लुल्ला परिवारLulla Family
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देवीशक्ति, रक्षा और रूपांतरण

ललिता सहस्रनाम, खण्ड 7

श्री ललिता सहस्रनाम · खण्ड सात

साधक से सम्बन्ध

नाम छह सौ एक से सात सौ तक। उन नेत्रों से, जो करुणा से काँपते हैं, उस सत्-चित्-आनन्द तक, जहाँ श्रीविद्या और वेदान्त एक हो जाते हैं।

एक साधक हाथ जोड़े घुटनों के बल बैठे हैं और सामने सिंहासन पर ललिता विराजमान हैं, दाहिनी ओर श्वेत गौ है और नीचे दीप और कमल रखे हैं।

इस खण्ड के नाम बताते हैं कि देवी साधक के अनुभव में किस-किस रूप में उतरती हैं। कहीं वे आदिशक्ति हैं, समस्त सृष्टि का मूल कारण; कहीं ज्ञानदा, जो आत्म-ज्ञान देती हैं; और अन्त में सच्चिदानन्द-रूपिणी, जिनका स्वरूप ही सत्-चित्-आनन्द है। एक-एक नाम साधक और देवी के बीच की दूरी को घटाता जाता है।

श्रीविद्या की परम्परा में यह सम्बन्ध एक प्रकार की प्रेम-वार्ता के रूप में देखा गया है। यहाँ देवी मातृ-भाव से अधिक गुरु-भाव में प्रकट होती हैं; साधक शिष्य की भाँति बैठा रहता है, और वे उसे एक-एक मन्त्र-स्तर से ऊपर उठाती जाती हैं।

इन्हीं नामों में दण्ड-नीति, मुद्रा, योग और समाधि जैसे शब्द आते हैं, जो राज-शास्त्र और योग-शास्त्र के संगम के सूचक हैं। भारतीय चिन्तन में राज-धर्म और मोक्ष-धर्म कभी पृथक् धाराएँ नहीं रहीं। इन नामों की अर्थ-संगति भास्कर-राय की सौभाग्य-भास्कर टीका के अनुसार चलती है, जो श्रीविद्या-परम्परा में इस सहस्रनाम की सबसे प्रसिद्ध टीका है।

खण्ड का आरम्भ देवी के मुख से होता है, मानो साधक सबसे पहले उनकी दृष्टि के सम्मुख आता है। उनके दीर्घ नेत्र करुणा से किंचित् काँपते हुए चंचल रहते हैं, और उनका मुख मन्द हास से उज्ज्वल और प्रसन्न रहता है। यही पहली कृपा है, जिससे शेष सारी यात्रा खुलती है।

नाम 601 से 602 · पहली दृष्टि

601दरान्दोलितदीर्घाक्षीकरुणा से किंचित् काँपते चंचल दीर्घ नेत्रों वाली; भास्करराय के अनुसार यह दृष्टि भक्तों का भय हर लेती है
602दरहासोज्ज्वलन्मुखीमन्द हास से उज्ज्वल मुख वाली

अब देवी गुरु-रूप में सामने आती हैं। वे स्वयं गुरु का स्वरूप धारण करती हैं, समस्त शुभ गुणों की निधि हैं, और मनोरथ पूर्ण करने वाली कामधेनु सुरभि के रूप में प्रकट हुईं। वे कार्तिकेय की जननी हैं, समस्त देवों की ईश्वरी और रक्षिका हैं। फिर एक गहरा मोड़ आता है: वे दण्ड-नीति में, अर्थात् न्याय और शासन की व्यवस्था में, अविचल रूप से प्रतिष्ठित हैं। भास्कर-राय के अनुसार राज-शास्त्र की दण्ड-नीति देवी का ही स्वरूप है; धर्म और शासन का सन्तुलन उन्हीं की मर्यादा से चलता है। और साथ ही वे हृदय-गुहा के उस सूक्ष्म आकाश के रूप में विद्यमान हैं जिसे छान्दोग्य की दहर-विद्या आत्म-तत्त्व कहती है। बाहर शासन, भीतर आत्मा, दोनों एक ही देवी।

नाम 603 से 609 · गुरु, न्याय और हृदय-गुहा

603गुरुमूर्तिःस्वयं गुरु का स्वरूप धारण करने वाली
604गुणनिधिःसमस्त शुभ गुणों की निधि
605गोमातागौओं की माता, मनोरथ पूर्ण करने वाली कामधेनु सुरभि
606गुहजन्मभूःगुह अर्थात् कार्तिकेय की जननी
607देवेशीसमस्त देवों की ईश्वरी और रक्षिका
608दण्डनीतिस्थादण्डनीति में अविचल प्रतिष्ठित; भास्करराय के अनुसार यह नीति दण्ड और सान्त्वना से लोगों को मार्ग पर लाती है
609दहराकाशरूपिणीहृदय गुहा के सूक्ष्म आकाश का रूप, जिसे छान्दोग्य की दहर विद्या आत्म तत्त्व कहती है

इसके बाद नाम समय और कला की ओर मुड़ते हैं। देवी प्रतिपदा से पूर्णिमा तक की समस्त तिथियों के मण्डल में पूजित हैं; वे समस्त कलाओं के रूप में विद्यमान हैं और उन्हीं कलाओं की स्वामिनी भी। काव्य के आलाप-श्रवण में वे आनन्द लेती हैं, और उनकी सेवा में चँवर लिये वाम भाग में लक्ष्मी और दक्षिण भाग में सरस्वती उपस्थित रहती हैं। ऐश्वर्य और वाणी, दोनों उनकी सेविका बनकर खड़ी हैं।

नाम 610 से 614 · तिथि, कला और दो सेविकाएँ

610प्रतिपन्मुख्यराकान्ततिथिमण्डलपूजिताप्रतिपदा से पूर्णिमा तक की तिथियों के मण्डल में पूजित; भास्करराय के अनुसार उन तिथियों की नित्या देवियों के द्वारा
611कलात्मिकासमस्त कलाओं के रूप में विद्यमान, अग्नि, सूर्य और चन्द्र की कलाओं सहित
612कलानाथाउन्हीं कलाओं की स्वामिनी
613काव्यालापविनोदिनीकाव्य के आलाप और श्रवण में आनन्द लेने वाली
614सचामररमावाणीसव्यदक्षिणसेविताचँवर लिये वाम भाग में लक्ष्मी और दक्षिण भाग में सरस्वती के द्वारा सेवित

अब स्वर ऊँचा होता है और देवी का परम स्वरूप खुलता है। वे आदिशक्ति हैं, वही पराशक्ति जो समस्त विश्व का मूल कारण है, अपरिमेय, किसी प्रमाण से न नापी जाने वाली। वे समस्त प्राणियों में अन्तर्व्याप्त आत्मा हैं, परम तत्त्व, पावन करने वाला स्वरूप, अनेक करोड़ ब्रह्माण्डों की जननी, और दिव्य विग्रह वाली। वे काम-बीज ‘क्लीं’ अक्षर के रूप में प्रकट होती हैं, फिर भी केवल अर्थात् परिपूर्ण, स्वतन्त्र और निरुपाधि रहती हैं। वे गुह्य रूप से गुरु-मुख से रहस्य की भाँति जानी जाती हैं, और वही कैवल्य अर्थात् मोक्ष का पद प्रदान करती हैं।

नाम 615 से 625 · आदिशक्ति और कैवल्य

615आदिशक्तिःसमस्त विश्व का मूल कारण आदिशक्ति
616अमेयाअपरिमेय, किसी प्रमाण से न नापी जाने वाली
617आत्मासमस्त प्राणियों में अन्तर्व्याप्त आत्मा; भास्करराय के अनुसार यहाँ जीव, और अगला नाम परमात्मा
618परमापरम तत्त्व, सबसे ऊपर
619पावनाकृतिःपावन करने वाले स्वरूप वाली
620अनेककोटिब्रह्माण्डजननीअनेक करोड़ ब्रह्माण्डों की जननी
621दिव्यविग्रहादिव्य विग्रह, दिव्य देह वाली
622क्लीङ्कारीकाम बीज क्लीं अक्षर के रूप में प्रकट
623केवलाकेवल, परिपूर्ण, स्वतन्त्र और निरुपाधि
624गुह्यागुह्य, गुरु मुख से रहस्य की भाँति जानी जाने वाली
625कैवल्यपददायिनीकैवल्य अर्थात् मोक्ष का पद देने वाली

यहाँ से तीन की महिमा गूँजती है। वे त्रिपुरा हैं, ब्रह्मा, विष्णु और शिव, इन तीनों से भी पूर्ववर्ती; तीन पुरों अर्थात् त्रिविध तत्त्वों की अधिष्ठात्री। वे तीनों लोकों से वन्दित हैं, त्रिमूर्ति का समष्टि-रूप, देवताओं की ईश्वरी, और प्रणव के तीन अक्षरों अकार-उकार-मकार से बना स्वरूप। फिर वही परम तत्त्व सगुण रूप में सजता है: दिव्य गन्ध से समृद्ध, और ललाट पर सिन्दूर के तिलक से सुशोभित।

नाम 626 से 632 · त्रिपुरा और प्रणव

626त्रिपुराब्रह्मा, विष्णु और शिव से भी पूर्ववर्ती, तीन पुरों की अधिष्ठात्री
627त्रिजगद्वन्द्यातीनों लोकों से वन्दित
628त्रिमूर्तिःब्रह्मा, विष्णु और शिव, त्रिमूर्ति का समष्टि रूप
629त्रिदशेश्वरीत्रिदश अर्थात् देवताओं की ईश्वरी
630त्र्यक्षरिप्रणव के तीन अक्षरों अ, उ, म से बना स्वरूप; भास्करराय इन्हें पंचदशी के तीन कूटों के बीज पढ़ते हैं
631दिव्यगन्धाढ्यादिव्य गन्ध से समृद्ध
632सिन्दूरतिलकाञ्चिताललाट पर सिन्दूर के तिलक से सुशोभित

अब वही परा-शक्ति परिचित मुख में आती हैं। वे उमा अर्थात् पार्वती हैं, पर्वतराज हिमवान् की पुत्री, गौर वर्ण वाली गौरी, जिनकी सेवा गन्धर्वगण करते हैं। और साथ ही उनका विराट् रूप भी खुलता है: उनके गर्भ में समस्त विश्व समाया हुआ है, वे हिरण्यगर्भ की भी आधार-शक्ति हैं, अधर्म का नाश करने वाली, और समस्त वाणी की अधीश्वरी। हिमालय की पुत्री और ब्रह्माण्ड का गर्भ, एक ही साथ।

नाम 633 से 640 · गौरी और विश्वगर्भा

633उमाउमा अर्थात् पार्वती; भास्करराय के अनुसार तप को जाती पुत्री को रोकती माँ की पुकार भी, उ मा
634शैलेन्द्रतनयापर्वतराज हिमवान् की पुत्री
635गौरीगौर वर्ण वाली गौरी
636गन्धर्वसेवितागन्धर्वगण के द्वारा सेवित
637विश्वगर्भाजिनके गर्भ में समस्त विश्व समाया है
638स्वर्णगर्भाहिरण्यगर्भ की भी आधार शक्ति, स्वर्ण गर्भ वाली
639अवरदाअधर्म और अधर्मी असुरों का दमन करने वाली
640वागधीश्वरीसमस्त वाणी की अधीश्वरी

अब नाम ज्ञान की ओर भीतर मुड़ते हैं। वे ध्यान के द्वारा ही प्राप्त होती हैं, असीम हैं जिनकी सीमा का निर्धारण सम्भव नहीं। वे आत्म-ज्ञान प्रदान करती हैं, ज्ञान की साक्षात् मूर्ति हैं, समस्त वेदान्त के द्वारा जानी जाने योग्य हैं, और जिनका स्वरूप सत्य और आनन्द है। श्रीविद्या के एक प्रमुख आम्नाय की ऋषि लोपामुद्रा से वे अर्चित हैं, और केवल लीला-मात्र से उन्होंने समस्त ब्रह्माण्ड-मण्डल रच डाला। अन्त में एक सूक्ष्म पलटा आता है: वे इन्द्रियों से दृष्टिगोचर नहीं होतीं, समस्त दृश्य से रहित केवल द्रष्टा-स्वरूप हैं, सबको जानने वाली विज्ञात्री, और फिर ज्ञान-स्वरूप होने से स्वयं ज्ञेय से परे हो जाती हैं। पहले वे ज्ञाता थीं, अब वे जानने योग्य किसी विषय की अपेक्षा ही नहीं रखतीं।

नाम 641 से 652 · ज्ञानदा और द्रष्टा-स्वरूप

641ध्यानगम्याध्यान के द्वारा ही प्राप्त होने वाली
642अपरिच्छेद्याअसीम, जिनकी सीमा देश और काल से तय नहीं होती
643ज्ञानदाआत्म ज्ञान देने वाली
644ज्ञानविग्रहाज्ञान की साक्षात् मूर्ति, ज्ञान ही जिनका विग्रह है
645सर्ववेदान्तसंवेद्यासमस्त वेदान्त के द्वारा जानी जाने योग्य
646सत्यानन्दस्वरूपिणीजिनका स्वरूप सत्य और आनन्द है
647लोपामुद्रार्चिताअगस्त्य की पत्नी, श्रीविद्या के एक आम्नाय की ऋषि लोपामुद्रा के द्वारा अर्चित
648लीलाकॢप्तब्रह्माण्डमण्डलाकेवल लीला मात्र से समस्त ब्रह्माण्ड मण्डल रच देने वाली
649अदृश्याइन्द्रियों से दृष्टिगोचर न होने वाली
650दृश्यरहितासमस्त दृश्य से रहित, केवल द्रष्टा स्वरूप
651विज्ञात्रीसबको जानने वाली विज्ञात्री
652वेद्यवर्जिताज्ञान स्वरूप होने से ज्ञेय से परे, जानने योग्य किसी विषय की अपेक्षा नहीं

अब योग का स्वर मुखर होता है। वे परा-शिव से नित्य संयुक्त योगिनी हैं, योग की सामर्थ्य प्रदान करने वाली, सब प्रकार के योग के योग्य आश्रय, और योग से प्राप्त होने वाले आनन्द का स्वरूप। भास्कर-राय कहते हैं कि योगी जिस परमानन्द में स्थित होता है, वह देवी का ही स्वरूप है। वे युगों को धारण करती हैं, और भास्कर-राय इसे साधक को योग-मार्ग में स्थिर रखने वाली शक्ति के रूप में भी पढ़ते हैं। फिर एक सूत्र में सारा तन्त्र समा जाता है: वे इच्छा-शक्ति, ज्ञान-शक्ति और क्रिया-शक्ति, इन तीनों के स्वरूप में विद्यमान हैं।

नाम 653 से 658 · योगिनी और तीन शक्तियाँ

653योगिनीपरशिव से नित्य संयुक्त योगिनी
654योगदायोग की सामर्थ्य प्रदान करने वाली
655योग्यासब प्रकार के योग के योग्य आश्रय
656योगानन्दायोग से मिलने वाले आनन्द का स्वरूप; भास्करराय के अनुसार शिव और शक्ति का साझा सार ही वह योग है
657युगन्धरायुगों को धारण करने वाली; जैसे बैल जुआ उठाता है, वैसे समस्त विश्व को उठाने वाली
658इच्छाशक्तिज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिस्वरूपिणीइच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति, इन तीनों के स्वरूप में विद्यमान

अब अद्वैत की गहराई खुलती है। वे समस्त का आधार हैं, अपने स्वरूप में सुदृढ़ प्रतिष्ठित, सत् और असत् दोनों के रूप धारण करने वाली, अष्ट-मूर्ति, और अज्ञान-रूपी माया पर विजय पाने वाली। वे लोकों की समस्त गतिविधि का संचालन करती हैं, फिर भी अद्वितीय एकमात्र रहती हैं। वे भूमा अर्थात् छान्दोग्य की भूमा-विद्या वाली अनन्त, असीम पूर्णता हैं, जिनमें द्वैत का लेश भी नहीं, जो द्वैत से सर्वथा रहित हैं। यहाँ श्रीविद्या और अद्वैत-वेदान्त एक ही दिशा में बहने लगते हैं।

नाम 659 से 668 · भूमा और अद्वैत

659सर्वाधारासमस्त जगत् का आधार
660सुप्रतीष्ठाअपने स्वरूप में सुदृढ़ प्रतिष्ठित
661सदसद्रूपधारिणीसत् और असत् दोनों के रूप धारण करने वाली; भास्करराय के अनुसार सत् ब्रह्म, असत् जगत्
662अष्टमूर्तिःअष्ट मूर्ति, आठ रूपों वाली
663अजाजेत्रीअजा अर्थात् अज्ञान रूपी माया पर विजय पाने वाली
664लोकयात्रविधायिनीलोकों की समस्त गतिविधि का संचालन करने वाली
665एकाकिनीअद्वितीय, जिनका कोई दूसरा नहीं
666भूमरूपाछान्दोग्य की भूमा विद्या वाली अनन्त, असीम पूर्णता
667निर्द्वैताजिनमें द्वैत का लेश भी नहीं
668द्वैतवर्जिताद्वैत से सर्वथा रहित

अब देवी पालन और ब्रह्म-तत्त्व दोनों में फैलती हैं। वे समस्त प्राणियों को अन्न देने वाली अन्नदा हैं, धन-सम्पदा देने वाली वसुदा, सबसे प्राचीन सनातन वृद्धा, और जिनका स्वरूप ब्रह्म और आत्मा की एकता है। वे विशाल बृहती हैं, सत्त्व-गुण-प्रधान ब्राह्मणी, वाणी की अधिष्ठात्री ब्राह्मी, और सदा ब्रह्मानन्द में निमग्न। उन्हें नैवेद्य-समर्पण प्रिय है, वे समस्त भाषा के रूप में प्रकट हैं, उनकी सेना विशाल है, और अन्त में वे भाव और अभाव दोनों से परे हैं।

नाम 669 से 680 · अन्नदा से भावातीत तक

669अन्नदासमस्त प्राणियों को अन्न देने वाली
670वसुदाधन सम्पदा देने वाली
671वृद्धासबसे प्राचीन, सनातन
672ब्रह्मात्मैक्यस्वरूपिणीब्रह्म और आत्मा की एकता ही जिनका स्वरूप है
673बृहतीविशाल और बृहत् स्वरूपा
674ब्राह्मणीसत्त्व गुण प्रधान ब्राह्मणी
675ब्राह्मीवाणी की अधिष्ठात्री ब्राह्मी
676ब्रह्मानन्दासदा ब्रह्मानन्द में निमग्न
677बलिप्रियाजिन्हें नैवेद्य और बलि का समर्पण प्रिय है
678भाषारूपासमस्त भाषाओं के रूप में प्रकट
679बृहत्सेनाविशाल सेना वाली
680भावाभावविवर्जिताभाव और अभाव दोनों से परे

अब खण्ड का राज-स्वर उठता है, जहाँ देवी राजराजेश्वरी के रूप में सजती हैं। उनकी आराधना सुगमता से हो जाती है, वे कल्याण करने वाली शुभकरी हैं, और उनकी प्राप्ति का मार्ग उज्ज्वल और सुलभ है। फिर वही परम ऐश्वर्य-रूप: वे राजाओं और सम्राटों की भी ईश्वरी हैं, राज्य और अधिकार देने वाली, समस्त राज्यों की रक्षिका। उनकी कृपा सबको मोहित करती हुई देदीप्यमान रहती है, और वे अपने शरणागतों को राज-सिंहासन पर ही प्रतिष्ठित कर देती हैं। वे राज्य की समृद्धि-रूपा राज्यलक्ष्मी हैं, कोश की स्वामिनी, चतुरंगिणी सेना की अधीश्वरी, साम्राज्य का दान करने वाली, और सत्य-प्रतिज्ञ, जिनका संकल्प कभी मिथ्या नहीं होता।

नाम 681 से 693 · राजराजेश्वरी

681सुखाराध्याजिनकी आराधना सुगमता से हो जाती है
682शुभकरीकल्याण करने वाली
683शोभनासुलभागतिःजिनकी प्राप्ति का मार्ग उज्ज्वल और सुलभ है
684राजराजेश्वरीराजाओं और सम्राटों की भी ईश्वरी
685राज्यदायिनीराज्य और अधिकार देने वाली
686राज्यवल्लभासमस्त राज्यों की प्रिय रक्षिका
687राजत्कृपाजिनकी कृपा सबको मोहित करती हुई देदीप्यमान रहती है
688राजपीठनिवेशितनिजाश्रिताअपने शरणागतों को राज सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर देने वाली
689राज्यलक्ष्मीराज्य की समृद्धि रूपा राज्यलक्ष्मी
690कोशनाथाकोश की स्वामिनी; भास्करराय के अनुसार अन्नमय आदि पाँच कोशों की भी
691चतुरङ्गबलेश्वरीचतुरंगिणी सेना की अधीश्वरी
692साम्राज्यदायिनीसाम्राज्य का दान करने वाली
693सत्यसन्धासत्य प्रतिज्ञ, जिनका संकल्प कभी मिथ्या नहीं होता

खण्ड का समापन देवी की विराट् मर्यादा और फिर परम तत्त्व पर होता है। समुद्र-वलयित पृथ्वी ही उनकी मेखला अर्थात् करधनी है; वे भक्तों के उद्धार के व्रत में दीक्षित हैं, दैत्यों और दुष्ट शक्तियों का शमन करने वाली, समस्त लोकों को वश में रखने वाली, और समस्त अभीष्ट अर्थ प्रदान करने वाली। वे विश्व की सृजन-शक्ति, गायत्री-रूपा सावित्री हैं। और ठीक सात-सौवें स्थान पर वह सूत्र आता है जिसमें श्रीविद्या और अद्वैत पूर्णतः एक हो जाते हैं: सच्चिदानन्द-रूपिणी, जिनका स्वरूप सत्-चित्-आनन्द है। तैत्तिरीय की ब्रह्मानन्द-वल्ली से अनुस्यूत यह नाम पराकाष्ठा है, और इसके आगे के नाम प्रायः वेदान्त की ही शब्दावली में चलते हैं।

नाम 694 से 700 · सागरमेखला से सच्चिदानन्द तक

694सागरमेखलासमुद्र से वलयित पृथ्वी ही जिनकी मेखला है
695दीक्षिताभक्तों के उद्धार के व्रत में दीक्षित
696दैत्यशमनीदैत्यों और दुष्ट शक्तियों का शमन करने वाली
697सर्वलोकवशङ्करीसमस्त लोकों को वश में रखने वाली
698सर्वार्थदात्रीसमस्त अभीष्ट अर्थ प्रदान करने वाली
699सावित्रीविश्व की सृजन शक्ति, गायत्री रूपा सावित्री
700सच्चिदानन्दरूपिणीजिनका स्वरूप सत्, चित् और आनन्द है

स्रोत: ब्रह्माण्ड-पुराण, उत्तर-खण्ड, ललितोपाख्यान। अर्थ-संगति भास्कर-राय की सौभाग्य-भास्कर टीका के अनुसार। मूल पाठ sanskritdocuments.org/doc_devii/lalita1000.itx से।

अनुज्ञप्ति: मूल पाठ सार्वजनिक-स्वत्व (पब्लिक डोमेन) में है। हिन्दी संगति lulla.net, CC BY-NC 4.0।