Lulla Family

ललिता सहस्रनाम, खण्ड 8

श्री ललिता सहस्रनाम · खण्ड आठ

वेदान्त-दर्शन के साथ संगति

नाम सात-सौ-एक से आठ-सौ। सच्चिदानन्द, ब्रह्मविद्या, तत्त्व-मयी।

आठवाँ खण्ड वहाँ बैठता है जहाँ श्रीविद्या-तन्त्र और अद्वैत-वेदान्त एक ही घाट पर मिलते हैं। यहाँ देवी का स्वरूप उसी शब्दावली में खुलता है जो उपनिषद् ब्रह्म के लिए बचा रखते हैं। ‘देशकालापरिच्छिन्ना’ से लेकर ‘सत्यज्ञानानन्दरूपा’ तक, सात-सौ के बाद के अनेक नाम सत्-चित्-आनन्द, आत्मा, विज्ञान और चित्-कला की ही भाषा बोलते हैं।

श्रीविद्या-परम्परा में देवी केवल पूजी जाने वाली शक्ति नहीं, वही परा-संवित् हैं जिसे वेदान्त ब्रह्म कहता है। इसी कारण इस खण्ड के नाम ब्रह्मविद्या का परिचय भक्ति की भाषा में देते हैं, और ‘मिथ्याजगदधिष्ठाना’ जैसे नाम में अद्वैत का वह सिद्धान्त सीधे सुनाई पड़ता है कि यह दृश्य-जगत् आभास-मात्र है और उसका अधिष्ठान वही एक चैतन्य है।

भास्करराय की ‘सौभाग्य-भास्कर’ टीका इन नामों को इसी दृष्टि से खोलती है, जहाँ प्रकाश-रूप शिव और विमर्श-रूप शक्ति एक ही सत्य के दो पक्ष हैं। नीचे सात-सौ-एक से आठ-सौ तक के सौ नाम, थमते-थमते बहती हुई प्रस्तावना के साथ।

नाम 701–800

आरम्भ ही असीम से होता है। पहले नाम घोषणा करते हैं कि देवी न देश में बँधी हैं न काल में नापी जाती हैं, और फिर भी सर्वत्र व्याप्त हैं और अपनी माया से समस्त जीवों को मोह में बाँधे रखती हैं। वही विवेक-प्रज्ञा रूप सरस्वती हैं, वही समस्त आगम-निगम का शरीर धारण करने वाली शास्त्र-मयी, स्कन्द की माता भी और हृदय-गुहा में बसने वाली गुप्त-रूपा भी, जिनका स्वरूप सहज दृष्टि से कभी नहीं पकड़ में आता।

देशकालापरिच्छिन्ना · सर्वमोहिनी

701देशकालापरिच्छिन्ना
702सर्वगा
703सर्वमोहिनी
704सरस्वती
705शास्त्रमयी
706गुहाम्बा
707गुह्यरूपिणी

अब उपाधि-रहित परम-तत्त्व का परिचय आता है। देवी नाम-रूप की किसी सीमा से अछूती हैं, सदाशिव में ही जिनकी अनन्य निष्ठा है, और जो पवित्र गुरु-परम्पराओं की अधीश्वरी होकर सम्प्रदाय-ज्ञान की रक्षा करती हैं। समता और शान्ति उनका स्वभाव है। फिर मन्त्र की गुह्य परत खुलती है, जहाँ वे श्रीविद्या-मन्त्र के उस ‘ई’ बीज रूप में प्रकट होती हैं जिसमें कामकला निहित है, और समस्त गुरु-मण्डल को अपने में धारण करने वाली रूपिणी बन जाती हैं।

सर्वोपाधिविनिर्मुक्ता · गुरूमण्डलरूपिणी

708सर्वोपाधिविनिर्मुक्ता
709सदाशिवपतिव्रता
710सम्प्रदायेश्वरी
711साधु
712
713गुरूमण्डलरूपिणी

आगे के नाम इन्द्रियों के पार ले जाते हैं। देवी कुल अर्थात् इन्द्रिय-समूह से अतीत हैं, सूर्यमण्डल में गुह्य रूप से आराधित हैं, और वही माया-स्वरूपा हैं जिससे एक ब्रह्म अनेक प्रतीत होने लगता है। उनका स्वभाव मधु-सा मधुर है और समाधि की ‘मधुमती’ भूमिका भी वही हैं। फिर वे पृथ्वी बनकर समस्त भूतों को धारती हैं, शिव-गणों की माता होती हैं, और गुह्यक देवताओं की आराध्य ठहरती हैं।

कुलोत्तीर्णा · गुह्यकाराध्या

714कुलोत्तीर्णा
715भगाराध्या
716माया
717मधुमती
718मही
719गणाम्बा
720गुह्यकाराध्या

कोमलता और स्वातन्त्र्य साथ-साथ चलते हैं। देवी के अंग सुकुमार हैं, गुरुओं को वे प्रिय हैं और गुरु उन्हें प्रिय, फिर भी वे किसी पर अवलम्बित नहीं, अपनी ही इच्छा से सब रचने वाली स्वतन्त्रा हैं। समस्त तन्त्रों की अधीश्वरी होकर वे उस दक्षिणामूर्ति के रूप में प्रकट होती हैं जो मौन से ही आत्मज्ञान बाँट देते हैं, और सनक-सनन्दन जैसे नित्य-ब्रह्मचारी ऋषियों द्वारा आराधित वह ब्रह्मविद्या-रूपा हैं जिसकी उपासना केवल ज्ञानी कर पाते हैं।

स्वतन्त्रा · सनकादिसमाराध्या

721कोमलाङ्गी
722गुरुप्रिया
723स्वतन्त्रा
724सर्वतन्त्रेशी
725दक्षिणामूर्तिरूपिणी
726सनकादिसमाराध्या

यहाँ खण्ड का हृदय धड़कता है, वह चैतन्य जो वेदान्त की भाषा बोलता है। देवी शिव का ज्ञान देने वाली हैं, ब्रह्म में स्थित वह चित्-कला हैं जिससे जड़ तक प्रकाशित हो उठता है, और खिलने को तैयार आनन्द की वह मुकुल हैं जो ब्रह्मानन्द बनकर फूटती है। वे शुद्ध प्रेम का स्वरूप हैं, भक्तों को अभीष्ट देने वाली, और अपने नामों के पारायण-मात्र से प्रसन्न हो जाने वाली।

चित्कला · नामपारायणप्रीता

727शिवज्ञानप्रदायिनी
728चित्कला
729आनन्दकलिका
730प्रेमरूपा
731प्रियङ्करी
732नामपारायणप्रीता

अब नृत्य और मुक्ति की लय बँधती है, और बीच में अद्वैत का वह नाम चमक उठता है जिस पर पूरा खण्ड टिका है। देवी नन्दि-मन्त्र की अधिष्ठात्री हैं, नृत्य करते शिव की पत्नी नटेश्वरी हैं, और वही ‘मिथ्याजगदधिष्ठाना’ हैं, यह सारा दृश्य-संसार जिस एक सत्य पर आभास-मात्र की तरह उभरता है। मुक्ति वे देती भी हैं और स्वयं मुक्ति का स्वरूप भी हैं। उन्हें लास्य-नृत्य प्रिय है, प्रलय में समस्त सृष्टि को अपने में समेटने वाली लयकरी वही हैं, और प्राणियों में लज्जा रूप से भी वही बसती हैं।

मिथ्याजगदधिष्ठाना · लज्जा

733नन्दिविद्या
734नटेश्वरी
735मिथ्याजगदधिष्ठाना
736मुक्तिदा
737मुक्तिरूपिणी
738लास्यप्रिया
739लयकरी
740लज्जा

इसके बाद वह प्रसिद्ध रूपक-माला आती है जहाँ हर नाम एक चित्र बन जाता है। रम्भा आदि अप्सराओं की वन्दित देवी संसार-रूपी दावानल पर अमृत की वर्षा हैं, पाप-रूपी वन को जला डालने वाली आग हैं, और दुर्भाग्य-रूपी रूई को उड़ा ले जाने वाली प्रचण्ड वायु हैं। वृद्धावस्था के अन्धकार को मिटाने वाली सूर्य-किरण भी वही हैं, और सौभाग्य-समुद्र को उमड़ाने वाली पूर्णिमा-चन्द्रिका भी।

भवदावसुधावृष्टिः · भाग्याब्धिचन्द्रिका

741रम्भादिवन्दिता
742भवदावसुधावृष्टिः
743पापारण्यदवानला
744दौर्भाग्यतूलवातूला
745जराध्वान्तरविप्रभा
746भाग्याब्धिचन्द्रिका

रूपक-माला और गहरी होती है। भक्तों के चित्त-रूपी मयूरों को नचाने वाली सघन वर्षा-मेघ देवी हैं, रोग-रूपी पर्वत को चूर करने वाला वज्र भी, और मृत्यु-रूपी वृक्ष को जड़ से काट डालने वाली कुल्हाड़ी भी। फिर स्वर तीव्र होता है, और वे परम ईश्वरी महेश्वरी से महाकाली बनकर महाकाल की संहार-शक्ति में प्रकट होती हैं, प्रलय में महान् तत्त्वों तक को ग्रस लेने वाली, समस्त महान् को भी भोजन रूप में ग्रहण कर लेने वाली।

भक्तचित्तकेकिघनाघना · महाशना

747भक्तचित्तकेकिघनाघना
748रोगपर्वतदम्भोलिः
749मृत्युदारुकुठारिका
750महेश्वरी
751महाकाली
752महाग्रासा
753महाशना

संहार-स्वर से कथा-रूप की ओर मुड़कर नाम पार्वती के तप और चण्डी के पराक्रम को छूते हैं। पत्ते तक का आहार त्याग देने वाली अपर्णा वही हैं, दुष्टों पर प्रचण्ड क्रोध रूप में फूट पड़ने वाली चण्डिका भी, और चण्ड-मुण्ड आदि असुरों की संहारिणी भी। फिर दृष्टि लौटती है तत्त्व पर, जहाँ वे नश्वर जगत् और अविनाशी पुरुष दोनों को अपने भीतर समेटे क्षर-अक्षर-आत्मिका हैं, समस्त लोकों की अधीश्वरी, और सम्पूर्ण विश्व को धारण करने वाली।

अपर्णा · विश्वधारिणी

754अपर्णा
755चण्डिका
756चण्डमुण्डासुरनिषूदिनी
757क्षराक्षरात्मिका
758सर्वलोकेशी
759विश्वधारिणी

अब वर-दात्री और तीन-तीन के रूपकों की पंक्ति चलती है। देवी धर्म, अर्थ और काम, तीनों पुरुषार्थ देती हैं, समस्त सौभाग्य की आश्रय-स्थली हैं, सूर्य-चन्द्र-अग्नि रूप तीन नेत्रों वाली त्र्यम्बका हैं, और सत्त्व-रज-तम तीनों गुणों का सार। स्वर्ग और मोक्ष दोनों उनके हाथ में हैं, स्वयं वे परम शुद्ध हैं, और उनका शरीर गुड़हल-पुष्प सी अरुण-आभा से दमकता है।

त्रिवर्गदात्री · जपापुष्पनिभाकृतिः

760त्रिवर्गदात्री
761सुभगा
762त्र्यम्बका
763त्रिगुणात्मिका
764स्वर्गापवर्गदा
765शुद्धा
766जपापुष्पनिभाकृतिः

तेज, यज्ञ और व्रत के नाम आते हैं। देवी ओज और तेजोबल से सम्पन्न हैं, दीप्ति-कान्ति धारण करने वाली, समस्त यज्ञों का अधिष्ठान यज्ञ-स्वरूपा, और व्रत-निष्ठा में आनन्द लेने वाली प्रियव्रता। पर उनकी आराधना सहज नहीं, यथाविधि उपासना से ही प्रसन्न होने वाली दुराराध्या हैं वे, और जिन्हें कोई पराभूत नहीं कर सकता ऐसी अजेय दुराधर्षा भी।

ओजोवती · दुराधर्षा

767ओजोवती
768द्युतिधरा
769यज्ञरूपा
770प्रियव्रता
771दुराराध्या
772दुराधर्षा

पुष्प, पर्वत और नाद के बीच विराट् रूप उभरता है। देवी को पाटली के हल्के लाल पुष्प प्रिय हैं, वे महान् हैं और नारद की ‘महती’ वीणा के नाद-रूप में भी प्रकट, मेरु पर्वत पर निवास करने वाली, मन्दार के दिव्य पुष्पों की प्रेमी, और वीर-साधकों की आराध्य। फिर वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपना स्थूल शरीर बनाने वाली विराट्-रूपा हो जाती हैं, रजोगुण से रहित, और सब दिशाओं की ओर मुख किए सर्वतोमुखी चैतन्य।

पाटलीकुसुमप्रिया · विश्वतोमुखी

773पाटलीकुसुमप्रिया
774महती
775मेरुनिलया
776मन्दारकुसुमप्रिया
777वीराराध्या
778विराड्रूपा
779विरजा
780विश्वतोमुखी

विराट् से अन्तर्यामी की ओर दृष्टि सिमटती है। देवी सबके भीतर बैठा प्रत्यगात्मा हैं, और साथ ही वह परम चिदाकाश जो पिण्ड और ब्रह्माण्ड दोनों का उपादान-कारण है। वही प्राण देती हैं, स्वयं समस्त प्राणों में स्पन्दित प्राण-रूपा हैं, सूर्य-रूप मार्ताण्ड-भैरव की आराध्य हैं, और जिन्होंने राज्य का भार अपनी मन्त्रिणी श्यामला को सौंप रखा है ऐसी निश्चिन्त साम्राज्ञी भी।

प्रत्यग्रूपा · मन्त्रिणीन्यस्तराज्यधूः

781प्रत्यग्रूपा
782पराकाशा
783प्राणदा
784प्राणरूपिणी
785मार्ताण्डभैरवाराध्या
786मन्त्रिणीन्यस्तराज्यधूः

अब खण्ड अपने शिखर की ओर बढ़ता है, जहाँ राज्य-वैभव और निर्गुण ब्रह्म एक साँस में कहे जाते हैं। देवी त्रिपुर की अधीश्वरी हैं, जिनकी सेना केवल विजय की अभ्यस्त है, और फिर भी वे तीनों गुणों से रहित गुणातीत-स्वरूपा हैं, परा भी और अपरा भी, सगुण और निर्गुण दोनों रूपों में विद्यमान। यहीं वह घोषणा गूँजती है जो उपनिषद् दोहराते हैं, कि देवी सत्य-ज्ञान-आनन्द का स्वरूप हैं, और उस समरस अवस्था में स्थित जहाँ परा-अपरा का भेद विलीन होकर शिव-शक्ति एक रस हो जाते हैं।

त्रिपुरेशी · सामरस्यपरायणा

787त्रिपुरेशी
788जयत्सेना
789निस्त्रैगुण्या
790परापरा
791सत्यज्ञानानन्दरूपा
792सामरस्यपरायणा

खण्ड का समापन कला और रस पर होता है। जटाधारी शिव की पत्नी कपर्दिनी चौंसठ कलाओं को माला की तरह धारण करती हैं, कामधेनु-सी समस्त कामनाएँ पूर्ण करती हैं, और इच्छानुसार मनोहर रूप धारने वाली कामरूपिणी हैं। वे समस्त कलाओं का कोश हैं, काव्य की कला-स्वरूपा, समस्त रसों की मर्मज्ञा, और अन्त में रस का वह अक्षय कोश-गृह जिसमें काव्य का रस भी है और वेदान्त-वर्णित ‘रसो वै सः’ वाला वह परमानन्द-रस भी। इसी रस-निधि पर आठवाँ खण्ड विराम लेता है।

कपर्दिनी · रसशेवधिः

793कपर्दिनी
794कलामाला
795कामधुक्
796कामरूपिणी
797कलानिधिः
798काव्यकला
799रसज्ञा
800रसशेवधिः

स्रोत: ब्रह्माण्ड-पुराण, ललितोपाख्यान (उत्तर-खण्ड); अर्थ-संगति भास्करराय की ‘सौभाग्य-भास्कर’ टीका के अनुसार। मूल पाठ sanskritdocuments.org/doc_devii/lalita1000.itx से।

लाइसेन्स: मूल पाठ सार्वजनिक-सम्पत्ति। हिन्दी संगति lulla.net, CC BY-NC 4.0।

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