राग बिहागड़ा
रात की धुन, ध्यान और एकांत की।
बिहागड़ा रात्रि के मध्य का राग है। आसपास के बिहाग राग का यह एक छोटा भाई-जैसा है, जो हिंदुस्तानी शास्त्रीय में अधिक प्रसिद्ध है।
स्वर में एक धीरज है, गहरापन है। एकांत में सुनने वाला सुर। पंजाब की कीर्तन-परम्परा में बिहागड़ा की रचनाएँ अक्सर रात की संगति में गायी जाती हैं।
"दूतन संगरीआ ॥" बिहागड़ा M5
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 1 (2)
महला 3 (32)
- गुर सेवा ते सुखु पाईऐ होर थै सुखु न भालि ॥अंग 548
- सिफति खजाना बखस है जिसु बखसै सो खरचै खाइ ॥अंग 548
- नानक गिआनी जगु जीता जगि जीता सभु कोइ ॥अंग 548
- तिन॑ भउ संसा किआ करे जिन सतिगुरु सिरि करतारु ॥अंग 549
- गुरमुखि सचै भावदे दरि सचै सचिआर ॥अंग 549
- गुर की सेवा चाकरी भै रचि कार कमाइ ॥अंग 549
- मनि परतीति न आईआ सहजि न लगो भाउ ॥अंग 549
- आपणा आपु न पछाणै मूड़ा अवरा आखि दुखाए ॥अंग 549
- सा रसना जलि जाउ जिनि हरि का सुआउ न पाइआ ॥अंग 550
- सा रसना जलि जाउ जिनि हरि का नाउ विसारिआ ॥अंग 550
- दरवेसी को जाणसी विरला को दरवेसु ॥अंग 550
- नानक तरवरु एकु फलु दुइ पंखेरू आहि ॥अंग 550
- करम धरम सभि बंधना पाप पुंन सनबंधु ॥अंग 551
- गुरमुखि प्रभु सेवहि सद साचा अनदिनु सहजि पिआरि ॥अंग 551
- कहिऐ कथिऐ न पाईऐ अनदिनु रहै सदा गुण गाइ ॥अंग 551
- सेखा अंदरहु जोरु छडि तू भउ करि झलु गवाइ ॥अंग 551
- सतिगुर की सेवा सफल है जे को करे चितु लाइ ॥अंग 552
- नामि रता सतिगुरू है कलिजुग बोहिथु होइ ॥अंग 552
- इकि सतिगुर की सेवा करहि चाकरी हरि नामे लगै पिआरु ॥अंग 552
- एहा संधिआ परवाणु है जितु हरि प्रभु मेरा चिति आवै ॥अंग 553
- प्रिउ प्रिउ करती सभु जगु फिरी मेरी पिआस न जाइ ॥अंग 553
- नानक बिनु सतिगुर भेटे जगु अंधु है अंधे करम कमाइ ॥अंग 554
- सतिगुरू फुरमाइआ कारी एह करेहु ॥अंग 554
- माणसु भरिआ आणिआ माणसु भरिआ आइ ॥अंग 554
- इहु जगतु जीवतु मरै जा इस नो सोझी होइ ॥अंग 554
- किआ जाणा किव मरहगे कैसा मरणा होइ ॥अंग 555
- रामु रामु करता सभु जगु फिरै रामु न पाइआ जाइ ॥अंग 555
- ए मन इहु धनु नामु है जितु सदा सदा सुखु होइ ॥अंग 555
- हउमै विचि जगतु मुआ मरदो मरदा जाइ ॥अंग 555
- धुरि खसमै का हुकमु पइआ विणु सतिगुर चेतिआ न जाइ ॥अंग 556
- सभु किछु हुकमे आवदा सभु किछु हुकमे जाइ ॥अंग 556
- सो जोगी जुगति सो पाए जिस नो गुरमुखि नामु परापति होइ ॥अंग 556
महला 4 (29)
- हरि हरि नामु धिआईऐ मेरी जिंदुड़ीए गुरमुखि नामु अमोले राम ॥अंग 537
- अंम्रितु हरि हरि नामु है मेरी जिंदुड़ीए अंम्रितु गुरमति पाए राम ॥अंग 538
- जगि सुक्रितु कीरति नामु है मेरी जिंदुड़ीए हरि कीरति हरि मनि धारे राम ॥अंग 539
- हउ बलिहारी तिन॑ कउ मेरी जिंदुड़ीए जिन॑ हरि हरि नामु अधारो राम ॥अंग 539
- जिन हरि हरि नामु न चेतिओ मेरी जिंदुड़ीए ते मनमुख मूड़ इआणे राम ॥अंग 540
- सभि जीअ तेरे तूं वरतदा मेरे हरि प्रभ तूं जाणहि जो जीइ कमाईऐ राम ॥अंग 541
- सभ तेरी तू सभस दा सभ तुधु उपाइआ ॥अंग 548
- जीअ जंत सभि तेरिआ तू सभना रासि ॥अंग 549
- तेरी वडिआई तूहै जाणदा तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥अंग 549
- जिस दै चिति वसिआ मेरा सुआमी तिस नो किउ अंदेसा किसै गलै दा लोड़ीऐ ॥अंग 550
- हरि आपे ठाकुरु सेवकु भगतु हरि आपे करे कराए ॥अंग 550
- आपे धरती आपे है राहकु आपि जंमाइ पीसावै ॥अंग 550
- अंधे चानणु ता थीऐ जा सतिगुरु मिलै रजाइ ॥अंग 551
- जदहु आपे थाटु कीआ बहि करतै तदहु पुछि न सेवकु बीआ ॥अंग 551
- आपे वेद पुराण सभि सासत आपि कथै आपि भीजै ॥अंग 551
- आपि समुंदु आपि है सागरु आपे ही विचि रतन धरे ॥अंग 552
- आपे पारसु आपि धातु है आपि कीतोनु कंचनु ॥अंग 552
- बिनु सतिगुर सेवे जीअ के बंधना जेते करम कमाहि ॥अंग 552
- आपे चाटसाल आपि है पाधा आपे चाटड़े पड़ण कउ आणे ॥अंग 552
- आपे सिव संकर महेसा आपे गुरमुखि अकथ कहाणी ॥अंग 553
- आपे तंतु परम तंतु सभु आपे आपे ठाकुरु दासु भइआ ॥अंग 553
- आपे अठसठि तीरथ करता आपि करे इसनानु ॥अंग 554
- आपे भार अठारह बणसपति आपे ही फल लाए ॥अंग 554
- जिस दा कीता सभु किछु होवै तिस नो परवाह नाही किसै केरी ॥अंग 554
- जा आपि क्रिपालु होवै हरि सुआमी ता आपणां नाउ हरि आपि जपावै ॥अंग 555
- आपे सभ घट अंदरे आपे ही बाहरि ॥अंग 555
- आपे दानां बीनिआ आपे परधानां ॥अंग 556
- सभु किहु तेरै वसि है तू सचा साहु ॥अंग 556
- आपे जंत उपाइअनु आपे आधारु ॥अंग 556
महला 5 (11)
- दूतन संगरीआ ॥अंग 537
- अति प्रीतम मन मोहना घट सोहना प्रान अधारा राम ॥अंग 542
- करि किरपा गुर पारब्रहम पूरे अनदिनु नामु वखाणा राम ॥अंग 543
- वधु सुखु रैनड़ीए प्रिअ प्रेमु लगा ॥अंग 544
- हरि चरण सरोवर तह करहु निवासु मना ॥अंग 544
- खोजत संत फिरहि प्रभ प्राण अधारे राम ॥अंग 545
- अन काए रातड़िआ वाट दुहेली राम ॥अंग 546
- सुनहु बेनंतीआ सुआमी मेरे राम ॥अंग 547
- बोलि सुधरमीड़िआ मोनि कत धारी राम ॥अंग 547
- हरि नामु न सिमरहि साधसंगि तै तनि उडै खेह ॥अंग 553
- घटि वसहि चरणारबिंद रसना जपै गुपाल ॥अंग 554
महला 9 (1)
- हरि की गति नहि कोऊ जानै ॥अंग 537
भगत कबीर जी (1)
अन्य भगत (3)
- छका 1 ॥अंग 541
- कलि कलवाली कामु मदु मनूआ पीवणहारु ॥अंग 553
- मरदाना 1 ॥अंग 553