लुल्ला परिवारLulla Family
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देवीशक्ति, रक्षा और रूपांतरण

ललिता सहस्रनाम, खण्ड 9

श्री ललिता सहस्रनाम · खण्ड नौ

गुणातीत और निर्गुण-स्वरूप

नाम आठ-सौ-एक से नौ-सौ। माया-अतीत, निर्विकल्प।

एक साधिका पीठ की ओर से प्रकाश-स्तम्भ के सामने बैठी हैं, दोनों ओर श्वेत, रक्त और श्याम वर्ण की धाराएँ उठ रही हैं और ऊपर एक धूमिल तेजोमय रूप है।

नौवें खण्ड का झुकाव देवी के निर्गुण-रूप की ओर है। यहाँ नाम-दर-नाम माया से, तीनों गुणों से, और सब कल्पनाओं से देवी की अतिक्रमण-स्थिति प्रकट होती है।

यह खण्ड माण्डूक्य उपनिषद् के तुरीय-तत्त्व के बहुत निकट है। श्रीविद्या-परम्परा का सर्वोच्च शिखर यहीं है, जहाँ देवी रूप-धारी व्यक्तित्व नहीं रहतीं, शुद्ध तत्त्व-स्थिति बन जाती हैं।

काश्मीर के शैव-दर्शन में स्पन्द का सिद्धान्त इसी प्रकार की निर्गुण-सगुण-संगति को रेखांकित करता है। उत्पलदेव और अभिनवगुप्त ने श्रीविद्या को इसी दार्शनिक-आधार पर समझा। आज भी काशी और पुणे की कुछ परम्पराओं में यह तत्त्व-चिन्तन जीवित है।

नौवें खण्ड में ‘गुणातीत’ और ‘निर्गुण’ शब्द बार-बार आते हैं और एक दार्शनिक-स्थिति ले लेते हैं। सत्त्व, रजस् और तमस्, इन तीनों गुणों से ललिता परे हैं। यह गुणातीत-अवस्था भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय में कृष्ण ने और ‘विवेक-चूड़ामणि’ में शंकराचार्य ने भी खोली है।

नाम आठ-सौ-एक से नौ-सौ तक के शब्द-समूह में एक लक्षण उभरता है। ‘महा-‘ उपसर्ग बार-बार जुड़ता है, और देवी की अनन्तता का सूचक बनता है। निर्गुण-नामों की यह घनी पंक्ति देवी को कारण-कार्य, जन्म-मृत्यु और कल्पना, तीनों से परे ले जाती है।

आधुनिक तमिल-कवियों में सुब्रह्मण्य भारती (1882-1921) ने अपनी देवी-रचनाओं में इन नामों का बार-बार स्मरण किया। भारती श्रीविद्या-साधक नहीं थे, फिर भी उनकी काव्य-दृष्टि में देवी का यह गुणातीत-स्वरूप केन्द्र में रहा।

नाम 801 से 900

पहली लहर देवी को परिपूर्णता और पुरातनता से खोलती है। वे सदा पुष्ट और बल से भरी हैं, आदि-काल से विद्यमान सबसे प्राचीन सत्ता हैं, सबकी पूजा के योग्य हैं। परिपूर्ण होकर वे सबका पोषण करती हैं, और उनके नेत्र कमल-दल समान हैं। फिर नाम परम-तत्त्व की ओर उठते हैं। वे परम ज्योति-स्वरूप हैं, सर्वोच्च आश्रय और परम धाम हैं, सूक्ष्म से सूक्ष्मतम परमाणु-स्वरूप हैं, और श्रेष्ठों में भी श्रेष्ठ, पर से भी परे हैं। हाथ में पाश सुशोभित है, और वही पाश थामे वे हमारे बन्धनों का नाश कर देती हैं, और शत्रुओं के अभिचार-मन्त्रों का भेदन कर देती हैं।

801पुष्टासदा पुष्ट और बल से भरी हुई
802पुरातनाआदि काल से विद्यमान सबसे प्राचीन सत्ता
803पूज्यासबकी पूजा के योग्य
804पुष्करापरिपूर्ण होकर सबका पोषण करने वाली
805पुष्करेक्षणाकमल दल समान नेत्रों वाली
806परञ्ज्योतिःपरम ज्योति स्वरूपा, ज्योतियों की भी ज्योति
807परन्धामसर्वोच्च आश्रय और परम धाम
808परमाणुःसूक्ष्म से सूक्ष्मतम, परमाणु स्वरूपा
809परात्पराश्रेष्ठों में भी श्रेष्ठ, पर से भी परे
810पाशहस्ताहाथ में पाश धारण करने वाली
811पाशहन्त्रीउसी पाश को थामे हमारे बन्धनों का नाश करने वाली
812परमन्त्रविभेदिनीशत्रुओं के अभिचार मन्त्रों का भेदन करने वाली

अगली लहर साकार और निराकार के बीच झूलती है। देवी साकार रूप धारण करती हैं, और वही किसी निश्चित रूप से रहित निराकार भी हैं। हमारे क्षणभंगुर अर्पण से भी वे तृप्त हो जाती हैं, और मुनियों के मन-रूपी मानस-सरोवर की हंसी बनकर विचरती हैं। फिर सत्य की पंक्ति आती है। वे सत्य में दृढ़ रहती हैं, स्वयं सत्य-स्वरूप हैं, सबके भीतर अन्तर्यामी रूप में बसती हैं, और नित्य सत्-स्वरूपा सत्ता हैं। यहीं वे ब्रह्म की शक्ति बनकर सबका आधार बनती हैं, स्वयं ब्रह्म-स्वरूप हैं, सबकी जननी हैं, और अनेक रूपों में प्रकट होती हैं।

813मूर्तासाकार रूप धारण करने वाली
814अमूर्ताकिसी निश्चित रूप से रहित निराकार
815अनित्यतृप्ताक्षणभंगुर अर्पण से भी तृप्त हो जाने वाली, क्योंकि भक्ति ही उन्हें प्रसन्न करती है
816मुनिमानसहंसिकामुनियों के मन रूपी मानस सरोवर की हंसी
817सत्यव्रतासत्य में दृढ़ रहने वाली, सत्य ही जिनका व्रत है
818सत्यरूपास्वयं सत्य स्वरूपा, जो तीनों कालों में टिकी रहती है
819सर्वान्तर्यामिनीसबके भीतर अन्तर्यामी रूप में बसने वाली
820सतीनित्य सत् स्वरूपा सत्ता; दक्ष की पुत्री, शिव की पतिव्रता सती भी
821ब्रह्माणीब्रह्म की शक्ति बनकर सबका आधार; भास्करराय के अनुसार ब्रह्मा को जीवन देने वाली
822ब्रह्मस्वयं ब्रह्म स्वरूपा
823जननीसबकी जननी, समस्त विश्व की रचयित्री
824बहुरूपाअनेक रूपों में प्रकट होने वाली

अब देवी सृष्टि की प्रवर्तक और प्राणों की स्वामिनी बनकर उभरती हैं। वे ज्ञानियों द्वारा अर्चित हैं, समस्त विश्व की जन्मदात्री हैं, भय-जनक तेज से भरी प्रचण्डा हैं, स्वयं दिव्य आज्ञा-स्वरूप हैं, और सबकी प्रतिष्ठा, आधार-नींव हैं। वे विश्व-रूप में प्रकट हुई हैं, पाँचों प्राणों और इन्द्रियों की स्वामिनी हैं, और वही जीवन-शक्ति की दात्री भी हैं। पचास पूजा-पीठों के रूप में स्थित हैं, हर भाँति बन्धन-रहित स्वतन्त्र हैं, और एकान्त निर्जन स्थानों में निवास करती हैं।

825बुधार्चिताज्ञानियों के द्वारा अर्चित
826प्रसवित्रीसमस्त विश्व की जन्मदात्री
827प्रचण्डाभय जनक तेज से भरी प्रचण्डा
828आज्ञास्वयं दिव्य आज्ञा स्वरूपा, वेदों में कही विधि और निषेध
829प्रतिष्ठासबकी प्रतिष्ठा, समस्त विश्व की आधार नींव
830प्रकटाकृतिःविश्व रूप में प्रकट हुई, सबके अनुभव में आने वाली आकृति
831प्राणेश्वरीपाँचों प्राणों और इन्द्रियों की स्वामिनी
832प्राणदात्रीजीवन शक्ति की दात्री
833पञ्चाशत्पीठरूपिणीपचास पूजा पीठों के रूप में स्थित, कामरूप से आगे की पीठें
834विशृङ्खलाहर भाँति बन्धन रहित, स्वतन्त्र
835विविक्तस्थाएकान्त निर्जन स्थानों में निवास करने वाली

यह लहर वीरता, मुक्ति और मूल-स्वरूप को साथ बाँधती है। देवी वीरों की माता हैं, आकाश-तत्त्व की जननी हैं, मुक्ति प्रदान करने वाली हैं, और स्वयं मुक्ति का निवास-स्थान हैं। वे समस्त सृष्टि के मूल विग्रह-रूप हैं, सबके भाव और मनोभावों को जानती हैं, जन्म-मृत्यु-रूपी भव-रोग का नाश करती हैं, और वही भव-चक्र को घुमाती भी हैं। फिर शब्द और सार की पंक्ति आती है। वे समस्त वेदों का सार हैं, समस्त शास्त्रों का सार हैं, समस्त मन्त्रों का सार हैं, और कृश-उदरी, क्षीण कटि वाली रूप-छवि में प्रकट होती हैं।

836वीरमातावीरों की माता
837वियत्प्रसूःआकाश तत्त्व की जननी
838मुकुन्दामुक्ति प्रदान करने वाली
839मुक्तिनिलयास्वयं मुक्ति का निवास स्थान
840मूलविग्रहरूपिणीसमस्त सृष्टि और शक्तियों का मूल विग्रह रूप
841भावज्ञासबके भाव और मनोभावों को जानने वाली
842भवरोगघ्नीजन्म मृत्यु रूपी भव रोग का नाश करने वाली
843भवचक्रप्रवर्तिनीभव चक्र को घुमाने वाली
844छन्दःसारासमस्त वेदों का सार
845शास्त्रसारासमस्त शास्त्रों का सार
846मन्त्रसारासमस्त मन्त्रों का सार
847तलोदरीकृश उदर और क्षीण कटि वाली

यहाँ कीर्ति और वैभव से नाम उठकर शान्ति की भी सीमा लाँघ जाते हैं। देवी की कीर्ति उदात्त और विस्तीर्ण है, वैभव और सामर्थ्य असीम है, और वे अक्षर-वर्णों के रूप में स्थित हैं। वे जन्म, मृत्यु और जरा से तप्त जनों को विश्राम और शान्ति देती हैं, उनका गुणगान समस्त उपनिषदों में हुआ है, और वे शान्ति की अवस्था से भी परे की कला-स्वरूपा हैं। फिर गहराई और आकाश की पंक्ति आती है। वे अथाह, गहन हैं, आकाश के भीतर अवकाश में स्थित हैं, अपने ऐश्वर्य में गर्वित हैं, और संगीत में रमती हैं।

848उदारकीर्तिःउदात्त और विस्तीर्ण कीर्ति वाली
849उद्दामवैभवाअसीम वैभव और सामर्थ्य वाली
850वर्णरूपिणीअक्षर वर्णों के रूप में स्थित
851जन्ममृत्युजरातप्तजनविश्रान्तिदायिनीजन्म, मृत्यु और जरा से तप्त जनों को विश्राम और शान्ति देने वाली
852सर्वोपनिषदुद्घुष्टासमस्त उपनिषदों में जिनका गुणगान हुआ है
853शान्त्यतीतकलात्मिकाशान्ति की अवस्था से भी परे की कला स्वरूपा, जो द्वैत मिटाकर आनन्द देती है
854गम्भीराअथाह और गहन
855गगनान्तस्थाआकाश के भीतर अवकाश में स्थित
856गर्विताअपने ऐश्वर्य में गर्वित
857गानलोलुपासंगीत में रमने वाली

अब निर्गुण-शिखर सबसे पास आता है। देवी कल्पित गुणों से, मन की रचनाओं से रहित हैं, सर्वोच्च परम-सीमा हैं जिससे परे कुछ नहीं, और समस्त पाप और शोक का अन्त कर देती हैं। वे अपने कान्त, शिव के शरीर का अर्ध-भाग हैं, कार्य और कारण के बन्धन से मुक्त हैं, कामेश्वर के सान्निध्य के आनन्द में तरंगित रहती हैं, और दमकते स्वर्ण के कर्ण-ताटङ्क धारण करती हैं। फिर लीला और अजन्मा-भाव की पंक्ति आती है। वे लीला-वश अनेक दिव्य रूप धारण करती हैं, अजन्मा हैं, क्षय और क्षीणता से सर्वथा मुक्त हैं, अपने सौन्दर्य में मनोहारिणी हैं, और शीघ्र प्रसन्न हो जाती हैं।

858कल्पनारहिताकल्पित गुणों और मन की रचनाओं से रहित
859काष्ठासर्वोच्च परम सीमा, जिससे परे कुछ नहीं; भास्करराय के अनुसार वेदान्त का अन्तिम सिद्धान्त
860अकान्तासमस्त पाप और शोक का अन्त करने वाली
861कान्तार्धविग्रहाअपने कान्त शिव के शरीर का अर्ध भाग
862कार्यकारणनिर्मुक्ताकार्य और कारण के बन्धन से मुक्त
863कामकेलितरङ्गिताकामेश्वर के सान्निध्य के आनन्द में तरंगित
864कनत्कनकताटङ्कादमकते स्वर्ण के कर्ण ताटंक धारण करने वाली
865लीलाविग्रहधारिणीलीला वश अनेक दिव्य रूप धारण करने वाली
866अजाअजन्मा, जिनका जन्म कभी नहीं हुआ
867क्षयविनिर्मुक्ताक्षय और क्षीणता से सर्वथा मुक्त
868मुग्धाअपने सौन्दर्य में मनोहारिणी
869क्षिप्रप्रसादिनीशीघ्र प्रसन्न हो जाने वाली

यह लहर अन्तर्मुख-साधना और त्रयी-स्वरूप को बाँधती है। देवी अन्तर्मुख होकर मन के भीतर आराधी जाती हैं, और बहिर्मुख वृत्ति वालों के लिए अति दुर्लभ रहती हैं। वे तीनों वेद-स्वरूपा हैं, धर्म, अर्थ और काम इन तीन पुरुषार्थों का निवास हैं, तीनों लोकों में स्थित रहती हैं, और श्रीचक्र के अन्तर्दशार चक्र की अधिष्ठात्री त्रिपुरमालिनी हैं। फिर स्वाधीनता और अमृत की पंक्ति आती है। वे सब प्रकार के रोगों से रहित हैं, किसी आश्रय पर निर्भर नहीं स्वयं-आधार हैं, अपने ही आत्म-स्वरूप में रमण करती हैं, अमृत-धारा का उद्गम हैं, और संसार-रूपी कीचड़ में डूबे जनों के उद्धार में निपुण हैं।

870अन्तर्मुखसमाराध्याअन्तर्मुख होकर मन के भीतर आराधी जाने वाली
871बहिर्मुखसुदुर्लभाबहिर्मुख वृत्ति वालों के लिए अति दुर्लभ
872त्रयीतीनों वेद, ऋक्, यजुः और साम, स्वरूपा
873त्रिवर्गनिलयाधर्म, अर्थ और काम, तीन पुरुषार्थों का निवास
874त्रिस्थातीनों लोकों में स्थित रहने वाली
875त्रिपुरमालिनीश्रीचक्र के अन्तर्दशार चक्र की अधिष्ठात्री
876निरामयासब प्रकार के रोगों से रहित
877निरालम्बाकिसी आश्रय पर निर्भर नहीं, स्वयं आधार
878स्वात्मारामाअपने ही आत्म स्वरूप में रमण करने वाली
879सुधास्रुतिः / सृतिःअमृत धारा का उद्गम; भास्करराय के अनुसार सहस्रार के चन्द्र से झरता अमृत
880संसारपङ्कनिर्मग्नसमुद्धरणपण्डितासंसार रूपी कीचड़ में डूबे जनों के उद्धार में निपुण

अब यज्ञ, धर्म और समृद्धि की पंक्ति आती है। देवी को यज्ञ और अन्य अनुष्ठान प्रिय हैं, वे स्वयं यज्ञ-कर्म की कर्त्री हैं, और यज्ञ का संचालन करने वाले यजमान का स्वरूप भी हैं। वे धर्म, सदाचरण की आधार-भूमि हैं, समस्त धन की अध्यक्षा हैं, और धन और धान्य की वृद्धि करती हैं। ज्ञानी विप्र उन्हें प्रिय हैं, वे स्वयं विप्र के रूप में स्थित हैं, और अपनी माया-शक्ति से विश्व को घुमाती हैं। प्रलय-काल में वे समस्त विश्व का ग्रास कर लेती हैं, और उनकी आभा मूँगे की भाँति रक्तिम है।

881यज्ञप्रियाजिन्हें यज्ञ और अनुष्ठान प्रिय हैं
882यज्ञकर्त्रीस्वयं यज्ञ कर्म की कर्त्री
883यजमानस्वरूपिणीयज्ञ कराने वाले यजमान का स्वरूप
884धर्माधाराधर्म और सदाचरण की आधार भूमि
885धनाध्यक्षासमस्त धन की अध्यक्षा
886धनधान्यविवर्धिनीधन और धान्य की वृद्धि करने वाली
887विप्रप्रियाजिन्हें ज्ञानी विप्र प्रिय हैं
888विप्ररूपास्वयं विप्र के रूप में स्थित
889विश्वभ्रमणकारिणीअपनी माया शक्ति से विश्व को घुमाने वाली
890विश्वग्रासाप्रलय काल में समस्त विश्व का ग्रास करने वाली
891विद्रुमाभामूँगे की भाँति रक्तिम आभा वाली

अन्तिम लहर खण्ड को निर्गुण-शिखर पर समाप्त करती है। देवी विष्णु की शक्ति-रूपा हैं, विष्णु-रूप में समस्त विश्व में व्याप्त हैं, उद्गम-रहित अकारण हैं, और वही समस्त उद्गमों का मूल-स्थान भी हैं। वे निहाई की भाँति अविचल, अपरिवर्तित रहती हैं, कौल-मार्ग की अधिष्ठात्री हैं, वीरों की गोष्ठी और सत्संग उन्हें प्रिय है, और स्वयं वीर्यमयी, पराक्रम-स्वरूपा हैं। अन्त में वे कर्म से परे, निष्क्रिय-स्वरूपा हैं, जहाँ कर्ता-भाव और कर्म-बन्धन दोनों शान्त हो जाते हैं। खण्ड का विश्राम इसी नैष्कर्म्य-स्थिति पर होता है।

892वैष्णवीविष्णु की शक्ति रूपा
893विष्णुरूपिणीविष्णु रूप में समस्त विश्व में व्याप्त
894अयोनिःउद्गम रहित, अकारण
895योनिनिलयासमस्त उद्गमों का मूल स्थान
896कूटस्थानिहाई की भाँति अविचल और अपरिवर्तित
897कुलरूपिणीकौल मार्ग की अधिष्ठात्री
898वीरगोष्ठीप्रियाजिन्हें वीरों की गोष्ठी और सत्संग प्रिय है
899वीरास्वयं वीर्यमयी, पराक्रम स्वरूपा
900नैष्कर्म्याकर्म से परे, जहाँ कर्ता भाव और कर्म बन्धन दोनों शान्त हो जाते हैं

स्रोत: ब्रह्माण्ड-पुराण, उत्तर-खण्ड, ललितोपाख्यान। अर्थ-संगति भास्करराय के ‘सौभाग्य-भास्कर’ भाष्य के अनुसार। मूल पाठ sanskritdocuments.org/doc_devii/lalita1000.itx से।

अनुज्ञप्ति: मूल पाठ सार्वजनिक-सम्पदा। हिन्दी संगति lulla.net, CC BY-NC 4.0।