Lulla Family

ललिता सहस्रनाम, खण्ड 5

श्री ललिता सहस्रनाम · खण्ड पाँच

श्रीविद्या और तत्त्व-नाम

नाम तीन सौ सत्तानवे से पाँच सौ तक। तत्त्व, चक्र और श्रीविद्या के नाम।

यहाँ देवी का स्मरण मूल कारण से आरम्भ होता है और शरीर के भीतर बसे चक्रों तक उतरता चला जाता है। पाँचवाँ खण्ड श्रीविद्या-परम्परा के गूढ़तम मर्म में पैठता है। देवी का षोडशी (सोलहवें अक्षर वाला) स्वरूप, बिन्दु-तर्पण की संगति, और मन्त्र, तन्त्र तथा यन्त्र की एकता यहाँ एक साथ सामने आती है।

श्रीविद्या के दो प्रमुख स्वरूप हैं, पंचदशाक्षरी (पन्द्रह अक्षरों वाली) और षोडशी (सोलह अक्षरों वाली)। पंचदशाक्षरी सार्वजनिक है, किन्तु षोडशी का सोलहवाँ अक्षर गुप्त रहता है, गुरु से शिष्य को केवल मौखिक संक्रमण से ही दिया जाता है। इन नामों में दोनों स्वरूपों का स्मरण है।

पंचदशाक्षरी मन्त्र के पन्द्रह अक्षर तीन कूटों में बँटे हैं, वाग्भव (पाँच अक्षर), कामराज (छह अक्षर), और शक्ति (चार अक्षर)। हर कूट की अपनी देवी-संगति है, अपना न्यास-स्थान है। षोडशी का सोलहवाँ अक्षर कौन-सा है, इस पर आज भी भिन्न-भिन्न परम्पराओं में मतभेद है। काश्मीर की शैव-परम्परा एक उत्तर देती है, कांची-कामकोटि की परम्परा दूसरा।

‘पंचदशाक्षरी मन्त्र’ की उत्पत्ति की कथा भी प्राचीन है। मनु, चन्द्र, कुबेर, लोपामुद्रा, मन्मथ, अगस्त्य, अग्नि, सूर्य, इन्द्र, स्कन्द, शिव, क्रोधभट्टारक, और दुर्वासा, इन तेरह ऋषियों ने तेरह भिन्न स्वरूपों में इस मन्त्र का दर्शन किया। इसी से श्रीविद्या-परम्परा को ‘त्रयोदश-मतावलम्बी’ भी कहते हैं।

तमिल भूमि में कांची-कामकोटि-पीठ की श्रीविद्या-परम्परा आज सबसे जीवन्त है। जगद्गुरु चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती (1894-1994) ने इन नामों पर अनेक तमिल प्रवचन दिये, जो आगे चलकर ‘देवी-कलै’ नामक संग्रह में संकलित हुए। उनके उत्तराधिकारी जगद्गुरु शंकर-विजयेन्द्र सरस्वती आज भी श्रीविद्या-साधना का प्रसार करते हैं।

स्तुति सृष्टि की जड़ से उठती है। देवी वही मूल प्रकृति हैं जो समस्त सृष्टि का आदि-कारण है, जो इन्द्रियों के परे अव्यक्त रहती है, और जो व्यक्त तथा अव्यक्त, दोनों रूपों में एक साथ विद्यमान है। वही सर्वत्र व्याप्त हैं, समस्त ब्रह्माण्ड में फैली हुई, अनेक आकार धारण करती हुई। और वही विद्या और अविद्या, ज्ञान और अज्ञान, दोनों का स्वरूप बन जाती हैं।

नाम 397 से 402

397मूलप्रकृतिः
398अव्यक्ता
399व्यक्ताव्यक्तस्वरूपीणि
400व्यापिनी
401विविधाकारा
402विद्याऽविद्यास्वरूपिणी

अब दो विराट उपमाएँ आती हैं। देवी महाकामेश्वर के नेत्र-रूपी कुमुदों को प्रफुल्लित करने वाली चन्द्रिका हैं, और भक्तों के हृदय का अन्धकार भेदने वाली सूर्य-किरणों की वह धारा हैं जो भीतर के तम को चीर देती है।

नाम 403 और 404

403महाकामेशनयनकुमुदाह्लादकौमुदी
404भक्तहार्दतमोभेदभानुमद्भानुसन्ततिः

अब नामों की एक लड़ी शिव से जुड़ती है, इतनी निकट कि देवी और शिव में भेद मिट जाता है। जिसके दूत स्वयं शिव हैं, जिसकी आराधना स्वयं शिव करते हैं, जिसका स्वरूप साक्षात् शिव ही है। वही मंगल और कल्याण देती हैं और भक्तों को शिवरूप में ढाल देती हैं, वही शिव की प्रिया हैं और एकमात्र शिव में अनुरक्त। फिर स्वर सत्पुरुषों की ओर मुड़ता है, जो सज्जनों को प्रिय हैं, उनकी इष्ट-देवी, सदा उन्हीं के द्वारा पूजित।

नाम 405 से 412

405शिवदूती
406शिवाराध्या
407शिवमूर्तिः
408शिवङ्करी
409शिवप्रिया
410शिवपरा
411शिष्टेष्टा
412शिष्टपूजिता

फिर नाम उस ओर बढ़ते हैं जहाँ माप और शब्द हार जाते हैं। देवी इन्द्रियों के द्वारा अमेय हैं, स्वयं-प्रकाशस्वरूपा, स्वतः ज्योतिर्मयी, और मन तथा वाणी की पहुँच से परे। वही चैतन्य की शक्ति हैं, शुद्ध चेतना का रूप, और वही माया बनकर सृष्टि की जड-शक्ति हो जाती हैं, जड जगत् के रूप में स्थित।

नाम 413 से 419

413अप्रमेया
414स्वप्रकाशा
415मनोवाचामगोचरा
416चिच्छक्तिः
417चेतनारूपा
418जडशक्तिः
419जडात्मिका

अब देवी वेद-वाणी के रूप में प्रकट होती हैं। वही गायत्री मन्त्र-स्वरूपा हैं, वही व्याहृति-स्वरूपा और वाक्-शक्ति की अधिष्ठात्री, वही सन्ध्या-वेला के रूप में विद्यमान, और द्विजों के समूह के द्वारा सेवित।

नाम 420 से 423

420गायत्री
421व्याहृतिः
422सन्ध्या
423द्विजवृन्दनिषेविता

यहाँ नामों की लड़ी एक महावाक्य में बदल जाती है। देवी का आसन तत्त्व हैं, वही ‘तत्’ से अभिप्रेत परम सत्य, वही ब्रह्म, और वही ‘त्वम्’ से इंगित जीव, इन दो नामों में ‘तत्त्वमसि’ गूँजता है, ब्रह्म और जीव का अभेद। फिर पुकार उठती है, हे माता, यह पद-विभाजन सब परम्पराओं में एक-सा नहीं माना जाता। और वही पाँचों कोशों के भीतर निवास करती हैं।

नाम 424 से 428

424तत्त्वासना
425तत्
426त्वं
427अयी
428पञ्चकोशान्तरस्थिता

अब स्तुति देवी के सौन्दर्य और आनन्द-मद की ओर मुड़ती है। उनकी महिमा असीम है, सीमा से रहित, और वे सदा यौवन-सम्पन्न रहती हैं। आनन्द के उस मद में वे सुशोभित होती हैं, उनके रक्ताभ नेत्र उन्माद से घूमते हुए अन्तर्मुख हो उठते हैं, कपोल अरुणाभ हो जाते हैं। उनका अंग चन्दन के लेप से चर्चित है, और चम्पा के पुष्प उन्हें विशेष प्रिय हैं।

नाम 429 से 435

429निःसीममहिमा
430नित्ययौवना
431मदशालिनी
432मदघूर्णितरक्ताक्षी
433मदपाटलगण्डभूः
434चन्दनद्रवदिग्धाङ्गी
435चाम्पेयकुसुमप्रिया

अब नाम सीधे श्रीविद्या के कुल-रहस्य में उतरते हैं। देवी हर कार्य में निपुण हैं, कोमल और सुकुमार स्वरूप वाली, कुरुविन्द मणि में निवास करने वाली कुरुकुल्ला शक्ति। वही कुल की ईश्वरी हैं, जहाँ कुल का अर्थ है ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान का त्रिक। वही मूलाधार-चक्र के कोश के मध्य कुलकुण्ड में बसती हैं, कौल-मार्ग में निरत साधकों के द्वारा सेवित, और वही कुमार तथा गणनाथ की माता हैं।

नाम 436 से 442

436कुशला
437कोमलाकारा
438कुरुकुल्ला
439कुलेश्वरी
440कुलकुण्डालया
441कौलमार्गतत्परसेविता
442कुमारगणनाथाम्बा

अब देवी उन शक्तियों के रूप में स्मरण की जाती हैं जो जीवन को सँभालती हैं। वही तुष्टि हैं, सदा सन्तुष्ट, और वही पुष्टि, पोषण की शक्ति। वही बुद्धि के रूप में प्रकट होती हैं, वही धैर्य और धारण-शक्ति, वही शान्ति, वही कल्याणमयी मंगल-स्वरूपा, वही कान्ति और दीप्ति, और वही आनन्द देने वाली।

नाम 443 से 450

443तुष्टिः
444पुष्टिः
445मतिः
446धृतिः
447शान्तिः
448स्वस्तिमती
449कान्तिः
450नन्दिनी

फिर तेज और सौन्दर्य के नाम आते हैं। वही समस्त विघ्नों का नाश करती हैं, वही तेजस्विनी, जिसके तीन नेत्र सूर्य, चन्द्र और अग्नि हैं। उनके चंचल नेत्र घूमते रहते हैं, कुछ पाठ इसके बाद ‘कामरूपिणी’ को पृथक् नाम मानते हैं, जो नारी में प्रेम के रूप में स्थित है। वही माला धारण किये हुए हैं, वही हंसों से अभिन्न, वे योगी जो परम आध्यात्मिक स्थिति को पा चुके हैं, और वही समस्त विश्व की माता।

नाम 451 से 457

451विघ्ननाशिनी
452तेजोवती
453त्रिनयना
454लोलाक्षी
455मालिनी
456हंसिनी
457माता

अब रूप-माधुर्य का एक और गुच्छा खुलता है। वही मलय पर्वत पर निवास करती हैं, सुन्दर मुख वाली, जिसका अंग कमल की पंखुड़ियों-सा कोमल है, सुन्दर भौंहों वाली, सदा दीप्तिमती और शोभायमान, देवताओं की नायिका। वही नीलकण्ठ शिव की पत्नी हैं, कान्ति से युक्त, जो मन में क्षोभ उत्पन्न करती हैं, और जिनका रूप इतना सूक्ष्म है कि इन्द्रियों से उसका ग्रहण नहीं होता।

नाम 458 से 467

458मलयाचलवासिनी
459सुमुखी
460नलिनी
461सुभ्रूः
462शोभना
463सुरनायिका
464कालकण्ठी
465कान्तिमती
466क्षोभिणी
467सूक्ष्मरूपिणी

अब सिद्धों की देवी सामने आती हैं। वही वज्रेश्वरी हैं, छठी नित्या-देवी, वामदेव शिव की पत्नी, जो आयु और काल के परिवर्तनों से रहित हैं। वही सिद्धों के द्वारा आराधित ईश्वरी हैं, वही पन्द्रह अक्षरों वाला सिद्धविद्या-मन्त्र, वही सिद्धों की माता, जिनका यश अनुपम है।

नाम 468 से 474

468वज्रेश्वरी
469वामदेवी
470वयोऽवस्थाविवर्जिता
471सिद्धेश्वरि
472सिद्धविद्या
473सिद्धमाता
474यशस्विनी

अब स्तुति शरीर के भीतर उतरती है, चक्र-दर-चक्र। पहला पड़ाव कण्ठ का विशुद्धि-चक्र है, जहाँ देवी डाकिनी-रूप में बसती हैं। वहाँ उनका वर्ण किंचित् रक्ताभ है, तीन नेत्रों वाली, खट्वांग आदि आयुधों से सुसज्जित, एक मुख से युक्त, जिसे खीर का भोग प्रिय है। वही स्पर्श-इन्द्रिय की अधिष्ठात्री हैं, सांसारिक बन्धन में बँधे पशु-जनों के लिए भयंकर, अमृता आदि महाशक्तियों से घिरी, डाकिनी-देवी के रूप में स्थित।

नाम 475 से 484

475विशुद्धिचक्रनिलया
476आरक्तवर्णा
477त्रिलोचना
478खट्वाङ्गादिप्रहरणा
479वदनैकसमन्विता
480पायसान्नप्रिया
481त्वक्स्था
482पशुलोकभयङ्करी
483अमृतादिमहाशक्तिसंवृता
484डाकिनीश्वरी

दूसरा पड़ाव हृदय का अनाहत-चक्र है, जहाँ देवी राकिणी-रूप में बसती हैं। वहाँ वे अनाहत-कमल में निवास करती हैं, श्याम-वर्ण की आभा वाली, दो मुख वाली, उज्ज्वल दाढ़ों से युक्त, रुद्राक्ष की माला आदि धारण किये। वही प्राणियों के शरीर में रुधिर की अधिष्ठात्री हैं, कालरात्रि आदि शक्तियों के समूह से घिरी, जिन्हें स्निग्ध अन्न का भोग प्रिय है, जो महावीरों को वर देती हैं, और राकिणी-देवी के रूप में विद्यमान।

नाम 485 से 494

485अनाहताब्जनिलया
486श्यामाभा
487वदनद्वया
488दंष्ट्रोज्ज्वला
489अक्षमालादिधरा
490रुधिरसंस्थिता
491कालरात्र्यादिशक्त्यौघवृता
492स्निग्धौदनप्रिया
493महावीरेन्द्रवरदा
494राकिण्यम्बास्वरूपिणी

तीसरा पड़ाव नाभि का मणिपूरक-चक्र है, जहाँ देवी लाकिनी-रूप में बसती हैं। वही मणिपूरक के दस-दल कमल में निवास करती हैं, तीन मुख वाली, वज्र आदि आयुध धारण किये, डामरी आदि सेविका-देवियों से घिरी, रक्त-समान लाल वर्ण वाली। और वही प्राणियों के शरीर में मांस-धातु की अधिष्ठात्री हैं। यहीं पाँचवाँ खण्ड विराम लेता है, चक्रों की यात्रा अगले खण्ड में आगे बढ़ेगी।

नाम 495 से 500

495मणिपूराब्जनिलया
496वदनत्रयसंयुता
497वज्रादिकायुधोपेता
498डामर्यादिभिरावृता
499रक्तवर्णा
500मांसनिष्ठा

स्रोत: ब्रह्माण्ड-पुराण, ललितोपाख्यान। श्री ललिता त्रिपुरसुन्दरी के सहस्र नाम, भास्कररायकृत ‘सौभाग्य-भास्कर’ टीका के अनुसार।

अधिकार: मूल पाठ सार्वजनिक धरोहर। हिन्दी संगति lulla.net, CC BY-NC 4.0।

English