भण्डासुर-वध की कथा
नाम दो-सौ-पचहत्तर से तीन-सौ-छियानवें तक। ललिता के अवतार का प्रयोजन।

चौथे खण्ड के इन एक-सौ-बाईस नामों में एक पूरी कथा छिपी हुई है। ललिता के अवतार का मुख्य प्रयोजन भण्डासुर नामक असुर का संहार था। यह आख्यान ब्रह्माण्ड-पुराण के ललितोपाख्यान में और देवी-भागवत में विस्तार से कहा गया है, और इन नामों में संकेत-रूप से बैठा हुआ मिलता है।
भण्डासुर की उत्पत्ति की कथा यों है। शिव ने जब अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म किया, तब उस राख से एक भयानक असुर उठ खड़ा हुआ। उसका नाम ‘भण्ड’ पड़ा, अर्थात् जो भीतर से रिक्त है, ज्ञान-शून्य है। ब्रह्मा ने उसे यह वर दिया कि वह जिस शस्त्र से युद्ध करेगा, उस शस्त्र की आधी शक्ति वह अपने प्रतिद्वन्द्वी से हर लेगा। इस वर के बल पर भण्डासुर ने तीनों लोक जीत लिए।
देवताओं ने ललिता का आह्वान किया। देवी ने अपनी मन्त्रिणी श्यामला, सेनानायिका वाराही-दण्डनाथा और सम्पूर्ण शक्ति-सेना के साथ संग्राम किया, और भण्डासुर तथा उसके पुत्रों का वध किया। इन नामों में उसी युद्ध के विभिन्न प्रसंग संकेतित हैं, कामेश्वर के मुख की दीप्ति से गणेश का प्राकट्य, अनेक दिव्य शस्त्रों का प्रयोग, और अन्त में विजय।
दुर्गा-सप्तशती की महिषासुर-वध कथा से इसकी संरचना भिन्न है। वहाँ देवी अकेली संग्राम करती हैं, यहाँ उनके साथ श्यामला, वाराही और दण्डनायिका जैसी सेनानायिकाएँ हैं। यह भेद श्रीविद्या-परम्परा की उस दृष्टि को दिखाता है जिसमें देवी अपने अनेक रूपों और शक्तियों के संग एक संगठित मण्डल की स्वामिनी हैं।
श्रीविद्या के आचार्यों के अनुसार इस कथा का एक आध्यात्मिक अर्थ भी है। भण्डासुर अहंकार का प्रतीक है, जो कामना के भस्म हो जाने पर भी पीछे रह जाने वाली रिक्त, चेतना-हीन वृत्ति है। उसका वध साधक के भीतर उस अहंकार के नाश का संकेत है, जो देवी की कृपा से ही सम्भव होता है। इसी से यह खण्ड केवल युद्ध-वर्णन न रहकर सहस्रनाम का दार्शनिक केन्द्र बन जाता है।
स्तुति का यह सोपान देवी को उनके आसन और ऐश्वर्य से पहचानता है। वे सूर्य-मण्डल के ठीक मध्य में विराजती हैं और भैरव अर्थात् शिव की अर्धांगिनी, भैरवी हैं। छह ऐश्वर्यों, श्री, प्रभुता, यश, वीर्य, वैराग्य और ज्ञान, रूपी ‘भग’ की माला वे धारण करती हैं, कमल-पुष्प के आसन पर बैठी हैं, और समस्त ऐश्वर्य से सम्पन्न होकर अपने उपासकों की रक्षा करती हैं। फिर वे पद्मनाभ अर्थात् विष्णु की सहोदरा कहलाती हैं, क्योंकि शक्ति और विष्णु एक ही परम-तत्त्व के दो रूप हैं। भास्करराय बताते हैं कि पद्मासना, भगवती और पद्मनाभसहोदरी, ये तीन नाम एक साथ पञ्चदशाक्षरी श्रीविद्या-मन्त्र के प्रथम कूट, वाग्भव-कूट का संकेत देते हैं।
नाम 275–280 · आसन और ऐश्वर्य
अब देवी का विराट्-रूप खुलता है। उनके नेत्रों के खुलने मात्र से लोकों की पंक्तियाँ प्रकट होती हैं और मुँदने से लीन हो जाती हैं। सहस्रों मस्तक, सहस्रों मुख, सहस्रों नेत्र और सहस्रों चरण उनके हैं, वही विराट्-कल्पना जो पुरुष-सूक्त गाता है। ब्रह्मा से लेकर तुच्छ कीट तक समस्त प्राणियों की वे जननी हैं, और उन्होंने ही वर्ण और आश्रम की व्यवस्था का विधान किया। वेद ही उनकी आज्ञा का रूप धारण किए हुए हैं, और पुण्य तथा पाप, दोनों कर्मों का फल वही प्रदान करती हैं।
नाम 281–288 · विराट्-रूप और विधान
यहाँ देवी और शास्त्र का सम्बन्ध गहराता है। उनके चरण-कमलों की धूलि वेद-रूपी देवियों की माँग का सिन्दूर बन जाती है, और समस्त आगम-शास्त्रों की सीप के भीतर छिपा हुआ मोती वही हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों पुरुषार्थ वे देती हैं। फिर उनका स्वरूप कहा जाता है, सदा परिपूर्ण, जिनमें न वृद्धि है न क्षय, समस्त भोगों की भोक्त्री, समस्त भुवनों की ईश्वरी, जगत् की माता अम्बिका, और जिनका न आदि है न अन्त।
नाम 289–296 · शास्त्र, पुरुषार्थ और पूर्णता
अब नाद और निर्गुण की ओर स्तुति मुड़ती है। विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र जिनकी सेवा में रहते हैं, वही नारायण की शक्ति-रूपा नारायणी हैं, मूल ध्वनि नाद के रूप में स्थित, और फिर उससे भी परे, नाम और रूप से रहित निर्गुण-निराकार। नाद-रूपा कहलाने के तुरन्त बाद यह निर्गुण रूप इसलिए आता है कि नाद से नीचे उतरकर ही नाम-रूप का विस्तार होता है, पर अपने मूल में देवी उन सबसे परे हैं।
नाम 297–300 · नाद से परे
यहाँ से नामों की एक माला आती है जो ‘ह्रीं’ बीज से खुलती है, श्रीविद्या का प्रसिद्ध माया-बीज। देवी उसी ‘ह्रीं’ के स्वरूप वाली हैं, लज्जा और मर्यादा से सम्पन्न, हृदय में निवास करने वाली और हृदय को प्रिय, और जिनके लिए न कुछ त्याज्य है न कुछ ग्राह्य। फिर राजसी ऐश्वर्य का स्वर उठता है, राजाओं के राजा कुबेर आदि से पूजित, समस्त राजाओं के स्वामी शिव की पटरानी राज्ञी।
नाम 301–306 · ह्रीं और राज्ञी
अब ‘र’ अक्षर की एक सुन्दर लड़ी पिरोई जाती है, जिसमें देवी का रमणीय, रस-भरा रूप गाया जाता है। वे परम रमणीया हैं और सबको आनन्द देती हैं, उनके नेत्र कमल के समान हैं, वे मन को अनुरंजित करती हैं, आनन्द देने वाली रमणी हैं, और स्वयं रस-रूप से आस्वाद्य होकर रस का आस्वादन भी करती हैं। रुनझुन करती घुँघरुओं वाली करधनी उनकी शोभा है, वे ही लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में प्रकट हैं, और उनका मुख पूर्णिमा के चन्द्र-सा मनोहर है।
नाम 307–314 · रमणीय रूप
‘र’-माला यहाँ काम और रक्षा के स्वर में बदलती है। देवी काम की पत्नी रति के रूप में स्थित हैं, रति को प्रिय हैं और रति जिनकी सेवा करती हैं। वे भक्तों की रक्षा करती हैं, समस्त राक्षस-जाति का संहार करती हैं, और वही रामा हैं जिनमें मन रमता है, आनन्द देने वाली। अपने प्रियतम शिव में वे अनुरक्त हैं।
नाम 315–320 · रति, रक्षा और राक्षस-संहार
अब ‘क’ अक्षर की लड़ी आती है, और इसके भीतर श्रीविद्या का एक गूढ़ रहस्य खुलता है। देवी सबकी कामना का विषय हैं, परम वाञ्छनीया, और कामकला के रूप में स्थित, जिसमें बिन्दु और अक्षर के योग से सृष्टि का बीज माना जाता है। कदम्ब के पुष्प उन्हें विशेष प्रिय हैं, वे कल्याण और मंगल देती हैं, समस्त जगत् का वह मूल कन्द हैं जिससे सृष्टि अंकुरित होती है, और करुणा-रस का अथाह सागर हैं।
नाम 321–326 · कामकला और करुणा
देवी समस्त कलाओं की मूर्ति हैं और मधुर, कलापूर्ण वाणी बोलती हैं। वे परम कमनीया सुन्दरी हैं, मधु-रस को प्रिय मानने वाली, उदारता से वरदान देने वाली, और सुन्दर नेत्रों वाली। फिर एक योग-संकेत आता है, वे वारुणी नामक दिव्य रस के आनन्द में विभोर हैं, जो योग की दृष्टि में सहस्रार से झरते अमृत का मद है।
नाम 327–333 · कला, माधुर्य और वारुणी-मद
अब ‘व’ अक्षर की माला वेद और सृष्टि की ओर ले जाती है। देवी समस्त विश्व से परे और उससे अधिक हैं, फिर भी वेदों द्वारा जानने योग्य। वे विन्ध्याचल पर्वत पर निवास करती हैं, इस विश्व की सृष्टि और धारण करने वाली विधात्री हैं, वेदों की जननी हैं, विष्णु की माया-शक्ति हैं, और सृष्टि-लीला में विलास करने वाली विलासिनी।
नाम 334–340 · वेद और सृष्टि-लीला
अब ‘क्ष’ अक्षर की लड़ी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का वेदान्तिक भेद उठाती है। देवी क्षेत्र अर्थात् प्रकृति-शरीर के स्वरूप वाली हैं, उसी क्षेत्र के स्वामी शिव की शक्ति हैं, और क्षेत्र (शरीर-प्रकृति) तथा क्षेत्रज्ञ (आत्मा), दोनों की रक्षिका हैं। वृद्धि और क्षय, दोनों से वे मुक्त हैं, अविकारी, और क्षेत्रपाल रूप शिव द्वारा भली-भाँति पूजित।
नाम 341–345 · क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ
विजय और निर्मलता का स्वर उठता है। देवी सदा विजयिनी हैं, किसी भी मल से रहित निर्मल, वन्दना के योग्य पूज्या, और वन्दना करने वाले भक्तों पर मातृवत् वात्सल्य रखने वाली। वे वाणी के रूप में बोलने वाली वाक्-शक्ति-स्वरूपा हैं, सुन्दर केशों वाली, और अग्नि-मण्डल में निवास करती हैं।
नाम 346–352 · विजय, निर्मलता और वाणी
अब देवी की मुक्ति-दात्री शक्ति प्रकट होती है। वे भक्तों के लिए मनोवाञ्छा पूर्ण करने वाली कल्पलता हैं, और पशु अर्थात् बद्ध जीव को पाश यानी बन्धन से मुक्त करने वाली, वही शैव-शाक्त त्रिक जिसमें पशु, पाश और पति प्रसिद्ध हैं। वे समस्त पाखण्ड और मिथ्या-मत का संहार करती हैं, सदाचार में स्थित रहकर औरों को भी उसकी प्रेरणा देती हैं, और तीनों तापों, आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक, की अग्नि से जले हुए जीवों को शीतल आह्लाद देने वाली चन्द्रिका हैं।
नाम 353–357 · बन्धन-मुक्ति और शीतल आह्लाद
‘त’ की लड़ी देवी के नित्य-यौवन और तमोनाश को गाती है। वे सदा तरुण, नित्य-यौवना हैं, तपस्वियों द्वारा आराधित, कृश और सूक्ष्म कटि-प्रदेश वाली, और तमस् से उत्पन्न अज्ञान का नाश करने वाली। यहाँ से ज्ञान-तत्त्व गहराता है, वे शुद्ध चैतन्य चिति-स्वरूपा हैं।
नाम 358–362 · नित्य-यौवन और तमोनाश
अब स्तुति वेदान्त के शिखर को छूती है। देवी ‘तत्त्वमसि’ के ‘तत्’ पद का लक्ष्यार्थ हैं, वही परम-ब्रह्म जिसकी ओर ‘तत्’ शब्द संकेत करता है। वे एकरस चैतन्य के रूप वाली ज्ञान की मूल हैं, और उनके आत्मानन्द के एक लव, अंश-मात्र, के सामने ब्रह्मा आदि का सम्पूर्ण आनन्द तुच्छ ठहर जाता है।
नाम 363–365 · तत्त्वमसि का लक्ष्यार्थ
यहाँ वाणी के चारों स्तर क्रम से कहे जाते हैं, श्रीविद्या का एक सुन्दर सोपान। देवी सबसे परे परम ‘परा’ हैं, ध्वनि की सूक्ष्मतम बीज-अवस्था, और अन्तर्मुखी अप्रकट चैतन्य प्रत्यक्-चिति के रूप वाली। फिर ‘पश्यन्ती’, वह दूसरा स्तर जहाँ शब्द अंकुरित होने लगता है, स्वाधिष्ठान चक्र से सम्बद्ध। वे परम देवता पराशक्ति-स्वरूपा हैं। फिर ‘मध्यमा’, परा और वैखरी के बीच बुद्धि में स्फुरित होने वाली सूक्ष्म, अनुच्चरित वाणी, अनाहत चक्र से सम्बद्ध। और अन्त में ‘वैखरी’, मुख से उच्चरित सुनाई देने वाली स्थूल वाणी। इस प्रकार परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी, वाक् के चारों स्तर पूरे होते हैं।
नाम 366–371 · वाक् के चार स्तर
अब देवी का भक्त-वत्सल और शृंगारमय रूप लौटता है। वे भक्तों के मानस-सरोवर में विहार करने वाली हंसी हैं, अपने पति कामेश्वर के प्राण की नाड़ी, उनका जीवन-तत्त्व, और हमारे समस्त कर्मों को घटित होते ही जान लेने वाली कृतज्ञा। वे कामदेव द्वारा पूजित हैं और शृंगार-रस से परिपूर्ण।
नाम 372–376 · मानस-हंसी और शृंगार
अब स्तुति शक्ति-पीठों और श्रीचक्र के गुप्त उपासना-क्रम में प्रवेश करती है। देवी सर्वत्र और सदा विजयिनी जया हैं, जालन्धर पीठ (कण्ठ-प्रदेश) में स्थित, ओड्याण पीठ (आज्ञा चक्र) को अपना निवास बनाने वाली, और श्रीचक्र के केन्द्रवर्ती बिन्दु-मण्डल में निवास करने वाली, वही बिन्दु जो देवी का परम स्थान है। वे गुप्त याग-विधि के क्रम से आराधित होती हैं और गुप्त तर्पण-विधि से सन्तुष्ट।
नाम 377–382 · पीठ और गुप्त उपासना
देवी तत्काल प्रसन्न होकर कृपा करने वाली हैं। वे समस्त विश्व की साक्षी हैं, फिर भी जिनका अपना कोई अन्य साक्षी नहीं, स्वयं-प्रकाश। वे हृदय, शिर, शिखा, नेत्र, कवच और अस्त्र, इन षडंगों की देवताओं से युक्त हैं, और छह दिव्य गुणों, ऐश्वर्य, वीर्य, वैराग्य, यश, श्री और ज्ञान, से परिपूर्ण।
नाम 383–387 · साक्षी और षडंग
खण्ड अपने विश्राम की ओर बढ़ता है। देवी सदा करुणा से आर्द्र रहती हैं, उनकी कोई उपमा नहीं, और वे मोक्ष का परम सुख देती हैं। फिर एक गूढ़ नाम आता है, वे सोलह नित्या-देवियों, कामेश्वरी, भगमालिनी, नित्यक्लिन्ना, भेरुण्डा, वह्निवासिनी, महावज्रेश्वरी, शिवदूती, त्वरिता, कुलसुन्दरी, नित्या, नीलपताकिनी, विजया, सर्वमंगला, ज्वालामालिनी, चित्रा और त्रिपुरसुन्दरी, के रूप में स्थित हैं, जो चन्द्र की सोलह कलाओं की प्रतीक हैं।
नाम 388–391 · करुणा और सोलह नित्याएँ
और अन्त में देवी का तेजोमय, परम रूप गाया जाता है। वे श्रीकण्ठ अर्थात् शिव के शरीर का आधा भाग हैं, अर्धनारीश्वर-स्वरूपा। वे प्रभा यानी तेज से युक्त देदीप्यमान हैं, स्वयं उसी तेज के रूप वाली, सर्वत्र विख्यात, और समस्त की परम ईश्वरी, परमेश्वरी। इसी विजय-तेज के साथ चौथा खण्ड पूर्ण होता है।