साधक से सम्बन्ध
नाम छह सौ एक से सात सौ तक। उन नेत्रों से, जो करुणा से काँपते हैं, उस सत्-चित्-आनन्द तक, जहाँ श्रीविद्या और वेदान्त एक हो जाते हैं।

इस खण्ड के नाम बताते हैं कि देवी साधक के अनुभव में किस-किस रूप में उतरती हैं। कहीं वे आदिशक्ति हैं, समस्त सृष्टि का मूल कारण; कहीं ज्ञानदा, जो आत्म-ज्ञान देती हैं; और अन्त में सच्चिदानन्द-रूपिणी, जिनका स्वरूप ही सत्-चित्-आनन्द है। एक-एक नाम साधक और देवी के बीच की दूरी को घटाता जाता है।
श्रीविद्या की परम्परा में यह सम्बन्ध एक प्रकार की प्रेम-वार्ता के रूप में देखा गया है। आचार्य अभिनवगुप्त ने अपने तन्त्रालोक में कहा है कि साधना का चरम स्तर वही है जहाँ साधक देवी से पृथक् नहीं रह जाता। यहाँ देवी मातृ-भाव से अधिक गुरु-भाव में प्रकट होती हैं; साधक शिष्य की भाँति बैठा रहता है, और वे उसे एक-एक मन्त्र-स्तर से ऊपर उठाती जाती हैं।
इन्हीं नामों में दण्ड-नीति, मुद्रा, योग और समाधि जैसे शब्द आते हैं, जो राज-शास्त्र और योग-शास्त्र के संगम के सूचक हैं। भारतीय चिन्तन में राज-धर्म और मोक्ष-धर्म कभी पृथक् धाराएँ नहीं रहीं। लक्ष्मीधर पण्डित की पन्द्रहवीं शताब्दी की टीका, जो इस सहस्रनाम की प्राचीनतम टीकाओं में से है, इन नामों को श्रीविद्या-साधना के चरण-दर-चरण निर्देश के रूप में पढ़ती है। आगे भास्कर-राय की सौभाग्य-भास्कर टीका इसी अर्थ-परम्परा को और प्रौढ़ करती है।
खण्ड का आरम्भ देवी के मुख से होता है, मानो साधक सबसे पहले उनकी दृष्टि के सम्मुख आता है। उनके दीर्घ नेत्र करुणा से किंचित् काँपते हुए चंचल रहते हैं, और उनका मुख मन्द हास से उज्ज्वल और प्रसन्न रहता है। यही पहली कृपा है, जिससे शेष सारी यात्रा खुलती है।
नाम 601 से 602 · पहली दृष्टि
अब देवी गुरु-रूप में सामने आती हैं। वे स्वयं गुरु का स्वरूप धारण करती हैं, समस्त शुभ गुणों की निधि हैं, और मनोरथ पूर्ण करने वाली कामधेनु सुरभि के रूप में प्रकट हुईं। वे कार्तिकेय की जननी हैं, समस्त देवों की ईश्वरी और रक्षिका हैं। फिर एक गहरा मोड़ आता है: वे दण्ड-नीति में, अर्थात् न्याय और शासन की व्यवस्था में, अविचल रूप से प्रतिष्ठित हैं। भास्कर-राय के अनुसार राज-शास्त्र की दण्ड-नीति देवी का ही स्वरूप है; धर्म और शासन का सन्तुलन उन्हीं की मर्यादा से चलता है। और साथ ही वे हृदय-गुहा के उस सूक्ष्म आकाश के रूप में विद्यमान हैं जिसे छान्दोग्य की दहर-विद्या आत्म-तत्त्व कहती है। बाहर शासन, भीतर आत्मा, दोनों एक ही देवी।
नाम 603 से 609 · गुरु, न्याय और हृदय-गुहा
इसके बाद नाम समय और कला की ओर मुड़ते हैं। देवी प्रतिपदा से पूर्णिमा तक की समस्त तिथियों के मण्डल में पूजित हैं; वे समस्त कलाओं के रूप में विद्यमान हैं और उन्हीं कलाओं की स्वामिनी भी। काव्य के आलाप-श्रवण में वे आनन्द लेती हैं, और उनकी सेवा में चँवर लिये वाम भाग में लक्ष्मी और दक्षिण भाग में सरस्वती उपस्थित रहती हैं। ऐश्वर्य और वाणी, दोनों उनकी सेविका बनकर खड़ी हैं।
नाम 610 से 614 · तिथि, कला और दो सेविकाएँ
अब स्वर ऊँचा होता है और देवी का परम स्वरूप खुलता है। वे आदिशक्ति हैं, वही पराशक्ति जो समस्त विश्व का मूल कारण है, अपरिमेय, किसी प्रमाण से न नापी जाने वाली। वे समस्त प्राणियों में अन्तर्व्याप्त आत्मा हैं, परम तत्त्व, पावन करने वाला स्वरूप, अनेक करोड़ ब्रह्माण्डों की जननी, और दिव्य विग्रह वाली। वे काम-बीज ‘क्लीं’ अक्षर के रूप में प्रकट होती हैं, फिर भी केवल अर्थात् परिपूर्ण, स्वतन्त्र और निरुपाधि रहती हैं। वे गुह्य रूप से गुरु-मुख से रहस्य की भाँति जानी जाती हैं, और वही कैवल्य अर्थात् मोक्ष का पद प्रदान करती हैं।
नाम 615 से 625 · आदिशक्ति और कैवल्य
यहाँ से तीन की महिमा गूँजती है। वे त्रिपुरा हैं, ब्रह्मा, विष्णु और शिव, इन तीनों से भी पूर्ववर्ती; तीन पुरों अर्थात् त्रिविध तत्त्वों की अधिष्ठात्री। वे तीनों लोकों से वन्दित हैं, त्रिमूर्ति का समष्टि-रूप, देवताओं की ईश्वरी, और प्रणव के तीन अक्षरों अकार-उकार-मकार से बना स्वरूप। फिर वही परम तत्त्व सगुण रूप में सजता है: दिव्य गन्ध से समृद्ध, और ललाट पर सिन्दूर के तिलक से सुशोभित।
नाम 626 से 632 · त्रिपुरा और प्रणव
अब वही परा-शक्ति परिचित मुख में आती हैं। वे उमा अर्थात् पार्वती हैं, पर्वतराज हिमवान् की पुत्री, गौर वर्ण वाली गौरी, जिनकी सेवा गन्धर्वगण करते हैं। और साथ ही उनका विराट् रूप भी खुलता है: उनके गर्भ में समस्त विश्व समाया हुआ है, वे हिरण्यगर्भ की भी आधार-शक्ति हैं, अधर्म का नाश करने वाली, और समस्त वाणी की अधीश्वरी। हिमालय की पुत्री और ब्रह्माण्ड का गर्भ, एक ही साथ।
नाम 633 से 640 · गौरी और विश्वगर्भा
अब नाम ज्ञान की ओर भीतर मुड़ते हैं। वे ध्यान के द्वारा ही प्राप्त होती हैं, असीम हैं जिनकी सीमा का निर्धारण सम्भव नहीं। वे आत्म-ज्ञान प्रदान करती हैं, ज्ञान की साक्षात् मूर्ति हैं, समस्त वेदान्त के द्वारा जानी जाने योग्य हैं, और जिनका स्वरूप सत्य और आनन्द है। श्रीविद्या के एक प्रमुख आम्नाय की ऋषि लोपामुद्रा से वे अर्चित हैं, और केवल लीला-मात्र से उन्होंने समस्त ब्रह्माण्ड-मण्डल रच डाला। अन्त में एक सूक्ष्म पलटा आता है: वे इन्द्रियों से दृष्टिगोचर नहीं होतीं, समस्त दृश्य से रहित केवल द्रष्टा-स्वरूप हैं, सबको जानने वाली विज्ञात्री, और फिर ज्ञान-स्वरूप होने से स्वयं ज्ञेय से परे हो जाती हैं। पहले वे ज्ञाता थीं, अब वे जानने योग्य किसी विषय की अपेक्षा ही नहीं रखतीं।
नाम 641 से 652 · ज्ञानदा और द्रष्टा-स्वरूप
अब योग का स्वर मुखर होता है। वे परा-शिव से नित्य संयुक्त योगिनी हैं, योग की सामर्थ्य प्रदान करने वाली, सब प्रकार के योग के योग्य आश्रय, और योग से प्राप्त होने वाले आनन्द का स्वरूप। भास्कर-राय कहते हैं कि योगी जिस परमानन्द में स्थित होता है, वह देवी का ही स्वरूप है। वे युगों को धारण करती हैं, और भास्कर-राय इसे साधक को योग-मार्ग में स्थिर रखने वाली शक्ति के रूप में भी पढ़ते हैं। फिर एक सूत्र में सारा तन्त्र समा जाता है: वे इच्छा-शक्ति, ज्ञान-शक्ति और क्रिया-शक्ति, इन तीनों के स्वरूप में विद्यमान हैं।
नाम 653 से 658 · योगिनी और तीन शक्तियाँ
अब अद्वैत की गहराई खुलती है। वे समस्त का आधार हैं, अपने स्वरूप में सुदृढ़ प्रतिष्ठित, सत् और असत् दोनों के रूप धारण करने वाली, अष्ट-मूर्ति, और अज्ञान-रूपी माया पर विजय पाने वाली। वे लोकों की समस्त गतिविधि का संचालन करती हैं, फिर भी अद्वितीय एकमात्र रहती हैं। वे भूमा अर्थात् छान्दोग्य की भूमा-विद्या वाली अनन्त, असीम पूर्णता हैं, जिनमें द्वैत का लेश भी नहीं, जो द्वैत से सर्वथा रहित हैं। यहाँ श्रीविद्या और अद्वैत-वेदान्त एक ही दिशा में बहने लगते हैं।
नाम 659 से 668 · भूमा और अद्वैत
अब देवी पालन और ब्रह्म-तत्त्व दोनों में फैलती हैं। वे समस्त प्राणियों को अन्न देने वाली अन्नदा हैं, धन-सम्पदा देने वाली वसुदा, सबसे प्राचीन सनातन वृद्धा, और जिनका स्वरूप ब्रह्म और आत्मा की एकता है। वे विशाल बृहती हैं, सत्त्व-गुण-प्रधान ब्राह्मणी, वाणी की अधिष्ठात्री ब्राह्मी, और सदा ब्रह्मानन्द में निमग्न। उन्हें नैवेद्य-समर्पण प्रिय है, वे समस्त भाषा के रूप में प्रकट हैं, उनकी सेना विशाल है, और अन्त में वे भाव और अभाव दोनों से परे हैं।
नाम 669 से 680 · अन्नदा से भावातीत तक
अब खण्ड का राज-स्वर उठता है, जहाँ देवी राजराजेश्वरी के रूप में सजती हैं। उनकी आराधना सुगमता से हो जाती है, वे कल्याण करने वाली शुभकरी हैं, और उनकी प्राप्ति का मार्ग उज्ज्वल और सुलभ है। फिर वही परम ऐश्वर्य-रूप: वे राजाओं और सम्राटों की भी ईश्वरी हैं, राज्य और अधिकार देने वाली, समस्त राज्यों की रक्षिका। उनकी कृपा सबको मोहित करती हुई देदीप्यमान रहती है, और वे अपने शरणागतों को राज-सिंहासन पर ही प्रतिष्ठित कर देती हैं। वे राज्य की समृद्धि-रूपा राज्यलक्ष्मी हैं, कोश की स्वामिनी, चतुरंगिणी सेना की अधीश्वरी, साम्राज्य का दान करने वाली, और सत्य-प्रतिज्ञ, जिनका संकल्प कभी मिथ्या नहीं होता।
नाम 681 से 693 · राजराजेश्वरी
खण्ड का समापन देवी की विराट् मर्यादा और फिर परम तत्त्व पर होता है। समुद्र-वलयित पृथ्वी ही उनकी मेखला अर्थात् करधनी है; वे भक्तों के उद्धार के व्रत में दीक्षित हैं, दैत्यों और दुष्ट शक्तियों का शमन करने वाली, समस्त लोकों को वश में रखने वाली, और समस्त अभीष्ट अर्थ प्रदान करने वाली। वे विश्व की सृजन-शक्ति, गायत्री-रूपा सावित्री हैं। और ठीक सात-सौवें स्थान पर वह सूत्र आता है जिसमें श्रीविद्या और अद्वैत पूर्णतः एक हो जाते हैं: सच्चिदानन्द-रूपिणी, जिनका स्वरूप सत्-चित्-आनन्द है। तैत्तिरीय की ब्रह्मानन्द-वल्ली से अनुस्यूत यह नाम पराकाष्ठा है, और इसके आगे के नाम प्रायः वेदान्त की ही शब्दावली में चलते हैं।