ललिता सहस्रनाम, खण्ड 1

श्री ललिता सहस्रनाम · खण्ड एक

देव-कार्य और दिव्य-स्वरूप

नाम एक से चौरासी तक। श्रीमाता से आरम्भ; मस्तक से कन्धों तक देवी का स्वरूप।

सहस्रनाम का यह पहला खण्ड चौरासी नामों का है, और इसकी रचना दो स्तरों पर खुलती है। आरम्भ के नाम, एक से ग्यारह तक, ललिता के अवतार-प्रयोजन को कहते हैं, श्रीमाता, श्रीमहाराज्ञी, श्रीमत्सिंहासनेश्वरी। फिर तेरह से चौरासी तक देवी के अंग-स्वरूप का सघन वर्णन है, मस्तक से चलकर कन्धों तक।

यह क्रम केवल अलंकार नहीं है। श्रीविद्या-परम्परा में देवी का ध्यान दोनों दिशाओं में किया जाता है, पाद से केश तक और केश से पाद तक। सहस्रनाम मस्तक से चरण की ओर का क्रम चुनता है, और ये पहले चौरासी नाम उसी यात्रा के आरम्भिक पड़ाव हैं।

परम्परागत ध्यान में ललिता स्वर्ण-सिंहासन पर विराजमान हैं। चार भुजाओं में पाश, अंकुश, इक्षु-धनुष और पाँच पुष्प-बाण। ये पाँच पुष्प-बाण पंच-तन्मात्र, अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध के द्योतक हैं। देवी का वर्ण सिन्दूरी, मानो उगता हुआ सूर्य। तीन नेत्र, मस्तक पर चन्द्र-शिखर, और मुख पर मन्द मुस्कान। यह स्वरूप उस ध्यान-श्लोक से आता है जिसका आरम्भ ‘सिन्दूर-अरुण-विग्रहाम्’ से होता है, और जो सहस्रनाम-पाठ से पूर्व बोला जाता है।

ललिता-सहस्रनाम पर सबसे प्रामाणिक टीका भास्करराय जी की ‘सौभाग्य-भास्कर’ है, जो अठारहवीं सदी के आरम्भ में, क़रीब 1729 ई. के आसपास, काशी में रची गयी। भास्करराय जी मूलतः महाराष्ट्र के थे, किन्तु श्रीविद्या-साधना के लिए काशी में आ बसे थे। उनकी टीका इन नामों को तीन स्तरों पर पढ़ती है, स्थूल, सूक्ष्म और कारण। नीचे की प्रत्येक प्रस्तावना उसी दृष्टि से इन नामों के समूह को खोलती है।

इन पहले चौरासी नामों में देवी का यह वर्णन ध्यान की एक रीति है। एक-एक नाम पर ठहर कर पढ़ें तो प्रत्येक अपने आप में एक चित्र है, और सम्पूर्ण समूह को एक साथ देखें तो ललिता का अखण्ड स्वरूप उभरता है। यही रीति आदि शंकराचार्य ने अपनी ‘सौंदर्य-लहरी’ में भी अपनायी थी, जहाँ देवी का केश से चरण तक का यह सौन्दर्य-ध्यान विस्तार पाता है। ‘सौंदर्य-लहरी’ और ब्रह्माण्ड-पुराण का यह ललिता-सहस्रनाम, दोनों श्रीविद्या के आधार-ग्रन्थ हैं, और दोनों में देवी का यही ध्यान-स्वरूप एक-सा प्रतिध्वनित होता है।

नाम 1 से 84

आरम्भ ही माता के भाव से होता है। पहला नाम ‘श्री’ और ‘माता’ का मेल है, और भास्करराय जी कहते हैं कि यह एक नाम ही पूरे सहस्रनाम का सार है, क्योंकि माता का भाव सबसे निकट और सबसे करुण है। ऋग्वेद के देवी-सूक्त में देवी स्वयं को सम्पूर्ण जगत् की धात्री कहती हैं, और वही धात्री यहाँ समस्त सृष्टि की महाराज्ञी और परम दिव्य सिंहासन की स्वामिनी भी है। जिसकी आज्ञा से ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त होते हैं, वही यहाँ तीन भावों में नमित होती है।

नाम 1 से 3 · श्रीमाता का त्रिविध भाव

1श्रीमाता
2श्रीमहाराज्ञी
3श्रीमत्सिंहासनेश्वरी

अब अवतार की कथा खुलती है। देवताओं ने जब भण्डासुर के संहार के लिए महायज्ञ किया, तो चित्-रूपी अग्नि के उसी कुण्ड से ललिता प्रकट हुईं। भास्करराय जी इस चिदग्नि को शुद्ध-चैतन्य का प्रतीक मानते हैं, अर्थात् देवी किसी भौतिक मूल से नहीं, स्वयं चैतन्य से उद्भूत हैं। प्रकट होते ही उनका प्रयोजन स्पष्ट है, देवताओं का कार्य पूर्ण करना। और उनकी कान्ति उगते हुए हज़ार सूर्यों की आभा-सी है, वही अरुण तेज जो ध्यान-श्लोक में देवी के विग्रह को सिन्दूरी कहता है, और जिसे भास्करराय जी आत्मा के स्वयंप्रकाश का प्रतीक मानते हैं।

नाम 4 से 6 · चित्-अग्नि से प्रकट

4चिदग्निकुण्डसम्भूता
5देवकार्यसमुद्यता
6उद्यद्भानुसहस्राभा

चार भुजाओं में चार आयुध, और भास्करराय जी हर एक को मन की एक वृत्ति से जोड़ते हैं। हाथ में राग का पाश है, अर्थात् इच्छा और आसक्ति को देवी अपने हाथ में बाँधकर साधक के लिए वश में कर लेती हैं। दूसरा आयुध अंकुश क्रोध का रूप है, जो भीतरी विकारों को अंकुश में रखता है। तीसरा गन्ने का धनुष है, जो मन का प्रतीक है, कोमल जान पड़ता है किन्तु इसी से देवी पाँच तन्मात्र-बाण चलाती हैं; यह स्वरूप कामदेव से लिया गया है, जिनके अहंकार के शमन के बाद देवी उनके आयुध स्वयं धारण करती हैं। और चौथा आयुध पाँच पुष्प-बाण, अर्थात् पंच-तन्मात्र, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध, जो पाँचों इन्द्रिय-विषयों को वश में रखते हैं। यह सांख्य और तन्त्र के संगम का सूचक है।

नाम 7 से 11 · चार भुजाएँ, चार आयुध

7चतुर्बाहुसमन्विता
8रागस्वरूपपाशाढ्या
9क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला
10मनोरूपेक्षुकोदण्डा
11पञ्चतन्मात्रसायका

अब अंग-ध्यान आरम्भ होता है, और पहले देवी का अरुण तेज समस्त ब्रह्माण्ड को अपनी बाढ़ में निमग्न कर देता है। फिर दृष्टि मस्तक पर ठहरती है। केश चम्पा, अशोक, पुन्नाग और सौगन्धिक पुष्पों से सुशोभित हैं, उन पर कुरुविन्द मणियों की पंक्तियों से जड़ा दीप्त मुकुट है। ललाट अष्टमी के अर्धचन्द्र-सा देदीप्यमान है, और उस पर कस्तूरी का तिलक मानो मुख-रूपी चन्द्र का कलंक हो।

नाम 12 से 16 · अरुण तेज, केश और ललाट

12निजारुणप्रभापूरमज्जद्ब्रह्माण्डमण्डला
13चम्पकाशोकपुन्नागसौगन्धिकलसत्कचा
14कुरुविन्दमणिश्रेणीकनत्कोटीरमण्डिता
15अष्टमीचन्द्रविभ्राजदलिकस्थलशोभिता
16मुखचन्द्रकलङ्काभमृगनाभिविशेषका

अब भौंह, नेत्र, नासिका और कान। देवी का मुख ही कामदेव का मंगल-गृह है, और भौंहें उस गृह के तोरण-सी झुकी हैं। नेत्र मुख की शोभा-धारा में तैरती मछलियों-से चंचल और कान्तिमान हैं। नासिका नवीन चम्पा-पुष्प-सी सुन्दर है, और उस पर का नासा-आभूषण तारों की कान्ति को भी तिरस्कृत कर देता है। एक कान कदम्ब-मञ्जरी के आभूषण से मनोहारी है, और दोनों कर्णफूल का युगल मानो स्वयं सूर्य और चन्द्र के मण्डल हों।

नाम 17 से 22 · भौंह, नेत्र, नासिका, कर्ण

17वदनस्मरमाङ्गल्यगृहतोरणचिल्लिका
18वक्त्रलक्ष्मीपरीवाहचलन्मीनाभलोचना
19नवचम्पकपुष्पाभनासादण्डविराजिता
20ताराकान्तितिरस्कारिनासाभरणभासुरा
21कदम्बमञ्जरीक्लृप्तकर्णपूरमनोहरा
22ताटङ्कयुगलीभूततपनोडुपमण्डला

कपोल पद्मराग मणि के दर्पण को भी सौन्दर्य में मात कर देते हैं, अधर नवीन मूँगे और बिम्ब-फल की शोभा को भी लज्जित करते हैं, और दन्त-पंक्तियाँ शुद्ध-विद्या के अंकुर-सी उज्ज्वल हैं। मुख से उठती कर्पूर-मिश्रित ताम्बूल की सुगन्ध दिशाओं तक को आकर्षित करती है, और देवी की वाणी की मधुरता सरस्वती की वीणा को भी तिरस्कृत कर देती है। फिर वह मन्द मुस्कान, जिसकी कान्ति में कामेश्वर शिव का मन तक निमग्न हो जाता है। और ठुड्डी की शोभा ऐसी है कि उसकी उपमा किसी से दी ही नहीं जा सकती।

नाम 23 से 29 · कपोल, अधर, वाणी, मुस्कान

23पद्मरागशिलादर्शपरिभाविकपोलभूः
24नवविद्रुमबिम्बश्रीन्यक्कारिरदनच्छदा
25शुद्धविद्याङ्कुराकारद्विजपङ्क्तिद्वयोज्ज्वला
26कर्पूरवीटिकामोदसमाकर्षिदिगन्तरा
27निजसल्लापमाधुर्यविनिर्भर्त्सितकच्छपी
28मन्दस्मितप्रभापूरमज्जत्कामेशमानसा
29अनाकलितसादृश्यचिबुकश्रीविराजिता

कण्ठ कामेश्वर के बाँधे मंगल-सूत्र से सुशोभित है, भुजाएँ स्वर्ण के अंगद और केयूर से सजी हैं, और गले में रत्नजटित ग्रैवेयक और मोती के लोलक वाला हार है। आगे का वर्णन कवि की लज्जाशील दृष्टि का है। देवी का वक्ष कामेश्वर के दिए प्रेम-रूपी रत्न के प्रत्युत्तर में अर्पित है, और नाभि से उठती रोम-लता के दो फलों-सा प्रतीत होता है। फिर कटि इतनी सूक्ष्म है कि वह दृष्टि से प्रायः ओझल है; उसका होना केवल इस तर्क से जाना जाता है कि उस रोम-लता का आधार कहीं तो होगा। भास्करराय जी इस सूक्ष्मता में देवी के उस स्वरूप का संकेत देखते हैं जो स्थूल दृष्टि की पकड़ से परे है। उदर की तीन रेखाएँ मानो वक्ष-भार से झुकती कटि को सँभालने वाला पट्ट हों, कटि-प्रदेश उगते सूर्य-सा अरुण कुसुम्भ-रंजित वस्त्र से दीप्त है, और उस पर रत्नजटित घुँघरुओं वाली मनोहर करधनी है।

नाम 30 से 38 · कण्ठ, भुजा, वक्ष, कटि

30कामेशबद्धमाङ्गल्यसूत्रशोभितकन्धरा
31कनकाङ्गदकेयूरकमनीयभुजान्विता
32रत्नग्रैवेयचिन्ताकलोलमुक्ताफलान्विता
33कामेश्वरप्रेमरत्नमणिप्रतिपणस्तनी
34नाभ्यालवालरोमालिलताफलकुचद्वयी
35लक्ष्यरोमलताधारतासमुन्नेयमध्यमा
36स्तनभारदलन्मध्यपट्टबन्धवलित्रया
37अरुणारुणकौसुम्भवस्त्रभास्वत्कटीतटी
38रत्नकिङ्किणिकारम्यरशनादामभूषिता

अब ध्यान चरणों की ओर उतरता है। ऊरु-युगल का सौभाग्य और कोमलता केवल कामेश्वर ही जानते हैं, दोनों जानु माणिक्य के मुकुट के आकार-से सुशोभित हैं, और पिण्डलियाँ कामदेव के रत्नजटित तूणीर-सी दीप्त हैं। टखने सुडौलता में छिपे हुए हैं, चरणों का उभार कूर्म की पीठ की चिकनाई और सौन्दर्य को भी जीत लेता है, और चरण-नखों की दीप्ति प्रणाम करते भक्तों के अज्ञान-अन्धकार को पूर्णतः ढक देती है। दोनों चरणों की प्रभा कमल को भी कान्ति में पराजित कर देती है, और वे श्रीचरण-कमल मधुर रुनझुन करते मणिमय नूपुरों से सुशोभित हैं।

नाम 39 से 46 · ऊरु से श्रीचरण तक

39कामेशज्ञातसौभाग्यमार्दवोरुद्वयान्विता
40माणिक्यमकुटाकारजानुद्वयविराजिता
41इन्द्रगोपपरिक्षिप्तस्मरतूणाभजङ्घिका
42गूढगुल्फा
43कूर्मपृष्ठजयिष्णुप्रपदान्विता
44नखदीधितिसंछन्ननमज्जनतमोगुणा
45पदद्वयप्रभाजालपराकृतसरोरुहा
46शिञ्जानमणिमञ्जिरमण्डितश्रीपदाम्बुजा

अब अंग-ध्यान पूर्ण होकर समग्र स्वरूप पर लौटता है। देवी की चाल हंसिनी-सी मन्द और कोमल है, वे महान् लावण्य की निधि हैं, सर्वथा अरुण-वर्ण हैं, और उनका अंग-अंग निर्दोष तथा वन्दनीय है। समस्त आभूषणों से सुशोभित वे काम के विजेता शिव-कामेश्वर की गोद में विराजती हैं, और स्वयं कल्याण की दात्री शिवा हैं, शिव की शक्ति। यहाँ अद्वैत का संकेत है, जिनके वल्लभ शिव सदा उन्हीं के अधीन रहते हैं।

नाम 47 से 54 · गति, लावण्य, शिव की संगिनी

47मरालीमन्दगमना
48महालावण्यशेवधिः
49सर्वारुणा
50अनवद्याङ्गी
51सर्वाभरणभूषिता
52शिवकामेश्वराङ्कस्था
53शिवा
54स्वाधीनवल्लभा

अब वर्णन देवी के निवास-स्थानों पर ठहरता है, जो श्रीचक्र-नगरी का ध्यान है। वे सुमेरु पर्वत के मध्य शिखर पर, उस मंगलमय श्रीनगर की नायिका के रूप में, चिन्तामणि से बने भवन के भीतर विराजती हैं। उनका आसन पाँच ब्रह्मों, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव से बना है। वे महान् कमल-वन के मध्य, कदम्ब-वन में, और अमृत के सागर के मध्य निवास करती हैं। और वे कामाक्षी हैं, जिनके नेत्र अभिलाषा जगाते हैं, तथा कामदायिनी, जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करती हैं।

नाम 55 से 63 · श्रीनगर और निवास-स्थान

55सुमेरुमध्यशृङ्गस्था
56श्रीमन्नगरनायिका
57चिन्तामणिगृहान्तस्था
58पञ्चब्रह्मासनस्थिता
59महापद्माटवीसंस्था
60कदम्बवनवासिनी
61सुधासागरमध्यस्था
62कामाक्षी
63कामदायिनी

अब वही कथा लौटती है जिससे आरम्भ हुआ था, भण्डासुर का संग्राम। देवों और ऋषियों के समूह जिनके आत्म-वैभव की स्तुति करते हैं, वही देवी अब भण्डासुर के वध को उद्यत शक्ति-सेना से युक्त रणभूमि में उतरती हैं। सम्पत्करी शक्ति द्वारा संचालित गज-समूह उन्हें सेवित करता है, अश्वारूढा शक्ति द्वारा संचालित करोड़ों अश्वों की सेना उन्हें घेरे है, और वे समस्त आयुधों से सज्जित चक्रराज नामक रथ पर विराजमान हैं। आगे मन्त्रिणी श्यामला अपने गेयचक्र रथ पर हैं, और दण्डनाथा वाराही अपने किरिचक्र रथ पर देवी से आगे चलती हैं।

नाम 64 से 70 · शक्ति-सेना और तीन रथ

64देवर्षिगणसङ्घातस्तूयमानात्मवैभवा
65भण्डासुरवधोद्युक्तशक्तिसेनासमन्विता
66सम्पत्करीसमारूढसिन्धुरव्रजसेविता
67अश्वारूढाधिष्ठिताश्वकोटिकोटिभिरावृता
68चक्रराजरथारूढसर्वायुधपरिष्कृता
69गेयचक्ररथारूढमन्त्रिणीपरिसेविता
70किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृता

संग्राम तीव्र होता है। ज्वालामालिनी शक्ति देवी की सेना के चारों ओर अग्नि का दुर्ग रच देती है, और उसी के मध्य देवी स्थित रहती हैं। वे अपनी शक्तियों के पराक्रम से हर्षित होती हैं, अपनी नित्या-देवियों के गर्व और शौर्य को देखने को उत्सुक रहती हैं, और बाला देवी जब भण्ड के पुत्रों के वध को उद्यत होती हैं तो उनके पराक्रम से आनन्दित होती हैं। मन्त्रिणी अम्बा जब विषंग का वध करती हैं और वाराही जब विशुक्र के प्राण हरती हैं, तो देवी इन सबके शौर्य से सन्तुष्ट और प्रसन्न होती हैं।

नाम 71 से 76 · अग्नि-दुर्ग और शक्तियों का शौर्य

71ज्वालामालिनिकाक्षिप्तवह्निप्राकारमध्यगा
72भण्डसैन्यवधोद्युक्तशक्तिविक्रमहर्षिता
73नित्यापराक्रमाटोपनिरीक्षणसमुत्सुका
74भण्डपुत्रवधोद्युक्तबालाविक्रमनन्दिता
75मन्त्रिण्यम्बाविरचितविषङ्गवधतोषिता
76विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता

अब विजय का चरम। भण्डासुर ने विघ्न-यन्त्र छोड़ा तो देवी ने कामेश्वर के मुख की ओर दृष्टि-मात्र से श्रीगणेश को प्रकट किया, और महागणेश ने उस यन्त्र को भेद डाला, जिससे देवी अत्यन्त हर्षित हुईं। भण्डासुर के छोड़े प्रत्येक अस्त्र पर देवी प्रत्यस्त्रों की वर्षा करती हैं, और अपने हाथ की अँगुलियों के नखों से नारायण के दसों अवतार प्रकट कर देती हैं। फिर महापाशुपत अस्त्र की अग्नि से असुर-सेना भस्म होती है, और कामेश्वर अस्त्र से स्वयं भण्डासुर तथा उसकी नगरी शून्यका भस्म हो जाती है। ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र आदि देव जिनके वैभव की स्तुति करते हैं, अन्ततः वे ही करुणा-स्वरूप हैं, जो शिव के तीसरे नेत्र की अग्नि से भस्म हुए कामदेव के लिए संजीवनी औषधि बनकर उसे पुनः जीवन देती हैं।

नाम 77 से 84 · विजय और काम का पुनर्जीवन

77कामेश्वरमुखालोककल्पितश्रीगणेश्वरा
78महागणेशनिर्भिन्नविघ्नयन्त्रप्रहर्षिता
79भण्डासुरेन्द्रनिर्मुक्तशस्त्रप्रत्यस्त्रवर्षिणी
80कराङ्गुलिनखोत्पन्ननारायणदशाकृतिः
81महापाशुपतास्त्राग्निनिर्दग्धासुरसैनिका
82कामेश्वरास्त्रनिर्दग्धसभण्डासुरशून्यका
83ब्रह्मोपेन्द्रमहेन्द्रादिदेवसंस्तुतवैभवा
84हरनेत्राग्निसन्दग्धकामसञ्जीवनौषधिः

स्रोत: ब्रह्माण्ड-पुराण, उत्तर-खण्ड, ललितोपाख्यान। मूल पाठ sanskritdocuments.org/doc_devii/lalita1000.itx से।

अनुज्ञप्ति: मूल पाठ सार्वजनिक सम्पत्ति। हिन्दी संगति lulla.net, CC BY-NC 4.0।

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