लुल्ला परिवारLulla Family
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देवीशक्ति, रक्षा और रूपांतरण

ललिता सहस्रनाम, खण्ड 1

श्री ललिता सहस्रनाम · खण्ड एक

देव-कार्य और दिव्य-स्वरूप

नाम एक से चौरासी तक। श्रीमाता से आरम्भ; मस्तक से चरण तक देवी का स्वरूप, श्रीनगर, और भण्डासुर-वध।

ललिता अग्नि-मण्डल के भीतर सिंहासन पर विराजमान हैं, मुकुट पर चन्द्रकला है, हाथों में पाश, अंकुश, इक्षु-धनुष और बाण हैं, नीचे देवता हवन-कुण्ड के पास बैठे हैं।

सहस्रनाम का यह पहला खण्ड चौरासी नामों का है, और इसकी रचना दो स्तरों पर खुलती है। आरम्भ के नाम, एक से ग्यारह तक, ललिता के अवतार-प्रयोजन को कहते हैं, श्रीमाता, श्रीमहाराज्ञी, श्रीमत्सिंहासनेश्वरी। फिर तेरह से छियालीस तक देवी के अंग-स्वरूप का सघन वर्णन है, मस्तक से चलकर श्रीचरणों तक; उसके बाद श्रीनगर में उनका निवास, और चौंसठ से चौरासी तक भण्डासुर का संग्राम।

यह क्रम केवल अलंकार नहीं है। श्रीविद्या-परम्परा में देवी का ध्यान दोनों दिशाओं में किया जाता है, पाद से केश तक और केश से पाद तक। सहस्रनाम मस्तक से चरण की ओर का क्रम चुनता है, और छियालीसवें नाम तक यह यात्रा पूरी हो जाती है।

परम्परागत ध्यान में ललिता स्वर्ण-सिंहासन पर विराजमान हैं। चार भुजाओं में पाश, अंकुश, इक्षु-धनुष और पाँच पुष्प-बाण। ये पाँच पुष्प-बाण पंच-तन्मात्र, अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध के द्योतक हैं। देवी का वर्ण सिन्दूरी, मानो उगता हुआ सूर्य। तीन नेत्र, मस्तक पर चन्द्र-शिखर, और मुख पर मन्द मुस्कान। यह स्वरूप उस ध्यान-श्लोक से आता है जिसका आरम्भ ‘सिन्दूर-अरुण-विग्रहाम्’ से होता है, और जो सहस्रनाम-पाठ से पूर्व बोला जाता है।

ललिता-सहस्रनाम पर सबसे प्रामाणिक टीका भास्करराय जी की ‘सौभाग्य-भास्कर’ है, जो अठारहवीं सदी के आरम्भ में, क़रीब 1729 ई. के आसपास, काशी में रची गयी। भास्करराय जी मूलतः महाराष्ट्र के थे, किन्तु श्रीविद्या-साधना के लिए काशी में आ बसे थे। उनकी टीका इन नामों को तीन स्तरों पर पढ़ती है, स्थूल, सूक्ष्म और कारण। नीचे की प्रत्येक प्रस्तावना उसी दृष्टि से इन नामों के समूह को खोलती है।

इन पहले चौरासी नामों में देवी का यह वर्णन ध्यान की एक रीति है। एक-एक नाम पर ठहर कर पढ़ें तो प्रत्येक अपने आप में एक चित्र है, और सम्पूर्ण समूह को एक साथ देखें तो ललिता का अखण्ड स्वरूप उभरता है। यही रीति आदि शंकराचार्य ने , जहाँ देवी का केश से चरण तक का यह सौन्दर्य-ध्यान विस्तार पाता है। ‘सौंदर्य-लहरी’ और ब्रह्माण्ड-पुराण का यह ललिता-सहस्रनाम, दोनों श्रीविद्या के आधार-ग्रन्थ हैं, और दोनों में देवी का यही ध्यान-स्वरूप एक-सा प्रतिध्वनित होता है।

नाम 1 से 84

आरम्भ ही माता के भाव से होता है। पहला नाम ‘श्री’ और ‘माता’ का मेल है, और भास्करराय जी कहते हैं कि यह एक नाम ही पूरे सहस्रनाम का सार है, क्योंकि माता का भाव सबसे निकट और सबसे करुण है। ऋग्वेद के देवी-सूक्त में देवी स्वयं को सम्पूर्ण जगत् की धात्री कहती हैं, और वही धात्री यहाँ समस्त सृष्टि की महाराज्ञी और परम दिव्य सिंहासन की स्वामिनी भी है। जिसकी आज्ञा से ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त होते हैं, वही यहाँ तीन भावों में नमित होती है।

नाम 1 से 3 · श्रीमाता का त्रिविध भाव

1श्रीमाताश्री और माता का मेल, समस्त सृष्टि की करुणामयी माता; भास्करराय के लिए यही नाम पूरे सहस्रनाम का सार है
2श्रीमहाराज्ञीसमस्त सृष्टि की महाराज्ञी, जिनके शासन में रचा हुआ जगत् जीता है
3श्रीमत्सिंहासनेश्वरीपरम दिव्य सिंहासन की स्वामिनी, जिनकी आज्ञा से ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र अपना कार्य करते हैं

अब अवतार की कथा खुलती है। देवताओं ने जब भण्डासुर के संहार के लिए महायज्ञ किया, तो चित्-रूपी अग्नि के उसी कुण्ड से ललिता प्रकट हुईं। भास्करराय जी इस चिदग्नि को शुद्ध-चैतन्य का प्रतीक मानते हैं, अर्थात् देवी किसी भौतिक मूल से नहीं, स्वयं चैतन्य से उद्भूत हैं। प्रकट होते ही उनका प्रयोजन स्पष्ट है, देवताओं का कार्य पूर्ण करना। और उनकी कान्ति उगते हुए हज़ार सूर्यों की आभा-सी है, वही अरुण तेज जो ध्यान-श्लोक में देवी के विग्रह को सिन्दूरी कहता है, और जिसे भास्करराय जी आत्मा के स्वयंप्रकाश का प्रतीक मानते हैं।

नाम 4 से 6 · चित्-अग्नि से प्रकट

4चिदग्निकुण्डसम्भूताचित् रूपी अग्नि के कुण्ड से प्रकट; भास्करराय के अनुसार शुद्ध चैतन्य से उद्भूत, किसी भौतिक मूल से नहीं
5देवकार्यसमुद्यतादेवताओं का कार्य पूर्ण करने को उद्यत, भण्डासुर के वध के लिए प्रकट
6उद्यद्भानुसहस्राभाउगते हुए हज़ार सूर्यों सी अरुण आभा वाली

चार भुजाओं में चार आयुध, और भास्करराय जी हर एक को मन की एक वृत्ति से जोड़ते हैं। हाथ में राग का पाश है, अर्थात् इच्छा और आसक्ति को देवी अपने हाथ में बाँधकर साधक के लिए वश में कर लेती हैं। दूसरा आयुध अंकुश क्रोध का रूप है, जो भीतरी विकारों को अंकुश में रखता है। तीसरा गन्ने का धनुष है, जो मन का प्रतीक है, कोमल जान पड़ता है किन्तु इसी से देवी पाँच तन्मात्र-बाण चलाती हैं; यह स्वरूप कामदेव से लिया गया है, जिनके अहंकार के शमन के बाद देवी उनके आयुध स्वयं धारण करती हैं। और चौथा आयुध पाँच पुष्प-बाण, अर्थात् पंच-तन्मात्र, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध, जो पाँचों इन्द्रिय-विषयों को वश में रखते हैं। यह सांख्य और तन्त्र के संगम का सूचक है।

नाम 7 से 11 · चार भुजाएँ, चार आयुध

7चतुर्बाहुसमन्विताचार भुजाओं से युक्त
8रागस्वरूपपाशाढ्याराग अर्थात् इच्छा और आसक्ति ही जिनका पाश है, जिसे वे अपने हाथ में बाँधे रखती हैं
9क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वलाक्रोध के आकार वाले अंकुश से दीप्त, जो भीतरी विकारों को वश में रखता है
10मनोरूपेक्षुकोदण्डामन ही जिनका इक्षु अर्थात् गन्ने का धनुष है
11पञ्चतन्मात्रसायकाशब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध, पाँच तन्मात्र ही जिनके बाण हैं

अब अंग-ध्यान आरम्भ होता है, और पहले देवी का अरुण तेज समस्त ब्रह्माण्ड को अपनी बाढ़ में निमग्न कर देता है। फिर दृष्टि मस्तक पर ठहरती है। केश चम्पा, अशोक, पुन्नाग और सौगन्धिक पुष्पों से सुशोभित हैं, उन पर कुरुविन्द मणियों की पंक्तियों से जड़ा दीप्त मुकुट है। ललाट अष्टमी के अर्धचन्द्र-सा देदीप्यमान है, और उस पर कस्तूरी का तिलक मानो मुख-रूपी चन्द्र का कलंक हो।

नाम 12 से 16 · अरुण तेज, केश और ललाट

12निजारुणप्रभापूरमज्जद्ब्रह्माण्डमण्डलाअपनी अरुण प्रभा की बाढ़ में समस्त ब्रह्माण्ड मण्डल को डुबो देने वाली
13चम्पकाशोकपुन्नागसौगन्धिकलसत्कचाचम्पा, अशोक, पुन्नाग और सौगन्धिक पुष्पों से सुशोभित केश वाली
14कुरुविन्दमणिश्रेणीकनत्कोटीरमण्डिताकुरुविन्द मणियों की पंक्तियों से जड़े दीप्त मुकुट से मण्डित
15अष्टमीचन्द्रविभ्राजदलिकस्थलशोभिताअष्टमी के अर्धचन्द्र सा देदीप्यमान ललाट वाली
16मुखचन्द्रकलङ्काभमृगनाभिविशेषकाजिनका कस्तूरी तिलक मुख रूपी चन्द्र का कलंक सा लगता है

अब भौंह, नेत्र, नासिका और कान। देवी का मुख ही कामदेव का मंगल-गृह है, और भौंहें उस गृह के तोरण-सी झुकी हैं। नेत्र मुख की शोभा-धारा में तैरती मछलियों-से चंचल और कान्तिमान हैं। नासिका नवीन चम्पा-पुष्प-सी सुन्दर है, और उस पर का नासा-आभूषण तारों की कान्ति को भी तिरस्कृत कर देता है। एक कान कदम्ब-मञ्जरी के आभूषण से मनोहारी है, और दोनों कर्णफूल का युगल मानो स्वयं सूर्य और चन्द्र के मण्डल हों।

नाम 17 से 22 · भौंह, नेत्र, नासिका, कर्ण

17वदनस्मरमाङ्गल्यगृहतोरणचिल्लिकाजिनकी भौंहें कामदेव के मंगल गृह रूपी मुख के तोरण हैं
18वक्त्रलक्ष्मीपरीवाहचलन्मीनाभलोचनामुख की शोभा धारा में तैरती चंचल मछलियों से नेत्र वाली
19नवचम्पकपुष्पाभनासादण्डविराजितानवीन चम्पा पुष्प सी सुन्दर नासिका से सुशोभित
20ताराकान्तितिरस्कारिनासाभरणभासुरातारों की कान्ति को भी तिरस्कृत करने वाले नासा आभूषण से दीप्त
21कदम्बमञ्जरीक्लृप्तकर्णपूरमनोहराकदम्ब मञ्जरी के कर्ण आभूषण से मनोहर
22ताटङ्कयुगलीभूततपनोडुपमण्डलाजिनके दोनों कर्णफूल मानो सूर्य और चन्द्र के मण्डल हों

कपोल पद्मराग मणि के दर्पण को भी सौन्दर्य में मात कर देते हैं, अधर नवीन मूँगे और बिम्ब-फल की शोभा को भी लज्जित करते हैं, और दन्त-पंक्तियाँ शुद्ध-विद्या के अंकुर-सी उज्ज्वल हैं। मुख से उठती कर्पूर-मिश्रित ताम्बूल की सुगन्ध दिशाओं तक को आकर्षित करती है, और देवी की वाणी की मधुरता सरस्वती की वीणा को भी तिरस्कृत कर देती है। फिर वह मन्द मुस्कान, जिसकी कान्ति में कामेश्वर शिव का मन तक निमग्न हो जाता है। और ठुड्डी की शोभा ऐसी है कि उसकी उपमा किसी से दी ही नहीं जा सकती।

नाम 23 से 29 · कपोल, अधर, वाणी, मुस्कान

23पद्मरागशिलादर्शपरिभाविकपोलभूःपद्मराग मणि के दर्पण को भी मात करने वाले कपोल वाली
24नवविद्रुमबिम्बश्रीन्यक्कारिरदनच्छदानवीन मूँगे और बिम्ब फल की शोभा को लज्जित करने वाले अधर वाली
25शुद्धविद्याङ्कुराकारद्विजपङ्क्तिद्वयोज्ज्वलाशुद्ध विद्या के अंकुर सी उज्ज्वल दन्त पंक्तियों वाली; भास्करराय शुद्धविद्या से श्रीविद्या का अर्थ लेते हैं
26कर्पूरवीटिकामोदसमाकर्षिदिगन्तराकर्पूर मिश्रित ताम्बूल की सुगन्ध से दिशाओं को आकर्षित करने वाली
27निजसल्लापमाधुर्यविनिर्भर्त्सितकच्छपीअपनी वाणी की मधुरता से सरस्वती की वीणा कच्छपी को भी तिरस्कृत करने वाली
28मन्दस्मितप्रभापूरमज्जत्कामेशमानसाजिनकी मन्द मुस्कान की कान्ति में कामेश्वर का मन निमग्न हो जाता है
29अनाकलितसादृश्यचिबुकश्रीविराजिताजिनकी ठुड्डी की शोभा की कोई उपमा नहीं

कण्ठ कामेश्वर के बाँधे मंगल-सूत्र से सुशोभित है, भुजाएँ स्वर्ण के अंगद और केयूर से सजी हैं, और गले में रत्नजटित ग्रैवेयक और मोती के लोलक वाला हार है। आगे का वर्णन कवि की लज्जाशील दृष्टि का है। देवी का वक्ष कामेश्वर के दिए प्रेम-रूपी रत्न के प्रत्युत्तर में अर्पित है, और नाभि से उठती रोम-लता के दो फलों-सा प्रतीत होता है। फिर कटि इतनी सूक्ष्म है कि वह दृष्टि से प्रायः ओझल है; उसका होना केवल इस तर्क से जाना जाता है कि उस रोम-लता का आधार कहीं तो होगा। भास्करराय जी इस सूक्ष्मता में देवी के उस स्वरूप का संकेत देखते हैं जो स्थूल दृष्टि की पकड़ से परे है। उदर की तीन रेखाएँ मानो वक्ष-भार से झुकती कटि को सँभालने वाला पट्ट हों, कटि-प्रदेश उगते सूर्य-सा अरुण कुसुम्भ-रंजित वस्त्र से दीप्त है, और उस पर रत्नजटित घुँघरुओं वाली मनोहर करधनी है।

नाम 30 से 38 · कण्ठ, भुजा, वक्ष, कटि

30कामेशबद्धमाङ्गल्यसूत्रशोभितकन्धराकामेश्वर के बाँधे मंगल सूत्र से सुशोभित कण्ठ वाली
31कनकाङ्गदकेयूरकमनीयभुजान्वितास्वर्ण के अंगद और केयूर से सजी सुन्दर भुजाओं वाली
32रत्नग्रैवेयचिन्ताकलोलमुक्ताफलान्वितारत्नजटित ग्रैवेयक और मोती के लोलक वाले हार से युक्त
33कामेश्वरप्रेमरत्नमणिप्रतिपणस्तनीजिनका वक्ष कामेश्वर के प्रेम रूपी रत्न के प्रत्युत्तर में अर्पित मूल्य है
34नाभ्यालवालरोमालिलताफलकुचद्वयीनाभि रूपी क्यारी से उठती रोम लता के दो फल सा वक्ष वाली
35लक्ष्यरोमलताधारतासमुन्नेयमध्यमाजिनकी कटि केवल इस अनुमान से जानी जाती है कि रोम लता का कोई आधार होगा
36स्तनभारदलन्मध्यपट्टबन्धवलित्रयावक्ष भार से झुकती कटि को सँभालने वाले पट्ट सी उदर की तीन रेखाओं वाली
37अरुणारुणकौसुम्भवस्त्रभास्वत्कटीतटीउगते सूर्य से अरुण कुसुम्भ रंजित वस्त्र से दीप्त कटि वाली
38रत्नकिङ्किणिकारम्यरशनादामभूषितारत्नजटित घुँघरुओं वाली मनोहर करधनी से भूषित

अब ध्यान चरणों की ओर उतरता है। ऊरु-युगल का सौभाग्य और कोमलता केवल कामेश्वर ही जानते हैं, दोनों जानु माणिक्य के मुकुट के आकार-से सुशोभित हैं, और पिण्डलियाँ कामदेव के रत्नजटित तूणीर-सी दीप्त हैं। टखने सुडौलता में छिपे हुए हैं, चरणों का उभार कूर्म की पीठ की चिकनाई और सौन्दर्य को भी जीत लेता है, और चरण-नखों की दीप्ति प्रणाम करते भक्तों के अज्ञान-अन्धकार को पूर्णतः ढक देती है। दोनों चरणों की प्रभा कमल को भी कान्ति में पराजित कर देती है, और वे श्रीचरण-कमल मधुर रुनझुन करते मणिमय नूपुरों से सुशोभित हैं।

नाम 39 से 46 · ऊरु से श्रीचरण तक

39कामेशज्ञातसौभाग्यमार्दवोरुद्वयान्विताजिनके ऊरु युगल का सौभाग्य और कोमलता केवल कामेश्वर जानते हैं
40माणिक्यमकुटाकारजानुद्वयविराजितामाणिक्य के मुकुट के आकार से सुशोभित दोनों जानु वाली
41इन्द्रगोपपरिक्षिप्तस्मरतूणाभजङ्घिकाइन्द्रगोप मणियों से जड़े कामदेव के तूणीर सी दीप्त पिण्डलियों वाली
42गूढगुल्फासुडौलता में छिपे टखनों वाली
43कूर्मपृष्ठजयिष्णुप्रपदान्विताकूर्म की पीठ को भी जीत लेने वाले चरण उभार वाली
44नखदीधितिसंछन्ननमज्जनतमोगुणाजिनके चरण नखों की दीप्ति प्रणाम करते भक्तों के अज्ञान अन्धकार को ढक देती है
45पदद्वयप्रभाजालपराकृतसरोरुहाजिनके दोनों चरणों की प्रभा कमल को भी पराजित कर देती है
46शिञ्जानमणिमञ्जिरमण्डितश्रीपदाम्बुजारुनझुन करते मणिमय नूपुरों से मण्डित श्रीचरण कमल वाली

अब अंग-ध्यान पूर्ण होकर समग्र स्वरूप पर लौटता है। देवी की चाल हंसिनी-सी मन्द और कोमल है, वे महान् लावण्य की निधि हैं, सर्वथा अरुण-वर्ण हैं, और उनका अंग-अंग निर्दोष तथा वन्दनीय है। समस्त आभूषणों से सुशोभित वे काम के विजेता शिव-कामेश्वर की गोद में विराजती हैं, और स्वयं कल्याण की दात्री शिवा हैं, शिव की शक्ति। यहाँ अद्वैत का संकेत है, जिनके वल्लभ शिव सदा उन्हीं के अधीन रहते हैं।

नाम 47 से 54 · गति, लावण्य, शिव की संगिनी

47मरालीमन्दगमनाहंसिनी सी मन्द और कोमल चाल वाली
48महालावण्यशेवधिःमहान् लावण्य की निधि
49सर्वारुणासर्वथा अरुण वर्ण वाली, वस्त्र, आभूषण और पुष्प तक अरुण
50अनवद्याङ्गीजिनका अंग अंग निर्दोष और वन्दनीय है
51सर्वाभरणभूषितासमस्त आभूषणों से सुशोभित
52शिवकामेश्वराङ्कस्थाकाम के विजेता शिव कामेश्वर की गोद में विराजमान
53शिवाकल्याण की दात्री, शिव की शक्ति; भास्करराय के अनुसार स्वयं परम शिव की इच्छा
54स्वाधीनवल्लभाजिनके वल्लभ शिव सदा उन्हीं के अधीन रहते हैं

अब वर्णन देवी के निवास-स्थानों पर ठहरता है, जो श्रीचक्र-नगरी का ध्यान है। वे सुमेरु पर्वत के मध्य शिखर पर, उस मंगलमय श्रीनगर की नायिका के रूप में, चिन्तामणि से बने भवन के भीतर विराजती हैं। उनका आसन पाँच ब्रह्मों, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव से बना है। वे महान् कमल-वन के मध्य, कदम्ब-वन में, और अमृत के सागर के मध्य निवास करती हैं। और वे कामाक्षी हैं, जिनके नेत्र अभिलाषा जगाते हैं, तथा कामदायिनी, जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करती हैं।

नाम 55 से 63 · श्रीनगर और निवास-स्थान

55सुमेरुमध्यशृङ्गस्थासुमेरु पर्वत के मध्य शिखर पर विराजमान
56श्रीमन्नगरनायिकामंगलमय श्रीनगर की नायिका
57चिन्तामणिगृहान्तस्थाचिन्तामणि से बने भवन के भीतर विराजमान
58पञ्चब्रह्मासनस्थिताब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव, पाँच ब्रह्मों से बने आसन पर स्थित
59महापद्माटवीसंस्थामहान् कमल वन के मध्य निवास करने वाली
60कदम्बवनवासिनीकदम्ब वन में निवास करने वाली
61सुधासागरमध्यस्थाअमृत के सागर के मध्य स्थित
62कामाक्षीजिनके नेत्र अभिलाषा जगाते हैं; कांची की अधिष्ठात्री देवी का यही विशेष नाम है
63कामदायिनीसमस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली

अब वही कथा लौटती है जिससे आरम्भ हुआ था, भण्डासुर का संग्राम। देवों और ऋषियों के समूह जिनके आत्म-वैभव की स्तुति करते हैं, वही देवी अब भण्डासुर के वध को उद्यत शक्ति-सेना से युक्त रणभूमि में उतरती हैं। सम्पत्करी शक्ति द्वारा संचालित गज-समूह उन्हें सेवित करता है, अश्वारूढा शक्ति द्वारा संचालित करोड़ों अश्वों की सेना उन्हें घेरे है, और वे समस्त आयुधों से सज्जित चक्रराज नामक रथ पर विराजमान हैं। आगे मन्त्रिणी श्यामला अपने गेयचक्र रथ पर हैं, और दण्डनाथा वाराही अपने किरिचक्र रथ पर देवी से आगे चलती हैं।

नाम 64 से 70 · शक्ति-सेना और तीन रथ

64देवर्षिगणसङ्घातस्तूयमानात्मवैभवादेवों और ऋषियों के समूह जिनके आत्म वैभव की स्तुति करते हैं
65भण्डासुरवधोद्युक्तशक्तिसेनासमन्विताभण्डासुर के वध को उद्यत शक्ति सेना से युक्त
66सम्पत्करीसमारूढसिन्धुरव्रजसेवितासम्पत्करी शक्ति द्वारा संचालित गज समूह से सेवित
67अश्वारूढाधिष्ठिताश्वकोटिकोटिभिरावृताअश्वारूढा शक्ति द्वारा संचालित करोड़ों अश्वों से घिरी
68चक्रराजरथारूढसर्वायुधपरिष्कृताचक्रराज रथ पर विराजमान, समस्त आयुधों से सज्जित
69गेयचक्ररथारूढमन्त्रिणीपरिसेवितागेयचक्र रथ पर आरूढ़ मन्त्रिणी श्यामला से सेवित
70किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृताकिरिचक्र रथ पर आरूढ़ दण्डनाथा वाराही जिनके आगे चलती हैं

संग्राम तीव्र होता है। ज्वालामालिनी शक्ति देवी की सेना के चारों ओर अग्नि का दुर्ग रच देती है, और उसी के मध्य देवी स्थित रहती हैं। वे अपनी शक्तियों के पराक्रम से हर्षित होती हैं, अपनी नित्या-देवियों के गर्व और शौर्य को देखने को उत्सुक रहती हैं, और बाला देवी जब भण्ड के पुत्रों के वध को उद्यत होती हैं तो उनके पराक्रम से आनन्दित होती हैं। मन्त्रिणी अम्बा जब विषंग का वध करती हैं और वाराही जब विशुक्र के प्राण हरती हैं, तो देवी इन सबके शौर्य से सन्तुष्ट और प्रसन्न होती हैं।

नाम 71 से 76 · अग्नि-दुर्ग और शक्तियों का शौर्य

71ज्वालामालिनिकाक्षिप्तवह्निप्राकारमध्यगाज्वालामालिनी के रचे अग्नि दुर्ग के मध्य स्थित
72भण्डसैन्यवधोद्युक्तशक्तिविक्रमहर्षिताभण्ड की सेना के वध को उद्यत शक्तियों के पराक्रम से हर्षित
73नित्यापराक्रमाटोपनिरीक्षणसमुत्सुकानित्या देवियों के पराक्रम का गर्व देखने को उत्सुक
74भण्डपुत्रवधोद्युक्तबालाविक्रमनन्दिताभण्ड के पुत्रों के वध को उद्यत बाला देवी के पराक्रम से आनन्दित
75मन्त्रिण्यम्बाविरचितविषङ्गवधतोषितामन्त्रिणी अम्बा द्वारा किए विषंग के वध से सन्तुष्ट
76विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिताविशुक्र के प्राण हरने वाली वाराही के शौर्य से आनन्दित

अब विजय का चरम। भण्डासुर ने विघ्न-यन्त्र छोड़ा तो देवी ने कामेश्वर के मुख की ओर दृष्टि-मात्र से श्रीगणेश को प्रकट किया, और महागणेश ने उस यन्त्र को भेद डाला, जिससे देवी अत्यन्त हर्षित हुईं। भण्डासुर के छोड़े प्रत्येक अस्त्र पर देवी प्रत्यस्त्रों की वर्षा करती हैं, और अपने हाथ की अँगुलियों के नखों से नारायण के दसों अवतार प्रकट कर देती हैं। फिर महापाशुपत अस्त्र की अग्नि से असुर-सेना भस्म होती है, और कामेश्वर अस्त्र से स्वयं भण्डासुर तथा उसकी नगरी शून्यका भस्म हो जाती है। ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र आदि देव जिनके वैभव की स्तुति करते हैं, अन्ततः वे ही करुणा-स्वरूप हैं, जो शिव के तीसरे नेत्र की अग्नि से भस्म हुए कामदेव के लिए संजीवनी औषधि बनकर उसे पुनः जीवन देती हैं।

नाम 77 से 84 · विजय और काम का पुनर्जीवन

77कामेश्वरमुखालोककल्पितश्रीगणेश्वराकामेश्वर के मुख की ओर दृष्टि मात्र से श्रीगणेश को प्रकट करने वाली
78महागणेशनिर्भिन्नविघ्नयन्त्रप्रहर्षितामहागणेश द्वारा विघ्न यन्त्र के भेदे जाने से अत्यन्त हर्षित
79भण्डासुरेन्द्रनिर्मुक्तशस्त्रप्रत्यस्त्रवर्षिणीभण्डासुर के छोड़े हर अस्त्र पर प्रत्यस्त्रों की वर्षा करने वाली
80कराङ्गुलिनखोत्पन्ननारायणदशाकृतिःजिनके हाथ की अँगुलियों के नखों से नारायण के दस अवतार प्रकट हुए
81महापाशुपतास्त्राग्निनिर्दग्धासुरसैनिकामहापाशुपत अस्त्र की अग्नि से असुर सेना को भस्म करने वाली
82कामेश्वरास्त्रनिर्दग्धसभण्डासुरशून्यकाकामेश्वर अस्त्र से भण्डासुर सहित उसकी नगरी शून्यका को भस्म करने वाली
83ब्रह्मोपेन्द्रमहेन्द्रादिदेवसंस्तुतवैभवाब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि देव जिनके वैभव की स्तुति करते हैं
84हरनेत्राग्निसन्दग्धकामसञ्जीवनौषधिःशिव के नेत्र की अग्नि से भस्म हुए कामदेव के लिए संजीवनी औषधि

स्रोत: ब्रह्माण्ड-पुराण, उत्तर-खण्ड, ललितोपाख्यान। मूल पाठ sanskritdocuments.org/doc_devii/lalita1000.itx से।

अनुज्ञप्ति: मूल पाठ सार्वजनिक सम्पत्ति। हिन्दी संगति lulla.net, CC BY-NC 4.0।