लुल्ला परिवारLulla Family
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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

राग बिहागड़ा

राग · M1-M5

राग बिहागड़ा

रात की धुन, ध्यान और एकांत की।

बिहागड़ा रात्रि के मध्य का राग है। आसपास के बिहाग राग का यह एक छोटा भाई-जैसा है, जो हिंदुस्तानी शास्त्रीय में अधिक प्रसिद्ध है।

स्वर में एक धीरज है, गहरापन है। एकांत में सुनने वाला सुर। पंजाब की कीर्तन-परम्परा में बिहागड़ा की रचनाएँ अक्सर रात की संगति में गायी जाती हैं।

"दूतन संगरीआ ॥" बिहागड़ा M5
इस राग के सब अंग

इस राग के शबद

हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।

महला 1 (2)
  1. कली अंदरि नानका जिंनां दा अउतारु ॥अंग 556
  2. हिंदू मूले भूले अखुटी जांही ॥अंग 556
महला 3 (32)
  1. गुर सेवा ते सुखु पाईऐ होर थै सुखु न भालि ॥अंग 548
  2. सिफति खजाना बखस है जिसु बखसै सो खरचै खाइ ॥अंग 548
  3. नानक गिआनी जगु जीता जगि जीता सभु कोइ ॥अंग 548
  4. तिन॑ भउ संसा किआ करे जिन सतिगुरु सिरि करतारु ॥अंग 549
  5. गुरमुखि सचै भावदे दरि सचै सचिआर ॥अंग 549
  6. गुर की सेवा चाकरी भै रचि कार कमाइ ॥अंग 549
  7. मनि परतीति न आईआ सहजि न लगो भाउ ॥अंग 549
  8. आपणा आपु न पछाणै मूड़ा अवरा आखि दुखाए ॥अंग 549
  9. सा रसना जलि जाउ जिनि हरि का सुआउ न पाइआ ॥अंग 550
  10. सा रसना जलि जाउ जिनि हरि का नाउ विसारिआ ॥अंग 550
  11. दरवेसी को जाणसी विरला को दरवेसु ॥अंग 550
  12. नानक तरवरु एकु फलु दुइ पंखेरू आहि ॥अंग 550
  13. करम धरम सभि बंधना पाप पुंन सनबंधु ॥अंग 551
  14. गुरमुखि प्रभु सेवहि सद साचा अनदिनु सहजि पिआरि ॥अंग 551
  15. कहिऐ कथिऐ न पाईऐ अनदिनु रहै सदा गुण गाइ ॥अंग 551
  16. सेखा अंदरहु जोरु छडि तू भउ करि झलु गवाइ ॥अंग 551
  17. सतिगुर की सेवा सफल है जे को करे चितु लाइ ॥अंग 552
  18. नामि रता सतिगुरू है कलिजुग बोहिथु होइ ॥अंग 552
  19. इकि सतिगुर की सेवा करहि चाकरी हरि नामे लगै पिआरु ॥अंग 552
  20. एहा संधिआ परवाणु है जितु हरि प्रभु मेरा चिति आवै ॥अंग 553
  21. प्रिउ प्रिउ करती सभु जगु फिरी मेरी पिआस न जाइ ॥अंग 553
  22. नानक बिनु सतिगुर भेटे जगु अंधु है अंधे करम कमाइ ॥अंग 554
  23. सतिगुरू फुरमाइआ कारी एह करेहु ॥अंग 554
  24. माणसु भरिआ आणिआ माणसु भरिआ आइ ॥अंग 554
  25. इहु जगतु जीवतु मरै जा इस नो सोझी होइ ॥अंग 554
  26. किआ जाणा किव मरहगे कैसा मरणा होइ ॥अंग 555
  27. रामु रामु करता सभु जगु फिरै रामु न पाइआ जाइ ॥अंग 555
  28. ए मन इहु धनु नामु है जितु सदा सदा सुखु होइ ॥अंग 555
  29. हउमै विचि जगतु मुआ मरदो मरदा जाइ ॥अंग 555
  30. धुरि खसमै का हुकमु पइआ विणु सतिगुर चेतिआ न जाइ ॥अंग 556
  31. सभु किछु हुकमे आवदा सभु किछु हुकमे जाइ ॥अंग 556
  32. सो जोगी जुगति सो पाए जिस नो गुरमुखि नामु परापति होइ ॥अंग 556
महला 4 (29)
  1. हरि हरि नामु धिआईऐ मेरी जिंदुड़ीए गुरमुखि नामु अमोले राम ॥अंग 537
  2. अंम्रितु हरि हरि नामु है मेरी जिंदुड़ीए अंम्रितु गुरमति पाए राम ॥अंग 538
  3. जगि सुक्रितु कीरति नामु है मेरी जिंदुड़ीए हरि कीरति हरि मनि धारे राम ॥अंग 539
  4. हउ बलिहारी तिन॑ कउ मेरी जिंदुड़ीए जिन॑ हरि हरि नामु अधारो राम ॥अंग 539
  5. जिन हरि हरि नामु न चेतिओ मेरी जिंदुड़ीए ते मनमुख मूड़ इआणे राम ॥अंग 540
  6. सभि जीअ तेरे तूं वरतदा मेरे हरि प्रभ तूं जाणहि जो जीइ कमाईऐ राम ॥अंग 541
  7. सभ तेरी तू सभस दा सभ तुधु उपाइआ ॥अंग 548
  8. जीअ जंत सभि तेरिआ तू सभना रासि ॥अंग 549
  9. तेरी वडिआई तूहै जाणदा तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥अंग 549
  10. जिस दै चिति वसिआ मेरा सुआमी तिस नो किउ अंदेसा किसै गलै दा लोड़ीऐ ॥अंग 550
  11. हरि आपे ठाकुरु सेवकु भगतु हरि आपे करे कराए ॥अंग 550
  12. आपे धरती आपे है राहकु आपि जंमाइ पीसावै ॥अंग 550
  13. अंधे चानणु ता थीऐ जा सतिगुरु मिलै रजाइ ॥अंग 551
  14. जदहु आपे थाटु कीआ बहि करतै तदहु पुछि न सेवकु बीआ ॥अंग 551
  15. आपे वेद पुराण सभि सासत आपि कथै आपि भीजै ॥अंग 551
  16. आपि समुंदु आपि है सागरु आपे ही विचि रतन धरे ॥अंग 552
  17. आपे पारसु आपि धातु है आपि कीतोनु कंचनु ॥अंग 552
  18. बिनु सतिगुर सेवे जीअ के बंधना जेते करम कमाहि ॥अंग 552
  19. आपे चाटसाल आपि है पाधा आपे चाटड़े पड़ण कउ आणे ॥अंग 552
  20. आपे सिव संकर महेसा आपे गुरमुखि अकथ कहाणी ॥अंग 553
  21. आपे तंतु परम तंतु सभु आपे आपे ठाकुरु दासु भइआ ॥अंग 553
  22. आपे अठसठि तीरथ करता आपि करे इसनानु ॥अंग 554
  23. आपे भार अठारह बणसपति आपे ही फल लाए ॥अंग 554
  24. जिस दा कीता सभु किछु होवै तिस नो परवाह नाही किसै केरी ॥अंग 554
  25. जा आपि क्रिपालु होवै हरि सुआमी ता आपणां नाउ हरि आपि जपावै ॥अंग 555
  26. आपे सभ घट अंदरे आपे ही बाहरि ॥अंग 555
  27. आपे दानां बीनिआ आपे परधानां ॥अंग 556
  28. सभु किहु तेरै वसि है तू सचा साहु ॥अंग 556
  29. आपे जंत उपाइअनु आपे आधारु ॥अंग 556
महला 5 (11)
  1. दूतन संगरीआ ॥अंग 537
  2. अति प्रीतम मन मोहना घट सोहना प्रान अधारा राम ॥अंग 542
  3. करि किरपा गुर पारब्रहम पूरे अनदिनु नामु वखाणा राम ॥अंग 543
  4. वधु सुखु रैनड़ीए प्रिअ प्रेमु लगा ॥अंग 544
  5. हरि चरण सरोवर तह करहु निवासु मना ॥अंग 544
  6. खोजत संत फिरहि प्रभ प्राण अधारे राम ॥अंग 545
  7. अन काए रातड़िआ वाट दुहेली राम ॥अंग 546
  8. सुनहु बेनंतीआ सुआमी मेरे राम ॥अंग 547
  9. बोलि सुधरमीड़िआ मोनि कत धारी राम ॥अंग 547
  10. हरि नामु न सिमरहि साधसंगि तै तनि उडै खेह ॥अंग 553
  11. घटि वसहि चरणारबिंद रसना जपै गुपाल ॥अंग 554
महला 9 (1)
  1. हरि की गति नहि कोऊ जानै ॥अंग 537
भगत कबीर जी (1)
  1. कबीरा मरता मरता जगु मुआ मरि भि न जानै कोइ ॥अंग 555
अन्य भगत (3)
  1. छका 1 ॥अंग 541
  2. कलि कलवाली कामु मदु मनूआ पीवणहारु ॥अंग 553
  3. मरदाना 1 ॥अंग 553

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