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अंग 554

अंग
554
राग Bihaagraa
राग: Bihaagraa · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मः 5 ॥
घटि वसहि चरणारबिंद रसना जपै गुपाल ॥
नानक सो प्रभु सिमरीऐ तिसु देही कउ पालि ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! (जिस मनुष्य के) हृदय में प्रभू के चरण-कमल बसते हैं और जिहवा हरी को जपती है। और प्रभू (जिस शरीर के होने से) सिमरा जाता है उस शरीर की पालना करो। 2।
पउड़ी ॥
आपे अठसठि तीरथ करता आपि करे इसनानु ॥
आपे संजमि वरतै स्वामी आपि जपाइहि नामु ॥
आपि दइआलु होइ भउ खंडनु आपि करै सभु दानु ॥
जिस नो गुरमुखि आपि बुझाए सो सद ही दरगहि पाए मानु ॥
जिस दी पैज रखै हरि सुआमी सो सचा हरि जानु ॥14॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। प्रभू स्वयं ही अढ़सठ तीर्थों को करने वाला है।खुद ही (उन तीर्थों पर) स्नान करता है। मालिक स्वयं ही जुगति में बरतता है और खुद ही नाम जपाता है। भय दूर करने वाला प्रभू खुद ही दयालु होता है और खुद ही सब तरह के दान करता है। जिस मनुष्य को सतिगुरू के माध्यम से समझ बख्शता है।वह सदा ही दरगाह में आदर पाता है। जिसकी लाज खुद रखता है वह ईश्वर का प्यारा सेवक ईश्वर का ही रूप है। 14।
सलोकु मः 3 ॥
नानक बिनु सतिगुर भेटे जगु अंधु है अंधे करम कमाइ ॥
सबदै सिउ चितु न लावई जितु सुखु वसै मनि आइ ॥
तामसि लगा सदा फिरै अहिनिसि जलतु बिहाइ ॥
जो तिसु भावै सो थीऐ कहणा किछू न जाइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ हे नानक ! गुरू के मिले बिना संसार अंधा है और अंधे ही काम करता है। वह सतिगुरू के शबद से मन नहीं जोड़ता जिस (शबद में मन जोड़ने) से हृदय में सुख आ बसे। तमो गुण में मस्त हुआ सदा भटकता है और दिन-रात (तमोगुण में) जलते हुए (उसकी उम्र) गुजरती है। (इस बारे में) कुछ नहीं कहा जा सकता।जो प्रभू को अच्छा लगता है।वही होता है। 1।
मः 3 ॥
सतिगुरू फुरमाइआ कारी एह करेहु ॥
गुरू दुआरै होइ कै साहिबु संमालेहु ॥
साहिबु सदा हजूरि है भरमै के छउड़ कटि कै अंतरि जोति धरेहु ॥
हरि का नामु अंम्रितु है दारू एहु लाएहु ॥
सतिगुर का भाणा चिति रखहु संजमु सचा नेहु ॥
नानक ऐथै सुखै अंदरि रखसी अगै हरि सिउ केल करेहु ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3। सतिगुरू ने हुकम दिया है (भरम का छउड़ पर्दा काटने के लिए) ये काम (भाव।इलाज) करो- गुरू के दर पर जा के (भाव।गुरू की चरणी लग के) मालिक को याद करो। मालिक सदा अंग-संग है (आँखों के आगे से) भरम के जाले उतार के हृदय में उसकी ज्योति को टिकाओ। हरी का नाम अमर करने वाला है, ये दारू बरतो। सतिगुरू का भाणा (मानना) चित्त में रखो और सच्चा प्यार (रूपी) रहणी (जीवन-शैली) (धारण करो)। हे नानक ! (यही दवा) यहाँ (संसार में) सुखी रखेगा और आगे (परलोक में भी) हरी के साथ मजे करेंगे। 2।
पउड़ी ॥
आपे भार अठारह बणसपति आपे ही फल लाए ॥
आपे माली आपि सभु सिंचै आपे ही मुहि पाए ॥
आपे करता आपे भुगता आपे देइ दिवाए ॥
आपे साहिबु आपे है राखा आपे रहिआ समाए ॥
जनु नानक वडिआई आखै हरि करते की जिस नो तिलु न तमाए ॥15॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू खुद बनस्पति के अठारह भार है (भाव।सारी सृष्टि की बनस्पति खुद ही है)।खुद ही उसे फल लगाता है। खुद ही माली है।खुद ही सिंचाई करता है और खुद ही (फल) खाता है। खुद ही करने वाला है।खुद ही भोगने वाला है।खुद ही देता है और खुद ही दिलवाता है। मालिक भी खुद है और रखवाला भी खुद है।खुद सब जगह व्यापक है। हे नानक ! (कोई विरला) सेवक उस प्रभू की सिफत सालाह करता है जिसको सारी सृष्टि का कर्ता-धर्ता (होते हुए भी) रक्ती मात्र भी कोई तमा नहीं। 15।
सलोक मः 3 ॥
माणसु भरिआ आणिआ माणसु भरिआ आइ ॥
जितु पीतै मति दूरि होइ बरलु पवै विचि आइ ॥
आपणा पराइआ न पछाणई खसमहु धके खाइ ॥
जितु पीतै खसमु विसरै दरगह मिलै सजाइ ॥
झूठा मदु मूलि न पीचई जे का पारि वसाइ ॥
नानक नदरी सचु मदु पाईऐ सतिगुरु मिलै जिसु आइ ॥
सदा साहिब कै रंगि रहै महली पावै थाउ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ जो मनुष्य (विकारों में) लिबड़ा हुआ (यहाँ संसार में) लाया गया।वह यहाँ आ के (और विकारों में ही) फसता है (और शराब आदि कुकर्मों में पड़ता है)। पर जिसके पीने से बुद्धि मारी जाती है (अनाब-शनाब) बकने का जोश आ चढ़ता है। अपने व पराए की पहचान नहीं रहती। मालिक की ओर से धक्के पड़ते हैं। जिसके पीने से (प्रभू) पति बिसर जाता है और दरगाह में सजा मिलती है। ऐसी चंदरी शराब जहाँ तक बस चले कभी नहीं पीनी चाहिए। हे नानक ! प्रभू की मेहर की नजर से ‘नाम’ रूपी नशा (उस मनुष्य को) मिलता है।जिसे गुरू आ के मिल जाए। वह मनुष्य सदा मालिक के (नाम के) रंग में रहता है और दरगाह में उसको जगह (भाव।इज्जत) मिलती है। 1।
मः 3 ॥
इहु जगतु जीवतु मरै जा इस नो सोझी होइ ॥
जा तिनि॑ सवालिआ तां सवि रहिआ जगाए तां सुधि होइ ॥
नानक नदरि करे जे आपणी सतिगुरु मेलै सोइ ॥
गुर प्रसादि जीवतु मरै ता फिरि मरणु न होइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जब इस संसार को (भाव।संसारी जीवों को) समझ आती है तब ये जीवित ही मरता है (भाव।माया में विचरते हुए भी माया से उपराम रहता है;) (पर) सूझ तभी आती है जब प्रभू खुद जगाता है।जब तक उसने (माया में) सुला रखा है।तब तक सोया रहता है। हे नानक ! यदि प्रभू अपनी मेहर की नजर करे।तो वह खुद (संसार को) सतिगुरू मिलाता है। और सतिगुरू की कृपा से (संसार) जीवित रहते हुए ही मर जाता है।फिर दुबारा मरना नहीं होता (भाव।जनम-मरण से बच जाता है)। 2।
पउड़ी ॥
जिस दा कीता सभु किछु होवै तिस नो परवाह नाही किसै केरी ॥
हरि जीउ तेरा दिता सभु को खावै सभ मुहताजी कढै तेरी ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। उस प्रभू को किसी की काण (डर) नहीं क्योकि सब कुछ होता ही उसका किया हुआ है; (बल्कि)। हे हरी ! सारी सृष्टि आपकी मुथाज है (क्योंकि) हरेक जीव आपका ही दिया खाता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 5॥ हे नानक ! (जिस मनुष्य के) हृदय में प्रभू के चरण-कमल बसते हैं और जिहवा हरी को जपती है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।