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तप के फल, दान के फल, और वीर-शय्या की महिमा
युधिष्ठिर अपने वध-कर्मों के शोक में कहते हैं, “इतने राजा, इतने लाख मनुष्य मारे गए। जिन स्त्रियों के पति, पुत्र, मामा और भाई हमने छीने, उनकी क्या दशा होगी? अपने ही कुरु-बन्धुओं को मारकर हमें सिर नीचे करके नरक में डूबना होगा, इसमें सन्देह नहीं। मैं अब कठोर तप करना चाहता हूँ।”
भीष्म कहते हैं, “सुनिए, यह अत्यन्त अद्भुत और महान रहस्य है, कि कौन-से कर्म से मरने के बाद कौन-सा फल मिलता है। तप से स्वर्ग, यश, आयु और सब भोग मिलते हैं; ज्ञान, विज्ञान, आरोग्य, सौन्दर्य, समृद्धि और धन भी। मौन-व्रत से सारा जगत वश में आता है; दान से सब भोग्य वस्तुएँ; दीक्षा से उत्तम कुल में जन्म। केवल फल-मूल पर जीने वाले राज्य पाते हैं; पत्तों पर जीने वाले और जल-मात्र पर जीने वाले स्वर्ग पाते हैं। गुरु की श्रद्धा-सेवा से विद्या; प्रति-दिन श्राद्ध से सन्तति; तीन बार स्नान से अनेक पत्नियाँ; जल-मात्र से प्रजापति-लोक मिलता है।”

भीष्म दान-फलों की लम्बी सूची देते हैं, “सत्य बोलने वाला देवताओं के साथ क्रीड़ा करता है। अहिंसा से आरोग्य। ब्राह्मण-सेवा से राज्य और ब्राह्मणत्व। जल और अन्न के दान से अक्षय यश और भोग। अभय-दान से सब बन्धनों से मुक्ति। दीप-दान से उत्तम दृष्टि। सुगन्ध और माला के दान से दूर तक फैला यश। जो स्वर्ण-मढ़े सींगों वाली सहस्र गौएँ दान करता है वह स्वर्ग पाता है। जो सवत्सा कपिला गौ, काँसे के दोहन-पात्र और स्वर्ण-मढ़े सींगों सहित दान करे, वह गौ के रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक स्वर्ग में रहता है और सात पीढ़ियों को नरक से उबारता है। गौ-दान डूबते को नौका की तरह बचाता है। ब्राह्मण को घर-दान करने वाला उत्तर-कुरु में वास पाता है। स्वर्ण-दान स्वर्ग देता है, शुद्ध-स्वर्ण-दान और अधिक पुण्य; छत्र-दान से भवन, पादुका-दान से वाहन, वस्त्र-दान से रूप, सुगन्ध-दान से सुगन्धित जन्म मिलता है।”
अन्त में भीष्म वीर-शय्या की परम महिमा कहते हैं, “जो वीर रणभूमि में वीरों की शय्या (वीर-शय्या) पर प्राण त्यागता है, वह साक्षात पितामह ब्रह्मा के तुल्य हो जाता है। इससे ऊँची कोई गति नहीं, ऐसा महर्षियों ने घोषित किया है।” यह सुनकर युधिष्ठिर वीर-गति के अभिलाषी हो गए और गृहस्थ-जीवन से विरक्ति त्याग दी। उन्होंने भाइयों से कहा, “पितामह के वचन पर आपकी श्रद्धा हो,” और द्रौपदी सहित सब पाण्डवों ने “हाँ” कहकर अनुमोदन किया।
समझने की कुंजी (कपिला गौ और रोम-संख्या): “कपिला” = भूरी/ताम्र-वर्ण की गौ, दान में परम पुण्य-दायिनी। “गौ के रोमों की संख्या के बराबर वर्ष स्वर्ग” एक अतिशय-छन्द है जो दान के अपार फल को दर्शाता है, इसे अक्षरशः गणित नहीं, फल की विशालता का काव्य-माप समझें। “वीर-शय्या” वही बाण-शय्या-तुल्य रण-मृत्यु है, जिस पर स्वयं भीष्म लेटे हैं, इसी से यह उपदेश आत्म-कथा भी बन जाता है।
सार: युधिष्ठिर के युद्ध-शोक के उत्तर में भीष्म कर्म-फल का विशाल कोश खोलते हैं, तप, मौन, दान, अहिंसा, गौ-दान के अलग-अलग फल। चरम घोषणा वीर-शय्या की है, रण में वीर-मृत्यु ब्रह्म-तुल्य गति देती है। इसी से युधिष्ठिर की विरक्ति शान्त हुई और वे गृहस्थ-धर्म में स्थिर हो गए।
वृक्ष और तालाब, और परम दान
युधिष्ठिर वृक्ष लगाने और तालाब खुदवाने के फल पूछते हैं। भीष्म कहते हैं, “जल से भरा तालाब मित्र के घर के समान सुखद है, सूर्य और देवताओं को प्रिय। जो तालाब खुदवाता है वह तीनों लोकों के आदर का पात्र होता है। तालाब धर्म, अर्थ और काम, तीनों का साधक है। देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पितर, उरग, राक्षस और स्थावर प्राणी तक जल-भरे तालाब को आश्रय मानते हैं। जिसके तालाब में वर्षा-ऋतु में जल रहे वह अग्निहोत्र का फल पाता है; शरद में जल रहे तो सहस्र-गो-दान का; ग्रीष्म में जल रहे तो अश्वमेध का। जिसके तालाब में गौएँ और धर्मनिष्ठ जन जल पीते हैं, वह अपने पूरे कुल को उबार लेता है। हे पुत्र, परलोक में जल दुर्लभ है। जल का दान शाश्वत सुख देता है। यहीं तिल दीजिए, जल दीजिए, अन्धकार-स्थलों में दीप दीजिए। जल का दान सब दानों में श्रेष्ठ है।”
वृक्ष-रोपण पर भीष्म कहते हैं, “स्थावर वस्तुओं के छह वर्ग हैं, वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली, त्वक्सार (बाँस आदि) और भाँति-भाँति की तृण। वृक्ष लगाने वाला इस लोक में यश और परलोक में शुभ फल पाता है, पितृ-लोक में पूजित होता है, और देव-लोक में भी उसका नाम नहीं मिटता। वृक्ष लगाने वाला अपने पैतृक और मातृ-दोनों कुलों के पूर्वजों और वंशजों को उबार लेता है। जो वृक्ष मनुष्य लगाता है वे उसकी सन्तान हैं, वे फूलों से देवताओं को, फलों से पितरों को, और छाया से अतिथियों को तृप्त करते हैं। वृक्ष अपने रोपक को वैसे ही उबारते हैं जैसे पुत्र अपने पिता को। अतः कल्याण चाहने वाला तालाबों के किनारे वृक्ष लगाए और उन्हें अपनी सन्तान की तरह पाले।”
युधिष्ठिर वेदेतर शास्त्रों में वर्णित दानों में सर्वश्रेष्ठ दान पूछते हैं, “वह कौन-सा दान है जो दाता के साथ परलोक तक जाता है?” भीष्म कहते हैं, “सब प्राणियों को प्रेम और अभय का आश्वासन, हर प्रकार की हिंसा से विरति, संकट में पड़े को सहायता, याचक की इच्छा के अनुरूप दान, और वे दान जिन्हें दाता ‘मैंने दिया’ कहकर मन में भी न रखे, ये परम और श्रेष्ठ दान हैं। स्वर्ण-दान, गौ-दान और भूमि-दान पाप-नाशक हैं, दाता को उसके पापों से उबारते हैं। जो दान को अक्षय बनाना चाहे, वह योग्य पात्रों को घर की सर्वोत्तम वस्तुएँ दे। जो प्रिय वस्तुएँ देता है और औरों का प्रिय करता है, उसे सदा प्रिय वस्तुएँ मिलती हैं।”
भीष्म ब्राह्मण-सेवा को धर्म का केन्द्र बताते हैं, “वे ब्राह्मण जो किसी से माँगते नहीं, सन्तुष्ट रहते हैं, और बिना याचना मिली भिक्षा पर जीते हैं, तीव्र विष वाले सर्प के समान तेजस्वी हैं; उन्हें गुप्तचरों से खोजकर भी दान देकर अपनी रक्षा करनी चाहिए। उन्हें घर, सेवक, वस्त्र और भोग की सब वस्तुएँ देनी चाहिए, और वह भी कर्तव्य-भाव से, फल की इच्छा से नहीं।” फिर भीष्म एक मार्मिक शपथ लेते हैं, “हे युधिष्ठिर, मुझे न मेरे पिता, न माता, न पितामह, न अपना जीवन ब्राह्मणों से अधिक प्रिय है। पृथ्वी पर आपसे अधिक प्रिय मुझे कुछ नहीं, पर ब्राह्मण तो आपसे भी अधिक प्रिय हैं। इसी सत्य की शपथ से मैं उन पुण्य-लोकों को देखता हूँ जो शान्तनु के हैं, और जहाँ ब्रह्मा प्रकाशमान हैं; वहीं मैं जाऊँगा।”
एक उप-कथा: भीष्म स्त्री-धर्म से ब्राह्मण-सेवा की उपमा देते हैं, जैसे स्त्री का एक शाश्वत धर्म पति की श्रद्धा-सेवा है, वैसे ही क्षत्रिय का शाश्वत धर्म ब्राह्मण की सेवा है। प्राचीन रीति में क्षत्रिय ब्राह्मण की, वैश्य राजा (क्षत्रिय) की, और शूद्र वैश्य की सेवा करता था। ब्राह्मण इतना तेजस्वी (अग्नि-तुल्य) माना गया कि शूद्र उसे स्पर्श किए बिना, दूर से ही सेवा करता; केवल क्षत्रिय और वैश्य ही स्पर्श-पूर्वक सेवा कर सकते थे। यह पाठ का प्राचीन वर्ण-शिष्टाचार है।
सार: तालाब-खुदाई और वृक्ष-रोपण को भीष्म अक्षय-पुण्य के कर्म बताते हैं, जल-दान सब दानों में श्रेष्ठ, और वृक्ष रोपक की सन्तान की तरह उसे उबारते हैं। फिर वे परम दान को परिभाषित करते हैं, अभय, अहिंसा, और गुप्त-निरभिमान दान। अन्त में अपनी अद्भुत शपथ से ब्राह्मण-प्रेम को युधिष्ठिर के प्रेम से भी ऊपर रखते हैं।
अयाचक का दान, राजा का धर्म, और भूमि-दान की परम महिमा
युधिष्ठिर पूछते हैं, “दो ब्राह्मण समान-शील, समान-विद्या, समान-कुल के हों, पर एक माँगता है और दूसरा नहीं, तो किसको दान देना अधिक पुण्य है?” भीष्म कहते हैं, “अयाचक को दिया दान याचक को दिए से अधिक पुण्य है। क्षत्रिय की दृढ़ता दूसरों की रक्षा में है, ब्राह्मण की दृढ़ता न-माँगने में। याचक को दान करुणावश दीजिए, पर जो माँगते नहीं और दरिद्रता में डूबे हैं, उन्हें आदर से बुलाकर सहायता दीजिए। ऐसे ब्राह्मणों को राख से ढकी अग्नि समझिए, जो तप से सारी पृथ्वी भस्म कर सकते हैं। उन्हें सुन्दर घर, सेवक, वस्त्र और भोग-सामग्री से सम्मानित कीजिए।”
भीष्म दान-यज्ञ का विधान देते हैं, “आपके घर में मध्याह्न में दान-यज्ञ चले; अतिथियों को भली-भाँति भोजन कराकर गौ, स्वर्ण और वस्त्र दीजिए। प्रातः और सायं की दो आहुतियों, और मध्याह्न के इस दान-यज्ञ से देव, पितर और ब्राह्मण तृप्त होते हैं, और विश्वेदेव प्रसन्न होते हैं। सब प्राणियों पर करुणा, सबका हक देना, इन्द्रिय-संयम, त्याग, स्थिरता और सत्य, यही इस दान-यज्ञ का अवभृथ-स्नान (समापन-स्नान) है।”
युधिष्ठिर दान और यज्ञ में श्रेष्ठ पूछते हैं। भीष्म राजधर्म की ओर मुड़ते हैं, “क्षत्रिय प्रायः उग्र कर्मों में लगा रहता है, इसी से यज्ञ और दान उसे शुद्ध करते हैं। राजा प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञ करे। पर ऐसा धन यज्ञ में न लगे जो कठोरता और बल-प्रयोग से लूटा गया हो; वैसे यज्ञ सज्जन नहीं सराहते। राजा वृद्धों, बालकों, अन्धों और विकलांगों के धन की रक्षा करे। सूखे में कुओं के जल से उगाई फसल पर कर न ले, न रोती हुई स्त्रियों से धन ले। दरिद्र और असहाय से लिया धन राज्य और राजा की समृद्धि का नाश करता है।”
भीष्म कठोर सत्य कहते हैं, “उन मनुष्यों से बढ़कर पापी कोई नहीं जिनके अन्न की ओर बच्चे ललचाई दृष्टि से देखें पर खा न सकें। यदि आपके राज्य में कोई विद्वान ब्राह्मण भूख से ऐसे ही तड़पे, तो आप पर भ्रूण-हत्या का पाप लगेगा। राजा शिवि ने कहा था, धिक्कार है उस राजा को जिसके राज्य में ब्राह्मण या कोई भी भूख से तड़पे।” भीष्म चेतावनी देते हैं, “जो राजा प्रजा का रक्षक कहकर भी रक्षा न करे, केवल उनका धन लूटे, मर्यादाएँ भ्रष्ट करे, करुणा-हीन हो, उसे प्रजा मिलकर पागल कुत्ते की तरह मार डाले। जो राजा रक्षा नहीं करता उस पर प्रजा के पापों का चौथाई भाग चढ़ता है; और जो रक्षा करता है, उसे प्रजा के पुण्यों का चौथाई मिलता है।”
अन्ततः युधिष्ठिर सब दानों में श्रेष्ठ पूछते हैं। भीष्म घोषित करते हैं, “सब दानों में भूमि-दान प्रथम है। भूमि अचल और अविनाशी है, स्वामी की सब मनोकामनाएँ पूरी करती है, वस्त्र, रत्न, पशु, धान और जौ देती है। भूमि साक्षात समृद्धि (लक्ष्मी) है, महादेवी है। जो इसका दान करता है उसे अगले जन्म में वह अपना स्वामी बना लेती है, वह पुनः मनुष्य और भू-पति होकर जन्मता है। भूमि-दान घोर पापी, यहाँ तक कि ब्रह्म-हत्यारे और असत्य-वादी को भी शुद्ध कर देता है। माता की तरह भूमि दाता और ग्रहीता दोनों को पवित्र करती है। इसका एक गुप्त प्रिय नाम है, प्रियदत्ता।”
एक उप-कथा: भीष्म भूमि-दान का एक वैदिक छन्द सुनाते हैं, जिसे सुनकर जमदग्नि-पुत्र राम (परशुराम) ने सम्पूर्ण पृथ्वी कश्यप को दान कर दी थी। छन्द कहता है, “मुझे दान में लीजिए; मुझे दान कर दीजिए; मुझे दान करके आप मुझे फिर पाएंगे।” अर्थात जो इस लोक में दिया जाता है वही अगले लोक में पुनः मिलता है। यही उस अश्वमेध-तुल्य पुण्य का रहस्य है जो भूमि-दान में निहित है।
भीष्म समाप्त करते हैं, “जैसे माता अपने बच्चे को स्तन से दूध पिलाती है, वैसे ही भूमि भूमि-दाता को सब रसों से तृप्त करती है। मृत्यु, यम, दण्ड, और घोरतम पाप भी भूमि-दाता को छू नहीं सकते। एक गोचर्म-भर (एक गाय की खाल जितनी) भूमि का दान भी निर्धनता से किए सब पापों को धो देता है, और दस पीढ़ियों, पैतृक और मातृ-दोनों, को उबार लेता है। राजा का सारा धन वस्तुतः ब्राह्मणों का है। धर्म-नीति का ज्ञाता राजा ही राज्य की समृद्धि का मूल है; अधर्मी और नास्तिक राजा की प्रजा कभी सुख से सो या जाग नहीं सकती।”
सार: भीष्म अयाचक-दान को श्रेष्ठ बताते हैं, और राजधर्म जोड़ते हैं, बलात लूटे धन से यज्ञ निष्फल, दरिद्र से कर लेना राज्य-नाशक, रक्षा न करने वाला राजा पाप का भागी और वध-योग्य। चरम घोषणा भूमि-दान की है, सब दानों में प्रथम, “प्रियदत्ता” नाम वाली भूमि माता की तरह दाता-ग्रहीता दोनों को पवित्र करती और अश्वमेध-तुल्य फल देती है। परशुराम का कश्यप को पृथ्वी-दान इसी का दृष्टान्त है।
भूमि का दान, जो सब दानों में अग्रणी है
शर-शय्या (बाणों की सेज, जिस पर भीष्म घायल पड़े थे) से पितामह भीष्म युधिष्ठिर को दान-धर्म का उपदेश दे रहे थे। उन्होंने कहा, हे युधिष्ठिर, समस्त प्रकार के दानों में भूमि (पृथ्वी, ज़मीन) का दान अग्रणी कहा गया है। भूमि अचल है और अविनाशी। जो उसका स्वामी होता है, उसके मन की समस्त उत्तम वस्तुएँ वही प्रदान कर देती है। वस्त्र, रत्न, मणि, पशु, धान और जौ, सब कुछ वह देती है। समस्त प्राणियों में जो भूमि का दाता होता है, वह सदा-सदा के लिए समृद्धि में बढ़ता जाता है। जब तक यह पृथ्वी रहती है, तब तक उसका दाता समृद्ध होता रहता है।
भूमि के दान से बढ़कर कोई दान नहीं है। हमने सुना है कि सब मनुष्यों ने थोड़ी-थोड़ी भूमि का दान किया है, और इसी कारण सब थोड़ी-थोड़ी भूमि का उपभोग करते हैं। इस लोक में हो या अगले में, सब प्राणी अपने ही कर्मों पर आश्रित दशा में जीते हैं। भूमि साक्षात् श्री (समृद्धि की देवी) है। वह महान् देवी है। जो इस जीवन में दूसरों को उसका दान करता है, उसे वह अगले जन्म में अपना स्वामी बना लेती है। हे राजन्, जो पुरुष इस अविनाशी भूमि को दक्षिणा (यज्ञ या धर्म-कार्य में दी जाने वाली भेंट) के रूप में दे देता है, वह अगले जन्म में मनुष्य रूप में जन्म लेकर भूमि का स्वामी होता है। इस जीवन में किसी के भोग की मात्रा उसके पूर्वजन्म के दान की मात्रा के अनुरूप ही होती है। शास्त्रों का यही निष्कर्ष है।

क्षत्रिय को या तो भूमि का दान करना चाहिए, या युद्ध में अपने प्राण त्याग देने चाहिए। क्षत्रियों के लिए समृद्धि का परम स्रोत यही है। हमने सुना है कि दी हुई भूमि देने वाले को शुद्ध और पवित्र कर देती है। जो पुरुष पापाचारी है, जो ब्राह्मण-हत्या और मिथ्या-भाषण तक का दोषी है, वह भी भूमि के दान से शुद्ध हो जाता है। ऐसा दान उस पापी को भी उसके समस्त पापों से उबार लेता है। धर्मात्मा लोग पापी राजाओं से केवल भूमि का ही दान स्वीकार करते हैं, अन्य कोई वस्तु नहीं। माता के समान, दी हुई भूमि देने वाले और लेने वाले, दोनों को शुद्ध कर देती है। भूमि का एक प्राचीन और गुप्त नाम है, प्रियदत्ता (वह जो प्रिय रूप में दी जाए)। दी जाए या ग्रहण की जाए, उसे प्रिय यही नाम लगता है, प्रियदत्ता।
जो राजा किसी विद्वान् ब्राह्मण को भूमि का दान करता है, वह उस दान से अगले जन्म में राज्य पाता है, और राजा के समान पद को प्राप्त होता है। भूमि का स्वामी ही भूमि का दान करने में समर्थ है, और जो योग्य पात्र न हो वह उसे ग्रहण न करे। जो किसी धर्मात्मा की भूमि छीन लेता है, उसे कभी भूमि नहीं मिलती। जो मनुष्य आश्रय के अभाव में, जीविका के अभाव में पाप करता है, वे सब पाप केवल इतनी भूमि के दान से, जितनी एक गाय के चमड़े से ढकी जा सके, धुल जाते हैं।
पूर्वजों का मत था कि जो अश्वमेध (अश्व-यज्ञ, राजसूय जैसा महान् राजकीय यज्ञ) करता है और जो धर्मात्मा को भूमि का दान करता है, इन दोनों में बहुत थोड़ा अन्तर है। विद्वान् लोग धर्म के अन्य समस्त कर्मों के फल में संदेह करते हैं, पर जिस एक कर्म में वे संदेह नहीं करते, वह है भूमि का दान। भूमि का दाता मानो स्वर्ण, रजत (चाँदी), वस्त्र, मणि, मोती और बहुमूल्य रत्न, सब कुछ दे देता है। तप, यज्ञ, वेद-ज्ञान, सदाचार, लोभ का अभाव, सत्य में दृढ़ता, गुरुजनों, आचार्यों और देवताओं का पूजन, ये सब उसमें निवास करते हैं जो भूमि का दान करता है।
जैसे माता अपने स्तन के दूध से अपनी सन्तान का पालन करती है, वैसे ही भूमि समस्त रसों से उस पुरुष को तृप्त करती है जो उसका दान करता है। मृत्यु, वैकिंकर (यम का दूत), दण्ड, यम, अति भयंकर अग्नि, और समस्त घोर पाप, ये भूमि-दाता को स्पर्श नहीं कर सकते। जो शान्त-चित्त पुरुष भूमि का दान करता है, वह अपने लोक में रहने वाले पितरों (पूर्वजों) को और अपने लोक से आने वाले देवताओं को भी तृप्त करता है। जो किसी क्षीण, उदास, जीविका-विहीन, दुर्बलता से जर्जर पुरुष को भूमि देकर उसे जीविका का साधन प्रदान करता है, वह यज्ञ करने के समान सम्मान और पुण्य का अधिकारी होता है।
जो ब्राह्मण को जोती हुई, बीज-बोई हुई, या खड़ी फसल वाली भूमि, अथवा समस्त साधनों से सम्पन्न भवन का दान करता है, वह अगले जन्म में सबकी इच्छाएँ पूरी करने वाला होता है। जैसे चन्द्रमा दिन-प्रतिदिन बढ़ता है, वैसे ही भूमि-दान का पुण्य हर बार बढ़ता है जब वह भूमि फसल उपजाती है।
प्राचीन इतिहास के ज्ञानी भूमि-दान के विषय में एक श्लोक गाते हैं। उसी श्लोक को सुनकर जमदग्नि के पुत्र (परशुराम) ने सारी पृथ्वी कश्यप को दान कर दी थी। वह श्लोक यह है, “मुझे दान में ग्रहण कीजिए। मुझे दान कर दीजिए। मुझे दान करके, हे दाता, आप मुझे फिर पा लेंगे।” जो इस जीवन में दिया जाता है, वह अगले जन्म में फिर मिल जाता है।
समझने की कुंजी: “दक्षिणा” यज्ञ या किसी धर्म-कार्य के अन्त में पुरोहित या योग्य पात्र को दी जाने वाली भेंट है। “श्री” समृद्धि और सौभाग्य की देवी, लक्ष्मी का ही दूसरा नाम। “पितर” वे पूर्वज जो देहत्याग के पश्चात् पितृलोक में निवास करते हैं, जिनके निमित्त श्राद्ध किया जाता है।
भूमि-दाता दस पीढ़ी की पैतृक और मातृक, दोनों कुलों को उबार लेता है। इसी से उल्टा भी होता है, जो दी हुई भूमि को छीन लेता है, वह स्वयं को और दोनों ओर की दस पीढ़ियों को नरक में डाल देता है। इसी प्रसंग में पितामह ने एक प्राचीन आख्यान सुनाया, देवगुरु बृहस्पति और देवराज इन्द्र (मघवत्, शक्र, पुरन्दर, इन्हीं के नाम हैं) के बीच का संवाद।
सौ यज्ञों में, जिनमें प्रचुर दक्षिणा दी गई थी, विष्णु का पूजन करके मघवत् ने वाक्पटुओं में अग्रणी बृहस्पति से पूछा, “हे भगवन्, किस दान से मनुष्य स्वर्ग और परम कल्याण को प्राप्त होता है? वह दान कौन-सा है जो उच्च और अक्षय पुण्य देने वाला है?” बृहस्पति ने उत्तर दिया कि जो शुभ और समस्त रसों से भरी भूमि का दान करता है, उसके लिए सुरक्षित सुख का लोक कभी समाप्त नहीं होता। यदि अनेक पाप करके भी कोई द्विज-वर्ग (ब्राह्मण आदि, जिनका उपनयन-संस्कार होता है) को भूमि का दान करता है, तो वह उन समस्त पापों को वैसे ही त्याग देता है जैसे साँप अपनी केंचुली। भूमि का दाता मानो समुद्र, नदियाँ, पर्वत, वन, झीलें, तालाब, कुएँ और सोते, सब कुछ दे देता है।
बृहस्पति ने राजा को चेताया कि जिस प्रजा का राजा अधर्मी और नास्तिक हो, वह कभी सुखी नहीं रह सकती। ऐसे राजा के कुकर्मों से प्रजा सदा चिन्ता में डूबी रहती है। पर जिस प्रजा का राजा बुद्धिमान् और धर्मात्मा हो, वह सुख से सोती और सुख से जागती है। राजा को भूमि कभी किसी धर्मात्मा से छीननी नहीं चाहिए, उल्टे दान करनी चाहिए। दी हुई भूमि देने वाले के हर बार फसल देने पर वैसे ही बढ़ती जाती है जैसे जल पर गिरी तेल की एक बूँद चारों ओर फैल जाती है।
बृहस्पति के ये वचन सुनकर वासव (इन्द्र) ने उन्हें समस्त रत्नों, मणियों और नाना धन सहित सारी पृथ्वी का दान कर दिया। पितामह ने कहा, यदि श्राद्ध के अवसर पर भूमि-दान के माहात्म्य के ये श्लोक पढ़े जाएँ, तो न राक्षस और न असुर उस श्राद्ध में दी हुई आहुति का कोई अंश हड़प सकते हैं, और पितरों को दी गई आहुति अक्षय हो जाती है।
सार: भीष्म ने भूमि-दान को समस्त दानों में अग्रणी बताया। यह माता के समान देने और लेने, दोनों को शुद्ध करती है, घोर पापों तक से उबारती है, और दस पीढ़ियों के कुल को तार देती है। बृहस्पति-इन्द्र संवाद इसी का समर्थन करता है, और इसे श्राद्ध में पढ़ने का विधान बताया गया।
अन्न का दान, और नारद का वचन
युधिष्ठिर ने पूछा, जब राजा दान करना चाहे, तो उसे उत्तम गुणों से सम्पन्न ब्राह्मणों को कौन-से दान करने चाहिए, जिनसे वे तत्काल तृप्त हों, और जिनका फल इस लोक और परलोक, दोनों में मिले? भीष्म बोले, ये ही प्रश्न मैंने पूर्वकाल में दिव्य रूप वाले नारद से पूछे थे। सुनिए, उन्होंने मुझे जो कहा वही मैं आपको सुनाता हूँ।

नारद ने कहा, देवता और समस्त ऋषि अन्न की प्रशंसा करते हैं। संसार की गति और बुद्धि की समस्त शक्तियाँ अन्न पर ही टिकी हैं। अन्न के दान के समान कोई दान न हुआ है, न होगा। इस संसार में अन्न ही ऊर्जा और बल का कारण है। प्राण-वायु अन्न पर ही टिकी है। गृहस्थ, संन्यासी, तपस्वी, सब वर्ग अन्न पर आश्रित होकर जीते हैं। अपने सम्बन्धियों को (यदि आवश्यक हो तो) कष्ट सहकर भी अपनी समृद्धि चाहने वाले को किसी उदारचित्त ब्राह्मण या भिक्षु-वर्ग के व्यक्ति को अन्न का दान करना चाहिए।
गृहस्थ को अपने द्वार पर आए हुए व्यक्ति का कभी अनादर नहीं करना चाहिए, और न उसे लौटाकर अपमान करना चाहिए। चाण्डाल को या कुत्ते तक को दिया हुआ अन्न-दान कभी निष्फल नहीं जाता। जो मार्ग पर थका हुआ, अपरिचित पथिक को स्वच्छ अन्न देता है, वह महान् पुण्य पाता है। ब्राह्मण महान् प्राणी है। जब वह किसी के घर आकर माँगता है, “मुझे दीजिए,” तब वह गृहस्थ, चाहे पुण्य की इच्छा से हो या न हो, उस याचना को सुनकर ही महान् पुण्य पाता है। ब्राह्मण समस्त प्राणियों का अतिथि है। वह हर अन्न के प्रथम भाग का अधिकारी है।
नारद ने आगे कहा कि अन्न ही मनुष्यों का प्राण है। अन्न देने वाला मानो जीवन देता है, सब कुछ देता है। अन्न से ही धर्म और धन, दोनों प्रवाहित होते हैं। रोग की चिकित्सा या स्वास्थ्य भी अन्न से ही आता है। एक पूर्व कल्प (सृष्टि-चक्र) में प्रजापति ने कहा था कि अन्न ही अमृत है, अमरता का स्रोत। अन्न ही पृथ्वी है, अन्न ही स्वर्ग है, अन्न ही अन्तरिक्ष है। अन्न के अभाव में देह को बनाने वाले पंच महाभूत (पाँच तत्त्व) संयुक्त अवस्था में नहीं रह सकते। अन्न के अभाव में निमन्त्रण, विवाह और यज्ञ, सब रुक जाते हैं। अन्न न रहे तो वेद तक लुप्त हो जाते हैं।
नारद ने प्रकृति का यह चक्र समझाया, प्राणों के स्वामी वायुदेव सूर्य द्वारा खींचे गए जल को बादलों के ऊपर पहुँचाते हैं। शक्र (इन्द्र) उस जल को पृथ्वी पर बरसाते हैं। सूर्य अपनी किरणों से भूमि की नमी सोखता है, और वायुदेव उस नमी को सूर्य से नीचे गिरने देते हैं। जब वह जल बादलों से पृथ्वी पर गिरता है, तब पृथ्वी देवी आर्द्र हो जाती है। तब लोग नाना प्रकार की फसलें बोते हैं, जिनकी उपज पर समस्त प्राणी-जगत् निर्भर है। उसी अन्न में समस्त प्राणियों के मांस, मेद, अस्थि और वीर्य की उत्पत्ति है। अग्नि और सोम, देह के भीतर रहने वाले दो कारक, उस वीर्य को रचते और बनाए रखते हैं।
समझने की कुंजी: “द्विज” का अर्थ “दो बार जन्मा हुआ”, अर्थात् वह जिसका उपनयन-संस्कार हो चुका हो। “कल्प” ब्रह्मा का एक दिन, सृष्टि का एक विशाल काल-चक्र। “पंच महाभूत” पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, ये पाँच तत्त्व जिनसे देह बनी है।
भीष्म ने कहा, नारद के इस उपदेश के पश्चात् मैं सदा अन्न का दान करता रहा हूँ। आप भी, हे राजन्, द्वेष से मुक्त होकर, प्रसन्न हृदय से अन्न का दान कीजिए। अन्न-दाताओं के लिए जो लोक सुरक्षित हैं, सुनिए। उन महात्माओं के भवन स्वर्ग में देदीप्यमान होते हैं, आकाश के तारों के समान उज्ज्वल, अनेक स्तम्भों पर खड़े, चन्द्रमा के बिम्ब के समान श्वेत, अनेक घंटियों से सज्जित, और नवोदित सूर्य के समान रक्तिम। उनमें फल देने वाले वृक्ष, तालाब, मार्ग, सभा-भवन, कूप और झीलें होती हैं। वहाँ दूध की नदियाँ बहती हैं और अन्न के पर्वत होते हैं। ये सब उन्हें मिलते हैं जो इस लोक में अन्न का दान करते हैं।
सार: नारद ने अन्न को प्राणों का आधार बताया, समस्त सृष्टि, धर्म, धन और वेद तक उसी पर टिके हैं। अन्न देना जीवन देना है, और चाण्डाल या कुत्ते तक को दिया अन्न व्यर्थ नहीं जाता। भीष्म ने स्वयं इसे जीवन भर निभाया और युधिष्ठिर को निभाने को कहा।
नक्षत्रों के अनुसार दान, देवकी और नारद का संवाद
युधिष्ठिर ने पूछा, अब मुझे दान के विषय में ग्रहों और नक्षत्रों के योग के बारे में बताइए। भीष्म ने कहा, इस प्रसंग में देवकी (श्रीकृष्ण की माता) और ऋषि-श्रेष्ठ नारद का प्राचीन संवाद सुनाया जाता है। एक बार नारद द्वारका पधारे, और देवकी ने उनसे यह प्रश्न पूछा।
नारद ने प्रत्येक नक्षत्र के लिए उपयुक्त दान बताया। कृत्तिका नक्षत्र में घी मिले पायस (खीर) से योग्य ब्राह्मणों को तृप्त करने पर महान् सुख के लोक मिलते हैं। रोहिणी में ब्राह्मणों के ऋण से मुक्त होने के लिए चावल, घी, दूध आदि के साथ दान देना चाहिए। मृगशिरा (सोमदैवत) में बछड़े सहित गाय देने वाला स्वर्ग के परम सुखद लोक में जाता है। पुनर्वसु में पकवान आदि का दान करने पर व्यक्ति सुन्दर रूप और यश पाता है, और अगले जन्म में अन्न-समृद्ध कुल में जन्म लेता है। पुष्य में स्वर्ण का दान करने वाला अंधकार के बीच सोम (चन्द्रमा) के समान चमकता है। आश्लेषा में चाँदी के बैल का दान करने वाला हर भय से मुक्त होकर समृद्धि पाता है।
मघा में तिल भरे मिट्टी के पात्र देने पर सन्तान और पशु मिलते हैं। पूर्वा-फाल्गुनी में उपवास रखकर फाणित (गुड़ का रस) मिला अन्न देने का फल महान् समृद्धि है। उत्तरा-फाल्गुनी में घी, दूध और षष्टिक चावल देने पर स्वर्ग में बड़ा सम्मान मिलता है, और इस नक्षत्र में किया दान अक्षय होता है। हस्त में चार हाथियों सहित रथ का दान महान् सुख के लोक देता है। चित्रा में बैल और सुगन्ध का दान देने वाला नन्दन-वन में देवताओं के समान विहार करता है। स्वाति में धन का दान इच्छित लोक और यश देता है। विशाखा में बैल, दूध देने वाली गाय, धान से भरी गाड़ी और वस्त्र देने पर पितर और देवता तृप्त होते हैं।
अनुराधा में वस्त्र और अन्न का दान सौ युगों तक स्वर्ग में सम्मान देता है। ज्येष्ठा में मूल सहित कलंबी शाक का दान समृद्धि देता है। मूल में फल-मूल का दान पितरों को तृप्त करता है। पूर्वाषाढ़ा में दही से भरे पात्र देने पर अगले जन्म में गोधन-सम्पन्न कुल मिलता है। उत्तराषाढ़ा में घी और गन्ने के रस सहित जौ का जल देने पर हर इच्छा पूरी होती है। अभिजित् योग में बुद्धिमानों को दूध, मधु और घी देने वाला स्वर्ग में सम्मानित होता है। श्रवण में कम्बल या मोटे वस्त्र देने पर व्यक्ति श्वेत रथ पर चढ़कर हर सुखद लोक में विचरता है। धनिष्ठा में बैल जुते वाहन या वस्त्र-धन का ढेर देने पर अगले जन्म में स्वर्ग मिलता है।
शतभिषा में अगर और चन्दन की सुगन्ध देने पर अप्सराओं का साथ मिलता है। पूर्वाभाद्रपदा में राजमाष (एक प्रकार की दाल) का दान अगले जन्म में महान् सुख देता है। उत्तरा में मेष (भेड़) का मांस-दान पितरों को तृप्त करता है। रेवती में दुहने के पात्र सहित गाय देने पर वह गाय अगले लोक में हर इच्छा पूरी करने को तैयार रहती है। अश्विनी में घोड़े जुते रथ का दान देने वाला अगले जन्म में हाथी-घोड़े-रथ-सम्पन्न कुल में जन्म लेता है। भरणी में गाय और तिल का दान महान् यश और गोधन देता है। देवकी ने यह सुनकर अपनी पुत्रवधुओं (श्रीकृष्ण की पत्नियों) को यह उपदेश सुनाया।
समझने की कुंजी: भारतीय ज्योतिष में 27 नक्षत्र हैं, जिनमें से प्रत्येक के साथ चन्द्रमा का योग शुभ-अशुभ काल बताता है। प्रत्येक नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता और गुण-स्वभाव होते हैं, इसी से किस नक्षत्र में कौन-सा दान फलदायी है, यह विधान बना। “योग” यहाँ ग्रह-नक्षत्र का विशेष संयोग है, जैसे अभिजित्।
सार: नारद ने देवकी को सत्ताईस नक्षत्रों के अनुसार उचित दान का विधान क्रम से बताया, खीर से लेकर गाय, स्वर्ण, वस्त्र, मांस और रथ तक, प्रत्येक का अपना फल। देवकी ने यह ज्ञान आगे अपनी पुत्रवधुओं को दिया।
स्वर्ण, जल, घी, छत्र और पादुका का दान
भीष्म ने अनेक ऋषि-राजाओं के वचन उद्धृत किए। ब्रह्मा के पुत्र अत्रि ने कहा कि जो स्वर्ण का दान करते हैं, वे मानो संसार की हर वस्तु का दान करते हैं। राजा हरिश्चन्द्र ने कहा कि स्वर्ण का दान पाप-नाशक है, दीर्घायु देता है, और पितरों के लिए अक्षय पुण्य उत्पन्न करता है। मनु ने कहा कि जल का दान समस्त दानों में श्रेष्ठ है, इसलिए मनुष्य को कूप, तालाब और झीलें खुदवानी चाहिए। जिस कूप से अनेक प्राणी जल पीते हैं, वह उसके खोदने वाले के आधे पाप हर लेता है। जिसके कूप या तालाब में गाय, ब्राह्मण और सज्जन सदा अपनी प्यास बुझाते हैं, उसका सारा कुल नरक और पाप से उबर जाता है।
घी बृहस्पति, पूषन, भग, अश्विनीकुमारों और अग्निदेव को तृप्त करता है। घी उच्च औषधीय गुणों से युक्त है, यज्ञ की महती आवश्यकता है, और समस्त द्रवों में श्रेष्ठ है। जो आश्विन मास में ब्राह्मणों को घी का दान करता है, उसे अश्विनीकुमार प्रसन्न होकर सुन्दर रूप देते हैं। जो घी मिले पायस का दान करता है, उसके घर पर राक्षस आक्रमण नहीं करते। जो जल से भरे घड़ों का दान करता है, वह कभी प्यास से नहीं मरता।
जो ब्राह्मणों को रसोई के लिए और जाड़ा दूर करने के लिए ईंधन देता है, उसके समस्त कार्य सफल होते हैं, और अग्निदेव उस पर प्रसन्न होते हैं। जो छत्र (छाते) का दान करता है, उसे सन्तान और समृद्धि मिलती है, और वह कभी नेत्र-रोग से पीड़ित नहीं होता। ऋषि शाण्डिल्य ने कहा कि समस्त दानों में रथ का दान श्रेष्ठ है।
युधिष्ठिर ने पादुका (खड़ाऊँ) के दान के विषय में पूछा, उस ब्राह्मण के लिए जिसके पाँव तपती बालू से जल रहे हों। भीष्म बोले, जो ब्राह्मणों को उनके पैरों की रक्षा हेतु पादुका देता है, वह समस्त काँटों को रौंदकर हर कठिनाई पर विजय पाता है, और अपने समस्त शत्रुओं के सिर पर खड़ा रहता है। उसके पास स्वर्ण-रजत के, खच्चर जुते, उज्ज्वल वाहन आते हैं।
सार: भीष्म ने स्वर्ण (पाप-नाशक, अक्षय), जल (मनु के अनुसार दानों में श्रेष्ठ, कूप-तालाब खुदवाना), घी (यज्ञ का मूल, सुन्दरता देने वाला), छत्र, रथ और पादुका, प्रत्येक के दान का माहात्म्य और फल अलग-अलग बताया।
तिल, भूमि, गृह, गोशाला और गो का दान
युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्म ने तिल-दान का माहात्म्य बताया। तिल को स्वयम्भू ब्रह्मा ने पितरों के लिए श्रेष्ठ अन्न के रूप में रचा। इसी से तिल का दान पितरों को अत्यन्त प्रसन्न करता है। जो माघ मास में ब्राह्मणों को तिल देता है, उसे उस नरक में नहीं जाना पड़ता जो भयंकर जीवों से भरा है। तिल महर्षि कश्यप के अंगों से उत्पन्न हुए, इसी से दान में वे अत्यन्त प्रभावशाली माने गए। प्राचीनकाल में जब हवि (आहुति का घृत) अप्राप्य हो गया था, तब ऋषि कुशिक ने अपनी तीन यज्ञाग्नियों में तिल की आहुति देकर उत्तम गति पाई।
इसके पश्चात् भीष्म ने एक आख्यान सुनाया। एक बार देवता यज्ञ करने के इच्छुक होकर स्वयम्भू ब्रह्मा के पास गए, और यज्ञ के लिए शुभ भूमि माँगी, क्योंकि जिसने उचित रीति से भूमि नहीं पाई, वह यज्ञ का पुण्य नहीं पाता। ब्रह्मा ने उन्हें भूमि दी। देवताओं ने अगस्त्य, कण्व, भृगु, अत्रि, वृषाकपि, असित और देवल को बुलाकर हिमवान् पर्वत के वक्ष पर वह यज्ञ सम्पन्न किया, और उस यज्ञ के पुण्य का छठा भाग भूमि-दान को अर्पित कर दिया।
भीष्म ने सावधान किया, बंजर, झुलसी, श्मशान के निकट की, या किसी पापी के द्वारा भोगी हुई भूमि कभी दान न करे। जब कोई दूसरे की भूमि पर पितरों का श्राद्ध करता है, तो पितर उस भूमि के दान और श्राद्ध, दोनों को व्यर्थ कर देते हैं। इसलिए बुद्धिमान् को छोटी ही सही, पर मोल ली हुई भूमि का दान करना चाहिए, क्योंकि क्रय की गई भूमि पर दिया पिण्ड अक्षय होता है। वन, पर्वत, नदियाँ और तीर्थ अस्वामिक माने गए हैं, वहाँ श्राद्ध के लिए भूमि खरीदने की आवश्यकता नहीं।
एक उप-कथा: चर्मण्वती नदी की उत्पत्ति। प्राचीनकाल में राजा रन्तिदेव ने एक भव्य यज्ञ किया जिसमें असंख्य गायों की बलि दी गई। उन वध की गई गायों के चमड़ों से जो रस निकला, उससे एक नदी बनी, जो चर्मण्वती कहलाई। भीष्म ने स्पष्ट कहा कि अब गायें यज्ञ-योग्य पशु नहीं रहीं, वे अब केवल दान-योग्य पशु हैं।
फिर भीष्म ने गो-दान का माहात्म्य बताया। गायें समस्त तपस्वियों से श्रेष्ठ मानी गई हैं, और इसी से महादेव ने उनके सानिध्य में तप किया। गायें ब्रह्मलोक में सोम के साथ निवास करती हैं। गायें मनुष्यों को दूध, घी, दही, गोबर, चर्म, अस्थि, सींग और बाल से लाभ पहुँचाती हैं। उन्हें न शीत व्यापता है, न ताप, न वर्षा। गाय का दूध अमृत है, घी यज्ञ की श्रेष्ठ आहुति है। गायें प्राणियों की प्राण-वायु और परम आश्रय हैं। जो हज़ार गायों का दान करता है, उसे नरक नहीं जाना पड़ता।
भीष्म ने यह भी स्पष्ट किया कि गाय किसे न दें, वध करने वाले को नहीं, खेत जोतने वाले को नहीं, नास्तिक को नहीं, और न उसको जिसका पेशा ही गाय रखना हो। ऐसे पापी को गाय देने वाला सदा-सदा के नरक में डूबता है। दुबली, मृत बछड़े जनने वाली, बाँझ, रोगी, अंग-हीन, या परिश्रम से जर्जर गाय ब्राह्मण को न दे। जो दस हज़ार गायें देता है, वह इन्द्र के साथ स्वर्ग में विहार करता है।
समझने की कुंजी: “हवि” यज्ञ की अग्नि में डाली जाने वाली आहुति, विशेषकर घृत। “हव्य” देवताओं को अर्पित आहुति, “कव्य” पितरों को अर्पित आहुति। “पिण्ड” श्राद्ध में पितरों को अर्पित किया जाने वाला चावल या जौ का गोला। “स्वयम्भू” स्वयं उत्पन्न हुए, ब्रह्मा का विशेषण।
सार: तिल पितरों का श्रेष्ठ अन्न (कश्यप के अंगों से उत्पन्न); भूमि-दान में मोल ली हुई शुद्ध भूमि का विधान; गायें अब यज्ञ-योग्य नहीं, दान-योग्य हैं (चर्मण्वती की कथा से यही मोड़); और गो-दान किसे करें, किसे न करें, इसका सूक्ष्म विवेक।
जल का दान, और ब्राह्मण-यम संवाद
युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्म ने जल और पेय के दान का माहात्म्य बताया। अन्न या जल के दान से जो पुण्य मिलता है, वैसा किसी अन्य दान से नहीं मिल सकता। जल के बिना कुछ भी अस्तित्व में नहीं रह सकता। ग्रहों के स्वामी सोम जल से उत्पन्न हुए। अमृत, सुधा, स्वधा, दूध, और हर प्रकार का अन्न, औषधीय लताएँ, सब जल से उत्पन्न होते हैं। देवताओं का भोजन अमृत है, नागों का सुधा, पितरों का स्वधा, पशुओं का घास, और मनुष्यों का अन्न, ये सब जल से ही जन्मते हैं। इसी से जल या पेय के दान से बढ़कर कुछ नहीं।
भीष्म ने राजा शिवि का उदाहरण याद दिलाया, जिन्होंने कबूतर को प्राण-दान देकर जो गति पाई, वही गति अन्न-दाता को मिलती है। अन्न-दाता मानो जीवन का ही दान करता है, और जीवन के दान से बढ़कर इस संसार में कोई दान नहीं।
फिर भीष्म ने एक प्राचीन ब्राह्मण और यमराज का संवाद सुनाया। गंगा और यमुना के बीच, यमुना नामक पहाड़ी की तलहटी में, पर्णशाला नामक एक रमणीय नगर था, जहाँ अनेक विद्वान् ब्राह्मण रहते थे। एक दिन मृत्यु के स्वामी यम ने अपने एक दूत को आज्ञा दी, जो काले वस्त्र पहने, रक्त-वर्ण नेत्रों वाला, और जिसके पाँव, आँखें और नाक कौवे के समान थे। यम ने कहा, “जाओ, उस ब्राह्मण-नगर से अगस्त्य-वंश के, शर्मिन् नामक, मानसिक शान्ति में लीन और विद्वान् पुरुष को ले आओ, जो वेद पढ़ाने वाला आचार्य है। उसी पड़ोस में उसी वंश का उसके समान एक और पुरुष रहता है, उसे मत लाना। उसे आदर से लाना, घसीटकर नहीं।”
दूत ने वहाँ पहुँचकर ठीक उल्टा किया। जिसे यम ने मना किया था, उसी पर आक्रमण कर उसी को ले आया। उस ब्राह्मण को देखते ही महातेजस्वी यम उठ खड़े हुए और उन्होंने उसका विधिवत् पूजन किया। फिर यम ने दूत को आज्ञा दी, “इसे वापस ले जाओ और दूसरे को लाओ।” यह सुनकर वह ब्राह्मण बोला, “मैंने वेदाध्ययन पूरा कर लिया है और अब संसार में मेरी आसक्ति नहीं रही। मेरी मर्त्य आयु का जो भी काल शेष हो, मैं उसे यहीं रहकर बिताना चाहता हूँ।” यम ने कहा, “मैं काल से नियत किसी की आयु का ठीक-ठीक माप नहीं जानता, और काल की प्रेरणा के बिना मैं किसी को यहाँ निवास नहीं दे सकता। हे विद्वन्, अपने धाम लौट जाइए। बताइए, मैं आपके लिए और क्या कर सकता हूँ?”
ब्राह्मण ने पूछा, “मुझे वे कर्म बताइए जिन्हें करके महान् पुण्य मिले। आप तीनों लोकों में इस विषय के परम प्रमाण हैं।” यम बोले, “सुनो, तिल का दान परम श्रेष्ठ है, अक्षय पुण्य देता है, जितना तिल दे सको दो। वैशाख की पूर्णिमा को ब्राह्मणों को तिल देना चाहिए, और जब भी सम्भव हो, उन्हें तिल खिलाना और छूने देना चाहिए। इसी प्रकार जल का दान करो, मार्गों पर प्याऊ बनवाओ, कूप-तालाब-झीलें खुदवाओ। भोजन के पश्चात् विशेषकर पीने के लिए जल का दान करो।” दूत उसे वापस उसके धाम ले गया, और फिर यम-इच्छित असली शर्मिन् को लाया। यम ने उस धर्मात्मा ब्राह्मण का भी पूजन किया, उससे संवाद किया, और वही उपदेश देकर लौटा दिया।
भीष्म ने आगे कहा, जल के दान के समान ही यम पितरों के हित के लिए अंधेरे स्थानों में दीप-दान की प्रशंसा करते हैं। जो अंधेरे स्थान में दीप जलाता है, वह पितरों, देवताओं और स्वयं अपनी दृष्टि-शक्ति को बढ़ाता है। रत्नों का दान भी श्रेष्ठ कहा गया है। जो ब्राह्मण रत्न-दान पाकर उसे ब्राह्मणों को ही दे देता है, वह स्वयं अक्षय पुण्य पाता है और मूल दाता को भी अक्षय पुण्य देता है।
समझने की कुंजी: “सुधा” नागों का अमृत-समान पेय। “स्वधा” वह मन्त्र-शब्द और पेय जो पितरों को अर्पित होता है (जैसे देवताओं के लिए “स्वाहा”)। “प्याऊ” मार्ग पर पथिकों को निःशुल्क जल पिलाने का स्थान।
सार: जल समस्त अन्न और प्राणों का मूल है, इसी से जल-दान परम है। यम-ब्राह्मण आख्यान में दूत भूल से दूसरे ही को ले आया, पर यम ने धर्म का पालन करते हुए उसे आदर से लौटाया और तिल, जल तथा दीप-दान का उपदेश दिया, जो दोनों ब्राह्मणों ने लौटकर निभाया।
गाय, भूमि और विद्या, तीन समान दान; राजा नृग की कथा
युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्म ने कहा कि तीन ऐसे दान हैं जो एक ही नाम (गो) से पुकारे जाते हैं और समान पुण्य देते हैं, और तीनों हर इच्छा पूरी करते हैं, गाय, भूमि और ज्ञान। जो अपने शिष्य को वेदों के धर्ममय वचन सुनाता है, वह भूमि और गाय के दान के समान पुण्य पाता है। गायें समस्त प्राणियों की माता हैं। कोई गाय को लात न मारे, न उनके बीच से होकर निकले। प्यासी गायों को जल से रोकने वाले को वे केवल देख भर लें, तो वह अपने समस्त सम्बन्धियों सहित नष्ट हो सकता है।
फिर युधिष्ठिर ने पूछा कि कैसी गायें दान-योग्य हैं और कैसी नहीं, और किसे दी जाएँ, किसे नहीं। भीष्म ने कहा, गाय कभी अधर्मी, पापी, लोभी, झूठे, या पितर-देव की पूजा न करने वाले को न दे। जो वेद-विद्या में निपुण, धन में निर्धन, अनेक सन्तानों वाले, और घर में अग्नि रखने वाले ब्राह्मण को दस गायें देता है, वह अनेक सुख-लोक पाता है। ब्राह्मण की वस्तु का हरण हर परिस्थिति में टाला जाए।
एक उप-कथा: राजा नृग और गोह की कथा। ब्राह्मण की वस्तु छीनने के दोष को समझाने के लिए भीष्म ने यह कथा सुनाई। पूर्वकाल में यदुवंश के कुछ युवक जल खोजते हुए घास-लताओं से ढके एक बड़े कूप पर पहुँचे। उसका मुँह साफ़ करने पर उन्होंने भीतर एक पर्वत जैसी विशाल गोह (एक प्रकार का बड़ा सरीसृप) देखी। रस्सियों और चमड़े के चिमटों से बहुत प्रयत्न करने पर भी वे उसे निकाल न सके, तो जनार्दन (श्रीकृष्ण) के पास गए।
वासुदेव ने स्वयं जाकर उस गोह को निकाला और पूछा कि वह कौन है। गोह ने कहा कि वह प्राचीन राजा नृग की आत्मा है, जिसने अनेक यज्ञ किए थे। माधव ने पूछा, “आपने तो अनेक धर्म-कर्म किए, कोई पाप न किया। हमने सुना है आपने ब्राह्मणों को लाखों-करोड़ों गायें दान कीं। फिर आपको यह दुर्गति क्यों मिली?” नृग ने उत्तर दिया, “एक बार एक ब्राह्मण की गाय, जो नित्य अग्नि-पूजन करता था, उसके घर से भटककर मेरे गो-समूह में आ मिली। मेरे ग्वालों ने उसे हज़ार गायों की गिनती में सम्मिलित कर लिया, और कालान्तर में मैंने स्वर्ग-सुख की इच्छा से वह गाय किसी ब्राह्मण को दान कर दी।
असली स्वामी लौटकर अपनी गाय खोजते-खोजते दूसरे के घर पहुँचा और बोला, ‘यह गाय मेरी है।’ दूसरे ने विवाद किया, और दोनों क्रोध में भरकर मेरे पास आए। एक बोला, ‘आपने यह गाय दान की थी।’ दूसरा बोला, ‘आपने मेरी गाय चुराई, यह मेरी है।’ मैंने उस ब्राह्मण से, जिसे गाय दी थी, सैकड़ों गायों के बदले उसे लौटाने की विनती की। पर उसने इनकार कर दिया, क्योंकि वह गाय बहुत दूध देती, बड़ी शान्त थी, और उसके अभी छुड़ाए गए दुर्बल बच्चे का पोषण कर रही थी। फिर मैंने मूल स्वामी से लाख गायों के बदले विनती की, पर उसने कहा, ‘मैं क्षत्रिय से दान नहीं लेता। आप बिना देर किए मुझे मेरी वही गाय दे दीजिए।’ मैंने स्वर्ण, रजत, घोड़े, रथ देने चाहे, पर उसने कुछ न लिया और चला गया।
“फिर काल की अनिवार्य प्रेरणा से मुझे यह लोक छोड़ना पड़ा। यमराज ने मेरा पूजन कर कहा, ‘हे राजन्, आपके पुण्य-कर्म का अन्त नहीं, पर एक छोटा-सा पाप आपसे अनजाने हुआ है। आपने राज्य पाते समय शपथ ली थी कि सबकी रक्षा करेंगे, वह शपथ पूरी तरह न निभी, और आपने ब्राह्मण की वस्तु ले ली। यही दुहरा दोष है। अभी भोगोगे या बाद में?’ मैंने कहा, ‘पहले दण्ड का कष्ट भोग लूँ, फिर सुख।’ इतना कहते ही मैं पृथ्वी पर गिर पड़ा। गिरते-गिरते मैंने यम के ये वचन सुने कि वासुदेव के पुत्र जनार्दन मुझे उबारेंगे, और पूरे एक हज़ार वर्ष बाद, जब इस पाप का फल समाप्त होगा, मैं अपने पुण्य से अर्जित अक्षय सुख-लोक पाऊँगा।” गोह-रूप में पड़े नृग की स्मृति लुप्त न हुई थी। श्रीकृष्ण की कृपा से उबरकर, उनकी अनुमति ले, नृग दिव्य रथ पर चढ़कर स्वर्ग चले गए।
नृग के जाने पर वासुदेव ने यह वचन कहा, कोई जानबूझकर ब्राह्मण की वस्तु न ले। ब्राह्मण की वस्तु, यदि ली जाए, तो लेने वाले को वैसे ही नष्ट कर देती है जैसे ब्राह्मण की गाय ने राजा नृग को नष्ट किया। और यह भी कि सज्जनों से भेंट कभी निष्फल नहीं जाती, देखो, नृग सत्पुरुष से भेंट करके ही नरक से उबरे।
समझने की कुंजी: नृग की कथा महाभारत की नैतिक सूक्ष्मता का उदाहरण है। नृग ने पाप करने की मंशा नहीं रखी, अनजाने में दूसरे की गाय दान कर दी और राज-शपथ ठीक से न निभा सके। फिर भी काल और कर्म का नियम उन्हें नहीं छोड़ता, और एक छोटा-सा अनजाना दोष भी हज़ार वर्ष की गोह-योनि देता है। यहाँ कोई सपाट “अच्छाई-बुराई” नहीं, अनभिप्रेत भूल का भी फल भोगना पड़ा।
सार: गाय, भूमि और विद्या, तीनों समान पुण्य के “गो” नामक दान हैं। राजा नृग की कथा से भीष्म ने दिखाया कि ब्राह्मण की वस्तु अनजाने भी छीनना घोर दोष है, पर सत्पुरुष (यहाँ श्रीकृष्ण) से भेंट उससे भी उबार लेती है।
नचिकेता की कथा, यमलोक की यात्रा और गो-दान का विधान

युधिष्ठिर के बार-बार आग्रह पर भीष्म ने ऋषि उद्दालक और उनके पुत्र नचिकेता का प्राचीन इतिहास सुनाया। एक बार उद्दालक ने नचिकेता से कहा कि वह उनकी सेवा करे। फिर एक दिन उद्दालक ने कहा, “स्नान और वेदाध्ययन में लीन रहकर मैं नदी-तट पर रखी समिधा (यज्ञ की लकड़ी), कुश, फूल, जल-कलश और शाक भूल आया हूँ, उन्हें ले आओ।” नचिकेता वहाँ गए, पर देखा कि सब कुछ धारा में बह चुका है। लौटकर बोले, “मुझे वे वस्तुएँ नहीं मिलीं।” भूख, प्यास और थकान से व्याकुल उद्दालक ने सहसा क्रोध में आकर पुत्र को शाप दे दिया, “आज आप यम से मिलिए!”
वाणी के इस वज्र से आहत होकर नचिकेता हाथ जोड़कर बोले, “मुझ पर प्रसन्न हों।” पर शीघ्र ही वे प्राण-रहित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। पुत्र को निश्चेष्ट देखकर उद्दालक शोक से अचेत हो गए और “हाय, मैंने यह क्या किया” कहकर वे भी गिर पड़े। शोक में विलाप करते-करते दिन बीता, रात आई। तब पिता के आँसुओं से भीगकर नचिकेता में जीवन के चिह्न लौटे, मानो शुभ वर्षा से बीज अंकुरित हों। सुगन्धित लेप-से देह वाले, गहरी निद्रा से जागते-से पुत्र से ऋषि ने पूछा, “क्या आपने अपने कर्मों से शुभ लोक पाए? आपकी देह मानो मानवी नहीं लगती।”

नचिकेता ने उत्तर दिया, “आपकी आज्ञा से मैं यम के विशाल, दिव्य कान्ति वाले लोक में गया। वहाँ हज़ारों योजन तक फैला, स्वर्ण-दीप्ति बिखेरता एक राजभवन देखा। यम ने मुझे आते देख अपने सेवकों को आज्ञा दी कि मुझे उत्तम आसन दिया जाए, और अर्घ्य आदि से मेरा पूजन किया। मैंने नम्रता से कहा, ‘मैं अपने कर्मों के योग्य लोक माँगता हूँ।’ यम ने कहा, ‘आप मरे नहीं हैं। तपस्वी आपके पिता ने ‘यम से मिलिए’ कहा था, और उनके तेज को मैं मिथ्या नहीं कर सकता था, इसलिए आपने मुझे देखा। अब लौट जाइए। आपका रचयिता पिता आपके लिए विलाप कर रहा है। आप मेरे प्रिय अतिथि हैं, कोई वर माँग लीजिए।’
“मैंने प्रार्थना की कि मुझे उन उच्च सुख-लोकों का दर्शन कराइए जो धर्मात्माओं के लिए सुरक्षित हैं। तब यम ने मुझे सूर्य-समान तेजस्वी, श्रेष्ठ अश्वों से जुते रथ पर बिठाकर वे सब दिव्य लोक दिखाए। वहाँ मणि-रत्नों से सज्जित, चन्द्र-बिम्ब से उज्ज्वल, घंटियों की पंक्तियों से अलंकृत, अनेक मंज़िला भवन थे, भीतर रमणीय उपवन, स्वच्छ जलाशय, अन्न और वस्त्र के ढेर, और दूध की नदियाँ तथा घी के पर्वत बहते थे।”
नचिकेता ने यम से पूछा कि दूध और घी की ये नित्य बहने वाली नदियाँ किसके भोग के लिए हैं। यम ने कहा कि ये उन धर्मात्माओं के लिए हैं जो मनुष्य-लोक में दान करते हैं, और जो शोक-रहित भवन गो-दाताओं के लिए सुरक्षित हैं। पर यम ने स्पष्ट किया, केवल गाय दे देना ही प्रशंसनीय नहीं है। पात्र कौन हो, समय क्या हो, कैसी गाय हो, और कौन-से विधि-विधान निभाए जाएँ, इन सबका विचार आवश्यक है। तीन रात अन्न त्यागकर केवल जल पर रहकर, धरती पर सोकर, गाय को भलीभाँति खिलाकर ब्राह्मणों को दे, और दान के पश्चात् तीन दिन केवल दूध पर रहे। दी जाने वाली गाय अपने बछड़े सहित हो, और सत्पात्र वह ब्राह्मण हो जो वेद-विद्या, तप और यज्ञ से सम्पन्न हो।
नचिकेता ने यम से यह भी पूछा कि जब गायें न मिलें, तब किस वस्तु के दान से वही गो-दान-लोक मिलें। यम ने कहा कि गाय के अभाव में घी से बनी गाय का दान करे, उसके अभाव में तिल से बनी गाय का, और उसके भी अभाव में जल से बनी गाय का। ये प्रतीक-रूप गायें भी दाता को कल्याण के लोक तक पहुँचाती हैं। यम ने नचिकेता को बताया कि कपिल वर्ण की गाय का दान सब पापों से शुद्ध करता है, क्योंकि गाय का दूध समस्त रसों में परम है। यम ने प्रसन्न होकर बार-बार कहा कि शुद्ध मन से, सुपात्र को, उचित समय और स्थान पर सदा गो-दान करे, और किसी प्रकार का संदेह न करे। नचिकेता ने यम को प्रणाम कर, अनुमति लेकर पिता के चरणों में लौट आए।
समझने की कुंजी: “नचिकेता” वही ऋषि-कुमार जिनकी यम से भेंट की कथा कठ-उपनिषद् में भी आती है, यद्यपि वहाँ का संवाद आत्मज्ञान पर केन्द्रित है। यहाँ महाभारत में यही कथा गो-दान के विधान को केन्द्र में रखती है। “कपिल” गाय का गहरा भूरा या ताम्र-स्वर्ण वर्ण, जिसे परम पवित्र माना गया। “योजन” दूरी का प्राचीन माप, लगभग आठ से तेरह किलोमीटर।
सार: पिता के शाप से नचिकेता क्षण भर को मृत्यु को प्राप्त हुए, यमलोक में आदर पाया, सुख-लोक देखे, और लौटकर गो-दान का सूक्ष्म विधान (पात्र, समय, गाय का प्रकार, और गाय के अभाव में घी-तिल-जल की प्रतीक-गाय) सुनाया, जिसे यम ने स्वयं समझाया।
गो-लोक का स्वरूप, और वर्णों के अनुसार गो-दान का फल
युधिष्ठिर ने गो-दाताओं के निवास-लोक के बारे में विस्तार से जानना चाहा। भीष्म ने ब्रह्मा (प्रथम कमल से उत्पन्न) और सौ यज्ञ करने वाले इन्द्र का प्राचीन संवाद सुनाया। शक्र (इन्द्र) ने पूछा, “हे पितामह, गो-लोक के निवासी अपने तेज से स्वर्ग के देवताओं की समृद्धि को भी लाँघ जाते हैं, यह देखकर मुझे संदेह हुआ। वे लोक कैसे हैं? उनके क्या फल हैं?”
ब्रह्मा ने कहा कि अनेक प्रकार के ऐसे लोक हैं जो इन्द्र तक को अदृश्य हैं। वे केवल मुझे, और उन सती स्त्रियों को जो एक ही पति में अनुरक्त रहीं, तथा उत्तम व्रत वाले ऋषियों और धर्मात्मा ब्राह्मणों को दिखते हैं, जो अपनी देह सहित भी वहाँ पहुँच सकते हैं। उन लोकों में काल की गति तक रुकी हुई है। वहाँ न बुढ़ापा है, न सर्वव्यापी अग्नि, न रोग, न दुर्बलता। जो सब प्राणियों के प्रति क्षमाशील, स्नेहमय, गुरुजनों के आज्ञाकारी, और गर्व-दम्भ से रहित हैं, जो मांस त्यागते हैं, माता-पिता का आदर करते हैं, सत्यवादी हैं, ब्राह्मणों और गायों पर क्रोध नहीं करते, वे ही उस गो-लोक को पाते हैं।
पर जो व्यभिचारी है, गुरु-हन्ता है, मिथ्या-भाषी है, मित्रों से द्रोह करता है, कृतघ्न है, छली है, धर्म का अनादर करता है, या ब्राह्मण-हन्ता है, वह उस लोक का दर्शन कल्पना में भी नहीं पाता।
फिर ब्रह्मा ने गो-दान के पुण्य में वर्ण-भेद बताया। यदि कोई धर्मनिष्ठ, सत्यनिष्ठ पुरुष एक गाय भी दे, तो वह एक गाय हज़ार गायों के समान हो जाती है। ऐसे गुणों वाला क्षत्रिय जो एक गाय देता है, उसका पुण्य ब्राह्मण के समान हो जाता है। वैसे ही वैश्य की एक गाय पाँच सौ गायों के समान, और नम्र शूद्र की एक गाय एक सौ पच्चीस गायों के समान फल देती है। जो विरासत में या उचित रीति से अर्जित धन से गाय खरीदकर देता है, वह अक्षय सुख-लोक पाता है। जो स्वयं को बेचकर उस धन से गाय खरीदकर ब्राह्मणों को दान करता है, उसे तब तक स्वर्ग-सुख मिलता है जब तक पृथ्वी पर गायें दिखती हैं।
ब्रह्मा ने यह भी कहा कि जो वन में गायों के पीछे-पीछे चलता है, स्वयं घास, गोबर और पत्तों पर निर्वाह करता है, फल की इच्छा से रहित, इन्द्रियों को संयमित किए, वह मेरे या किसी भी इच्छित सुख-लोक में देवताओं के साथ आनन्द से रहता है।
समझने की कुंजी: “गो-लोक” गायों का वह परम धाम जो देवलोक से भी ऊँचा माना गया, जहाँ काल, जरा और रोग नहीं पहुँचते। वर्णों के अनुसार पुण्य की मात्रा का यह क्रम तत्कालीन समाज-व्यवस्था और शास्त्रीय दृष्टि को दर्शाता है, जहाँ दान का फल पात्र की निष्ठा और कुल-धर्म से जोड़ा गया।
सार: गो-लोक काल-जरा-रोग से परे, देवलोक से भी ऊँचा है, और केवल क्षमाशील, सत्यनिष्ठ, गुरु-भक्त ही उसे पाते हैं; व्यभिचारी, गुरु-हन्ता, कृतघ्न नहीं। एक धर्मात्मा की दी एक गाय हज़ार के बराबर है, और ब्रह्मा ने वर्णों के अनुसार पुण्य की मात्रा बताई।
गो-चोरी का फल, दक्षिणा-रूप स्वर्ण, और गो-दान का मन्त्र-विधान
इन्द्र ने पूछा कि जो जानबूझकर गाय चुराता है या लोभ से बेचता है, उसकी क्या गति होती है। ब्रह्मा ने कहा, जो गाय को मांस के लिए मारता है, या धन के लिए बेचता है, या जो धन के लिए किसी को गाय मारने देता है, मारने वाला, खाने वाला और अनुमति देने वाला, तीनों उतने वर्ष नरक में सड़ते हैं जितने उस मारी गई गाय की देह पर रोएँ होते हैं। जो गाय चुराकर ब्राह्मण को दान कर देता है, वह दान के पुण्य से स्वर्ग-सुख तो पाता है, पर चोरी के पाप से उतने ही काल नरक भी भोगता है।
ब्रह्मा ने कहा कि गो-दान में स्वर्ण ही दक्षिणा कहा गया है, और स्वर्ण समस्त यज्ञों में श्रेष्ठ दक्षिणा है। गो-दान से मनुष्य अपने पूर्वजों और वंशजों को सात पीढ़ी तक उबारता है, और स्वर्ण-दक्षिणा सहित गो-दान से दुगुनी पीढ़ियों को। स्वर्ण समस्त दानों में श्रेष्ठ, सबमें बड़ा शोधक, और दाता के समस्त कुल का पवित्र करने वाला है।
भीष्म ने बताया कि यह उपदेश ब्रह्मा ने इन्द्र को दिया, इन्द्र ने दशरथ को, दशरथ ने अपने पुत्र राम को, और रघुवंशी राम ने अपने प्रिय भाई लक्ष्मण को। वन में रहते समय लक्ष्मण ने इसे ऋषियों को सुनाया, और तब से यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आया। भीष्म के गुरु ने इसे उन्हें दिया। जो ब्राह्मण इसे प्रतिदिन ब्राह्मणों की सभा में, यज्ञ में, गो-दान के समय, या दो पुरुषों के मिलने पर सुनाता है, वह अक्षय सुख-लोक पाता है।
फिर युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्म ने गो-दान का वही विधि-विधान विस्तार से बताया जो बृहस्पति ने राजा मान्धाता को दिया था। दाता पूर्व दिन ब्राह्मणों का आदर कर दान का समय नियत करे। दी जाने वाली गायें रोहिणी जाति की हों, और उन्हें “सामंगे” और “वहुले” शब्दों से सम्बोधित किया जाए। गोशाला में प्रवेश कर यह श्रुति-वचन कहे, “गाय मेरी माता है। बैल मेरा पिता है। मुझे स्वर्ग और पार्थिव समृद्धि दो। गाय मेरा आश्रय है।” दाता उस रात गोशाला में गायों के बीच, उनकी स्वतन्त्रता में बाधा डाले बिना, धरती पर लेटकर बिताए, यहाँ तक कि उन कीट-पतंगों को भी न हटाए जो गायों को सताते हैं। इस प्रकार स्वयं को गायों के समान बनाकर वह अपने समस्त पापों से शुद्ध हो जाता है।
प्रातः सूर्योदय पर बछड़े और बैल सहित गाय दे। दान के मन्त्रों में गायों की महिमा है, गायें बल, ऊर्जा और बुद्धि के तत्त्व हैं, यज्ञ से प्राप्त अमरता का स्रोत हैं, समस्त ऊर्जा का आश्रय हैं, और सृष्टि की सनातन गति हैं। दाता कहे, “मैं आपको देकर सचमुच स्वयं को दे रहा हूँ। आज मैं वही बन गया जो आप हैं।” तब ग्रहण करने वाला कहे, “अब आप देने वाले की नहीं रहीं, मेरी हो गईं। सूर्य और सोम के स्वभाव वाली आप दाता और ग्रहीता, दोनों को समृद्धि से देदीप्यमान कीजिए।”
भीष्म ने प्रतीक-दान का विधान भी बताया। जो गाय के बदले उसका मूल्य, या वस्त्र, या स्वर्ण देता है, वह भी गो-दाता माना जाता है। मूल्य देते समय “यह ऊपर-मुख गाय दी जा रही है, स्वीकार करो” कहे; वस्त्र देते समय “भावितव्य” कहे (अर्थात् इसे गाय का प्रतिनिधि समझो); स्वर्ण देते समय “वैष्णवी” कहे (अर्थात् यह स्वर्ण गाय के रूप और स्वभाव का है)। इन प्रतीक-दानों का फल क्रमशः छत्तीस हज़ार, आठ हज़ार और बीस हज़ार वर्ष स्वर्ग-वास है। पर जो असली गाय देता है, उसे यह समस्त पुण्य ग्रहीता के घर लौटते आठवें ही कदम पर मिल जाता है।
भीष्म ने सावधान किया कि यह विधान उसे न सिखाया जाए जो शिष्य न हो, व्रत-रहित हो, श्रद्धा-हीन हो, या कुटिल बुद्धि का हो, क्योंकि यह धर्म एक रहस्य है। फिर उन्होंने उन धर्मात्मा राजाओं के नाम गिनाए जिन्होंने इस विधान से गो-दान कर स्वर्ग पाया, उशीनर, विश्वगाश्व, नृग, भगीरथ, युवनाश्व-पुत्र मान्धाता, मुचुकुन्द, नैषध, सोमक, पुरूरवा, सम्राट् भरत (जिनके वंश में समस्त भारत हैं), दशरथ-पुत्र वीर राम, और राजा दिलीप। यह सुनकर युधिष्ठिर ने वैसा ही किया, गायों के दान करने लगे, जौ के दानों और गोबर पर निर्वाह करने लगे, धरती पर सोने लगे, गायों का पूजन करने लगे, और अपने वाहन में गायें जोतना छोड़ दिया, अच्छे घोड़ों के रथ से चलने लगे।
समझने की कुंजी: यह उपदेश-परम्परा ब्रह्मा से इन्द्र, फिर दशरथ-राम-लक्ष्मण होते हुए महाभारत के भीष्म तक आती है, अर्थात् रामायण और महाभारत के पात्र यहाँ एक ही ज्ञान-धारा में जुड़ते हैं। “रोहिणी जाति” गायों की एक उत्तम नस्ल या वर्ण। प्रतीक-दान का यह क्रम दिखाता है कि असली गाय का दान सर्वोच्च है, पर असमर्थ के लिए मूल्य, वस्त्र या स्वर्ण भी मान्य रास्ता है।
सार: गो-चोरी और गो-हत्या में मारने, खाने और अनुमति देने वाले, तीनों समान दोषी; स्वर्ण ही गो-दान की श्रेष्ठ दक्षिणा। बृहस्पति-मान्धाता विधान में दाता रात गायों के बीच बिताकर स्वयं को उनके समान बना लेता है, फिर मन्त्रोच्चार सहित दान करता है। युधिष्ठिर ने यह सब निभाया।
कैसी गाय दें, कैसी नहीं; कपिला गाय की उत्पत्ति और महादेव का वृषभ
भीष्म ने फिर गो-दान दोहराया, और यह स्पष्ट किया कि कैसी गाय कभी न दे, जो पी या खा न सके, जिसका दूध सूख गया हो, इन्द्रियाँ दुर्बल हों, जो रोगी और बुढ़ापे से जर्जर हो, मानो सूखे जलाशय-सी हो। ऐसी गाय देकर ब्राह्मण को केवल कष्ट और निराशा देने वाला अवश्य अंधकार-नरक में जाता है। क्रोधी, दुर्व्यवहारी, रोगी, दुर्बल, या बिना तय मूल्य चुकाए खरीदी गई गाय भी न दे। केवल बलवान्, सुशील, युवा और सुगन्धित गायें ही दान में सराही जाती हैं। जैसे गंगा समस्त नदियों में अग्रणी है, वैसे ही कपिला गाय समस्त गो-जाति में।
युधिष्ठिर ने पूछा कि जब सभी उत्तम गायें समान मानी जाएँ, तो कपिला गाय का दान अधिक पुण्य-दायी क्यों कहा जाता है। तब भीष्म ने कपिला गाय की उत्पत्ति की कथा सुनाई।
एक उप-कथा: सुरभि और कपिला गायों का जन्म, तथा महादेव की दृष्टि। पूर्वकाल में स्वयम्भू ब्रह्मा ने ऋषि दक्ष को आज्ञा दी, “प्राणियों की सृष्टि करो।” प्राणियों के हित के लिए दक्ष ने पहले अन्न रचा। जैसे देवता अमृत पर टिके हैं, वैसे ही समस्त प्राणी दक्ष के दिए आधार पर जीते हैं। जब प्राणी जन्मे, तो वे अन्न के लिए माता-पिता के पास बच्चों के समान दक्ष के पास दौड़े। उनका भाव जानकर दक्ष ने स्वयं कुछ अमृत पिया। तृप्त होकर उन्हें एक डकार आई, और चारों ओर उत्तम सुगन्ध फैल गई। उसी डकार से एक गाय का जन्म हुआ, जिसे उन्होंने सुरभि नाम दिया। यह सुरभि उनके मुख से उत्पन्न उनकी पुत्री थी।
सुरभि ने अनेक पुत्रियाँ जनीं, जो जगत् की माताएँ कहलाईं। उनका वर्ण स्वर्ण-सा था, और वे सब कपिला थीं। जब उन अमृत-वर्ण गायों ने दूध बहाया, तो उसका फेन चारों ओर फैल गया, जैसे बहती धारा की लहरें टकराकर फेन उड़ाती हैं। दूध पीते बछड़ों के मुख से वह फेन उछलकर पृथ्वी पर बैठे महादेव के मस्तक पर जा गिरा। महादेव क्रोध से भर उठे और उन गायों पर दृष्टि डाली। अपने ललाट के उस तीसरे नेत्र से, जैसे सूर्य मेघों को नाना रंग देता है, उनके तेज ने उन गायों में नाना वर्ण उत्पन्न कर दिए। जो गायें सोम के लोक में प्रवेश कर उस दृष्टि से बच गईं, वे अपने मूल वर्ण की बनी रहीं, उनमें कोई परिवर्तन न हुआ।
महादेव को अत्यन्त क्रुद्ध देखकर प्रजापति दक्ष ने उन्हें समझाया, “हे महादेव, आप तो अमृत से सिक्त हैं। बछड़ों के मुख से छूटा दूध या फेन कभी जूठा या अपवित्र नहीं माना जाता। चन्द्रमा अमृत पीकर फिर उसे उँडेलता है, पर वह अपवित्र नहीं कहलाता। वायु, अग्नि, स्वर्ण, समुद्र, और देवताओं द्वारा पिया गया अमृत, ये कभी अपवित्र नहीं होते। वैसे ही, अमृत से उत्पन्न गाय का दूध, चाहे बछड़े ने मुख लगाया हो, कभी अपवित्र नहीं होता। ये गायें अपने दूध और घी से समस्त लोकों का पालन करेंगी।” यह कहकर दक्ष ने महादेव को कुछ गायों सहित एक बैल भेंट किया। तृप्त होकर महादेव ने उस बैल को अपना वाहन बनाया, और उसी बैल की आकृति को अपनी ध्वजा पर धारण किया, इसी से रुद्र वृषभ-ध्वज (बैल के चिह्न वाले) कहलाए। उसी अवसर पर देवताओं ने मिलकर महादेव को पशुओं का स्वामी, अर्थात् पशुपति बनाया।
इसी से, हे राजन्, गो-दान में कपिला गायों का दान प्रधान रूप से वांछनीय है, जो महान् ऊर्जा से युक्त और अपरिवर्तित वर्ण की हैं। गायें समस्त लोकों के निर्वाह का स्रोत हैं, रुद्र उनके स्वामी हैं, वे दूध के रूप में सोम (अमृत) देती हैं, मंगलमयी, पवित्र, हर इच्छा पूरी करने वाली और जीवनदायिनी हैं। यह सुनकर युधिष्ठिर ने अपने भाइयों सहित नाना वर्णों के बैल और गायें ब्राह्मणों को दान कीं।
समझने की कुंजी: “सुरभि” कामधेनु का ही एक नाम, समस्त गायों की आदि-माता। “कपिला” स्वर्ण-ताम्र वर्ण की गाय। “वृषभ-ध्वज” और “पशुपति” शिव के नाम, यहाँ इस कथा से जुड़ते हैं कि कैसे बैल उनका वाहन और ध्वजा-चिह्न बना और वे पशुओं के स्वामी कहलाए। ध्यान दें, यहाँ महादेव के क्रोध को नरम नहीं किया गया, उनकी तीसरी आँख का तेज गायों में स्थायी वर्ण-भेद रच देता है, यही गो-जाति की विविधता का कारण बना।
सार: जर्जर, रोगी, सूखी गाय देना नरक देता है; कपिला गाय गंगा-समान श्रेष्ठ है। उसकी श्रेष्ठता की जड़ है दक्ष की डकार से सुरभि का जन्म और उसकी कपिला पुत्रियाँ, तथा महादेव के तीसरे नेत्र के तेज से गो-जाति में वर्ण-भेद, जिसके बाद वे वृषभ-ध्वज पशुपति कहलाए।
वसिष्ठ का गो-माहात्म्य, और राजा सौदास

भीष्म ने एक और आख्यान सुनाया। पूर्वकाल में इक्ष्वाकु-वंश के राजा सौदास ने अपने कुलगुरु, ऋषि-श्रेष्ठ वसिष्ठ से पूछा, “हे सिनलेस, तीनों लोकों में वह कौन-सी पवित्र वस्तु है जिसका सदा कीर्तन करके मनुष्य उच्च पुण्य पाए?” वसिष्ठ ने पहले गायों को प्रणाम कर, स्वयं को शुद्ध कर, गो-माहात्म्य का रहस्य कहा।
वसिष्ठ ने कहा, गायें सदा सुगन्धित हैं। उनकी देह से अगर-चन्दन जैसी सुगन्ध निकलती है। गायें समस्त प्राणियों का परम आश्रय हैं, समस्त कल्याण की महान् स्रोत। गायें भूत और भविष्य हैं, सनातन वृद्धि का मूल हैं, समृद्धि की जड़ हैं। गायों को दी हुई कोई वस्तु कभी व्यर्थ नहीं जाती। स्वाहा और वषट् मन्त्र सदा गायों में स्थित हैं। यज्ञ गायों पर टिके हैं। जिसके पास दस गायें हों और वह एक दान करे, जिसके सौ हों और दस दान करे, जिसके हज़ार हों और सौ दान करे, तीनों समान पुण्य पाते हैं।
वसिष्ठ ने नित्य-नियम बताए, कोई रात गायों के नाम लिए बिना न सोए, न प्रातः उठे। प्रातः-सायं गायों को सिर झुकाकर प्रणाम करे। गाय के गोबर और मूत्र से घृणा न करे, गाय का मांस कभी न खाए। बुरे स्वप्न दिखें तो गायों के नाम ले। और वसिष्ठ ने यह सुन्दर प्रार्थना सिखाई, “स्वर्ण-सींग वाली, प्रचुर दूध देने वाली, सुरभि और सुरभि-पुत्री गायें मेरे पास वैसे ही आएँ जैसे नदियाँ समुद्र की ओर। मैं सदा गायों को देखता रहूँ, गायें मुझे देखती रहें। गायें हमारी हैं, हम उनके हैं। हम वहीं हैं जहाँ गायें हैं।” रात हो या दिन, सुख हो या दुःख, यहाँ तक कि महान् भय के समय भी जो यह कहे, वह हर भय से मुक्त हो जाता है।
वसिष्ठ ने आगे बताया कि पूर्व-युग में रची गई गायों ने एक लाख वर्ष तक घोर तप किया, इस इच्छा से कि वे यज्ञों में श्रेष्ठ दक्षिणा बनें और किसी दोष से दूषित न हों, उनके गोबर मिले जल से स्नान कर लोग पवित्र हों, और जो उन्हें दान करे वह उन्हीं के सुख-लोक पाए। तप के अन्त में ब्रह्मा ने प्रकट होकर उन्हें ये वर दिए, “ऐसा ही हो। आप समस्त लोकों को उबारिए।” तब से गायें जगत् का आश्रय बनीं।
वसिष्ठ ने विभिन्न वर्ण की गायों के दान के फल बताए, कपिला गाय का दान ब्रह्मलोक में, लाल गाय का सूर्यलोक में, चितकबरी का सोमलोक में, श्वेत का इन्द्रलोक में, श्याम का अग्निलोक में, धूम्र-वर्ण का यमलोक में, जल-फेन वर्ण का वरुणलोक में, वायु-धूलि वर्ण का वायुलोक में, स्वर्ण-वर्ण ताम्र-नेत्र वाली का कुबेरलोक में सम्मान देता है। ऊँचे डील वाला बैल देने से मरुतों का लोक, नीला बैल देने से गन्धर्व-अप्सराओं का लोक मिलता है। जो गो-दाता है, वह सूर्य-तेज के रथ पर मेघों को भेदता हुआ स्वर्ग जाता है, जहाँ हज़ार दिव्य अप्सराएँ उसका स्वागत करती हैं। यह सुनकर राजा सौदास ने ब्राह्मणों को असंख्य गायें दान कीं और अनेक सुख-लोक पाए।
समझने की कुंजी: “स्वाहा” वह मन्त्र-शब्द जिसके साथ देवताओं को आहुति दी जाती है; “वषट्” यज्ञ में आहुति देते समय बोला जाने वाला आह्वान-शब्द। “सौदास” इक्ष्वाकु-वंश का राजा, राम के पूर्वज-कुल का। यहाँ हर गाय के वर्ण का एक देवलोक से मेल बैठाया गया, यह गो-दान के प्रतीक-विधान की सूक्ष्मता दिखाता है।
सार: वसिष्ठ ने राजा सौदास को गो-माहात्म्य, नित्य-नियम, और “गावो मम पुरतः” वाली रक्षक-प्रार्थना सिखाई; बताया कि गायों ने तप से ब्रह्मा का वर पाकर जगत् का आश्रय-पद पाया, और किस वर्ण की गाय किस देवलोक में पहुँचाती है।
घी का जप, व्यास-शुक संवाद, और गो-लोक की रचना
वसिष्ठ ने घी का एक मन्त्र-जप भी सिखाया, “गायें घी और दूध की दात्री हैं, घी की स्रोत हैं, घी से उत्पन्न हैं, घी की नदियाँ और घी के भँवर हैं। गायें सदा मेरे घर में रहें। घी मेरा हृदय है, मेरी नाभि में स्थित है, मेरे हर अंग में है, मेरे मन में बसता है। गायें मेरे आगे, मेरे पीछे, मेरे चारों ओर हैं। मैं गायों के बीच निवास करता हूँ।” जल छूकर शुद्ध होकर प्रातः-सायं यह जपने वाला दिन भर के समस्त पापों से शुद्ध हो जाता है।
फिर भीष्म ने व्यास और उनके पुत्र शुक का संवाद सुनाया। बुद्धिमान् शुक ने अपने पिता, द्वैपायन कृष्ण (व्यास) से पूछा, “वह कौन-सा यज्ञ है जो आपको समस्त यज्ञों में श्रेष्ठ लगता है? वह कौन-सा परम पवित्र कर्म है?” व्यास ने उत्तर दिया, गायें समस्त प्राणियों का आधार और आश्रय हैं, पुण्य की मूर्ति हैं, पवित्र और सबको पवित्र करने वाली हैं। पहले गायें सींग-रहित थीं। सींग पाने की इच्छा से उन्होंने ब्रह्मा की आराधना की और प्राय (अनशन-व्रत) में बैठीं। ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर प्रत्येक को मनचाहा दिया, तब उनके सींग उगे और वे नाना वर्ण की होकर शोभा पाने लगीं।
व्यास ने गो-लोक का वर्णन किया, वहाँ के वृक्ष सदा मीठे फल और दिव्य सुगन्ध वाले फूल देते हैं, भूमि रत्नमयी है, बालू स्वर्ण की है, हर ऋतु की उत्तमता एक साथ अनुभव होती है, न कीचड़ है न धूल। वहाँ की नदियाँ रक्त-कमलों और रत्नों से देदीप्यमान हैं। धर्मात्मा वहाँ शोक और क्रोध से मुक्त, हर इच्छा की पूर्ति लिए, सुन्दर वाहनों पर विचरते हैं, और अप्सराएँ नृत्य-गीत से उनका मन रमाती हैं। गो-दाता ही ऐसे लोक पाता है। व्यास ने घी-आधारित कुछ कठोर व्रत भी बताए, तीन दिन गाय का गरम मूत्र, फिर तीन दिन गरम दूध, फिर तीन दिन गरम घी पीना, फिर तीन दिन केवल वायु पर रहना। यह सुनकर शुक उस दिन से नित्य गायों का पूजन करने लगे।
युधिष्ठिर ने पूछा कि गाय का गोबर श्री (समृद्धि) से युक्त कैसे हुआ। भीष्म ने गायों और श्री के संवाद की कथा सुनाई।
एक उप-कथा: श्री गायों में निवास माँगती हैं। एक बार समृद्धि की देवी श्री अत्यन्त सुन्दर रूप धरकर एक गो-समूह में आईं। गायों ने पूछा कि वे कौन हैं। श्री ने कहा, “मैं समस्त प्राणियों को प्रिय हूँ, श्री नाम से जानी जाती हूँ। जिन दैत्यों ने मुझे छोड़ा, वे सदा के लिए नष्ट हो गए। इन्द्र, सोम, विष्णु, वरुण, अग्नि, मुझे पाकर ही आनन्द में हैं। मैं आप सबमें निवास करना चाहती हूँ।”
पर गायों ने कहा, “आप चंचल और अस्थिर हैं, अनेक के द्वारा भोगी जाती हैं। हमें आपकी आवश्यकता नहीं। हम स्वयं सुन्दर रूप वाली हैं। आप जहाँ चाहें जाएँ।” श्री ने बार-बार विनती की कि यदि वे उन्हें छोड़ देंगी तो वे समस्त संसार में अनादृत हो जाएँगी, और कहा, “मैं आपकी किसी भी अंग में, चाहे वह कितना ही अरुचिकर हो, निवास करना चाहती हूँ। पर मुझे आप में कोई अंग अरुचिकर नहीं दिखता, क्योंकि आप पवित्र और मंगलमयी हैं।” तब करुणामयी गायों ने आपस में परामर्श कर कहा, “हे यशस्विनी, हम आपका सम्मान करना चाहती हैं। आप हमारे मूत्र और गोबर में निवास करें, ये दोनों पवित्र हैं।” श्री प्रसन्न होकर बोलीं, “ऐसा ही हो। आपने मुझे सचमुच सम्मान दिया।” और उन्हीं गायों के सामने अदृश्य हो गईं। इसी से गाय का गोबर श्री से युक्त माना जाता है।
अन्त में भीष्म ने ब्रह्मा और इन्द्र का एक और संवाद सुनाया, जिसमें इन्द्र ने पूछा कि गायों का लोक देवलोक से ऊँचा क्यों है। ब्रह्मा ने इन्द्र को डाँटा कि उसने सदा गायों का अनादर किया, इसी से वह उनकी महिमा नहीं जानता। ब्रह्मा ने सुरभि की कथा सुनाई, देवयुग में जब दानव तीनों लोकों के स्वामी हो गए, तब अदिति ने पुत्र (विष्णु) पाने के लिए एक पाँव पर खड़े होकर घोर तप किया। उन्हें देखकर दक्ष-पुत्री सुरभि ने भी कैलास पर्वत के वक्ष पर एक पाँव पर खड़े होकर ग्यारह हज़ार वर्ष घोर तप किया। उनके तप के ताप से देवता, ऋषि और नाग तक झुलस उठे।
ब्रह्मा ने उनके पास जाकर वर माँगने को कहा। सुरभि बोलीं, “मुझे किसी वर की आवश्यकता नहीं। आप मुझ पर प्रसन्न हुए, यही महान् वर है।” उनकी निर्लोभता और निष्कामता से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें अमरत्व का वर दिया और कहा, “आप तीनों लोकों से ऊँचे लोक में निवास करेंगी, जो गो-लोक नाम से प्रसिद्ध होगा। आपकी सन्तान सत्कर्म करती हुई मनुष्य-लोक में रहेगी। स्वर्ग का जो भी सुख है, वह आपका होगा।” ब्रह्मा ने कहा कि गो-लोक में न मृत्यु है, न जरा, न अग्नि, न दुर्भाग्य; वहाँ केवल ब्रह्मचर्य, तप, सत्य, संयम, दान और सत्कर्मों से ही पहुँचा जा सकता है। यह सुनकर सहस्र-नेत्र इन्द्र उस दिन से नित्य गायों का पूजन और परम आदर करने लगे।
भीष्म ने कहा, हे महातेज युधिष्ठिर, मैंने आपको गायों के समस्त पवित्र, पाप-नाशक माहात्म्य की कथा सुना दी। जो पुरुष इस वृत्तान्त को हव्य-कव्य या यज्ञ या पितृ-पूजा के अवसर पर ब्राह्मणों को सुनाता है, वह अपने पूर्वजों को अक्षय सुख देता है। जो गायों के प्रति समर्पित है, वह पुत्र, पुत्री, धन, ज्ञान, धर्म और सुख, जो भी चाहे, पा लेता है।
समझने की कुंजी: “शुक” व्यास के पुत्र, परम विरक्त ज्ञानी, जो आगे चलकर भागवत-कथा सुनाने वाले शुकदेव कहलाए। “प्राय” अनशन-व्रत, जिसमें कोई अपनी माँग की पूर्ति या प्राण-त्याग तक भूखे बैठा रहता है। “गो-लोक” यहाँ सुरभि के तप का फल है, सृष्टि का वह परम धाम जो स्वयं ब्रह्मा के वर से अस्तित्व में आया।
सार: घी का नित्य-जप; व्यास-शुक संवाद में गायों का सींग-दान और गो-लोक का वर्णन; श्री का गो-गोबर में निवास माँगना (इसी से गोबर श्री-युक्त); और सुरभि के घोर निष्काम तप से ब्रह्मा द्वारा गो-लोक की रचना, जिसके बाद इन्द्र तक गो-पूजक बने।
स्वर्ण की उत्पत्ति का प्रश्न, और भीष्म के पितृ-श्राद्ध का स्मरण
युधिष्ठिर ने कहा, हे पितामह, आपने भूमि और गो-दान का माहात्म्य सुनाया। वेद और उपनिषद् कहते हैं कि समस्त यज्ञों और धर्म-कर्मों में दक्षिणा भूमि, गाय या स्वर्ण होनी चाहिए, पर श्रुति घोषित करती है कि समस्त दक्षिणाओं में स्वर्ण श्रेष्ठ है। मैं जानना चाहता हूँ, स्वर्ण क्या है? यह कैसे उत्पन्न हुआ? कब अस्तित्व में आया? इसका सार क्या है? इसका अधिष्ठाता देवता कौन है? इसके फल क्या हैं? यह समस्त वस्तुओं में अग्रणी क्यों माना जाता है? बुद्धिमान् स्वर्ण-दान की प्रशंसा क्यों करते हैं? यह भूमि और गाय से भी श्रेष्ठ शोधक क्यों है?
भीष्म ने कहा, सुनो, मैं स्वर्ण की उत्पत्ति का सारा वृत्तान्त, जैसा मैं जानता हूँ, क्रम से सुनाता हूँ। पहले मैं आपको वह घटना सुनाता हूँ जिससे यह प्रसंग जुड़ा है। जब मेरे पिता, महातेजस्वी शान्तनु इस लोक से विदा हुए, तब मैं उनका श्राद्ध करने गंगाद्वार गया। वहाँ पहुँचकर मैंने पिता का श्राद्ध आरम्भ किया। मेरी माता जाह्नवी (गंगा) वहाँ आकर मेरी बड़ी सहायक बनीं। अनेक सिद्ध तपस्वियों को बुलाकर, उन्हें आसन देकर, मैंने जल-दान आदि प्रारम्भिक विधियाँ कीं।
एकाग्र मन से समस्त प्रारम्भिक विधियाँ पूरी कर, जब मैं शास्त्रोक्त रीति से पिण्ड अर्पित करने लगा, तब मैंने देखा कि अंगद आदि आभूषणों से सज्जित एक सुन्दर भुजा, भूमि को भेदती हुई, मेरे बिछाए कुश के तिनकों में से ऊपर उठी। उस भुजा को देख मैं विस्मय से भर गया। मैंने सोचा, मानो मेरे पिता स्वयं पिण्ड ग्रहण करने आए हैं। पर शास्त्र के प्रकाश में विचार करने पर मुझे यह दृढ़ निश्चय हुआ कि वेद में विधान है कि जिसका श्राद्ध हो, उसके हाथ में पिण्ड नहीं दिया जाता। पितर अपने प्रत्यक्ष रूप में पिण्ड लेने नहीं आते; विधान है कि पिण्ड भूमि पर बिछे कुश के तिनकों पर रखा जाए।
तब मैंने पिता की उपस्थिति का संकेत देती उस भुजा की उपेक्षा कर, शास्त्र के सच्चे विधान को स्मरण कर, सारा पिण्ड कुश के उन तिनकों पर ही अर्पित किया। ऐसा करना शास्त्र-विधान के पूर्णतः अनुरूप था। इसके पश्चात् मेरे पिता की वह भुजा हमारे देखते-देखते अन्तर्धान हो गई। उस रात जब मैं सोया, पितर मुझे स्वप्न में दिखाई दिए। प्रसन्न होकर उन्होंने कहा, “हम आपसे प्रसन्न हैं कि आपने आज शास्त्र-विधान के प्रति अपनी निष्ठा का परिचय दिया, और उसके आदेश से तनिक भी विचलित न हुए। आपके इस आचरण से शास्त्र, वेद-श्रुति, पितर, ऋषि, स्वयं पितामह ब्रह्मा और प्रजापति-सरीखे गुरुजन, सबका मान बढ़ा। आपने आज बहुत उत्तम किया। आपने भूमि और गाय का दान किया है। अब स्वर्ण का दान कीजिए। स्वर्ण का दान परम शोधक है। ऐसे दान पूर्वजों और वंशजों, दोनों को उबारते हैं।”
समझने की कुंजी: “पिण्ड” श्राद्ध में पितरों को अर्पित चावल या जौ का गोला। “कुश” यज्ञ-कर्म में प्रयुक्त एक पवित्र घास, जिस पर पितरों के निमित्त पिण्ड रखा जाता है। “गंगाद्वार” वह तीर्थ जहाँ गंगा पर्वतों से उतरकर मैदान में आती है (आज का हरिद्वार)। “जाह्नवी” गंगा का नाम, और भीष्म की जननी होने से वे यहाँ श्राद्ध में सहायक हैं। ध्यान दें, पिता की भुजा का प्रत्यक्ष आना भी भीष्म को शास्त्र-विधान से नहीं डिगाता, यही महाभारत की धर्म-सूक्ष्मता है, भावना नहीं, विधान का अनुसरण।
सार: युधिष्ठिर ने स्वर्ण की उत्पत्ति, उसके अधिष्ठाता देव और श्रेष्ठता का कारण पूछा। उत्तर में भीष्म ने अपने पिता शान्तनु के श्राद्ध का स्मरण सुनाया, जहाँ पिता की प्रत्यक्ष भुजा के बावजूद उन्होंने शास्त्र-विधान निभाकर पिण्ड कुश पर अर्पित किया, और स्वप्न में प्रसन्न पितरों ने उन्हें स्वर्ण-दान की प्रेरणा दी, यहीं से स्वर्ण की उत्पत्ति की कथा का सूत्र खुलता है।
गो की महिमा का समापन और इन्द्र की गोभक्ति
शर-शय्या पर लेटे भीष्म युधिष्ठिर को गो-दान की महिमा सुना ही रहे थे कि कथा का सिरा गोलोक तक पहुँचा। सुरभि (कामधेनु, गायों की जननी) के लोक का वर्णन करते हुए स्वयम्भू ब्रह्मा ने इन्द्र से कहा था, हे सहस्रनेत्र, आपकी पुत्रियाँ ही मनुष्यलोक में गायों के रूप में निवास करेंगी। जो भी सुख आप मन में सोचें, चाहे दिव्य हो चाहे मानवी, वह तत्काल आपका हो जाएगा। सुरभि के लोक में हर कामना की पूर्ति का साधन है, वहाँ मृत्यु, बुढ़ापा और अग्नि किसी को नहीं घेरते, कोई दुर्भाग्य नहीं। वहाँ मनोहर वन, आभूषण और सुन्दर वस्तुएँ हैं, इच्छानुसार चलनेवाले रथ हैं। हे कमलनयन, उस गोलोक को केवल ब्रह्मचर्य, तप, सत्य, संयम, दान, अनेक धर्म-कर्म, तीर्थ-सेवन और कठोर तपस्या से ही पाया जा सकता है। यही उत्तर ब्रह्मा ने इन्द्र को दिया, और अन्त में कहा, हे असुरसंहारक, आप कभी गायों का अनादर न करें।
भीष्म आगे बोले, हे युधिष्ठिर, स्वयम्भू ब्रह्मा के ये वचन सुनकर उस दिन से सहस्रनेत्र इन्द्र प्रतिदिन गायों की पूजा और उनका परम आदर करने लगे। मैंने आपको गायों के पवित्र करनेवाले स्वभाव का सब कुछ बता दिया। गायों की वह उच्च प्रतिष्ठा और महिमा, जो हर पाप से मनुष्य को स्वच्छ कर देती है, आपके सामने खोल दी। जो मनुष्य अपनी इन्द्रियों को विषयों से हटाकर हव्य-कव्य के अवसरों पर, यज्ञों में या पितरों के पूजन के समय इस गो-आख्यान को ब्राह्मणों के सम्मुख सुनाता है, वह अपने पितरों को अक्षय और सर्व-कामना-पूर्ण सुख देता है। जो गायों के प्रति समर्पित है, उसकी हर कामना पूरी होती है, स्त्री हो या पुरुष। पुत्र चाहनेवाला पुत्र पाता है, कन्या चाहनेवाला कन्या, धन चाहनेवाला धन, धर्म चाहनेवाला धर्म, विद्या चाहनेवाला विद्या, और सुख चाहनेवाला सुख। हे भारत, गो-भक्त के लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं।
समझने की कुंजी: यह अनुशासन पर्व है, अर्थात “उपदेश का पर्व”। महाभारत-युद्ध समाप्त हो चुका है, भीष्म बाणों की शय्या पर पड़े उत्तरायण (सूर्य के उत्तर की ओर मुड़ने) की प्रतीक्षा कर रहे हैं, और इसी बीच राजा युधिष्ठिर को राजधर्म के बाद दान-धर्म का विस्तृत उपदेश दे रहे हैं। यहाँ कथा गायों की महिमा से चलकर स्वर्ण-दान की ओर बढ़ती है।
सार: गोलोक की दिव्यता और इन्द्र की गोभक्ति के साथ गायों की महिमा का प्रकरण पूरा होता है, और भीष्म दान-धर्म के अगले अध्याय, स्वर्ण की उत्पत्ति, की ओर मुड़ते हैं।
स्वर्ण का प्रश्न और भीष्म के पिता की शर-शय्या-कथा
युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर कहा, हे पितामह, आपने गो-दान का महान फल बताया। पर राजा के लिए राज्य सदा ही दुखदायी है, अशुद्ध हृदयवाले उसे ढो नहीं सकते, और प्रायः राजा शुभ गति नहीं पाते। पृथ्वी का दान करते-करते ही वे अपने पापों से स्वच्छ होते हैं। आपने राजा नृग के प्राचीन गो-दानों का, और ऋषि नचिकेता के उपदेश का स्मरण कराया। वेद और उपनिषद कहते हैं कि सब यज्ञों और धर्म-कर्मों में दक्षिणा (यज्ञ के बदले दिया जानेवाला दान) पृथ्वी, गो या स्वर्ण हो। पर श्रुति यह भी कहती है कि सब दक्षिणाओं में स्वर्ण ही श्रेष्ठ और सर्वोत्तम है। हे पितामह, मैं इस विषय में सत्य सुनना चाहता हूँ। स्वर्ण क्या है, कैसे उत्पन्न हुआ, कब आया, उसका सार क्या है, उसका अधिष्ठाता देवता कौन है, उसके फल क्या हैं, वह सब वस्तुओं में अग्रणी क्यों है, और सब यज्ञों में सर्वश्रेष्ठ दक्षिणा क्यों मानी जाती है, पृथ्वी और गो से भी अधिक पवित्र करनेवाली क्यों, यह सब मुझे बताइए।
भीष्म बोले, हे राजन, एकाग्र मन से सुनिए, मैं स्वर्ण की उत्पत्ति का सारा प्रसंग विस्तार से कहता हूँ। जब मेरे महातेजस्वी पिता शान्तनु इस लोक से चले गए, तब मैं उनका श्राद्ध करने गंगाद्वार गया। वहाँ मैंने पिता का श्राद्ध आरम्भ किया, और मेरी माता जाह्नवी (गंगा) ने आकर मेरी बड़ी सहायता की। मैंने अनेक सिद्ध तपस्वियों को निमन्त्रित कर अपने सामने आसन दिए, और जल आदि के दान के प्रारम्भिक विधान पूरे किए। फिर एकाग्र मन से जब मैं श्राद्ध का पिण्ड (पिण्डदान का अन्न-गोला) अर्पित करने बैठा, तब मैंने देखा कि कुश घास पर, धरती फोड़कर, अंगद आदि आभूषणों से सजी एक सुन्दर भुजा ऊपर उठ आई।
एक उप-कथा: भीष्म के मन में संशय उठा कि शायद पिता शान्तनु स्वयं पिण्ड लेने आए हैं। पर शास्त्र के प्रकाश में उन्हें स्मरण आया कि जिसका श्राद्ध हो, उसके दिखते हुए हाथ में पिण्ड नहीं रखा जाता, पितर प्रत्यक्ष रूप से पिण्ड लेने नहीं आते, विधान यही है कि पिण्ड फैली हुई कुश-घास पर रखा जाए। अतः उस उठी हुई भुजा की अनदेखी कर, भीष्म ने पूरा पिण्ड कुश पर ही अर्पित किया। तब वह भुजा उनके देखते-देखते लुप्त हो गई।
उस रात भीष्म स्वप्न में अपने पितरों से मिले। प्रसन्न होकर पितरों ने कहा, हे भरतश्रेष्ठ, हम आपसे प्रसन्न हैं, क्योंकि आज आपने शास्त्र-विधान के प्रति अपनी निष्ठा दिखाई और वेद के आदेश से नहीं डिगे। आपके इस आचरण से शास्त्र की प्रामाणिकता और दृढ़ हुई, और आपने स्वयं को, शास्त्र को, वेद-श्रुति को, पितरों को, ऋषियों को, पितामह ब्रह्मा को और प्रजापतियों को सम्मानित किया। आपने पृथ्वी और गो का दान दिया, अब स्वर्ण का दान कीजिए, स्वर्ण-दान अत्यन्त पवित्र करनेवाला है। ऐसे दान दसवीं पीढ़ी तक पूर्वजों और वंशजों, दोनों का उद्धार करते हैं। यह कहकर पितर अन्तर्धान हो गए, और भीष्म ने जागकर मन में स्वर्ण-दान का संकल्प कर लिया।
सार: युधिष्ठिर के स्वर्ण-विषयक प्रश्न पर भीष्म अपने ही जीवन का प्रसंग सुनाते हैं, कैसे पिता के श्राद्ध में शास्त्र-निष्ठा से उन्होंने पितरों को प्रसन्न किया, और कैसे स्वर्ण-दान का यह प्राचीन आख्यान आगे चलता है।
परशुराम और स्वर्ण की उत्पत्ति, ऋषियों का उपदेश
भीष्म ने कहा, यह प्राचीन इतिहास पहले-पहल जमदग्निपुत्र परशुराम को सुनाया गया था। पुराने समय में भृगुवंशी राम (परशुराम) ने महान क्रोध से इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित कर दिया था। समूची पृथ्वी जीतकर उन्होंने एक अश्वमेध यज्ञ की तैयारी की, जो सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाला और ब्राह्मण-क्षत्रिय सबके द्वारा प्रशंसित है। उस यज्ञ से परशुराम पवित्र तो हुए, पर हृदय की पूरी हलकाई उन्हें न मिली। पश्चात्ताप और करुणा से भरे वे ऋषियों और देवताओं के पास गए और बोले, हे महाभाग, मुझ जैसे उग्र कर्म करनेवालों के लिए जो और भी अधिक पवित्र करनेवाला उपाय हो, वह बताइए।
वेद और शास्त्र के ज्ञाता उन महर्षियों ने कहा, हे राम, वेद के अधिकार से सब विद्वान ब्राह्मणों का सम्मान कीजिए, और कुछ काल यह आचरण करके फिर ऋषियों से पूछिए कि आत्म-शुद्धि के लिए क्या करें। परशुराम वसिष्ठ, अगस्त्य और कश्यप के पास गए और पूछा, हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मैं किस कर्म, रीति या दान से स्वयं को स्वच्छ करूँ, यदि दान से, तो वह कौन-सी वस्तु है जिसके देने से मेरी यह कामना पूर्ण हो।
ऋषियों ने कहा, हे भृगुनन्दन, पापी मनुष्य गो, पृथ्वी और धन के दान से स्वच्छ होता है, यह हमने सुना है। पर एक और दान है जो महान पवित्रकारक माना जाता है, सुनिए। वह वस्तु उत्तम, अद्भुत और अग्नि से उत्पन्न है। पुराने समय में अग्निदेव ने सारे संसार को जलाया था, और उन्हीं के बीज से सुन्दर वर्णवाला स्वर्ण उत्पन्न हुआ, जो “सुवर्ण” (श्रेष्ठ वर्णवाला) कहलाया। स्वर्ण-दान से आपकी कामना अवश्य फलेगी। तब विशेष रूप से कठोर व्रतवाले वसिष्ठ ने उन्हें सम्बोधित कर स्वर्ण की उत्पत्ति की पूरी कथा कही।
समझने की कुंजी: परशुराम जमदग्नि और रेणुका के पुत्र, भृगुवंशी ब्राह्मण-योद्धा हैं। इक्कीस बार क्षत्रियों के संहार के बाद अपने उग्र कर्मों के भार से वे आत्म-शुद्धि की खोज में हैं, और इसी सन्दर्भ में वसिष्ठ उन्हें स्वर्ण की उत्पत्ति का रहस्य सुनाते हैं। ध्यान दें, यहाँ महाकाव्य परशुराम के संहार को छिपाता नहीं; उसी भार को कथा का प्रेरक बनाता है।
वसिष्ठ का उपदेश, अग्नि-सोम का सार और स्वर्ण की श्रेष्ठता
वसिष्ठ बोले, हे राम, सुनिए कि अग्नि-सा तेजवाला स्वर्ण कैसे उत्पन्न हुआ। यह निश्चित जानिए कि स्वर्ण अग्नि और सोम के सार से बना है। स्मृतियों में कहा गया है, बकरा अग्नि है (उसके दान से अग्निदेव के लोक की प्राप्ति होती है), भेड़ वरुण है (वरुण के लोक की), घोड़ा सूर्य है (सूर्य के लोक की), हाथी नाग हैं (नागलोक की), भैंस असुर हैं (असुरलोक की), मुर्गा और सूअर राक्षस हैं (राक्षसलोक की); और पृथ्वी यज्ञ, गो, जल तथा सोम है। समस्त विश्व का मन्थन करने पर जो तेज-राशि मिली, वही स्वर्ण है। अतः इन सब वस्तुओं की तुलना में स्वर्ण निश्चय ही श्रेष्ठ, मूल्यवान और उत्कृष्ट है। इसी कारण देवता, गन्धर्व, उरग (नाग), राक्षस, मनुष्य और पिशाच, सब इसे सँभालकर रखते हैं, और इसी से मुकुट, बाजूबन्द आदि बनाकर सब प्राणी तेज से चमकते हैं।
स्वर्ण-दान सब दानों में परम है, पृथ्वी, गो और अन्य सब वस्तुओं के दान से ऊँचा। अग्नि सब देवता एक में हैं, और स्वर्ण का सार अग्नि ही है, अतः जो स्वर्ण का दान करता है, वह मानो सब देवताओं का दान करता है। इसीलिए स्वर्ण-दान से बढ़कर कोई दान नहीं। वसिष्ठ ने आगे कहा, हे भृगुनन्दन, स्वर्ण की श्रेष्ठता पर और सुनिए, यह मैंने पुराण में सुना है और स्वयं प्रजापति की वाणी कह रहा हूँ।
त्रिशूलधारी रुद्र का विवाह उस देवी (उमा) से हुआ जो उनकी पत्नी बनीं, और हिमालय के शिखर पर वह महातेजस्वी देव देवी से संयोग की इच्छा करने लगे। तब सब देवता चिन्ता से भरे रुद्र के पास गए। महादेव और उनकी वरदायिनी पत्नी उमा, दोनों एक साथ बैठे थे, उन्हें प्रणाम और प्रसन्न करके देवता बोले, हे प्रभु, आपका यह संयोग, एक प्रचण्ड तपवाले का दूसरे प्रचण्ड तपवाली से संयोग है, एक अप्रतिम तेजवाले का दूसरे अप्रतिम तेजवाली से। इससे जो सन्तान होगी, वह निश्चय ही महाबली होगी और तीनों लोकों को बिना शेष छोड़े भस्म कर देगी। हे लोकेश्वर, इन प्रणत देवताओं पर कृपा कीजिए, तीनों लोकों के हित के लिए वर दीजिए, और अपने इस उच्च तेज को रोक लीजिए जो सन्तान का बीज बन सकता है। हे प्रभु, आप पुत्र को जन्म न दें, इसी में हमारी रक्षा है।
बैल-वाहन महादेव ने देवताओं से कहा, “ऐसा ही हो”, और अपना वीर्य ऊपर खींच लिया। तब से वे “ऊर्ध्वरेता” (जिसने वीर्य ऊपर खींच लिया) कहलाए। पर रुद्र की पत्नी उमा देवताओं के इस प्रजनन-रोध से अत्यन्त क्रुद्ध हुईं और बोलीं, चूँकि आपने मेरे स्वामी को सन्तान उत्पन्न करते समय रोका, और मुझसे सन्तान-जन्म का विरोध किया, इसलिए आप सब देवता निःसन्तान हो जाएँ, आपकी अपनी कोई सन्तान न होगी। जिस समय यह शाप दिया गया, उस समय अग्निदेव वहाँ नहीं थे। इसी शाप के कारण देवता सन्तानहीन हुए। रुद्र ने अपना अतुल्य तेज भीतर रोक लिया, पर थोड़ा-सा अंश शरीर से निकलकर पृथ्वी पर गिरा, और वही बीज एक धधकती अग्नि में जा पड़ा और अद्भुत रूप से बढ़ने लगा। रुद्र का वह तेज दूसरे महान तेज (अग्नि) से मिलकर सार में एक हो गया।
समझने की कुंजी: “सोम” यहाँ चन्द्रमा-तत्त्व और औषधि-रस दोनों का द्योतक है, और “अग्नि-सोम का सार” का अर्थ है दोनों मूल शक्तियों, ताप और शीतलता, का मिलन। स्वर्ण को इन्हीं दो शक्तियों के मन्थन से उत्पन्न माना गया है। इसी कथा में आगे यह तेज कार्तिकेय के जन्म और स्वर्ण की उत्पत्ति, दोनों का मूल बनता है।
तारक का त्रास और देवताओं की ब्रह्मा से प्रार्थना
इसी बीच इन्द्र समेत सब देवता तारक नामक असुर से बहुत झुलस गए थे। आदित्य, वसु, रुद्र, मरुत, अश्विन और साध्य, सब दिति के उस पुत्र के पराक्रम से अत्यन्त पीड़ित थे। देवताओं के लोक, उनके सुन्दर रथ, उनके महल और ऋषियों के आश्रम, सब असुरों ने छीन लिए। तब देवता और ऋषि उदास हृदय से अविनाशी तेजवाले ब्रह्मा की शरण में गए।
देवता बोले, हे प्रभु, तारक असुर, जिसे आपसे वर मिला है, देवताओं और ऋषियों को पीड़ित कर रहा है। आप उसकी मृत्यु का विधान कीजिए। हे पितामह, उससे हमें बड़ा भय है, आपके सिवा हमारी कोई शरण नहीं। ब्रह्मा ने कहा, मैं सब प्राणियों के प्रति समान हूँ, पर अधर्म को अनुमोदित नहीं कर सकता। देवताओं और ऋषियों का वह विरोधी तारक शीघ्र नष्ट हो। वेद और सनातन धर्म समाप्त नहीं होंगे, मैंने उचित विधान कर दिया है, आपके हृदय का ज्वर दूर हो।
देवता बोले, आपके दिए वर से वह दिति-पुत्र अपने बल पर गर्वित है, देवताओं से अवध्य है, फिर उसकी मृत्यु कैसे होगी। आपका वर यह है कि वह देवता, असुर या राक्षस से न मारा जा सके। और रुद्र की पत्नी ने हमें शाप दे रखा है कि हमारी कोई सन्तान न होगी। ब्रह्मा ने कहा, हे देवताओं, जब वह शाप दिया गया, अग्नि वहाँ नहीं थे। वही अग्नि देवशत्रुओं के नाश के लिए पुत्र उत्पन्न करेंगे। देवता, दानव, राक्षस, मनुष्य, गन्धर्व, नाग और पक्षी, सबको लाँघकर, अग्नि का वह पुत्र अपने अमोघ शूल (भाला, जो एक बार छोड़ा जाए तो व्यर्थ न जाए) से तारक को मारेगा, और आपके सब शत्रुओं का संहार करेगा।
ब्रह्मा ने आगे कहा, इच्छा (काम) सनातन है, वह रुद्र के बीज से अभिन्न है जिसका एक अंश अग्नि की धधकती ज्वाला में गिरा। वह तेज, जो मानो दूसरा अग्नि है, अग्नि के द्वारा गंगा में डाला जाएगा ताकि देवशत्रुओं के नाश के लिए उन पर सन्तान उत्पन्न हो। अग्नि उमा के शाप की पहुँच में नहीं आए, क्योंकि शाप के समय वे वहाँ नहीं थे। अतः अग्निदेव को खोजा जाए और इस कार्य में लगाया जाए। जो तेजस्वी हैं, उन पर तेजस्वियों के शाप का असर नहीं होता, बल हो जो अधिक बल से टकराए तो दुर्बल पड़ जाता है। अग्नि सब प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं, सर्वत्र जाते हैं, सब वस्तुओं में रहते हैं, और रुद्र से भी पुराने हैं। उस हविर्भोजी अग्नि को खोजिए, वही आपके हृदय की कामना पूरी करेंगे।
सार: तारक के अत्याचार से त्रस्त देवता ब्रह्मा की शरण जाते हैं, और ब्रह्मा बताते हैं कि अग्नि से उत्पन्न पुत्र ही उमा के शाप से मुक्त रहकर तारक का वध करेगा, इसलिए अग्नि को ढूँढ़ना होगा।
अग्नि की खोज, मेंढक, हाथी और तोते के शाप

ब्रह्मा के ये वचन सुनकर देवता और ऋषि प्रसन्न हृदय से अग्नि की खोज में निकले और तीनों लोकों का कोना-कोना छान मारा। पर अग्नि अपने को अपने में लीन करके छिप गए थे, अतः वे न मिले। तभी एक मेंढक, अग्नि के तेज से झुलसा हुआ, पाताल से जल की सतह पर आया और भयभीत देवताओं से बोला, हे देवताओं, अग्नि इस समय पाताल में जल के नीचे हैं, उन्होंने जल की राशि रचकर उसी में निवास किया है, उनके तेज से हम सब झुलस गए हैं। यदि आपको उनके दर्शन चाहिए तो वहीं जाइए, हम तो अग्नि के भय से यहाँ से भागते हैं। इतना कहकर मेंढक जल में डूब गया।
अग्नि को मेंढक के इस विश्वासघात का पता चला। उन्होंने सम्पूर्ण मेंढक-जाति को शाप दिया, आज से आप स्वाद की इन्द्रिय (जीभ का रस-बोध) से रहित हो जाएँगे। यह शाप देकर अग्नि शीघ्र दूसरे स्थान पर चले गए और स्वयं को प्रकट नहीं किया। मेंढकों की यह दशा देखकर, जिन्होंने सेवा की पर दण्ड पाया, देवताओं ने उन पर कृपा की और कहा, यद्यपि अग्नि के शाप से आपकी जीभ और रस-बोध जाता रहा, फिर भी आप अनेक प्रकार की वाणी बोल सकेंगे। बिलों में रहते, भूखे, अचेत, सूखे, अधमरे होकर भी आपको पृथ्वी धारण करेगी, और गहन अन्धकार में, रात को, आप विचर सकेंगे।
देवता फिर पृथ्वी का कोना-कोना छानने लगे, पर अग्नि न मिले। तब इन्द्र के हाथी-सा विशाल एक हाथी बोला, अग्नि इस अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष में निवास कर रहे हैं। क्रोध से अग्नि ने सब हाथियों को शाप दिया, आपकी जीभ पीछे की ओर मुड़ जाएगी। यह कहकर वे वहाँ से चले गए और कुछ काल शमी वृक्ष के हृदय में जा छिपे। हाथियों पर देवताओं ने वरदान किया, भीतर मुड़ी जीभ से भी आप सब कुछ खा सकेंगे और अस्पष्ट बोल सकेंगे।
अश्वत्थ से निकलकर अग्नि शमी के हृदय में जा बैठे थे, इसे एक तोते ने बता दिया। क्रुद्ध अग्नि ने सब तोतों को शाप दिया, आज से आप वाणी की शक्ति से वंचित हो जाएँगे, और उनकी जीभ उलट दी। पर देवताओं ने तोते पर दया करके कहा, तोता होने के कारण आप वाणी से पूरी तरह रहित न होंगे, यद्यपि आपकी जीभ पीछे मुड़ गई है, फिर भी “क” अक्षर तक सीमित वाणी आपमें रहेगी, बालक या वृद्ध की भाँति आपकी बोली मधुर, अस्पष्ट और अद्भुत होगी।
एक उप-कथा: शमी के हृदय में अग्नि के मिलने पर ही देवताओं ने शमी की लकड़ी को यज्ञ-अग्नि उत्पन्न करने का पवित्र ईंधन ठहराया। तभी से अग्नि शमी के भीतर निवास करते माने गए, और मनुष्य शमी को यज्ञ की अग्नि जलाने का साधन मानने लगे। और जो जल अग्नि के सम्पर्क में पाताल में आए थे, वे ही पर्वत के झरनों से उष्ण जल के रूप में फूटते हैं, अग्नि के निवास से वे जल आज भी गरम हैं।
देवताओं को देखकर अग्नि खिन्न हुए और पूछा, आपके यहाँ आने का कारण क्या है। देवता और महर्षि बोले, हम आपको एक कार्य सौंपना चाहते हैं, उसे पूरा कीजिए, इससे आपका ही यश बढ़ेगा। अग्नि ने कहा, अपना कार्य बताइए, मैं उसे पूरा करूँगा, मैं सदा आपकी आज्ञा के लिए तत्पर हूँ, संकोच न करें।
सार: अग्नि बार-बार छिपते हैं, और जो जीव उनका पता देते हैं, उन्हें अग्नि शाप देते और देवता उस शाप को नरम करते हैं। अन्ततः शमी में मिले अग्नि देवताओं का कार्य पूरा करने को तैयार होते हैं।
गंगा में अग्नि का बीज और कार्तिकेय का जन्म

देवता बोले, तारक नामक असुर ब्रह्मा से प्राप्त वर के मद में हमें पीड़ित कर रहा है। आप उसका नाश विधान कीजिए। हे पावक, इन देवताओं, प्रजापतियों और ऋषियों की रक्षा कीजिए, और अपने तेज से एक वीर पुत्र उत्पन्न कीजिए जो उस असुर से हमारा भय दूर करे। हमें महादेवी उमा ने शाप दे रखा है, अब आपके तेज के सिवा कोई शरण नहीं। ऐसा कहे जाने पर अप्रतिम अग्निदेव बोले, “ऐसा ही हो”, और भागीरथी नामक गंगा की ओर गए, उनसे आध्यात्मिक संयोग कर उन्हें गर्भवती किया। गंगा के गर्भ में अग्नि का बीज वैसे ही बढ़ने लगा जैसे ईंधन और वायु पाकर स्वयं अग्नि बढ़ती है।
उस देव के तेज से गंगा हृदय में अत्यन्त व्याकुल हुईं और उस तेज को धारण कर पाने में असमर्थ हो गईं। जब अग्नि ने अपना महातेज गंगा के गर्भ में डाला, तब एक असुर ने अपने ही प्रयोजन से एक भयंकर गर्जना की। उस गर्जना से (जो गंगा को डराने के लिए नहीं थी, पर उन्हें डरा गई) गंगा अत्यन्त भयभीत हुईं, उनके नेत्र भय से घूम गए, और अचेत-सी होकर वे अपने शरीर और गर्भ को सँभाल न पाईं। जाह्नवी काँपने लगीं और अग्निदेव से बोलीं, हे प्रभु, मैं अब आपका यह बीज गर्भ में धारण नहीं कर सकती, इस तेज ने मुझे दुर्बल कर दिया है। मैं इसे विवशता से त्यागती हूँ, अपनी इच्छा से नहीं। हे प्रभु, मेरे शरीर का आपके बीज से वास्तविक देह-स्पर्श नहीं हुआ, हमारा यह संयोग देवताओं के संकट के कारण हुआ, उचित था, देह का नहीं। इसका जो भी पुण्य या दोष हो, वह आपका है।
अग्नि ने कहा, आप यह बीज, यह तेजोमय गर्भ धारण कीजिए, इससे महान फल होगा, आप तो समूची पृथ्वी धारण करने में समर्थ हैं। फिर भी गंगा ने वह बीज मेरु पर्वत के वक्ष पर त्याग दिया, क्योंकि रुद्र के तेज से युक्त (अग्नि रुद्र से अभिन्न हैं) उस जलते बीज को वे अधिक देर सँभाल न सकीं। अग्नि ने पूछा, जो गर्भ आपने त्यागा, वह कैसा है, किस वर्ण, किस रूप, किस तेजवाला है, बताइए। गंगा बोलीं, वह गर्भ स्वर्ण के वर्णवाला है, तेज में आप ही के समान, निर्मल, उज्ज्वल, और उसने सारा पर्वत प्रकाशित कर दिया है। उसकी सुगन्ध कमलों और कदम्ब-पुष्पों की मिली-जुली शीतल गन्ध-सी है। उसके तेज से चारों ओर सब कुछ स्वर्ण-सा हो गया है, मानो सूर्य की किरणों से पर्वत और भूमि स्वर्णमय हो जाएँ। ऐसा है आपका पुत्र, सूर्य या आप ही के समान, सौन्दर्य में दूसरा सोम (चन्द्रमा)। यह कहकर देवी अन्तर्धान हो गईं, और देवताओं का कार्य पूरा कर अग्नि भी अपने इच्छित स्थान को चले गए।
एक उप-कथा: इसी फल के कारण ऋषियों और देवताओं ने अग्नि को “हिरण्यरेता” (स्वर्ण-बीजवाला) नाम दिया। और चूँकि गंगा के त्यागने पर पृथ्वी ने उस बीज को धारण किया, वह “वसुमती” (रत्नवती) कहलाई। वह गर्भ सरकंडों के वन में गिरकर बढ़ने लगा और अद्भुत रूप धारण किया। कृत्तिका नक्षत्र की अधिष्ठात्री देवी ने उस उदय-होते सूर्य-से शिशु को देखा और अपना पुत्र मानकर स्तनपान से उसका पालन किया। इसी से वह बालक “कार्तिकेय” कहलाया। रुद्र के शरीर से स्खलित बीज से उत्पन्न होने के कारण “स्कन्द”, और सरकंडों के वन के एकान्त में, सबकी दृष्टि से छिपकर जन्म लेने के कारण “गुह” (गुप्त) कहलाया।
इसी प्रकार स्वर्ण अग्निदेव की सन्तान के रूप में उत्पन्न हुआ। इसी से स्वर्ण सब वस्तुओं में अग्रणी और देवताओं का भी आभूषण माना गया, और इसी से वह “जातरूप” कहलाया। यह सब मूल्यवान वस्तुओं और आभूषणों में अग्रणी है, सब पवित्रकारकों में पवित्रकारक, सब मंगलों में परम मंगल। स्वर्ण साक्षात तेजस्वी अग्नि है, सब वस्तुओं का स्वामी, और प्रजापतियों में अग्रणी। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, स्वर्ण सब पवित्रों में परम पवित्र है, और उसका सार अग्नि तथा सोम है।
सार: गंगा के गर्भ में पड़ा अग्नि का तेज मेरु पर त्यागा जाकर स्वर्ण-वर्ण के शिशु में परिणत होता है, जो कृत्तिकाओं द्वारा पाला जाकर कार्तिकेय बनता है, और उसी तेज से स्वर्ण की उत्पत्ति होती है।
ब्रह्मदर्शन आख्यान, रुद्र का यज्ञ और भृगु-अंगिरस-कवि का जन्म
वसिष्ठ ने आगे कहा, हे राम, यह ब्रह्मदर्शन नामक इतिहास भी मैंने पुराने समय में सुना था, जो परमात्मा-स्वरूप पितामह ब्रह्मा की उपलब्धि से सम्बन्धित है। प्राचीन काल में देवश्रेष्ठ रुद्र ने, वरुण का रूप धारण कर, एक यज्ञ किया था। उसमें अग्नि को आगे लेकर सब मुनि और देवता आए। यज्ञ के सब अंग अपने मूर्त रूप में, वषट् मन्त्र मूर्त रूप में, हजारों सामवेद और यजुर्वेद के मन्त्र मूर्त रूप में आए। ऋग्वेद उच्चारण-नियमों से सज्जित होकर आया। लक्षण, स्वर, निरुक्त, पद-पाठ की पंक्तियाँ, ओंकार, निग्रह और प्रग्रह, सब आकर महादेव के नेत्र में निवास करने लगे। वेद, उपनिषद, विद्या, सावित्री, और भूत-वर्तमान-भविष्य, सब आए और शिव में धारण हुए।
उस सर्वेश्वर ने स्वयं अपने में आहुति दी, और पिनाकधारी ने उस बहुरूप यज्ञ को परम सुन्दर बना दिया। वही स्वर्ग, अन्तरिक्ष, पृथ्वी और आकाश है, पृथ्वी का स्वामी है, सब विघ्नों का स्वामी है, श्री से युक्त है, और तेजस्वी अग्नि से अभिन्न है। वह देव अनेक नामों से पुकारा जाता है, ब्रह्मा, शिव, रुद्र, वरुण, अग्नि और प्रजापति, वही सब प्राणियों का मंगलमय स्वामी है। यज्ञ अपने मूर्त रूप में, तप, सब संयोग-संस्कार, कठोर व्रतवाली देवी दीक्षा, दिशाएँ अपने अधिष्ठाता देवों समेत, देवताओं की पत्नियाँ, उनकी कन्याएँ और दिव्य मातृगण, सब एक साथ उस पशुपति के पास आए। वरुण-रूपधारी महादेव के उस यज्ञ को देखकर सब प्रसन्न हुए।
परम सुन्दर दिव्य अप्सराओं को देखकर ब्रह्मा का बीज निकल पृथ्वी पर गिरा। बीज धूल में गिरने के कारण पूषा (सूर्य) ने वह बीज-मिश्रित धूल हाथों से उठाकर यज्ञ-अग्नि में डाल दी। उधर यज्ञ धधकती अग्नि के साथ चल रहा था, और होता-रूप ब्रह्मा अग्नि में आहुति दे रहे थे। तभी पितामह कामना से उद्दीप्त हुए और उनका बीज निकला, जिसे उन्होंने यज्ञ-स्रुवा (आहुति-चम्मच) से उठाकर मन्त्रों सहित घी की आहुति के रूप में धधकती अग्नि पर डाल दिया। उसी बीज से ब्रह्मा ने चारों वर्ण के प्राणियों को उत्पन्न किया।
पितामह का वह बीज सत्त्व, रजस और तमस, तीनों गुणों से युक्त था। उसके रजस अंश से सब चर प्राणी (प्रवृत्ति, कर्म में रत) उत्पन्न हुए, तमस अंश से सब अचर प्राणी, और सत्त्व अंश दोनों में प्रविष्ट हुआ। वह सत्त्व-गुण तेज या प्रकाश-स्वरूप है (बुद्धि से अभिन्न), नित्य है, और उसी से अनन्त आकाश है। सब प्राणियों में सत्त्व विद्यमान है, और वही उचित-अनुचित का बोध करानेवाला प्रकाश है।
जब ब्रह्मा का बीज उस यज्ञ-अग्नि पर आहुति-रूप में पड़ा, तब उससे तीन पुरुष उत्पन्न हुए, जिनके शरीर उनके उद्गम-स्थान के अनुरूप थे। एक अग्नि की ज्वालाओं (भृग्) से सबके पहले उठा, अतः “भृगु” कहलाया। दूसरा जलते अंगारों (अंगार) से उठा, अतः “अंगिरस” कहलाया। तीसरा बुझे अंगारों के ढेर से उठा, अतः “कवि” कहलाया। यज्ञ-अग्नि की किरणों से एक और उत्पन्न हुआ, मरीचि, और मरीचि से कश्यप। बिछे कुश से वालखिल्य ऋषि और अत्रि उत्पन्न हुए। अग्नि की राख से वैखानस ऋषि, अग्नि के नेत्रों से दोनों अश्विन, कानों से प्रजापति, रोम-कूपों से ऋषि, स्वेद से छन्द, और बल से मन उत्पन्न हुआ। इसी से अग्नि को सब देवताओं का समष्टि-रूप कहा गया है।
एक उप-कथा: इस यज्ञ-रूपक में अग्नि के अंग ही काल-इकाइयाँ बन जाते हैं, जो लकड़ियाँ अग्नि को जीवित रखती हैं वे मास हैं, ईंधन के रस पक्ष (पखवाड़े) हैं, अग्नि का यकृत दिन-रात है, उसका प्रचण्ड प्रकाश मुहूर्त, रक्त से रुद्रगण और स्वर्ण-वर्ण मैत्रदेवता, धुएँ से वसु, ज्वालाओं से रुद्र और बारह आदित्य, और आकाश में नियत कक्षाओं में बैठे ग्रह-नक्षत्र अग्नि के अंगारे हैं।
सार: रुद्र के वरुण-रूप यज्ञ में ब्रह्मा के बीज से भृगु, अंगिरस और कवि, तीन प्रजापति उत्पन्न होते हैं, जिनसे आगे सम्पूर्ण सृष्टि-वंश फैलता है, और परशुराम स्वयं इसी भृगु-वंश के हैं।
तीन पुत्रों पर अधिकार और प्रजापति-वंश का विस्तार
जन्म के पश्चात वरुण-रूपधारी, पवन-आत्मावाले महादेव ने कहा, यह उत्तम यज्ञ मेरा है, मैं इसमें गृहपति हूँ, अतः जो तीन प्राणी पहले अग्नि से उत्पन्न हुए, वे मेरे हैं। अग्नि बोले, ये मेरे अंगों से उत्पन्न हुए हैं, इनके जीवन का कारण मैं हूँ, अतः ये मेरी सन्तान हैं, वरुण-रूप महादेव इस विषय में भूल कर रहे हैं। तब सर्व-स्वामी पितामह ब्रह्मा ने कहा, ये बालक मेरे हैं, बीज मेरा था जो मैंने अग्नि पर डाला, यज्ञ का सम्पादक मैं हूँ, और फल सदा उसी का होता है जिसने बीज बोया हो।
तब देवताओं ने ब्रह्मा को प्रणाम कर कहा, हे प्रभु, हम सब और यह सम्पूर्ण चराचर जगत आपकी ही सन्तान है, अतः अग्नि और वरुण-रूप महादेव की भी इन पुत्रों के विषय में इच्छा पूरी हो। ब्रह्मा से उत्पन्न होने पर भी, वरुण-रूप महादेव ने प्रथम पुत्र भृगु को, जो सूर्य-सा तेजस्वी था, अपना पुत्र माना। ब्रह्मा की इच्छा से अंगिरस अग्नि के पुत्र हुए, और कवि को ब्रह्मा ने अपना पुत्र माना। अतः प्रजापति भृगु “वारुण” कहलाए, अंगिरस “आग्नेय”, और कवि “ब्राह्म”। भृगु और अंगिरस, जो अग्नि की ज्वाला और अंगारों से उत्पन्न हुए, संसार में विस्तृत वंशों के जनक बने। ये तीनों प्रजापति अनेक जाति-वंशों के मूल हैं।
भृगु के सात पुत्र हुए, सब गुण और सिद्धियों में उन्हीं के समान, च्यवन, वज्रशीर्ष, शुचि, ऊर्व, वरदायी शुक्र, विभु और सवन। ये भृगु के पुत्र होने से “भार्गव” और महादेव-वरुण द्वारा भृगु के अंगीकार के कारण “वारुण” भी कहलाते हैं। हे राम, आप इसी भृगुवंश के हैं। अंगिरस के आठ पुत्र हुए, बृहस्पति, उतथ्य, पायस्य, शान्ति, धीर, विरूप, संवर्त और आठवें सुधन्वा, ये अग्नि के पुत्र भी माने जाते हैं और केवल ज्ञान में रत हैं। कवि के, जिन्हें ब्रह्मा ने अपनाया, आठ पुत्र “वारुण” कहलाए, कवि, काव्य, धृष्णु, महाबुद्धिमान उशनस, भृगु, विरज, कशि और सब धर्मों के ज्ञाता उग्र। इन्हीं तीनों के वंश से समूचा संसार बसा।
देवताओं की प्रार्थना पर ब्रह्मा प्रसन्न हुए थे, जब उन्होंने कहा था कि ये लोकनाथ (भृगु, अंगिरस, कवि और उनके वंशज) हम सबकी रक्षा करें, प्रजा के जनक हों, तपस्वी हों, वेदों के पारगामी हों, महान कर्म करें, देवताओं के मित्र हों, और प्रत्येक सृष्टि के आरम्भ में फिर से वंश को स्थापित करें। ब्रह्मा ने “ऐसा ही हो” कहकर अपनी सम्मति दी और अपने स्थान को लौट गए। यही पुराने समय में महादेव के उस यज्ञ में हुआ, जब उन्होंने सृष्टि के आरम्भ में वरुण का रूप धरा था।
समझने की कुंजी: यह वंश-कथा परशुराम (राम भार्गव) को सीधे इस सृष्टि-कथा से जोड़ती है, “आप इसी भृगुवंश के हैं” कहकर वसिष्ठ बताते हैं कि सुननेवाला स्वयं उसी परम्परा का अंश है, जिससे स्वर्ण-उत्पत्ति की कथा निजी हो उठती है।
अग्नि-स्वर्ण की अभिन्नता और स्वर्ण-दान का फल
वसिष्ठ बोले, अग्नि ही ब्रह्मा है, पशुपति है, सर्व है, रुद्र है, प्रजापति है। यह प्रसिद्ध है कि स्वर्ण अग्नि की सन्तान है। जब यज्ञ के लिए अग्नि उपलब्ध न हो, तब स्वर्ण को उसका स्थानापन्न बनाया जाता है। वेद-श्रुति के संकेत से, जो अग्नि और स्वर्ण की अभिन्नता जानता है, वह कुश पर स्वर्ण का टुकड़ा रखकर उस पर आहुति देता है। बाँबी के छिद्रों पर, बकरे के दाहिने कान पर, समतल भूमि पर, तीर्थ के जल पर, या ब्राह्मण के हाथ पर आहुति दी जाए तो अग्निदेव प्रसन्न होते हैं। इसी से सब देवता अग्नि को अपनी शरण मानते हैं। अग्नि ब्रह्मा से उत्पन्न हुए, और अग्नि से स्वर्ण, अतः जो धर्मात्मा स्वर्ण-दान करते हैं, वे मानो सब देवताओं का दान करते हैं।
स्वर्ण-दान करनेवाला परम गति पाता है, उसके लोक तेज से दीप्त होते हैं, वह स्वर्ग में राजाओं का राजा होता है। जो सूर्योदय पर विधि और मन्त्र से स्वर्ण-दान करता है, वह अशुभ स्वप्नों के दुष्फल टाल देता है, और सब पापों से स्वच्छ हो जाता है। जो मध्याह्न में स्वर्ण-दान करता है, वह भविष्य के पाप नष्ट कर देता है। जो संयत मन से सन्ध्या-काल में स्वर्ण-दान करता है, वह ब्रह्मा, वायु, अग्नि और सोम के लोकों में निवास पाता है, इन्द्र के लोकों में यश पाता है, इस लोक में भी कीर्ति पाकर सब पापों से मुक्त होकर सुख से विचरता है, और अनगिनत सुख-लोकों को भोगता है, जहाँ से कभी पतन नहीं होता।
स्वर्ण को अग्नि के समान कहा गया है, अतः स्वर्ण-दान महान सुखदायी है, वह अभीष्ट गुण और सिद्धियाँ देता है और हृदय को स्वच्छ करता है। हे निष्पाप, मैंने आपको स्वर्ण की उत्पत्ति बता दी। अब सुनिए, कार्तिकेय कैसे बड़े हुए। बहुत काल बाद कार्तिकेय बढ़े, और इन्द्र समेत सब देवताओं ने उन्हें देव-सेना का सेनापति चुना। उन्होंने इन्द्र की आज्ञा से और सब लोकों के हित के लिए दैत्य तारक और अनेक असुरों का वध किया। हे राम, अतः आप भी स्वर्ण-दान कीजिए।
भीष्म बोले, वसिष्ठ के ऐसा कहने पर महाप्रतापी जमदग्निपुत्र परशुराम ने ब्राह्मणों को स्वर्ण-दान किया और अपने पापों से स्वच्छ हुए। हे युधिष्ठिर, मैंने आपको स्वर्ण-दान के फल और उसकी उत्पत्ति का सब वर्णन कर दिया। आप भी ब्राह्मणों को प्रचुर स्वर्ण-दान कीजिए, इससे आप निश्चय ही सब पापों से स्वच्छ होंगे।
सार: अग्नि और स्वर्ण की अभिन्नता के आधार पर स्वर्ण-दान को सब देवताओं का दान कहा गया है, उदय, मध्याह्न और सन्ध्या के दानों के अलग-अलग फल बताए गए, और कार्तिकेय द्वारा तारक-वध के साथ यह आख्यान पूरा होता है।
कार्तिकेय का विकास और तारक-वध का पूरा वृत्तान्त
युधिष्ठिर ने पूछा, हे पितामह, आपने स्वर्ण-दान का फल और स्वर्ण की उत्पत्ति बताई। अब बताइए, तारक का वध कैसे हुआ, जब वह देवताओं से अवध्य था। मुझे यह विस्तार से सुनने की बड़ी उत्सुकता है। भीष्म बोले, तारक के पराक्रम और गंगा द्वारा अग्नि-बीज त्यागने से व्याकुल देवताओं और ऋषियों ने छह कृत्तिकाओं से उस शिशु का पालन कराने को कहा, क्योंकि देवांगनाओं में केवल वे ही अग्नि के तेज को गर्भ में धारण कर सकती थीं। उनकी इस तत्परता से अग्निदेव अत्यन्त प्रसन्न हुए। अग्नि के तेज को छह भागों में बाँटकर गर्भ-मार्गों में रखा गया, और छहों कृत्तिकाएँ अपने-अपने अंश का पोषण करने लगीं।
पर भीतर बढ़ते कुमार के तेज से उनके शरीर तप उठे, और उन्हें न स्वर्ग में न पृथ्वी पर शान्ति मिली। प्रसव-काल आने पर छहों ने एक ही समय प्रसव किया, और यद्यपि वे छह भिन्न गर्भों में थे, सब अंश बाहर आते ही एक में मिल गए। पृथ्वी देवी ने स्वर्ण के ढेर से उस शिशु को उठाया, जो अग्नि-सा तेजस्वी, सुन्दर रूपवाला था और सरकंडों के मनोहर वन में बढ़ने लगा। छहों कृत्तिकाओं ने प्रातःकाल के सूर्य-से उस शिशु को देखा, स्नेह से भरकर अपने स्तनों से उसका पालन किया। कृत्तिकाओं से जन्म और पालन के कारण वह “कार्तिकेय”, रुद्र से स्खलित बीज से “स्कन्द”, और सरकंडों के एकान्त में जन्म के कारण “गुह” कहलाया।
तैंतीस देवता, अपने मूर्त रूप में दिशाएँ और उनके अधिष्ठाता, रुद्र, धाता, विष्णु, यम, पूषा, अर्यमा, भग, अंश, मित्र, साध्य, वासव, वसु, अश्विन, जल, वायु, आकाश, चन्द्रमा, सब नक्षत्र, ग्रह, सूर्य, और मूर्त रूप में ऋक्-साम-यजुर्वेद, सब उस अग्निपुत्र को देखने आए। ऋषियों ने स्तुति की और गन्धर्वों ने गीत गाए। वह कुमार छह मुख, बारह नेत्र, बारह भुजाओंवाला, चौड़े कन्धोंवाला और ब्राह्मणों के प्रति अत्यन्त अनुरक्त था, उसका तेज अग्नि और सूर्य-सा था। उसे झाड़ियों पर लेटा देख देवता और ऋषि प्रसन्न हुए और तारक को मानो मरा ही समझ लिया।
देवता उसके मनोरंजन के लिए अनेक खिलौने और पक्षी लाए। सुन्दर पंखोंवाले गरुड़ ने अपना एक पुत्र, रंग-बिरंगे पंखोंवाला मयूर, दिया। राक्षसों ने सूअर और भैंसा दिया। अरुण ने अग्नि-सा तेजवाला मुर्गा दिया। चन्द्रमा ने भेड़, सूर्य ने अपनी कुछ चमकीली किरणें दीं। गायों की माता सुरभि ने सैकड़ों-हजारों गायें दीं। अग्नि ने सद्गुणी बकरा दिया। इला ने प्रचुर फूल-फल दिए। सुधन्वा ने रथ और कुवर-वाहन दिया। वरुण ने समुद्र के मंगलमय उत्पाद और कुछ हाथी दिए। इन्द्र ने सिंह, व्याघ्र, चीते, अनेक पक्षी, हिंस्र पशु और अनेक छत्र दिए। राक्षस और असुर बड़ी संख्या में उस बालक के अनुचर बने।
अग्निपुत्र को बढ़ते देख तारक ने अनेक उपायों से उसका नाश चाहा, पर उस तेजस्वी देव का कुछ न बिगाड़ सका। समय आने पर देवताओं ने सरकंडों के वन में जन्मे अग्निपुत्र को अपनी सेना का सेनापतित्व सौंपा और तारक के अत्याचार बताए। महातेजस्वी सेनापति बढ़े, और गुह ने अपने अमोघ शूल से तारक को ऐसे मार डाला मानो खेल हो। तारक-वध के बाद उन्होंने इन्द्र को तीनों लोकों के राज्य पर फिर प्रतिष्ठित किया। स्वर्ण-रूप वह तेज कार्तिकेय के साथ एक ही बीज से उत्पन्न हुआ, अतः स्वर्ण परम मंगल, श्रेष्ठ और अक्षय गुणवाला है। हे राम, अतः आप स्वर्ण-दान कीजिए, वसिष्ठ ने यही पुराने समय में परशुराम को सुनाया था, और स्वर्ण-दान से ही परशुराम सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग के उस स्थान को गए जो अन्यों को दुर्लभ है।
सार: छह कृत्तिकाओं द्वारा पाला गया छह-मुखवाला कार्तिकेय देव-सेनापति बनकर अमोघ शूल से तारक का वध करता है और इन्द्र को राज्य लौटाता है, जिससे स्वर्ण-उत्पत्ति का प्रसंग और दान-महिमा एक साथ पूर्ण होते हैं।
मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), अनुशासन पर्व, दानधर्म उपपर्व, अध्याय 1-168; पाठान्तर में गीता प्रेस का क्रम रखा गया है।
आधार: महाभारत, वेदव्यास (गीता प्रेस, गोरखपुर)