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अंग 555

अंग
555
राग Bihaagraa
राग: Bihaagraa · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जि तुध नो सालाहे सु सभु किछु पावै जिस नो किरपा निरंजन केरी ॥
सोई साहु सचा वणजारा जिनि वखरु लदिआ हरि नामु धनु तेरी ॥
सभि तिसै नो सालाहिहु संतहु जिनि दूजे भाव की मारि विडारी ढेरी ॥16॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! जो मनुष्य आपकी सिफत सालाह करता है।उसको सब कुछ प्राप्त होता है।क्योंकि उस पर माया-रहित प्रभू की कृपा होती है। हे हरी ! जिसने आपके नाम (रूपी) धन असबाब लादा है वही शाहूकार है और सही मायने में वणजारा व्यापारी है। हे संत जनो ! जिस प्रभू ने माया के मोह का टिॅबा (मन में से) गिरा के निकाल दिया है।आप सभी उसी की सिफत सालाह करो। 16।
सलोक ॥
कबीरा मरता मरता जगु मुआ मरि भि न जानै कोइ ॥
ऐसी मरनी जो मरै बहुरि न मरना होइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे कबीर ! मरता मरता (वैसे तो) सारा संसार ही मर रहा है।पर किसी ने भी (सच्चे) मरने की जाच नहीं सीखी। जो मनुष्य इस तरह की सच्ची मौत मरता है।उसे फिर मरना नहीं पड़ता। 1।
मः 3 ॥
किआ जाणा किव मरहगे कैसा मरणा होइ ॥
जे करि साहिबु मनहु न वीसरै ता सहिला मरणा होइ ॥
मरणै ते जगतु डरै जीविआ लोड़ै सभु कोइ ॥
गुर परसादी जीवतु मरै हुकमै बूझै सोइ ॥
नानक ऐसी मरनी जो मरै ता सद जीवणु होइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3। मुझे तो ये पता नहीं कि (सच्चा) मरना क्या होता है और हमें कैसे मरना चाहिए। अगर मालिक मन से ना विसरे।तो मरना आसान हो जाता है (भाव।मनुष्य आराम से ही माया के प्रभाव से बच जाता है)। मरने से सारा संसार डरता है।हर कोई जीना चाहता है। गुरू की कृपा से जो मनुष्य जीवित ही मरता है।वह हरी की रजा को समझता है। हे नानक ! इस तरह की मौत जो मरता है।(भाव।जो मनुष्य प्रभू की रजा में चलता है) उसे अटल जीवन मिल जाता है। 2।
पउड़ी ॥
जा आपि क्रिपालु होवै हरि सुआमी ता आपणां नाउ हरि आपि जपावै ॥
आपे सतिगुरु मेलि सुखु देवै आपणां सेवकु आपि हरि भावै ॥
आपणिआ सेवका की आपि पैज रखै आपणिआ भगता की पैरी पावै ॥
धरम राइ है हरि का कीआ हरि जन सेवक नेड़ि न आवै ॥
जो हरि का पिआरा सो सभना का पिआरा होर केती झखि झखि आवै जावै ॥17॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जब हरी स्वामी खुद मेहरबान होता है तो अपना नाम (जीवों से) आप जपाता है। अपना सेवक हरी को प्यारा लगता है।उसको खुद ही सतिगुरू मिल के सुख देता है। प्रभू अपने सेवकों की आप लाज रखता है।(संसार को) अपने भक्तों के चरणों में ला डालता है। (और तो और) धर्म राज जो प्रभू का ही बनाया हुआ है।प्रभू के सेवक के नजदीक नहीं आता। (बात यहाँ पे खत्म होती है कि) जो मनुष्य प्रभू का प्यारा है (भाव।उसे सब लोग प्यार करते हैं); (और बाकी) और बहुत सारी सृष्टि खप-खप के पैदा होती है मरती है। 17।
सलोक मः 3 ॥
रामु रामु करता सभु जगु फिरै रामु न पाइआ जाइ ॥
अगमु अगोचरु अति वडा अतुलु न तुलिआ जाइ ॥
कीमति किनै न पाईआ कितै न लइआ जाइ ॥
गुर कै सबदि भेदिआ इन बिधि वसिआ मनि आइ ॥
नानक आपि अमेउ है गुर किरपा ते रहिआ समाइ ॥
आपे मिलिआ मिलि रहिआ आपे मिलिआ आइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3। सारा संसार (मुँह से) ‘राम राम’ कहता फिरता है पर इस तरह ‘राम’ पाया नहीं जाता; क्योंकि वह अपहुँच है इन्द्रियों की पहुँच से परे है। बहुत बड़ा है अतुल है और तोला नहीं जा सकता। कोई भी उसकी कीमत नहीं लगा सका (भाव।उसकी प्राप्ति का मूल्य किसी को नहीं पता) और किसी जगह से (मूल्य दे के) खरीदा भी नहीं जाता।(पर हाँ।एक तरीका है) अगर गुरू के शबद से (मन) भेदित हो जाए तो इस तरह प्रभू मन में आ बसता है। हे नानक ! प्रभू खुद तो गिनती से परे है।पर सतिगुरू की कृपा से (ये पता मिल जाता है कि वह सारी सृष्टि में) व्यापक है; प्रभू खुद ही हर जगह मिला हुआ है और (जीव के हृदय में) खुद ही आ के प्रगट होता है। 1।
मः 3 ॥
ए मन इहु धनु नामु है जितु सदा सदा सुखु होइ ॥
तोटा मूलि न आवई लाहा सद ही होइ ॥
खाधै खरचिऐ तोटि न आवई सदा सदा ओहु देइ ॥
सहसा मूलि न होवई हाणत कदे न होइ ॥
नानक गुरमुखि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ हे मन ! जिस धन से सदा ही सुख होता है वह धन ‘नाम’ है। इस धन को बिल्कुल घाटा नहीं।सदा लाभ ही लाभ है। खाने से और खर्चने से भी घाटा नहीं पड़ता।(क्योंकि) वह प्रभू सदा ही (ये धन) दिए जाता है। (यहाँ) कभी (इस धन संबंधी) कोई चिंता नहीं होती और (आगे दरगाह में) शर्मिंदगी नहीं उठानी पड़ती। (पर) हे नानक ! जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर की नजर करता है।
पउड़ी ॥
आपे सभ घट अंदरे आपे ही बाहरि ॥
आपे गुपतु वरतदा आपे ही जाहरि ॥
जुग छतीह गुबारु करि वरतिआ सुंनाहरि ॥
ओथै वेद पुरान न सासता आपे हरि नरहरि ॥
बैठा ताड़ी लाइ आपि सभ दू ही बाहरि ॥
आपणी मिति आपि जाणदा आपे ही गउहरु ॥18॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ उसे सतिगुरू के सन्मुख होने से (ये धन) मिलता है।प्रभू खुद ही सारे शरीरों में है और खुद ही सबसे अलग है। खुद ही (सब में) छुपा हुआ है और प्रत्यक्ष (दिखाई दे रहा है)। प्रभू खुद ही कई युग अंधेरा करके शून्य (अफुर) अवस्था में बरतता है; उस शून्य अवस्था के समय जीवों का मालिक प्रभू खुद ही खुद होता है; वेद पुरान शास्त्र आदि कोई भी धर्म पुस्तक तब नहीं होती। (जीवों को रच के) सब से अलग भी समाधि लगा के बैठा हुआ है (भाव।माया की रचना रच के भी इस माया के प्रभाव से स्वयं अलग व निर्लिप है)। प्रभू स्वयं ही (जैसे) गहरा समुंद्र है।वह कितना बड़ा है, ये बात वह स्वयं ही जानता है। 18।
सलोक मः 3 ॥
हउमै विचि जगतु मुआ मरदो मरदा जाइ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ संसार अहंकार में मरा पड़ा है।नित्य (नीचे ही नीचे) गरकता ही है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! जो मनुष्य आपकी सिफत सालाह करता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।