सोई साहु सचा वणजारा जिनि वखरु लदिआ हरि नामु धनु तेरी ॥
सभि तिसै नो सालाहिहु संतहु जिनि दूजे भाव की मारि विडारी ढेरी ॥16॥
कबीरा मरता मरता जगु मुआ मरि भि न जानै कोइ ॥
ऐसी मरनी जो मरै बहुरि न मरना होइ ॥1॥
किआ जाणा किव मरहगे कैसा मरणा होइ ॥
जे करि साहिबु मनहु न वीसरै ता सहिला मरणा होइ ॥
मरणै ते जगतु डरै जीविआ लोड़ै सभु कोइ ॥
गुर परसादी जीवतु मरै हुकमै बूझै सोइ ॥
नानक ऐसी मरनी जो मरै ता सद जीवणु होइ ॥2॥
जा आपि क्रिपालु होवै हरि सुआमी ता आपणां नाउ हरि आपि जपावै ॥
आपे सतिगुरु मेलि सुखु देवै आपणां सेवकु आपि हरि भावै ॥
आपणिआ सेवका की आपि पैज रखै आपणिआ भगता की पैरी पावै ॥
धरम राइ है हरि का कीआ हरि जन सेवक नेड़ि न आवै ॥
जो हरि का पिआरा सो सभना का पिआरा होर केती झखि झखि आवै जावै ॥17॥
रामु रामु करता सभु जगु फिरै रामु न पाइआ जाइ ॥
अगमु अगोचरु अति वडा अतुलु न तुलिआ जाइ ॥
कीमति किनै न पाईआ कितै न लइआ जाइ ॥
गुर कै सबदि भेदिआ इन बिधि वसिआ मनि आइ ॥
नानक आपि अमेउ है गुर किरपा ते रहिआ समाइ ॥
आपे मिलिआ मिलि रहिआ आपे मिलिआ आइ ॥1॥
ए मन इहु धनु नामु है जितु सदा सदा सुखु होइ ॥
तोटा मूलि न आवई लाहा सद ही होइ ॥
खाधै खरचिऐ तोटि न आवई सदा सदा ओहु देइ ॥
सहसा मूलि न होवई हाणत कदे न होइ ॥
नानक गुरमुखि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥2॥
आपे सभ घट अंदरे आपे ही बाहरि ॥
आपे गुपतु वरतदा आपे ही जाहरि ॥
जुग छतीह गुबारु करि वरतिआ सुंनाहरि ॥
ओथै वेद पुरान न सासता आपे हरि नरहरि ॥
बैठा ताड़ी लाइ आपि सभ दू ही बाहरि ॥
आपणी मिति आपि जाणदा आपे ही गउहरु ॥18॥
हउमै विचि जगतु मुआ मरदो मरदा जाइ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! जो मनुष्य आपकी सिफत सालाह करता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।