कि काम से उत्तेजित एक ब्राह्मणी पर नाई का काम करनेवाले एक शूद्र ने आपको उत्पन्न किया, इसलिए आप जन्म से चाण्डाल हैं, आपका ब्राह्मणत्व है ही नहीं।
गधी के ये वचन सुनकर मातंग घर लौट गया। लौटते देख पिता ने पूछा कि मैंने आपको यज्ञ-सामग्री जुटाने के कठिन कार्य पर भेजा था, आप उसे पूरा किए बिना क्यों लौट आए, क्या सब कुशल है। मातंग ने कहा कि जिसका कोई निश्चित जन्म-वर्ग न हो, या जो अति नीच वर्ग का हो, वह सुखी कैसे हो सकता है। हे पिता, जिसकी माता दूषित हो, वह कैसे प्रसन्न रहे। यह गधी, जो मानो मनुष्य से बढ़कर है, कहती है कि मैं एक शूद्र से ब्राह्मणी पर उत्पन्न हूँ। इसी से मैं अब घोर तप करूँगा। यह कहकर वह महान वन में जाकर कठोरतम तप करने लगा।
ब्राह्मण-पद को सुखपूर्वक पाने के लिए किए उस तप से मातंग देवताओं को भी तपाने लगा। तब देवराज इन्द्र प्रकट होकर बोले कि हे मातंग, आप सब मानवीय सुख त्यागकर इस शोक में समय क्यों बिता रहे हैं, मैं आपको वर देता हूँ, माँग लीजिए। मातंग ने कहा कि ब्राह्मणत्व पाने की इच्छा से मैंने यह तप आरम्भ किया है, उसे पाकर ही घर लौटूँगा, यही वर माँगता हूँ। इन्द्र ने कहा कि हे मातंग, जो ब्राह्मण-पद आप चाहते हैं वह आपके लिए सचमुच अप्राप्य है, क्योंकि अशुद्ध योनि में उत्पन्न लोग उसे नहीं पा सकते। हे मूर्ख-बुद्धि, इस प्रयत्न पर अड़े रहे तो विनाश को प्राप्त होंगे। अतः इस व्यर्थ प्रयास से तुरन्त विरत हो जाइए। चाण्डाल-योनि में जन्मा व्यक्ति देवों, असुरों और मनुष्यों में परम पवित्र माने जानेवाले उस पद को कभी नहीं पा सकता।
समझने की कुंजी (अवधारणा): यह कथा वर्ण को जन्म से जोड़ती है, जो उस युग के शास्त्रीय मत का प्रतिनिधित्व करती है। महाभारत स्वयं अन्यत्र (जैसे युधिष्ठिर-नहुष संवाद में) वर्ण को आचरण से भी जोड़ता है, इसलिए इसे एकमात्र अन्तिम मत न मानकर परम्परा का एक स्वर समझना उचित है। चाण्डाल = नीचतम मानी गई मिश्र-जन्म जाति। अंकुश = पशु को हाँकने का नुकीला डंडा।
सार: गधी के मुख से मातंग को अपने जन्म का सत्य पता चला कि वह ब्राह्मणी और शूद्र की सन्तान है। आहत होकर वह तप में जुट गया, पर इन्द्र ने आकर कहा कि ब्राह्मणत्व तप से नहीं पाया जा सकता, वह केवल जन्म से मिलता है।
मातंग का अटल तप, और इन्द्र का योनि-क्रम का उपदेश
भीष्म ने कहा कि इन्द्र के समझाने पर भी मातंग ने उनकी बात नहीं सुनी, और एक पैर पर सौ वर्ष खड़ा रहा। इन्द्र फिर प्रकट होकर बोले कि हे बालक, ब्राह्मणत्व अप्राप्य है, इसकी इच्छा से आप विनाश को प्राप्त होंगे, ऐसा साहस मत कीजिए, यह आपके लिए धर्म-मार्ग नहीं। इन्द्र ने योनियों का क्रम बताया कि पशु-योनि से मनुष्यता मिलती है, फिर मनुष्य पुक्कस या चाण्डाल रूप में जन्म ले सकता है। उस पापमय योनि में बहुत काल भटककर, सहस्र वर्ष बिताने पर शूद्र-पद मिलता है। शूद्र-योनि में भी बहुत काल भटकना पड़ता है। तीस सहस्र वर्ष बाद वैश्य-पद मिलता है। वहाँ बहुत काल बिताकर, शूद्र-काल से साठ गुने समय बाद क्षत्रिय-वर्ग मिलता है।
इन्द्र ने आगे बताया कि क्षत्रिय-योनि में बहुत काल बिताने पर, उस अन्तिम काल को साठ से गुणा करने पर मनुष्य पतित ब्राह्मण रूप में जन्म लेता है। उसमें भी बहुत काल भटककर, उस काल को दो सौ से गुणा करने पर शस्त्र-व्यवसाय करनेवाले ब्राह्मण कुल में जन्म होता है। वहाँ बहुत काल बिताकर, उसे तीन सौ से गुणा करने पर गायत्री आदि पवित्र मन्त्रों के पाठी ब्राह्मण कुल में जन्म होता है। वहाँ बहुत काल भटककर, उसे चार सौ से गुणा करने पर समस्त वेद-शास्त्र के ज्ञाता ब्राह्मण कुल में जन्म होता है। उस स्थिति में भी जब वह भटकता है, तब हर्ष-शोक, राग-द्वेष, अभिमान और दुर्वचन उसमें घुसकर उसे दीन बनाने का प्रयत्न करते हैं। यदि वह इन शत्रुओं को जीत ले तो उच्च गति पाता है, और यदि ये उसे जीत लें तो वह ताड़ वृक्ष के शिखर से गिरते व्यक्ति की भाँति उस उच्च पद से गिर जाता है। यह निश्चित जानकर हे मातंग, आप कोई और वर माँगिए, क्योंकि चाण्डाल-जन्मे आपके लिए ब्राह्मणत्व अप्राप्य है।
समझने की कुंजी (संख्या): इन्द्र का योनि-क्रम विशाल कल्प-कालों को गुणनफल से दर्शाता है, जो अक्षरशः गणित न होकर यह भाव जगाता है कि ऊर्ध्वगति असंख्य जन्मों की क्रमिक तपस्या से होती है। पुक्कस से शूद्र, फिर वैश्य, क्षत्रिय, पतित ब्राह्मण, और अन्ततः पूर्ण-वेदज्ञ ब्राह्मण, यह सीढ़ी कितनी लम्बी है, यही ‘साठ गुना, दो सौ गुना’ आदि से जताया गया है।
सार: इन्द्र ने मातंग को योनियों की लम्बी सीढ़ी दिखाई कि ब्राह्मणत्व तक पहुँचने में असंख्य जन्मों का क्रम लगता है, और वहाँ पहुँचकर भी राग-द्वेष से गिरा जा सकता है। फिर भी उन्होंने मातंग को कोई और वर माँगने को कहा।
मातंग की अन्तिम याचना और वर
भीष्म ने कहा कि इन्द्र के समझाने पर भी मातंग ने जो कहा गया वह नहीं माना। संयमी व्रत और शुद्ध आत्मा से वह एक पैर पर सहस्र वर्ष खड़ा रहकर योग-ध्यान में डूबा रहा। सहस्र वर्ष बीतने पर इन्द्र फिर आए और वही बात कही। मातंग ने पूछा कि सहस्र वर्ष एक पैर पर, गहरे ध्यान में, ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करते हुए मैंने बिताए, फिर भी मुझे ब्राह्मणत्व क्यों नहीं मिला। इन्द्र ने उत्तर दिया कि चाण्डाल-जन्मा किसी भी प्रकार ब्राह्मणत्व नहीं पा सकता, अतः कोई और वर माँग लीजिए ताकि आपका यह सारा श्रम व्यर्थ न जाए।

यह सुनकर मातंग शोक से भर गया। वह प्रयाग गया और वहाँ सौ वर्ष पैर के पंजों पर खड़ा रहा। ऐसी दुस्सह योग-साधना से वह अत्यन्त कृश हो गया, उसकी नसें-धमनियाँ उभरकर दिखने लगीं, और वह केवल हड्डी-चमड़ी का रह गया। सुना जाता है कि गया में वह तप करते-करते थककर भूमि पर गिर पड़ा। प्राणियों के हितैषी, वर देनेवाले इन्द्र उसे गिरते देख तुरन्त वहाँ आए और उसे थाम लिया।
इन्द्र ने कहा कि हे मातंग, आप जो ब्राह्मणत्व चाहते हैं वह आपके योग्य नहीं, और अप्राप्य है, आपके लिए तो उसमें अनेक संकट हैं। ब्राह्मण की पूजा से मनुष्य सुख पाता है, और उससे विमुख रहकर दुःख। ब्राह्मण सब प्राणियों के लिए प्रिय वस्तु का दाता और उनके पास जो है उसका रक्षक है। ब्राह्मणों के ही द्वारा पितर और देवता तृप्त होते हैं। अनगिनत योनियों में बार-बार जन्म लेकर कोई किसी जन्म में ब्राह्मणत्व पाता है, अशुद्ध-आत्मा वह कभी नहीं पाते, अतः इसे छोड़िए, कोई और वर माँगिए।
मातंग ने पीड़ा से कहा कि हे शक्र, मैं तो पहले से दुःखी हूँ, आप मुझे और क्यों पीड़ित करते हैं, यह तो मरे हुए पर प्रहार करना है। आप कहते हैं कि ब्राह्मणत्व अन्य तीन वर्गों के लिए अप्राप्य है, फिर भी जो स्वाभाविक रूप से उसे पा गए हैं, वे भी सदा उस पर टिके नहीं रहते, क्योंकि कौन-से पाप ब्राह्मण नहीं करते। जो इतने दुर्लभ ब्राह्मणत्व को पाकर भी उसके धर्मों का पालन न कर उसे बनाए नहीं रखते, वे संसार में सबमें अधम हैं। मैं तो आत्म-सन्तुष्ट हूँ, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों से परे हूँ, सांसारिक विषयों से अलिप्त हूँ, सब प्राणियों पर करुणा और आत्म-संयम का पालन करता हूँ, फिर मैं उस पद के योग्य क्यों नहीं माना जाता। कितना अभागा हूँ कि माता के दोष से इस दशा को पहुँचा, यद्यपि मेरा आचरण अधार्मिक नहीं। निस्सन्देह नियति को व्यक्तिगत प्रयत्न से न तो टाला जा सकता है न जीता जा सकता है, क्योंकि इतने अटल प्रयत्नों पर भी मैं जिस वस्तु पर हृदय लगा बैठा हूँ उसे नहीं पा सका। ऐसी स्थिति में, हे धर्मात्मन्, यदि मैं आपकी कृपा या थोड़े पुण्य का अधिकारी हूँ तो मुझे कोई और वर दीजिए।
इन्द्र ने कहा कि वर माँगिए। तब मातंग ने माँगा कि मुझे इच्छानुसार रूप धारण करने और आकाश में विचरण करने की शक्ति मिले, मैं जिस सुख की इच्छा करूँ वह भोगूँ, और मुझे ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों दोनों की स्वेच्छा से की गई पूजा मिले। हे देव, मैं सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ, ऐसा भी कीजिए जिससे मेरा यश संसार में सदा बना रहे। इन्द्र ने कहा कि आप एक विशेष छन्द-माप के देवता के रूप में प्रसिद्ध होंगे और सब स्त्रियों की पूजा पाएँगे, आपका यश तीनों लोकों में अद्वितीय होगा। यह वर देकर इन्द्र वहीं अन्तर्धान हो गए। मातंग भी प्राण त्यागकर उच्च पद को प्राप्त हुआ। हे भारत, इस प्रकार ब्राह्मणत्व अति उच्च है, और जैसा स्वयं इन्द्र ने कहा, वह जन्म के स्वाभाविक मार्ग के अतिरिक्त यहाँ अप्राप्य है।
सार: मातंग ने सहस्रों वर्ष तप किया, अपना शरीर हड्डियों का ढाँचा बना दिया, पर इन्द्र अडिग रहे कि ब्राह्मणत्व जन्म से ही मिलता है। मातंग ने नियति की हार स्वीकार कर अन्ततः रूप-परिवर्तन, आकाश-विचरण और अमर यश का वर माँग लिया और उच्च गति को प्राप्त हुआ।
राजर्षि वीतहव्य का ब्राह्मणत्व
युधिष्ठिर ने कहा कि यह महान कथा मैंने सुनी, और आपने कहा कि ब्राह्मणत्व अति दुर्लभ है। पर सुना जाता है कि प्राचीन काल में विश्वामित्र ने ब्राह्मणत्व पाया था, और राजा वीतहव्य ने भी। तो वीतहव्य ने किस प्रकार ब्राह्मणत्व पाया, किसी वर से या तप के बल से, यह बताइए। भीष्म ने सुनाया कि जब महात्मा मनु धर्मपूर्वक प्रजा का पालन कर रहे थे, तब उन्हें शर्याति नामक धर्मात्मा पुत्र मिला। शर्याति के वंश में वत्स के दो पुत्र राजा हुए, हैहय और तालजंघ। हैहय की दस पत्नियाँ थीं, और उनसे उसने युद्ध-प्रिय सौ पुत्र पाए, जो रूप-पराक्रम में एक-दूसरे के समान, महान बली और युद्ध-कुशल थे, और सब वेद तथा शस्त्र-विद्या में पारंगत थे।
भीष्म ने कहा कि काशी में दिवोदास के पितामह हर्यश्व नामक विजयी राजा थे। वीतहव्य नाम से प्रसिद्ध हैहय के पुत्रों ने काशी पर आक्रमण किया और गंगा-यमुना के बीच के देश में पहुँचकर हर्यश्व से युद्ध कर उसे मार डाला, फिर निर्भय होकर अपने वत्स-देश के नगर लौट गए। हर्यश्व का पुत्र सुदेव काशी की राजगद्दी पर बैठा। उसने कुछ काल राज्य किया, तब वीतहव्य के सौ पुत्रों ने फिर आक्रमण कर उसे हराया और लौट गए। फिर सुदेव का पुत्र दिवोदास काशी का राजा बना। वीतहव्य-पुत्रों के पराक्रम को जानकर दिवोदास ने इन्द्र की आज्ञा से वाराणसी को फिर बसाकर सुदृढ़ किया। उसके राज्य में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भरे थे, हर प्रकार की वस्तुएँ और सम्पन्न बाजार थे। वह राज्य गंगा के तट से उत्तर में गोमती के दक्षिण तट तक फैला था और दूसरी अमरावती जैसा था।
भीष्म ने आगे कहा कि हैहयों ने फिर दिवोदास पर आक्रमण किया। महातेजस्वी दिवोदास नगर से निकलकर युद्ध में जुटा। वह युद्ध देवासुर-संग्राम जैसा घोर हुआ। दिवोदास ने एक सहस्र दिन तक शत्रु से युद्ध किया, पर अनेक अनुचर और पशु खोकर अत्यन्त व्यथित हो गया। सेना और कोष क्षीण देख वह राजधानी छोड़कर भाग निकला और बुद्धिमान भरद्वाज के रमणीय आश्रम में पहुँचकर हाथ जोड़कर ऋषि की शरण ली। भरद्वाज, जो बृहस्पति के ज्येष्ठ पुत्र और राजा के पुरोहित थे, ने पूछा कि आपके आने का कारण क्या है, मैं बिना संकोच आपका प्रिय करूँगा। राजा ने कहा कि हे पूज्य, वीतहव्य के पुत्रों ने मेरे कुल के सब बच्चों और पुरुषों को मार डाला, केवल मैं बचा, मैं आपकी शरण में हूँ, मुझे शिष्य-सा स्नेह देकर रक्षा कीजिए।
भीष्म ने कहा कि भरद्वाज ने कहा कि मत डरिए, मत डरिए, हे सुदेव-पुत्र, आपका भय दूर हो। मैं एक यज्ञ करूँगा जिससे आपको ऐसा पुत्र मिलेगा जो वीतहव्य के दल के सहस्रों को मार सके। ऋषि ने यज्ञ किया, और उसके फल-स्वरूप दिवोदास को प्रतर्दन नामक पुत्र हुआ। जन्म लेते ही वह तेरह वर्ष के बालक-सा बढ़ गया और शीघ्र ही समूचे वेद और सम्पूर्ण शस्त्र-विद्या में निपुण हो गया। भरद्वाज ने अपने योग-बल से उसमें प्रवेश कर, ब्रह्माण्ड की सारी ऊर्जा एकत्र कर प्रतर्दन के शरीर में भर दी। चमकीला कवच और धनुष धारण किए प्रतर्दन उदित सूर्य-सा देदीप्यमान था। रथ पर सवार, कमर में खड्ग बाँधे, ढाल घुमाता वह अपने पिता के पास पहुँचा। उसे देखकर दिवोदास हर्ष से भर गया और शत्रु वीतहव्य के पुत्रों को मानो मरा ही समझने लगा। उसने प्रतर्दन को युवराज नियुक्त किया और स्वयं को कृतकृत्य मानकर अत्यन्त सुखी हुआ।
भीष्म ने कहा कि वृद्ध राजा ने प्रतर्दन को वीतहव्य के पुत्रों पर चढ़ाई कर उन्हें मारने का आदेश दिया। महाबली प्रतर्दन रथ पर गंगा पार कर वीतहव्यों के नगर की ओर बढ़ा। उसके रथ की घरघराहट सुनकर वीतहव्य के पुत्र अपने रथों पर, जो किलों जैसे थे, नगर से निकले और कवच पहने, शस्त्र उठाए प्रतर्दन पर बाणों की वर्षा करते टूट पड़े। उन्होंने हिमवान पर मेघों की वर्षा-सी अस्त्र-वृष्टि की। प्रतर्दन ने उनके अस्त्रों को अपने अस्त्रों से व्यर्थ कर इन्द्र के वज्र-सी तीव्र बाण-शलाकाओं से सबको मार गिराया। सैकड़ों चौड़े बाणों से कटे उनके सिर रक्त-रंजित होकर ऐसे गिरे जैसे कुल्हाड़ों से कटे किंशुक वृक्ष।
भीष्म ने कहा कि अपने सब योद्धा और पुत्र युद्ध में गिरने के बाद राजा वीतहव्य राजधानी छोड़कर भृगु के आश्रम भाग गया और शरण माँगी। भृगु ने उसे अभय दिया। प्रतर्दन वीतहव्य के पीछे-पीछे आश्रम पहुँचकर ऊँचे स्वर में बोला कि हे भृगु के शिष्यो, जो उपस्थित हों, मैं ऋषि के दर्शन चाहता हूँ, उन्हें सूचित कीजिए। प्रतर्दन को आया जान भृगु स्वयं बाहर आए और विधिवत राजा का सत्कार किया, फिर पूछा कि हे राजन, क्या प्रयोजन है। राजा ने कहा कि हे ब्राह्मण, राजा वीतहव्य यहाँ आया है, उसे मुझे सौंप दीजिए। उसके पुत्रों ने मेरे कुल का नाश किया, काशी का राज्य और धन उजाड़ा। उसके सौ पुत्रों को मैंने मार डाला, अब उसे मारकर पिता का ऋण चुकाऊँगा।
भीष्म ने कहा कि करुणा से भरे धर्मात्मा भृगु ने उत्तर दिया कि इस आश्रम में कोई क्षत्रिय नहीं है, यहाँ जो हैं सब ब्राह्मण हैं। भृगु के इन सत्य वचनों को सुनकर प्रतर्दन ने धीरे से ऋषि के चरण छूकर प्रसन्नता से कहा कि हे पूज्य, इससे तो मैं कृतकृत्य हो गया, क्योंकि मेरे पराक्रम से यह राजा अपने जन्म-वर्ग से ही छूट गया। मुझे विदा दीजिए और मेरे कल्याण की प्रार्थना कीजिए, क्योंकि हे उस वंश के संस्थापक, यह राजा मेरे बल से अपने जन्म-समुदाय से ही निकाल दिया गया। भृगु से विदा लेकर प्रतर्दन, मानो साँप अपना विष उगलकर लौटे, आया हुआ स्थान लौट गया।
भीष्म ने कहा कि इस बीच राजा वीतहव्य केवल भृगु के वचनों से ही ब्रह्मर्षि का पद पा गया, और उसी कारण उसने समस्त वेदों पर भी अधिकार पा लिया। वीतहव्य के गृत्समद नामक पुत्र हुआ, जो रूप में दूसरा इन्द्र था। एक बार दैत्यों ने उसे इन्द्र समझकर बहुत पीड़ा दी। ऋचाओं में उस उच्चात्मा ऋषि के विषय में एक श्रुति है कि जिसके साथ गृत्समद रहे, हे ब्राह्मण, वह सब ब्राह्मणों में आदर पाता है। गृत्समद ब्रह्मचर्य-निष्ठ ब्रह्मर्षि हुआ।
भीष्म ने वंश-क्रम सुनाया कि गृत्समद का पुत्र सुतेजा, उसका वर्चस, वर्चस का विहव्य, विहव्य का वितत्य, वितत्य का सत्य, सत्य का शान्त, शान्त का ऋषि श्रवस, श्रवस का तम, तम का प्रकाश नामक श्रेष्ठ ब्राह्मण हुआ। प्रकाश का पुत्र वागीन्द्र, जो मौन मन्त्र-जप करनेवालों में अग्रणी था, उसका पुत्र प्रमति, जो समस्त वेद-शाखाओं का स्वामी था। प्रमति ने अप्सरा घृताची से रुरु नामक पुत्र पाया। रुरु ने अपनी पत्नी प्रमद्वरा से ब्रह्मर्षि शुनक नामक पुत्र पाया। शुनक का पुत्र शौनक हुआ। इस प्रकार हे श्रेष्ठ राजन, राजा वीतहव्य क्षत्रिय जन्म होने पर भी भृगु की कृपा से ब्राह्मणत्व पा गया, और मैंने आपको गृत्समद के वंश का क्रम भी बता दिया।
समझने की कुंजी (वंश/स्थान): हैहय = शर्याति-वंश का क्षत्रिय कुल, जिसका राजा वीतहव्य कहलाया। काशी = वाराणसी, हर्यश्व-सुदेव-दिवोदास की राजधानी। भरद्वाज = बृहस्पति-पुत्र, दिवोदास के पुरोहित, जिन्होंने यज्ञ से प्रतर्दन को जन्म दिलाया। भृगु = वह ऋषि जिनके केवल वचन से क्षत्रिय वीतहव्य ब्रह्मर्षि बन गया। किंशुक = लाल फूलोंवाला पलाश वृक्ष, जिससे कटे सिरों की उपमा दी गई।
एक उप-कथा: ध्यान देने योग्य है कि मातंग कथा में इन्द्र कहते हैं ब्राह्मणत्व जन्म के बिना अप्राप्य है, और तुरन्त बाद वीतहव्य कथा में एक क्षत्रिय केवल भृगु के एक वाक्य से ब्रह्मर्षि बन जाता है। महाभारत यह विरोध जानबूझकर पास-पास रखता है, मानो कह रहा हो कि नियम कठोर है पर ऋषि की कृपा और तप उसे लाँघ भी सकते हैं। युधिष्ठिर ने यही प्रश्न उठाकर इस तनाव को उभारा था।
सार: काशी के दिवोदास का कुल हैहय-राजा वीतहव्य के पुत्रों ने पीढ़ियों तक उजाड़ा, तब भरद्वाज के यज्ञ से जन्मे प्रतर्दन ने उन सौ पुत्रों को मार गिराया। भागे हुए वीतहव्य को भृगु ने शरण दी, और केवल अपने वचन से उसे ब्रह्मर्षि बना दिया, जिससे प्रतर्दन का वैर भी चुक गया।
नारद और वासुदेव का संवाद, पूज्य कौन
युधिष्ठिर ने पूछा कि तीनों लोकों में कौन-से पुरुष श्रद्धापूर्वक पूजे जाने योग्य हैं। भीष्म ने कहा कि इस सम्बन्ध में नारद और वासुदेव के संवाद की पुरानी कथा है। एक बार नारद को अनेक श्रेष्ठ ब्राह्मणों की हाथ जोड़कर पूजा करते देख केशव ने पूछा कि हे पूज्य, आप इन ब्राह्मणों में किसकी इतनी श्रद्धा से पूजा कर रहे हैं, यदि यह सुनने योग्य हो तो मुझे बताइए।
नारद ने कहा कि हे गोविन्द, सुनिए कि मैं किनकी पूजा करता हूँ। मैं उन ब्राह्मणों को पूजता हूँ जो नित्य वरुण, वायु, आदित्य, पर्जन्य, अग्नि, स्थाणु, स्कन्द, लक्ष्मी, विष्णु, वाणी के स्वामी, चन्द्रमा, जल, पृथ्वी और सरस्वती की उपासना करते हैं। मैं उन ब्राह्मणों को पूजता हूँ जो तप से युक्त हैं, वेदज्ञ हैं, सदा वेदाध्ययन में लगे हैं और उच्च गुणवाले हैं। मैं उन्हें सिर झुकाता हूँ जो अभिमान-रहित हैं, खाली पेट देवताओं के कर्म करते हैं, जो है उसी में सन्तुष्ट हैं, और क्षमाशील हैं। मैं उन्हें पूजता हूँ जो यज्ञकर्ता, क्षमाशील, संयमी, इन्द्रिय-जयी हैं, सत्य और धर्म की उपासना करते हैं, और सुपात्र ब्राह्मणों को भूमि-गोदान करते हैं।
नारद ने आगे कहा कि मैं उन्हें नमन करता हूँ जो तप में लगे हैं, वनों में रहते हैं, फल-मूल पर जीते हैं, कल के लिए कुछ संचय नहीं करते, और शास्त्र-विहित सब कर्म करते हैं। मैं उन्हें नमन करता हूँ जो अपने सेवकों का पालन-पोषण करते हैं, अतिथियों के प्रति सदा सत्कारशील हैं, और केवल देवताओं को अर्पित का शेष खाते हैं। मैं उन्हें पूजता हूँ जो वेदाध्ययन से अजेय हो गए हैं, शास्त्रों पर वक्तृत्व में निपुण हैं, ब्रह्मचर्य-व्रती हैं, और दूसरों के यज्ञ कराने तथा शिष्यों को पढ़ाने में लगे हैं। मैं उन्हें नमन करता हूँ जो सब प्राणियों पर करुणा रखते हैं और दोपहर तक, अर्थात् पीठ धूप से तपने तक, वेद पढ़ते हैं। मैं उन्हें नमन करता हूँ जो गुरु की कृपा पाने का यत्न करते हैं, वेद अर्जित करने में परिश्रम करते हैं, व्रत में दृढ़ हैं, गुरुओं और बड़ों की आज्ञाकारी सेवा करते हैं, और ईर्ष्या-द्वेष से मुक्त हैं।
नारद ने कहा कि मैं उन्हें नमन करता हूँ जो उत्तम व्रती हैं, मौन साधते हैं, ब्रह्म-ज्ञान रखते हैं, सत्य में दृढ़ हैं, और घृत तथा हवि की आहुति देते हैं। मैं उन्हें नमन करता हूँ जो भिक्षा पर जीते हैं, अन्न-जल के अभाव में कृश हैं, गुरुओं के घर रह चुके हैं, सब भोगों से विरत और इस पृथ्वी के धन में दरिद्र हैं। मैं उन्हें नमन करता हूँ जिन्हें इस पृथ्वी की वस्तुओं से मोह नहीं, जो किसी से कलह नहीं करते, जो वस्त्र भी नहीं पहनते, जिन्हें कोई कामना नहीं, जो वेदाध्ययन से अजेय हैं और धर्म के व्याख्याता हैं। मैं उन्हें नमन करता हूँ जो सब प्राणियों पर करुणा रखते हैं, सत्य में दृढ़, संयमी और शान्त हैं। मैं उन्हें नमन करता हूँ जो देवताओं और अतिथियों की उपासना करते हैं, गृहस्थ-धर्म पालते हैं, और कबूतर की भाँति केवल बिखरे दानों से अपनी जीविका चलाते हैं।
नारद ने कहा कि मैं सदा उन्हें नमन करता हूँ जिनका धर्म-अर्थ-काम का त्रिवर्ग सब कर्मों में बिना क्षीण हुए रहता है, और जो सत्य तथा धर्म-आचरण में स्थित हैं। मैं उन्हें नमन करता हूँ जो केवल जल पर, या केवल वायु पर, या देवताओं-अतिथियों को अर्पित शेष पर जीते हैं और भाँति-भाँति के उत्तम व्रत पालते हैं। मैं उन्हें पूजता हूँ जिनकी पत्नी नहीं, अर्थात् जो ब्रह्मचर्य में हैं, और जिनकी पत्नी तथा गृह-अग्नि है, अर्थात् जो गृहस्थ-धर्म में हैं, जो वेदों के आश्रय हैं और करुणावश सब प्राणियों के आश्रय हैं। मैं सदा उन ऋषियों को नमन करता हूँ जो विश्व के सृष्टा हैं, विश्व के वयोवृद्ध हैं, कुल के ज्येष्ठ हैं, अज्ञान के अन्धकार के नाशक हैं, और आचरण तथा ज्ञान में सबमें श्रेष्ठ हैं। इसी से हे वृष्णिवंशी, आप भी प्रतिदिन इन द्विजों की पूजा कीजिए, ये पूजे जाने पर आपको यहाँ और परलोक में सुख देंगे।
नारद ने अन्त में कहा कि जो सब अतिथियों के प्रति सत्कारशील हैं, ब्राह्मणों, गायों और सत्य के प्रति समर्पित हैं, वे सब विपत्तियों और बाधाओं को पार कर जाते हैं। जो शान्त-आचरण हैं, ईर्ष्या-द्वेष से मुक्त हैं और वेदाध्ययन में लगे हैं, वे सब बाधाएँ पार करते हैं। जो सब देवताओं को बिना भेदभाव नमन करते हैं, एक वेद को अपना आश्रय बनाते हैं, श्रद्धावान और संयमी हैं, वे सब बाधाएँ पार करते हैं। जो श्रेष्ठ ब्राह्मणों की श्रद्धा से पूजा करते हैं, उत्तम व्रत में दृढ़ हैं और दान करते हैं, वे सब बाधाएँ पार करते हैं। जो तप में लगे हैं, ब्रह्मचर्य-व्रती हैं, और जिनकी आत्मा तप से शुद्ध है, वे सब बाधाएँ पार करते हैं। जो माता, पिता, गुरु और बड़ों के प्रति वैसा ही आचरण करते हैं जैसा हे वृष्णि-श्रेष्ठ आप करते हैं, वे सब बाधाएँ पार करते हैं। यह कहकर देवर्षि चुप हो गए। भीष्म ने आगे कहा कि इसी कारण हे कुन्ती-पुत्र, आप भी सदा श्रद्धा से देवताओं, पितरों, ब्राह्मणों और घर आए अतिथियों की पूजा कीजिए, इससे आप उत्तम गति पाएँगे।
समझने की कुंजी (अवधारणा): त्रिवर्ग = धर्म, अर्थ और काम, जीवन के तीन पुरुषार्थ, जो सन्तुलित रहें तो श्रेष्ठ। कबूतर जैसी जीविका = खेत में बिखरे, गिरे हुए दाने-भर पर निर्वाह, अर्थात् बिना संचय और बिना लोभ का जीवन। स्थाणु = शिव। स्कन्द = कार्तिकेय। केशव/गोविन्द/माधव/यादव = श्रीकृष्ण (वासुदेव) के ही नाम, जिन्हें नारद सम्बोधित कर रहे हैं।
सार: नारद ने श्रीकृष्ण को बताया कि वे किन-किन ब्राह्मणों को सिर झुकाते हैं, और एक लम्बी माला में संयम, तप, सत्य, करुणा, ब्रह्मचर्य और निर्लोभ जीवन के हर रूप को नमन किया। भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा कि आप भी ऐसे ही देव, पितर, ब्राह्मण और अतिथि की पूजा कीजिए।
कबूतर और बाज, राजा वृषदर्भ की शरण-रक्षा

युधिष्ठिर ने पूछा कि जब चारों वर्ग के प्राणी शरण माँगें तो उन्हें अभय देनेवालों को कौन-सा पुण्य मिलता है। भीष्म ने कहा कि इस सम्बन्ध में शरण-रक्षा के महान पुण्य की पुरानी कथा सुनिए। एक बार एक सुन्दर कबूतर, बाज से पीछा किए जाने पर, आकाश से गिरकर परम-धन्य राजा वृषदर्भ की शरण में आ गिरा। पवित्र-आत्मा राजा ने कबूतर को भय से अपनी गोद में दुबका देख उसे सान्त्वना दी कि हे पक्षी, मत डरिए, आपको इतना भय कहाँ से लगा कि आपके होश ही उड़ गए और आप मरे जैसे हो गए। आपका रंग नीले कमल जैसा है, आपके नेत्र अनार या अशोक-पुष्प के रंग के हैं। मत डरिए, आश्वस्त रहिए। जब आपने मेरी शरण ली है, तो जान लीजिए कि कोई आपको पकड़ने का साहस नहीं कर सकता। मैं आपके लिए आज काशी का राज्य ही नहीं, यदि आवश्यक हो तो अपने प्राण भी दे दूँगा।
तभी बाज बोला कि हे राजन, यह पक्षी मेरा भोजन ठहराया गया है, आप इसे मुझसे बचाने का प्रयत्न न कीजिए। मैंने बड़े परिश्रम से इसका पीछा कर इसे पकड़ा है। इसका मांस, रक्त, मज्जा और चर्बी मुझे बहुत तृप्ति देंगे। मुझे प्यास सता रही है और भूख मेरी अँतड़ियाँ कुतर रही है। इसे छोड़ दीजिए। मैं भूख और सहन नहीं कर सकता। देखिए, मैंने अपने पंखों और पंजों से इसका शरीर घायल कर दिया है, इसकी साँस क्षीण हो चली है। हे राजन, आप मनुष्य को मनुष्य से बचाने में समर्थ हैं, पर आकाश में विचरनेवाले इस भूखे-प्यासे पक्षी पर आपका कोई अधिकार नहीं। आपका शासन शत्रुओं, सेवकों, सम्बन्धियों और प्रजा के विवादों पर है, समूचे राज्य और आपकी इन्द्रियों पर भी है, पर आकाश पर नहीं। यदि आप पुण्य कमाना चाहते हैं तो मेरी ओर भी देखिए कि मेरी भूख कैसे मिटे और मेरे प्राण कैसे बचें।
भीष्म ने कहा कि बाज के ये वचन सुनकर राजर्षि विस्मित हो गए। उन्होंने उसकी अवहेलना न कर, उसका भी हित सोचते हुए कहा कि आपके लिए आज कोई बैल, सूअर, हिरण या भैंसा पकाया जाए, उसी से अपनी भूख मिटाइए। एक की मेरी प्रतिज्ञा है कि शरणागत को कभी नहीं त्यागूँगा। देखिए, यह पक्षी मेरी गोद नहीं छोड़ता। बाज ने कहा कि हे राजन, मैं सूअर, बैल या किसी पक्षी का मांस नहीं खाता, मुझे ऐसे भोजन से क्या काम। मेरा सम्बन्ध तो उसी भोजन से है जो मेरी जाति के लिए सनातन काल से नियत है। बाज कबूतर को खाते हैं, यही शाश्वत विधान है। हे निष्पाप उशीनर, यदि इस कबूतर पर आपको इतना स्नेह है, तो अपने ही शरीर से इस कबूतर के बराबर तौल का मांस मुझे दे दीजिए।
भीष्म ने कहा कि राजा ने कहा कि आपने ऐसा कहकर आज मुझ पर बड़ा उपकार किया, मैं वही करूँगा जो आप कहते हैं। यह कहकर वह श्रेष्ठ राजा अपना ही मांस काट-काटकर तराजू में कबूतर के विरुद्ध तौलने लगा। इस बीच महल के भीतर रत्न-आभूषणों से सजी राजा की रानियाँ यह सुनकर शोक से चीख उठीं और दुःख से भरकर बाहर आईं। रानियों, मन्त्रियों और सेवकों के विलाप से महल में मेघ-गर्जन जैसा कोलाहल उठा। जो आकाश स्वच्छ था, वह चारों ओर घने बादलों से ढक गया। राजा के उस सत्य-कर्म से पृथ्वी काँप उठी। राजा अपने पार्श्व, भुजाओं और जाँघों से मांस काटकर एक पलड़ा भरता गया, फिर भी कबूतर भारी ही पड़ता रहा।
भीष्म ने कहा कि जब राजा मांस-रहित होकर केवल रक्त-सनी हड्डियों का ढाँचा रह गया, तब उसने अपना समूचा शरीर ही दे देने की इच्छा से, जिस पलड़े में पहले काटा मांस रखा था, स्वयं उसी पर चढ़ गया। उसी क्षण इन्द्र-सहित तीनों लोक उसे देखने वहाँ आ पहुँचे। आकाश के अदृश्य प्राणियों ने दिव्य दुन्दुभियाँ बजाईं। राजा वृषदर्भ पर अमृत की वर्षा हुई, और बार-बार दिव्य सुगन्ध तथा स्पर्शवाले पुष्पों की झड़ी लगी। देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ उसके चारों ओर वैसे ही गाने-नाचने लगे जैसे पितामह ब्रह्मा के चारों ओर। फिर राजा स्वर्ण, रत्न और लाजवर्द-स्तम्भों से सजे एक दिव्य रथ पर चढ़कर, उस पुण्य के बल से, राजर्षि शिवि के रूप में सनातन स्वर्ग को गया।
भीष्म ने कहा कि हे युधिष्ठिर, आप भी शरणागतों के प्रति ऐसा ही आचरण कीजिए। जो अपने भक्तों, प्रेम से जुड़े लोगों और आश्रितों की रक्षा करता है और सब प्राणियों पर करुणा रखता है, वह परलोक में महान सुख पाता है। शुद्ध-आत्मा, बुद्धिमान और अजेय पराक्रमी काशी-राज शिवि अपने धर्म-कर्मों से तीनों लोकों में प्रसिद्ध हुए। जो इसी प्रकार शरणागत की रक्षा करेगा, वह भी शिवि जैसी ही उत्तम गति पाएगा। जो राजर्षि वृषदर्भ की यह कथा कहता या सुनता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।
समझने की कुंजी (अवधारणा): इस कथा में राजा को वृषदर्भ, उशीनर और शिवि, तीनों नामों से पुकारा गया है, यह एक ही दानवीर राजर्षि की पहचान है (उशीनर देश के, शिवि-वंश के)। सत्य-कर्म = सत्य और प्रतिज्ञा-पालन का वह बल जिससे प्रकृति तक काँप उठती है। लाजवर्द = नीलमणि नामक रत्न।
सार: राजा वृषदर्भ ने शरण आए कबूतर को बाज से बचाने के लिए अपने ही शरीर का मांस तौलकर देना स्वीकार किया, और अन्ततः समूचा शरीर ही पलड़े पर चढ़ा दिया। अन्त में राजा शिवि के रूप में स्वर्ग को गए।
राजा के लिए श्रेष्ठ कर्म, ब्राह्मणों की पूजा
युधिष्ठिर ने पूछा कि राजा के लिए विहित सब कर्मों में श्रेष्ठ कौन-सा है, जिसे करके राजा इस लोक और परलोक दोनों का सुख पाता है। भीष्म ने कहा कि सिंहासन पर विधिवत बैठे राजा के लिए श्रेष्ठ कर्म ब्राह्मणों की पूजा है, यदि वह महान सुख चाहता है। राजा को सदा वेद-विद्या से युक्त धर्मात्मा ब्राह्मणों की श्रद्धा से पूजा करनी चाहिए। अपने नगर या प्रान्तों में रहनेवाले बड़े विद्वान ब्राह्मणों की नमन, सान्त्वना-वचन और सब भोग-वस्तुओं के दान से पूजा करे, यही राजा का श्रेष्ठ कर्म है। राजा इन पर वैसे ही दृष्टि रखे और इनकी रक्षा करे जैसे अपनी या अपने बच्चों की। जो ब्राह्मण उच्चतर पवित्रता और विद्या से योग्य हों, उनकी अधिक श्रद्धा से पूजा करे। जब ऐसे जन चिन्ता-मुक्त रहते हैं, तब समूचा राज्य शोभा से दीप्त हो उठता है।
भीष्म ने कहा कि ऐसे ब्राह्मण आराधना के योग्य हैं, राजा इन्हें वैसे ही सिर झुकाए जैसे अपने पितरों-पितामहों को। इन्हीं पर मनुष्यों के आचरण का क्रम वैसे ही टिका है जैसे सब प्राणियों की स्थिति इन्द्र पर। इनका पराक्रम अबाध और तेज महान है, क्रुद्ध होने पर ये केवल संकल्प, अभिचार या तप से समूचे राज्य को भस्म कर सकते हैं। इन्हें नष्ट कर सके, ऐसा मुझे कुछ नहीं दीखता। क्रुद्ध होने पर इनकी दृष्टि वन पर अग्नि-ज्वाला सी पड़ती है। ये नाना रूप और स्वभाव के होते हैं, कुछ घास से ढके कुएँ जैसे रहस्यमय, कुछ मेघहीन आकाश जैसे निर्मल। कुछ दुर्वासा जैसे उग्र, कुछ गौतम जैसे रूई से कोमल, कुछ अगस्त्य जैसे चतुर जिन्होंने वातापि असुर को निगल लिया। कुछ तप में लगे, कुछ कृषि में, कुछ गो-पालन में, कुछ भिक्षा पर, और कुछ आरम्भ के वाल्मीकि या अकाल के विश्वामित्र जैसे चोरी तक करनेवाले रहे हैं। कुछ नारद जैसे विवाद-प्रिय, कुछ भरत जैसे अभिनेता-नर्तक, और कुछ अगस्त्य जैसे जो समूचा सागर हथेली के जल-सा पी गए, असाधारण कर्म करने में समर्थ।
भीष्म ने कहा कि ब्राह्मण उत्पत्ति में पितरों, देवताओं, मनुष्यों, नागों और राक्षसों से भी ज्येष्ठ हैं। ये देवताओं, पितरों, गन्धर्वों, राक्षसों, असुरों या पिशाचों से अजेय हैं। ये अदेव को देव और देव को अदेव बना सकते हैं। जिसे चाहें राजा बना दें, जिससे प्रसन्न न हों वह पतन को प्राप्त हो। जो ब्राह्मणों की निन्दा करते हैं वे निश्चय नष्ट होते हैं। ब्राह्मणों की निन्दा कभी न करे, जहाँ निन्दा हो वहाँ मुख नीचा कर बैठे या वह स्थान छोड़ दे। ब्राह्मणों से कलह कर सुखी रहनेवाला न आज तक जन्मा है न आगे जन्मेगा। जैसे वायु को हाथ से नहीं पकड़ा जा सकता, चन्द्रमा को छुआ नहीं जा सकता, पृथ्वी को भुजाओं पर नहीं उठाया जा सकता, वैसे ही ब्राह्मणों को इस संसार में जीता नहीं जा सकता। ब्राह्मणों के अभाव से ही शक, यवन, कम्बोज तथा द्रविड़, कलिंग, पुलिन्द, उशीनर, कोलिसर्प, महिषक आदि क्षत्रिय-जातियाँ पतित होकर शूद्रत्व को प्राप्त हो गईं।
भीष्म ने आगे कहा कि ब्राह्मणों का सोम राजा है, और वे ही दूसरों को सुख-दुःख देते हैं। इनकी रक्षा अपने पितरों-पितामहों की भाँति करनी चाहिए और नमन, अन्न, आभूषण तथा भोग-वस्तुओं से आराधना करनी चाहिए। राज्य की शान्ति और सुख इस आदर से वैसे ही बहता है जैसे सब प्राणियों का सुख इन्द्र से। राज्य में शुद्ध-आचरण और ब्रह्म-तेज वाले ब्राह्मण जन्म लें, और शत्रुओं को तपा देनेवाले तेजस्वी क्षत्रिय भी, यही नारद ने मुझसे कहा था। धर्म और उत्तम-व्रत के ज्ञाता कुलीन ब्राह्मण को अपने घर में बसाने से बढ़कर मंगलप्रद कुछ नहीं। ब्राह्मणों को दी आहुति देवताओं तक पहुँचती है। ब्राह्मण सब प्राणियों के पिता हैं। आदित्य, चन्द्रमा, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश और दिशाएँ, सब ब्राह्मण के शरीर में प्रवेश कर वही ग्रहण करते हैं जो ब्राह्मण खाता है। जिस घर में ब्राह्मण नहीं खाते, वहाँ पितर नहीं खाते, और जो ब्राह्मणों से द्वेष करे उसके घर देवता नहीं खाते।
भीष्म ने कहा कि इस सम्बन्ध में वासुदेव और पृथ्वी के संवाद की पुरानी कथा है। वासुदेव ने पूछा कि हे सब प्राणियों की माता, हे मांगलिक देवी, गृहस्थ मनुष्य किस कर्म से अपने सब पाप धो लेता है। पृथ्वी ने कहा कि ब्राह्मणों की सेवा करनी चाहिए, यह आचरण शुद्ध और उत्तम है। जो श्रद्धा से ब्राह्मणों की सेवा करता है उसकी सब अशुद्धियाँ नष्ट होती हैं, और इसी से समृद्धि, यश तथा आत्म-ज्ञान उपजता है। क्षत्रिय इसी आचरण से महारथी और शत्रु-तापन बनकर महान यश पाता है। नारद ने यही मुझसे कहा कि जो हर समृद्धि चाहता हो वह कुलीन, दृढ़-व्रत, शास्त्रज्ञ ब्राह्मण का आदर करे। जो ब्राह्मणों की निन्दा करता है वह सागर में फेंके कच्चे मिट्टी के ढेले-सा शीघ्र नष्ट हो जाता है। चन्द्रमा के काले धब्बे और सागर का खारापन देखिए, और यह भी कि इन्द्र एक बार सहस्र चिह्नों से अंकित हुआ था जो ब्राह्मणों के तेज से सहस्र नेत्रों में बदल गए। वासुदेव ने ‘उत्तम, उत्तम’ कहकर देवी का सम्मान किया। हे पृथा-पुत्र, यह संवाद सुनकर आप भी सदा एकाग्र मन से श्रेष्ठ ब्राह्मणों की पूजा कीजिए।
समझने की कुंजी (वंश/अवधारणा): भीष्म जिन ऋषियों के उदाहरण देते हैं वे प्रसिद्ध हैं, अगस्त्य ने वातापि असुर को निगला और सागर पी गए, वाल्मीकि आरम्भ में दस्यु थे, विश्वामित्र अकाल में, नारद विवाद-प्रिय कहे गए। यह दिखाने को कि ब्राह्मण एक-रंगी नहीं, अनेक स्वभाव के होते हैं। सोम जिनका राजा = ब्राह्मणों के अधिष्ठाता-देव चन्द्र-सोम माने गए। इन्द्र के सहस्र चिह्न = गौतम के शाप का संकेत, जो आगे विपुल-कथा में खुलता है।
सार: भीष्म ने राजा का परम कर्तव्य ब्राह्मण-पूजा बताया, और ब्राह्मणों के तेज, विविध स्वभाव तथा अजेयता का वर्णन किया। पृथ्वी ने वासुदेव को सिखाया कि ब्राह्मण-सेवा ही गृहस्थ के पाप धोने और समृद्धि पाने का मार्ग है।
ब्रह्मा का ब्राह्मणों के लिए विधान
भीष्म ने कहा कि हे धन्य राजन, ब्राह्मण केवल जन्म से ही सब प्राणियों के लिए पूज्य हो जाता है, और अतिथि-रूप में सब पके अन्न का पहला भाग पाने का अधिकारी है। इन्हीं से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के महान प्रयोजन बहते हैं। ये सब प्राणियों के मित्र हैं और देवताओं के मुख हैं, क्योंकि इनके मुख में डाला अन्न देवता खाते हैं। श्रद्धा से पूजे जाने पर ये मांगलिक वचनों से कल्याण की कामना करते हैं। इस सम्बन्ध में प्राचीन वे श्लोक दोहराए जाते हैं जिनमें कहा गया है कि सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा ने ब्राह्मणों की रचना कर उनके कर्तव्य कैसे ठहराए।
भीष्म ने कहा कि ब्रह्मा ने कहा कि ब्राह्मण को कभी अपने विहित कर्म के अतिरिक्त कुछ नहीं करना चाहिए। रक्षित होकर वे दूसरों की रक्षा करें, इसी से उन्हें परम लाभ मिलेगा और ब्रह्म-समृद्धि प्राप्त होगी। वे सब प्राणियों के आदर्श और उन्हें संयम में रखनेवाली लगाम बनेंगे। विद्वान ब्राह्मण कभी शूद्रों के विहित कर्म न करे, इससे वह पुण्य खोता है। वेदाध्ययन से वह समृद्धि, बुद्धि, तेज, सब कुछ तपा देनेवाला पराक्रम और परम यश पाता है। देवताओं को घृत की आहुति देकर ब्राह्मण उच्च कल्याण और सब पके अन्न में बालकों से भी पहले का अधिकार पाते हैं। सब प्राणियों पर करुणामय श्रद्धा, आत्म-संयम और वेदाध्ययन से युक्त होकर वे अपनी सब कामनाओं की पूर्ति पाएँगे। मनुष्य-लोक में या देव-लोक में जो कुछ है, वह सब तप, ज्ञान और व्रत-संयम से अर्जित किया जा सकता है। यह विधान ब्रह्मा ने ब्राह्मणों पर करुणावश ठहराया।
भीष्म ने कहा कि उनमें जो तप में लगे हैं उनका पराक्रम राजाओं के बल के समान है, वे अजेय, उग्र, बिजली की गति वाले और शीघ्रकारी हैं। कुछ में सिंह का बल है, कुछ में बाघ का, कुछ में सूअर, हिरण या मगर का। कुछ का स्पर्श विषैले साँप-सा है, कुछ का दंश शार्क-सा। कुछ केवल वाणी से शत्रु का नाश कर सकते हैं, कुछ केवल दृष्टि से। उनके स्वभाव नाना प्रकार के हैं। मेकल, द्रविड़, लाट, पौण्ड्र, कोंवशिर, सौण्डिक, दरद, दर्व, चौर, सवर, वर्वर, किरात, यवन और अनेक अन्य क्षत्रिय-जातियाँ ब्राह्मणों के क्रोध से शूद्रत्व को प्राप्त हो गईं। ब्राह्मणों की अवहेलना से असुरों को सागर की गहराई में शरण लेनी पड़ी, और उनकी कृपा से देवता स्वर्ग के निवासी बने। जैसे आकाश को छुआ नहीं जा सकता, हिमवान हिलाया नहीं जा सकता, गंगा की धारा बाँध से रोकी नहीं जा सकती, वैसे ही ब्राह्मण जीते नहीं जा सकते। क्षत्रिय ब्राह्मणों का सद्भाव पाए बिना पृथ्वी पर राज नहीं कर सकते। यदि आप समुद्र-मेखला वाली समूची पृथ्वी का राज्य भोगना चाहते हैं तो सदा इन्हें दान और सेवा से पूजिए। पर ध्यान रहे, दान ग्रहण करने से ब्राह्मणों का तेज क्षीण होता है, अतः जो ब्राह्मण दान लेना ही नहीं चाहते, उनसे अपने कुल की रक्षा कीजिए।
सार: भीष्म ने ब्रह्मा का मूल विधान कहा कि ब्राह्मण अपने ही विहित कर्म में रहें, तप और वेद से तेज पाएँ। साथ ही एक सूक्ष्म चेतावनी, कि दान लेना ब्राह्मण के तेज को घटाता है, इसलिए जो ब्राह्मण दान नहीं लेते उनका तेज अक्षुण्ण रहता है, और राजा को उनसे अपने कुल की रक्षा करनी चाहिए।
शक्र और शम्बर का संवाद
भीष्म ने कहा कि इस सम्बन्ध में शक्र और शम्बर के संवाद की पुरानी कथा है। एक बार शक्र (इन्द्र) ने सिर पर जटा और शरीर पर भस्म लगाए तपस्वी का वेश धारण कर, एक भद्दे रथ पर सवार होकर असुर शम्बर के पास जाकर पूछा कि हे शम्बर, किस आचरण से आप अपनी समूची जाति के अग्रणी बने हैं, किस कारण सब आपको श्रेष्ठ मानते हैं, यह सच-सच विस्तार से बताइए।
शम्बर ने कहा कि मैं ब्राह्मणों के प्रति कभी दुर्भाव नहीं रखता। वे जो भी उपदेश दें, मैं उसे बिना प्रश्न श्रद्धा से स्वीकार करता हूँ। जब वे शास्त्रों की व्याख्या करते हैं, मैं प्रसन्न होकर सुनता हूँ और सुनकर कभी अवहेलना नहीं करता, न किसी प्रकार उनका अपराध करता हूँ। मैं बुद्धिमान ब्राह्मणों की सदा पूजा करता हूँ, उनसे ज्ञान माँगता हूँ, उनके चरण पूजता हूँ। वे विश्वास से मेरे पास आकर स्नेह से मेरी कुशल पूछते हैं। यदि वे असावधान हों तो मैं सावधान रहता हूँ, यदि वे सोएँ तो मैं जागता रहता हूँ। जैसे मधुमक्खियाँ छत्ते के कोषों को मधु से भर देती हैं, वैसे ही मेरे गुरु और शासक ब्राह्मण मुझे ज्ञान के अमृत से भरते रहते हैं, मुझे, जो शास्त्र के बताए मार्ग पर चलता हूँ, ब्राह्मणों के प्रति समर्पित हूँ और दुर्भाव से मुक्त हूँ। वे प्रसन्न मन से जो कहें, मैं उसे स्मृति और बुद्धि से स्वीकार करता हूँ। मैं अपनी श्रद्धा की रक्षा करता हूँ और सदा अपनी हीनता का स्मरण रखता हूँ। मैं उनकी जिह्वा के छोर पर बसे अमृत को चाटता हूँ, इसी से अपनी समूची जाति में चन्द्रमा के तारों से ऊँचे स्थान पर हूँ। ब्राह्मणों के मुख से निकली शास्त्र-व्याख्या ही पृथ्वी पर अमृत है, और श्रेष्ठ नेत्रों के समान है।
शम्बर ने कहा कि प्राचीन देवासुर-संग्राम को देखकर और ब्राह्मणों के उपदेशों का प्रभाव समझकर मेरे पिता विस्मय और हर्ष से भर गए थे। उच्चात्मा ब्राह्मणों का पराक्रम देखकर मेरे पिता ने चन्द्रमा से पूछा कि ब्राह्मण किस प्रकार सिद्धि पाते हैं। सोम ने कहा कि ब्राह्मण अपने तप से सिद्धि पाते हैं, उनका बल वाणी में है। राजवर्ग का पराक्रम भुजाओं में है, पर ब्राह्मणों का शस्त्र वाणी है। ब्राह्मण को गुरु के घर के कष्ट सहकर वेद या कम-से-कम प्रणव (ओम्) का अध्ययन करना चाहिए। क्रोध त्यागकर, आसक्ति छोड़कर वह यति बने और सब प्राणियों को समान दृष्टि से देखे। यदि अपने ही घर रहकर वह सब वेद पढ़कर आदरणीय पद पा ले, तब भी लोग उसे ‘अप्रवासी’ या ‘घरघुसना’ कहकर निन्दा करते हैं।
शम्बर ने सोम का वचन आगे कहा कि जैसे साँप चूहों को निगलता है, वैसे ही पृथ्वी इन दो को निगल जाती है, युद्ध न करनेवाले राजा को, और ज्ञान के लिए घर छोड़कर न जानेवाले ब्राह्मण को। अभिमान अल्प-बुद्धि की समृद्धि नष्ट करता है। कन्या गर्भ धारण कर ले तो कलंकित होती है, और ब्राह्मण घर में बैठे रहकर निन्दा पाता है। यही मेरे पिता ने सोम से सुना, और इसी से वे ब्राह्मणों की पूजा-आराधना करने लगे। उन्हीं की भाँति मैं भी उच्च-व्रत वाले सब ब्राह्मणों की पूजा करता हूँ। भीष्म ने कहा कि उस दानव-श्रेष्ठ के ये वचन सुनकर शक्र ब्राह्मणों की पूजा करने लगे, और इसी फल से उन्हें देवताओं का अधिपत्य मिला।
समझने की कुंजी (अवधारणा): शम्बर = एक प्रसिद्ध असुर, जिसे इन्द्र ने श्रेष्ठता का रहस्य जानने के लिए छद्म-वेश में जा पूछा। प्रणव = ओम् का मन्त्राक्षर। यति = संयमी संन्यासी। यह कथा का मर्म यह है कि इन्द्र ने एक असुर से ही सीखा कि ब्राह्मण-आदर ही श्रेष्ठता की जड़ है।
सार: इन्द्र ने तपस्वी का वेश धरकर असुर शम्बर से उसकी श्रेष्ठता का रहस्य पूछा, और शम्बर ने अपने ब्राह्मण-आदर को कारण बताया। यह आदर उसने अपने पिता से, और पिता ने सोम से सीखा था। इन्द्र ने भी यही करके देवराज-पद पाया।
दान का सुपात्र, और सत्कार-योग्य गुण
युधिष्ठिर ने पूछा कि इन तीन में दान के लिए श्रेष्ठ कौन है, बिलकुल अनजान व्यक्ति, या जो साथ रहकर बहुत काल से परिचित है, या जो दूर से चलकर सामने आता है। भीष्म ने कहा कि ये सब समान हैं। कुछ लोग यज्ञ करने, गुरु-दक्षिणा चुकाने या पत्नी-सन्तान के पालन के लिए माँगते हैं, इसी से वे पात्र हैं। कुछ की पात्रता पृथ्वी पर घूमने के व्रत में है, जो कभी कुछ माँगते नहीं पर दिए जाने पर ग्रहण करते हैं। जो जो माँगे, उसे वह देना चाहिए, पर अपने आश्रितों को पीड़ित किए बिना, क्योंकि आश्रितों को पीड़ित करके मनुष्य स्वयं को ही पीड़ित करता है। पहली बार आया अनजान व्यक्ति दान का उचित पात्र है, साथ रहनेवाला परिचित भी, और दूर से आया भी, तीनों समान दृष्टि से देखे जाएँ।
युधिष्ठिर ने कहा कि यह सत्य है कि किसी को पीड़ित किए बिना और शास्त्र-विधि का उल्लंघन किए बिना दान करना चाहिए। पर यह ठीक से जानना चाहिए कि दान का सुपात्र कौन है, ऐसा कि दान देकर पछताना न पड़े। भीष्म ने कहा कि यदि ऋत्विक, पुरोहित, गुरु, आचार्य, शिष्य, विवाह-सम्बन्धी और स्वजन विद्या से युक्त और द्वेष-रहित हों, तो वे आदर और पूजा के योग्य हैं। जिनमें ये गुण न हों वे दान या सत्कार के योग्य नहीं। अतः जिनसे सम्पर्क हो उन्हें सोच-विचारकर परखना चाहिए। क्रोध का अभाव, सत्यभाषण, अहिंसा, सरलता, शान्त आचरण, अभिमान का अभाव, विनय, त्याग, आत्म-संयम और सन्तोष, जिसमें ये स्वभाव से हों और जिसमें दुष्कर्म न हों, वही उचित पात्र है। चाहे वह परिचित हो या नया, यदि उसमें ये गुण हों तो वह सत्कार के योग्य है।
भीष्म ने कहा कि जो वेदों के प्रामाण्य को नकारे, शास्त्रों की अवहेलना करवाना चाहे, या समाज के सब संयम-भंगों का समर्थन करे, वह अपना ही नाश करता है और दान-योग्य नहीं। जो ब्राह्मण अपनी विद्या पर घमण्ड करे, वेदों की निन्दा करे, व्यर्थ वाद-विवाद की कला में लगा हो, सत्पुरुषों की सभा में धर्म और नीति के तर्क को झुठलाकर और सब कुछ संयोग पर थोपकर जीत चाहता हो, जो दूसरों की निन्दा करे, ब्राह्मणों को कोसे, सबमें शंकालु, मूर्ख, विवेकहीन और कटु-वचन हो, उसे कुत्ते के समान अप्रिय जानना चाहिए। जैसे कुत्ता भौंकता और काटने को तत्पर रहता है, वैसे ही वह अपनी साँस व्यर्थ खोता और सब शास्त्रों के प्रामाण्य को नष्ट करना चाहता है। जो आचरण समाज को धारण करते हैं, धर्म के कर्तव्य हैं और अपने हित के हैं, उन्हीं पर ध्यान देना चाहिए। ऐसे आचरण से जीनेवाला सदा समृद्ध होता है। देवताओं का ऋण यज्ञ से, ऋषियों का वेदाध्ययन से, पितरों का सन्तान-उत्पत्ति से, ब्राह्मणों का दान से, और अतिथियों का भोजन कराने से, इन्हें क्रम से और शुद्ध भाव से चुकाते हुए, शास्त्र-विधि का पालन करता गृहस्थ धर्म से नहीं गिरता।
समझने की कुंजी (अवधारणा): पाँच ऋण = देव, ऋषि, पितर, ब्राह्मण और अतिथि का ऋण, जिन्हें गृहस्थ क्रमशः यज्ञ, स्वाध्याय, सन्तान, दान और आतिथ्य से चुकाता है। ऋत्विक/पुरोहित/आचार्य = यज्ञ कराने और शिक्षा देनेवाले ब्राह्मणों की भिन्न भूमिकाएँ।
सार: भीष्म ने कहा कि दान का पात्र अनजान, परिचित या दूरागत, तीनों समान हैं, पर गुण देखकर देना चाहिए, आश्रितों को पीड़ित करके नहीं। वेद-निन्दक और व्यर्थ वाद-प्रिय कुत्ते-सा अप्रिय है। गृहस्थ पाँच ऋण चुकाते हुए धर्म पर टिका रहता है।
नारद और पंचचूड़ा, स्त्री-स्वभाव की चर्चा
युधिष्ठिर ने कहा कि हे भरत-श्रेष्ठ, मैं स्त्रियों के स्वभाव पर आपका उपदेश सुनना चाहता हूँ, क्योंकि कहा जाता है कि स्त्रियाँ सब दोषों की जड़ और अत्यन्त चंचल हैं। भीष्म ने कहा कि इस सम्बन्ध में देवर्षि नारद और दिव्य अप्सरा पंचचूड़ा के संवाद की पुरानी कथा है। एक बार समूचे संसार में घूमकर नारद ब्रह्म-लोक में निवास करनेवाली अनिन्द्य-सुन्दरी अप्सरा पंचचूड़ा से मिले। उसके सुन्दर अंगों को देखकर ऋषि ने कहा कि हे कृशांगी, मेरे मन में एक शंका है, उसका समाधान कीजिए।
भीष्म ने कहा कि ऋषि के ऐसा कहने पर अप्सरा बोली कि यदि विषय मेरे जानने योग्य हो और आप मुझे कहने योग्य समझें, तो मैं अवश्य कहूँगी। नारद ने कहा कि हे सुमुखी, मैं आपसे कोई असमर्थ कार्य नहीं माँगूँगा, मैं स्त्रियों के स्वभाव के विषय में आपसे सुनना चाहता हूँ। यह सुनकर अप्सरा ने कहा कि मैं स्वयं स्त्री होकर स्त्रियों की निन्दा करने में असमर्थ हूँ। आप जानते हैं कि स्त्रियाँ किस स्वभाव की होती हैं, मुझे इस कार्य में मत लगाइए। नारद ने उससे कहा कि यह सत्य है कि असत्य कहने से दोष लगता है, पर सत्य कहने में कोई दोष नहीं। यह सुनकर मधुर-स्मित पंचचूड़ा नारद के प्रश्न का उत्तर देने को सहमत हुई, और स्त्रियों के सच्चे तथा शाश्वत कहे जानेवाले दोष बताने लगी।
पंचचूड़ा ने कहा कि उच्च-कुल में जन्मी, सुन्दर और रक्षकों से युक्त होने पर भी स्त्रियाँ अपने लिए ठहराई मर्यादाओं को लाँघना चाहती हैं, यही दोष उन्हें कलंकित करता है। यश और धन वाले, सुन्दर और पूर्णतः वशवर्ती पतियों के होते हुए भी, अवसर मिलने पर वे उनकी उपेक्षा करने को तत्पर रहती हैं। यह हमारा दोष-स्वभाव है कि लज्जा त्यागकर हम कुटिल स्वभाव के पुरुषों की संगति करती हैं। जो उन्हें थोड़ा भी आदर देकर सेवा करे, स्त्रियाँ उसी की ओर झुकती हैं। केवल दूसरे पक्ष की ओर से याचना के अभाव से, या सम्बन्धियों के भय से, या मृत्यु और कारावास के भय से, चंचल स्त्रियाँ अपने लिए ठहराई मर्यादा का उल्लंघन नहीं करतीं और पति के पास रहती हैं। वे अत्यन्त अधीर हैं और सदा नए साथी की कामना करती हैं। उनका स्वभाव अबूझ है, इसलिए स्नेहपूर्ण व्यवहार से उन्हें वश में नहीं रखा जा सकता।
पंचचूड़ा ने कहा कि जैसे अग्नि ईंधन से, सागर नदियों के जल से, और काल सब प्राणियों के संहार से तृप्त नहीं होता, वैसे ही स्त्रियाँ पुरुषों से तृप्त नहीं होतीं। सुन्दर रूप का पुरुष देखते ही उनमें इच्छा के चिह्न प्रकट हो जाते हैं। जो पति उनकी सब कामनाएँ पूरी करे, सदा प्रिय करे और हर अभाव-संकट से रक्षा करे, उसके प्रति भी वे पर्याप्त आदर नहीं रखतीं। संहारक, वायु, मृत्यु, पाताल, सागर में भटकती अग्नि उगलती बड़वामुख, छुरे की धार, उग्र विष, साँप और अग्नि, ये सब मानो स्त्रियों में एक साथ बसे हैं। जिस सनातन ब्रह्म से पाँच महाभूत, सृष्टा ब्रह्मा और मनुष्य उपजे, उसी मूल से स्त्रियाँ भी उपजीं, और उसी समय ये दोष उनमें बोए गए।
समझने की कुंजी (अवधारणा): यह प्रसंग प्राचीन ग्रन्थ का एक तीखा, एकपक्षीय स्वर है, जो उस युग के पुरुष-दृष्टिकोण को दर्शाता है, स्त्री-स्वभाव का सर्वमान्य सत्य नहीं। महाभारत स्वयं अन्यत्र गान्धारी, द्रौपदी, सावित्री और सीता जैसी तेजस्विनी और धर्मनिष्ठ स्त्रियों को परम आदर देता है, अतः इसे परम्परा के भीतर का एक विवादास्पद मत समझिए, अन्तिम निर्णय नहीं। बड़वामुख = सागर में बसी, जल में भी जलती पौराणिक अग्नि।
सार: नारद के आग्रह पर अप्सरा पंचचूड़ा ने, स्वयं स्त्री होकर भी, उस युग के मत के अनुसार स्त्री-स्वभाव के दोष गिनाए, कि वे मर्यादा लाँघने को आतुर, अतृप्त और चंचल हैं। यह ग्रन्थ का एक एकपक्षीय स्वर है, जिसे महाभारत की तेजस्विनी नारियों के विरुद्ध तौलकर पढ़ना चाहिए।
विपुल का अन्तिम सत्य, और जो छिपाया वही पाप ठहरा
शर-शय्या (बाणों की शय्या, जिस पर भीष्म लेटे हैं) पर पड़े पितामह कथा को वहीं से उठाते हैं जहाँ उसे छोड़ा था। वे युधिष्ठिर से कहते हैं कि क्रोध में भरा वह विपुल, जिसने अपने गुरु देवशर्मा की पत्नी रुचि को इन्द्र की कुचेष्टा से बचाया था, अब उस इन्द्र पर बरस पड़ा। “हे शक्र, यदि आज मेरे गुरु ने आपको देख लिया होता, तो अपने तप के बल से आपके इस पापी रूप को भस्म कर देते। आप ब्राह्मणों का आदर कीजिए। तप से कुछ भी अप्राप्य नहीं रहता, यह जान लीजिए।”
यह सुनकर इन्द्र, लज्जा से भरा हुआ, बिना कुछ कहे अन्तर्धान हो गया। थोड़ी देर बाद देवशर्मा अपना यज्ञ-कर्म पूरा करके आश्रम लौट आए। विपुल ने गुरु की उस निष्कलंक सुन्दरी पत्नी को उन्हें सौंप दिया, जिसकी रक्षा उसने इन्द्र के छल से की थी। शान्त-चित्त, श्रद्धावान विपुल ने प्रणाम किया और निर्भय हृदय से खड़ा रहा। जब गुरु अपनी पत्नी के साथ एक ही आसन पर बैठे, तब विपुल ने इन्द्र की सारी चेष्टा कह सुनाई। यह सुनकर देवशर्मा उसके आचरण, उसके तप और उसके व्रत से अत्यन्त प्रसन्न हुए, “साधु! साधु!” कह उठे, और उसे यह वर दिया कि वह कभी धर्म से न डिगेगा। तब वह विपुल कठोर तप करने चला गया, और देवशर्मा भी अपनी पत्नी के साथ उसी निर्जन वन में, वल और वृत्र के संहारक इन्द्र से पूर्णतः निर्भय होकर, रहने लगे।
कुछ काल बीता। महान तेजस्वी विपुल ने आख़िर अपने को पर्याप्त तप-सम्पन्न मान लिया। अपने उस कर्म के अभिमान में, जिसे उसने पूरा किया था, वह निर्भय और सन्तुष्ट होकर पृथ्वी पर विचरने लगा, और भार्गव-कुल का वह तपस्वी मानने लगा कि उसने अपने उस कर्म से तथा अपने कठोर तप से दोनों लोक जीत लिए हैं। उसी बीच रुचि की बहन के एक दान-समारोह का अवसर आया, जिसमें प्रचुर धन और अन्न दिया जाना था। आकाश-मार्ग से जाती हुई एक अप्सरा के शरीर से कुछ दिव्य-गन्ध पुष्प नीचे रुचि के घर के पास गिरे। सुन्दर नेत्रों वाली रुचि ने उन्हें उठा लिया। तभी अंग-देश से रुचि को निमन्त्रण आया, क्योंकि उसकी बहन प्रभावती अंग-राज चित्ररथ की रानी थी। रुचि उन पुष्पों को अपने केशों में सजाकर अंग-राज के महल पहुँची। उन पुष्पों को देखकर रानी ने ऐसे ही कुछ पुष्प पाने की इच्छा प्रकट की, और रुचि ने अपने पति से यह विनती कह दी।
देवशर्मा ने अपनी साली की प्रार्थना स्वीकार की और विपुल को बुलाकर आज्ञा दी, “जाइए, जाइए, वैसे ही पुष्प ले आइए।” विपुल ने “जैसी आज्ञा” कहकर वहीं प्रस्थान किया जहाँ से रुचि ने पुष्प उठाए थे। वहाँ कुछ और पुष्प अब भी बिखरे पड़े थे, ऐसे ताज़े मानो अभी-अभी तोड़े गए हों, एक भी मुरझाया नहीं था। तप के फल से उसे वे दिव्य-गन्ध पुष्प मिल गए। प्रसन्न होकर वह चम्पा-नगरी की ओर चला।
मार्ग में उसने एक स्त्री-पुरुष के जोड़े को हाथ में हाथ डाले एक घेरे में नाचते देखा। उनमें से एक ने तेज़ कदम उठाया और ताल बिगड़ गई। इस पर दोनों में विवाद छिड़ गया, “आपने तेज़ कदम उठाया!” “नहीं, हरगिज़ नहीं।” हर एक अपनी बात पर अड़ा। तभी विवाद में एक शपथ सुनाई दी, और दोनों ने उसमें विपुल का नाम लिया, “हम दोनों में जो झूठ बोले, वह अगले लोक में वही गति पाए जो विपुल को मिलने वाली है।” यह सुनकर विपुल का मुख उतर गया। वह सोचने लगा, “मैंने इतना कठोर तप किया, फिर भी ये दोनों मेरी ही पर-लोक-गति को सब प्राणियों में सबमें पीड़ादायक बता रहे हैं। मेरा क्या पाप है?”
कुछ आगे बढ़ने पर उसने सोने-चाँदी के पासों से खेलते छह पुरुष देखे, जिनके रोंगटे खेल की उत्तेजना से खड़े थे। उनमें भी विवाद हुआ और उन्होंने भी वही शपथ ली, “हममें जो लोभवश अनुचित आचरण करे, वह वही गति पाए जो विपुल को अगले लोक में मिलेगी।” अब विपुल आग में रखी आग की तरह जलने लगा। बहुत देर तक स्मरण करने पर आख़िर उसे याद आया, जब उसने इन्द्र से रुचि की रक्षा की थी, तब उसने उस स्त्री के शरीर में प्रवेश किया था, अंग में अंग रखकर, मुख में मुख रखकर, और यह बात उसने गुरु को कभी नहीं बताई थी। यही उसका पाप था। चम्पा पहुँचकर उसने गुरु को पुष्प दिए और विधिपूर्वक उनकी पूजा की।
समझने की कुंजी (विपुल का “पाप”): विपुल ने रुचि की रक्षा करने में कोई काम-दोष नहीं किया था। उसका दोष इतना ही था कि उसने अपने उस असाधारण योग-प्रवेश की बात गुरु से छिपाई, यह सोचकर कि किसी को पता नहीं चलेगा। महाभारत यहाँ नैतिक सूक्ष्मता दिखाता है, रक्षा का कर्म निर्दोष था, पर सत्य का छिपाना ही उसका कलंक ठहरा।
देवशर्मा ने अपने लौटे शिष्य से पूछा, “हे विपुल, वन में आपने क्या देखा? जिन्हें आपने देखा, वे आपको जानते हैं। मैं और मेरी पत्नी रुचि भी जानते हैं कि आपने रुचि की रक्षा में कैसा आचरण किया।” विपुल ने पूछा, “वे पहले दो कौन थे? वे बाद के छह कौन थे? सब मुझे जानते हैं, ये किनकी बात आप कर रहे हैं?”
देवशर्मा ने कहा, “वह पहला जोड़ा दिन और रात हैं, जो घेरे की तरह निरन्तर घूमते रहते हैं। वे आपके दोष को जानते हैं। वे छह जो पासे खेल रहे थे, छह ऋतुएँ हैं। वे भी जानती हैं। एकान्त में पाप करके किसी को यह आश्वासन नहीं पालना चाहिए कि उसका दोष केवल उसी को ज्ञात है। मनुष्य जब छिपकर पाप करता है, तब ऋतुएँ तथा दिन और रात सदा देखती रहती हैं। आपने जो किया वह मुझसे न कहा, यही सोचकर कि कोई न जानेगा, और इसी विश्वास ने आपको प्रसन्न रखा। आप मेरी पत्नी की, जिसका स्वभाव सहज ही चंचल है, रक्षा करने में पूर्णतः समर्थ थे। जो आपने किया उसमें कोई पाप न था, इसी से मैं आपसे प्रसन्न हुआ। यदि आपने दुष्ट भाव से कुछ किया होता, तो मैं बिना संकोच आपको शाप देता। आपने भिन्न भाव से मेरी पत्नी की रक्षा की। अब वह रीति मुझे ऐसे ज्ञात है मानो आपने स्वयं बता दी हो। मैं आपसे प्रसन्न हूँ, अब चिन्ता-रहित होकर आप स्वर्ग जाएंगे।”
यह कहकर महान ऋषि देवशर्मा अपनी पत्नी और शिष्य के साथ स्वर्ग को सिधार गए। भीष्म कहते हैं, “यह इतिहास मुझे गंगा-तट पर महातपा मार्कण्डेय ने सुनाया था, इसी से मैं आपसे कहता हूँ। हे राजन, स्त्रियों की सदा रक्षा करनी चाहिए। उनमें दोनों प्रकार की होती हैं, सती और असती। जो सती हैं वे परम धन्य हैं, वे ही जगत की माताएँ हैं, वे ही जल और वनों सहित इस पृथ्वी को धारण करती हैं। जो असती, कुल-नाशिनी, पाप-संकल्प वाली हैं, वे अपने शरीर पर प्रकट होने वाले लक्षणों से पहचानी जा सकती हैं। उच्च-आत्मा पुरुष इसी प्रकार स्त्रियों की रक्षा कर पाते हैं, अन्य किसी रीति से नहीं। तीनों लोकों में केवल एक विपुल ही स्त्री की रक्षा कर सका, और कोई समर्थ नहीं।”
सार: विपुल ने रुचि की रक्षा तो की, पर अपने अद्भुत प्रवेश का सत्य गुरु से छिपाया, और दिन-रात तथा छह ऋतुओं ने वह गुप्त कर्म देख लिया, यही उसका कलंक बना। देवशर्मा ने भाव की शुद्धता देखकर उसे क्षमा दी और स्वर्ग का वर दिया। पाठ का मर्म यह है कि एकान्त का कोई पाप सचमुच एकान्त में नहीं होता।
विवाह के आठ रूप, और कन्या किसकी पत्नी ठहरती है
युधिष्ठिर पूछते हैं, “हे पितामह, समस्त धर्मों का मूल, बन्धुओं, गृह, पितरों और अतिथियों का मूल जो है, उसे कहिए। मैं समझता हूँ कन्या-दान ही सब धर्मों में श्रेष्ठ है। कन्या किस प्रकार के व्यक्ति को दी जानी चाहिए?”
भीष्म कहते हैं, “जिसके आचरण, स्वभाव, विद्या, कुल और कर्म की भली-भाँति जाँच कर ली गई हो, ऐसे योग्य वर को सज्जन अपनी कन्या देते हैं। सब धर्मनिष्ठ ब्राह्मण ऐसे ही करते हैं, इसी को ब्राह्म विवाह कहते हैं। योग्य वर चुनकर, अनेक उपहार देकर पिता उससे कन्या का विवाह कराए, यह सब सत्क्षत्रियों की सनातन रीति है। जब पिता अपनी इच्छा छोड़कर कन्या को उस पुरुष के साथ ब्याहता है जिसे कन्या चाहती है और जो कन्या के भाव का प्रत्युत्तर देता है, तब उसे वेद-ज्ञ गान्धर्व कहते हैं। कन्या को ऊँचे मूल्य पर खरीदकर, उसके स्वजनों का लोभ तृप्त करके ब्याहना आसुर रीति है। रोते हुए स्वजनों के सिर काट-काटकर बलपूर्वक कन्या को हर ले जाना राक्षस विवाह कहलाता है। इन पाँचों में से, हे युधिष्ठिर, तीन धर्म-संगत हैं और दो अधर्म-संगत। पैशाच और आसुर रूप कभी न अपनाए जाएँ। ब्राह्म, क्षात्र और गान्धर्व रूप धर्म्य हैं।”
एक उप-कथा: गांगुली के पाठ में आगे चलकर भीष्म आर्ष विवाह का भी उल्लेख करते हैं, जिसमें वर एक बैल और एक गाय देता है और कन्या का पिता उसे स्वीकार करता है। कुछ इसे शुल्क मानते हैं, कुछ नहीं, पर भीष्म का अन्तिम मत यह है कि वह उपहार छोटा हो या बड़ा, शुल्क ही गिना जाएगा, और वैसी कन्या-दान को विक्रय ही समझा जाएगा।
भीष्म कुल-नियम बताते हैं, “ब्राह्मण तीन पत्नियाँ ले सकता है, क्षत्रिय दो, और वैश्य अपने ही वर्ण से एक। इन पत्नियों से उत्पन्न सब सन्तानें समान मानी जाएँ। ब्राह्मण की तीन में से, जो उसके अपने वर्ण की है वही श्रेष्ठ मानी जाए, और क्षत्रिय की दो में भी वैसे ही। कुछ कहते हैं कि तीनों उच्च वर्ण केवल भोग के लिए (धर्म के लिए नहीं) शूद्र वर्ण से भी पत्नी ले सकते हैं, पर दूसरे इसका निषेध करते हैं। धर्मनिष्ठ शूद्रा से सन्तान उत्पन्न करने की निन्दा करते हैं, और ब्राह्मण को ऐसा करने पर प्रायश्चित करना पड़ता है। तीस वर्ष का पुरुष दस वर्ष की कन्या से ब्याहे, या इक्कीस वर्ष का सात वर्ष की से। जिस कन्या का न भाई हो न पिता, उससे विवाह न करे, क्योंकि वह अपने पिता की पुत्रिका मानी जा सकती है। रजोदर्शन के बाद यदि कन्या अनब्याही रह जाए तो तीन वर्ष प्रतीक्षा करे, चौथे वर्ष स्वयं वर ढूँढ़े। ऐसा करने में न उसकी प्रतिष्ठा घटती है, न उससे संयोग अपमान बनता है। पर यदि वह तब भी वर न चुने, तो प्रजापति का दोष उस पर आता है। माता का सपिण्ड न हो, पिता के समान गोत्र की न हो, ऐसी कन्या से विवाह करे, यही मनु की मर्यादा है।”
समझने की कुंजी (पुत्रिका): पुत्रिका वह कन्या है जिसे पुत्र-हीन पिता “पुत्र के स्थान पर” नियुक्त कर देता है, ताकि उसका पुत्र (दौहित्र) नाना को पिण्ड दे और उसकी सम्पत्ति का उत्तराधिकारी हो। सपिण्ड का अर्थ है एक ही पिण्ड-दान-परम्परा के निकट रक्त-सम्बन्धी; ऐसी कन्या से विवाह वर्जित है। ये प्राचीन कुल-विधान हैं, इन्हें उस युग के सामाजिक ढाँचे के सन्दर्भ में पढ़ा जाए।
युधिष्ठिर एक उलझन रखते हैं, “कोई विवाह की इच्छा से कन्या के स्वजनों को शुल्क देता है, कोई देने का वचन देता है, कोई कहता है मैं बलपूर्वक कन्या हर ले जाऊँगा, कोई केवल अपना धन दिखाता है, और कोई विधिवत कन्या का हाथ ग्रहण करता है। तो कन्या वस्तुतः किसकी पत्नी होती है?”
भीष्म उत्तर देते हैं, “जो कन्या किसी को वचन-बद्ध होकर भी किसी और को हाथ दे दे, तो वह कन्या, उसके पुत्र, ऋत्विज, गुरु, शिष्य और उपाध्याय सब प्रायश्चित के पात्र होते हैं, ऐसा कुछ कहते हैं; कुछ कहते हैं प्रायश्चित आवश्यक नहीं। मनु उस कन्या के उस पुरुष के साथ रहने की प्रशंसा नहीं करते जिसे वह नहीं चाहती, क्योंकि अप्रिय पति के साथ रहना अपकीर्ति और पाप लाता है। जिस कन्या को विधिवत स्वजनों ने दे दिया, उसे या जिसके लिए शुल्क लेकर स्वीकार किया गया, उसे बलपूर्वक ब्याह लेने में बड़ा पाप नहीं। पर असली बात यह है कि सात पद चलने पर ही मन्त्र विवाह को अटूट करते हैं। कन्या उसी की पत्नी होती है जिसे जल के साथ वस्तुतः दान किया जाता है। शुल्क का देना-लेना पति-पत्नी का सम्बन्ध नहीं बनाता।”
इसी प्रसंग में भीष्म अपनी ही कथा कहते हैं, “पूर्वकाल में मैंने मगध, काशी और कोसल को जीतकर विचित्रवीर्य के लिए दो कन्याएँ बलपूर्वक हर लाया था। एक का विधिवत विवाह हुआ; दूसरी का नहीं, इस आधार पर कि उसके लिए शुल्क पराक्रम के रूप में दिया जा चुका था। मेरे कुरु-वंशी चाचा बाह्लीक ने कहा कि बिना विधि के लाई गई वह कन्या मुक्त कर दी जाए। तब मुझे सन्देह हुआ। मैं सत्य जानने की उत्कण्ठा से अपने पिता के पास गया।” बाह्लीक ने उत्तर दिया था कि पति-पत्नी का सम्बन्ध शुल्क के देने-लेने से नहीं बनता, केवल विधिवत पाणि-ग्रहण से ही बनता है; जो लोग शुल्क से यह सम्बन्ध मानते हैं वे शास्त्र-अनभिज्ञ हैं। न पत्नी खरीदी जानी चाहिए, न पिता को कन्या बेचनी चाहिए। केवल वे पापी-आत्मा, जो लोभ से दासियाँ खरीदते-बेचते हैं, शुल्क से पत्नी-भाव मानते हैं।
इसी पर एक बार राजकुमार सत्यवान से किसी ने पूछा, “यदि शुल्क-दाता विवाह से पहले मर जाए, तो क्या कोई दूसरा उस कन्या से ब्याह सकता है?” सत्यवान ने कहा, “कन्या के स्वजन उसे उसी को दें जिसे योग्य समझें; इसमें कोई संकोच न करें। दाता जीवित हो तब भी धर्मनिष्ठ उसकी अपेक्षा किए बिना ऐसा कर सकते हैं, और जो मर गया उसके विषय में तो सन्देह ही नहीं।” भीष्म जोड़ते हैं, “विवाह के मन्त्र अपना प्रयोजन सातवें पद पर पूरा करते हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मण उसी कन्या से ब्याह करे जो अनिच्छुक न हो, जो समान कुल की हो, और जिसे उसका भाई दान करे; अग्नि के समक्ष, विधिवत, अग्नि की परिक्रमा कराते हुए।”
सार: विवाह के तीन रूप (ब्राह्म, क्षात्र/राजसिक, गान्धर्व) धर्म्य हैं, दो (आसुर, पैशाच) त्याज्य; आर्ष और राक्षस की मिश्रित स्थिति है। भीष्म का केन्द्रीय निर्णय यह है कि शुल्क का लेन-देन पत्नी-भाव नहीं बनाता; केवल जल-दान और सप्तपदी सहित विधिवत पाणि-ग्रहण ही विवाह को पूर्ण करता है।
शुल्क-दाता चला जाए तो, और दौहित्र का अधिकार
युधिष्ठिर पूछते हैं, “यदि कोई शुल्क देकर चला जाए, तो कन्या का पिता क्या करे?” भीष्म कहते हैं, “यदि वह कन्या किसी पुत्र-हीन धनी पिता की हो, तो पिता उसका पालन करे (शुल्क-दाता के लौटने की प्रतीक्षा में)। यदि पिता शुल्क न लौटाए, तो कन्या दाता की ही मानी जाएगी; वह शास्त्रोक्त उपायों से दाता के लिए सन्तान भी उत्पन्न कर सकती है, पर कोई और उससे विधिवत विवाह नहीं कर सकता।”
भीष्म एक प्राचीन विवाद छूते हैं, “पूर्वकाल में राजकुमारी सावित्री ने पिता की आज्ञा से स्वयं पति चुनकर उससे संयोग किया था। कुछ इसकी प्रशंसा करते हैं, कुछ शास्त्र-ज्ञ इसकी निन्दा। विदेह-राज जनक के पौत्र सुक्रतु का मत यह है कि शास्त्र-घोषणा है कि स्त्री जीवन में कभी स्वतन्त्रता के योग्य नहीं। पति-पत्नी का सम्बन्ध अत्यन्त सूक्ष्म है, यह केवल नर-नारी की काम-कामना वाले स्वाभाविक सम्बन्ध से भिन्न है।”
युधिष्ठिर पूछते हैं, “जिसके केवल कन्या हो, उसका धन किस आधार पर किसी और के पास जाए? पिता की दृष्टि में तो कन्या पुत्र के समान ही है।” भीष्म कहते हैं, “पुत्र अपना ही स्वरूप है, और कन्या भी पुत्र के तुल्य। जब मनुष्य कन्या के रूप में स्वयं ही जीवित है, तो कोई और धन कैसे ले? माता का जो धन यौतुक कहलाता है, वह कुमारी कन्या का भाग बनता है। यदि नाना पुत्र-हीन मरे, तो दौहित्र (कन्या का पुत्र) उसका उत्तराधिकारी हो, क्योंकि दौहित्र अपने पिता और माता के पिता, दोनों को पिण्ड देता है। जब किसी की एक ही कन्या हो और उसने उसे पुत्रिका-रूप में नियुक्त कर दिया हो, फिर यदि पुत्र हो जाए, तो वह पुत्र (सारा धन न लेकर) कन्या के साथ बँटवारा करे। यदि पुत्र गोद लिया या खरीदा गया हो, तो कन्या उससे श्रेष्ठ मानी जाएगी, वह तीन भाग लेगी और पुत्र दो।”
भीष्म एक अपवाद बताते हैं, “जिस कन्या को पिता ने मूल्य लेकर बेच दिया हो, उसके पुत्र केवल अपने पिता के होते हैं, नाना के दौहित्र भी नहीं, क्योंकि नाना ने मूल्य लेकर अपने सब अधिकार खो दिए। ऐसे पुत्र प्रायः द्वेष-भरे, अधर्मी और कपटी निकलते हैं, क्योंकि वे उस पापमय आसुर विवाह से जन्मे होते हैं।” इसी सन्दर्भ में भीष्म यम के गाए छन्द उद्धृत करते हैं, “जो अपने पुत्र को बेचकर या कन्या के लिए शुल्क लेकर अपनी जीविका चलाता है, वह कालसूत्र नामक सात भयानक नरकों में एक के बाद एक डूबता है, और वहाँ स्वेद, मूत्र और मल पर ही जीता है।”
समझने की कुंजी (दौहित्र और पुत्रिका): इस पूरे प्रसंग का मर्म यह है कि कन्या को पुत्र-तुल्य माना गया है, और उसके पुत्र (दौहित्र) को नाना का उत्तराधिकारी और पिण्ड-दाता। पर यह तभी, जब कन्या “बेची” न गई हो। यम के छन्द कन्या के विक्रय (आसुर रीति) की कठोरतम निन्दा करते हैं, कालसूत्र नरक तक। ध्यान दीजिए, भीष्म दान-धर्म के बीच भी सतत यही दोहराते हैं कि कन्या वस्तु नहीं।
भीष्म जोड़ते हैं, “जिस मनुष्य से रक्त का कोई सम्बन्ध न हो, वह भी विक्रय का विषय न बने, फिर अपनी ही सन्तान का क्या कहना? पाप-कर्म से अर्जित धन से कोई पुण्य-कर्म नहीं हो सकता।”
सार: शुल्क-दाता के चले जाने पर कन्या पिता के संरक्षण में रहे; पिता शुल्क लौटा दे तो कन्या मुक्त। कन्या पुत्र-तुल्य है, उसका पुत्र नाना का उत्तराधिकारी। पर जो कन्या को बेचता है वह सब अधिकार खो देता है और यम के अनुसार कालसूत्र नरक पाता है। पाप के धन से पुण्य असम्भव।
दक्ष का वचन, और स्त्रियों की महिमा
भीष्म प्राचेतस-पुत्र दक्ष का छन्द उद्धृत करते हैं, “जिस कन्या के लिए स्वजन शुल्क-रूप में कुछ न लें, वह बेची हुई नहीं कही जाती। जिस कन्या का पाणि-ग्रहण हो, उसे आदर, कोमल व्यवहार और हर प्रिय वस्तु दी जाए। उसके पिता, भाई, श्वसुर और देवर सब उसका आदर करें, उसे आभूषणों से सजाएँ, यदि वे कल्याण चाहते हों, क्योंकि ऐसा आचरण सुख और लाभ लाता है। यदि पत्नी अपने पति को न चाहे, या प्रसन्न न रखे, तो पति को सन्तान-वृद्धि का सुख नहीं मिलता।”
भीष्म आगे कहते हैं, “हे राजन, स्त्रियों की सदा पूजा और स्नेह होना चाहिए। जहाँ स्त्रियों का आदर होता है, वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं; जहाँ नहीं होता, वहाँ सब कर्म निष्फल हो जाते हैं। यदि कुल की स्त्रियाँ अपने पर हुए व्यवहार से दुखी होकर आँसू बहाएँ, तो वह कुल शीघ्र नष्ट हो जाता है। जिन घरों को स्त्रियाँ शाप देती हैं, वे ऐसे क्षीण हो जाते हैं मानो किसी अभिचार-कर्म से झुलस गए हों। मनु ने स्वर्ग जाते समय स्त्रियों को पुरुषों के संरक्षण में सौंपा, यह कहकर कि वे कोमल हैं और पुरुषों के बहकावे में सहज आ जाती हैं। उनमें कुछ सत्य-निष्ठ और स्नेह-स्वीकारिणी हैं, कुछ द्वेष-भरी, मान-लोलुप और तर्क से परे भी। फिर भी, स्त्रियाँ आदर के योग्य हैं। पुरुषों की धार्मिकता स्त्रियों पर आश्रित है, सब सुख और भोग भी। उनकी सेवा कीजिए, उन्हें पूजिए, उनके आगे अपनी इच्छा झुकाइए। सन्तानोत्पत्ति, पालन, और समाज के सब आवश्यक कर्मों का कारण स्त्रियाँ ही हैं।”
इसी प्रसंग में विदेह-राज जनक के कुल की एक राजकुमारी का गाया छन्द आता है, “स्त्रियों के लिए कोई पृथक यज्ञ विहित नहीं, न श्राद्ध, न व्रत; पति की श्रद्धा और स्वेच्छा से सेवा ही उनका एकमात्र धर्म है, और इसी से वे स्वर्ग जीतती हैं। बचपन में पिता रक्षा करता है, यौवन में पति, और वृद्धावस्था में पुत्र। स्त्रियाँ समृद्धि की देवियाँ हैं; जो ऐश्वर्य चाहे, वह उनका आदर करे। हे भारत, स्त्री को सँवारना लक्ष्मी को सँवारना है, और उसे सताना लक्ष्मी को सताना।”
समझने की कुंजी (दो स्वरों का तनाव): इस खण्ड में महाभारत का स्वर एक-रूप नहीं है, यहीं इसकी नैतिक जटिलता है। एक ओर स्त्रियों को “जगत की माता” और “साक्षात लक्ष्मी” कहकर आदर का परम पात्र बताया गया है; दूसरी ओर उन्हें पुरुष के “संरक्षण-अधीन” और स्वतन्त्रता के अयोग्य कहा गया है। पाठ इन दोनों स्वरों को साथ रखता है, इन्हें सपाट करके किसी एक में मिला देना ठीक नहीं। ये उस युग की मर्यादाएँ हैं, जिनका आदर-पक्ष और अधीनता-पक्ष दोनों मूल में विद्यमान हैं।
सार: दक्ष के अनुसार जिस कन्या के लिए शुल्क न लिया जाए वह बेची हुई नहीं। भीष्म बार-बार कहते हैं कि स्त्रियों का आदर ही कुल की समृद्धि है, उनके आँसू कुल को नष्ट करते हैं, वे साक्षात लक्ष्मी हैं। साथ ही पाठ उन्हें संरक्षण-अधीन भी बताता है, दोनों स्वर मूल में हैं।
पैतृक धन का बँटवारा वर्णों के अनुसार
युधिष्ठिर एक सन्देह रखते हैं, “ब्राह्मण चार पत्नियाँ ले सकता है, यह कहा गया है, एक अपने वर्ण की, एक क्षत्रिया, एक वैश्या, और एक शूद्रा (यदि वह काम-इच्छा रखे)। तो इन पत्नियों के पुत्रों में से कौन पैतृक धन का उत्तराधिकारी हो, और किस क्रम से, किसका कितना भाग?”
भीष्म कहते हैं, “ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, ये तीन द्विज वर्ण हैं; इन्हीं तीन में विवाह करना ब्राह्मण का धर्म है। भ्रान्ति, लोभ या काम से जो ब्राह्मण शूद्रा को पत्नी बनाता है, वह शास्त्र-विरुद्ध करता है और उसे प्रायश्चित करना पड़ता है; यदि सन्तान हो जाए तो प्रायश्चित दुगुना। अब धन का बँटवारा सुनिए। ब्राह्मणी-पुत्र पहले एक उत्तम-लक्षण बैल और श्रेष्ठ रथ ले ले। शेष धन के दस समान भाग किए जाएँ। ब्राह्मणी-पुत्र चार भाग ले, क्षत्रिया-पुत्र तीन, वैश्या-पुत्र दो। शूद्रा-पुत्र उत्तराधिकारी नहीं माना जाता, फिर भी करुणा से शेष एक भाग उसे दिया जाए, पर तभी जब पिता स्वयं दे; पिता न दे तो वह न ले। करुणा परम धर्मों में एक है।”
समझने की कुंजी (दस भागों का गणित): ब्राह्मण की चार पत्नियों के पुत्रों में पैतृक धन इस तरह बँटता है, पहले ब्राह्मणी-पुत्र को विशेष “ज्येष्ठांश” (बैल + श्रेष्ठ रथ), फिर शेष के दस भागों में से 4 (ब्राह्मणी-पुत्र), 3 (क्षत्रिया-पुत्र), 2 (वैश्या-पुत्र), 1 (शूद्रा-पुत्र, केवल करुणावश और पिता की इच्छा से)। आधुनिक समतुल्य में यह जन्म-आधारित श्रेणीबद्ध उत्तराधिकार है, समान बँटवारा नहीं; इसे उस युग के वर्ण-विधान के सन्दर्भ में पढ़ा जाए।
युधिष्ठिर तर्क करते हैं, “जब क्षत्रिया और वैश्या के पुत्र भी ब्राह्मण-स्थिति वाले हैं, तो उन्हें असमान भाग क्यों?” भीष्म समझाते हैं, “सब पत्नियाँ ‘दाता’ (दारा) कहलाती हैं, पर भेद यह है कि यदि ब्राह्मण ने तीन अन्य वर्णों की पत्नियों के बाद सबके अन्त में ब्राह्मणी से विवाह किया हो, तब भी वही सब पत्नियों में प्रथम और परम आदर के योग्य मानी जाएगी। पति के स्नान, श्रृंगार, हव्य-कव्य और धर्म-कर्म की सब सामग्री उसी के कक्ष में रहे। यदि ब्राह्मणी घर में हो, तो कोई और पत्नी पति की इन सेवाओं की अधिकारी नहीं। यदि ब्राह्मण कामवश इसके विरुद्ध आचरण करे, तो वह ब्राह्मणों में चाण्डाल कहलाता है।”
भीष्म वर्ण-क्रम का तर्क देते हैं, “जन्म-क्रम में क्षत्रिय ब्राह्मणी के समान नहीं, इसी से ब्राह्मणी-पुत्र क्षत्रिया-पुत्र से श्रेष्ठ। वैश्य क्षत्रिय के समान नहीं। समृद्धि, राज्य और कोष क्षत्रिय के हैं; समुद्र-पर्यन्त समस्त पृथ्वी उसी की है। क्षत्रिय के बिना कोई रक्षा नहीं। ब्राह्मण देवों के भी देव हैं। चोर आदि से सब की सम्पत्ति की रक्षा क्षत्रिय करता है; उसके बिना धन और स्त्रियाँ बलात हर ली जातीं। इसी से क्षत्रिया-पुत्र वैश्या-पुत्र से श्रेष्ठ और अधिक भाग का अधिकारी है।”
फिर भीष्म अन्य वर्णों के नियम बताते हैं, “क्षत्रिय की दो पत्नियाँ विहित हैं, तीसरी शूद्रा-पत्नी प्रचलन में है पर शास्त्र-सम्मत नहीं। क्षत्रिय का धन आठ भागों में बँटे, क्षत्रिया-पुत्र चार ले, वैश्या-पुत्र तीन, शूद्रा-पुत्र एक (तभी जब पिता दे)। वैश्य की एक पत्नी विहित, दूसरी शूद्रा प्रचलन में। वैश्य का धन पाँच भागों में बँटे, वैश्या-पुत्र चार ले, शूद्रा-पुत्र एक (तभी जब पिता दे)। शूद्र की केवल एक पत्नी, अपने ही वर्ण की; उसके सौ पुत्र भी हों तो सब समान भाग पाएँ। सब वर्णों में, अपने ही वर्ण की पत्नी के पुत्र समान भाग के अधिकारी हैं। ज्येष्ठ पुत्र सब भाइयों से एक भाग अधिक पाता है, पिता की श्रेष्ठ वस्तुओं सहित। यही मरीचि-पुत्र महर्षि कश्यप का घोषित नियम है।”
सार: पैतृक धन वर्ण-क्रम से बँटता है, ब्राह्मणी/क्षत्रिया/वैश्या-पुत्र को घटते हुए भाग, शूद्रा-पुत्र को केवल करुणावश और पिता की इच्छा पर। ब्राह्मणी पत्नी, चाहे सबके अन्त में ब्याही गई हो, सदा प्रथम और परम आदर की अधिकारी। ज्येष्ठ को एक भाग अधिक। ये कश्यप-घोषित प्राचीन वर्ण-विधान हैं।
वर्ण-संकर, और जन्म का चिह्न छिपता नहीं
युधिष्ठिर पूछते हैं, “लोभ, काम, अज्ञान या मूढ़ता से वर्णों का संकर (मिश्रण) होता है। मिश्रित वर्णों में जन्मे लोगों के क्या धर्म और कर्म हैं?” भीष्म कहते हैं, “आदि में प्रजापति ने यज्ञ के लिए चार वर्ण और उनके कर्म रचे। ब्राह्मण अपने वर्ण और उससे ठीक नीचे (क्षत्रिया) की पत्नी में स्वयं ही जन्म लेता है, अर्थात उन सन्तानों को अपनी ही स्थिति मिलती है। पर वैश्या और शूद्रा से जन्मी सन्तान की स्थिति पिता से नहीं, माता से तय होती है। शूद्रा से ब्राह्मण-पुत्र पारशर कहलाता है।”
भीष्म संकर-जातियों का विस्तार से वर्णन करते हैं, “क्षत्रिय की शूद्रा-पत्नी का पुत्र उग्र कहलाता है। यदि नीच वर्ण का पुरुष उच्च वर्ण की स्त्री से सन्तान उत्पन्न करे, तो वह चारों वर्णों के बाहर मानी जाती है। क्षत्रिय से ब्राह्मणी-पुत्र सूत होता है, उसका कर्म राजाओं की स्तुति-गान है। वैश्य से ब्राह्मणी-पुत्र वैदेहक, उसका कर्म अन्तःपुर के द्वार-रक्षण का है। शूद्र से ब्राह्मणी-पुत्र चाण्डाल, उग्र-स्वभाव, नगर-बाहर रहने वाला, जिसका कर्म वध-दण्ड (जल्लाद) का है। वैश्य से क्षत्रिया-पुत्र वन्दी या मागध (स्तुति-पाठक), शूद्र से क्षत्रिया-पुत्र निषाद (मत्स्य-ग्रहण), शूद्र से वैश्या-पुत्र आयोगव (तक्षण/बढ़ईगिरी) कहलाता है।”
भीष्म बताते हैं कि इन संकर-जातियों से आगे और संकर होते हैं, “इस प्रकार नीच से नीच की ओर पन्द्रह संकर-वर्ग तक उत्पन्न होते हैं। मागध से सैरन्ध्री-स्त्री में आयोगव (जाल बनाने वाले), वैदेह से सैरन्ध्री में मैरेयक (मद्य-निर्माता), निषाद से मद्गुर और दास (नौका चलाने वाले), चाण्डाल से श्वपाक (शव-रक्षक), वैदेहक से क्षुद्र, और नगर-बाहर रहने वाला आन्ध्र; चर्मकार से निषादी में करावर, चाण्डाल से पाण्डुसौपाक (बाँस की टोकरियाँ बनाने वाला), इत्यादि। ये सब अनुचित संयोग से उत्पन्न होते हैं, और चाहे छिपकर रहें या खुलकर, अपने कर्मों से पहचाने जाते हैं। शास्त्र ने केवल चार मुख्य वर्णों के लिए धर्म नियत किए; शेष के विषय में मौन हैं। जिन वर्गों के लिए शास्त्र ने कोई धर्म नहीं कहा, उन्हें जीविका के विषय में भय न रखना चाहिए।”
एक उप-कथा: भीष्म इन संकर-वर्गों के लिए भी मुक्ति का द्वार खुला रखते हैं। वे कहते हैं कि गौ और ब्राह्मण की सहायता करके, अहिंसा, करुणा, सत्य-वचन और क्षमा का अभ्यास करके, और आवश्यकता पड़ने पर औरों की रक्षा के लिए अपना प्राण तक देकर, मिश्रित वर्ण के लोग भी सिद्धि पा सकते हैं। “मुझे सन्देह नहीं,” भीष्म कहते हैं, “कि ये गुण ही उनकी सफलता का कारण बनते हैं।” अर्थात जन्म चाहे जो हो, सद्आचरण ऊपर उठा देता है।
भीष्म चेतावनी देते हैं, “नीच कुल में जन्मे को शास्त्र-ज्ञान भी नीच कर्मों से नहीं बचा पाता, वह ज्ञान शरद के बादल की तरह बिना फल के बिखर जाता है। जो उच्च वर्ण में जन्मा होकर भी सदाचार-हीन हो, वह आदर का पात्र नहीं; और यदि शूद्र भी धर्म-ज्ञ और सदाचारी हो, तो उसकी पूजा करनी चाहिए। मनुष्य अपने ही कर्मों, स्वभाव और जन्म से अपने को प्रकट कर देता है। यदि कोई नीच कुल का हो, तो भी अपने कर्मों से उसे ऊँचा उठाकर यशस्वी बना सकता है।”
युधिष्ठिर पूछते हैं, “ऐसे मिश्रित कुल के लोग जो ऊपर से प्रतिष्ठित दिखते हैं पर वस्तुतः नहीं, उनके जन्म का सत्य किन चिह्नों से जाना जाए?” भीष्म कहते हैं, “अनियमित संयोग से जन्मे का स्वभाव विविध होता है। शुद्धता आचरण से जानी जाती है। अनादर-योग्य व्यवहार, शास्त्र-विरुद्ध कर्म, कुटिलता, क्रूरता, और यज्ञादि पुण्य-कर्मों से विमुखता, ये जन्म की अशुद्धि घोषित कर देते हैं। पुत्र पिता या माता का, या दोनों का स्वभाव पाता है। अशुद्ध-जन्मा अपना सच्चा स्वभाव कभी नहीं छिपा सकता, जैसे व्याघ्र या तेन्दुए का शावक रूप और धारियों से अपने माता-पिता को प्रकट कर देता है। वंश-धारा चाहे कितनी ढकी हो, यदि अशुद्ध हो, तो उसका स्वभाव कम या अधिक प्रकट हो ही जाता है।”
सार: भीष्म लम्बा वर्ण-संकर-विवरण देते हैं, पन्द्रह संकर-वर्ग और उनके कर्म। पर अन्ततः उनका बल आचरण पर है, सदाचारी शूद्र पूज्य है और दुराचारी उच्च-वर्णी अपूज्य; जन्म चाहे जो हो, कर्म से कुल ऊँचा होता है, और जन्म का सच्चा स्वभाव छिपता नहीं। यह पाठ का प्राचीन सामाजिक ढाँचा है, जिसकी कठोरता को नरम किए बिना भी आचरण-प्रधान निष्कर्ष स्पष्ट है।
पुत्रों के बारह भेद, और बीज तथा क्षेत्र का प्रश्न
युधिष्ठिर शास्त्रोक्त पुत्र-भेद जानना चाहते हैं। भीष्म गिनाते हैं, “अपने वीर्य से जन्मा पुत्र अपना स्वरूप है। जिसे निमन्त्रित करके अपनी पत्नी में उत्पन्न कराया जाए वह नियुक्तज। बिना अनुमति किसी ने उत्पन्न किया तो प्रसृतज। पतित पुरुष से अपनी पत्नी में जन्मा पतितज। फिर दत्तक (दिया गया) पुत्र और कृत्रिम (बनाया गया) पुत्र; एक और अध्यूढ। कन्या-अवस्था में जन्मा कानीन। इनके अतिरिक्त छह अपध्वंसज और छह अपसद हैं।”
युधिष्ठिर इन छह-छह का विवरण माँगते हैं। भीष्म कहते हैं, “ब्राह्मण तीन निम्न वर्णों की पत्नियों में, क्षत्रिय दो निम्न में, और वैश्य एक निम्न में जो पुत्र उत्पन्न करता है, ये छह अपध्वंसज हैं। और शूद्र से ब्राह्मणी-पुत्र चाण्डाल, शूद्र से क्षत्रिया-पुत्र व्रात्य, शूद्र से वैश्या-पुत्र वैद्य, ये तीन; तथा वैश्य से ब्राह्मणी-पुत्र मागध, वैश्य से क्षत्रिया-पुत्र वामक, और क्षत्रिय से ब्राह्मणी-पुत्र सूत, ये तीन, मिलकर छह अपसद हैं। ये छह पुत्र ‘पुत्र नहीं हैं’ ऐसा नहीं कहा जा सकता।”
युधिष्ठिर बीज और क्षेत्र का गूढ़ प्रश्न उठाते हैं, “कुछ कहते हैं पुत्र वह है जो अपने ‘क्षेत्र’ (पत्नी) में जन्मे, कुछ कहते हैं जो अपने ‘बीज’ (वीर्य) से जन्मे। दोनों समान हैं? पुत्र किसका?” भीष्म कहते हैं, “पुत्र उसी का है जिसके बीज से जन्मा। पर यदि बीज का स्वामी उसे त्याग दे, तो वह उसका हो जाता है जिसकी पत्नी में जन्मा। जो अपने वीर्य से पुत्र उत्पन्न करके भी किसी कारण उसे त्याग दे, वह उसका पिता नहीं रहता, क्योंकि केवल वीर्य पुत्र-भाव नहीं बनाता। यदि कोई गर्भवती कन्या से विवाह करे, तो उसकी पत्नी का पुत्र उसी का होगा, क्योंकि वह उसके ‘क्षेत्र’ का फल है। पर ‘क्षेत्र’ में जन्मा पर दूसरे का बीज वाला पुत्र अपने वास्तविक जनक के ही लक्षण धारण करता है, और दृष्टि से ही पहचान लिया जाता है कि वह किसी और का है।”
कृत्रिम पुत्र के विषय में भीष्म कहते हैं, “जब कोई माता-पिता द्वारा मार्ग पर छोड़े गए शिशु को उठाकर पालता है और खोजने पर उसके माता-पिता का पता नहीं चलता, तब वह उसका पिता बन जाता है और शिशु उसका ‘कृत्रिम पुत्र’। ऐसा पुत्र उसी वर्ण का माना जाता है जिसका उसका पालक है। उसके शुद्धि-संस्कार पालक के कुल की रीति से हों, और कन्या भी पालक के वर्ण की दी जाए, यह तभी जब उसकी सच्ची माता का वर्ण ज्ञात न हो।”
समझने की कुंजी (बीज बनाम क्षेत्र): “बीज” = पिता का वीर्य; “क्षेत्र” = पत्नी का गर्भ। भीष्म का सूक्ष्म नियम यह है कि पुत्र पहले बीज-स्वामी का; पर यदि वह त्याग दे या कन्या पहले से गर्भवती हो, तो क्षेत्र-स्वामी (पति) का। फिर भी शरीर-लक्षण सच्चे जनक को प्रकट कर देते हैं। यह प्राचीन सन्तान-विधि का तर्क है, जो उत्तराधिकार और संस्कार के लिए महत्वपूर्ण था।
सार: भीष्म बारह प्रकार के पुत्रों की गणना करते हैं (नियुक्तज, प्रसृतज, पतितज, दत्तक, कृत्रिम, अध्यूढ, कानीन, छह अपध्वंसज, छह अपसद)। बीज बनाम क्षेत्र के विवाद में पुत्र मूलतः बीज-स्वामी का, पर त्याग या पूर्व-गर्भ की स्थिति में क्षेत्र-स्वामी का। त्यागा हुआ शिशु पालक का कृत्रिम पुत्र बनकर उसी वर्ण और संस्कार का हो जाता है।
च्यवन और मत्स्य, और गौ की अनुपम महिमा

युधिष्ठिर पूछते हैं, “दूसरे का दुख देखकर जो करुणा जागती है, और साथ रहने से जो सहानुभूति होती है, इनका स्वरूप क्या है? और गौओं की महिमा कितनी है?” भीष्म कहते हैं, “इस प्रसंग में मैं नहुष और ऋषि च्यवन का प्राचीन संवाद कहता हूँ।”
भृगु-वंशी महातपा च्यवन ने उदवास नामक व्रत के लिए बारह वर्ष जल में रहने का संकल्प किया। मद, क्रोध, हर्ष और शोक त्यागकर वे गंगा-यमुना के संगम पर जल में काठ के स्तम्भ की तरह खड़े हो गए। दोनों धाराओं का वेग, जो पवन-सा था, उन्होंने सिर पर झेला। गंगा-यमुना और प्रयाग में मिलने वाली अन्य नदियाँ उन्हें कष्ट देने के बजाय आदर से बगल से बह गईं। जल के सब प्राणी निर्भय होकर उनके होंठ सूँघने लगते। ऐसे ही बहुत काल बीत गया।
एक दिन कुछ मछुआरे (कैवर्त) जाल लेकर वहाँ आए। चौड़े सीने वाले, बलवान, जल से न डरने वाले वे लोग मछली पकड़ने उतरे। उन्होंने अपने नए और बड़े जाल को मिलाकर गंगा-यमुना का एक भाग घेर लिया, और बल लगाकर जाल खींचा। बहुत-सी मछलियों के साथ उन्होंने भृगु-पुत्र च्यवन को भी खींच लिया। उनका शरीर शैवाल से ढका था, दाढ़ी और जटाएँ हरी पड़ गई थीं, और शरीर पर शंख-सीप चिपके थे। उन्हें देखकर सब मछुआरे हाथ जोड़कर भूमि पर लोटने लगे। उधर जाल में फँसी मछलियाँ कष्ट से प्राण त्यागने लगीं। यह संहार देखकर च्यवन करुणा से भर गए और बार-बार आहें भरने लगे।
मछुआरों ने कहा, “हमने अज्ञानवश यह पाप किया है। आप प्रसन्न हों। हमें आज्ञा दीजिए, आपकी कौन-सी इच्छा पूरी करें?” च्यवन ने उन मछलियों के ढेर के बीच से कहा, “ध्यान देकर मेरी प्रिय इच्छा सुनिए। मैं या तो इन मछलियों के साथ मरूँगा, या मुझे इनके साथ ही बेच दीजिए। मैं इनके साथ बहुत काल जल में रहा हूँ, इस समय इन्हें त्यागना नहीं चाहता।” यह सुनकर मछुआरे भयभीत होकर राजा नहुष के पास गए और सारी बात कह सुनाई।
नहुष मन्त्रियों और पुरोहित सहित शीघ्र वहाँ आए, शुद्ध होकर, हाथ जोड़कर च्यवन के सामने उपस्थित हुए। पुरोहित ने ऋषि की पूजा की। नहुष ने कहा, “हे श्रेष्ठ ब्राह्मण, हम आपके लिए क्या करें? चाहे कितना भी कठिन हो, आपकी आज्ञा से सब करूँगा।” च्यवन ने कहा, “ये मछुआरे श्रम से थके हैं। इन्हें मेरा और इन मछलियों का जो मूल्य बने, वह दीजिए।”
तब मोल-तोल का अद्भुत क्रम चला। नहुष ने कहा, “पुरोहित इन निषादों को एक हज़ार स्वर्ण-मुद्राएँ दें।” च्यवन ने कहा, “एक हज़ार मेरा मूल्य नहीं। उचित मूल्य दीजिए।” नहुष ने एक लाख कहा, फिर एक करोड़, फिर आधा राज्य, फिर पूरा राज्य कहा। हर बार च्यवन ने कहा, “इतने में मैं नहीं खरीदा जा सकता। उचित मूल्य दीजिए, ऋषियों से परामर्श कीजिए।” नहुष शोक से भर गए।
तभी वन में फल-मूल पर जीने वाला, गौ से उत्पन्न एक ऋषि वहाँ आया, और बोला, “मैं आपको शीघ्र सन्तुष्ट करूँगा, ऋषि भी सन्तुष्ट होंगे। मैं असत्य कभी नहीं बोलता, हँसी में भी नहीं। आप निःशंक होकर मेरी बात मानिए।” नहुष ने प्रार्थना की, “हे भगवन, इस भृगु-वंशी महर्षि का मूल्य कहिए। मुझे, मेरे राज्य और मेरे कुल को इस संकट से बचाइए। यदि च्यवन कुपित हो जाएँ तो तीनों लोकों को नष्ट कर दें।”
गौ से जन्मा वह ऋषि बोला, “हे राजन, ब्राह्मण चारों वर्णों में श्रेष्ठ हैं, उनका कोई मूल्य नहीं आँका जा सकता। गौएँ भी अमूल्य हैं। इसलिए एक गौ को ही इस ऋषि का मूल्य मानिए।” यह सुनकर नहुष आनन्द से भर गए, और च्यवन के पास जाकर बोले, “उठिए, हे ब्राह्मण, आप एक गौ के मूल्य से खरीद लिए गए हैं। मेरे मत में यही आपका मूल्य है।”
च्यवन प्रसन्न होकर उठ खड़े हुए, “हाँ, हे राजाधिराज, मैं उठता हूँ। आपने मुझे ठीक से खरीदा है। मैं गौओं के समान कोई धन नहीं देखता। गौओं की चर्चा करना, सुनना, उनका दान करना और उनका दर्शन करना, ये सब परम पवित्र और पाप-नाशक हैं। गौएँ सदा समृद्धि की जड़ हैं। उनमें कोई दोष नहीं। वे देवताओं को हवि (आहुति) देती हैं। स्वाहा और वषट् मन्त्र उन्हीं पर प्रतिष्ठित हैं। वे यज्ञ का मुख हैं, अमृत-तुल्य दूध देती हैं, समस्त लोकों की पूज्य हैं। पृथ्वी पर गौएँ अग्नि के समान तेजस्वी हैं, सब प्राणियों को सुख देती हैं। जिस देश में गौएँ निर्भय साँस लेती हैं वह शोभा पाता है, उसके पाप धुल जाते हैं। गौएँ स्वर्ग की सीढ़ियाँ हैं; स्वर्ग में भी सुशोभित हैं। गौएँ सब-कुछ देने वाली देवियाँ हैं। संसार में इनसे श्रेष्ठ कुछ नहीं।”
समझने की कुंजी (उदवास और गौ-मूल्य): उदवास एक कठोर व्रत है जिसमें तपस्वी जल में निवास करता है। इस आख्यान का मर्म यह है कि ब्राह्मण और गौ, दोनों को अमूल्य कहा गया है, इसी से लाख-करोड़-राज्य कोई भी मूल्य अपर्याप्त ठहरा, और अन्ततः एक गौ ही “मूल्य” बनी, क्योंकि एक अमूल्य का मोल केवल दूसरा अमूल्य ही हो सकता है। यही गौ-महिमा का केन्द्र है।
भीष्म कहते हैं, “गौओं की महिमा का एक अंश ही मैं कह सका, पूरा कहने में असमर्थ हूँ।” तब निषादों ने हाथ जोड़कर कहा, “हे ऋषि, आपने हमें देखा और हमसे बात की। कहा जाता है कि सज्जनों की मित्रता केवल सात वचनों पर निर्भर करती है। आप हम पर कृपा कीजिए, यह गौ हमसे वापस ले लीजिए।” च्यवन ने कहा, “मैं वह गौ ले लूँगा जो आप देना चाहते हैं। हे मछुआरो, आप सब पाप-मुक्त होकर इन मछलियों सहित बिना विलम्ब स्वर्ग जाइए।”
ऋषि के वचन-बल से वे मछुआरे उन मछलियों सहित स्वर्ग को चले गए। यह देखकर नहुष विस्मित हुए। फिर दोनों ऋषियों, च्यवन और गौ से जन्मे ऋषि, ने नहुष को अनेक वर दिए। नहुष ने धर्म में स्थिरता का वर माँगकर “बस” कहा। च्यवन व्रत पूरा कर अपने आश्रम लौटे, गौ-जन्मा ऋषि अपने आश्रम, और नहुष अपनी नगरी।
सार: च्यवन ने उदवास-व्रत में जल-निवासी मछलियों से ऐसा स्नेह कर लिया कि जाल में फँसने पर उन्हीं के साथ बिकना चाहा। नहुष का बढ़ता मोल (हज़ार से पूरा राज्य तक) भी अपर्याप्त रहा, क्योंकि ब्राह्मण अमूल्य है। गौ-जन्मा ऋषि ने एक गौ को मूल्य ठहराया, और च्यवन ने गौ की महिमा गाई। अन्ततः मछुआरे मछलियों सहित स्वर्ग गए, करुणा और सहवास-स्नेह दोनों का फल।
च्यवन और कुशिक, और भार्गव-कुशिक वंशों का बन्धन
युधिष्ठिर की उत्कण्ठा जमदग्नि-पुत्र राम (परशुराम) के जन्म और विश्वामित्र पर है, “ब्राह्मण-कुल में जन्मा राम क्षत्रिय-आचरण वाला कैसे बना? कुशिक-कुल का क्षत्रिय विश्वामित्र ब्राह्मण कैसे हुआ? यह विचित्र अदला-बदली पुत्रों में न घटकर पौत्रों में क्यों घटी?”
भीष्म च्यवन और राजा कुशिक का संवाद कहते हैं। च्यवन ने अपनी दिव्य-दृष्टि से देखा कि उनके अपने कुल पर एक कलंक आने वाला है (किसी वंशज के क्षत्रिय-आचरण में पड़ने से)। इसका मूल कुशिक-कुल में था। अतः च्यवन कुशिक-कुल का नाश करने के संकल्प से राजा कुशिक के पास गए और बोले, “हे निष्पाप, मेरे मन में कुछ काल आपके साथ रहने की इच्छा हुई है।”
कुशिक ने विनम्रता से कहा, “हे ऋषि, ‘साथ रहना’ तो कन्या-दान के समय विहित है। फिर भी, चाहे धर्म के विरुद्ध हो, मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।” राजा ने आसन, पाद्य और मधु आदि से ऋषि का सत्कार किया और कहा, “हम दोनों आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा में हैं। राज्य, धन, गौ, जो चाहिए कहिए। यह राजमहल, यह राज्य आपका है। आप पृथ्वी पर राज्य कीजिए, मैं पूर्णतः आप पर आश्रित हूँ।”
च्यवन ने कहा, “मुझे न राज्य चाहिए, न धन, न गौएँ। मैं एक व्रत करना चाहता हूँ; उस अवधि में आप और आपकी पत्नी बिना संकोच मेरी सेवा कीजिए।” राजा-रानी ने “ऐसा ही हो” कहकर ऋषि को उत्तम कक्ष में सुलाया। दोपहर ढले ऋषि ने भोजन माँगा, उचित भोजन पाया, फिर कहा, “मैं सोना चाहता हूँ। जब तक सोऊँ, मुझे जगाइए नहीं; जागते रहकर मेरे पैर दबाते रहिए।” राजा-रानी ने पूरी रात ऐसा ही किया।
ऋषि बिना करवट बदले इक्कीस दिन सोते रहे। राजा-रानी निराहार रहकर पूरे समय हर्ष से उनकी सेवा करते रहे। इक्कीसवें दिन ऋषि स्वयं उठे, बिना किसी से बोले कक्ष से बाहर निकल गए। भूखे-थके राजा-रानी पीछे चले, पर ऋषि ने एक बार भी उन पर दृष्टि नहीं डाली, और थोड़ी दूर जाकर अपनी योग-शक्ति से अन्तर्धान हो गए। राजा शोक से भूमि पर गिर पड़े, पर सँभलकर रानी सहित ऋषि को खोजने लगे।
लज्जित, थके राजा महल लौटे, और कक्ष में जाकर देखा, च्यवन पहले की तरह शय्या पर लेटे हैं। दोनों विस्मित हुए, फिर सेवा में लग गए। ऋषि दूसरी करवट इक्कीस दिन और सोते रहे। फिर उठकर बोले, “मेरे शरीर पर तेल मलिए, मैं स्नान करूँगा।” भूखे-थके राजा-रानी ने सौ बार उबाले बहुमूल्य तेल से ऋषि का अभ्यंग किया। ऋषि ने एक बार भी “बस” नहीं कहा। फिर अचानक उठकर स्नान-गृह में गए, पर कोई सामग्री काम में न लाकर वहीं फिर अन्तर्धान हो गए। राजा-रानी की समता तब भी न डिगी।
फिर ऋषि स्नान के बाद सिंहासन पर बैठे दिखे। राजा-रानी ने प्रसन्न मुख से अनेक प्रकार के पके भोजन, मांस, शाक, मधुर पकवान और दूध की वस्तुएँ, तथा वन्य फल भी, उनके आगे रखे। ऋषि ने उन सबमें आग लगाकर भस्म कर दिया। राजा-रानी ने तब भी क्रोध नहीं किया। ऋषि फिर अन्तर्धान हो गए। राजा रात-भर उसी मुद्रा में, रानी सहित, बिना एक शब्द बोले खड़े रहे, क्रोध नहीं किया।
फिर ऋषि ने कहा, “आप दोनों रथ में जुतकर मुझे जहाँ कहूँ ले चलिए।” राजा ने पूछा, “विहार-रथ या युद्ध-रथ?” ऋषि ने कहा, “वही युद्ध-रथ, जिससे आप शत्रु-नगरों में घुसते हैं, सब अस्त्रों, ध्वजाओं और स्वर्ण-स्तम्भों सहित।” राजा ने वह रथ सजाया, रानी को बायीं ओर और स्वयं को दायीं ओर जोता। रथ में उन्होंने तीन हत्थों वाला, वज्र-सा कठोर और सूई-सा तीखा अंकुश भी रखा।
ऋषि ने आज्ञा दी, “रथ धीरे-धीरे, पग-पग चले। मुझे थकान न हो। नगर के बीच से ले चलिए ताकि सब देखें। मार्ग में जो मेरे पास आए, उसे रोका न जाए; मैं सबको धन दूँगा, ब्राह्मणों को रत्न और धन बिना संकोच।” राजा ने सेवकों को आज्ञा दी कि ऋषि जो कहें वह निर्भय होकर दे दें। तब रत्न, सुन्दर स्त्रियाँ, भेड़, स्वर्ण और पर्वत-से हाथी, सब ऋषि के पीछे चलने लगे। नगर ‘हाय-हाय’ से भर गया।
राजा-रानी को ऋषि उस तीखे अंकुश से अचानक पीठ और गालों पर मारने लगे। पचास रातों से अन्न न मिलने से अति-दुर्बल वह वीर-दम्पति फिर भी विचलित नहीं हुए, रथ खींचते रहे। अंकुश से बार-बार कटकर वे रक्त से ऐसे ढक गए मानो किंशुक (पलाश) के खिले हुए वृक्ष हों। नगर-वासी दुखी हुए पर शाप के भय से मौन रहे, “धन्य है तप का बल। हम क्रुद्ध होकर भी ऋषि की ओर देख नहीं सकते। और देखिए राजा-रानी की सहनशीलता।”
राजा-रानी को पूर्णतः अविचलित देखकर च्यवन कुबेर की तरह उदारता से धन लुटाने लगे। राजा ने तब भी असन्तोष नहीं दिखाया। अन्ततः प्रसन्न होकर ऋषि रथ से उतरे, राजा-रानी को जुए से मुक्त किया, और कोमल, गम्भीर, प्रसन्न स्वर में बोले, “मैं आप दोनों को उत्तम वर देने को तैयार हूँ।” उनके सुकुमार शरीर अंकुश से बिंधे थे; ऋषि ने स्नेह से अमृत-तुल्य हाथ फेरकर उन्हें चंगा कर दिया। राजा ने कहा, “हम दोनों को कोई थकान नहीं हुई।”
ऋषि ने कहा, “मैंने कभी असत्य नहीं कहा, अतः जो कहा वही होगा। गंगा-तट का यह स्थान रमणीय है; मैं यहाँ कुछ काल व्रत-स्थ रहूँगा। आप नगर लौटिए, कल पत्नी सहित पुनः यहीं आइए, और शोक-क्रोध न कीजिए। आपके लिए महान फल का समय आ गया है।” राजा ने उत्तर दिया, “हे ऋषि, मैंने न शोक किया, न क्रोध। आपने हमें शुद्ध और पुनः युवा कर दिया। मेरी देवी अप्सरा-सी सुन्दर हो गई हैं, और अंकुश के घाव-चिह्न तक मिट गए। यह सब आपकी कृपा है।” राजा वैभव से नगर लौटे, और उस रात राजा-रानी ने नवयौवन और दिव्य रूप में सुख-पूर्वक बिताई। उधर च्यवन ने अपनी योग-शक्ति से गंगा-तट के उस वन को रत्न-जटित दिव्य आश्रम में बदल दिया।
समझने की कुंजी (इक्कीस दिन, अंकुश और जुआ): च्यवन की हर क्रिया एक “अग्नि-परीक्षा” थी। इक्कीस-इक्कीस दिन की निद्रा, भोजन का भस्म होना, और अंकुश से बिंधे शरीर से रथ खींचना, सब राजा-रानी के क्रोध को भड़काने के यत्न थे, ताकि च्यवन को शाप देने का बहाना मिले और कुशिक-कुल का नाश हो सके। पर दम्पति की अडिग समता ने ऋषि का मूल संकल्प ही पलट दिया।
सार: च्यवन ने व्रत के बहाने कुशिक के घर रहकर एक के बाद एक असह्य परीक्षाएँ रचीं, निराहार सेवा, अंकुश के घाव, रथ-जुआ, धन-लूट। राजा-रानी एक बार भी क्रोध या खेद में नहीं डिगे, और रक्त से लथपथ होकर भी रथ खींचते रहे। उनकी समता देखकर ऋषि ने उन्हें चंगा कर वर देने का संकल्प किया और कल पुनः आने को कहा।
स्वर्ण-आश्रम का स्वप्न, और ब्राह्मणत्व की दुर्लभता

अगली सुबह कुशिक पत्नी सहित उस वन में गए, और वहाँ सहस्र स्तम्भों वाला, रत्न-मणियों से बना स्वर्ण-महल देखा, मानो गन्धर्वों का भवन हो। रमणीय घाटियाँ, कमल-भरे सरोवर, बहुमूल्य वस्तुओं से भरे भवन, स्वर्ण-से समतल मैदान, और सहकार, केतक, अशोक, चम्पक, तिलक, पनस आदि पुष्पित वृक्ष; तोते, कोयल, मोर, हंस, सारस, चक्रवाक; और जगह-जगह अप्सराओं और गन्धर्वों के समूह। राजा कभी ये दृश्य देखता, कभी वे लुप्त हो जाते। मधुर संगीत और वेद-शास्त्र पढ़ाते आचार्यों के स्वर भी सुनाई देते।
राजा सोचने लगा, “क्या यह स्वप्न है? या मन का भ्रम? या सत्य? क्या मैं इस पार्थिव शरीर को त्यागे बिना ही स्वर्ग पा गया? यह या तो उत्तर-कुरु का पवित्र देश है, या इन्द्र की अमरावती।” अन्ततः उसने ऋषि को रत्न-स्तम्भों वाले स्वर्ण-महल में बहुमूल्य शय्या पर लेटे देखा। राजा-रानी प्रसन्न मन से पास गए, पर च्यवन शय्या सहित अन्तर्धान हो गए। फिर ऋषि वन के दूसरे भाग में कुश की चटाई पर मन्त्र-जप करते दिखे। उसी क्षण वह दिव्य वन, अप्सराएँ, गन्धर्व, सब लुप्त हो गए, और गंगा-तट पहले की तरह कुश और बाँबियों से ढका मौन हो गया।
राजा विस्मित होकर रानी से बोला, “देखिए, ये दृश्य कहीं और नहीं मिलते। यह सब भृगु-पुत्र की कृपा और तप का बल है। तप से वह सब प्राप्त होता है जिसकी मनुष्य कल्पना करता है। तप तीनों लोकों के राज्य से भी श्रेष्ठ है; सम्यक तप से मोक्ष भी मिल जाता है। राज्य सहज मिल जाता है, पर ब्राह्मणत्व सहज नहीं। ब्राह्मण के तेज से ही हम जुते हुए पशुओं की तरह रथ में जोते गए।”
राजा के ये विचार च्यवन ने जान लिए। ऋषि ने पास बुलाकर, आशीर्वाद देकर, राजा को सान्त्वना दी और कहा, “हे राजन, आपने पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और छठा मन, सब वश में कर लिया है। इसी से आप मेरी रची अग्नि-परीक्षा से अक्षत निकले। आपने मेरा उचित आदर किया; आपमें लेशमात्र भी पाप नहीं। अब आज्ञा दीजिए, मैं अपने स्थान को जाऊँगा। मैं आपसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ, वर माँगिए।”
कुशिक ने कहा, “हे ऋषि, आपकी उपस्थिति में मैं अग्नि के बीच रहने जैसा रहा। मैं अब तक भस्म नहीं हुआ, यही परम वर है। आप मुझसे प्रसन्न हुए, और मैंने अपने कुल को नाश से बचा लिया, यही मेरे सर्वोत्तम वर हैं। यही मेरे जीवन, राज्य और तप का अन्तिम फल है। यदि आप प्रसन्न हैं, तो मेरे मन के सन्देह दूर कीजिए।”
सार: च्यवन ने अपनी योग-शक्ति से कुशिक को क्षण-भर स्वर्ग का दर्शन कराया, फिर उसे लुप्त कर दिया, ताकि तप और धर्म का फल दिखे। राजा के मन में राज्य से ऊपर ब्राह्मणत्व और तप की कामना जागी। ऋषि ने घोषित किया कि राजा ने इन्द्रियों और मन को जीतकर सारी अग्नि-परीक्षा पार कर ली, और उसका कुल नाश से बच गया।
च्यवन का रहस्योद्घाटन, और ऊर्व से परशुराम-विश्वामित्र तक
कुशिक ने अपने सब सन्देह एक साथ रखे, “आप मेरे महल में क्यों रहे? इक्कीस-इक्कीस दिन बिना करवट क्यों सोए? बिना बोले बाहर क्यों गए? बार-बार अन्तर्धान-प्रकट क्यों हुए? भोजन को अग्नि से क्यों भस्म किया? रथ-यात्रा और धन-दान का क्या प्रयोजन था? और वह स्वर्ण-वन, स्वर्ण-महल दिखाकर फिर क्यों लुप्त किया? मैं बार-बार स्तब्ध हो जाता हूँ।”
च्यवन ने सत्य खोला, “सुनिए। एक बार देवताओं की सभा में पितामह ब्रह्मा ने कहा था कि ब्राह्मण-तेज और क्षत्रिय-तेज के संघर्ष से मेरे (भार्गव) कुल में एक संकरता आएगी; और आपका पौत्र महान तेजस्वी होगा। यह सुनकर मैं आपके कुल का समूल नाश करने आया था, गर्भस्थ शिशुओं तक को भस्म करने के संकल्प से। इसी से मैंने व्रत का बहाना कर आपकी सेवा माँगी, और आपमें कोई दोष ढूँढ़ा। पर आपमें कोई त्रुटि न मिली, इसी से आप जीवित हैं; अन्यथा अब तक मृतकों में गिने जाते।”
च्यवन ने हर क्रिया का रहस्य बताया, “इक्कीस दिन इस आशा में सोया कि आप मुझे जगाएंगे (और मुझे शाप का बहाना मिलेगा), पर आपने नहीं जगाया। बिना बोले बाहर गया इस आशा में कि आप कुछ पूछेंगे और मैं शाप दे सकूँगा। भूख-थकान से आप क्रुद्ध हो जाएँ, इसलिए आपको भूखा रखा। भोजन भस्म किया कि आप क्रोध करें। रथ में जोता, अंकुश से मारा, धन लुटाया, हर बार आपके क्रोध की प्रतीक्षा में, पर आपके हृदय में लेशमात्र क्रोध या खेद न उठा। इसी से मैं प्रसन्न हुआ। और वह दिव्य वन मैंने आपको स्वर्ग का पूर्व-स्वाद देने के लिए रचा, तप का बल और धर्म का फल दिखाने को।”
च्यवन ने कुशिक के मन की इच्छा जान ली, “आप राज्य, यहाँ तक कि स्वर्ग के राज्य को भी त्यागकर ब्राह्मणत्व और तप-फल चाहने लगे। यह दुर्लभ है। ब्राह्मणत्व पाना अति कठिन; ब्राह्मण होकर ऋषि होना और कठिन; ऋषि होकर तपस्वी होना और भी। पर आपकी कामना पूरी होगी। आपसे, हे कुशिक, आपके नाम पर एक ब्राह्मण उत्पन्न होगा; आपसे तीसरी पीढ़ी में ब्राह्मणत्व आएगा। भार्गवों के तेज से आपका पौत्र अग्नि-सा तेजस्वी तपस्वी होगा, तीनों लोकों को भय देने वाला।”
च्यवन ने पूरी भविष्य-वंशावली खोली, “क्षत्रियों को यज्ञ में सदा भृगु-पुत्रों की सहायता चाहिए। पर भाग्य के अटल विधान से क्षत्रिय और भार्गव में विरोध होगा; क्षत्रिय भृगु-वंश का संहार करेंगे, गर्भस्थ शिशुओं तक को न छोड़ेंगे। तब भृगु-कुल में ऊर्व नामक ऋषि उत्पन्न होगा, अग्नि या सूर्य-सा तेजस्वी, जिसका क्रोध तीनों लोकों को भस्म करने योग्य होगा। वह क्रोधाग्नि को कुछ काल समुद्र में विचरने वाली बड़वा-मुख (घोटक-मुख) में डाल देगा। उसका पुत्र ऋचीक होगा, जिसके पास सम्पूर्ण अस्त्र-विद्या स्वयं मूर्त रूप में आएगी, समस्त क्षत्रिय-संहार के लिए। ऋचीक उसे अपने पुत्र जमदग्नि को देगा।”
च्यवन ने अदला-बदली का रहस्य खोला, “जमदग्नि आपके कुल से कन्या (गाधि की पुत्री, आपकी पौत्री) को ब्याहेंगे, और क्षत्रिय-गुणों वाला एक ब्राह्मण-पुत्र (राम/परशुराम) उत्पन्न करेंगे। और आपके कुल में गाधि का पुत्र, ब्राह्मण-गुणों वाला एक क्षत्रिय, विश्वामित्र जन्मेगा, जो तेज में बृहस्पति-तुल्य होगा। इस पुत्र-विनिमय का कारण दो स्त्रियाँ होंगी, और यह सब पितामह की आज्ञा से होगा, अन्यथा नहीं। आपसे तीसरी पीढ़ी को ब्राह्मणत्व मिलेगा, और आप भार्गवों के विवाह-सम्बन्धी बनेंगे।”
समझने की कुंजी (दो वंशों की अदला-बदली): कथा का गूढ़ केन्द्र यह “विनिमय” है, भार्गव (ब्राह्मण) कुल में क्षत्रिय-स्वभाव वाला परशुराम जन्मा, और कुशिक (क्षत्रिय) कुल में ब्राह्मण-स्वभाव वाला विश्वामित्र। वंश-रेखा यह है: कुशिक → गाधि → विश्वामित्र (क्षत्रिय से ब्राह्मण-ऋषि); और भृगु → ऊर्व → ऋचीक → जमदग्नि → परशुराम (ब्राह्मण-कुल में क्षत्रिय-पराक्रमी)। “दो स्त्रियों” का संकेत ऋचीक-गाधि-कन्या के उस प्रसिद्ध प्रसंग की ओर है जहाँ चरु (पवित्र हविष्य) की अदला-बदली से पौत्रों के स्वभाव उलट गए।
भीष्म समाप्त करते हैं, “यह सुनकर कुशिक हर्षित हुआ और ‘ऐसा ही हो’ कहा। च्यवन ने पुनः वर दिया, और राजा ने माँगा कि उसका कुल ब्राह्मणत्व पाए और सदा धर्म में रत रहे। ऋषि ने वर देकर विदा ली और तीर्थ-यात्रा को निकल पड़े। सब ठीक वैसा ही हुआ जैसा च्यवन ने कहा था, राम (भार्गव) और विश्वामित्र (कौशिक) का जन्म वैसे ही घटा।”
सार: च्यवन कुशिक-कुल का नाश करने आए थे, पर राजा-रानी की अडिग समता ने उन्हें वर-दाता में बदल दिया। उन्होंने भविष्य खोला, क्षत्रिय-भार्गव विरोध, भृगु-संहार, ऊर्व का जन्म और बड़वानल, फिर ऋचीक-जमदग्नि-परशुराम तथा गाधि-विश्वामित्र के रूप में दो कुलों का स्वभाव-विनिमय। तप की समता ही वह बल है जिसने नाश को आशीर्वाद में पलट दिया।
मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), अनुशासन पर्व, दानधर्म उपपर्व, अध्याय 1-168; पाठान्तर में गीता प्रेस का क्रम रखा गया है।
आधार: महाभारत, वेदव्यास (गीता प्रेस, गोरखपुर)