घटि वसहि चरणारबिंद रसना जपै गुपाल ॥
नानक सो प्रभु सिमरीऐ तिसु देही कउ पालि ॥2॥
आपे अठसठि तीरथ करता आपि करे इसनानु ॥
आपे संजमि वरतै स्वामी आपि जपाइहि नामु ॥
आपि दइआलु होइ भउ खंडनु आपि करै सभु दानु ॥
जिस नो गुरमुखि आपि बुझाए सो सद ही दरगहि पाए मानु ॥
जिस दी पैज रखै हरि सुआमी सो सचा हरि जानु ॥14॥
नानक बिनु सतिगुर भेटे जगु अंधु है अंधे करम कमाइ ॥
सबदै सिउ चितु न लावई जितु सुखु वसै मनि आइ ॥
तामसि लगा सदा फिरै अहिनिसि जलतु बिहाइ ॥
जो तिसु भावै सो थीऐ कहणा किछू न जाइ ॥1॥
सतिगुरू फुरमाइआ कारी एह करेहु ॥
गुरू दुआरै होइ कै साहिबु संमालेहु ॥
साहिबु सदा हजूरि है भरमै के छउड़ कटि कै अंतरि जोति धरेहु ॥
हरि का नामु अंम्रितु है दारू एहु लाएहु ॥
सतिगुर का भाणा चिति रखहु संजमु सचा नेहु ॥
नानक ऐथै सुखै अंदरि रखसी अगै हरि सिउ केल करेहु ॥2॥
आपे भार अठारह बणसपति आपे ही फल लाए ॥
आपे माली आपि सभु सिंचै आपे ही मुहि पाए ॥
आपे करता आपे भुगता आपे देइ दिवाए ॥
आपे साहिबु आपे है राखा आपे रहिआ समाए ॥
जनु नानक वडिआई आखै हरि करते की जिस नो तिलु न तमाए ॥15॥
माणसु भरिआ आणिआ माणसु भरिआ आइ ॥
जितु पीतै मति दूरि होइ बरलु पवै विचि आइ ॥
आपणा पराइआ न पछाणई खसमहु धके खाइ ॥
जितु पीतै खसमु विसरै दरगह मिलै सजाइ ॥
झूठा मदु मूलि न पीचई जे का पारि वसाइ ॥
नानक नदरी सचु मदु पाईऐ सतिगुरु मिलै जिसु आइ ॥
सदा साहिब कै रंगि रहै महली पावै थाउ ॥1॥
इहु जगतु जीवतु मरै जा इस नो सोझी होइ ॥
जा तिनि॑ सवालिआ तां सवि रहिआ जगाए तां सुधि होइ ॥
नानक नदरि करे जे आपणी सतिगुरु मेलै सोइ ॥
गुर प्रसादि जीवतु मरै ता फिरि मरणु न होइ ॥2॥
जिस दा कीता सभु किछु होवै तिस नो परवाह नाही किसै केरी ॥
हरि जीउ तेरा दिता सभु को खावै सभ मुहताजी कढै तेरी ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 5॥ हे नानक ! (जिस मनुष्य के) हृदय में प्रभू के चरण-कमल बसते हैं और जिहवा हरी को जपती है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।