लुल्ला परिवारLulla Family
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देवीशक्ति, रक्षा और रूपांतरण

ललिता सहस्रनाम, खण्ड 2

श्री ललिता सहस्रनाम · खण्ड दो

मन्त्र-शरीर और कुण्डलिनी का आरोहण

नाम पचासी से एक-सौ-पैंसठ। आँख से नहीं, मन्त्र और साधना से जाना जाने वाला स्वरूप, और निर्गुण की ओर गति।

एक साधिका पीठ की ओर से ध्यान में बैठी हैं और उनकी मेरुदण्ड-रेखा पर चक्र दीप्त हो रहे हैं, ऊपर कमल पर ललिता विराजमान हैं, दोनों ओर दीपक जल रहे हैं।

पहले खण्ड में देवी के स्थूल विग्रह का ध्यान था, उनके आयुध, उनकी शोभा, उनका मुख। दूसरे खण्ड का स्वर भीतर की ओर मुड़ता है। यहाँ देवी का वह स्वरूप वर्णित है जो आँख से नहीं, मन्त्र और साधना से ही जाना जाता है।

आचार्य भास्करराय की ‘सौभाग्य-भास्कर’ टीका इन्हीं नामों को इसी क्रम में पढ़ती है। नीचे की संगति उसी परम्परा के अनुसार है।

नाम 85 से 165

पहले पाँच नाम देवी का ‘मन्त्र-शरीर’ खोलते हैं। श्रीविद्या का मूल-मन्त्र पंचदशाक्षरी है, पन्द्रह अक्षरों का, और वह तीन कूटों में बँटा है। यहाँ देवी का मुख-कमल श्रीयुक्त वाग्भव-कूट कहा गया, कण्ठ से कटि तक का भाग मध्य-कूट, और कटि के नीचे का भाग शक्ति-कूट। यह पैर से सिर तक का अंग-वर्णन नहीं, देह के तीन भागों पर मन्त्र के तीन कूटों का न्यास है, जिससे साधक के सामने देवी और मूल-मन्त्र एक ही हो जाते हैं। इसीलिए अगला नाम कहता है, देवी स्वयं मूल-मन्त्र का स्वरूप हैं, और उनका सूक्ष्म-शरीर इन्हीं तीन कूटों से रचा है।

नाम 85 से 89 · मन्त्र-शरीर

85श्रीमद्वाग्भवकूटैकस्वरूपमुखपङ्कजाजिनका मुख कमल पंचदशाक्षरी मन्त्र का श्रीयुक्त वाग्भव कूट है
86कण्ठाधःकटिपर्यन्तमध्यकूटस्वरूपिणीकण्ठ से कटि तक का भाग जिनका मध्य कूट अर्थात् कामराज कूट है
87शक्तिकूटैकतापन्नकट्यधोभागधारिणीकटि के नीचे का भाग जिनका शक्ति कूट है
88मूलमन्त्रात्मिकास्वयं मूल मन्त्र पंचदशाक्षरी का स्वरूप; भास्करराय के अनुसार मन्त्र अपने जपने वाले की रक्षा करता है
89मूलकूटत्रयकलेवरामूल मन्त्र के तीन कूट ही जिनका सूक्ष्म शरीर हैं; भास्करराय इसे कामकला का शरीर कहते हैं

अब नाम ‘कुल’ की धारा में उतरते हैं। कुल यहाँ श्रीविद्या के उस गुप्त मार्ग का नाम है जिसका रस अमृत-सा है। देवी उसी कुल-अमृत में रमती हैं, उसके गुप्त साधना-संकेतों की रक्षा करती हैं, उत्तम कुल की कुलवती नारी हैं, कुल-विद्या के भीतर बसती हैं, कुल-परम्परा की अधिष्ठात्री और कुलों में निवास करने वाली योगिनी हैं। फिर अन्तिम नाम पलट कर कहता है, वही अकुला भी हैं, कुल से परे, जिनका कोई कुल नहीं, क्योंकि अकुल तो शिव का ही संकेत है।

नाम 90 से 96 · कुल की धारा

90कुलामृतैकरसिकाकुल अमृत में अनन्य रस लेने वाली; भास्करराय यहाँ से देह में कुण्डलिनी का वर्णन आरम्भ करते हैं
91कुलसङ्केतपालिनीकुल मार्ग के गुप्त साधना संकेतों की रक्षा करने वाली, जो अनधिकारी से उन्हें छिपाए रखती हैं
92कुलाङ्गनाउत्तम कुल की कुलवती नारी; भास्करराय के अनुसार श्रीविद्या कुलीन स्त्री सी गुप्त रखी जाती है
93कुलान्तस्थाकुल विद्या के भीतर बसने वाली, कुल शास्त्रों के ज्ञान का विषय
94कौलिनीकुल परम्परा की अधिष्ठात्री, जो हर घर, हर देश और हर देह में पूजी जाती हैं
95कुलयोगिनीकुलों में निवास करने वाली योगिनी; भास्करराय के अनुसार आकाश में कल्पित चक्र से जुड़ी
96अकुलाकुल से परे, जिनका कोई कुल नहीं; अकुल शिव का ही संकेत है

यहाँ से साधना की भीतरी यात्रा खुलती है। पहले दो नाम ‘समय’ मार्ग की ओर ले जाते हैं, देवी उस मार्ग के भीतर बसती हैं और समयाचार-उपासना में तत्पर रहती हैं। फिर नाम सीधे कुण्डलिनी के आरोहण में उतर जाते हैं। देवी का मुख्य निवास मूलाधार-चक्र है, वहीं जाग कर वे पहली गाँठ ब्रह्म-ग्रन्थि को भेदती हैं, मणिपूर में उदित होती हैं, विष्णु-ग्रन्थि खोलती हैं, आज्ञा-चक्र के मध्य स्थित हो रुद्र-ग्रन्थि भेदती हैं, सहस्रदल कमल पर आरूढ़ होती हैं, और वहाँ से अमृत की धारा बरसाती हैं। तीन ग्रन्थियाँ साधक की तीन रुकावटें हैं, और उनका भेदन ही साधना की भीतरी सीढ़ी है। नाम निन्यानबे से एक-सौ-छह तक यही एक अखण्ड साधना-गाथा है।

नाम 97 से 106 · मूलाधार से सहस्रार तक

97समयान्तस्थासमय मार्ग के भीतर बसने वाली; भास्करराय के अनुसार समय हृदय आकाश के चक्र की आन्तरिक पूजा है
98समयाचारतत्परासमयाचार की उपासना में सदा तत्पर
99मूलाधारैकनिलयाजिनका मुख्य निवास मूलाधार चक्र है, जहाँ कुण्डलिनी सोती है
100ब्रह्मग्रन्थिविभेदिनीजाग कर पहली गाँठ ब्रह्म ग्रन्थि को भेदने वाली
101मणिपूरान्तरुदितानाभि के मणिपूर चक्र में उदित होने वाली
102विष्णुग्रन्थिविभेदिनीमणिपूर के ऊपर की विष्णु ग्रन्थि को खोलने वाली
103आज्ञाचक्रान्तरालस्थाभ्रूमध्य के आज्ञा चक्र के मध्य स्थित
104रुद्रग्रन्थिविभेदिनीतीसरी गाँठ रुद्र ग्रन्थि को भेदने वाली
105सहस्राराम्बुजारूढासहस्रदल कमल पर आरूढ़ होने वाली
106सुधासाराभिवर्षिणीसहस्रार से अमृत की धारा बरसाने वाली

सहस्रार तक चढ़ने के बाद नाम देवी के उस सूक्ष्म रूप को बाँधते हैं जो इस आरोहण में प्रकट हुआ। उनकी कान्ति बिजली की लता-सी कौंधती है, वे छहों चक्रों के ऊपर सहस्रार में स्थित हैं, शिव-शक्ति के आनन्दमय मिलन में अत्यन्त आसक्त हैं, कुण्डली के रूप में लिपटी वही शक्ति हैं, और कमल-नाल के तन्तु-सी अत्यन्त सूक्ष्म और कोमल।

नाम 107 से 111 · सूक्ष्म कुण्डलिनी-रूप

107तडिल्लतासमरुचिःबिजली की लता सी कौंधती कान्ति वाली
108षट्चक्रोपरिसंस्थिताछहों चक्रों के ऊपर सहस्रार में स्थित
109महासक्तिःशिव शक्ति के आनन्दमय मिलन रूपी महोत्सव में अत्यन्त आसक्त
110कुण्डलिनीकुण्डल के रूप में लिपटी शक्ति, मूलाधार में सोई हुई सर्पिणी सी
111बिसतन्तुतनीयसीकमल नाल के तन्तु सी अत्यन्त सूक्ष्म और कोमल

अब स्वर ‘भ’ पर लौटता है, भव और भक्ति की ओर। देवी भव यानी शिव की पत्नी भवानी हैं, बाहरी कल्पना से नहीं केवल अन्तर्ध्यान की भावना से प्राप्त होती हैं, और संसार-रूपी वन को काटने वाली कुल्हाड़ी हैं। आगे का गुच्छ मंगल और भक्ति में खुलता है, वे मंगल को प्रिय रखती और सब मंगल देती हैं, साक्षात् कल्याण की मूर्ति हैं, भक्तों को सौभाग्य देती हैं, भक्ति उन्हें प्रिय है, केवल भक्ति से ही प्राप्त होती हैं, भक्ति के वश में हो जाती हैं, और भय को दूर करती हैं।

नाम 112 से 116 · भव और मंगल

112भवानीभव अर्थात् शिव की पत्नी; भास्करराय के अनुसार भव को जीवन देने वाली
113भावनागम्याकेवल अन्तर्ध्यान की भावना से प्राप्त होने वाली
114भवारण्यकुठारिकासंसार रूपी वन को काटने वाली कुल्हाड़ी
115भद्रप्रियामंगल को प्रिय रखने वाली और सब मंगल देने वाली
116भद्रमूर्तिःसाक्षात् कल्याण की मूर्ति

नाम 117 से 121 · भक्ति का वश

117भक्तसौभाग्यदायिनीभक्तों को सौभाग्य देने वाली
118भक्तिप्रियाजिन्हें भक्ति प्रिय है; भास्करराय के अनुसार मुख्य भक्ति ईश्वर के प्रति परम अनुराग है
119भक्तिगम्याकेवल भक्ति से ही प्राप्त होने वाली
120भक्तिवश्याभक्ति के वश में हो जाने वाली, स्वतन्त्र होकर भी भक्त के अधीन
121भयापहाभय को दूर करने वाली

अगली लड़ी ‘श’ पर टिकती है, शिव की शक्ति और शम-कल्याण के नामों पर। वे शम्भु की शाम्भवी हैं, सरस्वती द्वारा पूजित, शर्व की शर्वाणी, सुख देने वाली शर्मदायिनी, शंकर की शक्ति शाङ्करी, श्री देने वाली श्रीकरी, और पवित्र पतिव्रता साध्वी। फिर तीन नाम फिर से रूप और शान्ति को छूते हैं, उनका मुख शरद् के निर्मल पूर्ण चन्द्र-सा दीप्त है, कटि क्षीण और सुडौल, और स्वरूप शान्ति से युक्त।

नाम 122 से 126 · शिव की शक्ति

122शाम्भवीशम्भु की शक्ति और पत्नी; भास्करराय शम्भु के भक्तों की माता का अर्थ भी देते हैं
123शारदाराध्याशारदा अर्थात् सरस्वती द्वारा आराधित
124शर्वाणीशर्व अर्थात् पृथ्वी रूप शिव की पत्नी
125शर्मदायिनीभक्तों को सुख देने वाली
126शाङ्करीशंकर की शक्ति; शं अर्थात् सुख की कर्त्री

नाम 127 से 131 · श्री और शान्ति

127श्रीकरीश्री अर्थात् सम्पदा और सिद्धि देने वाली
128साध्वीपवित्र पतिव्रता, तीनों कालों में केवल अपने पति शिव में अनुरक्त
129शरच्चन्द्रनिभाननाशरद् के निर्मल पूर्ण चन्द्र सा दीप्त मुख वाली
130शातोदरीक्षीण और सुडौल कटि वाली
131शान्तिमतीशान्ति से युक्त स्वरूप वाली, जो भक्तों को कभी कठोर नहीं लगतीं

यहीं से नामों का स्वर निषेध की ओर मुड़ जाता है। ‘नि’ और ‘निर्’ से आरम्भ होने वाली यह लम्बी लड़ी देवी को रूप, गुण और उपाधि से परे, निर्गुण ब्रह्म के रूप में सूचित करती है। जो अभी क्षण भर पहले मन्त्रमयी और चक्र-निवासिनी थीं, वही अब किसी सीमा से अबद्ध कही जाती हैं। पहली तरंग में वे किसी आधार पर निर्भर नहीं स्वयं-आधार हैं, निर्लिप्त, कर्म के लेप से रहित, सब मलों से निर्मल, नित्य और शाश्वत, आकार से रहित, क्षोभ से रहित, तीनों गुणों से परे, और अंशों से रहित अखण्ड।

नाम 132 से 140 · निषेध की पहली तरंग

132निराधाराकिसी आधार पर निर्भर नहीं, स्वयं समस्त जगत् का आधार
133निरञ्जनानिर्लिप्त, जिन पर कोई दाग या कालिमा नहीं
134निर्लेपाकर्म के लेप से रहित
135निर्मलासब मलों से रहित, निर्मल
136नित्यानित्य और शाश्वत, तीनों कालों में अबाध
137निराकराकिसी आकार से रहित
138निराकुलाक्षोभ से रहित, अविद्या के संसर्ग में भी अविचलित
139निर्गुणासत्त्व, रज और तम, तीनों गुणों से परे
140निष्कलाअंशों से रहित, अखण्ड

निषेध आगे बढ़ता है और गहराता है। वे शान्त स्वरूपा हैं, कामना से रहित, अविनाशी, सांसारिक बन्धनों से सदा मुक्त, विकार-रहित अपरिवर्तनशील, इस दृश्य प्रपंच से परे, किसी आश्रय पर निर्भर न रहने वाली, नित्य-शुद्ध, नित्य-प्रबुद्ध, और किसी दोष से रहित स्तुत्य।

नाम 141 से 150 · शुद्ध और बुद्ध

141शान्ताशान्त स्वरूप वाली
142निष्कामाकामना से रहित, जिनकी सब इच्छाएँ पूर्ण हैं
143निरुपप्लवाअविनाशी, किसी उपप्लव अर्थात् विपत्ति से अछूती
144नित्यमुक्तासांसारिक बन्धनों से सदा मुक्त
145निर्विकाराविकार रहित, अपरिवर्तनशील
146निष्प्रपञ्चाइस दृश्य प्रपंच के विस्तार से परे
147निराश्रयाकिसी आश्रय पर निर्भर न रहने वाली, जिन पर सब कुछ टिका है
148नित्यशुद्धानित्य शुद्ध, तीनों कालों में निष्कलंक
149नित्यबुद्धानित्य प्रबुद्ध, स्वयं चित् स्वरूप
150निरवद्याकिसी दोष से रहित, स्तुत्य

इस लड़ी का शिखर ‘निरन्तरा’ है। इसका एक अर्थ है, जो सर्वत्र व्याप्त हैं, जिनमें कोई अन्तराल नहीं, भीतर-बाहर का कोई भेद शेष नहीं। यहाँ निषेध अन्ततः पूर्ण व्यापकता में बदल जाता है। उसी बोध के साथ वे कारण से रहित कही जाती हैं, कलंक-रहित निर्दोष, किसी उपाधि या सीमा से अबद्ध, और परम-स्वतन्त्र, जिनसे ऊपर कोई स्वामी या ईश्वर नहीं।

नाम 151 से 155 · व्याप्ति का शिखर

151निरन्तराजिनमें कोई अन्तराल नहीं, सर्वत्र व्याप्त, भीतर बाहर का भेद नहीं
152निष्कारणाकारण से रहित, क्योंकि वे स्वयं सबका कारण हैं
153निष्कलङ्काकलंक रहित, निर्दोष
154निरुपाधिःकिसी उपाधि या सीमा से अबद्ध; भास्करराय उपाधि को स्फटिक पर रंग चढ़ाते फूल सा कहते हैं
155निरीश्वरापरम स्वतन्त्र, जिनसे ऊपर कोई स्वामी या ईश्वर नहीं

अन्तिम गुच्छ निषेध को मन के विकारों पर मोड़ देता है, और हर दोष के साथ उसके नाशक का नाम जोड़ता है। वे राग से रहित हैं, और राग का मन्थन कर उसे नष्ट करने वाली भी। मद से रहित, और मद का नाश करने वाली। चिन्ता से रहित, अहंकार से रहित जिनमें ‘मैं’ और ‘मेरा’ नहीं, मोह से रहित और भक्तों के मोह का नाश करने वाली, किसी वस्तु के प्रति ममता से रहित, और ममत्व-स्वामित्व के भाव का नाश करने वाली। दोष-रहित होना और दोष को मिटा देना, यही देवी का दोहरा स्वरूप इस खण्ड को विराम देता है।

नाम 156 से 165 · विकारों का नाश

156नीरागाराग से सर्वथा रहित
157रागमथनीराग का मन्थन कर उसे नष्ट करने वाली
158निर्मदामद से सर्वथा रहित
159मदनाशिनीमद का नाश करने वाली
160निश्चिन्ताचिन्ता से रहित; भास्करराय चिन्ता को जीवित को जला देने वाली चिता कहते हैं
161निरहङ्काराअहंकार से रहित, जिनमें मैं और मेरा नहीं
162निर्मोहामोह से सर्वथा रहित
163मोहनाशिनीभक्तों के मोह का नाश करने वाली, उन्हें एकत्व का बोध देकर
164निर्ममाकिसी वस्तु के प्रति ममता से रहित
165ममताहन्त्रीममत्व और स्वामित्व के भाव का नाश करने वाली

स्रोत: ब्रह्माण्ड-पुराण, ललितोपाख्यान, उत्तर-खण्ड। मूल पाठ sanskritdocuments.org/doc_devii/lalita1000.itx से। अर्थ आचार्य भास्करराय की ‘सौभाग्य-भास्कर’ टीका की परम्परा के अनुसार।

अधिकार: मूल पाठ सर्व-सुलभ (सार्वजनिक धरोहर)। हिन्दी संगति lulla.net, CC BY-NC 4.0।