गुणातीत और निर्गुण-स्वरूप
नाम आठ-सौ-एक से नौ-सौ। माया-अतीत, निर्विकल्प।

नौवें खण्ड का झुकाव देवी के निर्गुण-रूप की ओर है। यहाँ नाम-दर-नाम माया से, तीनों गुणों से, और सब कल्पनाओं से देवी की अतिक्रमण-स्थिति प्रकट होती है।
यह खण्ड माण्डूक्य उपनिषद् के तुरीय-तत्त्व के बहुत निकट है। श्रीविद्या-परम्परा का सर्वोच्च शिखर यहीं है, जहाँ देवी रूप-धारी व्यक्तित्व नहीं रहतीं, शुद्ध तत्त्व-स्थिति बन जाती हैं।
काश्मीर के शैव-दर्शन में स्पन्द का सिद्धान्त इसी प्रकार की निर्गुण-सगुण-संगति को रेखांकित करता है। उत्पलदेव और अभिनवगुप्त ने श्रीविद्या को इसी दार्शनिक-आधार पर समझा। आज भी काशी और पुणे की कुछ परम्पराओं में यह तत्त्व-चिन्तन जीवित है।
नौवें खण्ड में ‘गुणातीत’ और ‘निर्गुण’ शब्द बार-बार आते हैं और एक दार्शनिक-स्थिति ले लेते हैं। सत्त्व, रजस् और तमस्, इन तीनों गुणों से ललिता परे हैं। यह गुणातीत-अवस्था भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय में कृष्ण ने और ‘विवेक-चूड़ामणि’ में शंकराचार्य ने भी खोली है।
नाम आठ-सौ-एक से नौ-सौ तक के शब्द-समूह में एक लक्षण उभरता है। ‘महा-‘ उपसर्ग बार-बार जुड़ता है, और देवी की अनन्तता का सूचक बनता है। निर्गुण-नामों की यह घनी पंक्ति देवी को कारण-कार्य, जन्म-मृत्यु और कल्पना, तीनों से परे ले जाती है।
आधुनिक तमिल-कवियों में सुब्रह्मण्य भारती (1882-1921) ने अपनी देवी-रचनाओं में इन नामों का बार-बार स्मरण किया। भारती श्रीविद्या-साधक नहीं थे, फिर भी उनकी काव्य-दृष्टि में देवी का यह गुणातीत-स्वरूप केन्द्र में रहा।
नाम 801,900
पहली लहर देवी को परिपूर्णता और पुरातनता से खोलती है। वे सदा पुष्ट और बल से भरी हैं, आदि-काल से विद्यमान सबसे प्राचीन सत्ता हैं, सबकी पूजा के योग्य हैं। परिपूर्ण होकर वे सबका पोषण करती हैं, और उनके नेत्र कमल-दल समान हैं। फिर नाम परम-तत्त्व की ओर उठते हैं। वे परम ज्योति-स्वरूप हैं, सर्वोच्च आश्रय और परम धाम हैं, सूक्ष्म से सूक्ष्मतम परमाणु-स्वरूप हैं, और श्रेष्ठों में भी श्रेष्ठ, पर से भी परे हैं। हाथ में पाश सुशोभित है, और वही पाश थामे वे हमारे बन्धनों का नाश कर देती हैं, और शत्रुओं के अभिचार-मन्त्रों का भेदन कर देती हैं।
अगली लहर साकार और निराकार के बीच झूलती है। देवी साकार रूप धारण करती हैं, और वही किसी निश्चित रूप से रहित निराकार भी हैं। हमारे क्षणभंगुर अर्पण से भी वे तृप्त हो जाती हैं, और मुनियों के मन-रूपी मानस-सरोवर की हंसी बनकर विचरती हैं। फिर सत्य की पंक्ति आती है। वे सत्य में दृढ़ रहती हैं, स्वयं सत्य-स्वरूप हैं, सबके भीतर अन्तर्यामी रूप में बसती हैं, और नित्य सत्-स्वरूपा सत्ता हैं। यहीं वे ब्रह्म की शक्ति बनकर सबका आधार बनती हैं, स्वयं ब्रह्म-स्वरूप हैं, सबकी जननी हैं, और अनेक रूपों में प्रकट होती हैं।
अब देवी सृष्टि की प्रवर्तक और प्राणों की स्वामिनी बनकर उभरती हैं। वे ज्ञानियों द्वारा अर्चित हैं, समस्त विश्व की जन्मदात्री हैं, भय-जनक तेज से भरी प्रचण्डा हैं, स्वयं दिव्य आज्ञा-स्वरूप हैं, और सबकी प्रतिष्ठा, आधार-नींव हैं। वे विश्व-रूप में प्रकट हुई हैं, पाँचों प्राणों और इन्द्रियों की स्वामिनी हैं, और वही जीवन-शक्ति की दात्री भी हैं। पचास पूजा-पीठों के रूप में स्थित हैं, हर भाँति बन्धन-रहित स्वतन्त्र हैं, और एकान्त निर्जन स्थानों में निवास करती हैं।
यह लहर वीरता, मुक्ति और मूल-स्वरूप को साथ बाँधती है। देवी वीरों की माता हैं, आकाश-तत्त्व की जननी हैं, मुक्ति प्रदान करने वाली हैं, और स्वयं मुक्ति का निवास-स्थान हैं। वे समस्त सृष्टि के मूल विग्रह-रूप हैं, सबके भाव और मनोभावों को जानती हैं, जन्म-मृत्यु-रूपी भव-रोग का नाश करती हैं, और वही भव-चक्र को घुमाती भी हैं। फिर शब्द और सार की पंक्ति आती है। वे समस्त वेदों का सार हैं, समस्त शास्त्रों का सार हैं, समस्त मन्त्रों का सार हैं, और कृश-उदरी, क्षीण कटि वाली रूप-छवि में प्रकट होती हैं।
यहाँ कीर्ति और वैभव से नाम उठकर शान्ति की भी सीमा लाँघ जाते हैं। देवी की कीर्ति उदात्त और विस्तीर्ण है, वैभव और सामर्थ्य असीम है, और वे अक्षर-वर्णों के रूप में स्थित हैं। वे जन्म, मृत्यु और जरा से तप्त जनों को विश्राम और शान्ति देती हैं, उनका गुणगान समस्त उपनिषदों में हुआ है, और वे शान्ति की अवस्था से भी परे की कला-स्वरूपा हैं। फिर गहराई और आकाश की पंक्ति आती है। वे अथाह, गहन हैं, आकाश के भीतर अवकाश में स्थित हैं, अपने ऐश्वर्य में गर्वित हैं, और संगीत में रमती हैं।
अब निर्गुण-शिखर सबसे पास आता है। देवी कल्पित गुणों से, मन की रचनाओं से रहित हैं, सर्वोच्च परम-सीमा हैं जिससे परे कुछ नहीं, और समस्त पाप और शोक का अन्त कर देती हैं। वे अपने कान्त, शिव के शरीर का अर्ध-भाग हैं, कार्य और कारण के बन्धन से मुक्त हैं, कामेश्वर के सान्निध्य के आनन्द में तरंगित रहती हैं, और दमकते स्वर्ण के कर्ण-ताटङ्क धारण करती हैं। फिर लीला और अजन्मा-भाव की पंक्ति आती है। वे लीला-वश अनेक दिव्य रूप धारण करती हैं, अजन्मा हैं, क्षय और क्षीणता से सर्वथा मुक्त हैं, अपने सौन्दर्य में मनोहारिणी हैं, और शीघ्र प्रसन्न हो जाती हैं।
यह लहर अन्तर्मुख-साधना और त्रयी-स्वरूप को बाँधती है। देवी अन्तर्मुख होकर मन के भीतर आराधी जाती हैं, और बहिर्मुख वृत्ति वालों के लिए अति दुर्लभ रहती हैं। वे तीनों वेद-स्वरूपा हैं, धर्म, अर्थ और काम इन तीन पुरुषार्थों का निवास हैं, तीनों लोकों में स्थित रहती हैं, और श्रीचक्र के अन्तर्दशार चक्र की अधिष्ठात्री त्रिपुरमालिनी हैं। फिर स्वाधीनता और अमृत की पंक्ति आती है। वे सब प्रकार के रोगों से रहित हैं, किसी आश्रय पर निर्भर नहीं स्वयं-आधार हैं, अपने ही आत्म-स्वरूप में रमण करती हैं, अमृत-धारा का उद्गम हैं, और संसार-रूपी कीचड़ में डूबे जनों के उद्धार में निपुण हैं।
अब यज्ञ, धर्म और समृद्धि की पंक्ति आती है। देवी को यज्ञ और अन्य अनुष्ठान प्रिय हैं, वे स्वयं यज्ञ-कर्म की कर्त्री हैं, और यज्ञ का संचालन करने वाले यजमान का स्वरूप भी हैं। वे धर्म, सदाचरण की आधार-भूमि हैं, समस्त धन की अध्यक्षा हैं, और धन और धान्य की वृद्धि करती हैं। ज्ञानी विप्र उन्हें प्रिय हैं, वे स्वयं विप्र के रूप में स्थित हैं, और अपनी माया-शक्ति से विश्व को घुमाती हैं। प्रलय-काल में वे समस्त विश्व का ग्रास कर लेती हैं, और उनकी आभा मूँगे की भाँति रक्तिम है।
अन्तिम लहर खण्ड को निर्गुण-शिखर पर समाप्त करती है। देवी विष्णु की शक्ति-रूपा हैं, विष्णु-रूप में समस्त विश्व में व्याप्त हैं, उद्गम-रहित अकारण हैं, और वही समस्त उद्गमों का मूल-स्थान भी हैं। वे निहाई की भाँति अविचल, अपरिवर्तित रहती हैं, कौल-मार्ग की अधिष्ठात्री हैं, वीरों की गोष्ठी और सत्संग उन्हें प्रिय है, और स्वयं वीर्यमयी, पराक्रम-स्वरूपा हैं। अन्त में वे कर्म से परे, निष्क्रिय-स्वरूपा हैं, जहाँ कर्ता-भाव और कर्म-बन्धन दोनों शान्त हो जाते हैं। खण्ड का विश्राम इसी नैष्कर्म्य-स्थिति पर होता है।